Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

19.8.08

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है.......

काज का तूफ़ान है की थमने का नाम नही ले रहा है, और इसी रोजी रोटी के लिए यदा कदा यहाँ वहां भटकता रहता हूँ। अभी हप्ते दिन पहले की बात है मैं दिल्ली में था और रोज ही नोएडा के फेस टू तक का सफर दक्षिण दिल्ली से कर रहा था कारण वो ही कि पापी पेट का सवाल है।

नॉएडा का फेस टू ओद्योगिक इलाका है चारो तरफ़ फैक्ट्री हि फैक्ट्री और इनके साथ लगे दीवालों के नीचे इनमें काम करने वाले मजदूर और उनका परिवार। मैं रोज ही संध्या काल में कार्यालय से बाहर आता सुट्टा के बहाने और रोज ही इस छोटे बच्चे से मिलता। आप भी देखें.....


पढने की ललक , सुविधा का आभाव चलो दिन के उजाले में पढ़ लें...........

आप जानना चाहेंगे की ये मासूम कौन है तो बताता चलूँ की नॉएडा के ही फक्ट्रियों में काम कर रहे मजदुर के बच्चे हैं, रहने को न छत, पहने को न कपड़े, खाना पता नही ये क्या खाते हैं मगर पढने की ललक को देख कर कुछ कर गुजरने की तमन्ना जरूर दिखती है.

आशियाना आसमान से ऊपर

ये है इस मासूम का ठिकाना जहाँ घर के नाम पर ये चंद पोलीथिन के छत खेलने के लिए सड़क और पढने के लिए सड़क के साथ सूर्य भगवान् की कृपा, अगर बारिश तो इस बेचारे का पढने का हर्जा होना।

सरकार के बाल विकास और बाल शिक्षा की पोल खोलती ये तस्वीर ही बयां करती है की हमारे कार्यक्रम किस प्रकार नेता और समबन्धित अधिकारी से होते हुए मीडिया का जेब गर्म करते हुए अपने मुकाम तक पहूंचता है यानी की वार्षिक रिपोर्ट योजना के सफलतम होने की घोषणा के साथ ही, मगर मेरा ये छुटकू अपने अधिकारों से अनजान अपनी जद्दोजहद इस सड़क की चटाई पर सूर्य की रोशिनी में जारी रखे हुए है,

क्या इस तरह से युद्ध जीतने वाले योद्धा पर सरकार को गर्व करने का हक है?

इस तरह से अपने मुकाम पाने वाले वीरों पर देश की जानता कैसे अपना अधिकार बता सकती है।

जय जय भड़ास।


18.8.08

अपनी नहीं पाकिस्तान की चिंता

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के आज इस्तीफा देते ही पाकिस्तान में प्रतिक्रियाओं का आना स्वाभाविक था किंतु भारत देश में उससे ज्यादा मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रहीं हैं. मीडिया में तमाम स्वयम्भू जानकार जो ख़ुद को मीडिया के द्वारा भारत-पाक संबंधों का जानकार घोषित करवा रहे हैं, मुशर्रफ़ के इस्तीफे पर अपनी राय प्रकट कर रहे हैं. मीडिया में लोगों की चिंता अब पाकिस्तान में स्थिर सरकार, स्थिर लोकतंत्र की स्थापना को लेकर दिख रही थी. कितनी हास्यास्पद स्थिति है की जिस देश में अपना लोकतंत्र, अपनी सरकारें स्थिर नहीं दिख रहीं हैं, जहाँ के हालात ख़ुद बेकाबू हैं (जी हाँ मैं अपने भारत देश की ही चर्चा कर रहा हूँ) वो अपने पड़ोसी के लोकतंत्र के लिए चिंता कर रहा है.
ये बात एकदम सही है कि कोई भी स्थिति हो देश हो, समाज हो, मोहल्ला हो, सफर हो, मनोरंजन हो सभी में पड़ोसी का विशेष महत्त्व है। यहाँ देश के पड़ोसी की अपनी महत्ता है क्योंकि उसको किसी भी स्थिति में बदला नहीं जा सकता है किंतु इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि अपनी स्थिति की चिंता किए बगैर अपने पड़ोसी की चिंता में लग जाया जाए.
बहरहाल अपने देश के हालातों पर एक नज़र भर क्योंकि वास्तविकता से आप सब भी परिचित हैं।
1- केन्द्र सरकार मंहगाई को रोक नहीं पा रही है।
2- जम्मू में स्थिति अभी भी शांत नहीं हैं। वैसे शांत रहे ही कब?
3- झारखण्ड का राजनैतिक संकट बरकरार है। मुम्बई में उत्तर वालों पर अभी भी हमले हो रहे हैं.
4- बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि अनेक राज्यों में आपराधिक घटनाएँ लगातार घटने के स्थान पर बढ़ ही रहीं हैं।
5- बमों के धमाके हमेशा होते रहने की नियति बन चुकी है। आदि-आदि-आदि-आदि....................

ये उदहारण कुछ एक हैं। इन्हें निपटाने का कोई हल नहीं निकाला जा रहा है और चिंता की जा रही है पाकिस्तान की. ठीक है पड़ोसी की भी चिंता की जाए पर क्या उस पड़ोसी की जिसने हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत को खून के आंसू दिए हैं? हो सकता है जो आजादी के पूर्व पाकिस्तान में रह रहे थे और हालातों के चलते यहाँ आ गए उनका पाकिस्तान से मोह तो समझा जा सकता है पर क्या हालत कुछ सीखने को नहीं कहती? फ़िर भी आए दिन पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाई जाती रहती है. अब हालातों को समझ कर वोट बैंक का मोह छोड़ कर वास्तविकता को समझना होगा. पाकिस्तान में शासक कोई भी आए उसकी सत्ता तब तक फलीभूत है जब तक वह भारत विरोध करता है. इसके ठीक उलट यहाँ उसी को वोट मिलने की अधिक उम्मीद रहती है जो पाकिस्तान प्रेम की बात करता है. वाह रे देश, वाह रे सरकारें, वाह रे जानकार, वाह रे नेताओं, वाह रे वोट बैंक लोलुप, वाह से शान्ति समर्थक........... वाह-वाह....... एक तरफ़ विरोध, एक तरफ़ प्रेम.

आखिर जमीन का एक कतरा ही तो है

छोटी-छोटी बातों पर बयान जारी करने वाले हमारे नेता जम्मू-कश्मीर के हालात पर मौन हैं। जबकि, बात यहां तक आ पहुंची है कि श्रीनगर में हमारे राष्ट ्रीय ध्वज का अपमान किया जा रहा है। वहां की इमारतों पर पाकिस्तान का झंडा लहराया जा रहा है। तुष्टि करण की राजनीति का शिकार देश के नेता इस मसले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है उनके मुंह से निकले कुछ शब्द उनके वोट बैंक में सेंधमारी का कारण न बन जाएं। जबकि, जम्मू के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। जमीन के एक टुकड़े के लिए दो संप्रदायों के लोग आमने-सामने हैं। मीडिया में आ रही खबरों में साफ दिखाई दे रहा है कि वहां का आम आदमी इस दिनों किन हालात में जी रहा होगा। भूमि हस्तांतरण मुद् दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेेंकी जा रही हैं। आम आदमी को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मुद् दे की आड़ में उन तमाम बातों को अंतरराष्ट ्रीय मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनकी कोशिश पहले भी कई बार होती रही हैं। बात साफ है अलगावादी लोग इस बात को उछालना चाहते हैं कि कश्मीर में मुसलमान खुश नहीं हैं, उन पर अत्याचार हो रहे हैं। दूसरा, वे कश्मीर के सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक ताने-बाने को एक पंथीय रूप देना चाहते हैं। कश्मीर के लोगों को भी इस देश केप्रत्येक नागरिक की तरह वे सभी अधिकार प्राप्त हैं, जो भारतीय संविधान में दर्ज हैं। लेकिन, कुछ अलगाववादी लोग धर्म की आड़ लेकर वहां की जनता को बहका रहे हैं। उनका एक ही मकसद है, भारत की अंखडता को छिन्न-भिन्न करना। वे नहीं चाहते की इस देश में एकता कायम रहे।
मेरा मानना है कि इस मुद् दे पर देश के बौद्धिक वर्ग को आगे आकर पहल करनी चाहिए। हिंदू-मुसलमान भाईचारे को कायम रखते हुए दोनों सुमदाय केलोगों को मिलजुलकर विवाद को सुलझाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर आज नहीं, आजादी केबाद से ही जल रहा है। इसका स्थायी समाधान है, लेकिन राजनैतिक लोगों से इसकी अपेक्षा करनी बेमानी है। योंकि अगर जम्मू-कश्मीर और वर्तमान भूमि हस्तांतरण जैसे मुद् दे समय पर सुलझा लिए गए, तो कई राजनेताआें की दुकाने बंद हो जाएंगी।
दूसरा राष्ट ्रीय स्वाभिमान के प्रतीक तिरंगे का अपमान करने वाले को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वह किसी समुदाया का यों न हो। इसी तिरंगे की आन बचाने को हमारे फौजी आए दिन सीने पर गोलियां खाते हैं। लेकिन, तिरंगे को जमीन पर तक नहीं गिरने देते। फिर यह बात कैसे बर्दाश्त किया जा सकत है कि कोई इसी देश में रहते हुए देश के झंडे को जलाए। मुजफ्फराबाद रैली के दौरान और आगे-पीछे भी जम्मू-कश्मीर पर देश की जनता ने टीवी और समाचारों पत्रों में तिरंगे को जलाने की तस्वीरें साफ देखीं। उनकी मुठि् ठयां भिंच गइंर्। लेकिन, वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। योंकि यह खेल आम आदमी की पहुंच से बाहर है। देश का आम आदमी खिन्न है, वह धरना-प्रदर्शन तो कर सकता है, चिल्ला सकता है, लेकिन उसके हाथ में वह ताकत नहीं है, जो सीधे तौर पर ऐसे लोगों को मुंहताे़ड जवाब दे।

भ्रष्टाचार

फैल रहा है देश में कैसा भ्रष्टाचार
देख रहे हैं सब खड़े बेबस और लाचार
बेबस और लाचार अगर कोई न चेता
खा जायेंगे बेच इसे आगे ये नेता
कैसी त्रासदी देश हमारा झेल रहा है
भ्रष्टाचार बन ज़हर रगों में फैल रहा है

मेरा भारत महान

15 अगस्त की खुशी मना कर लौटा, मन में उमंग,हर्ष की अनुभूति अपनेआप ही होने लगती है. अब भी तिरंगे को सलामी देते समय बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं जब स्कूल में तिरंगे की तरफ़ देखते हुए सलामी को उठते नन्हे हाथ लरजते थे, मन में अजब सी अनुभूति होती थी, देह का एक-एक रोयाँ खडा हो जाता था. इसके ठीक उलट अब तिरंगे को फहराने की रस्म अदायगी की जाने लगी है. न स्कूलों में कोई कार्यक्रम, न खेलकूद न देशभक्ति भरे गीत. अब जो थोड़े से कार्यक्रम कहीं होते भी हैं तो उनमें बच्चे फिल्मी गीतों पर ठुमका लगाते दीखते हैं.
बच्चों का क्या कहें बड़ों की स्थिति भी प्रशंसनीय नहीं है। हमारे आसपास रोज़ ही लड़ाई-झगडे देखने को मिलते हैं. देश को तोड़ने की साजिश होती दिखती है. ऐसा ही कुछ 15 अगस्त के समारोह के बाद देखने-सुनने को मिला. मन ख़राब हुआ और आज बैठे-बैठे बहुत पुरानी अपनी एक कविता याद आ गई "मेरा भारत महान" आपको भी उसे बताते चलें. शायद..................

सालों पहले देखा
सपना एक
भारत महान का।
आलम था बस
इंसानियत, मानवता का।
सपने के बाहर
मंजर बहुत अलग था,
बिखरा पडा था.......
टूटा पडा था......
सपना.......
भारत महान का।
चल रही थी, आंधी एक
आतंक भरी
हर नदी दिखती थी
खून से भीगी भरी,
न था पीने को पानी
हर तरफ़ बस
खून ही खून।
लाशों के ढेर पर..........
पडा लहुलुहान.....
कब संभलेगा......
मेरा भारत महान!!!

17.8.08

मुस्लिम समाज में परिवर्तन....

' परिवर्तन संसार का नियम है। इसी नियम के तहत आज सब कुछ बदल रहा है। पहले जहाँ औरतें अपने अन्डर-गारमेंट्स खुले धुप में सुखाने में भी शर्माती थी, वहीँ आज ये बाज़ार में खुलेआम नज़र आते हैं....... मुस्लिम समाज भी अब परदे से बाहर निकल रही है....... तुम्हारे यहाँ तो मौल्वियो का दबदबा है.......... बात बात पर फतवे जारी कर दिए जाते हैं............. हर काम पर पर रोक लगा दी जाती है.......... यहाँ मत जाओ , वहां मत जाओ ...... यह मत करो, वो मत करो........जहाँ एक तरफ़ मुसलमान आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट हो कर उसके समाप्ति की बातें कर रहे हैं, वहीँ बाल ठाकरे साहब की ओर से हिंदू आतंकवाद के बढावा देने की भी बातें हो रही हैं, ....... आदि-अनादी। '

हमलोग इन्ही बातों को लेकर पिछले दिनों चम्पारण की पवित्र धरती 'बेतिया' (जहाँ से गाँधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत की थी, और आज राजनितिक गतिविधियों एवं अपने कारनामों के कारण पुरे भारत में प्रसिद्द है।) अपने एक मित्र के घर बहस कर रहे थे । दरअसल, हम सब को एक पार्टी में जाना था, इसी कारण एक जगह एकत्रित हुए थे। अभी हमारी बहस जारी थी ही थी कि कानो में पटाखों कि गूंज साहब सुनाई दी, ऐसा लगा ठाकरे कि की फिदाईन दस्ते ने हमारे घरों पर हमले बोल दिए हैं। घबराहट में हम छत की तरफ भागे. अब बैंड बाजों की धुन हमारी कानो को आनंदित कर रही थी. मेरे एक मित्र ने कहा "लगता है, बारात है...." पर हम सब इस सोच में डुबे थे कि बिन लगन यह शहनाई कैसी....? हिन्दू धर्म के लिए तो अभी लगन तो है ही नहीं. हो सकता है किसी मुस्लिम कि शादी होगी. उनके यहाँ तो कोई नेम-टेम होता ही नहीं. बाप भी मर जाये तो भी शादी हो जाती है. लेकिन जैसे ही बारात और नजदीक आई, हमने रथ को देखा जो आमतौर पर हिन्दू धर्म कि शादी में ही देखा जाता है. मुस्लमान दुल्हे तो घोडे या फिर गाडी में बैठना मुनासिब समझते हैं. इस तरह हम सब कन्फर्म हो गए कि कोई हिन्दू शादी ही है.मेरे दोस्त ने चुटकी लेते हुए कहा "देखो हमारे यहाँ भी सब कुछ बदल रहा है, अब तो तुम लोग भी सुधर जाओ." पर यह क्या सिर्फ सौगोलिया ही नज़र आ रहे है. दूल्हा तो कही है ही नहीं. सचमुच दूल्हा था ही नहीं. सिर्फ चार छोटे-छोटे बच्चे दूल्हा बने दिखे. कहीं यह बाल विवाह तो नहीं. पर बाद में मालूम चला कि इन बच्चो की कल मुसलमानी होने वाली है और अज उनका अकीका है,और उसी अकीका की पार्टी में हमें जाना है. फिर वहां जाकर मेरे मित्रो ने जो कुछ देखा,उनकी आँखें खुली की खुली रह गयी. और उनके मुंह से बरबस ही निकला "मुस्लिम समाज में इतना परिवर्तन...?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा "जी दोस्त! सब कुछ बदल चूका है,और ये परिवर्तन हमें स्वीकार करना पडेगा."

खेलों का भला ऐसे होगा?

अभिनव बिंद्रा ने ओलम्पिक में गोल्ड मैडल जीत कर देश में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के महत्व दिए जाने का संदेश दिया पर क्या वाकई ऐसा होगा? यह एक बड़ा सवाल है कि क्या वाकई ऐसा होगा क्योंकि ये पहली बार नहीं है जब क्रिकेट के अलावा भी किसी दूसरे खेल के किसी खिलाडी ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है. देश में उस समय भी एक प्रकार का जूनून छाया था जब विश्वनाथ आनंद ने शतरंज में विश्व चैंपियनशिप जीती थी. उस समय लग रहा था कि देश के हर एक नौजवान को अब शतरंज ही खेलना है.
जहाँ तक क्रिकेट की बात है तो इस देश में क्रिकेट को देवताओं के समकक्ष रख कर देखा जाता है बल्कि यदि कहा जाए कि देवताओं से ऊपर रखा जाता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये बात इस कारण भी ग़लत नहीं है क्योंकि देश में सट्टे के एक कलंकित दौर के बाद लग रहा था कि इस देश के देशभक्त क्रिकेट को भुला कर तो नहीं पर कुछ मोह छोड़ कर दूसरे खेलों की ओर भी ध्यान देंगे पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. क्रिकेट जहाँ था वहीँ रहा बाक़ी खेल जहाँ थे वहीँ रहे.
यदि हम अपने अन्य खेलों के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को सामने रख कर क्रिकेट के खिलाड़ियों से तुलना करें तो वे किसी भी स्थिति में सचिन, धोनी, युवराज आदि से कम नहीं बैठते हैं पर सब बातों की एक मुख्य बात है पैसा। और पैसा सबसे ज्यादा है क्रिकेट में तो बस.................. इसका उदहारण अभी हाल में संपन्न हुए 20-20 मैच हैं. कुल मिला कर कहा जा सकता है कि बिंद्रा की अपनी सोच अच्छी है कि उसके स्वर्ण पदक जीतने से अन्य खेलों की तरफ़ सरकार ध्यान देगी पर ऐसा कतई नहीं होगा. यदि सरकार ध्यान देती तो बिंद्रा बिदेश में अपना अभ्यास नहीं करते, सानिया विदेश को नहीं भागती, भूपति-पेस के खेलों पर भी ग्रहण नहीं लगता, और तो और आठ बार के ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता हाकी, देश का राष्ट्रीय खेल हाकी आज बाहर खड़े होकर खेल न देख कर बीजिंग में खेल रही होती. सरकार को बस इतनी सुध है.
चलते-चलते एक बड़ी सुखद ख़बर, बीसीसीआई के एक प्रतिष्ठित पदाधिकारी का कहना है कि हमारी सरकार को ओलम्पिक के समाप्त हो जाने के बाद चीन से उनका उखडा हुआ सामान ले लेना चाहिए ताकि हम 2009 में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी कर सकें, एक ढांचा बना सकें. क्या इस तरह के रवैये से हम खेलों में सुधार की बात कर सकते हैं?

वो कहते हैं हम बदतमीज हैं

अभी कुह दिन पूर्व दिल्ली में था, बस पकड़ने के लिए दक्षिण दिल्ली के एक पोश इलाके के बस स्टैंड पर खड़ा था तो स्टैंड के पास के नजारे ने कुछ दिनों पूर्व के मुख्यमन्त्री और राज्यपाल के वक्तव्य को याद दिला गया।
शहरी मुख्यमन्त्री और अनुशाषित राज्यपाल को लगता था की सम्पूर्ण उत्तर भारतीय नियम कानून को ताक पर रख कर चलते हैं और इनके सरकार चलाने में रोड़ा अटकाते हैं। तुलना की दक्षिण के लोग बड़े सुशिक्षित होते हैं और कायदे कानून वाले भी, तात्पर्य सिर्फ़ इतना की देश की राजधानी के सर्वेसर्वा जहाँ लोगों को सर्टिफिकेट दे रहे थे वहीँ उत्तर और दक्षिण के नाम पर विभेद भी।

जरा इस तस्वीर को देखिये , दक्षिण दिल्ली के पोश इलाके के बस स्टैंड का है, ठीक सामने बड़ा सा गड्ढा, गड्ढा इतना बड़ा की एक छ: फुट का आदमी समां जाए, सोचिये रात का समय हो और लोग बस पकड़ने के लिए स्टैंड से नीचे आयें आगे अल्लाह ही मालिक है क्या इस तस्वीर के बाद भी लोगों से अपेक्षा की वोह बस स्टैंड पर बैठ कर बस आने के बाद गड्ढे में जाने का इन्तेजार करें।

वो कहते हैं हम बदतमीज हैं हमें सभ्य समाज में रहना नही आता हम कहते हैं हमारे दम पर सरकार बनाने वालों तुम्हें सरकार चलाना नही आता।

जय जय भड़ास

कब तक हम विदेश भैजेगे अपने बच्चो को डक्टरी पढ़ाने ..?

इन दिनो देश के ढ़ेरो बच्चे डाक्टरी की शिक्षा पाने के लिये चीन , रूस आदि देशो की ओर जा रहे है . इससे जहां एक तरफ भारत को आर्थिक नुकसान हो रहा है वही लोगो को असाधारण असुविधा हो रही है . पर बचचो के सुखद भविष्य की कामना में लोग यह कदम उठाने को विवश है. ईन देशो से मेडिकल शिक्षित बच्चो को देश में प्रैक्टिस करने के लिये ima की एक परीक्षा पास करणी होती है .
यदि सरकार आर्थिक कारणौ से नये मेडिकल कालेज नही खौल पा रही है तो , निजी क्षेत्र को मेडिकल कालेज शुरू करने दे , इन कालेजो से पास बचचे ima की वही परीक्षा पास करके अपनी प्रैक्टिस कर सकते है .
देश की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है यदि मेदिकल कालेज नही खोले गये तो कुछ ही वर्षो में डाक्टर ढ़ूढ़े नही मिलेंगे .
क्या सोचते है आप?

बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर

एक ओर स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं हम ...
दूसरी ओर रक्षा बंधन ...
तो बंधन और स्वतंत्रता के संयुक्त अवसर पर चिंतन करें .
स्वतंत्रता के लिये हम जान देने को तैयार हैं फिर हमें आखिर बंधन अच्छा क्यो आर कैसे लगता है ....
उत्तर है हमें वह बंधन अच्छा लगता है जिसमें बहन का शा निश्छल प्यार हो , जिसमें रक्षा का संकल्प हो
तो ऐसे पाव पुनीत अवसर पर सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई , मंगलकामनायें
विवेक रंजन श्रीवास्तव
, जबलपुर

हिन्दी का विकास और विकसित देश

अमेरिका के पास सबसे ज्यादा पैसा है, आस्ट्रेलिया के पास सबसे ज्यादा यूरेनियम है, हर विकसित देश के पास पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन भारत के पास पर्याप्त लोग है... अर्थात पर्याप्त मानव संसाधन हैं. लेकिन इनके लिये भारत में न तो पर्याप्त संसाधन हैं न अवसर.
अब बात करते हैं अपनी भाषा और उसके सशक्तिकरण की. हम हमेशा यही राग अलापते हैं कि हिन्दी को मजबूत करने के कोई प्रयास नहीं किये जा रहे तो मेरे एक मित्र सदैव यह उदाहरण देते हैं कि विदेशों में उन देशों की भाषा ही सर्वमान्य भाषा है वहां चपरासी से लेकर अधिकारी तक सभी एक ही भाषा में काम करते हैं. वहां पढ़ाई भी एक ही भाषा में होती है लेकिन भारत में ऐसा नहीं फिर इस पर लंबी बहस होती है और बात बेनतीजा हो कर अधूरी रह जाती है. काफी सोचने के बाद मेरा मानना है कि जब तक हम विकसित देश नहीं हो जाते तब तक हिन्दी पूरे देश की भाषा नहीं बन सकती चाहे इसके लिये हम कितने भी प्रयास कर लें या फिर कितने भी आयोजन कर लें.
अब हम बात करते हैं कि भारत की पूरी शिक्षा हिन्दी में क्यों नहीं होती तो मेरा मानना है कि चलिये हम पूरी शिक्षा हिन्दी में कर भी लेते हैं सारी किताबे हिन्दी में तैयार भी हो जाती हैं तकनीकी, चिकित्सा सहित सारी पढ़ाई हिन्दी में शुरू हो जाती है तो हासिल क्या होगा... इन परिस्थितियों में जो भी पेशेवर तैयार होंगे वे बेहतर हिन्दी तो जानेगें लेकिन उन्हे हम कितना रोजगार दे पाएंगे... क्या हमारे यहां इतनी व्यवस्थाएं हैं कि उन्हें हम अपने यहां खपा सकें... शायद नहीं. फिर ये बेहतर हिन्दी भाषी क्या बाहर रोजगार पा सकेंगे...
दूसरा क्या हमारे यहां इतने संसाधन हैं कि नित नई खोज अपने यहां अपनी भाषा में कर सकें... निश्चित तौर पर नहीं फिर हम हिन्दी भाषी अपने अल्पसंसाधनों व हिन्दी भाषा ज्ञान के माध्यम से बाहरी प्रणालियों से समन्वय बना सकेंगे... शायद नहीं
लोग कहते हैं विदेशों में जाने वाले लोगों को वहां की भाषा सीखनी पड़ती है तो भारत आने वाले क्यों नहीं सीखते हिन्दी... तो महाशय हम अभी विकास की उस प्रक्रिया से गुजर रहे हैं जहां लोग अभी आना शुरू किये हैं. यदि हम उन्हें अभी नहीं समझ पाएंगे या उन्हें नहीं समझा पाएंगे तो वे दूसरी ओर जाना शुरू कर देंगे... फिर हम उनपर हिन्दी लाद कर क्या हिन्दी का विकास कर सकेंगे...
आज हम गरीबी के साथ जीने वाले तथा कम रोजगार के अवसरों से घिरे देश में रह रहे हैं यदि हमने हिन्दी की चादर ओढ़ ली तो क्या हम रोजगार के बेहतर अवसर बाहर पा सकेंगे... शायद नहीं...
ऐसे कई मामले हैं जहां पूर्ण हिन्दी अपना लेने से हम नुकसान में रहेंगे. हां लेकिन जब हम विकसित राष्ट्र हो जाएंगे तथा हमारे मानव संसाधन पूर्ण संसाधन में बदल जाएंगे तो फिर हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. उस समय हम हिन्दी को लोगों की मजबूरी बना सकेंगे. तब हमारे पास मानव संसाधन को खपाने के पर्याप्त संसाधन होंने और उसका माध्यम होगी हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी...
इसलिये यदि हिन्दी को राष्ट्र भाषा तथा सर्वमान्य भाषा बनाना है तो हिन्दी के विकास के दिखावटी प्रयास बंद कर देश को विकसित राष्ट्र बनाने में जुटें. विकसित होते ही हिन्दी अपने आप राष्ट्र भाषा बन जाएगी.

16.8.08

दिल्ली पुलिस और ब्लू लाइन

दिल्ली और ब्लू लाइन एक दुसरे का पर्याय है, बिना ब्लू लाइन के दिल्ली ऐसी लगेगी जैसे सधवा के मांग से सिंदूर हटा दिया गया हो, सच कहूं तो लोगों का जीना मुहाल हो जाए और दिल्ली सरकार की डी टी सी यानी की या तो बस ही ना आए ओए यदि गलती से आ भी जाए तो किस्मत आपकी ड्राइवरआपको चढ़ाएगा की नही। खैर ये तो बातें बसों की मैं बता रहा था की आप दिल्ली में हों और ब्लू लाइन की सेवा ले रहें हैं गरमी हो या बरसात आपको जल्दी हो या न हो मगर इन तस्वीर को देखिये, दिल्ली पोलिस के इन प्रहरियों को आम जन से कोई लेना देना नही, बस रोकी हील हुज्जत रोज का ड्रामा बस एक पत्ती और बस को हरी झंडी, अगर ज्यादा चूं चपड़ तो फ़िर रुके रहो भाई क्योँ की ये दिल्ली पोलिस है, आपकी सेवा में हमेशा आपके लिए तत्पर, बस पत्ती होनी चाहिए।

जरा इस तस्वीर को देखिये हम भी इसी बस में थे, बस के ड्राइवर और कंडेक्टर ने पत्ती देने से मना कर दिया कारण साफ़ था की दोनों पुरे युनिफोर्म में थे और सभी कागजात भी पुरे थे सो जिच दोनों तरफ़ और बीच में पीसने वाली गरीब दिल्ली की जनता, क्या करें दिल्ली की एलिट क्लास की मुख्यमंत्री और राज्यपाल महोदय को हमारा पिसना जो नही दिखता है, हाँ यहाँ के लोगों की खामियां मीडिया के सामने बताने में परहेज नहीआख़िर इसी बहने अपने खामियों को जो छुपाना है.

15.8.08

किसे फरक पड़ता है किसी करुणाकर या कुंवर जी अंजुम के न होने पर....!!!!

करुणाकर जब जिंदा थे तभी यह सूचना मिली थी कि कुंवर जी अंजुम नहीं रहे। और उनका जाना कोई हफ्ते दो हफ्ते पहले का मामला नहीं था। पूरे एक साल पहले वे इस दुनिया से गए लेकिन खबर आते आते पूरा साल गुजर गया। कुंवर जी अंजुम ने अपनी जिंदगी के दो तिहाई दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर के रूप में गुजारे। मास्को भी गए थे। सीपीआई की नेशनल कोउंसिल में रहे। सीपीआई की मैग्जीन के संपादक मंडल में तो रहे ही, उन्होंने अपनी पार्टी के कई बड़े कामरेडों की आत्मकथाएं भी लिखी थीं। क्रांति और आदर्शों से सीपीआई की बढ़ती दूरी और चुनाव व सत्ता से लगातार नजदीकी के चलते सीपीआई के नेता भी कुछ वैसे ही हरकत करने लगे जैसे दूसरी पार्टियों के नेता करते थे। पूरी पार्टी के सत्ता व वोट के लाभ हानि नफा नुकसान की तरफ बढ़ जाने से इस पार्टी के आदर्शवादी लोगों को झटका लगा और वे धीरे धीरे इधर उधर होने लगे। कुछ ने सीपीएम या सीपीआईएमएल का साथ पकड़ लिया तो कुछ जो ज्यादा चालाक व चतुर थे वे सपा और बसपा और कांग्रेस की ओर मुड़ लिए। कुंवर जी अंजुम दिल दिमाग व सोच से शायर, बेहतरीन इंसान, सांस्कृतिक चेतना से लैस, समाज व देश-दुनिया की गूढ़ समझ रखने वाले, हिंदी उर्दू लिट्रेचर के जानकार थे। ऐसे संवेदनशील आदमी के लिए यह दो तिहाई उम्र गुजारने के बाद यह समझ में आना की जिस राह पर चले थे वो मंजिल को नहीं जाती, कहीं और ले जाती है, बेहद झटका देने वाला रहा। ज़िंदगी की गाड़ी खींचने के लिए पत्रकारिता में चले आए और दुनिया के दोगलेपन से मुक्त होने व खुद को खो देने की खातिर शराब से दोस्ती कर ली। जब मैं जालंधर में अमर उजाला की लांचिंग पर ट्रेनिंग देने वास्ते डेपुटेशन पर गया था तो वहां कुंवर जी अंजुम एक साथी पत्रकार की भांति मिले। मोटे कंबल वाले जैकेट को पहने, मुंह में पान घुलाए, दाढ़ी बढ़ाए और चेहरे पर मुस्कान लिए गले मिले। इससे पहले हम लोगों की मुलाकातें लखनऊ में दुर्गा दादा के पास हुआ करती थीं। दुर्गा दादा सीपीआई के होलटाइमर होने के साथ साथ पार्टी की मार्क्सवादी साहित्व वाली दुकान चेतना पुस्तक केंद्र के प्रबंधक थे। दुर्गा दादा के यहां कुंवर जी अंजुम से लगातार मिलना होता था। कई बार विधायक निवास दारुलशफा के बगल वाली शराब की दुकान पर टकरा जाते थे। फिर जो मजा़ज़, ग़ालिब, बशीर बद्र, फिराक साहब ....की ग़ज़लों व शेरों से हम लोगों को रुबरु कराते थे, सुनाते थे, समझाते थे और जिंदगी के फलसफे को पद्य में इशारे इशारे में हौले हौले से नशे के साथ दिल में उतारते थे। मैं देहाती, तलछट, कम पढ़ा लिखा.....ऐसे विद्वान व्यक्ति पर मुग्ध सा होता गया। उनकी फटेहाली, उनकी सादगी, उनकी सहजता, उनकी विनम्रता, उनका ज्ञान, उनका विजन, उनकी सोच, उनका क्रांतिकारी अतीत, उनका संघर्षमयी वर्तमान...यह सब मुझे हीरोइक सा लगने लगा।
जालंधर में मुलाकात के बाद एक घटना हुई। कुंवर जी अंजुम शराब के इतने दीवाने हो चुके थे कि वे उसके साथ चौबीसों घंटे जीने लगे थे। नए बने अमर उजाला आफिस के बाथरुम में दीवार में एक ईंटे भर छेद में दारू का पव्वा रख देते थे और उपर से ईंटे के टुकटे से उसे ढक देते थे। हर दो घंटे पर बाधरूम जाते और एक पैग मारकर काम पर लग जाते। कुछ साथियों ने उन्हें ऐसा करते देख लिया और संपादक से शिकायत कर दी। संपादक रामेश्वर पांडेय जी कुंवर जी अंजुम के व्यक्तित्व को भली भांति जानते थे और उन्होंने ही कुंवर जी को ज्यादा उम्र के बावजूद उनके ज्ञान के चलते पत्रकारिता में मौका दिया। रामेश्वर जी ने कुंवर जी को समझाया, चेताया और ऐसा न करने की सलाह दी। दूसरा कोई संपादक होता तो शायद उसी पल कुंवर जी को हटा देता लेकिन रामेश्वर पांडेय ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कुंवर जी को हमेशा मौका दिया। कुंवर जी बाद में दैनिक जागरण, नोएडा आ गए। यहां भी काम के बाद और काम के दौरान पीने पिलाने का दौर चलता रहा। इसके बाद उन्हें एक दिन नौकरी से निकाल दिया गया। साहिबाबाद में नया घर लिया था कुंवर जी, बिटिया पढ़ती है, पत्नी साथ रहती हैं। नौकरी जाने के बाद कुंवर जी से संपर्क किसी का नहीं हो पाया। जो खबरें पता चलीं उसके मुताबिक वो और ज्यादा पीने लगे थे। उसी क्रम में एक दिन उन्हें लखनऊ ले जाकर एसजीपीजीआई में भर्ती कराना पड़ा और कई महीने के इलाज के बाद लीवर सिरोसिस के चलते उनकी मौत हो गई। उनकी मौत की खबर दोस्तों तक पूरे साल भर बाद पहुंची। किसे फिक्र की कोई किसी बेरोजगार का हालचाल जाने। यहां तो उगते सूरज को सौ बार सलाम करने की परंपरा है। डूबते सितारे की तरफ कोई मुड़कर देखता तक नहीं। कुंवर जी नहीं रहे, यह अब भी उनके कई जानने वालों को पता नहीं है। मुझे भी पता नहीं था। जब कुंवर जी की पत्नी पूरे एक साल बाद दैनिक जागरण से उनका बकाया लेने आईं तक जाकर उनके साथ काम करने वालों को उनके निधन के बारे में पता चला। लखनऊ से लेकर जालंधर, नोएडा, दिल्ली में उनके हजारों जानने वाले थे पर किसी को उनकी फिक्र करने की जरूरत नहीं थी। कुंवर जी किसी को नौकरी नहीं दे सकते थे, कुंवर जी किसी को लाभ नहीं दिला सकते थे, कुंवर जी पैसे वाले नहीं थे, कुंवर जी किसी के सामने किसी चीज के लिए रिरिया नहीं सकते थे। कुंवर जी किसी की चापलूसी नहीं कर सकते थे। वो इंसान अपने में मस्त, अपने में खुश, अपने में उदास, अपने में दुखी। उसने जिंदा होते हुए भी खुद को इंसानों से काट लिया था। इंसानों के बीच रहता था लेकिन संवाद बस इतना ही जितने में जिंदगी चल जाती, नौकरी चल जाती।

आखिर में कुंवर जी नहीं रहे। मरना तो सबको है, कुंवर जी थोड़ा पहले चले गए। वो चाहते तो सीपीआई के नेताओं की तरह चतुर सुजान होकर किसी पार्टी में चले जाते और दलाली के जरिए लाखों करोड़ों कमा लेते। किसी बड़े नेता की चापलूसी करके उसके लिए मीडिया मैनेज करते और पैसे में खेलते। पर उन्होंने कुछ भी ऐसा नहीं किया जो उन्हें पसंद नहीं था। एक संस्कृतकर्मी, एक शायर, एक बेहतरीन इंसान कुंवर जी का जाना कचोट रहा है पर यह कचोट बस केवल कुछ सेकेंड के लिए है जब उनकी याद आ जाती है या जब उनकी याद दिला दी जाती है। अगले ही पल अपने दुनियावी ड्रामे में हम तल्लीन हो जाते हैं और चतुर सुजान आदमी की तरह शह-मत भरी इस बाजारवादी व्यवस्था में अपनी गोटियां चलने के बारे में रणनीति बनाने लगते हैं।

करुणाकर भी चला गया। जिंदगी जीने की उमंग लिए एक 23 साल के नौजवान की अचानक मौत हो जाती है। मौत तय थी, एम्स के मुताबिक पर हम लोग ठहरे एक भावुक इंसान। दिल नहीं मानता था कि वो मरेगा। सब कुछ तो ठीकठाक था बाहर से। हंसता मुस्कराता खाता पीता चलता पढ़ता सुनता बोलता ....सब कुछ करता एक नौजवान। पर अंदर जाने क्या पल रहा था। एम्स ने कहा कि लंग कैंसर अंतिम अवस्था में है, फेफड़े दोनों खत्म हो चुके हैं, छह महीने की जान बची है, जाकर गांव में मां बाप के सामने मरो। पर हम लोगों का दिल नहीं माना। ऐसे कैसे कह दिया कि जाओ और घर वालों के सामने बैठकर मौत की प्रतीक्षा करो। पर अंततः हुवा वही। दवा इलाज सिंपैथी अभियान आह्वान कवरेज मीडिया कंपेन ब्लाग कंपेन के बाद भी करुणाकर गांव में अपने परिजनों के बीच अचानक उभरे दर्द में तड़पकर मर गया।

आज आरकुट पर करुणाकर की प्रोफाइल पर पहुंचा। उसकी प्रोफाइल अब भी है। उसका आरकुट खाता अब भी चल रहा है। आपको कहीं से नहीं लगेगा कि करुणाकर इस दुनिया में नहीं है। जब वो जिंदा था तो मैंने उसे आरकुट पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी पर वो उसके बाद आरकुट पर गया ही नहीं। मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट अब भी वेट कर रहा है। अब करुणाकर तो है नहीं, सो मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट वहीं का वहीं पड़ा रहेगा। संभवतः यह फ्रेंड रिक्वेस्ट तब कनफर्म हो जब मैं भी उपर उसके यहां पहुंच जाऊं। तब उस दूसरी दुनिया के आरकुट खाते में हम जरूर एक दूसरे के फ्रेंड बन जाएंगे। यहां तो करुणाकर मेरे रिक्वेस्ट को एसेप्ट करने से पहले ही गुजर गया।

करुणाकर के आरकुट खाते के स्क्रैप को मैं नहीं पढ़ सकता क्योंकि उसमें लिखा आ रहा है कि मैंने कोई स्क्रैप नहीं किया है इसलिए मैं नहीं पढ़ सकता। यह जरूर कोई तकनीकी व्यवस्था होगी पर अंदर से लगता है जैसे करुणाकर ने मुझे श्राप दिया हो, तुम सब जिंदा हो और मैं तुम लोगों के सामने ही मर कर चला आया, जाओ श्राप देता हूं, तुम मेरा स्क्रैप नहीं पढ़ सकते, तुम मेरे फ्रेंड नहीं बन सकते। करुणाकर, शायद मैं तुम्हारा मित्र पहले बन गया होता तो देख पाता कि तुम्हारे स्क्रैप बुक पर हाल फिलहाल किन लोगों ने क्या लिखा। बाल सुलभ उत्सुकता है। लेकिन मुझे पता है कि जिन लोगों को तुम्हारे मौत की खबर हुई होगी उन लोगों ने तुम्हारे स्क्रैपबुक पर जाकर तुरंत तुम्हें श्रद्धांजलि देकर तुमसे अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया होगा लेकिन मैं वादा करता हूं कि मैं तुम्हे तुम्हारे स्क्रैपबुक को नहीं पढ़ रहा और तुम्हें श्रद्धांजलि नहीं लिख पा रहा इसलिए मैं तुमसे नाता नहीं तोड़ रहा। यह मैं खुद के दिल को समझाने के लिए सोच रहा। जब हम उपर मिलेंगे तो शुरू से दोस्ती रखेंगे, स्क्रैप स्क्रैप खेलेंगे और तुम्हें मैं कुछ गंदी चीजें भी सिखावुंगा। तुमने तो जीवन भर सिगरेट या बीड़ी नहीं पी, पर तुम्हारे फेफड़े खराब हो गए। तुम्हें सिगरेट पीना सिखाउंगा ताकि किसी टेंशन में धुवें के छल्ले छोड़ते हुए तुम हलके से रिलीज हो सको। तुम्हें थोड़ा दारू पीना सिखाउंगा ताकि जब तुम बेहद दर्द में रहो तो इससे मुक्त होने के लिए थोड़ी सुरा ले लो और किसी नई दुनिया में पहुंच जाओ जहां कोई टेंशन नहीं। तुम्हें थोड़ी बदमाशी भी सिखावुंगा। यह सब तुमने किया नहीं। तुम तो ठहरे सीधे साधे आदर्शवादी नौजवान जो मां बाप के अरमान पूरा करने के लिए दिन रात सिर्फ और सिर्फ पढ़ता रहता था और अच्छे नंबरों से पास होता रहता था। पर देखा तुमने, तुम्हारी शराफत ने तुम्हें क्या इनाम दिया। हम लोगों तो सारी बुराई करके जिंदा हैं और तुम आदर्शवादी दोस्त.....चले गए न कलयुग में अच्छे कर्म करके किसी अच्छी दुनिया में, बुरे लोगों को और बुराइयों को यहीं छोड़कर। पर हम बदमाश और बुरे लोग तुम्हें दिल से चाहते हैं।

कुंवर जी, मुझे मलाल है कि मैं भी दिल्ली मे रहा और बेरोजगारी व दारूबाजी के बीच जिंदगी की गणित में उलझकर आपको याद तक न कर सका। पर अब जब आप याद आते हैं तो लगता है जैसे मुझसे पाप हुआ है। अब भी दिल होता है कि एक बार आपके घर जाकर पता करूं कि क्या हाल हैं, कैसे हो रहा है गुजारा पर सच कहूं तो मेरे पास भी टाइम नहीं है, मैं बहुत बिजी आदमी हूं, बहुत आगे जाना है मुझे, हेक्टिक शिड्यूल रहता है इसलिए सारी। मैं आपके परिजनों से भी नहीं मिल सकता। अब आप चाहे इसका बुरा मानों या भला, पर यही सच है मेरे भाई। आपके जीते जी आपकी मदद नहीं कर पाया और मरने के बाद आपके परिजनों के किसी काम न आउंगा लेकिन हां, देखिए आपको याद कर और इतना सब लिखकर कुछ अच्छे नंबर जरूर बटोरने की कोशिश कर रहा हूं। माफ करना दोस्त, आजकल दोस्त ही दगाबाज होते हैं और वही सबसे अच्छे दुश्मन बनते हैं। तुम मुझसे दुश्मनी करो न करो, मैं तुम्हारे लिए एक दोस्त के रूप में दुश्मन ही हूं।

चलिए.....करुणाकर और कुंवर जी अंजुम को थोड़ा याद कर लें, थोड़ा खुद को याद कर लें...बाकी कल तो हम सभी बिजी हो जाएंगे अपने अपने शिड्यूल के हिसाब से।

अंत में करुणाकर की आरकुट प्रोफाइल का लिंक, आप भी जाकर देखें और पढ़ें.....सोचें, बिचारें.....कुछ समझ में आए तो भड़ास निकालें......हम लोग तो बस भड़ास ही निकाल सकते हैं, और क्या कर सकते हैं.......


अगर आपका आरकुट खाता है तो क्लिक करें.......करुणाकर आरकुट पर


करुणाकर ने अपने आरकुट प्रोफाइल में खुद के एक ब्लाग के बारे में भी बताया है, वो है http://karunakarmishra.blogspot.com परफेक्ट डेट के बारे में उसका कहना है कि वो इसे इसलिए नहीं पसंद करता क्योंकि वो यह सब तब करेगा जब वह अपना लक्ष्य हासिल कर लेगा।


करुणाकर के आरकुट प्रोफाइल में सोशल, प्रोफेशनल, और परसनल सेक्शन में जो जो लिखा है वो इस प्रकार है....

relationship status: single

age: 23

languages i speak: English (UK), Hindi

here for: friends

about me: aasmaan ko neend aayegi to sulaaoge kahan...zameen ko maut aayegi to dafnaaoge kahan...

कौन हूँ??
इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.
जो ना समझ सके, उनके लिये "कौन".
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.

दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.
सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.
आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हू

well....if u culd figure me out completely then u wuld b my best friend...multiple personality disorder wuz named after me....i live for a few people...friends mean the world to me...i go out of my way to help them wen they need me...not a gud listener unless its my frnz who wanna talk...outspoken most of the time....spontaneous n sarcastic jokes rule my roost...love is not my cup of tea...i flirt in d gud way n m honest about it....show me attitude n i'll give u an overdose of my own....in d end m gud to only

children: no

ethnicity: east indian

religion: Hindu

political view: not political

humor: campy/cheesy, dry/sarcastic, clever/quick witted, friendly, goofy/slapstick, obscure, raunchy

fashion: natural

smoking: no

drinking: no

pets: i like them at the zoos

living: alone, friends visit often

hometown: ayodhya/noida /delhi/banglore

webpage: http://www.jssate.com

passions: To be iimian

sports: cricket,chess;

activities: SPORTS,STUDY,TALKING WITH FREINDS,AKING FREINDS;

books: STUDY

music: SOFT OLD SONGS

tv shows: INDIAN IDEAL PART TWO

movies: MUNNA BHAI MBBS;PARDESH;

cuisines: kheer,chinees food

city: NOIDA

state: india

zip/postal code: 272123

country: India


education: Bachelor's Degree

high school: ya sure

occupation: STUDENT

industry: High Tech, Computer Software

title: http://www.orkut.co.in/UniversalSearch.aspx?q=%22http%3A%2F%2Fkarunakarmishra.blogspot.com%22

job description: as student life

career skills: IT GETS CHANGE ACCORDING TO REQUIRMENT.

career interests: OF COURSE MANAGEMENT

ideal match: that is in pending

first thing you will notice about me: MY simplicity

height: 172 centimeters

eye color: black

hair color: black

build: slim

looks: average

best feature: chest

my idea of a perfect first date: i do't like dating becoc i will do all these things after achieving all my goals

from my past relationships i learned: i do't have any relationship inspite of my parents and sister brothere and from these i am learning continously no endpoints

five things I cant live without: i can live without anything in the presense of air water and food

in my bedroom you will find: i have't here bedroom but i have my flat in that me and my freinds lives together so u find alot of things like MY PC,MY freinds laptop and as i am student then books obiously.


-----------

आज़ादी का एक रूप ये भी

कोई नही तुम्हे कुछ नही होगा बाबा जी ने अपने पास से थोडी भभूति दे दी। बाबा के पास इतना पैसा हर दिन जामा हो जाता है की उसे देखकर आप चौंक सकते हैं। वैसे बाबा पर लोगों को भरोसा इसलिए था क्यूंकि उनका आकर बहुत छोटा है और वो दीखते इंसानों जैसे हैं।

बाबा जी थोड़ा सा टाइम मुझे दे दीजिये बच्चा बहुत वीमार है। ये सब कुछ मैंने अयोध्या में देखा जहाँ पर इन दिनों सावन का मेला चल रहा है और देश के कोने कोने से यहाँ पर लाखों स्रधालु जमा हुए हैं।

थोडी देर बाद बाबा जी फिर से अपने काम में लग गए। बाबा की विशेषता ये है की वो मुस्किल से कुछ इंच के ही हैं। पर लोगों को लगता है वो उन्हें बहुत खुशियाँ अपने तपोबल से देंगे।






अरे ये क्या कर रहे हो मेरी तस्वीर मत छापना नही तो तुम्हे पाप लगेगा

श्री सुरेश कुमार जैन का दोष

श्री सुरेश कुमार जैन, आई ० जी ० का क्या दोष था कि उनका नाम राष्ट्रपति के पदक से सम्मानित किए जाने वाले अधिकारियों की सूची से निकाल दिया गया। क्या आज तक पूरे देश में गोली चलाने का आदेश देने वाले किसी भी अधिकारी को सम्मानित नहीं किया गया, क्या तमाम के तमाम ऐसे अधिकारियों को तुंरत ही स्थानांतरित कर दिया गया? क्या इसलिए उन्हें वापस दिल्ली बुला लिया गया कि एक पुलिस अधिकारी होने के नाते उपद्रवियों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए, यदि ऐसा ही है तो बाकी जम्मू और पूरे देश के अधिकारियों के साथ ऐसा सुलूक क्यों नहीं किया जाता। इससे यह स्पष्ट होता है कि छुद्र स्वार्थों की पूर्ति हेतु राजनीति से जुड़े हुए लोग कैसा भी निर्णय ले सकते हैं, चाहे फिर उनके निर्णयों में घोर साम्प्रदायिकता ही क्यों न व्याप्त हो ? इस प्रकार के निर्णय आगे चलकर अधिकारियों को कम से कम एक विशेष संप्रदाय से सम्बंधित अपराधियों के प्रति भी कार्यवाई करने को लेकर मात्र हतोत्साहित ही करेंगे और इससे जो संदेश जायेगा वह समाज को किस तरफ ले जायेगा, लोगों की मानसिकता में क्या अन्तर आएगा, इसका जबाव भी आने वाले वर्षों में स्वत: मिल जायेगा। विशेष संप्रदाय को खुश करने की कोशिशों की ही अगली और ugly कड़ी है यह निर्णय।

Happy Indipendence Day


Jashn-e-Aajadi
Ki Buniyaad " Shahidon" Ki Qurbani Hai.
Naaz Hai Taqdir Pe Ki Hum
"HINDUSTANI"
Hain.

Happy
Indipendence
Day

शुभकामनाओं सहित
Anil Bhardwaj

14.8.08

शायरों की नजर में देश की आज़ादी

अंकित माथुर
मौलाना आज़ाद ने लिखा था कि जो होने वाला है कोई क़ौम अपनी मनहूसियत से उसे रोक नहीं सकती। यक़ीनन वो दिन आया जब हिंदुस्तान 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ। और गुलामी की वो बेड़ियां जो हमने अपनी नादानी की वजह से अपने पांव में डाल ली थीं वे हिंदुस्तान के जियालों ने काट गिरायीं। हिंदुस्तान की आज़ादी के महासमर में शायद ही किसी धर्म और मजहब के लोगों ने उसमें हिस्सा न लिया हो। लेकिन हिंदुस्तान की आज़ादी ऐसे वक्त आयी जब बंगाल में बहुत ज़बर्दस्त अकाल पड़ा था और लाखों लोग भूख और प्यास से मर गये थे। बंगाल के इस मंज़र को देखकर हिंदुस्तान के कवि एवं लेखकों के पहलू में दिल तड़प उठे और उर्दू का मशहूर कवि वामिक जौनपुरी चिल्ला उठा -

"उत्तर देश में डुग्गी बाजी फैला दु:ख का जाल,
भूख की अग्नि कौन बुझाये, सूख गये सब ताल...
सुंदर नारी भूख की मारी, घर-घर बेचे लाज रे
साथी भूखा है बंगाल रे साथी भूखा है बंगाल...''


साथ ही साथ हिंदुस्तान की आज़ादी ऐसे समय में आयी जब मुल्क का बंटवारा हो गया, हिंदू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे हो उठे। पंजाब में हिंदुओं और सिखों का क़त्लेआम हुआ और बिहार में मुसलमानों का। इंसानियत मौत के दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुराती रही और हैवानों का राज्य हो गया। लाखों लोग पंजाब से दिल्ली में आ बसे। गोया एक पंजाब दिल्ली में आ बसा और दिल्ली के मुसलमान पंजाब में जा बसे। इस ड्रामे को देखकर उर्दू के मशहूर शायर अली सरदार जाफरी ने मुल्क के नेताओं से यह सवाल पूछा, "कौन आज़ाद हुआ? किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी।

""खंज़र आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए
और मौत आज़ाद है लाशों पे गुजरने के लिए।''

दूसरी तरफ मजाज ने यह आवाज लगायी कि यह इन्क़लाब का मुसदा (साया) है इन्क़लाब नहीं। ये आफताब का परतव (साया) है आफताब नहीं। डा. राही मासूम रज़ा ने नेताओं और फिरक़ापरस्त लोगों की तरफ उंगली उठाते हुए कहा कि

एक मिनिस्टर है तस्वीर के वास्ते और एक मिनिस्टर है ताज़िर के वास्ते
और जनता है सिर्फ ज़ंजीर के वास्ते।


वो लोग जिन्होंने हिंदुस्तान का बंटवारा करवाया उनकी तरफ इशारा करते हुए किसी शायर ने कह दिया कि ..
तुमने फ़िरदौस के बदले में जहन्नुम देकर कह दिया हमसे कि
गुलिस्तां में बहार आयी है
और चंद सिक्कों के एवज में चंद और मिलों की ख़ातिर तुमने
शहीदों का लहू बेच दिया और बाग़वां बन के उठे और चमन बेच दिया।


लेकिन चंद लोग ऐसे भी थे जिन्होंने हिंदुस्तान के बंटवारे की सख़्त मुख़ालफत की थी। मसलन मौलाना आज़ाद ने 1929 में कहा, ""अगर आज़ादी फरिश्ता कुतुब मीनार पर खड़े होकर ये ऐलान करे कि हिंदुस्तान को 24 घंटे में आज़ादी मिल सकती है बशर्ते कि वो हिंदू और मुसलमान की दोस्ती को अलग कर दे तो मैं कहूंगा कि भारत को ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए।
इस बँटवारे को देखकर डॉ. राही मासूम रज़ा ने ये लिखा था कि,

""चंद लुटेरे बड़े आदमी बन गये,
और हम अपने ही घर में शरणार्थी बन गये।''


लेकिन हमें यह जान लेना चाहिए कि उर्दू के शायरों और लेखकों ने इन्क़लाब जैसा ख़ूबसूरत और हिम्मतवर शब्द दिया जिसे हिंदू और मुसलमानों ने अपने गले से लगाया। हिंदुस्तान की आजादी में हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे का इतना साथ दिया, जो आज हिंदुस्तानियों के लिए रास्ते के चिराग़ का काम दे सकता है मसलन रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की दोस्ती की कहानी करोड़ों लोग जानते हैं। लेकिन शायद उनको ये नहीं मालूम कि जब चंद अंग्रेज़ों के पिट्ठू अशफाक उल्ला खां से मिलने गये और कहा तुम मुसलमान हो हिंदुओं का साथ क्यों देते हो, अंग्रेज़ों की मुख़ालफत क्यों करते हो और मुल्क की आज़ादी की बात क्यों करते हो? इस पर अशफाक उल्ला खां ने भूखे शेर की तरह चिंघाड़कर कहा कि मुझे हिंदुओं का ग़ुलाम बनना तो मंजूर है लेकिन यह मंजूर नहीं कि मैं और मेरी क़ौम अंग्रेजों के गुलाम रहे। हम अपने ख़ून के आख़िरी क़तरे तक अंग्रेज़ों से लड़ते रहेंगे। ये था मुल्क़ की आज़ादी के लिए सूली पर चढ़ने वाले लोगों का ज़ज्बा और वतन की मुहब्बत।

और हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह बहादुर शाह ज़फर ने जो ख़्वाब हिंदुस्तानियों के लिए देखा था उसे हिंदुस्तानियों ने पूरा कर दिखाया। यानी उन्होंने कहा था कि -

""हिंदियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की
सद्रे लंदन तक चलेगी तेग़ (तलवार) हिंदुस्तान की।


बहादुर शाह ज़फर ने क़ौम को जो पैग़ाम व नारा दिया था उसी का नतीज़ा था कि उधम सिंह ने जनरल डायर जिसने जालियांवाला बाग़ में हिंदुस्तानियों पर गोलियां चलवायी थीं, अपनी गोलियों से भून डाला और दूसरी तरफ ग़ज़नफर अली ख़ां ने पोर्ट ब्लेयर में अपने ख़ंज़र से लार्ड म्यों का क़त्ल कर डाला। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जब रंगून गये थे तो वो रंगून में बहादुर शाह ज़फर की कब्र पर भी गये और कहा के ऐ हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह जब हिंदुस्तान आज़ाद होगा तो तेरी लाश को हम हिंदुस्तान ले जाएंगे और तेरी लाश को भारत की सरज़मी पर दफन करेंगे; लेकिन अफसोस के साथ लिखना पड़ता है कि मुल्क की आज़ादी के 60 साल गुज़र चुके हैं लेकिन नेताजी के इस वादे को पूरा करना तो दूर उनके ख़्वाब और वादे के बारे में कोई सोचता भी नहीं है।
जय हिन्द...
एक ईमेल से उद्धत.

एक है ससुरा विजय शर्मा

ब्लोगर मित्रों।
आज कल सारे ब्लॉग जगत के लोग एक मेल से परेशान हैं और उस मेल की सुरुआत जिसने भी करी हो मगर इतने सारे ई मेल आई डीजमा कर के एक चेन्नई के ब्लोगर ने ब्लॉग जगत में कोहराम मचा दिया है, सारे ब्लोगर रोज बीसों इस मेल के आने से परेशान हैं हम भी हैं, मगर परेशान कोई नही है तो ऊ ससुरा विजय शर्मा। विजय जी को बहुत बहुत धन्यवाद की उन्होंने मेल का सदुपयोग करना ब्लोगरों को सीखा दिया और अब बाकी के ढेरक ब्लोगर इस मेल लिस्ट के सहारे अपने ब्लॉग को आम करने की जुगत में हैं।
एक बात और जो मैं कहना चाहूँगा की या तो ये सारे लोग जान बूझ कर परेशान करने वाली हरकतों को अंजाम दे रहे हैं या फ़िर वो ही पुरानी कहावत हिन्दी के अनपढ़ लोग हैं (कम्पूटर के मामले में ) क्योँ की तमाम लोगों की हरकत से पुरा ब्लॉग जगत परेशान है।
गुजारिश लोगों से की ये मेल की खिचडी पकाना बंद करें और हिन्दी ब्लोगिंग को लोगों पर जबरदस्ती न थोपें। संग ही लानत मलानत विजय शर्मा को और उसके जैसे तमाम जाहिल निकम्मे मेल के रिप्लाय करने वालों को।
जय जय भड़ास
जय जय भड़ास

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष - इन पाँचों चित्रों को एक-एक कर पढ़ें व अपने विचार अवश्य रखें.






हैदराबाद में शायद ही ऐसा दिन होगा जिस दिन हम नहीं रोये हों

भड़ास4मीडिया डाट काम (WWW.BHADAS4MEDIA.COM) से फुर्सत निकालकर भड़ास पर आकर लिखना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है पर मेरा पहला प्यार तो ये ब्लाग भड़ास ही है। भड़ास4मीडिया उस सौतन की तरह है जो नई आई और छा गई लेकिन ओल्ड इज गोल्ड को कैसा भुला देंगे। तो चलिए, बहुत दिन बाद, दो बातें आप तक पहुंचाता हूं। भड़ास4मीडिया को लेकर मेरे पास रोजाना 50 से 60 मेल आती हैं। इसमें ज्यादातर मेलों में भड़ास4मीडिया जैसा पोर्टल लांच करने के लिए मुझे बधाई दी गई होती है। उसी में से एक मेल आपके सामने रख रहा हूं।

दूसरी मेल एक पत्रकार की दास्तान है। किस तरह उसे प्रताड़ित किया जाता रहा है। मतलब, पत्रकारिता में अब शरीफों का गुजारा नहीं। आपको या तो बदमाश बनना होगा या फिर बदमाशी में शामिल होना होगा।

दोनों पत्रों इस तरह हैं....(पत्र लेखकों के नाम बदल दिए गए हैं ताकि वे जहां काम कर रहे हैं वहां उन्हें कोई दिक्कत न हो)

----------------

यशवंत जी,
भड़ास4मीडिया इतना लोकप्रिय हुआ है कि अंग्रेजीदां लड़कियां भी इस े निहारती रहती है। ऑफिस आने पर सबसे पहला काम होता है भड़ास4मीडिया खोलना। वजह साफ है कि इसकी विषय वस्तु इतनी सटीक और रिपोर्टिंग इतनी सख्त होती है कि बड़े-2 सूरमा कांप उठे हैं।मुझे लगती है इसकी रोजाना हिट्स 20-30 हजार तो जरुर होगी। इधर कुछ मीडियाकर्मी अपनी तारीफ भी सुनने को इच्छुक हो गए हैं या कईयों को लगता है कि उनके काम की तारीफ न होकर सिर्फ उनके सहकर्मी के काम की तारीफ हुई है। कुलमिलाकर कहने का मतलब ये कि इस साईट ने जितनी जल्दी मीडियाकर्मियों के बीच अपनी जगह बनाई है वो वाकई काबिले
तारीफ है। मुझे लगता है कि आनेवाले वक्त में इस साईट पर और भी अभिनव प्रयोग किये जाएंगे और इसको और भी प्रासंगिक बनाया जाएगा।
धन्यवाद सहित
विक्रांत


----------------------------

yashwant sir

mai copy editor hu. pichle mahine etv chodkar delhi me ek news channel ko join kar liya hai.

sir etv me mere saath bahut bura saluk kiya gaya. mai apne anubhav ko aapke ssath batna chata hu ki kaise juniour ke saath seniour behave karte hai.

sir, hyderabad me sayad hi aaisa din hoga jis din hum nahi roye the. ek loby ke sikhar hum ho gaye kyonki hum shirf apne kam se matlab rakhte the, kisi ki siykayt karna ya sunna mujhe pasand nahi.

sir rojana meri sikayat ki jati thi. manager bhi meri baat nahi sunte the. meri 8 mahine tak night shift laga di gai.office aane ke bad bhi meri 20 dino ki salery absent dikha kar kat di gai.sir mere saath aaisa kiyo kiya gaya yah sawal aaj tak mere kano me gunj raha hai, hame jawab chahiya , kya aake pass hai jawab?

aabhi bhi mere siniours chahte hai ki kisi tarah meri job chli jaye.

aapka

anil

बधाई हो बधाई

सभी सरकारी कर्मचारी भाइयों को नए वेतन मुबारक हो ।

स्थानीय मान-2

एक अधिकारी अपने कार्यालय के एक आयोजन में - "देखिये अगर देश को आगे बढ़ाना है तो हम लोगों को अपने निहित स्वार्थों को छोड़ना पड़ेगा, देश हित में अपने हितों का त्याग करना पड़ेगा। और यह हम सब लोगों का पुनीत कर्तव्य है कि देश हित में अपने छुद्र हितों को आड़े न आने दें, अपने कामों को पूरी ईमानदारी से करें और पूरी तरह से ईमानदार बनें, भ्रष्टाचार हमारे देश को कैंसर की तरह अन्दर से चाट रहा है।" बोलते बोलते उनका गला भर गया, सामने रखा पानी का गिलास उन्होंने उठाकर मुंह से लगा लिया।वही महोदय अपने अधीनस्थ से - "अरे भई देखो मेरे घर में जो इनवर्टर लगा है उसकी बैटरी ख़राब हो गई है, नई लगवा देना। और ऐसा करना कि दो किलो मिठाई ले आना बच्चों के लिए। बाकी अभी जो परचेज करनी है, उसमें से इसे एडजस्ट कर बाकी का पेमेंट कर देना."

एक अनजाना दर्द का रिश्ता

अभी खाली बैठे-बैठे देश-विदेश के हालचाल लेने के लिए टीवी पर समाचार चैनलों को उलट-पलट रहा था कि एन डी टी वी पर आई एक ख़बर ने चौंका दिया. शायद किसी के लिए वो ख़बर बड़ी न हो, मेरे लिए भी नहीं है पर उस ख़बर ने चैनलों की उल्टा-पलती को एक पल को थाम दिया. ख़बर थी मुंबई की निकिता के बच्चे के जन्म को लेकर, उसी बच्चे की ख़बर जिसको लेकर निकिता ने गर्भपात कराने की अनुमति अदालत से मांगी थी और अदालत ने अपने जवाब में मिकिता को बच्चे को जन्म देने का आदेश दिया था या कहें कि गर्भपात करवाने की अनुमति निकिता को नहीं दी थी. ख़बर में बताया गया कि समय से पहले निकिता के उस बच्चे को जन्म दिया जो मृत पैदा हुआ.
हालाँकि सीधे-सीधे हम लोगों का इस केस से किसी भी तरह से जुडाव नहीं था पर पता नहीं क्यों एक पल को गहरा सदमा सा लगा। हो सकता है कि काफी लंबे समय से कन्या भ्रूण ह्त्या निवारण के लिए काम करते-करते इस तरह के केस में ना चाहते हुए भी एक तरह का जुडाव सा हो जाता है. हो सकता है कि किसी भी तरह के क्षणांश दुःख का ये ही कारण हो?
बहरहाल निकिता के द्वंद्व की बड़ी ही दुखद समाप्ति हुई पर उसके अदालत तक पहुंचे केस ने इस तरह के मामलों के लिए बहस जरूर छेड़ दी है। गर्भपात के क़ानून को लेकर कानूनविदों को फ़िर से विचार करना होगा. जहाँ विज्ञान की तकनीकों का उपयोग आने वाली पीढी को गर्भ से ही सुंदर और बुद्धिमान बनाने के लिए किया जा रहा हो (क्लोनिंग को इसी सन्दर्भ में स्थापित किया जा रहा है) तब किसी माँ की अपील पर कानूनी दलीलों से अधिक उसकी भावनाओं को समझना आवश्यक था. फिलहाल बाकी बच्चा दुःख, क्षोभ.......................

13.8.08

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हुए हैं?

सैकड़ों साल तक गुलाम बने रहने के बाद 15 अगस्त 1947 को हमें आज़ादी नसीब हुई। आज़ादी मिलते ही राष्ट्र की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से हम भारतीयों के कंधों पर आ गई। आज़ादी की लड़ाई केवल चुने हुए नेताओं ने ही नहीं लड़ी थी, बल्कि देश का हर नागरिक इसमें सम्मिलित हुआ था। अतः यह स्वाभाविक था कि स्वतंत्र भारत के शासन में देश के हर नागरिक का भी हाथ हो। इस दृष्टि से तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग ले चुके महापुरूषों ने देश की शासन व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नई नीतियां बनायीं और संविधान का निर्माण किया। इन सारे कार्यों के दौरान उन्होंने देश की संस्कृति, परम्परा और सामाजिक स्थिति का ध्यान रखा। अब हमारा देश आज़ादी के 62वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यानी हमें आज़ाद हुए 61 वर्ष पूरे हो गए। इन 61 वर्षों में देश में हर साल ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जाता रहा है और प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लाल किले से तिरंगा फहरा कर देशवासियों को संबोधित करते रहे हैं। अक्सर इस संबोधन में देश की समस्याओं की चर्चा होती है और कभी कुछ राहत घोषनाएं भी की जाती है और सरकार अपने द्वारा किए गए कामों को ऐसे गिनाती है, जैसे जनता पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो। हम चाहें विकास का सफर जितना भी तय कर चुके हों ,लेकिन आज़ादी के मायने बिल्कुल बदल चुके हैं। आज़ादी की व्याख्या बदल चुकी है। समाज में रहने वाले लोग आज़ादी के प्रति अपनी भावना को व्यक्त करने से कतराने लगे हैं। साथ ही आज़ादी मिलने के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले समारोह का स्वरूप भी बदल चुका है। अतः यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि पिछले कई वर्षों से स्वतंत्रता दिवस का कार्यक्रम या समारोह महज़ एक रस्म अदायगी बनकर रह गया है।उल्लेखनीय रहे कि जब हमारा यह देश अंगे्रज़ो की गुलामी से मुक्त हुआ, उस मौके पर आज़ादी के दीवानों ने यह संकल्प लिया था कि अब हम अपने सपनों को साकार करेंगे, जिसमें देश के सभी नागरिकों को अपनी उन्नति व तरक्की करने का समान अवसर प्राप्त हो। नागरिकों को अपने धर्म, अपनी भाषा व संस्कृति के प्रचार व प्रसार की पूरी छूट होगी, बल्कि सरकार भी उनके धर्म, भाषा व संस्कृति की रक्षा करेगी। देश के तमाम नागरिक क़ानून के सामने बराबर होंगे, उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं बरता जाएगा। देश का हर नागरिक आज़ादी की खुली हवा में सांस ले सकै, इन उद्देश्यों को पुरा करने के लिए भारतीय संविधान में इन चीज़ों को शामिल किया गया और यह विश्वास दिलाया गया कि आज़ाद भारत में नागरिकों की उन्नति में बाधक बने तत्वों व कारकों को हटा दिया जाएगा।अब प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हो गए हैं? क्या हमारे उन्नति के बाधक सभी तत्वों व कारकों को हटा दिया गया है? क्या संविधान निर्माताओं की मेहनत सफल हो पायी है? क्या उनके सपने पूरे हो गए? शायद नहीं! हमारा समाज जितना विभाजित आज है, उतना पहले कभी नहीं रहा। नक्शे पर खींची रेखाओं से कहीं अधिक भयावह होती हैं मन और भावनाओं में पड़ी दरारें। मुसलमान आज बदहाल हैं और अपने देश में ही ज़लील हो रहे हैं। इससे भी भद्दा और गंदा मज़ाक और क्या हो सकता है कि हमारा ही देश हम से राष्ट्रभक्ति का प्रमाण-पत्र मांगता है। कह रहे हैं ‘वन्दे मातरम्’ गाओ, नहीं तो गद्दार करार दिए जाओगे....... ग़द्दार...... जो अशफाक़ुल्लाह खां देश प्रेम में फांसी के फंदे से झूल गया, जो अब्दुल हमीद पाकिस्तानी तोप के मु हाने पर खड़ा हो गया..... उस अशफाक़ व हीमद की कौम को कुछ कहो, पर गद्दार तो न कहो।क्या मुसलमानों ने जमहूरियत के लिए कुछ नहीं किया? हर बार मुसलमान सियासी दलों का मोहरा बनता रहा है। हर दंगे के बाद मुसलमान अपने आपको असुरक्षित महसूस करता रहा है। भिवंडी हो या बड़ौदा.... मेरठ हो या मुरादाबाद, जमशेदपुर हो या भागलपुर...अयोध्या हो या गुजरात.... मुसलमानों का खून हर जगह बहा है, और बह रहा है। आखिर हम कब तक शको-शुहबा के साए में सहमे-सहमे से रहेंगे ? आज हम जुड़ने के बजाय बिखरे पड़े हैं। धर्म, राष्ट्रीयता और एकता की बातें पुरानी पड़ गई हैं और जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय और क्षेत्रीयता के आधार पर नई पहचानें सर्वोपरि हो गई हैं । एक समय था जब हम अपनी सारी कमज़ोरियों, कमियों, ग़रीबी और गुलामी के बावजूद एक थे, परन्तु आज कोई यहां कहने का साहस नहीं करता कि जो भी हमें हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई , अगड़ी-पिछड़ी जातियां, उत्तर-दक्षिण, ग्रामीण-शहरी अथवा हिन्दी-अहिन्दी भाषियों में बांटने की कोशिश करता है अर्थात जो भी देश की एकता के विरूद्ध काम करता है, वह हमारे देश भारत का दुश्मन है। आज हमारे देश के नेता ही धार्मिक उन्माद फैलाकर अपना वोट बैंक बनाते हैं। जाति के आधार पर चुनाव लड़ते हैं। चुनाव जीतने के बाद इन्हे संसद और विधान सभाओं में जगह मिलती है, सरकार बनती है और संसदीय लोकतंत्र चलता है। यही कारण है कि लोकतंत्र के अंतर्गत राष्ट्रीय एकता, एक राष्ट्रीय भावना के निर्माण का एक संगठित भारतीय समाज की पहचान बनाने का हमारा उद्देयश् पूरा न हो प्रश्न यह उठता है कि आखि़र हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे लिए ऐसी व्यवस्था क्यों चुनी?मनोवैज्ञानिक बताते है कि दास को अपने स्वामी की हर बात आदर्श लगती है। वह वैसा ही बनना चाहता है। पश्चिम देशों की गुलामी में सदियों तड़पने के बाद यह स्वाभाविक था कि हम अपने मालिकों के देश शासन शैली और संस्थाओं की ओर आकृष्ट होते तथा इन्हे ही सर्वोत्तम और अनुकरणीय मानते। आज़ादी के संघर्ष के दिनों में भी राष्ट्रीय आन्दोलन के नायकों की मांग रही थी कि भारतीयों को भारत में भी वे सभी अधिकार व अवसर मिले जो अंग्रेज़ों को अपने देश में प्राप्त थे और वैसा ही संसदीय व्यवस्था स्थापित हो जैसा ब्रिटेन में था। दरअसल, आज़ादी का अर्थ होना चाहिए भारत के प्रत्येक गांव में पीने योग्य पानी, भूख से मुक्ति और बीमार पड़ने पर चिकित्सा की व्यवस्था किन्तु आज़ादी के 61 वर्ष पूरे होने के बाद भी देश में एक लाख से अधिक गांव ऐसे हैं जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। आज भी लगभग 30 प्रतिशत भारतीय निर्धनता की रेखा तले जीते हैं। लाखों को दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही है। करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं। आज भी स्कूल, चिकित्सा, मकान और अन्य बुनियादी सुविधाओं से करोड़ों लोग वंचित हैं।आखि़र यह कैसी विडंबना है। लोकतंत्र का आधार मानव जीवन का मूल्य और व्यक्तियों के बीच समानता को माना जाता है, किन्तु हमारा सामाजिक जीवन और चिंतन आज भी सामंतवादी हैं । आज भी मनुष्य के जीवन की अलग-अलग कीमतें लगती हैं। कहीं एक बच्चे का प्रतिदिन का खर्च 500 रूपये है तो कहीं मात्र 200-300 रूपये में आदिवासी माताएं अपने बच्चे को बेच डालती हैं।देश में संकट केवल राजनैतिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्र चरित्र का भी है। इस व्यवस्था में जो मन सुहाती कहते हैं पुरस्कृत होते हैं और जो सच्ची बात कहने अथवा किन्हीं मूल्यों की रक्षा करने का साहस करते हैं वे तिरस्कृत होते हैं, आज पैसा, कुर्सीं सत्ता, पद और उपाधियों की लड़ाई ही सब कुछ हो गई है। देश के सांसद पैसे पर बिकने लगे हैं। हद तो यह है जनता के लिए प्रश्नों को भी पैसे लेकर पूछते हैं। सबके सब पैसे व शोहरत के लालची हो गए हैं। चाहे इसके लिए देश भाड में जाए। यहां तक कि इन्होने ‘पवित्र’ संसद को भी नहीं बक़्शा! इसकी मर्यादाओं का ख्याल भी न रखा। अरे! नेताओं का बस चले तो देश तक को गिरवी रख दें। यदि ऐसा ही होता रहा और हम इसी संवैधानिक, राजनीतिक व्यवस्था से चिपके रहे तो निश्चित ही हमारे लोकतंत्र का लोप हो जाएगा और भारतीय गणतंत्र नष्ट। इन्हे बचाना है तो व्यवस्था और उसे चलाने वाले दोनो को बदलना होगा। लोक मानस को जगाना होगा। जन-जन को उठाना होगा, और प्रत्येक नागरिकों को स्वंय विपक्ष और लोकपाल बनना होगा। दिलचस्प बात तो सह है कि आज मीडिया की आज़ादी भी खतरे में हैं। मीडिया के लोगों को खुलेआम गिरफ्तार किया जा रहा है। ‘मीडिया’ को क्या करना है और क्या नहीं? इसका स्पष्ट दिशा निर्धारण भी सरकार व दूसरे तत्व तय करने लगे हैं। ऐसे में मीडिया के सामने भी यह चुनौती है क अपनी ‘‘आज़ादी’’ को कैसे बरकरार रखा जाए। बहरहाल, मीडिया को भी अपने कर्तव्यों को याद करना होगा। तब जाकर हम वास्तव में स्वतंत्र हो पाएंगे।

अफरोज़ आलम ‘साहिल’ एच ।77/14, चतुर्थ तल, शहाब मस्जिद रोड,बटला हाउस, ओखला, नई दिल्ली-२५ मोबाईलः 9891322178

मौत

मौत
एक ऐसी सच्चाई
जिससे सब डरते
एक ऐसी हकीकत
जिससे सब हारते

सभी भड़ासियों को नमस्कार बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ क्योकि भाई सरकारी आदेश कानपुर से पोर्टब्लेयर आ गया हूँ इन्टरनेट से संबंध कट गया है। करुणाकरन की मौत की खबर सुनकर बहुत दुख हुया यह तो नही जानता कि वह कौन था पर इतना जरुर जानता हूँ कि वह बेटा, भाई, जरुर होगा तथा किसी की राखी किसी की गोद जरुर सूनी हुई होगी।

अजीत कुमार मिश्रा

हम कब से दुश्मन हो गये...


कश्मीर के दस ज़िले सुलग गये, एक बार तो ऐसा लगा कि पिछले पन्द्रह साल की मेहनत बेकार हो चुकी है। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन दी और फिर वापस ली, इस पूरी कार्यवाही में उतना फायदा नहीं हुआ जितना नुकसान हो गया। नीयत किसकी खराब है ये सवाल पीछे छूट चुका है। चिंता इस बात की बढ़ गयी है कि डेढ़ दशक की मेहनत पर पानी न फिर जाय। मारे तो सब जगह बेकसूर ही जायेंगें, लेकिन उनकी चिताओं की आग उन नेताओं की रोटियां ज़रूर सेंक देंगीं जिन्हैं कश्मीर का आवाम तकरीबन भूलने को है। अमन की सारी कोशिशें चिनाब के पानी में बरसाती पानी की तरह बह जायेंगी, और पीछे छूट जायेगा, देवदार के दरख्त का वों ठूंठ जिस पर पत्तियां उगने से इन्कार कर सकती हैं। बदजुबान और गंदी नीयतें धरती के स्वर्ग को बरबाद कर रही हैं, दिल्ली की चक्कियों में आटा पीस कर खाने वाले, मुज्जफराबाद चलों के नारे लगा रहे हैं। सरकार की बेबसी पर आप सिर्फ बेबस बन सकते हैं, गुस्सा भी कर सकते हैं उस नामर्दी पर जो इस देश की राजनीति में पल रही है। वो जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, हम जैसा चाहे वैसा कर रहे हैं, इस आग के रंग बदल दिये गये हैं, मौकापरस्त जश्न मना रहे हैं लेकिन स्तब्ध है वो आवाम जो इसे अपना देश मान रही है। एक ऐसा प्रस्ताव अभी तक नहीं आया है जिस में कोई जान हो, कोई सरकारी नुमाइंदा ये बताने की हिम्मत नहीं कर रहा कि वो क्या करने जा रहे हैं। अलगाववादियों की राजनीति ठंडी पड़ रही थी बैठे बिठाये एक अदूरदर्शी फैसले ने आग बरसा दी। डरने वाले को राजा बने रहने का कोई हक नहीं, जो निर्भय नहीं
उसे सिंहासन त्याग देना चाहिये, लोभ और मोह के ये पुतले केवल मौके बर्बाद कर रहे हैं और कुछ नहीं। इन लोगों की कारस्तानी ने दुश्मनी और बढ़ा दी हैं। आज के हालात देखिये और सोचिये जम्मू कब से कश्मीर का दुश्मन हो गया ? ये बात वो लोग कह सकते हैं जिनको इस मौके की तलाश थी लेकिन उनका क्या जिनकी सब्ज़ियों के ट्रक हाइवे पर खड़े हैं। सच है, मरता इमानदार ही है। वो चंद लोग जो विषम से विषम परिस्थितियों में पुल बने रहे आज उनके पांव जकड़ दिये गये हैं..
अफसोस हमें दुश्मन ठहरा दिया ?

स्थानीय मान

एक कार्यालय का पहला दृश्य - "क्या बात है श्याम लाल, बड़े नाराज लग रहे हो, क्या हो गया?" श्याम लाल के साथ काम करने वाले कर्मचारी ने पुछा। "क्या बताऊं, कैसा जमाना आ गया है, बच्चे के एडमिशन के लिए भी घूस देनी पड़ती है, अरे भाई, ये डोनेशन भी तो एक तरह की घूस ही तो है!"श्याम लाल ने अपने सहयोगी की तरफ़ देखते हुए जवाब दिया। उसी कार्यालय में कुछ देर बाद दूसरा दृश्य-"अरे भाई, जाओ यहाँ से, कह तो दिया पाँच हजार से कम में काम नहीं होगा। कराना है तो पाँच हजार लेकर आना, समझ गए." श्याम लाल अपने सामने खड़े व्यक्ति से कह रहे थे.

साहित्य शिरोमणि दा दा चतुर्वेदी जयंती संपन्न

नई दिल्ली,गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में स्वतंत्रता सेनानी एवं मूर्धन्य पत्रकार प्रवर पंडित दामोदर दास चतुर्वेदी की जयंती के अवसर पर समकालीन पत्रकारिता :दशा और दिशा विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया,जिसमे श्री राजशेखर व्यास (वरिस्थ निर्देशक :दूर दर्शन) सुश्री अलका पाठक (निर्देशक आकाशवाणी)डा भगवान स्वरुप चैतन्य (संपादक लोकमंगल) एवं पंडित सुरेश नीरव(विख्यात कवि एवं पत्रकार) ने अपने विचार व्यक्त करते हुए दा दा चतुर्वेदी को याद किया.इस अवसर पर चतुर्वेदीजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित लोकमंगल पत्रिका का जहाँ लोकार्पण किया गया वही समाज के ११ विशिष्ट व्यक्तियों को साहित्य शिरोमणि दा दा चतुर्वेदी सम्मान से अलंकृत भी किया गया.कार्यक्रम के उत्तरार्ध में एक कवि-गोष्ठी भी हुई जिसमे डा मधु चतुर्वेदी,पी.एन सिंह,मृगेंद्र मकबूल,सुनीता चोटिया,श्रीकांत सिंह एवं पंडित सुरेश नीरव द्वारा काव्य-पाठ किया गया। ।।
प्रस्तुति-मकबूल.

सांसद का चुनाव

मित्रगण
मुझे एक मेल मिला जो किसी अनाम मित्र का था जिसमें आम जन के जागरूक होने से सम्बंधित कार्टून बने थे मुझे लगा की इसे भड़ास पर होना चाहिए सो अपने उस अनाम मित्र के साभार इस बेहतरीन कार्टून को भड़ास के लिए भी.....


क्या आप ऐसे सांसदों के हाथों में राष्ट्रध्वज देखना पसंद करेंगे.

या फ़िर बागडोर ऐसे सांसदों के पास।

सच्चे नागरिक होने का दायित्व निभाएं और चुनाव मतदान में अवश्य भाग लें क्यूंकि मुझे आपको हमें ही अपना प्रतिनिधि चुनना है। हमारा प्रतिनिधि हमारे लिए हमारे जैसा ना की मीडिया के प्रचार से बनाया गया स्वच्छ छवि वाला क्यूंकि एक मीडिया समूह इन सांसदों के हाथों का दलाल पहले ही बन चुका है, खरीद फरोख्त में एक शानदार कमीशन लेकर.

जय जय भड़ास।

साभार : मॉस फॉर अवेरनेस

12.8.08

भड़ास बिरादरी के सभी भाइयों को नमस्कार , उम्मीद है सब राजी खुशी होंगे । पन्दरह अगस्त की बधाई देने की सोच रहा था मगर कुछ देर पहले सुने एक दोस्त की कविता ने रोक लिया ।कविता की शुरुआत कुछ यूँ थी । हर कोई परेशान है हर कोई त्रस्त है , मारो पटक के जो कहे पन्द्रह अगस्त है। सुना है आज इंडिया न्यूज़ वालों ने चालीस साथियों को बहार का रास्ता दिखा दिया । उनके लिए तो आजादी पर ऐसा ही गुस्सा होगा मन में ।

भड़ास बिरादरी के सभी भाइयों को नमस्कार , उम्मीद है सब राजी खुशी होंगे । पन्दरह अगस्त की बधाई देने की सोच रहा था मगर कुछ देर पहले सुने एक दोस्त की कविता ने रोक लिया ।कविता की शुरुआत कुछ यूँ थी । हर कोई परेशान है हर कोई त्रस्त है , मारो पटक के जो कहे पन्द्रह अगस्त है। सुना है आज इंडिया न्यूज़ वालों ने चालीस साथियों को बहार का रास्ता दिखा दिया । उनके लिए तो आजादी पर ऐसा ही गुस्सा होगा मन में ।

"मंझधार से..."

कठिन तो नहीं था...
............. पार जाना!

मगर...
मुझे तो,
..बूँद बूँद से बात करनी थी!
~ ~लहर लहर से परिचय!!!

तट पे घर बसाये मित्रों!
मुझे तुम से ईर्ष्या नहीं,
ज़रा भी नहीं!!!

मेरी प्रेरणा मगर,
तुम नहीं हो!
तुम नहीं हो!

-"कुलदीप"

"कुत्ते से सावधान"

"कुत्ते से सावधान"

दोमुंहे दो बार सोच लें,
द्वार पे दस्तक देने से पहले!

ये तख्ती,
संभ्रांतता का सुबूत देने के लिए पाले गए,
किसी खास नस्ल के पालतू के लिए नहीं है!
ये उस खालिस खडूस के लिए है ....
जो इस दरवाजे के पीछे रहता है!

ख़बरदार!
न सिर्फ भौंकेगा, गुर्रायेगा बल्कि काट भी सकता है,
कमीनेपन के हाथों पे मक्कारी के मखमली दस्ताने चढ़ा जो पीठ पे हाथ फेरा,
या जात, जमात, जकात के जिक्र से अपना कद बढ़ा; इसकी औकात को घेरा!!

और सुनो,
तसल्ली की बासी रोटी पे बेईमानी का बिस्किट फ़ेंक,
ललचाने के लटके आजमाने की गलती मत करना!
वरना
खरोंचें दिखा-दिखा के इसके खिलाफ कीड़ों की कांफ्रेंस करोगे,
और फटे कपड़ों की तोहमत इस बिचारे के सिर धरते फिरोगे!!!

चलो मान लिया......
इकट्ठे हो कर इसको घेर भी लोगे तो क्या!
और घेर घोट के मार भी दोगे तो क्या!!
कीड़ी कुंजर मार के भी चींटी रहेगी और हाथी मर के भी गजधन!
और फिर अट्ठारहवें दिन तो न जयद्रथ बचा था न दुर्योधन!

खैर...
उठाए कष्ट पांडवों ने,
तो मोक्ष भी पाया था!
युधिष्ठिर को लेने स्वर्ग से
रथ धरा पर आया था!!!

और कहते हैं...
साथ गया था एक कुत्ता भी!
इसलिए फिर कहता हूँ सावधान!
"कुत्ते से सावधान"
-कुलदीप

"मैं फ़िर गधा हूँ "

"मैं फ़िर गधा हूँ "

मैं था एक गधा
चलता था घोड़े की चाल
अस्तबल जा पहुंचा
छोड़ के अपना धोबीघाट ।

अस्तबल में कोई घोड़ा न था
सब मेरी ही तरह आए हुए थे ;
कोई मुझ से ठीक पहले
कुछ पीढ़ियों से आसन जमाये थे।

अब मैं घोड़ों के संग दौड़ लगाता था
पूर्व परिजनों से न परिचय जताता था;
अभिभूत था आभिजात्य होने की अनुभूति से,
उन्मुक्त ढेंचू के बदले बंद कक्षों में गाता था।

अब सभाओं में मैं , सम्मानित अतिथि होता
उत्सवों के अवसर पर, आमंत्रित अतिथी होता;
सभ्यता, साहित्य और संस्कृति की बहसों में
भारी -भारी शब्दों के संग मैं उनकी शोभा होता।

थे अस्तबल में अभिव्यक्ति के ढंग अनूठे
भावहीन शब्द, और मुद्राओं को प्रमुखता
जीव चिन्हों की अपेक्षा अश्व चिन्हों को वरीयता
खुश होने पे मुस्कुराना भी छिछोरपन कहलाता।

किंतु
अस्तबल में हर तथाकथित घोड़े को
दूसरे से एक निश्चित दूरी पे रहना था;
यही थी परम्परा, यही दोनों के हित में था,
वरना भेद खुल जाने का खतरा था।

और....
इन सब से घबरा कर
मैं लौट आया ......
मैं लौट आया अपने धोबीघाट!

मैं खुश हूँ ,

मैं सुखी हूँ,

मैं फ़िर गधा हूँ!

मैं फ़िर गधा हूँ!

-कुलदीप


एयर इंडिया मे बिहार

हेलो मिथिला
बिहारक लोक के लेल एकटा नीक खबर अछि. एयर इंडिया के फ्लाइट मे बिहार सं जुड़ल फिल्म दिखायल जाएत. शुरू मे एयर इंडिया के न्यूयॉर्क आओर लॉस एंजेल्स के उड़ान मे बिहारक फिल्म दिखायल जाएत. एहि फिल्म मेबिहारक पर्यटक स्थल... कला-संस्कृति... गीत-नाद... खान-पान के बारे मे देश-विदेश केर लोक के जानकारी देलजाएत. एतबे नहिं एयर इंडिया के फ्लाइट मे मिथिला पेंटिंग के सेहो स्थान भेटत. एहि सं पहिने रेल के डिब्बाआओर स्टेशन पर मिथिला पेंटिंग लगाबय के फैसला सेहो भेल छल. उम्मीद कएल जा सकय अ जे एहि कदम संबिहार मे पर्यटन के क्षेत्र मे किछ विकास होएत आओर दुनियाभर सं बेसि सं बेसि लोक अपना राज्य दिस रुखकरताह. देश-विदेश के लोक सभ के एहि फिल्म सं बिहार केर बारे मे जानकारी त मिलबे करतन्हि ओ बिहारआबय लेल सेहो सोचताह. फिल्म मे बोधगया... राजगीर... नालंदा... वैशाली... पटना हरमंदिर साहेब... सोनपुरमेला... सीतामढ़ी जानकी जन्मस्थान मंदिर... मिथिला पेंटिंग... लिट्टी चोखा... खाजा मिठाई... मखान... मैथिली ... भोजपुरी गीतनाद के जगह मिलय के उम्मीद अछि. पर्यटन विभाग केर ओर सं बनय वाला ई फिल्म दिल्ली केरएकटा फिल्म निर्माण कंपनी बनाओत. असल मे ई बिहार सरकार पर्यटन विभाग के नहिं एयर इंडिया के पहलअछि. किछ समय पहिने एयर इंडिया सभ राज्य सं अपन-अपन राज्य केर पर्यटन स्थल के बढ़ावा लेल फिल्मबनाSक देबय लेल कहने छल. उम्मीद अछि जे ई फिल्म सितम्बर तक दS देल जाएत. फिल्म केर संग यात्री सभके बिहारक पर्यटन स्थल आओर दोसर जानकारी सं संबंधित ब्रोशर सेहो देल जाएत. ई नीक गप्प अछि जे फिल्मदिखायल जाएत मुदा पर्यटक अएताह तS कि देखताह... केना देखताह... केना अएताह-जएताह. सरकार के सभसबेसि ध्यान सड़क... बिजली... पिएअ वाला पानि पर देबय के जरूरत अछि. फिल्म देखि कS बिहार अएला केर बादकइटा पर्यटक बीचे रास्ता सं घुमि जाइत अछि... किएक तS कईठामक रोड चलय लाएक नहिं अछि. हुनकर कमरबिहारक रोड के झटका नहिं सहि पाबय छैनि. हुनका सभ के रहय लेल कोनो ढंगगर होटल नहिं अछि. होटल केकमी के सेहो पूरा करय के जरूरत अछि. लोक सभ के अपन मानसिकता सेहो बदलै पडतन्हि. कोनो विदेशी केदेखय नहि छथिन्ह कि लगय छनि कोनो दोसर ग्रहक प्राणि आबि गेल अछि. आंखि फाड़ि-फाड़ि के दैखैत रहैतछथिन्ह. दोकानदार सभ हुनका सभ सं बेसि पाई वसूलय के कोशिश करय छथिन्ह. घोड़ा-गाड़ी वाला सभ सेहोविदेशी देखतन्हि अपन भाड़ा बढ़ा दैत छथिन्ह. सोना के अंडा देय वाला मुर्गा के हलाल करय चाहय छथिन्ह. ई नहिंसोचय छथिन्ह जे ठगाकS गेलाह के बाद ओ फेर नहिं अएताह आओऱ दोसरो के सेहो मना करि देताह. हुनका सभके अपन परम्परा... रिवाज के अनुसार मेहमान भगवान के रूप होएत अछि... ई मानि स्वागत करिऔ. हुनकरएतेक आवभगत करिऔ जे ओ अपना घर जा फेर आबय केर सोचथिन्ह आ दोसरा लोक के सेहो आबय लेल प्रेरितकरथिन्ह. ओ एहिठामक सुखद अनुभव के पत्र-पत्रिका में लिखथिन्ह... ब्लॉग पर लिखथिन्ह. बेसि सं बेसि लोकआएत... आओर जं बेसि लोक आएताह त पाई आएत... अहांक आमदनी बढ़त... आमदनी बढ़त तं जीवन स्तरसुधरत... सभ किछ सुधरत. त कहिऔ अतिथि देवो भव:
आभार: हेलो मिथिला


11.8.08

आई मन बड़ खुश अछि

किछ गप्प ऐहन होएत अछि जकरा अहां मैथिली... भोजपुरी... मराठी कोनो भाषा... मिथिला... बिहार... यूपी... पंजाब आ महाराष्ट्र मे नहिं बांटि सकय छी. आजुक दिन ओहने छल. आई भोरे जखन अभिनव बिंद्रा 10 मीटर एयर राइफल मुकाबला मे स्वर्ण पदक जीतला तखन हम सभ टीवी पर ई सभ देखैत छलहुं..आगां पढ़ई लेल हेलो मिथिला पर क्लिक करु

नम आंखों से मौन श्रद्धांजलि

ॐ शांति, ॐ शांति, ॐ शांति,
शांति, शांति, शांति।
नम आंखों से मौन श्रद्धांजलि

देश, राष्ट्रगान, तिरंगा, सम्मान

देश की आजादी का जश्न मनाये जाने की तैयारियां हो रहीं हैं, देश के कुछ जाबांज चीन में पदकों के लिए अपना पसीना बहा रहे होंगे. इन सारी स्थितियों के बीच ये कैसा विषय छेड़ दिया है? शायद आपको आश्चर्य हो रहा होगा? ऐसा होना स्वाभाविक है पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि जब भी हम वर्तमान में किसी भी ऎसी स्थिति से गुजरते हैं जो हमें अतीत से जोड़ती है तब हम ख़ुद ब ख़ुद अतीत की घटनाओं को याद करने लगते हैं। कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ. अगस्त का माह, ओलम्पिक का उदघाटन, तिरंगे का फहराना, देश का सम्मान आदि सब कुछ एक साथ मिल-जुल कर आंखों के सामने घूमने लगा.
ओलम्पिक के मार्च-पास्ट के समय महिला खिलाड़ियों की रंग-बिरंगी पोशाकों से उठती टिप्पणियों ने भी इस पोस्ट को लिखने को प्रेरित किया। यहाँ शायद बात पहनावे की न हो पर समूचे विश्व-समुदाय के सामने देश के सम्मान की अवश्य थी. बहरहाल उस समय जो हुआ उस पर सफाइयों का दौर भी चल चुका है. यहाँ बात देश, राष्ट्रगान, तिरंगे और सम्मान की हो रही है.
शुरुआत देश से करते हैं। आप किस देश की बात कर रहे हैं जिसके अनेक नाम हैं. भारत, हिन्दुस्तान, इंडिया आदि-आदि. इन नामों के अलावा भी कई सारे नाम और भी चलन में हैं. अब आ गई न दिक्कत किस नाम का सम्मान किया जाए क्योंकि आजकल तो नम को सलाम किया जाता है. इसी के साथ और भी दूसरी समस्या है, भारत माता की जय, भारत देश हमारा है.....................हो गई लिंग की समस्या. क्या है देश का लिंग (ये समस्या बहुत पहले तथाकथित बुद्धिजीवियों ने उठाई थी) क्योंकि आजकल देश में लिंग का बोलबाला है. नाम के साथ लिंग की दिक्कत ने देश के प्रति लोगों को उदासीन कर दिया है. पहले आप नाम तय कर दो, लिंग तय कर दो तब हमसे देश की बात करना.
अब आते हैं राष्ट्रगान पर, अच्छा वही राष्ट्रगान जो अँगरेज़ अफसर के लिए लिखा गया था? यदि ऐसा है तो हम क्यों उसका सम्मान करें। हम नै पीढ़ी हैं जो अपने देश को गुलाम रखने वालों के सम्मान में कहे किसी भी शब्द के प्रति सम्मान नहीं रख सकते. इसका उदहारण भी दे-दे, किसी भी समारोह में अगर राष्ट्रगान हो रहा होता है तो सबके साथ खड़े हो जाते हैं पर जब कभी ये टीवी पर या फ़िल्म में बजता है तो तसल्ली से लेते या बैठे रहते हैं. कौन खड़ा हो, क्यों खड़ा हो? देखा नहीं था आपने उस फ़िल्म शायद "कभी खुशी कभी ग़म" में राष्ट्रगान बजता है क्या कोई खड़ा होता है? नहीं न बस. वैसे एक बात बताएं, किसी गीत पर सम्मान से खडा हुआ जाता है या कि उस पर थिरका जाता है? इसी कारण से हम नै पीढ़ी के लोग अब जयमाल या हुडदंग के माहौल में राष्ट्रगान का आलाप करने लगे हैं. आप भी करो बड़ा मजा आता है.
रही बात तिरंगे की तो तिरंगा है क्या? एक खादी के कपड़े का तीन रंग का टुकडा। आप लोग यहाँ भी ग़लत हो, कहाँ हैं तीन रंग? अच्छा केसरिया, सफ़ेद और हरा, ठीक तो फ़िर नीले रंग के चक्कर को कौन याद करेगा? आपके.........? (समझ गए) वैसे सही बात बताएं तो हमें अपनी पार्टी के झंडे के सिवाय कोई और रंग याद ही नहीं. उसी का गुणगान करते हैं उसी को सलाम करते हैं. हम हैं बीजेपी के तो हम तो केसरिया और हरे रंग को याद रखते हैं बाक़ी याद ही नहीं रहते. हाँ सही कहा हम हैं सपा के तो हमने लाल और हरा याद है बाक़ी को याद कर क्या करना है? भइया हमारी पार्टी है नीले झंडे वाली तो हम उसी को सलाम करेंगे क्योंकि बाकी सारे रंग तो मनुवाद के समर्थक हैं, जय बसपा. नहीं भाई, हमारी पार्टी के तो तीन वही रंग हैं जो तिरंगे के हैं पर असली तिरंगा तो हमारा है, ठीक तीन रंग का. नीले रंग की जगह है हाथ का निशान. उसका वही रंग होता है जैसा मैडम chahtee हैं. अब इस स्थिति में हम कांग्रेस वाले अपने तिरंगे की जगह दूसरे तिरंगे को सलाम कैसे कर दे, आख़िर गद्दी का सवाल है. हम तो एक रंग लाल वाले कम्युनिस्ट हैं किसी और रंग को सलाम करना हमारे संविधान में ही नहीं है तब तिरंगे को सलामी कैसे दी जाए. क्या कहा सलाम, अरे हम कट्टर हिन्दू सलाम कैसे करें? अरे हम मुसलमान अपने खुदा के अलावा किसी को सलाम नहीं करते, तब सलामी कैसी? देखा आपने इसी तरह के विचार सभी के हैं चाहे वो किसी भी पार्टी किसी भी धर्म का हो. तब तिरंगे को अकेले ही लहराना पड़ेगा. हम नै पीढी से क्यों कल्पना करते हो कि वो इस कपड़े के टुकड़े का महत्त्व समझे?
सम्मान का अर्थ अब तक एपी लोगों की समझ में अ गया हो तो अब ये लेक्चर बंद कर दो कि नई पीढ़ी किसी का सम्मान नहीं करती। अरे हमें जो दिखेगा हम वही करेंगे. जैसा देश वैसा भेष. देखा यहाँ भी देश........कितना छोटा हो गया है हमारा देश?

==================================================
चलते-चलते
बीजिंग ओलम्पिक में मिल गया एक स्वर्ण, पूरे 28 साल बाद. बधाई. शायद ऐसे ही एक-दो लोगों से देश का सम्मान बचा है?

महंगाई में 'नंगा नहाये क्या, निचोड़े क्या

  • अमिताभ फरोग
मियां मसूरी किसी उधेड़बुन में थे। हमने सवाल दागा-अमा मियां, किस ख्याल में खोए हो? उनका ध्यान भग्न हुआ। वे चिंतातुर थे-महोदय, इस महंगाई का क्या करूँ ? मैंने चिकोटी काटी -'दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ! मियां ने मुझे घूरा-महोदय, व्यर्थ के तर्क मत दीजिए। महंगाई ने गरीबों का आटा गीला और दाल पतली कर दी है। यूं लगता है गोया अब इस मुल्क में उन्हीं का पेट भर पाएगा, जो आदतन 'खाऊ कमाऊ हैं। मैंने पलटवार किया -अमा खां, खामख्वाह भेजा फ्राय मत कीजिए और आप भी खाने-खिलाने की आदत डाल लीजिए। खां की त्यौरियां चढ़ गईं-महोदय, मैं महंगाई से त्रस्त हूं, लेकिन भ्रष्ट नहीं। मैं हाजिर जवाबी पर उतर आया-मतलब, 100 में से 99 बेईमान, फिर भी मेरा देश महान! खां नाराज हो उठे-मैं एक प्रतिशत लोगों में रहकर भी खुश हूं। मैं गायनशैली में बोला-यानी, 'खून-पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे, नहीं तो यारो हम भूखे ही सो जाएंगे? खां ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा-महोदय, ईमानदारों का मजाक उड़ाना आप को शोभा नहीं देता। मैं सिर्फ मंहगाई पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहा हूं। यह अकेली हमारी नहीं, समग्र देशवासियों की समस्या है। मैं दार्शनिक अंदाज में बोला -यानी 'नगां नहाए क्या, निचोड़े क्या खां रुंआसे हो उठे-महोदय, गरीबों के पास तन ढकने को कपड़ा ही कहाँ बचा है, जो वो उन्हें धोएगा। रही बात नहाने की , तो सार्वजनिक नलों से बूंद-बूंद पानी ही तो टपकता है। खून-पसीना बहाकर हासिल हुए पानी को नहाने में इस्तेमाल करना क्या समझदारी कहलाएगी? मैं गंभीर हो उठा-खां, आप की चिंता वाजिब है, लेकिन सोल्यूशन कौन निकालेगा ? खां का लहजा कड़क हुआ -महोदय, सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती? मैंने पलटवार किया -खां, कदम उठाने के लिए दम चाहिए। वे बोले-तो फिर कांग्रेस जनहितैषी होने का दंभ क्यों भरती है? मैं फिर हाजिर जवाबी पर उतर आया-शब्दों के दंभ में कितना दम होता होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। खां ने सवाल किया -प्रधानमंत्री तो कुछ कर सकते हैं? मैंने तुकान्त शब्द-शैली अपनाई- मनमोहना... बड़े झूठे। खां चिंतातुर हो उठे-मैं आपका आशय नहीं समझा? मैं इतना आगे बढ़ लिया-खां, क्यों मुंह खुलवा रहे हो, सरकार में प्रधान कौन है और मंत्री कैसे हैं, यह सबको पता है। वैसे भी जिस 'सरदार' के 'सर' पर कोई दूजा बैठा हो, तो वो कितना असरदार होगा, कहने की आवश्यकता नहीं।

अब हम भी सुधर जाएं

मै जिस दौरान हिंदी साहित्य से एम.ए. कर रहा था. तब एक सिधांत पढ़ा था विरेचन सिधांत. उसी सिधांत की तर्ज़ पर हम सब अब तक अपने पेट बनाम मन का विरेचन भड़ास पर करते आ रहे है, लेकिन क्या हमारे मन में सिर्फ़ गन्दगी ही भरी है जो हर बार पोस्टिंग में हम सिर्फ़ और सिर्फ़ गलियों का सहारा लेकर अपने मन और विचारों का विरेचन कर रहे हैं. एक बार हुआ ,दो बार हुआ पर ये सिलसिला तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा. भड़ास पर हम जिन गलियों का प्रयोग पोस्टिंग में कर रहे हैं कहीं उन का उद्देश्य महिलाओं के जननांगों से लोगों को वाकिफ़ करना तो नहीं ? हमारे कुछ भड़ासी बंधु तो अपनी गलियों में उन जननांगों के उपयोग और दुरपयोग की जानकारी भी दे डालते हैं . कई दिनों से भड़ासियों की भड़ास देखकर अपनी भड़ास को नियंत्रित नहीं कर सका सो आज कह रहा हूँ. इसे प्रवचन या सलाह न मान कर मेरी जिम्मेदारी की भावना मान सकते हैं या मेरी भड़ास. हम अब तो सुधर जाएँ...

अभिनव बिंद्रा को salaam

अभिनव बिंद्रा को मेरठ वासियों का सलाम,

२८ साल बाद हमने सोना जीता है अभिनव बिंद्रा की वजह से, देश भर में जस्न मनाया जा रहा है, मेरठ में भी कई स्कूल और जगहों पर इस जीत का जशन मना कर अभिनव बिंद्रा की इस जीत को सलाम किया जा रहा है॥
देशवाशियों को इस जीत की बधाइयां....

जिम्मेदार कौन !

जय भड़ास !

मित्रों वैसे तो आप, मैं और हम सभी भारत वासी रोज़ अपने दिन की शुरूआत चाय के साथ किसी न किसी अखबार के पन्ने पलटते हुए करते हें और रोज़ ये अखबार लगभग एक जैसी भाषा और शब्दों का प्रयोग करते हुए हमे इस बदलती दुनिया, बदलते समाज की रंग बिरंगी तस्वीर दिखा जाता हे ।

सुबह जब में अखबार पड़ रहा था तो संपादकीय वाले पेज पर मेरी नजर अमरनाथ यात्रा और आतंकवाद से जुड़े लेख पड़ने के बाद मेरी नजर एक लंबे आरसे के बाद स्थानीय समस्याओं के कालमपर चली गई । दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, देश बदल गया गाँव और शहर भी बदल गये । मगर कुछ चीजे आज भी नही बदली । इस कालम में आज भी लगभग वही समस्याएं थी जो आज से १० -२० या कहो ५० बरस पहले थी बस थोड़ा सा स्तरबदला हे जैसे पहले समस्या पानी न होने की थी अब गंदे पानी की हे, पहले शोचालय न होने की थी अब बंद या रुके हुए सीवर लाइन की हे, पहले बिजली न होने की थी अब बिजली न आने की हे या कम आने की हे । पहले समस्या सड़क न होने या साधन न होने की थी अब टूटी फूटी सड़क या मंहगे पेट्रोल की हे । पहले अस्पताल न होने की थी अब डॉक्टर के न रहने या अस्पताल में सुविधाओं के स्तर की हे, पहले स्कूल न होने या पदाई न होने की थी वहां अब मिड-दे मील , पदाईके स्तर , लड़कियों की शिक्षा, खेल सुविधाओं और अध्यापकों के स्तर के साथ साथ खेल सुविधाओं से सम्बंधित थी ।

आप कह सकते हें विकास हो रहा हे तभी तो समस्याओं का स्तर बदल रहा हे ! सही भी हे ? लेकिन यदि हम गौर करें तो चीज जो इसमे नही बदली हे वो हे हे लोगों का नजरिया ??

लोग आजादी के ६२ साल बाद अर्थात आज भी अपनी समस्याओं के लिए दूसरो को जिम्मेदार बताते हे । कोई सरकारी कर्मचारी को, कोई प्रशासन को, कोई नेता को, कोई नगर पालिका को कोई पंचायत को, कोई राज्य तो कोई केन्द्र सरकार को !

आप पूछ सकते हे कीइसमे ग़लत क्या हे ? सब सही तो हे, इन सभी समस्याओं को ख़तम करने की जिम्मेदारी सरकार और प्रशाशन की ही तो हे ।

लेकिन नही शायद विकास की इस यात्रा में हम यहीं पर मात खा गये । हमने अपने गाँव बदले, शहर बदले, जीवन स्तर भी बदला, तकनीकें भी बदल डाली लेकिन अपनी सोच बदलना भूल गये, अपनी करनी दूसरो के सर डालने की पुरानी आदत नहीं छोड़ी हे हमने अभी तक, तभी तो इतने सारे क़ानून, नियम कायदे बनने, अधिकार मिलने के बाद भी हमारी समस्याएं आज भी वहीँ की वहीँ खड़ी हें ।

सरकार, प्रशाशन तो एक मध्यम हे जो हमारी समस्याओं को दूर करने के लिए हे ही मगर क्या हमने अपनी समस्याओं का कारण जानने की भी कभी कोशश की हे ? जी हाँ , अगर हम यह कोशिश करे तो पायेंगे की हर समस्या की जड़ हम ख़ुद हें, सिर्फ़ हम न की कोई प्रसाशन या सरकार । मगर कैसे ????????????

जरा सोच कर देखो ...................................
क्या मैंने कभी .........................................
किसी सरकारी कर्मचारी से ये पुचा हे की फलां काम क्यों नही हुआ ? उस काम के लिए कितने पैसे आए थे ? वो काम किसे दिया गया था ? वो काम कितने समय में पुरा होना था ? यदि काम समय पर नही हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी हे ? बाकी पैसे का क्या होगा ? यदि काम अधुरा हे तो उस पर हुए निरर्थक खर्च की भरपाई कैसे होगी ?

उदहारण .........................................................

१- आपके यहाँ गली में सड़क टूटी फूटी हे या कच्ची हे तो आप समस्या अखबार में भिजवाने के स्थान पर मोहल्ले में बात कर स्थानीय पार्षद के साथ या उसके बिना नगर पालिका /नगर परिषद्/ पी डब्लू दी /पंचायत जाकर वहां पता करें की उस गली की सड़क कब बनी थी ? दोबारा कब बनेगी ? कितने में बनी थी ? मरम्मत की जिम्मेदारी किसकी हे ? सुचना के कितने दिन में मरम्मत का प्रावधान हे ? इसके लिए कौन जिम्मेदार हे ?

इस सब में आप की सहायता " सुचना का अधिकार " भी करेगा । और आप सब कुछ पुराणी समस्याओं को छोड़ कर विकास की इस राह में नै समस्याओं का सामना करने के लिए तेयार हो पाएंगे ।

जय हिंद ।

आप सभी को मेरी और से हमारी स्वतंत्रता की ६२वि वर्षगांठ पर हार्दिक सुभ कामनाएं ।
नूतन वर्ष में आप सभी अबनी अपनी भड़ास निकलने के लिए भड़ास पर सादर आमंत्रित हे ।

गीतकार विषणु खन्ना नहीं रहे

मेरठ। जाने-माने गीतकार और लेखक विष्णु खन्ना का आज सुबह मीनाक्षीपुरम स्थित निवास पर निधन हो गया। अस्सी साल के खन्ना जी आकाशवाणी से सेवानिवृत्त हो जाने के बाद से स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। पुरातत्व और यायावरी पर उनके आलेख और पुस्तकें काफी लोकप्रिय और सारगर्भित रहीं। उनका एक गीत पढ़िए...
आवाज कहां से कहां गई
जीवन भर भटकी वहां गई

अभिशापों के घर खुले मिले
आगे बढ़-बढ़ गले मिले
ठोकर खाने को व्याकुल थी
सोचा न कभी क्यों कहां गई

स्वर के पीछे स्वर लगे रहे
चेतन सोया भ्रम जगे रहे
नादान भिखारिन आस लिए
जाने किस-किस के यहां गई

अनुभव ने बांची यही कथा
संबंधों की विच्छेद प्रथा
धरती, सागर, नभ, अगन, पवन
कोई बतला दे कहां गई

10.8.08

मृत्यु है ....तो ही तो जीवन है !

करुणाकर की मौत पर कुछ लिखना चाहता था ..........
लेकिन अंत में यह रचना सटीक लगी ....................



निर्मम है
काल चक्र
अतिशय निर्मम !
जिसके नीचे
जड़ जंगम
क्रमशः पिस्ता और बदलता
हर क्षण , हर पल !
थर-थर कांपता भूमंडल !

अदृश्य
निः शब्द किए
अविरत घूम रहा
यह काल चक्र
निर्विघ्न ....... निर्विकार !

इसके सम्मुख
स्थिरता का कोई
अस्तित्व नहीं,
इसकी गति से
सतत नियंत्रित
जीवन और मरण ,
धरती और गगन !



डॉ महेंद्र भटनागर की रचना "मृत्यु बोध और जीवन बोध" से साभार

डाक्टर रूपेश ! शेम-शेम... चुप्पी क्यों साध रखी है????


डाक्टर रूपेश ! शेम-शेम... शर्म की बात है आपके लिये ........ हर पोस्ट पर टिप्पणी लिखने वाले करुणाकर की मौत की बात पर चुप्पी क्यों साधे हो????? आज मुझे ये सुनने को मिल रहा है तो इसमें क्या ऐसा है जो मुझे दुःख होना चाहिये क्योंकि मैं तो जादूगर हूं साथ ही धरती का भगवान कहलाता हूं यानि कि चिकित्सक....... मैं क्यों असाध्य कहकर मौत का तिल-तिल इंतजार करते लोगों का उपचार अपने जिम्मे पर ले लेता हूं ???? मैंने अपने अध्ययनकाल में न जाने कितनी बार देखा कि पच्चीसों डाक्टरों की टीम मरीज को एण्टी-स्पाज़्मोडिक दवाएं दे रही ऐ फिर भी पेट दर्द है कि रुक नहीं रहा या संसार का सबसे अच्छा हार्ट-स्टिम्युलेंट देने के बावजूद पूरी टीम के सामने कार्डियोग्राम फ़्लैट होता जा रहा है और बस अगले पल एक सीधी लकीर..... खत्म ... जीवन समाप्त.... क्यों..क्यों...?????? बस इसलिये कि सुनिश्चित हार की घोषणा के बाद भी मैं लड़ना छोड़ कर हथियार डाल कर बैठ नहीं जाता.......। मैंने करुणाकर के परिवार के लिये सांत्वना के दो शब्द तक नहीं बोले या लिखे जबकि इस मुद्दे (मुद्दा इसलिये कह रहा हूं क्योंकि इस विषय के चलते मुझे ख्याति मिलने वाली थी जिसे कि मैं भविष्य में शायद कैश कराता ऐसा लोगों का विचार है ) पर मुझे सबसे ज्यादा चिल्ल-पौं करना चाहिये था आखिर हार मेरी हुई... चिकित्सा शास्त्र की हुई... आयुर्वेद की हुई....। कोई प्रलाप न करूंगा और न ही इस बात का अफसोस करूंगा कि मैं इस मिशन में नाकामयाब हुआ.......। मैं हर बार जीतता हूं जीवन की जंग क्योंकि डूबते जहाज की कप्तानी स्वीकारने का साहस है ... भय नहीं है इस बात का कि लोग निंदा करेंगे .... इस भय से मरणासन्न रोगी को भगा नहीं देता और अंतिम सांस तक लड़ता हूं। चिकित्सा करने पर अगर चमत्कार नहीं होता तो मैं निस्संदेह अपराधी ही तो हूं मुझे मार डालना ही सही न होगा क्या???? एक दिन मैं भी मरूंगा और किसी चिकित्सक को मेरे परिवार के लोग कोसते हुए आगे बढ़ जाएंगे जीवन पथ पर .....।
बस इतना ही..............

नया भड़ासी

भड़ासी टीम मे हमहुं शामिल भs गेलहुं अ. अहां सभ के हमरा तरफ सं नमस्कार. हमर मैथिली में ब्लॉग अछि हेलो मिथिला हम एहि में मिथिलाक गप्प करय छी. ओ सभ मुद्दा उठाबय छी जकर ताल्लुक कोनो नहि कोनो रुपे मिथिला सं अछि. त अहां सभ सेहो आउ आ हेलो मिथिला पर लिखु... अपन विचार राखु...गाम घरक...टोला मोहल्लाक खोज खबर लिअ.
धन्यवाद
हितेन्द्र कुमार गुप्ता
Ph. +91- 9873606696
Email- hellomithilaa@gmail.com

हेलो मिथिला पर हमर नवका पोस्ट अछि बिहार में रेल...

दुर्गापूजा... छठ के लेल टिकट मिलनाय अखने सं मुश्किल भs रहल अछि. हर साल लगन... होली... दुर्गा पूजा... छठ मे गाम घर जनाय एकटा यज्ञ करनाय जकां भs गेल अछि. टिकटक मारामारी... टिकट कटला पर गाड़ी मे चढ़य लेल मारामारी. स्टेशन पर भीड़क ई हाल जे कई बेर त लोकक भीड़ देखि स्टेशने सं डेरा घुमि जयबाक मन करैत रहैत अछि. मुदा गाम जाए केर एहन लालसा रहैत अछि जे पचासो कष्ट सहि गाड़ी पर बोरा... चट्टी जकां लदि जाए छी.....
आगां पढय के लेल हेलो मिथिला पर क्लिक करु