एक दिन कार की बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गई तो मारुति हेल्पलाइन वालों के बताए टिप्स पर कुछ ज्यादा ही अमल करते हुए अब मैं कार की बैटरी बिलकुल अनावश्यक खर्च नहीं करता। यहां तक कि एफएम पर भी पाबंदी लगा दी है, मतलब म्यूजिक आन नहीं करता। वैसे, गाड़ी चलाते वक्त म्यूजिक सुनने से कंसनट्रेशन भंग होता है, दिल्ली पुलिस मानती है और चालान भी कर देती है। यह सही भी लगता है क्योंकि जिस कदर ट्रैफिक है उसमें तो हर पल चौकन्ना रहना ही पड़ेगा वरना ले ली जान या फिर दे दी जान, फटाक से। ऐसे में जब गाना वाना सब बंद हो तो 45 मिनट का घर से आफिस और आफिस से घर वाला सफर कटे कैसे। तो भईजान, अपना कंठ खोला, गला खंखार के साफ किया और लगे कार में चिल्लाने। प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी, हो गई मैं मतवारी.....जोर से चिल्लाकर न गायेंगे तो कैलाश खेर बुरा मान जायेंगे। जब भी यह गाना गाता हूं तो संजय त्रिपाठी कानपुर आईनेक्स्ट वाले की याद आ जाती है। क्या गाता है बंदा, इस्टाइल में, गला खोलकर, दिल जोड़कर। तो आज यही गाना गाते-गाते आया लेकिन जैसा कि हर बार होता है, गाना आधा अधूरा ही गा पाता हूं क्योंकि लाइनें याद नहीं होतीं। हर बार संजय को फोन करना पड़ता है, संजय क्या है इसके आगे। लेकिन इस बार सोचा, चलो आफिस पहुंचकर सर्च करता हूं, और वाकई बात बन गई। एक शाम तेरे नाम ब्लाग पर ढेर सारे खूबसूरत गीत देखने को मिले। मन ललच गया, सोचा अपने भड़ासियों को भी पढ़ा ही देते हैं। अंकित माथुर ने मुंह का जायका बिगाड़ रखा है तो इसे ठीक कौन करेगा। तो फिर लीजिए, पढ़िए और गुनगुनाइए......मेरठ से मुंबई तक की सफल यात्रा करने वाले समकालीन महान सूफी गायक कैलाश खेर की पेशकश....
प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी
हो गई मैं मतवारी
बलि बलि जाऊँ अपने पिया को
कि मैं जाऊँ वारी वारी
मोहे सुध बुध ना रही तन मन की
ये तो जाने दुनिया सारी
बेबस और लाचार फिरूँ मैं
हारी मैं दिल हारी..हारी मैं दिल हारी..
तेरे नाम से जी लूँ, तेरे नाम से मर जाऊँ..
तेरे जान के सदके में कुछ ऐसा कर जाऊँ
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी
इश्क जुनूं जब हद से बढ़ जाए
हँसते-हँसते आशिक सूली चढ़ जाए
इश्क का जादू सर चढ़कर बोले
खूब लगा दो पहरे, रस्ते रब खोले
यही इश्क दी मर्जी है, यही रब दी मर्जी है,
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी
कि मैं रंग-रंगीली दीवानी
कि मैं अलबेली मैं मस्तानी
गाऊँ बजाऊँ सबको रिझाऊँ
कि मैं दीन धरम से बेगानी
की मैं दीवानी, मैं दीवानी
तेरे नाम से जी लूँ, तेरे नाम से मर जाऊँ..
तेरे जान के सदके में कुछ ऐसा कर जाऊँ
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी
साभारः एक शाम तेरे नाम
23.11.07
बिगड़े जायके को संगीत से ठीक करें......प्रीत की लत मोहे...
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यशवंत सिंह yashwant singh
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22.11.07
ऊंची दुकान फ़ीका पकवान!! "कबाब फ़ैक्टरी नोएडा..."
कई लोगो से तारीफ़ सुनने के बाद मैने व अन्य ने अपनी टीम को एक तथाकथित
रूप से उम्दा समझे जाने वाले रेस्टौरेण्ट में खाने पर ले
जाने की तजवीज़ की। मेरी शादी, एक दोस्त की बेटी होने की,
और एक अन्य साथी को अपने जनम्दिन की पार्टी देनी थी।
इरादा हुआ कि रैडिसन ग्रुप से संबंधित रेस्टौरेण्ट कबाब फ़ैक्टरी में जाया जाये।
खैर साहब हम सभी ने आज दोपहर के खाने की छुट्टी की
और शाम की रंगीन सोच में डूब गये।शाम को एक छोटी सी
ट्रेनिंग के बाद हम लोग अपने अपने वाहनों से पहुंच गये नोएडा
सेक्टर १८ के "कबाब फ़ैक्टरी" में।
शुरुआती दौर पर तीन तरह के कबाब पेश किये गये, ठीक ठाक थे।
कुछ ज़्यादा लज़्ज़तदार नही थे,उपर से चिकन मलाई कबाब परोसे गये जिनका
चिकन कई दिन से सडा हुआ था। खाने पर मालूम दिया कि चिकन खट्टा है,
और पकाया भी सही से नही गया है।
रेस्टोरेण्ट मैनेजर से कहा तो साला हमे ही पहाडे पढाने लगा।
हमने दिल को समझाया चलो कोई बात नही मेन कोर्स
में खाना अच्छा मिलने वाला है, रही सही कसर पूरी कर लेंगे।
अब बारी थी स्टार्टर्स के बाद मेन कोर्स की,हमने मेन्यू पूछा
मालूम हुआ कि सिर्फ़ दाल मखनी और दाल फ़्राई परोसी जाती है,
और एक वेजीटेरियन सब्ज़ी। भई अब तो हमारे सब्र का बांध टूटना ही था।
एक सेकण्ड में सीनियर मैनेजर मिस्टर शेखर और मास्टर शेफ़ मोहम्मद वकील साहब
तलब कर लिये गये, वो हमारे पास आये हमसे कुछ लम्हो तक गुफ़तगू की,
हमे गिनाने लगे कि किन किन नामी गिरामी शेफ़ व हस्तियों के साथ उन्होने
दाल पकाने का तजुर्बा हासिल किया है। उसी दाल को वो यहां पर अपने
पंच सितारा ग्राहकों को परोसते हैं। हमने पूछा कि भई
कबाब वगैरह खिलाने के बाद आप कुछ कोरमा वगैरह तो परोसिये,
कहने लगे कि भई यहां तो बस दाल ही परोसी जाती है।
पांच सितारा होटल के सितारे तो दूर की बात हमें तो वहां पर
कांटे ही कांटे नज़र आ रहे थे चारो ओर। सर्विस के नाम पर धब्बा।
कोई कटोरी रख कर जा रहा है तो चम्मच का कहीपता नही,
कोई पानी का गिलास रख कर जा रहा है तो मालूम नही पानी कब भरेगा।
खाना "ना" खाने के बाद जब हमसे मीठे के लिये पूछा गया तो
मालूम चला कि शाही टुकडा, फ़िरनी, गुलाब जामुन और मुज़ाफ़िर
नाम की डिश उप्लब्ध हैं हम सभी ने सोचा कि ट्रेलर इतना दकियानूसी था,
एण्डिंग अच्छी हो जाये शायद।
लेकिन यहां पर भी इन लोगो ने हमारी सोच की ऐसी तैसी कर डाली
शाही टुकडे के नाम पर दूध में भीगी हुई ब्रेड परोसी गई।
और दाम? बस पूछिये मत 900 रुपये प्रति व्यक्ति.......कुल मिला
कर मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव काफ़ी निराशाजनक रहा,
मै किसी भी भडासी या किसी अज़ीज़ को वहां खाने की सिफ़ारिश कभी नही करूंगा चूंकि
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Ankit Mathur
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अब बर्दाश्त नही होता...
यशवंत जी, नमस्कार
बहुत दिन भड़ास को देख पढ़ लिया, अब बर्दाश्त नही होता है सोचा चलो आज अपनी भड़ास निकल कर मन हल्का कर लिया जाये। भड़ास पाठशाला में आज मेरा पहला दिन होगा इसलिए कुछ सकुचाया कुछ सहमा सा दाखिल हो रहा हूँ, thoda सा होम वर्क करके laya हूँ उसको ही कर number दे दें। आपकी नजर हाल में ही लिखी कुछ line कर रहा हूँ . एक sulagti हुई pratikriya कि उम्मीद है ............
gar chand मेरे कमरे का bulb होता,
तो यह chadar chandni में dhul जाती
और tare sajte मेरे takiye per
यह khidki kahkashan पे khul jati
fhir suraj मेरे अख़बार कि ibarat bunta
subaha चाय कि payali में ghul jati
यह oas palkon per phisalti ayese
कि उम्मीद की सब kaliyan fhir khil jati
हर रात यही khawab लिए सो रहता हूँ
हर दिन एक haqiqat से aankh khul jati
hayatumar- hindustan meerut
@rediffmail.com
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mindtwister
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नहीं पकड़ूंगा कलम, नहीं लिखूंगा कालम
कालम लिखने में आफत बन गया था बीसीसीआई, नौकरी बचानी है तो बोर्ड कि माननी ही पड़ेगी। काफी लंबे समय के बाद मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर (कर्नल) अपने नाम से न्याय नहीं कर पाए और बीसीसीआई के आगे झुक गए। बीसीसीआई और वेंगी के बीच काफी लंबे से चल रहा खींचातानी आज समाप्त हो गया। कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद कर्नल ने बीसीसीआई से कहा कि वे आगे से कोई कालम नहीं लिखेंगे।
जब झुकना ही था तो बात का बतंगड़ क्यों बनाया
कुछ दिनों से कर्नल के एक समाचार पत्र में कालम लिखने का विवाद इस तरह गहराया कि बोर्ड बोर्ड ने कर्नल से यह कह दिया कि कालम लिखने का इतना ही शौक है तो छोड़ दो रास्ट्रीय चयन समिति। इसके जवाब में कर्नल कहाँ चुप बैठने वाले, उन्होने बोर्ड को करारा जवाब देते हुए कहा कि मुझे कालम लिखने से कोई नहीं रोक सकता है।
कर्नल का भड़ास किस पर कहर bankar टूटेगा
भारत-पाक वनडे क्रिकेट सीरिज बिना आलोचनाओं व बयानबाजी के साथ समाप्त हो गया। बोर्ड और चयनकर्ता इसे पचा नहीं पाए और आपस में ही भीड़ गए। बोर्ड उन्हें अनुशासन में रहने कि हिदायत दे रहा है जबकि कर्नल ऎंड कम्पनी ने उसे नकारते हुए साफ-साफ इस्तीफे कि धमकी दे दी। हालांकि पिछले १५ सालों से समाचार पत्रों में कालम लिखने वाले कर्नल इस आदेश से खफा तो जरूर होंगे, इसका भड़ास वे जल्द ही किसी पर निकालेंगे और वह किस पर कहर बनाकर टूटेगा यह आने वाला समय ही बताएगा।
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आलोक सिंह रघुंवंशी
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ब्राह्मण और बकरे की कहानी
किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था। एक बार वह अपने यजमान से एक बकरा लेकर अपने घर जा रहा था। रास्ता लंबा और सुनसान था। आगे जाने पर रास्ते में उसे तीन ठग मिले। ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर तीनों ने उसे हथियाने की योजना बनाई। एक ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “पंडित जी यह आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं। यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं।”ब्राह्मण ने उसे झिड़कते हुए कहा, “अंधा हो गया है क्या? दिखाई नहीं देता यह बकरा है।” पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था। अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम।” थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला। उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या आपको पता नहीं कि उच्चकुल के लोगों को अपने कंधों पर कुत्ता नहीं लादना चाहिए।” पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया। आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला। उसने भी ब्राह्मण से उसके कंधे पर कुत्ता ले जाने का कारण पूछा। इस बार ब्राह्मण को विश्वास हो गया कि उसने बकरा नहीं बल्कि कुत्ते को अपने कंधे पर बैठा रखा है। थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया। इधर तीनों ठग ने उस बकरे को मार कर खूब दावत उड़ाई। इसीलिए कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है।
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Ashish Maharishi
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जोकरों का समूह
श्रीलंका के अनुभवी बल्लेबाज मर्वन अटापट्टू ने चयनकर्ताओं से परेशान होकर उन्हें जोकरों का समूह कह दिया था। बाद में उन्हीं के चलते क्रिकेट को ही बाय-बाय कर दिया। एक तरफ वे क्रिकेट को अलविदा कर रहे थे तो इंडिया में शाहरुख़ खान को बीसीसीआई ने क्रिकेट मैंचो के बहाने फिल्मों का प्रमोशन करने का मुद्दा उठाया। इसके बाद शाहरुख़ ने भी कभी भी क्रिकेट नहीं देखने का कसम खा लिया। इस मामले के बाद यह लगाने लगा हैं कि केवल श्रीलंका के चयनकर्ता ही नहीं पुरा बीसीसीआई ही जोकरों का समूह है। क्रिकेट मैदान पर उपस्थित शाहरुख़ पर आपत्ति जताने वाला बीसीसीआई भूल गया है कि वह किसी को मैच देखने से नहीं रोक सकता। इस मामले में भी बोर्ड दो धडों में बंट गया है। एक तरफ जहाँ रत्नाकर सेत्टी शाहरुख़ कि आलोचना कर रहे हैं वहीं ललित मोदी ने साफ कह दिया कि शाहरुख़ बीसीसीआई के सम्मानीय अतिथि हैं । बीसीसीआई इसी तरह आपसी बयानबाजी में रोक नहीं लगाया तो उसे पूरी दुनिया ही जोकरों का समूह कहेगा।
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आलोक सिंह रघुंवंशी
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21.11.07
ये कड़क सरकार... और इतने चैनल.....!!!
न्यूज से वास्ता रखने वालों और खासकर टीवी मीडिया से जुड़े लोगों के लिए दो महत्वपूर्ण खबरें हैं। एक से समझ में आता है कि आगे बाहर की दुनिया से सब कुछ इतना आसानी से नहीं होने वाला है और उनकी आजादी पर सवाल उठाने के लिए कमर कसा जा चुका है। अब अगर चुप रहे तो आगे बहुत देर तक और दूर तक झेलेंगे टीवी मीडिया वाले। दूसरी खबर से पता चलता है कि न सिर्फ आगे बाहर से मुश्किलें हैं बल्कि भीतरी घमासान भी घनघोर होने वाला है। मार्केट में ढेर सारे दुकानदार अपनी दुकानें लेकर आ रहे हैं। लग रहा है कि मछलीबाजार सा माहौल होने वाला है....। खैर, पढ़िए और थोड़ी टिप्पणी भी करिए, ज्यादा कहने का मन हो तो पोस्ट डालिए।
इन दोनों खबरों को आडियेन्समैटर्स डाट काम से उठाया है और हूबहू डाल रहा हूं, बिना अनुवाद किये, अगर किसी भाई को दिक्कत हो तो अपने पड़ोसी से पूछ ले........:):)
जय भड़ास
यशवंत
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The Government of India's 'Sting' Operation
The Government is seriously working to finalize the draft of the proposed Broadcasting Service Regulation Bill in close consultation with various stakeholders and State Governments. The Bill, inter alia, seeks to set up a Broadcasting Regulatory Authority of India to deal with content issues, amongst others. However, it is not specifically focused on Sting Operations. The present draft of the Bill is available on the Ministry’s website www.mib.nic.in
TV channels are autonomous and there is no proposal to curb their autonomy. However, they have to abide by the Cable Television Networks (Regulation) Act 1995 and rules framed there under and any other regulation issued from time to time.
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255 TV Channels Allowed Uplinking
The Ministry of Information & Broadcasting has permitted 149 news & current affairs TV channels and 106 non-news & current affairs TV channels to uplink from India, as on 15.11.2007. Five (5) TV channels, uplinked from abroad, have also been permitted to downlink in India. In addition to this, 52 TV channels, uplinked from abroad, have been provisionally permitted to downlink in India. The permissions are for operation on an all-India basis and are not State-wise.
Out of the total 255 channels permitted to uplink from India, 123 channels have Indian ownership whereas 132 have varying components of foreign equity in the parent company. Out of the total 57 TV channels uplinked from abroad and permitted to downlink in India, 2 TV channels have Indian equity whereas the remaining 55 TV channels have foreign equity.
The Ministry is considering the proposed draft of the Broadcasting Services Regulation Bill. The said Bill is still at drafting stage and is under consultation with States/UTs and other stakeholders. No time frame can be given for finalization of the said Bill as consultation is on-going process.
This information was given by Shri P.R. Dasmunsi, Minister for Information and Broadcasting & Parliamentary Affairs in a written reply to a question in the Parliament today.
साभारः audiencematters.com
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यशवंत सिंह yashwant singh
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जब गब्बर की शिन सेन से मुलाकात हुई
कल बच्चों ने फिर ज़िंद की कि पापा कहानी सुनाओ। क्या सुनाऊं, सोचता रहा। बचपन में जितनी कहानियां सुन रखी थीं हुंड़ार, सियार, भेड़िया, राजकुमार, हनुमान, राम, शंकर, राक्षस, नदी....सब सुना डाली। अब क्या सुनाऊं। तब लगा कि ये बच्चे जिन नए कैरेक्टर्स को बेहद पसंद करते हैं, उन पर कहानियां गढ़ी जाएं। और, इन कैरेक्टर्स को मैं भी खूब पसंद करता हूं। जैसे, मिस्टर बीन, टाम जेरी, शिन सेन....। लंबी लिस्ट है, लेकिन मेरे पसंदीदा ते यही चारों हैं। शिन सेन मुझे बड़ा अच्छा लगता है। मेरे बच्चे जितना पसंद करते हैं, शायद उनसे भी ज्यादा। वो खुलकरर हंसकर अपनी खुशी का इजहार कर लेते हैं तो मैं हलके हलके मुस्कराते हुए। कहानी सुनाने की जिद मैंने पूरी कि शिन सेन को लेकर एक और नई कहानी गढ़ते हुए। साथ में ले आया गब्बर सिंह को। कहानी कुछ यूं बनी....(इसमें मजा तब आयेगा जब ये पढ़ते हुए आप शिन सेन और गब्बर की स्टाइल में बोलने की भी कोशिश करें)
एक बार गब्बर घोड़े से जा रहा था। रास्ते में उसे शिन सेन मिला। वो गब्बर के घोड़े के सामने खड़ा हो गया। घोड़ा रुक गया। गब्बर को गुस्सा आया। वो बोला...
गब्बर - ये घोड़ा क्यों रुका सांबा
सांबा- आगे एक बच्चा है
गब्बर- मेरे घोड़े को आजतक कोई आदमी नहीं रोक पाया, इस छटंकी से कैसे रुक गया घोड़ा, लगता है इसे अपने जान की परवाह नहीं है या यह गब्बर को नहीं जानता
शिन सेन- ओ हो, ये छटंकी क्या होता है
गब्बर- इस आलू जैसी शक्ल वाले छटंकी की इतनी हिम्मत कैसे हो रही है कि वो जबान लड़ा रहा है गब्बर से
शिन सेन- ये गब्बर कौन है
गब्बर - तेरे सामने खड़ा है छटंकी, तुझे जान प्यारी है या नहीं
शिन सेन- जान खाने में चाकलेट जैसा लगता है क्या
गब्बर - तू हटता है सामने सा या घोड़े को तेरे उपर चढ़ा दूं...
शिन सेन- हां, मुझे घोड़े पे चढ़ना है, मुझे घोड़े पे चढ़ना है, मुझे घोड़े पर चढ़ा दो मोटू, घोड़े पर चढ़ा दो, बड़ा मजा आएगा, ओए ओए बड़ा मजा आएगा (गब्बर की तरफ पिछवाड़ा करके नाचते हुए)
गब्बर - ये पागल लड़का मरेगा आज घोड़े के पैरों से
शिन सेन- पागल तो बड़े लोग होते हैं
गब्बर - रुक, घोड़ा चढ़ाता हूं तेरे पर....चल घोड़े...
((शिन सेन ने लेजर लाइट वाला खिलौना आन किया और घोड़े की आंख पर रोशनी फेंक दी, घोड़ा हिनहिना कर पैर उटाता है और पीछे की ओर पलटकर भागता है, गब्बर गिरा धड़ाम से))
शिन सेन- बड़ा मजा आया, घोड़े ने मोटे को गिराया, बड़ा मजा आया, घोड़े ने मोटे को गिराया
शिन सेन- गिरने में मजा आता है अंकल
गब्बर- सांबा, कितनी गोलियां हैं रे
सांबा- तीन सरदार
गब्बर- तो ये लो, दो निकाल दिया..ठांय ठांय, अब कितनी बची
सांबा- एक सरदार
शिन सेन- तुम्हें काउंटिंग नहीं आती क्या मोटू....तीन में से दो निकलने पर तो एक ही बचेगा, फिर पूछ क्यों रहे हो...लगता है पढ़ने में कमजोर थे
((सांबा हंसता है, पूरा गिरोह हंसता है))
गब्बर - चुप रहो हरामजादों, तुम लोग खड़े खड़े मुंह क्या देख रहे हो
शिन सेन- तुम्हारा मुंह बहुत मोटा है, देखन में अच्छा लगता है.....
....
....
खैर..हरि अनंत, हरि कथा अनंता...
इस पूरी कहानी को सुनाते हुए मैंने गब्बर और शिन सेन की बोलने की स्टाइल की नकल करने की पूरी कोशिश की जिससे बच्चों को मजा आ गया। मुझे लगा, ये प्रयोग तो ठीक है। रोज एक कहानी इसी तरह बना सकते हैं....पारंपरिक भारतीय पात्र और एक विदेशी पात्र की मुलाकात कराकर। जैसे...मिस्टर बीन की मुलाकात अगर लालू यादव से करा दी जाए तो कैसे रहेगा....
नए भड़ासियों का स्वागत....भड़ासियों की संख्या 40 हो चुकी है। लेकिन अभी ढेर सारे भड़ासी, जो चुपचाप भड़ास देखते हैं लेकिन मेंबर नहीं बन रहे, अनुरोध है कि भई जल्द मैदान में आओ और अपनी क्रिएटिविटी दिखाओ, माने भड़ास निकालो।
फिलहाल इतना ही
जय भड़ास
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यशवंत सिंह yashwant singh
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पत्रकार सहायता कोष!!
अनिल भारद्वाज जी के कथन से मै सहमत हूं।
नीरज इतिहास नही, हमारे दिलों में वो हमेशा वर्तमान रहेंगे !!
नीरज जी के परिवार को आर्थिक सहायता की आवश्यकता नही है।
शायद इस समय उन्हें भावनात्मक सहयोग की अधिक आवश्यकता है।
स्व० श्री नीरज चौधरी के नाम पर सहायता कोष की स्थापना के प्रस्ताव
को पूर्ण रूप से विश्लेषित करने के उपरांत ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जायेगा।
इस राहत कोष की स्थापना से पूर्व, नीरज जी के परिवारीजनों की सहमति
लेना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
कोष की स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य एक पत्रकार को उचित सम्मान देना है,
इस प्रयास में यदि उनके परिवार की सहमति प्राप्त होती है,
तभी इस दिशा में आगे कदम बढाया जायेगा,
अन्यथा इस कोष के लिये किसी अन्य उप्युक्त नाम की खोज की जायेगी।
इस विषय पर सभी मेम्बरान से सुझाव आमंत्रित हैं
विशेष रूप से सहारनपुर से जुडे़ सभी साथी।
अनिल भाई आशा है आप इस विषय पर उचित मार्गदर्शन करेंगे।
धन्यवाद...
अंकित माथुर...
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Ankit Mathur
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Sir ji ki jay ho.
bhadas par hamara bhi admission sweekaqr karein.
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brijesh dubey
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20.11.07
भा.ज.पा एवं जनता दल (एस) का हनीमून
कर्नाटक भा.ज.पा. और जनता दल (एस) का गठबन्धन की सुहागरात मनने से पहले ही तलाक हो गया इसमें किसकी गलती थी यह तो दोनो गठबन्धन करने पता लगायें किन्तु इस तरह के गठबन्धन को रोकने की कोई कानूनी या सामाजिक व्यवस्था होनी चाहिये क्योकि यदि कोई गठबन्धन होता है तथा कुछ दिन का तमाशा दिखा कर टूट जाता है तो निंशन्देह ही इससे जनता का धन और विश्वास दोनो का ही ह्रास होता है। क्या ये दोनो पार्टियाँ इसकी भरपाई ईमानदारी से करेंगी या इसकी भरपाई जनता स्वंय करें। यह तो शायद आने वाले चुनाव में ही पता लगेगा। परन्तु मेरी राय में इस तरह के मामले में राज्यपाल को भी पूरी तरह आश्वस्त होकर तथा यदि कानूनी रूप संभव हो तो लिखित समझोते के बाद ही बहुमत के लिए बुलाना चाहिये।
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Ajit Kumar Mishra
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आज समाज दिल्ली में लांच, शुभकामनाएं...
गुड मार्निंग समूह का आज समाज नामक अखबार दिल्ली में आज लांच कर दिया गया। इसकी लांचिंग सूचना प्रसारण मंत्री और पंजाब के मुख्यमंत्री की मौजूदगी में की गई। अखबार के समूह संपादक मधुकर उपाध्याय हैं और स्थानीय संपादक प्रदीप सिंह हैं। पहली नजर में अखबार काफी आकर्षक और प्रभावकारी है। इस अखबार का भविष्य अच्छा दिख रहा है क्योंकि इसका प्रजेंटेशन और लेआउट काफी भला और साफ-सुथरा है। हालांकि अभी काफी कुछ किए जाने की संभावना भी है। जैसे इस अखबार को अपनी वेबसाइट और अपना मोबाइल कंपेन भी लांच करना होगा ताकि वह पाठकों को इंटरएक्टिवटी के जरिए जोड़ सके। साथ ही कंटेंट पर लगातार काम करना होगा क्योंकि सारी लड़ाई कंटेंट की है। दिल्ली में प्रसार पाना आसान नहीं है इसलिए उसे मार्केटिंग स्ट्रेटजी भी नई तरीके की प्लान करनी होगी। कुछ ही दिनों पहले दिल्ली में मेल टुडे भी लांच किया गया। इस तरह से दो नए अखबारों के आने से दिल्ली के मार्केट में लड़ाई और तीखी हो गई है।
फिलहाल भड़ास की तरफ से इन दोनों अखबारों के बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं और यहां काम कर रहे सभी पत्रकारों और गैर पत्रकारों को बधाई...बेहतर अखबार लाने के लिए।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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पत्रकार या बेकार
किसी ज़माने में अकबर इलाहबादी ने कहा था कि :-
खींचो न तीरो कमान न तलवार निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो तब अखबार निकालो।
अखबार की ताकत को बयाँ करने वाला यह जुमला शायद आज बेकार हो गया है या फिर शायद बदलते समय के साथ इस शेर और अखबारो की शक्ति क्षीण पड़ गई है। एक समय अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले एवं स्वतंत्र अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम माने जाने वाले इन अखबारों की स्थिति आज ऐसी हो गई है य कर दी गई है कि इन्हे भी अपनी लेखनी और कलम की शक्ति का प्रयोग करने की जगह ज्ञापन सौंपने और विरोधात्मक रैली निकालने जैसे दूसरे दर्जे के साधन अपनाने पड़ रहे हैं। हाल ही में समाचार पत्रों को नए संस्कार देने वाली जबलपुर नगर मे एक ऐसी घटना घटी जो यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इतना कमज़ोर हो गया है कि हवा का एक कमज़ोर झौका उसे आरम से हिला दे? जिस देश में पत्रकारों के लिए यह कहा जाता है कि:-
शक्ल से देखने में यह न गोरे हैं न काले हैं।
न इनके पास पिस्टल हैं न इनके पास भाले हैं।
तबीयत से हैं यह बेफिक्र फाकामस्त जीवन में,
कलम के और कागज़ के धनी अखबार वाले हैं।
उसी देश में पत्रकारों की कलम इतनी भोथरी हो गई है कि उन्हें ज्ञापन सौंपने और विरोधात्मक रैली निकालने जैसे दोयम दर्जे के हथकण्डे अपनाने पड़ रहे हैं। यह बात जितनी हास्यास्पद है उतनी शर्मनाक भी। हम यह भूल गए कि हम उस देश के पत्रकार हैं जिसमे आपातकाल का विरोध समाचार पत्रों ने अपने सम्पादकीय पृष्ठ को खाली रख कर किया था। स्वयं इस क्षेत्र से जुड़े होने के कारण मुझे भी इस बात का क्षोभ होता है कि दूसरों के अधिकारों के हनन के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले माध्यम को आज अपने अधिकारों एवं अस्तित्व की रक्षा करना मुश्किल पड़ रहा है। और आज यह बात कहने में थोड़ा दुख तो होता है परंतु कोई हिचक नहीं होती कि सर्वप्रथम मिशन के रूप मे प्रारंभ होने वाली यह विधा धीरे-धीरे प्रोफेशन में बदली उसके बाद सेंसेशन मे तब्दील हुई। यहाँ तक तो ठीक था परंतु पर आत्मा में कहीं न कहीं एक गहरी चोट लगती है कि अब वह धीरे-धीरे कमीशन में बदल रही हैं। आज विलासिता ने व्यक्ति को इतना निष्क्रीय कर दिया है कि वह कोई भी कदम बिना किसी विचार के उठा लेता है। और यही कारण है कि आज कलम के सिपाहियों को कलम की शक्ति से ज़्यादा भरोसा अन्य चीज़ों पर है।
यदि इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र डाली जाए तो यह सम्पूर्ण घटनाक्रम महज़ एक समाचार पत्र मालिक और एक नेता के व्यक्तिगत विवाद से अधिक और कुछ नहीं है। दोनों व्यक्ति एक तरीके से अपनी-अपनी शक्ति प्रदर्शन में लगे हुए हैं। जहां एक ओर नेता अपने राजनीतिक हथकण्डों एवं जन समर्थन का शोषण कर रहा है वहीं समाचार पत्र के मालिक अपने व्यक्तिगत हितों के लिए पत्रकारों का अनुचित प्रयोग कर रहे हैं और एक व्यक्तिगत विवाद को राजनीतिक चादर से ढांकने की कोशिश कर रहे हैं।
यहाँ से नगर की पत्रकारिता में एक नकारत्मक कड़ी यह भी जुड़ती है कि यह घटना जनमानस में पत्रकारिता की छवि को ज़रूर धूमिल करती है और कहीं न कहीं आम जनता के मन मे पत्रकारो और पत्रकारिता की प्रतिबद्धता पर एक सवालिया निशान लगा देती है। और ऐसा इसिलिए क्योंकि पत्रकारों ने अपने कार्य की मूल प्रवृति को छोड़ कर एक दोयम दर्जे का मार्ग अपना लिया जिसकी उनसे अपेक्षा नहीं की गई थी।
कभी कभी यह लगता है कि यह विधा कहीं अपनी चिता अपने ही हांथों से तो तैयार नहीं कर रही? परंतु यहं भी उम्मीद की एक किरण मुझे इसमे भी दिखाई देती है कि हो सकता है कि अपनी हाथों से तैयार की गई चिता मैं नष्ट होने के बाद यह विधा एक बार पुनः जन्म लेगी स्वयं की अस्थियों से फीनिक्स पक्षी की तरह।
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विकास परिहार
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विश्वविद्यालयों के पुस्तकालय इंटरनेट पर!
अगर गूगल का ये सपना सच हो जाता है तो दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर आप इंटरनेट के ज़रिए प्रमुख विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध पर जानकारी एकत्र कर पाएँगे.
गूगल ने चार प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के साथ समझौता किया है जिसके अंतरगत उनकी किताबों का संग्रह ऑनलाइन उपलब्ध होगा.
इनमें ऑक्सफ़ोर्ड, हारवर्ड, मिशिगन विश्वविद्यालयों के साथ-साथ न्यूयॉर्क सार्वजनिक पुस्तकालय शामिल हैं.
ऐसा करने के लिए गूगल को पहले लाखों क़ागज़ों को 'स्कैन' करना होगा और उन्हें 'डिजिटल फ़ाईल' में बदलना होगा. फिर इस सामग्री को इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाएगा.
गूगल का कहना है कि उसने एक नई तकनीक तैयार की है जिससे ये काम सस्ते में, जल्द और आसानी से किया जा सकेगा.
इस तकनीक से असली दस्तावेज़ ख़राब भी नहीं होंगे. हालांकि गूगल ने इस तकनीक के बारे में और जानकारी नहीं दी है.
उदाहरण के तौर पर ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की बोडलेन पुस्तकालय में 19वीं सदी में लिखी गई किताबों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाएगा.
इनमें कई ऐसी किताबें भी हैं जिनकी सिर्फ़ एक ही प्रति बची है और वो बाज़ार में उपलब्ध नहीं है.
गूगल का कहना है कि इस नई योजना से उसे कोई आर्थिक फ़ायदा नहीं होगा. उसका उद्देश्य सिर्फ़ जानकारी और ज्ञान को आसानी से सब तक पहुँचाना है.
मगर इन पुस्तकालयों में रखी गई किताबों के लेखक और उनके प्रकाशकों को इसके व्यापारिक फ़ायदे ज़रूर होंगे.
गूगल की वेबसाईट पर किताबें बेचने वाली कंपनियों के कई विज्ञापन भी नज़र आते है, उनकी बिक्री पर भी इस क़दम का अच्छा असर हो सकता है.
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Ankit Mathur
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फेसबुक और आरकुट में फरक क्या है, कोई समझाए....
बहुत पहले फेसबुक पर अपना एकाउंट इसलिए खोल लिया था कि फेसबुक की चर्चा काफी हो रही थी और कई बड़े लोगों ने इसमें अपना अकाउंट बना रखा था। लेकिन शुरुआती कुछ एक दो दिनों तक फेसबुक खोलकर दायें बायें माउस हिलाने-डुलाने के दौरान कुछ खास चीज मेरे भेजे में न घुस सकी जिससे मैं फेसबुक और आरकुट में कोई खास अंतर कर सकूं। इसलिए फेसबुक के अपने अकाउंट को अनाथ छोड़कर आरकुट पर ही दिल लगाये रहा। लेकिन इन दिनों फेसबुक से ढेरों मित्रों के फ्रेंड रिक्वेस्ट मेल बाक्स में आ रहे हैं। मैं नहीं चाहता कि दो जगह एक ही काम के लिए एकाउंट रखूं। कोई तकनीकी विद्वान समझाए कि आरकुट और फेसबुक में बुनियादी फर्क क्या है और क्यों आरकुट अकाउंट के साथ फेसबुक अकाउंट रखना जरूरी है।
फर्जी आईडी और नाम से भड़ासी ना बनें
दूसरी बात, भड़ास के जितने भी मेंबर हैं उनमें से ज्यादातर को मैं जानता हूं लेकिन कुछ एक फर्जी आईडी से फर्जी नाम से भी लोग हैं जिन्हें आज डिलीट कर दिया। कृपया अगर कोई फर्जी नाम से भी आए तो वो मुझे विश्वास में लेकर आए ताकि यह तो पता रहे कि आखिर जो मेंबर है उसकी पहचान क्या है। मैं पहचान नहीं खोलूंगा यह वादा है लेकिन मुझे भरोसा तो रहेगा कि हां, उस बंदे पर मुझे विश्वास है। वैसे भी भड़ास की मेंबरशिप कलेजे वालों के लिए है, डरपोक लोगों के लिए नहीं जो बातें भी कहना करना चाहते हैं और पहचान भी छिपाना चाहते हैं। इसी के चलते परेशान आत्मा नामक भड़ासी पर गाज गिरा दी है। उनकी मेंबरशिप हटा दी गई है। कृपया परेशान आत्मा से अनुरोध है कि वो मुझे फोन कर विश्वास में ले लें, मेरा दिल हमेशा अपने दोस्तों और भाइयों के लिए पाक-साफ रहता है, चाहें उसने जितना भी बड़ा कर्म या कुकर्म किया हो। दोस्ती है तो है।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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पत्रकार नीरज चौधरी के निधन पर ग्वालियर से रविशेखर की शोक संवेदना
Respected Yashwant Jee,
Congratulations For again starting of the "Bhadas".
Bhadas realy unique world for Young Journalist around allover the world. I really think that this blog is going to create new history in media feild.
I am feeling very sorrowful & really condolance about the death of Young Journalist Neeraj. I really happy that you are doing so much for him, and your step is really appreciable, And I am also looking forward to do some help. How I can help Please mail me.
Again Congrates for Bhadas!
"Ravishekhar"
Radio Chaska 95 FM & Dainik Navbharat
Gwalior (M.P)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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नीरज के नाम पर कोष या पुरस्कार का सुझाव अच्छा है
अनिल भारद्वाज जी, जो कि सहारनपुर के हैं और नीरज के परिजनों से मिलकर उनकी इच्छाओं को हम तक पहुंचाया, धन्यवाद। नीरज के परिजनों की इच्छाओं का हम कद्र करते हैं और उनके परिजनों को मदद की बजाय हम भी यही चाहेंगे कि नीरज के नाम से कोष बनाया जाए जिससे किसी मदद के इच्छुक पत्रकार का भला किया जा सके।
इस प्रस्ताव के पूरा होने तक हम नीरज के परिजनों के नाम पर इकट्ठा किए जा रहे मदद को स्थगित करते हैं। चूंकि अभी किसी से पैसे लिए नहीं गए थे क्योंकि शुरू में ही यह बात थी कि जब तक नीरज के परिजनों से बात न हो जाए, हम पैसे इकट्ठा करने के बजाय दान देने वालों का नाम प्रकाशित करेंगे। इसलिए अब इन सभी बंधुओं को जिन्होंने अपना नाम मदद के लिए प्रस्तावित किया, धन्यवाद देते हुए हम उनसे आग्रह करेंगे कि वो अपने विचार नीरज कोष या नीरज पत्रकारिता पुरस्कार के लिए दें।
शुक्रिया
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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नीरज के परिवार को आर्थिक सहायता नही आपका प्यार चाहिऐ
नीरज कि आकस्मिक मौत का समाचार जिसे भी मिला भरोसा नही हुआ । भड़ास परिवार से इस शोक संत्राप्त परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने पर विचार हुआ , यह बहुत अच्छी सोच व पहल है । यशवंत भाई आपने इस बारे में सोचा और शुरुआत कि अच्छा लगा ।
भड़ास पर पढ़ने के बाद मेने नीरज के परिवार से इस विषय में बात कि तो उन्होने कहा कि वह उन सभी लोगो का धन्यवाद करते है जिन्होंने इस विषय में सोचा , उन्होने कहा कि उन्हें आर्थिक सहायता कि नही उन्हें सिर्फ दुआओं कि आवश्यकता है।
यशवंत भाई मैं आपके विचारों कि क़द्र करता हूँ और आपसे अनुरोध करता हूँ कि जो सिलसिला नीरज भाई के नाम से शुरू हुआ है, उसे नीरज कोष का नाम देते हुए यह राशी किसी जरूरतमंद कि सहायता में लगा दें। यही नीरज को हम सभी कि और से सच्ची श्रधांजलि होगी। मेरी और से भी नीरज कोष के जरिये किसी गरीब कि मदद के लिए १००० रूपये किस अकाउंट में जमा करने है बता दीजयेगा । मेरा मोबाइल नम्बर है 9412232433
यशवंत भाई भड़ास पर जहाँ भी नीरज के परिवार कि आर्थिक सहायता के विषय में लिखा है वह कृपया कर हटा दें। यह उसके परिवार वालों कि इच्छा है।
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Anil Bhardwaj
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कादम्बिनी में भड़ास ( पूर्व संकलन से!! )
भडास के कुछ चुनिंदा लेख मेरे पास संरक्षित हैं, यदि कोई सदस्य अपने पूर्व में
लिखी गई प्रविष्टी को ब्लाग पर दोबारा डालना चाहे तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
mickymathur@gmail.com
कादम्बिनी में भड़ास
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कादम्बिनी के अक्टूबर 07 अंक में ब्लॉगिंग की चर्चा की गई है। ब्लॉगिंग -ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति में भड़ास सहित हिन्दी के कई ब्लॉग्स की बात की गई है। मूल आलेख के कुछ अंश.... ------------------------......ब्लॉगिंग शब्द अंग्रेजी के 'वेब लॉग' (इंटरनेट आधारित टिप्पणियां) से बना है, जिसका तात्पर्य ऐसी डायरी से है जो किसी नोटबुक में नहीं बल्कि इंटरनेट पर रखी जाती है। पारंपरिक डायरी के विपरीत वेब आधारित ये डायरियां (ब्लॉग) सिर्फ अपने तक सीमित रखने के लिए नहीं हैं बल्कि सार्वजनिक पठन-पाठन के लिए उपलब्ध हैं। चूंकि आपकी इस डायरी को विश्व भर में कोई भी पढ़ सकता है इसलिए यह आपको अपने विचारों, अनुभवों या रचनात्मकता को दूसरों तक पहुंचाने का जरिया प्रदान करती है और सबकी सामूहिक डायरियों (ब्लॉगमंडल) को मिलाकर देखें तो यह निर्विवाद रूप से विश्व का सबसे बड़ा जनसंचार तंत्र बन चुका है। उसने कहीं पत्रिका का रूप ले लिया है, कहीं अखबार का, कहीं पोर्टल का तो कहीं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा के मंच का। उसकी विषय वस्तु की भी कोई सीमा नहीं। कहीं संगीत उपलब्ध है, कहीं कार्टून, कहीं चित्र तो कहीं वीडियो। कहीं पर लोग मिल-जुलकर पुस्तकें लिख रहे हैं तो कहीं तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। ब्लॉग मंडल का उपयोग कहीं भाषाएं सिखाने के लिए हो रहा है तो कहीं अमर साहित्य को ऑनलाइन पाठकों को उपलब्ध कराने में। इंटरनेट पर मौजूद अनंत ज्ञानकोष में ब्लॉग के जरिए थोड़ा-थोड़ा व्यक्तिगत योगदान देने की लाजवाब कोशिश हो रही है। सीमाओं से मुक्त अभिव्यक्ति ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत। त्वरित अभिव्यक्ति, त्वरित प्रसारण, त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गई है। ब्लॉगों की दुनिया पर केंद्रित कंपनी 'टेक्नोरैटी' की ताजा रिपोर्ट (जुलाई २००७) के अनुसार ९.३८ करोड़ ब्लॉगों का ब्यौरा तो उसी के पास उपलब्ध है। ऐसे ब्लॉगों की संख्या भी अच्छी खासी है जो 'टेक्नोरैटी' में पंजीकृत नहीं हैं। समूचे ब्लॉगमंडल का आकार हर छह महीने में दोगुना हो जाता है। सोचिए आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, तब अभिव्यक्ति और संचार के इस माध्यम का आकार कितना बड़ा होगा?आइए फिर से अभिव्यक्ति के मुद्दे पर लौटें, जहां से हमने बात शुरू की थी। हालांकि ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित होने के और भी कई कारण हैं जो चाहें, लिखें और अगर चाहते हैं कि इसे दूसरे लोग भी पढ़ें तो ब्लॉग पर डाल दें। किसी को जँचेगा तो पढ़ लेगा वरना आगे बढ़ जाएगा। ब्लॉगिंग वस्तुत: एक लोकतांत्रिक माध्यम है। यहां कोई न लिखने के लिए मजबूर है, न पढ़ने के लिए।लेकिन अधिकांश विशुद्ध, गैर-व्यावसायिक ब्लॉगरों ने अपने विचारों और रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए ही इस मंच को अपनाया। जिन करोड़ों लोगों के पास आज अपने ब्लॉग हैं, उनमें से कितने पारंपरिक जनसंचार माध्यमों में स्थान पा सकते थे? स्थान की सीमा, रचनाओं के स्तर, मौलिकता, रचनात्मकता, महत्व, सामयिकता आदि कितने ही अनुशासनों में निबद्ध जनसंचार माध्यमों से हर व्यक्ति के विचारों को स्थान देने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लेकिन ब्लॉगिंग की दुनिया पूरी तरह स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और मनमौजी किस्म की रचनात्मक दुनिया है। वहां आपकी 'भई आज कुछ नहीं लिखेंगे' नामक छोटी सी टिप्पणी का भी उतना ही स्वागत है जितना कि जीतेन्द्र चौधरी की ओर से वर्डप्रेस पर डाली गई सम्पूर्ण रामचरित मानस का। 'भड़ास' नामक सामूहिक ब्लॉग के सूत्र वाक्य से यह बात स्पष्ट हो जाती है- कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिए... मन हल्का हो जाएगा..। शैशव काल में है हिंदी ब्लॉगिंगहिंदी में अभी ब्लॉगिंग अपने शैशव काल में है। अंग्रेजी में जहां ब्लॉगिंग १९९७ में शुरू हो गई थी वहीं हिंदी में पहला ब्लॉग दो मार्च २००३ को लिखा गया। समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच महज छह साल की दूरी है लेकिन ब्लॉगों की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच कई प्रकाश-वर्षों का अंतर है। अंग्रेजी अंग्रेजी में जहां ब्लॉगिंग १९९७ में शुरू हो गई थी वहीं हिंदी में पहला ब्लॉग दो मार्च २००३ को लिखा गया। समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच महज छह साल की दूरी है लेकिन ब्लॉगों की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच कई प्रकाश-वर्षों का अंतर है.....-
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लेखक= - बालेन्दु शर्मा दाधीच
balendu@gmail.com
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अंकित माथुर
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Ankit Mathur
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19.11.07
पहला पहला प्यार है .......
मामला जब प्यार से जुडा हो तो थोड़ा संवेदनशील हो सकता है। लोग इस बात को माने या नहीं माने लेकिन कई शोध कहते हैं कि जीवन में रोमांस साल भर से अधिक ही समय के लिए रहता है। पिछले दिनों इटली के कुछ वैज्ञानिकों ने भी अपने शोध में यही पाया था. शोध के अनुसार जीवन में पहला-पहला-प्यार का जो संगीत बजता है, उसके पीछे असल भूमिका संभवतः मस्तिष्क में रहनेवाले एक रसायन की होती है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि किन्हीं दो लोगों के बीच जिनके बीच नया-नया प्यार पनपा हो उनमें इस प्रोटीन का स्तर ज्यादा होता है।लेकिन जब ऐसे लोगों की जिनके बीच संबंध लंबे समय से चले आ रहे हों, उनकी जाँच की गई, या ऐसे लोगों को परखा गया जो अभी प्यार की गाड़ी में सवार नहीं हुए हों, तो देखा गया कि इस प्रोटीन का स्तर कम था।
कुछ लोग इस शोध से इंकार भी कर सकते हैं लेकिन यह तो सही है कि हम अपने आस पास ऐसे लोगों को ज्यादा देखते हैं जिनके प्यार में पहले जैसी वाली बात नहीं रहती हैं. उनके जीवन में पहले जैसा भड़कीला प्यार नहीं होता है.
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Anonymous
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ek chhoti si (500/-) madad
yashwant ji
namaskar
yuva patrakar neeraj ka hamare beech se chala jana ek behad dukhad ghatna hai. aapne jo pahal ki hai nisandeh kabiletareef hai. main bhi neeraj ke parivar ko ek chhoti si (500/-)madad karna chahta hoon. hum sab jo bhi kar rahe hain ye koi aarthic madad nahi hai balki neeraj ke parivar par aai is vipda mein hum sab unke sath hain is baat ka sanket hai.
munendra gangwar
bareilly (up)
ph no. 09927093293
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यशवंत सिंह yashwant singh
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चीजों को क्यों न सार्वजनिक नजरिये से देखें
दोस्तो एक सुझाव है, कई बार कई लोगों से इस बारे में सुन चुका हूं. लेकिन कोई ठोस काम नहीं हुआ. नीरज जी के बहाने इसे अंजाम दें तो क्या बेहतर न होगा. सुझाव है कि हम सभी एक सहायता फंड बनाएं. इसे बावक्त जरूरत मित्रों को दिया जाए. जो जितनी मदद कर सकता है करे. मैं इस पूरी कार्य योजना के लिए यशवंत जी, अजय ब्रह्मात्मज जी, रियाज भाई, अंकित माथुर जी और राहुल का नाम समन्वय के लिए प्रस्तावित करता हूं. यह लोग पहल करें. भडास का मंच तो है ही. इसमें जो अन्य चीजें आगे बढानी हो वे भडास के जरिए बढाई जा सकती हैं. हां सिर्फ भावुक होकर हामी न भरे.
सचिन
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सचिन श्रीवास्तव
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18.11.07
दुख में ये साथी भी शामिल हैं........
नीरज के परिजनों की मदद के लिए हजार रुपये की मदद की पेशकश कुछ और साथियों ने की है,उनके नाम इस तरह हैं-
विशाल शुक्ला, कोलकाता
अशोक मधुप, बिजनौर
जितेंद्र चौधरी, कुवैत
(यहां एक बात का उल्लेख करना चाहता हूं कि दिवंगत नीरज का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध है और उन्हें किसी मदद की दरकार नहीं है, इस आधार पर कुछ साथियों का कहना है कि यशवंत, यह बेकार की कवायद कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह सही है कि हम जो मदद कर रहे हैं उससे कुछ ज्यादा होने वाला नहीं है लेकिन इस दुख के मौके पर हम सभी पत्रकार और गैर पत्रकार और नीरज के परिजनों के शुभेच्छु एकजुट होकर कोई पहल कर रहे हैं तो इसके पीछे आर्थिक मकसद शायद कम महत्वपू्र्ण है, दुख की घड़ी में हम लोगों की सामूहिक ताकत नीरज के परिजनों के साथ दिखना ज्यादा बड़ी बात है। आप सभी लोग क्या सोचते हैं,कृपया अवगत करायें।)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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नीरज के निधन पर एक साथी की तरफ से शोक संवेदना
प्रिय मित्र
पत्रकार नीरज जी की मौत का समाचार अत्यंत दुखद है..और उनके परिवार के साथ मेरी पूरी संवेदना है..लकिन मुझे इस बात की ख़ुशी है.की पीडा के इस दौर मे आप उनके परिवार को सार्थक संबल प्रदान करने मे जुटे है... निश्चित तौर पर आपके इस प्रयास से जहा दुखी परिवार को सहारा मिलेगा वही आज के युवा पत्रकारों को एक नई प्रेरणा मिलेगी...पत्रकार जगत आपके इस सक्रिए प्रयास का हमेशा आभारी रहेगा.
आपका युवा साथी
अपूर्व पंकज
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यशवंत सिंह yashwant singh
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परेशान आत्मा, सामने तो आओ, छिपकर वार बेकार है
परेशान आत्मा नामक भड़ासी ने हिंदुस्तान अखबार से नौकरी छोड़ने वालों की लिस्ट प्रकाशित कर कुछ कथित सैद्धांतिक सूत्रीकरण करने की कोशिश करते हुए एक पोस्ट भड़ास पर डाली थी, इसे मैंने डिलीट कर दिया। इसके पीछे सिर्फ एक तर्क है कि अगर आप सच कहने की हिम्मत रखते हैं और दूसरों को जगाना चाहते हैं तो पहले आप खुद सही नाम और सही पहचान से सामने आइए। छिपकर किसी संस्थान, किसी व्यक्ति पर वार को मैंने कभी पसंद नहीं किया और न करूंगा। इसलिए सभी फर्जी मेल आईडी वाले भड़ासियों और साथियों से अनुरोध है कि वे इस तरह की बातें लिखना चाहते हैं तो स्वागत है लेकिन आप असलनी नाम और पहचान के साथ लिखें। हर अखबार और हर टीवी चैनल से लोग आते जाते रहते हैं, इसके पीछे कोई वाद या कोई तर्क ढूंढने की बजाय सिर्फ एक चीज सोचना चाहिए कि जिसे जहां ज्यादा पद और पैसा मिल रहा है, वो वहां जा रहा है। जिसे नहीं मिल रहा वो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की शैली में आंय बांय शांय बकता रहता है। भइया, आप भी ट्राइ मारो। निजी तौर पर मैं कहूं तो पिछले दो वर्षों में हिंदुस्तान अखबार में जो सुधार और बदलाव दिखा है, कंटेंट और लेआउट के लेवल पर वो बेहद सराहनीय है। अच्छे की तारीफ करना चाहिए। तो परेशान आत्मा, ज्यादा परेशानी छिपने छुपाने से ही है, खुलकर और सहज तौर पर कहेंगे व रहेंगे तो आत्मा आपकी खुश रहेगी।
नए भड़ासी साथियों का स्वागत.......
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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इधर से गुजरा तो सोचा सलाम....
इस ब्लाग के तमाम सदस्यों को मेरा नमस्कार
ब्लागिंग की दुनिया में नया हूं लेकिन भड़ास की चर्चा बहुत सुनी थी लिहाजा फ्री मेंबरशिप का फायदा उठाने से खुद को रोक न सका। उम्मीद है आप सभी का सहयोग मिलेगा।
आपका- यथार्थ
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यथार्थ
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17.11.07
पुर्नजंम हुआ भडा़स का
आदरणी यशवंत जी पुन: आगमन हेतु बधायी । एक अनुरोध है कि पहले की तरह फिर अदृश मत हो जाना । भड़ास के माध्यम से आपने वह मंच पूरे भारत के मीडिया कर्मीयों को प्रदान किया है जिससे कि वह आपस में अपने दू:ख सुख्ा आपस में बतिया सके ।
कानपुर से भड़ास के लियें
शशिकान्त अवस्थी
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शशिश्रीकान्त अवस्थी
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ऐ ख़ाक़नशीनों उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुंचा है, जब तख़्त गिराये जायेंगे...जब ताज उछाले जायेंगे|
यशवंत भाई के उदगार पढे़।
पढ कर ये पंक्तियां खुद ब खुद ज़हन में आ गईं।
ऐ ख़ाक़नशीनों उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुंचा है,
जब तख़्त गिराये जायेंगे...जब ताज उछाले जायेंगे
मेरे खयाल से पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है, जिसमें वाह्य आकर्षण ज़बर्दस्त है।
लोग खुद ब खुद इसकी ओर आते चले जाते हैं, और जिन लोगों को झुक कर
सलाम लेने की आदत हो जाती है उनके लिये ये क्षेत्र छोडते नही बनता।
यहां पर मै किसी व्यक्ति विशेष का नाम नही लेना चाहता लेकिन रुतबे की
हनक सभी पत्रकारों में आ ही जाती है, चाहे वो कस्बे, तहसील, जिला या राष्ट्रीय
स्तर का पत्रकार हो। हमें यह बात नही भूलनी चाहिये कि घूरे के भी दिन पलटते हैं।
और सेर को सवा सेर मिलते देर नही लगती, इसी लिये ऊंची आवाज़ मेंनही बोलना चाहिये।
ऐसे लोगो के लिये मै अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि
सांप,कुत्ता, बिच्छू, बिल्ली जो चाहो पाल लो, लेकिन खुदा के लिये गलत फ़हमी कभी ना पालो।
इस दुनिया में एक से बढ कर एक का बाप बैठे हैं।
जय भडा़स!
इति सिद्धम...
अंकित माथुर...
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Ankit Mathur
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16.11.07
नीरज के परिवार को मदद देने के लिए आगे बढ़े कई हाथ
pankajshuklaa@gmail.com: नीरज के परिवार की सहायता के लिए मैं कुछ अर्थदान करना चाहता हूं। कैसे करना होगा, बता सकेंगे तो मेहरबानी होगी।
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आशीष said...
यशवंत जी नीरज जी वाली न्यूज़ काफी दुखी करने वाली न्यूज़ है.. आपका प्रस्ताव काबिले तारीफ है..मेरे लिए कोई आदेश हो तो कहें.
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आशीष महर्षि और पंकज शुक्ल, इन दो लोगों ने नीरज के परिजन को मदद करने का इरादा जताया है। मुझे लगता है कि ऐसी ही सोच कई और लोगों में भी है। मैं खुद करना चाहता हूं। ऐसे में इसे किस तरह किया जाए, मुझे ठीक ठीक नहीं पता। एक आइडिया आ रहा है, रियाज हाशमी या अंकित माथुर जो नीरज के मित्र भी रहे हैं और सहारनपुर के निवासी भी हैं, इसे कोआर्डिनेट करें। रियाज व अंकित से अनुरोध है कि वे कृपया मदद इकट्ठा करने के लिए तरीका बताएं। या तो एकाउंट पेयी चेक नीरज की पत्नी के नाम दिया जा सकता है या फिर कुछ और....मैं शायद सोच नहीं पा रहा इस वक्त। लेकिन हम सभी पत्रकार लोगों को कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए, इतना समझ में आ रहा है। शायद भड़ास के जरिए एक सार्थक काम हो सके। तो सबसे पहले रियाज और अंकित से चाहूंगा कि वो कृपया अपनी पहल के बारे में अवगत कराएं।
yashwant
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यशवंत सिंह yashwant singh
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ये बाजार है बाबू, न मैं बचा, न तुम
खैर, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय।
अभी पता नहीं चला कि देबांग आखिर हैं कहां और क्या कर रहे हैं।
श्रद्धांजलि.... : सहारनपुर में आईबीएन के पत्रकार नीरज चौधरी के निधन की दुखद सूचना से मर्माहत हूं। नीरज से दो-तीन अच्छी मुलाकातें थीं। एक बार सहारनपुर में होटल में रात में देर तक बैठे थे। एक बार नीरज दिल्ली आए थे, रियाज के साथ तो काफी देर तक बतियाते गपियाते और पीते खाते रहे। संभावनाओं से भरा चेहरा और चमकती आंखें अब भी याद हैं। छोटे जिले से होने के बावजूद जो पत्रकारीय चपलता और तेवर उनमें थे, वे ढेर सारे दिल्ली वालों में देखने को नहीं मिलते। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिजनों को इस दुखद घड़ी में खुद को संभालने का संबल।
यशवंत सिंह
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यशवंत सिंह yashwant singh
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आत्मा की परेशानी को समझिए और बस लिख भेजिए
भड़ास फिर से सब के लिए खुल गया. शायद मेरे नाम से आप लोंगों को अचंभा हो.
लेकिन क्या करूँ दुनियाँ में कोई आदमी ऐसा नही है जिसकी आत्मा कभी ना कभी परेशान ना होती हो. इस कारण मैने अपना नाम परेशान आत्मा रख लिया.
जब भी आपकी आत्मा परेशान होगी, यक़ीन दिलाता हूँ आपकी कलाम ज़रूर परेशान आत्मा के रूप में लिखने के लिए बेचैन होगी.
बस दिल और आत्मा की आवाज़ तो सुनिए.
परेशान आत्मा
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pareshan atma
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Labels: आत्मा
15.11.07
शोक समाचार
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Ankit Mathur
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लो फिर आ गये भड़ासी, अब ना रहेगी उदासी
भड़ास के दोबारा शुरु हो जाने पर सभी भड़ासीयों को शुभकामनाऐं। खासतौर पर यशवंत भाई को जिन्होने भड़ासियों को पुन: ये ब्लाग दे दिया। अब हमारे कई साथी जो भड़ास के बन्द हो जाने से निराश थे, वो खुश नज़र आयेंगें। उम्मीद है आप सभी लोग भड़ास के साथ-साथ रंगकर्मी को भी अपने विचारों से सुशोभित करेंगें। भड़ास और रंगकर्मी दोनो ही ब्लाग आप के लिये है जो कहना है खुलकर कहिये। चाहे हो अन्दर की बात या फिर किसी चिरकुट की कारस्तानी। (चिरकुट कहने से हमारी पुरानी कम्पनी के एक पुराने कुलीग को थोड़ी परेशानी होती है, इस लिये माफी के साथ ये शब्द इस्तेमाल कर रहा हुँ।) अपने दिल मे कुछ मत रखिये बस कह ड़ालिये मेरा मतलब है कि लिख ड़ालिये।
परवेज़ सागर
www.rangkarmi.blogspot.com
parvezsagar.cneb@gmail.com
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Parvez Sagar
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सुनिए, क्या कह रहे हैं वेद व्रत गिरी जी....
ढेर सारे ऐसे मेल आते हैं जो प्रमोशनल होते हैं। कई बार ये जानकारियां बेहद जरूरी होती हैं और कई बार अनावश्यक। जो जरूरी जानकारियां हैं उसे भड़ासियों से शेयर करने का दिल करता है। उम्मीद करता हूं, बाकी भड़ासी भी ऐसा करेंगे। तो ये जो वेदव्रत गिरी जी का मेल है, उसमें उन्होंने अपने 15 वर्षीय पत्रकारीय करियर के बाद कुछ निष्कर्ष निकालकर कुछ नया काम शुरू किया है। सिटीजन जर्नलिज्म का आजकल जोर है। कई लोग लगे हैं। मुंबई में शशि जी बिलकुल लंगोटा पहनकर चौबीसों घंटे के लिए जुट गए हैं। वेदव्रत जी ने भी आगाज कर दिया है। तो भई भड़ासियों, आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी तो है कि ये जो पत्रकारिता का दौर है, वाकई स्वर्णकाल है, बस आप अपने का नये मौकों के लायक तैयार करके रखिए। पढ़ते लिखते रहिए, तकनालजी से दोस्ती गांठते रहिए, नेट और नये ट्रेंड से गलबहियां करिए...देखिए, आप कहां से कहां पहुंचते हैं। दिक्कत बस यही है आप अपने बारे में जब आंकें तो कम न आंकें, आप वो हैं जो आपको खुद ही नहीं मालूम। सुबह सुबह भाषण देने का मूड नहीं था लेकिन क्या करें, कोई मिला ही नहीं तो सोचा चलो भड़ासियों के सामने ही निगल देते हैं। तो वेदव्रत जी को पढ़िए, जरूरी लगे तो संपरकियाइये, बतियाइये...
और हां, कई लोगों ने शिकायत की कि भड़ास का मेंबर बनने के दौर कोई इरर आ जा रहा है तो आज मैंने कुछ दुरुस्त किया है, अगर फिर दिक्कत आए तो जरूर बताएं....
यशवंत
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वेद व्रत गिरी का पत्र
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Dear Friends,
It's About MyNews Interactive
It is about a unique citizens' news portal - www.mynews.in. This has been widely appreciated as a pioneering initiative in citizen journalism in India. The www.mynews.in respects a writer in you. It also values your keen observations and invites you to express common concerns, which otherwise die out for want of suitable media. The www.mynews.in claims to be the first Indian Portal of its kind in many respects. It is a complete democratic forum. No prejudices for views and no bars on expressions. The ''of the people, by the people and for the people'' dictum comes alive with the www.mynews.in. We believe every citizen is a reporter/broadcaster for us and can freely contribute news/views/images/videos/blogs/debates/forums etc. What you think is of immense value for us and therefore be in public domain. We promote positive thinking, encourage critical analysis and dissenting voices for greater common good. We hold that your thoughts can help policy makers and professionals change and amend their approaches. You can have feed back about the impact of your dispatches on http://www.mynews.in/. Register yourself as citizen journalist and start sending us stories.
After 15 years in active journalism, I have come to a conclusion that we mainstream journalists have to ignore public interests for a variety of reasons. The focus of mainstream media suffers many biases. The voices of common people remain unheard. My endeavour, through www.mynews.in is to provide all thinking members of the society an opportunity to express themselves. The response is very encouraging.
I seek your esteemed participation in the mission as a citizen journalist and commentator. Please write for www.mynews.in and extend your support for outreaching www.mynews.in to one and all.
I am waiting for dispatches from your side. Please, reply.
How to Register with MyNews Interactive :
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For more assistance, use "FAQ" & "Helpguide" tabs. And I am also there always for assisting my ESTEEMED CITIZEN JOURNALISTS/REPORTERS.
Thanks with regards.
Yours' Sincerely:
VED VRAT GIRI
E-mail: vedvgiri@gmail.com
: vedvgiri@mynews.in
Cell Phone No.: 919826169126
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यशवंत सिंह yashwant singh
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14.11.07
परवेज के ब्लाग से एक और माल...., शादी की पार्टी कब दे रहो हो अंकित
अंकित और यशवंत जी को ढेरों शुभकामनाऐं
हमारे पुराने साथी अंकित माथुर ने कुंवारों की मंड़ली से इस्तीफा दे दिया है। अभी हाल ही मे वो ज़िन्दगीभर के लिये बेड़ियों मे जकड़े गये है। उनके साथ ये हादसा अपने शहर सहारनपुर मे ही पेश आया। अंकित को बांधने वाली हमारी भाभीजान भी सहारनपुर से ताल्लुक रखती है। माथुर जी इस नयी ज़िन्दगी के लिये ढेरों शुभकामनायें।
भड़ास के ज़रीये हिन्दी ब्लाग को नयी दिशा देने वाले हमारे साथी यशवंत सिंह जी ने नयी जगह नयी ज़िम्मेदारी सम्भाली है। इसके लिये उन्हे शुभकामनायें। उम्मीद है यशवंत भाई कामयाबी के नये रास्ते पर आगे बढते रहेगें। इसी उम्मीद के साथ आपका...................
परवेज़ सागर
Posted by PARVEZ SAGAR at 7:13 AM 1 comments
Show Original Post
अंकित माथुर said...
परवेज़ भाई, इन बेडियों से कौन बच पाया
है। आप तो हमसे भी पहले शहीद हो चुके थे।
लेकिन फ़िर भी हमें आपकी बधाई स्वीकार है।
November 7, 2007 6:55 AM
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(चोरी-चोरी बियाह कर लिया, भड़ासियों को बुलाया तक नहीं...चलो, भई, अब पार्टी तो दे दो....वैसे, शादी के बाद से अंकित काफी ठंडे से लग रहे हैं...तभी सब लिखना-बोलना बंद है.....यशवंत)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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परवेज का ब्लाग है रंगकर्मी, उनकी खुद की खबर पढ़िए...
आज तक को अलविदा, सीएनईबी से नाता
बहुत दिन बाद लिख रहा हूँ। दरअसल इस बीच वक्त ही नहीं मिल पाया। साढे चार साल तक "आज तक" के साथ काम किया। इस बीच ज़िन्दगी ने कई सबक सिखाये। कुछ अच्छे तो कुछ बुरे। बहुत कुछ था जो यहां सीखने को मिला। सबसे अहम ये कि दिल्ली मे काम करने वाले लोगों को समझने का अनुभव। जो शायद अभी भी पूरा नही हो पाया। खैर इस मुद्दे पर बात करुगां तो दूर तक चली जायेगी। बस कहना चाहूँगा उन लोगों के बारे मे जिन्होने मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाया और निराश होने पर मुझे प्रोत्साहित किया। यहां उनके बारे मे जितना लिखूँ कम है। वो हैं श्री जे पी दीवान और श्री राजेश बादल।
"आज तक" को अलविदा कहने के बाद मैने CNEB NEWS चैनल मे काम शुरु किया है। नया चैनल, नया ओहदा और नयी ज़िम्मेदारी इन दिनों थोड़ा व्यस्त चल रहा हूँ। एक अच्छी टीम बनाने की कवायद मे जुटा हूँ। कोशिश जारी है। काम थोड़ा सा मुश्किल है क्योंकि अधिकतर लोग यहां पर फ्रेशर है। जल्द ही ये अलग तरह का न्यूज़ चैनल आप लोगों के सामने होगा। ये चैनल भूत प्रेत नाग नागिन और अश्लीलता दिखाने के बजाय खबरें दिखायेगा। उम्मीद है सबको पसन्द आयेगा। अब लिखना बन्द कर रहा हूँ। बाकी बाते बाद मे होगीं।
परवेज़ सागर
साभारः रंगकर्मी
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यशवंत सिंह yashwant singh
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महिलाओं के लिए इंडिया टुडे का नया न्यूज़ पेपर
इंडिया टुडे ग्रुप जल्दी ही डेली मेल से साथ देश की राजधानी नई दिल्ली से एक समाचार पत्र शुरू करने जा रहा है, खबरों के अनुसार एक लाख बीस हजार कापी के साथ यह जल्दी लांच होने वाला है. यह ४८ पेज का पेपर होगा. यह समाचार पत्र विशेष रूप से महिलाओं के लिए निकाला जायेगा..साभार - बोल हल्ला
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Ashish Maharishi
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Invitation for VIKALP: A 10 day residential camp in Bihar from 22-31December 2007
Dear Friends
Greetings from Safar!
Safar is going to organize VIKALP a 10 day residential camp in the
Tariyani Chhapra Village of Bihar from 22nd to 31st December 2007. The
main aim of this camp is to explore various tools and ways of
communication, which give the participants some food for thought. The
camp will provide an opportunity for them to share their knowledge &
skill and to have an experience of rural life. We hope that it will
help the participants to begin a journey of their choice.
VIKALP is designed in such a way that it becomes an interesting
interactive learning experience. The participants will make
acquaintance with the new media technologies, interview the villagers,
and shoot photographs and videos. They will play with sound & images,
design books, make comics, write stories, poems, etc. Besides, there
will be a couple of community meetings, where the participants will
get to know about the local way of living, arts & crafts, culture and
practices.
No formal qualification is required to attend the workshop. We are
asking that people cover their own travel to-from Tariyani Chhapra and
contribute Rs.500 for food, accommodation and other accessories. Your
additional contribution will support other's participation. Safar is a
self-funded organization. It accepts event/program based support from
friends and well-wishers.
All are welcome, and please share the invitation with others. Last
date of registration is 25th November 2007. Let us know as early as
possible if you are interested in coming.
Tariyani Chhapra is 40 kilometers from Muzaffarpur Railway Station.
There are direct trains from almost all major cities to Muzaffarpur.
For registration and any other query please write to safar.delhi@gmail.com
or call @
+91 9811 972872 (Rakesh),
+91 9971 393 818 (Gautam)
Best Regards
Rakesh
for SAFAR
--
SAFAR a collective journey of researchers, journalists, students,
lawyers, activists, cultural practitioners and performing artists with
a deep commitment to the ideals of social and gender equality. This is
an open space for the dialogue, betterment and empowerment of the
marginalized.
http://safarr.blogspot.com
http://www.freewebs.com/safarindia
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यशवंत सिंह yashwant singh
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सितारों के आगे भी एक मुकम्मल जहाँ होगा !
आरकुट में फ्रेंड लिस्ट में 103 दोस्त हो गए। आज जो ताजा दोस्त बने हैं वो हैं मीडिया के छात्र विनय जायसवाल। उनकी बायोग्राफी पढ़ रहा था तो उसमें एबाउट मी खांचे में कुछ अच्छी चीज पढ़ने को मिली। सोचा, चलो भड़ासियों के सामने भी परोस दूं। अब क्या करें, पेट में कुछ पचता नहीं जो......
about me:
सितारों के आगे भी एक मुकम्मल जहाँ होगा !
उस जहाँ में सबसे सुंदर हमारा आशिया हिंदुस्तान होगा !
जहा न होगी गरीबी और बुराई !
जहा सबको नसीब रोटी,कपड़ा और मकान होगा !
हर एक होंगे जहा शिक्षित और हर हाथ को रोजगार होगा!
घिरिणित आतंकवाद की जगह यहाँ अमन का पैगाम होगा !
न होगा कोई भाषाई विभेद न कोई धार्मिक उन्माद होगा!
हम होंगे सिर्फ भारतीय और हमारा भारत देवताओ का वरदान होगा!
थम जाएँगी सरे विश्व की नज़रे हम पर
जब हममे वह प्रकाश बेशुमार होगा.............................
लोग कहते हैं हुई थी बारिश उस रोज़,
उन्हें क्या पता ग़म-ए-हिज़्र में रोया था कोई।
यूँ साए देख कर खुश होते हैं सब ग़ाफ़िल,
उन्हें क्या पता कल धूप में सोया था कोई।
कतरा-कतरा कर के मुस्कुराते हैं सभी,
उन्हें क्या पता चश़्म-ए-तर का रोया था कोई।
मंज़िल-ए-आखिर को चलते हैं अब राहिल,
उन्हें क्या पता इन राहों पर खोया था कोई।
रहते है साथ साथ मै और मेरी तनहाई--
करते है राज की बात मै और मेरी तनहाई--
दिन तो गुज्ञर जाता है लोगों की भीड़ में--
करते है बसर रात मै और मेरी तनहाई--
सांसो का क्या भरोसा कब छोड जाये साथ--
लेकिन रहेंगे साथ मै और मेरी तनहाई--
आए ना तुम्हे याद कभी भूल कर भी शायद--
करते है याद तुम्हे मै और मेरी तनहाई--
आ के पास क्यं दूर हो गये--?????
करते हैं तुम्हारा इंतजार मै और मेरी तनहाई .
विनय तक पहुंचने के लिए आप इस लिंक को क्लिक कर सकते हैं, बशर्ते आप का आरकुट में खाता चल रहा हो। लिंक है...
http://www.orkut.com/Profile.aspx?uid=4223539831650805970
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मीरा, अंकित, आलोक, रियाजुल, राहुल, विशाल....जमने लगी है मंडली। लेकिन अभी ढेर सारे भड़ासी गायब हैं। उनको खोज-खोजकर पकड़ना होगा, तभी असल भड़ास की शुरुआत होत सकेगी। अरे हां, वो सचिन कहां है, मेरठ से लुधियाना वाला। उसने अपने नये शहर के मिजाज पर अभी तक कुछ लिखा नहीं। उम्मीद है वो भी जल्द दर्शन देगा। रियाज सहारनपुरी, डा. मांधाता कोलकाता वाले, दिलीप मंडल जी....पता नहीं कहां हैं ये लोग....
फिर मिलते हैं....
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यशवंत सिंह yashwant singh
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सभी का स्वागत
भडास शुरू हुआ स्वागत है
बॉस कुछ और पुरानी पोस्ट अगर हों तो वो भी लगाइये
शुभकामनाओं के साथ
जय भडास
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राजीव जैन
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Labels: शुभकामनाएं
नोमश्कार
नोमश्कार कोरता हूँ बोंधू लोगो
हम फिर शे वापस आ गया हूँ, मुला इश बार तनिक ओंदाज़ ओलग होगा
एक शेर कहता हूँ , खैर छोडिये , नही कहूँगा।
नही कहूँगा तो कोई क्या कर लेगा !!
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Rising Rahul
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Labels: नए सदस्य
13.11.07
मेरी शराफत...
नमस्कार मित्रोमीरा जी की बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ की भड़ास में अब वैसा नहीं होना चाहिए जिसे यशवंत जी बुरा अनुभव कह सकें। इस बार मैं भी इस चर्चा का हिस्सा बनाना चाहता हूँ परन्तु मीरा जी की सलाह के मुताबिक मेरे अपने पास कोई भी "रिफरेन्स" नहीं है. बस इतना ही कह सकता हूँ की मैं जैसा भी हूँ... मेरी शराफत का एक ही प्रमाण है और वो है मेरा अपना ही ब्लॉग॥
www.punitomar.blogspot.comआप
के लिए जिन्दगी का एक दिन और सही॥
चाहे तो इसे ही देख लें.. और बाक़ी मैं अपने बारे में क्या कहूँ अब..
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पुनीत ओमर
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लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास
लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास।
बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे।
आपका थोबड़ा किससे मिलता है???
मेरा सभी लोगों से गुजारिस है की अपना-अपना थोबड़ा पहचाने
मैं स्पोर्ट्स देखता हूँ इसलिए डेविड बेककहम का थोबड़ा मुझसे मिलता है हाआआआआआ
फिर से बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे। यशवंत भैया की जे।
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आलोक सिंह रघुंवंशी
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लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास
लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास।
बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे।
आपका थोबड़ा किससे मिलता है???
मेरा सभी लोगों से गुजारिस है की अपना-अपना थोबड़ा पहचाने
मैं स्पोर्ट्स देखता हूँ इसलिए डेविड बेककहम का थोबड़ा मुझसे मिलता है हाआआआआआ
फिर से बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे। यशवंत भैया की जे।
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आलोक सिंह रघुंवंशी
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एक बार सोच लीजिये
यशवंत जी एक बार सोच लीजिये , इस बार बहुत सोच समझ कर और फूंक फूंक कर कदम रखने की आवशयकता है. मेरा एक सुझाव है की भड़ास को वही लोग ज्वैने करें जो किसी के परिचित या रेफरेंस से आयें. हालांकि मैं मेम्बेर्स में कोई अन्तर नही करना चाहती ये बस इसलिए की पिछली बार की तरह कुछ ग़लत लोग भड़ास से न जुड़ें.खैर आप जो उचित समझाने वो करने के लिए स्वतात्न्त्र हैं ये केवल एक सुझाव मात्र है.
-मीरा
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meera
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नई शुरुआत, नई भडास। जो भी हो जय भडास...
बड़के भईया यशवंत भडासी को नमश्कार॥
पता नही कौन सी खटिया के तले पडे थे।
फ़ुनवा भी कभी मिल जाये तो मिल जाये नही तो आउट आफ़ कवरेज एरिया।
खैर छोडिये जो हुआ सो हुआ।
अब भडास फ़िर निकलेगी और खूब ज़ोर से निकलेगी।
हमने तो कहीं भी लिखना पढना भी छोड़ दिया था।
यकायक भडास बंद, सारी पोस्ट गायब!
हैरान और परेशान होने के अलावा कुछ बचा ही नही।
रात को ही फ़ोन करा और पाया कि कुछ तकनीकी खराबी नही है,
यशवंत भाई ने खुद ही ब्लाग डिलीट मार दिया है।
कारण तो पता नही चल पाया, लेकिन निवारण उन्होने खुद ही कर डाला है अब।
खैर मज़ा आ गया।
जय भडास॥ जय भडास ॥
जय भडास॥
अंकित माथुर...
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Ankit Mathur
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I have updated my blog....अनिल पाण्डेय
I have updated my blog. please visit this url..
http://aneelpandey.blogspot.com/
and comment on it....
Thanks with regards :
--
Anil Pandey
Sub-Editor, News Today
(Powerd by Mid Day)
Phone : (0731) 4222584 | Fax : (0731) 4222585
IM : anil4pandey@gmail.com
http://aneelpandey.blogspot.com
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यशवंत सिंह yashwant singh
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जी, कार्टून से भड़ास निकालेंगे तो महाकलाकार कहलाएंगे
कीर्तीश भाई ने पूछा है कि ......
यशवंत जी,
सादर वंदे
में भड़ास का सदस्य तो बन गया लेकिन आपसे पूछना भूल गया कि क्या में अपनी भड़ास कार्टूनों के माध्यम से निकल सकता हू ?
विनीत
कीर्तीश भट्ट
मेरा जवाब है.....कीर्तीश जी, लिखकर और बोलकर भड़ास निकालने वाले तो बहुते लोग हैं, कलाकारी करके भड़ास निकालने वाला मुझे सिर्फ आप ही दिक्खे हैं। तो बरखुरदार, जरूर करटूनियाइए और अपनी भड़ास निकालकर गर्दन और गला हलकाइए, अरे नहीं, हलका करिए.....। और महाकलाकार कहलाइए।
शुक्रिया...
आलोक जी, आपका ब्लाग है, सब आपका है, मेरा क्या है.....गूगल का एड लगा नहीं कि आपने सवाल कर दिया, घर में लक्ष्मी तो आने देते....आपका भाई अगर धनी हो जाए तो आपको कष्ट होगा क्या.....ये तो मैं मजाक कर रहा था लेकिन आपने बिलकुल सही सवाल उठाए हैं। गूगल से एड आने पर मैं अपनी कंपनी खोलूंगा....यशवंत सिंह प्राइवेट लिमिटेड। इसमें जितने नशेबाज पत्रकार हैं, उनका इलाज कराया जाएगा ताकि वो दारू-वारू छोड़कर नार्मल जीवन जी सकें। जाहिर है, मेरे नाम से कंपनी होगी तो तब तक मैं नहीं रहूंगा और मेरी स्मृति में ही कंपनी खुलेगी। और यह भी बात स्पष्ट है कि दारू दारू पीते पीते किडनी फेल होने से ही मौत होगी, इसलिए आलोक भइया, खुदा का शुक्र मनाइए कि गूगल बाबा का जो चेला बना हूं, तो उससे कुछ फल भी मिले और लक्ष्मी आवें। दीवाली में साढ़े आठ सौ रूपये जुवे में जीता था, उसकी गरमी आज तक महसूस कर रहा हूं।
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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यशवंत जी बधाई हो
यशवंत जी को और भड़ास के सभी साथियों को शीना का नमस्कार...अच्छा लगा कि भड़ास अब फिर से हम सबके सामने अपने पुराने रूप में आ रहा है....यशवंत जी इसके लिए आपको बधाई ....शीना राय
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Anonymous
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wah gurudev maza aa gaya
मेरे गुरु बड्डे भाई और एक्स बॉस (आज भी उसी रूप में देखता हूँ ) यशवंत जी का अंदाज़ ही निराला है। यह कब कौन सा धमाका कर दें कोई नहीं जानता और अब भड़ास का नया रूप भई मज़ा आ गया। यह सुनकर बड़ी निराशा हुई थी की भड़ास अब कमुनिटी ब्लोग के रूप में नहीं चलेगा। टू सचिन भाई कहाँ हो? भड़ास आवाज़ लगा रहा है.
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विशाल अक्खड़
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भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास
पहले लिख ही दिया है, कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ, पर फिर से दोहरा रहा हूँ, कि मेरा किसी समाचार-संगठन से दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है, इसलिए मैं बस बतौर उपभोक्ता खबर लूँगा, दूँगा नहीं। और मेरी दिलचस्पी हिंदी अखबारनवीसी और टीवीनवीसी में होने वाले तकनीकी बदलावों में ज़्यादा है, तो उन्हीं के बारे में लिखूँगा और सवाल पूछूँगा। अब हो सकता है सवाल पूछते पूछते जवाब मिलें, या न मिलें, या सवाल ही बदल जाएँ, या सवाल किससे पूछ रहा हूँ, वह ही बदल जाए। जो भी हो।
तो बस यूँ कहिए कि अपने आपको एक जागरूक समझने वाला और सनकी उपभोक्ता हूँ। इस बात में भी दिलचस्पी है कि १०,००० प्रयोक्ताओं वाला चिट्ठा कैसे सँभलेगा, चाहता भी हूँ कि यह प्रयोग सफल हो। तो यदि कोई तकनीकी मदद चाहिए हो तो निस्संकोच पूछें, हाँ, मदद मैं अपने समयानुसार ही दे पाऊँगा, मगर इसका मतलब यह नहीं कि आपको मदद माँगने में संकोच करना होगा।
हाँ, तो १०,००० लेखकों वाला चिट्ठा, जो एक व्यक्ति - या बाद में कुछ अधिक व्यक्ति - संचालित कर रहे हों, कैसा लगेगा? इस समय कल्पना कर पाना मुश्किल है। अक्षरग्राम पर जब मिर्ची सेठ के सादर आमंत्रण पर पहला लेख लिखा था, तो उसमें काफ़ी भड़ासात्मकता थी।
उसी भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास करते हुए यहाँ शामिल होने का न्यौता स्वीकारा है। कोई भी सामूहिक काम आपसी सहयोग और सूझ बूझ के बिना नहीं चल सकता है, तो योगदान यदि किसी और प्रकार का चाहिए हो तो मुझे बताएँ। और कुछ बातें स्पष्ट होनी भी ज़रूरी हैं, जैसे कि, ये जो गूगल के विज्ञापन यहाँ लगे हैं, उसका पैसा कहाँ जाता है? सवाल यह नहीं है कि पैसा आ रहा है या नहीं, यह भी नहीं है कि कहाँ जाता है। बस, स्पष्ट होना चाहिए - क्योंकि कई लोग यहाँ लिख रहे हैं।
दूसरी बात यह कि जो भी लेख यहाँ छपते हैं, उनके पुनर्प्रकाशन का और अन्य अधिकार - यानी सर्वाधिकार - किसका है - भड़ास का या मूल लेखक का? वही सवाल, भड़ास पर होने वाली टिप्पणियों के बारे में भी।
यह दो सवाल मैं अलग से यशवंत जी को भी पूछ सकता था लेकिन क्योंकि यह सार्वजनिक महत्व के हैं तो मैंने सार्वजनिक रूप से पूछ लिया है। जवाब जो भी हों, मुझे तो स्वीकार्य ही हैं, पर शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जवाब हैं क्या। बस इसीलिए पूछा है।
तो जाते जाते यशवंत जी की ही थोड़ी खबर ले लूँ - आप जब किसी और लेख या टिप्पणी का हवाला देना चाहें, तो उसकी कड़ी प्रदान कर सकते हैं - जो लोग आपका लेख पढ़ रहे हैं वह कड़ियों पर चटके बाज़ी जम कर करते ही हैं, साथ ही वहाँ छपी नई टिप्पणियाँ या संशोधित लेख तक भी लोग अपने आप चले जाएँगे। पर शायद टीवी वालों को बार बार वही विज़ुअल दोहराते दोहराते आदत बुरी पड़ गई हो!
खैर अब तक पिछले अनुच्छेद से आप समझ ही गए होंगे कि मैं यहाँ किस तरह की सामग्री परोसूँगा, तो मिलते रहेंगे।
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आलोक
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Labels: पत्रकारिता, प्रचार-माध्यम, समाचार
badhayi.......learn english
bhadas phir shuru hone pe badhayi.....
rajkumar.....
((Check out English, baby! It’s a cool site to learn English and meet friends. I think you’ll like it!http://www.englishbaby.com/))
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kathpingla
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भड़ास की ये स्पीड...बाप रे, नजर न लगे....
भड़ास को फिर से कम्युनिटी ब्लाग के रूप में शुरू करने के दो घंटे के अंदर कुल पांच मेंबर बन गए और पांच कमेंट भी आ गए। अरे, इतनी तेज स्पीड। दुश्मनों का कहना है कि जो तेज भागता है वही तेज गिरता है, भड़ाक से। और मुंह फोड़ लेता है, हाथ तोड़ लेता है। तो कहीं इस बार भी....। नहीं, बिलकुल नहीं। आशीष का सही कहना है, यशवंत जी, फिर झटका न दीजिएगा। तो भई, झटका नहीं, इस बार भड़ासियों को पुरस्कार मिलेगा, यह पक्की बात है, लालीपाप नहीं।
अरे ये लो,,,,,अपने भड़ासी गुरु अनिल सिन्हा और डा. सुभाष भदौरिया तो जैसे इसी इंतजार में बैठे थे कि भड़ासियों का फिर जुटान हो। लो गुरुवरों, फिर आ गए, उसी रंग और तेवर के साथ। बल्कि थोड़ा और खर। दोनों गुरुवरों को प्रणाम और नमस्कार और सलाम। उम्मीद है, वे अपने बिंदास और बेबाक अनुभवों, आइडियाज और फंतासियों से हम सभी को शिक्षित प्रशिक्षित करते रहेंगे। पेश है...भड़ास के फिर से शुरू होने के दो घंटे के अंदर आई पांच टिप्पणियों की एक झलक....इसमें कई टिप्पणी करने वाले साथी भड़ास के मेंबर नहीं बने हैं। मेंबर बनने के लिए वे बाईं और लिखे भेज रहा हूं न्योता के नीचे भड़ासी बनिए को क्लिक करें, अपनी ई-मेल आईडी और अपना वाला पासवर्ड डाल दें, बस नाम आ जाएगा मैं ऐसा क्यों हूं के नीचे.....तो भई आलोक, आपको मिल गया होगा आपके सवाल का जवाब........
जय भड़ास....
5 comments:
12 November, 2007 22:57
डॉ.सुभाष भदौरिया. said...
ये ग़ज़ल मैं अपने तमाम भड़ास के दोस्तों को पूरे एहतिराम के साथ नज़र कर रहा हूँ और गुज़ारिश करता हूँ कि उनका बयान ज़ारी रहे.उनके कलाम में गीता और कुरान की पाकीज़गी हैं जो मैने अक्सर महसूस की है.सतही तौर पर उनमें भाषाई नुक्श भले हों.अंदरूनी जज़्बात बड़े गहरे हैं जिन्हें मैं तस्लीम करता हूँ.
बकौले मीर तकी मीर
सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ.
मुस्तनद है मेरा फ़र्माया हुआ.
डॉ.सुभाष भदौरिया.
ता.13-11-07 समय-1-00PM
ग़ज़ल भड़ास के नाम
तुम क्या गये की नेट की दौलत चली गयी.
ऐसा लगा कि अपनी मुहब्बत चली गयी .
है कीर्तन का दौर ये देखो तो दोस्त अब.
गाली में जो हयात थी उल्फ़त चली गयी.
गूँगों में एक तेरी ही आवाज़ थी भड़ास,
सच कहने की तो लोगों में शिद्दत चली गयी.
हम अपने ही ग़मों से परेशान थे बहुत,
जाने जो तेरे ग़म तो मसर्रत चली गयी.
हम आज भी हैं तेरे तलबगार जानेमन,
तेरी ये कब कहा कि ज़रूरत चली गयी.
12 November, 2007 23:41
आशीष said...
जय भड़ास
12 November, 2007 22:18
Basant Arya said...
पुरस्कार शुरू कर रहे है ये सराहनीय है. लगे रहो
12 November, 2007 22:42
आलोक said...
यशवंत जी,
मैं भड़ासी बनना चाहता हूँ। आपने यह तो लिखा ही नहीं कि भड़ासी बनने के लिए करना क्या होगा? या यह न्यौता केवल आपसे पहले जान पहचान रखने वालों के लिए ही है? मैं मीडिया से जुड़ा नहीं हूँ, उपभोक्ता के तौर पर खबर लूँगा ही, दूँगा नहीं।
आलोक
12 November, 2007 22:56
Sanjeet Tripathi said...
बहुत खूब!!
शुभकामनाएं बंधु!
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यशवंत सिंह yashwant singh
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यशवंत जी इस बार झटका मत दीजियेगा
लीजिए एक बार फिर से भड़ास का मंच सबके लिए खुल गया है, जहाँ कोई भी दस्तक दे सकता है और अपनी भड़ास निकाल सकता हैं..लेकिन भड़ास की फिर से शुरुआत के साथ मन में एक और डर बैठा हुआ है. और इसका हल सिर्फ़ यशवंत जी ही कर सकते हैं..यशवंत जी कहीं पिछले बार की तरह हम लोगों को कहीं एक बार और झटका मत दे दीजियेगा.. नहीं देंगे ना ? क्यूंकि जब पिछली बार आपने भड़ास को उडाया था तो मुझे बहुत बड़ा झटका लगा था.. लेकिन मुझे इस बार पूरी उम्मीद है कि कुछ भी हो जाए आप भड़ास के हक से हमें वंचित नहीं करेंगे,...क्या यह वचन देते हैं आप?
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Ashish Maharishi
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भड़ास के शुरू होने पर बधाई
भड़ास के दुवारा शुरू होने पर बधाई। विश्वास है कि अब यह जारी रहेगा।
(अजीत कुमार मिश्रा)
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Ajit Kumar Mishra
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आओ बनाएं एक बेहतर भड़ास
फिर से भड़ास शुरू करने के लिए बधाई। शायद सबसे पहला सदस्य मैं ही हूं इस बार।
अनिल सिन्हा
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अनिल सिन्हा
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भेज रहा हूं न्योता, भड़ासी बनिए....मतलब जोर से कहो, खुल के कहो...जय भड़ास
लीजिए, उसी तेवर और उसी दमखम के साथ फिर आ गया भड़ास। मीडिया वालों की खबर देने और खबर लेने। लेकिन यह काम तो तभी होगा ना जब फिर भड़ासियों की फौज तैयार हो। तो, एक बार फिर भेज रहा हूं न्योता। नेह निमंत्रण नहीं न्योता। नेह निमंत्रण का दौर गुजर गया है। अब साफ-साफ न्योता देने का दिन आ चुका है। पिछले अनुभवों से सबक लेकर अबकी जो भड़ास आपके सामने हाजिर किया जा रहा है वो दरअसल ज्यादा मेच्योर और ज्यादा सहज है। हालांकि मेच्योरिटी और सहजता में आपस में उलटा वाला रिश्ता होता है लेकिन इस बार वाकई हम सभी भड़ासी एक नई क्रांति की बुनियाद रखने वाले हैं, वो है सूचना और जानने की क्रांति का अधिकार। हर रोज मीडिया में इतनी सारी चीजें हो रही हैं कि उन्हें बताने वाला कोई नहीं है। अफवाहों से सही खबरें कम, झूठी खबरें ज्यादा मालूम होती हैं। तकनालजी में रोज नई चीज आ रही है। जिन्हें ये सारी जानकारी पता है वो तो भौचक्क है और सोच रहा है कि बाप रे, इतना सारा बदलाव, इतने फटाफट तरीके से। जिन्हें नहीं पता है वो भी भौचक, मुंह बाये, कुछ इस अंदाज में भाव दिखाते हुए....हें हें हें भाई...हमका तो कुछउ नाहीं मालूम....ऐही खातिर भौचक्क बानी...। तो भई, अगर आगे जाना है, रेस में बढ़ते जाना है, करियर और प्रोफेशन की बुलंदी छूना है तो थोड़ा आरगेनाइज, थोड़ा इनफारमेटिव, थोड़ा प्रोफेशनल और थोड़ा अराजक....होना पड़ेगा। अराजक इस नाते कि जब तक आप थोड़ा अराजक नहीं होते, अपने व्यक्तित्तव में छिपी नई चीजों को तलाश नहीं पाते। अब मझको ही देखिए ना.....पत्रकारिता से बिजनेस तक की यात्रा इसी अराजकता ने ही करा दी। लेकिन सलाह यही है, बड़े भाई या दोस्त की तरह.....दुस्साहस करिए लेकिन प्लांड तरीके से। मुझसे जो चीजें हुईं उसमें प्लांड कम था, स्पानटोनियस ज्यादा था। इसलिए थोड़ी दिक्कत भी झेलनी पड़ी। खासकर मानसिकत ज्यादा।
तो चलिए फटाफट भड़ास का मेंबर बनिए, और भड़ास के फिर से री-लांच और पुर्नजन्म का स्वागत करिए और अबकी बार इस वादे और नारे के साथ कि चलते जाना है, बढ़ते जाना है, मंजिल पाना है......। मेरा एक छोटा सा ख्वाब है...जो पिछले भड़ास के दौर में भी था....काश....हम प्रिंट पत्रकारिता और गैर-पत्रकारिता श्रेणी में 10 तरह के पुरस्कार शुरू कर पाते। और, दोस्तों, आपको सचमुच आश्चर्य होगा कि यह ख्वाब अगले वर्ष के शुरू में सच होने जा रहा है। जो भी भड़ास का मेंबर होगा वो इस पुरस्कार के लिए मान्य होगा। और हां, मेंबर बनने के साथ आप अपना फोन नंबर मुझे निजी तौर पर मेल करिएगा ताकि आपको प्रोफेशन से जुड़ी कुछ जरूरी सूचनाओं को एसएमएस के जरिए भेजा जा सके। यह एक नई सेवा है जिसका ट्रायल चल रहा है। पुरस्कार और नई सेवा के बारे में बाद में बतायेंगे। फिलहाल आज इतना ही कि अगले दो महीनों में भड़ास के सदस्यों की संख्या दस हजार करनी है ताकि भड़ास विरोधियों को अबकी करारा जवाब दिया जा सके। मैंने लैपटाप ले लिया है, मैंने जो नई कंपनी ज्वाइन की है उसने खुद भड़ास को चलाने और इसे आगे बढ़ाने का वादा किया है। है न मजेदार खबर......तो फिर जोर से बोलो, खुल के बोलो....जय भड़ास।
भड़ास के सभी पुराने साथियों से आह्वान है कि वो भड़ास से फिर जुड़ें और इस सकारात्मक और सर्वहिताय आंदोलन का आगे बढ़ाएं। खासकर स्वामी विकास मिश्र से अनुरोध है कि वो नाराजगी छोड़कर फिर एक बार मैदान में आ जाएं।
जय भड़ास
यशवंत सिंह
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यशवंत सिंह yashwant singh
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8.11.07
दिनेश की मेहनत रंग लाई....
दिनेश श्रीनेत की पाती मिली, मगर देर से। दरअसल जिल मेल आईडी पे उन्होंने यह भेजा था, उसे कम ही खोलता हूं लेकिन जब आज उसे खोला और उसमें दिनेश श्रीनेत की पाती मिली तो खुशी हुई। खुशी इसलिए कि वे जिस मकसद से बेंगलूर गए थे, वो मकसद अब सबके सामने आ गया। मतलब, वो जिस कंपनी की हिंदी वेबसाइट के बतौर एडीटर वहां काम कर रहे हैं, वो हिंदी वेबसाइट लांच हो गई। काफी देर तक देखता रहा, बोधिसत्व जी की प्रेम कविताएं पूरी पढ़ी। इसके बाद एओएल कंपनी की सारी खबरें पढ़ीं, होम पेज देखा.....वाकई, पढ़ और देखकर लगा कि कंपनियां किस तरह पूरी दुनिया में छा जाने की मुहिम में जुटी हुई है। मजेदार यह है कि इस कंपनी ने हिंदी के साथ तमिल में भी साइट लांच की है। अब जब दिनेश जी ने इतने नेक काम की जानकारी मुझे दी तो क्यों न इसे जन जन तक पहुंचाया जाए, इसी मकसद से इसे भड़ास पर डाल रहा हूं. अगर आप लोगों को कोई प्रतिक्रिया दिनेश तक पहुंचानी हो तो उन्हें इस पते पर मेल कर सकते हैं....। नीचे वो पत्र, वो लिंक हैं जिनके जरिए एओएल के काम-नाम के बारे में जान सकते हैं।
dshrinet@gmail.com
शुक्रिया
यशवंत
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Now our site is officially launched, u can see the work of our Hindi team.
I know there are many things that we can improve, plz give ur suggestions and comments.
www.aol.in/hindi
regards
Dinesh Shrinet
See here some news about our Hindi site.
New York, October 31: AOL plans to launch Wednesday Hindi and Tamil language versions of its Internet portal in India as part of an aggressive global expansion that will see it in 30 regions by the end of 2008. The online unit of one of the world's biggest media companies, Time Warner Inc., will also enable video searching in eight regions outside the United States.
read full story in-
http://www.aol.in/news/story/2007103103009019000001/index.html
AOL takes a giant step towards its expansion goal with the launch of a local language version of its web search portal in India. Coming into the Indian web market are a slew of AOL web services spearheaded by AOL's video search portal Truveo. Truveo is launching its international editions in eight major countries today as well.
read full story-
http://www.searchenginejournal.com/aol-launches-indian-language-portal/5928/
At a press conference that AOL (NYSE: TWX ) held on the sidelines of the Fortune Global Forum, the company announced the launch of local language portals in Hindi and Tamil, and the launch of video search Truveo; Jeff Bewkes, Time Warner President and COO reiterated the importance of India for Time Warner, saying that AOL plays an important part in teaching the company what is possible in India.
read full story-
http://www.contentsutra.com/entry/419-aol-launches-hindi-tamil-portals-truveo-video-search/
AOL.in is launching content channels in the Hindi and Tamil languages, improving the breadth of AOL's offerings at a time when the online audience in India is skyrocketing. The number of Internet users in urban India has grown by 28% in the past year, and about 60% of all active online Indians (30 million) prefer to read in local Indian languages.* The Hindi and Tamil language portals will have language sections in News, Cinema and Astrology.
read full story-
http://eon.businesswire.com/releases/india/video/prweb565650.htm
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यशवंत सिंह yashwant singh
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7.11.07
अपना काम करते हुए लोकमंच से जुड़ें, उचित मानदेय भी पायें
वरिष्ठ ब्लॉगर और पत्रकार शशि सिंह और उनके साथियों द्वारा शुरू किया प्रकल्प www.lokmanch.com निरंतर सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। अब लोकमंच अपने विस्तार की योजना पर काम कर रहा है... इस योजना के तहत लोकमंच को हर जिले में लेखक, पत्रकारों और जागरूक ब्लॉगरों की आवश्यकता है। लोकमंच से जुड़ने को इच्छुक इस ई-मेल shashikumarsingh@gmail.com पर सीधे शशि सिंह से संपर्क कर सकते हैं। योजना के तहत योग्य प्रत्याशियों को उचित मानदेय देने की भी व्यवस्था है।
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यशवंत सिंह yashwant singh
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5.11.07
सड़क पर जंग--- बाइक सवार पैदल सेना, मिसाइल बनीं कारें, गदा उठाए ब्लूलाइन, मरने को तैयार भाईलोग.....जय हो
शाम को आफिस से घर जाते हुए आईटीओ ब्रिज ज्यों क्रास करता हूं, दाईं तरफ एनएच-24 पर चकमकाती कारों का जो रंग-बिरंगा रेला दिखता है, उसे देखकर पहले दिन तो मेरी आंखें उसी तरह फटी रह गईं जैसी किसी देहाती की, जो जीवन में पहली बार दिल्ली और मुंबई आया हो। बाप रे, इतनी कारें। सब तरह-तरह की लाइट फेंकती, आगे से, पीछे से, दाएं से, बाएं से। जितनी गाड़ियां जा रही हैं उतनी आ रही हैं। इन गाड़ियों की सम्मिलित रोशनी से माहौल दिवाली वाला दिखता है। भई, यहां तो रोज दिवाली है। सड़कों पर वैसे ही सोडियम लाइटें और न जाने कौन कौन सी लाइटें सरकार ने लगवा रखी हैं। उसके बाद इन कारों की रंग बिरंगी रोशनियों ने माहौल को और रंगीन कर दिया है। रात में इन चकमक चकमक को देखते हुए लग सकता है कि वाह, अपनी दिल्ली कितनी महान। अपना देश कितना धनवान। लेकिन इन कारों में बैठे प्राणियों और सड़क पर फंसे अन्य मानवों के दिलों से तो पूछिए, गांड़ का गुह निकल जाता है इनका काम में। दिल दिमाग दोनों बंद। बस, दो पैग मारा तब आदमियत आई और तीसरे पैर में नींद रूपी छोटी मौत ने आगोश में ले लिया। या इसके पहले कुछ घंटों तक धमाचौकड़ी। बस। बंदा त्रस्त और बंदा मस्त। इसी में जी रहे हैं दिल्लीवाले। दुनिया जाए भांड़ में। पाकिस्तान में इमरजेंसी हो तो हो। अपना का देश गांवों का हो तो हो। किसान मरें तो मरें। गरीबी-बेकारी बढ़े तो बढ़े। शहर में चकमक है। शहर में तो जगमग है। धन्य हैं। जय हो।
हां तो कह रहा था कि शाम को सड़क पर एक इंच की जगह खाली नहीं। गाड़ियां बिलकुल सेट हैं। कहीं कोई गैप नहीं रखा। स्पीड बिलकुल स्लो। सड़क की फटी पड़ी है, अबे सालों, थोड़े कम हो जाओ, इतने ढेर सारे एक साथ चढ़ोगे तो मेरी जान निकल जाएगी। पैदल सेना के बाइक वाले सवार थोड़े से गैप को पाते ही लप्प से उसमें घुस जाते हैं और किसी योद्धा की तरह हेलमेट पहने वे करामाती सैनिक से लपलपाते हुए आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। कारें भी हर जाति की दिखती हैं। छोटी कारें दलितों-पिछडों की तरह दिखती हैं, बड़ी कारें ठाकुरों-बाभनों-बनियों की तरह। एकदम से रेल दिया और ठेल दिया और पेल दिया और निकल गए आगे फुर्र सुर्र ठुर्र करते......मक्खन मलाई की तरह कारें। कितनी चिकनी बाडी। कारें सड़कों पर चलने वाली जंग में दरअसल किसी कमसिन की तरह नजर आते हैं, सबसे बचना भी है, सबसे आगे भी रहना है, बिलकुल नहीं ठुकना है, कोई छू दे तो उस पर तुरंत छेड़खानी का आरोप। कभी कभी ये कारें किसी मिसाइल की तरह लगती हैं। तरह तरह के योद्धाओं के बीच से स्यूं स्यूं करती आगे निकल जाते हैं, मंजिल पर भड़ाक से गिरने के लिए। अब लीजिए ब्लूलाइन को। साली को हनुमान जी का साक्षात रूप कहिए। मुंह फुलाए, गदा उठाए, चल पड़े हैं हनुमान। जो आगे आएगा, रेला जाएगा, पेला जाएगा, जान गंवा जाएगा। इनसे नर, नारी, वानर, पशु-पक्षी और नाना प्रकार के जीव-जंतु तुरंत भय खाते हैं। इनका नाम सुनते ही तमाम घरों में सिसकारी गूंजने लगती है। तमाम घरों में मातम का माहौल फिर लौट आता है। लेकिन ये ब्लूलाइन रूपी आधुनिक हनुमान के बिना जीवन चलता भी नहीं। अब तो मुझे लगना लगा है कि ब्लू लाइनें कम मारती हैं, लोग मरने खुद ब खुद चले आते हैं। दो बसें एक साथ आईँ, रुकी नहीं लेकिन लोग कुत्ते की तरह शक्ल लिए बस के सामने दौड़ पड़ते है। अरे भाई, उसे रोकने दो चढ़ जाना। लेकिन किसे फुर्सत है साहब। सब भगवान के यहां से लंबे चौड़े कामों के लिस्ट लेकर इस धरती पर अवतरित हुए हैं। वे काम होने से रह जाएंगे, इसलिए वे काम करते हुए ही शहीद होकर भगवान के पास जाना चाहते हैं ताकि बता सकें, हे भगवन, मैं तो आपके काम करते हुए ही मरा हूं इसलिए मुझे शहीद का दर्जा देते हुए अप्सराओं वाले स्वर्ग में भेज दो ताकि मृत्युलोक पर पनपी कामनाओं और लालसाओं और वासनाओं की प्रतिपूर्ति कर सकूं। अब उन सालों को क्या पता कि वे पीछे पैदा कर गए हैं कई बच्चे, छोड़ गए हैं सिंदूर पोछने के लिए किसी औरत को। नहीं...जान देंगे, ब्लू लाइन ले लो तो भला, न लो तो काम हो ही जाएगा।
शायद संवेदनाएं जब ढीठ हो जाती हैं तो उसमें कोमलता और नाजुकता का अंत हो जाता है। जीवन-मृत्यु और मानवता से परे होने के भाव उगने लगते हैं और आदमी जो सोचे है, उसे पूरा करने को किसी हद तक चला जाता है, ब्लू लाइन से कुचलकर मरने तक भी। सड़क पर किसी से गाड़ी टच होने पर उसे स्वर्ग भेजने तक भी।
हां, तो बात हो रही थी सड़क पर चलने वाली जंग की। अगर कहीं रेड लाइट दिखी तो सबसे पहले पैदल सेना वाले बाइक सवार एकदम से रेड लाइट के पास पहुंच जाते हैं, बिलकुल आगे, कारों रुपी मिसाइलों के आगे ताकि सिग्नल मिलते ही पहले हमला करने के लिए पैदल सेना दौड़े, फिर महारथी रूपी कारें और फिर राक्षस और वानर सेना मतलब ब्लूलाइन, मिनी बस, कैंटर, जीप, कैब आदि.....।
इस सब में जो सुकून देने वाला पल होता है वो बाइक पर बैठे प्रेमी प्रेमिकाओं को देखना। एक दूसरे पर गिरते पड़ते ये लोग तमाम दिलों को शांति प्रदान करते हुए खुद भी बेहद सुकून से घर रूपी मंजिल पर पहुंचने की ओर अग्रसर होते हैं ताकि वे बेहद रोमांचित और रोमांसित जीवन को खुल दिल दिमाग से जी सकें। जय हो।
अप्पू घर में प्रेम तमाशा...
बात चली है जोड़ों की तो या आया कि कल संडे को दिल्ली में अप्पू घर गया, सपरिवार। आईटीओ और बहादुरशाह जफर मार्ग के आसपास ही दो ढाई किमी में अप्पू घर, चिड़ियाघर, इंडिया गेट आदि है। जब यह मालूम हुआ तो लगा कि इन चीजों का दर्शन खुद भी करना चाहिए, परिवार को भी कराना चाहिए। ये चाहत पहले भी थी लेकिन रास्ता न मालूम होने से और भटकने के भय से मैं कभी जाने को लेकर उत्साहित नहीं रहता था। इसलिए आज तक दिल्ली की किसी भी खास चीज को न देख सका। लेकिन जब नए आफिस के लिए आने-जाने में रास्तों की शिनाख्त कर ली तो एकदम से लगा कि संडे की छुट्टी के दिन बच्चों को घुमा लाना चाहिए। और, मेरा अनुभव....माइंड ब्लोइँग। लगा, न आकर गलती की थी। बच्चों ने वाटर पार्क और एम्यूजमेंट पार्क का इतना मजा लिया, मैने झूलों पर इतना हल्ला किया और गवाह बनीं अपनी श्रीमती जी। रोपवे मतलब वो जो पहाड़ों पर बिजली के तार पर लटककर चलता है....पहली बार चढ़े, लगा लंदन टू शिमला या शिमला टू लंदन की यात्रा पर है। दुनिया बहुत छोटी हो गई थी, हम बहुत बड़े दिख रहे थे। कुछ कुछ जहाज से उड़ने का अनुभव हो रहा था। ऐसा ही लगता होगा न जहाज पर चढ़ने पर, लौंडे ने पूछा तो मैंने हां में गर्दन हिला दिया। अब देक्खो भइया जहजवा पर कब चढ़ते हैं।
दरअसल तमन्ना ये है कि जहाज पर चढ़कर बनारस बाबतपुर एयरपोर्ट पर उतरूं और आने की सूचना गांव भेज दूं ताकि गांववाले मय ट्रैक्टर के हवाई अड्डे के बाहर जमा रहें और मुझे देखते हुए नारेबाजी करने लगें, इसलिए कि उनके गांव का एक लड़का जहाज से आया है...जसवंत भइया की जय, जहाज मइया की जय......। जय हो।
तो मैं कह रहा था जोड़ों की बात। अप्पू घर में जो झूले हैं उसमें कुछ झूले इस तरह डिजाइन हैं कि उसमें दो दो लोगों की टीम अलग अलग डिब्बों में बैठेगी और झूले जब तेज चलेगी तो दूसरा व्यक्ति पहले के देह पर इतनी बुरी तरह गिरा रहेगा कि अगर दोनों आदमी हुए और अपिरिचित हुए तो भिड़ जाएंगे...अबे हट, अबे कैसे हटूं झूली ही इधर गिरा रहा है। अगर मियां बीवी हुए तो मस्त। अगर प्रेमी प्रेमिका हुए तो.... अहा.....फिर तो सब फिट। इन झूलों पर सबसे ज्यादा संख्या में यही जोड़े थे। सब जोड़ीदारिनें जोड़ीदारों के देह पर गिरी पड़ी थीं उह आह की आवाज निकालते। दरअसल झूलों की स्पीड इतनी ज्यादा है कि यहां बिना चिल्लाए रहा नहीं जाता। बच्चों की कम उम्र से इस झूले पर चढ़ना एलाउ नहीं था और वाइफ ने इतनी स्पीड को झेलने से मना कर दिया। तो मैं अकेले ही खुद को सिकंदर समझते हुए एक अकेले बैठे सज्जन के बगल में बैठ गया और जब झूले ने स्पीड में अपना रूप दिखाना शुरू किया तो मेरा पूरा शरीर उन सज्जन की दुबली पतली देह पर। मुझे लग रहा था कि उनका चिल्लाना झूले की स्पीड से नहीं बल्कि मेरे शरीर के वजन से उनके दबने के कारण हो रहे दर्द के कारण था।
दोस्तों को दिया दिल
यह सप्ताह दोस्तों को दिल देने के नाम पर रहा। पहले एक ऐसी स्थिति में आ गया था कि सबसे भरोसा उठता नजर आ रहा था लेकिन अब लगता है, न यार, दुनिया में अगर कोई साथी है तो अच्छा दोस्त ही है, बस उसे पहचानने की अक्ल आनी चाहिए क्योंकि फर्जी दोस्त दाएं बाएं ढेरों हैं। ये आपकी सुनेंगे और उसी बात को दूसरों को तेल मिर्च लगाकर सुनाएंगे। ऐसे दोस्तों, ऐसे दोगलों से सावधान। दोस्त जो असली होगा वो बार बार दोस्त होने की बात न कहेगा, वो बस, समय आने पर आपके लिए साबित हो जाएगा, कर दिखाएगा। पिछले दिनों भड़ास के बेगूसराय के पाठकों के फोन आए। फर्रुखाबाद से फोन आए। न जाने कितने फोन आए जो सिर्फ भड़ास की वजह से मुझे जानते थे। पता नहीं यह क्या है लेकिन मुझे अच्छा लगा, लोग सच कहने और खुलकर कहने वालों का साथ देते हैं। तो दोस्तों, दोस्तों को चुनिए गुनिए और उनके लिए दुवाएं करिए। मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा, दोस्तों के लिए।
जय हो
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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आजा घरे छोड़ के तू दिली......
दिली मतलब दिल्ली को समझने की सही शुरुआत अब हुई है। अब लगता है कि दिल्ली में नोकरी कर रहा हूं। एक तो ड्यूटी टाइम बिलकुल शुद्ध देसी है। मतलब ब्रह्म मुहूर्त में आंख खोल देना है, बिस्तर से उठ जाना है, नहा लेना है और आठ बजते-बजते गाड़ी को सड़क पर रेल देना है। मयूर विहार फेज थ्री से मयूर विहार फेज वन और टू होते हुए, अक्षरधाम मंदिर वाली सड़क से होते हुए फिर पुराने आईटीओ ब्रिज को पार करने के बाद आईटीओ और बहादुरशाह जफर मार्ग पर गाड़ी रुकती है। अभी ठीक से तो हिसाब नहीं किया है लेकिन लगता है कि कार रोजाना सुबह शाम आने-जाने को मिलाकर 50 किमी चल ही लेती होगी। आते वक्त जिस तरह से लोग अपनी कारों और बाइकों को लेकर दिल्ली की ओर भागते हैं वो वाकई मजेदार है। मैं तो नया नया मुल्ला हूं। रोज अगल बगल की कारों वाले भाइयों-बहनों की शक्लों को देखता हूं, पढ़ने की कोशिश करता हूं। अब एक दो हफ्ते बीत रहे हैं तो लगता है कि वही भाव मेरे चेहरे पर भी आने लगे हैं। किसी ने थोड़ी भी गलत तरीके गाड़ी ओवरटेक की, कोई साइकिल वाला एकदम से आगे आ गया, आगे वाली गाड़ी बार बार इशारा करने पर भी दाएं-बाएं होने के लिए जगह नहीं दे रही.......तो चेहरा फनफना जाता है, शक्ल कुत्ते की होने लगती है, मुंह से भौं भौं की आवाज आती हुई महसूस होती है। लेकिन मैंने महसूस किया कि दरअसल दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली कारों और बाइक वालों को तय कर लेना चाहिए कि ड्राइविंग और ट्रैफिक के दौरान हुए किसी गड़बड़ घोटाले पर आपस में कभी नहीं भिड़ेंगे। रोज देखता हूं कई कार वाले कुत्ते की तरह भौंकते हुए आपस में एक दूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं। तूने मेरी गड्डी पर क्यों ठोंक दी तो तूने बिना सिग्नल दिए गाड़ी क्यों रोक दी। हे भगवान...सालों के पास कोई काम नहीं है क्या....जो काम भी होगा उसमें एक चीज तो बिलकुल पक्की है कि उस काम से उस कंपनी का भले लाभ हो जाए और इन महाशय का भले कल्याण हो जाए लेकिन किसी आम आदमी का तो भला नहीं होने वाला क्योंकि ये कायदे से खुद आदमी नहीं बन पाए हैं तो आम आदमी को क्या समझेंगे......यही सब सोचते गुनते घर पहुंचा तो टीवी पर टीसीरीज वालों की साइट पर एक भोजपुरी गाना चल रहा था...आजा घरे छोड़ के तू दिली......। गाने की धुन और बोल और गायिकी लाजवाब......मन में हूक उठी...आ तो रहा ही था घर लेकिन जाने फिर कैसे हाथ-पांव मारकर दिल्ली में रह गया.....हांफने-भागने और रोज थोड़ा सा कम हो जाने......
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यशवंत सिंह yashwant singh
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