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21.7.13

सारा शहर गवाह मेरी खुदकुशी का है

पहचान है सदियों की, मगर अजनबी सा है,
उसका हरेक दांव, तेरी दोस्ती सा है।
कातिल ने मुझे कत्ल किया अब के इस तरह,
सारा शहर गवाह मेरी खुदकुशी का है।।

मैं तोड़ तो दूं रस्म, मगर टूटती नहीं,
दुनिया में मेरा दिल अभी सौ फीसदी का है। 

भटकूंगा भला कब तक बेगाने से शहर में, 
ये घर किसी का है, तो वो छप्पर किसी का है। 

मां बाप की परवाह न जमाने का कोई खौफ
लगने लगा है देश ये 21वीं सदी का है।

पाकिस्तान से ’भागा था मिल्खा’ और वहीं से मिला ’फ्लाईंग सिख’ का खिताब !

भारत पाकिस्तान के बटवारे के दंश को दोनों मुल्कों के इतिहास, साहित्य, लोकगीतों और अब फिल्मों के माध्यम से संजो कर रखा जाता रहा है । जहाँ आक्रमण, बार्डर और लक्ष्य जैसी फिल्में सीधे तौर पर दोनों मुल्कों की सेनाओं के टकराव को दिखाती हैं वहीं अब फिल्मों की एक जमात ने उस टकराव को खेल के मैदानों तक ला खड़ा किया हैं ।

’चक दे इण्डिया’ में भारत के एक मुसलमान हाकी खिलाड़ी के पाकिस्तान के खिलाड़ी से मैच के बाद हाथ मिलाने पर देश-द्रोही करार दिया जाना दिखाया । इस खिलाड़ी का कैरियर लगभग तबाह हो गया था । जिसे फिर से महिलाओं की हाकी टीम के कोच के रूप में आने के लिये काफी मशक्क्त करनी पड़ी । और जब तक महिलाओं के हाकी का विश्व खिताब जीत नहीं लिया उसका "गद्दार" का तमगा हटा नहीं ।

फिल्म में मिल्खा की जो कहानी दिखायी गयी उससे मालूम हुआ कि उनको ’फ्लाईंग सिख’ का खिताब पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य शासक ने दिया था । किसी भी कामयाबी के लिये कड़ी मेहनत, लगन और जज्बे की जरूरत के महत्व को यह फिल्म रेखांकित करती है ।

गुरू, उस्ताद और मौलवी के महातम को भी बखूबी दिखाया गया है । पर एक बात जो दिल को छू गयी वह थी कि सिर्फ ’एक मग दूध और दो कच्चे अण्डों’ पर अंतराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार किये जा रहे थे  ।  सोनम कपूर की अदाकारी में दिल्ली 6 वाला खिलंदड़ी अन्दाज बरकरार दिखा । फरहान अख्तर एथलीट कम और बाडी बिल्डर टाइप ज्यादा लगे ।

पाकिस्तान से विभाजन के वक्त जान बचा कर ’भागने’ पर मिल्खा के उपर चुभने वाली टिप्पणी पाकिस्तान के कोच ने की ।  निश्च्य ही फिल्म के कुछ भाग को हटाकर इसे कुछ छोटा किया जा सकता था ।  यह भी एक पीरीयड फिल्म है और कुछ glitches रह जातें है ।  चूंकि मिल्खा सिंह आज भी स्वयं जीवित हैं इसलिये यह माना जा सकता है कि उनके ऊपर बनीं फिल्म "भाग मिल्खा भाग" पर उनकी स्वीकृति भी है । 

और हाँ भविष्य में मैं एक फिल्म भारत - पाकिस्तान के क्रिकेट वर्ल्ड कप फाईनल पर भी देखना चाहूँगा ।  कोई फिल्म अगर आई-पी-एल आदि में मैच फिक्सिंग पर भी बने तो क्या कहना । मधुर भण्डारकर खेमें से हो तो बेहतर ।

20.7.13

वर्ल्ड कप फेम पूनम पांड-ब्रज की दुनिया

मित्रों,क्या आप बहुत बड़ी खिलाड़ी पूनम पांडे को जानते हैं? अगर नहीं जानते तो जान लीजिए। वे ऐसी-वैसी खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि विश्व कप विजेता खिलाड़ी हैं। मैंने तो आज भी अखबार में पढ़ा है। क्या कहा मेरा ही सामान्य ज्ञान कमजोर है और उन्होंने कभी कोई वर्ल्ड कप नहीं जीता। परंतु ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई बिना वर्ल्ड कप जीते ही वर्ल्ड कप फेम हो जाए या कहलाने लगे? क्या कहा उन्होंने वर्ल्ड कप नहीं जीता था बल्कि वर्ल्ड कप के समय अपने नंग-धड़ंग होने के वादे को पूरा किया था। अरे भाई तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है,हम्माम में तो सभी नंगे होते ही हैं? क्या कहा वे कैमरे के आगे पूरी तरह से नंगी हो गई थीं और फिर बाद में वीडियो को सार्वजनिक भी कर दिया था। लीजिए मैं तो उनको कुछ और ही समझ रहा था वो क्या कहते हैं कि खिलाड़ी। अब समझा कि वे खिलाड़ी हैं ही नहीं बल्कि उन्होंने तो जमाने के सामने नंगा होने का वर्ल्ड कप जीता है। वैसे मैंने कई बार सड़कों पर विक्षिप्त पुरूष-महिलाओं को नंगे घूमते देखा है तो कहीं यह पूनम पांडे भी पागल तो नहीं है? अरे तू समझता क्यों नहीं है भाऊ पूनम पांडे पागल नहीं है वो तो दूसरों को पागल बनाती है रे।
                   मित्रों,वास्तव में यह अश्लील सत्य है कि इस समय पूरी दुनिया में अश्लीलता और नंगेपन का विश्व कप चल रहा है। आदमी खुद तो नंगा हो ही रहा है उसने प्रकृति को भी नंगा करके रख दिया है जंगल काटकर। लेकिन यहाँ हम आदमी और उसकी आत्मा के नंगेपन तक ही सीमित रहेंगे वरना बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। पहले भारत इस विश्वकप से बाहर था लेकिन अब संचार-क्रांति और अपसंस्कृतिकरण की कृपा के चलते वो भी इस महाआयोजन में शामिल ही नहीं हो गया है वरन् धूम मचा रहा है। कहिए तो सभी पूर्व खिताब विजेता क्लिंटनों और बर्लस्कोनियों को प्रतियोगिता से बाहर ही कर दिया है। अब इस विश्वकप का मतलब ही अखिल भारतीय कप रह गया है। क्या बूढ़े,क्या जवान और क्या किशोर हर कोई हर किसी से बाजी मार लेना चाहता है। जहाँ पहले नंगा शव्द गालियों में शुमार होता था अब उसने बदलते युगधर्म में पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित कर ली है। बाजारवाद का जमाना जो ठहरा। पहले कहावत थी कि हम्माम में सभी नंगे हैं अब गर्व से हम कह सकते हैं कि बाजार में सभी नंगे हैं क्योंकि बाजार में तो सिर्फ पैसा बोलता है न भाई। पैसा है तो अनैतिकता भी नैतिकता है वरना नैतिकता भी अनैतिकता।
                                        मित्रों,अभी-अभी दो-तीन दिन पहले ही दिल्ली से सटे गुड़गाँव में लगभग 100 होनहार किशोरों को सेक्स एंड पार्टी का आनंद लेते गिरफ्तार किया गया। आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा समाज किस तरह एकदम सही दिशा में अग्रसर हो गया है। अभी दो-तीन दिन पहले ही राजस्थान से एक बेहद शोचनीय मामला सामने आया। एक पिता ने अपनी 5 बेटियों के साथ कई महीने तक बलात्कार किया,उनको जबर्दस्ती ब्लू फिल्म दिखाया और परिणामस्वरूप कई-कई बार गर्भपात भी करवाया। तो क्या भविष्य में हमारी बेटियाँ अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगी? परंतु हमारी बेटियाँ तो वे भी हैं जो पूनम पांडे,सन्नी लियोन की तरह इस विश्वकप में खुद ही कपड़ों को तिलांजली देकर शामिल हो गई हैं और समाज तो दिक्भ्रमित कर रही हैं।
                          मित्रों,इसी बीच सर से पाँव तक और उससे भी कहीं ज्यादा आत्मा तक नंगी केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ शब्दों में बता दिया है कि वो अच्छे कहलानेवाले सरकार-विरोधी हजारों वेबसाइटों को तो जब चाहे तब बैन कर सकती है लेकिन अश्लील वेबसाइटों को कतई नहीं क्योंकि उसके मतानुसार ये वेबसाइटें हजारों सदियों से असभ्य रहे भारत का संस्कृतिकरण कर रहीं हैं। आजादी से पहले जहाँ ऐसा करना अंग्रेजों के लिए ह्वाईट मेन्स बर्डेन था अब इटली से अवतरित सोनिया गाँधी के लिए भारी बोझ बन गया है।
                         मित्रों,समझ में नहीं आता कि नंगई का वर्ल्ड कप किसे प्रदान किया जाए? जहाँ ओलंपिक में हमारे देश को पदकों के लाले पड़ जाते हैं यहाँ तो एक-से-एक प्रतियोगी मौजूद हैं। हमारे नेताओं को जिन्होंने घोटाला करने और जनता को धोखा देने में,झूठ बोलने और बरगलाने में और साथ-साथ कैमरे की उपस्थिति या अनुपस्थिति में नंगा होने में विश्व ही नहीं,ब्रह्माण्ड रिकार्ड बनाया हुआ है? या फिर अपने यहाँ के अधिकारियों को दे दिया जाए जिन्होंने संवेदनहीनता और घूस-कमीशनखोरी में पत्थरों और पशुओं तक को मीलों पीछे छोड़ दिया है। या फिर उन न्यायाधीशों को जो पैसे या लड़की लेकर न्याय के बदले अन्याय करते हैं। या फिर आम जनता को जिसने 16 दिसंबर जैसे कई महाक्रूर घटनाओं को अंजाम दिया है और जिनके मन-मस्तिष्क पर पूरी और बुरी तरह से अश्लीलता के वाईरस का कब्जा हो गया है,जिन्होंने देशभक्ति समेत समस्त नैतिक मूल्यों की एक बार में ही सामूहिक अंत्येष्टि कर दी है और अवशेषों को उपभोक्तावाद और बाजारवाद के गंदे गटर में ससम्मान प्रवाहित कर दिया है।
                              मित्रों,नंगई के विश्वकप के लिए नामांकन सालोंभर चलता रहता है। बहुत मारामारी है यहाँ। लालू, नीतीश, मुलायम, सोनिया, चांडी, राहुल, राघवजी, सन्नी लियोन, शरद पवार,पूनम पांडे आदि ने तो अपना नाम दर्ज करवा भी लिया है। आपने अपना नामांकन करवाया या नहीं? नहीं?? तो जल्दी करवाईए,आजकल नंगई बेस्ट कैरियर ऑप्शन बन गया है। जमकर पैसा बनाईए और अगर महेश भट्ट ने चाहा तो आपको फिल्मों में भी मौका मिल सकता है। अंदरखाने की एक बात बताऊँ आपको। आप पहले वादा करिए कि आप भी मेरी तरह किसी की नहीं बताएंगे-महेश भट्ट ने अपनी अगली अनाम फिल्म के लिए राघवजी और अभिषेक मनु सिंघवी को साईन कर भी लिया है। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि इस दुनिया और भारत के सबसे तेजी से उभरते सुनहरे क्षेत्र में कितनी मारामारी है। जल्दी करिए,जल्दी भरिए मित्रों,नहीं तो आप कप की रेस में काफी पीछे छूट जाएंगे/जाएंगी और तब कितना भी नंगा होने के बाद भी आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचेगा खुद को कोंसने का और हाथ मलने का।

पगथिया: धर्मनिरपेक्षता से साक्षात्कार .............

पगथिया: धर्मनिरपेक्षता से साक्षात्कार .............:  समय - आप कौन हैं ?
 मैं धर्मनिरपेक्षता हूँ मगर मेरा जन्म कब हुआ मैं इस बारे में कुछ नहीं जानत...

18.7.13

galee galee gaddaar

रोना अपने देश का  यारों है बेकार ,
नज़र  आ रहे आजकल गली गली गद्दार .
गली गली गद्दार भ्रष्ट  नेता अधिकारी ,
जनता चोर चुहाड़ जात पर मोहर मारी .
यह हम सब का काम चलो सबको समझायें
जात नहीं सद्गुण पर अब सरकार बनाएँ  .
 

डाकघरों से आज से मिलेंगे उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती फार्म

पुलिस भर्ती के आवेदन फार्म 18 जुलाई, 2013 से चयनित डाकघरों में मिलने शुरू हो जायेंगे। इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि उत्तर प्रदेश के 169 डाकघरों से फार्म मिलेंगे, जिनमें इलाहाबाद परिक्षेत्र के 24 डाकघर शामिल हैं। यह फार्म 18 जुलाई से 20 अगस्त, 2013 तक बिक्री किये जायेंगे।

इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाकघरों के द्वारा दो अलग-अलग तरह के फार्म बिक्री किये जायंेगे। प्रथम प्रकार के आवेदन-पत्र (खाकी रंग का लिफाफा) ऐसे अभ्यर्थियों को निःशुल्क वितरित किये जाएंगे जिन्होंने उ0प्र0 पुलिस भर्ती परीक्षा-2011 के लिए उस समय आवेदन किया था तथा दूसरे प्रकार के आवेदन-पत्र (सफेद रंग का लिफाफा) अन्य अभ्यर्थियों को रू 200/- शुल्क लेकर वितरित किये जायेंगे। श्री यादव ने यह भी कहा कि निःशुल्क आवेदन पत्र को प्राप्त करने हेतु आवेदक को एक अनुरोध-पत्र व घोषणा पत्र भी देना होगा, जिसका प्रारूप डाकघरों में नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया गया है। निशुल्क दिये जाने वाले खाकी रंग के लिफाफे के अन्दर नारंगी रंग का ओएमआर आवेदन पत्र होगा व खाकी रंग का वापसी लिफाफा होगा, जबकि सशुल्क आवेदन पत्र का लिफाफा सफेद रंग का होगा और लिफाफे के अन्दर ओएमआर आवेदन पत्र का रंग मजेन्टा होगा व वापसी लिफाफे का रंग सफेद होगा। 

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि संबंधित काउंटर सहायक द्वारा फार्म के सेट के साथ पावती पर्ची की 2 प्रतियाँ डाकघर के नाम व तारीख की मोहर लगाकर अभ्यर्थी को दी जायंेगी, जिसका उपयोग फार्म को वापस करते समय अभ्यर्थी द्वारा किया जायेगा। फार्म भरकर उसी डाकघर में वापस किया जायेगा जहाँ से वह खरीदा गया है। किसी भी स्थिति में दूसरे डाकघर द्वारा फार्म स्वीकार नहीं किया जायेगा। एक अभ्यर्थी को केवल एक ही फार्म दिया जायेगा।

निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि फार्मों की बिक्री हेतु व्यापक प्रबन्ध किये गये हैं एवं सशुल्क व निशुल्क आवेदनों हेतु अलग-अलग काउंटर चलाये जायेंगे।  उन्होंने कहा कि वाराणसी के वाराणसी प्रधान डाकघर, वारणसी कैंट प्र0 डा0, बी एच यू उपडाकघर, संत रविदास नगर के भदोही मुख्य डाकघर, ज्ञानपुर उपडाकघर, चन्दौली मुख्य डाकघर, मिर्जापुर के मिर्जापुर प्रधान डाकघर, चुनार उपडाकघर, राबर्ट्सगंज उपडाकघर, शक्तिनगर उपडाकघर, गाजीपुर के गाजीपुर प्रधान डाकघर, मोहम्मदाबाद युसुफपुर उपडाकघर, सैदपुर उपडाकघर व जौनपुर के जौनपुर प्रधान डाकघर व मडि़याहूं मुख्य डाकघर के माध्यम से फार्मों की बिक्री की जायेगी। डाकघरों से पुलिस भर्ती फार्म के सुचारू वितरण एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक पुलिस बल की तैनाती हेतु भी पुलिस अधिकारियों को लिखा गया है।








मिडडेमिल बना मौत की थाली-ब्रज की दुनिया

मित्रों,कल की ही तो बात है। घड़ी में दोपहर के एक बज रहे थे। धर्मासती प्राथमिक विद्यालय,जिला-सारण (बिहार) की घंटी घनघना उठी। बच्चे शोर मचाते हुए पंक्तिबद्ध होकर बैठ गए। मिडडेमिल योजनान्तर्गत चावल,दाल और सब्जी परोसी जाने लगी। न जाने क्यों आज सब्जी कुछ ज्यादा ही तीखी और अलग स्वादवाली थी। रसोईया मंजू को विश्वास नहीं हुआ तो उसने भी चखकर देखा। एक पंक्ति उठी और अभी दूसरी पंक्ति को भोजन परोसा भी नहीं गया था कि भोजन कर चुके बच्चों के पेट में भयंकर दर्द होने लगा। कुछ तो तत्काल ही बेहोश भी हो गए। पूरे गाँव में कोहराम मच गया। दो बच्चों ने चंद मिनटों में वहीं पर देखते-ही-देखते दम तोड़ दिया। बाँकियों को मशरख के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और कुछ बच्चों को मशरख के ही निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। परंतु वहाँ न तो सुविधाएँ ही थीं और न तो डॉक्टर कुछ समझ ही पा रहे थे। तब तक 5 अन्य बच्चे दुनिया को अलविदा कह चुके थे। शाम के 6 बजे जीवित बचे 40 बच्चों को मशरख से हटाकर छपरा,सदर अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया लेकिन वहाँ की तस्वीर भी कोई अलग नहीं थी। वहाँ न तो कोई डॉक्टर ही उपस्थित था और न तो जहर काटने की दवा ही उपलब्ध थी,ऑक्सीजन का तो सवाल ही नहीं उठता। सूर्यास्त तक अस्पताल में मौत तांडव करने लगा और 9 अन्य बच्चों ने भी दम तोड़ दिया। रात के नौ बजे स्थिति बिगड़ती देख जिंदा बचे 30 बच्चों को पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया गया जहाँ वे करीब 12 बजे पहुँचे। तब तक रास्ते में भी 4 बच्चों की साँसें थम चुकी थीं। बाद में पीएमसीएच में भी 7 बच्चों ने दम तोड़ दिया। लाशों की गिनती 27 मौतों के बाद भी अभी थमी नहीं है और कई बच्चों की हालत गंभीर बनी हुई है। दुर्भाग्यवश रसोईया मंजू देवी ने भी चूँकि उस भोजन को चखकर देखा था इसलिए वे भी पीएमसीएच में दाखिल हैं लेकिन उसके भी दो बच्चे इस घटना में काल-कवलित हो गए हैं। कल ही राज्य सरकार ने मामले की जाँच के लिए कमिश्नर और आईजी की जाँच कमिटी बना दी थी जो अब तक भी गाँव नहीं पहुँची है। अलबत्ता सुबह-सुबह पुलिस जरूर गाँव में आई थी और लोगों के सख्त विरोध के बाबजूद बर्तन और तैयार भोजन समेत सारे प्रमाण अपने साथ ले गई। इस बीच बिहार के शिक्षा मंत्री ने एक प्रेस वार्ता में कहा है कि उनका पुलिसिया जाँच में विश्वास नहीं है क्योंकि वे मानते हैं कि पुलिस पक्षपाती होकर काम करती है। इस मामले की जाँच से तो सरकार ने पुलिस को अलग कर दिया लेकिन उन बाँकी हजारों मामलों का क्या जिनका अनुसंधान बिहार पुलिस कर रही है?
                                 मित्रों,इतनी बड़ी संख्या में इन नौनिहालों की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? केंद्र
सरकार ने तो योजना बना दी,आवंटन भी कर दिया लेकिन उसे सही तरीके से लागू कौन करवाएगा? क्यों एफसीआई के गोदाम से ही 50 किलो की बोरी में 45 किलो अनाज होता है? फिर कैसे स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में ही बोरी का वजन घटकर 30-35 किलो हो जाता है? क्यों स्कूलों के शिक्षक पढ़ाना छोड़कर दिन-रात मिडडेमिल योजना में से पैसे बनाने और आपस में बाँटने की जुगत में लगे रहते हैं? क्यों मिडडेमिल प्रभारी अधिकारियों को सड़े और फफूंद लगे चावल-दाल नजर नहीं आते? कल धर्मासती में भोजन में जहर कहाँ से आ गया? जाहिर है कि रसोईये न तो नहीं मिलाया क्योंकि अगर वो ऐसा करती तो न तो उसको खुद खाती और न ही अपने दोनों बच्चों को ही खिलाती। अगर सरसों तेल जहरीला था तो कैसे और क्यों जहरीला था? चूँकि खाद्य-सामग्री प्रधानाध्यापिका के पति की दुकान से खरीदी जाती थी जो राजद का दबंग नेता भी है इसलिए हो सकता है कि उसने राजनैतिक फायदे के लिए जानबूझकर सरसो तेल में जहर मिला दिया हो या गलती से वहीं पर तेल जहर के संसर्ग में आ गया हो। हो तो यह भी सकता है कि प्रधानाध्यापिका के दरवाजे पर ही तेल में जहर मिल गया हो क्योंकि वहाँ खाद्य-सामग्री के साथ-साथ कीटनाशक और रासायनिक खाद भी रखा हुआ था। अगर यह मान भी लिया जाए कि इस घटना के पीछे कोई राजनैतिक साजिश थी तो भी प्रधानाध्यापिका तो सरकारी अधिकारी थीं उन पर निगरानी रखना तो सरकार का काम था। इतना ही नहीं इस योजना की निगरानी के लिए राज्य में अधिकारियों व स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधियों की एक लंबी फौज मौजूद है फिर राज्यभर में बराबर इस तरह की घटनाएँ कैसे घटती रहती हैं,क्या सुशासन बाबू जवाब देंगे? बाद में जब सहारा,बिहार संवाददाता पंकज प्रधानाध्यापिका मीना देवी यादव जिनके पति अर्जुन यादव इलाके के जानेमाने राजद नेता भी हैं के दरवाजे पर पहुँचे तो पाया कि एक टोकरी में आलू रखा हुआ है था जो पूरी तरह से सड़ चुका था और जानवरों के खाने के लायक भी नहीं था। प्रश्न तो यह भी उठता है कि उक्त स्कूल में पिछले 3 सालों से भोजन की देखभाल करनेवाली समिति भी भंग है और संबद्ध अधिकारी कान पर ढेला डाले हुए हैं।
                        मित्रों,क्या उन बच्चों को गाँव से सरकारी हेलिकॉप्टर भेजकर सीधे पटना नहीं लाया जा सकता था। क्या सरकारी हेलिकॉप्टर सिर्फ मुख्यमंत्री की जागीर होती है? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया? स्वास्थ्य मंत्रालय तो इस समय मुख्यमंत्री के पास ही है फिर सरकारी अस्पतालों में इंतजाम की इतनी भारी कमी क्यों है और अव्यवस्था और गैरजिम्मेदारी का माहौल क्यों है? क्यों अभी तक मुख्यमंत्री ने अभी तक पीएमसीएच,सदर अस्पताल,छपरा या धर्मासती गाँव का दौरा नहीं किया? वे जब पैर में फ्रैक्चर होने बाबजूद सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने जा सकते हैं तो प्रभावित गाँव क्यों नहीं जा सकते हैं? कहीं भी पुलिस फायरिंग में लोग मारे जाएँ या नरसंहार में या किसी दुर्घटना में क्यों मुख्यमंत्री लोगों को सांत्वना देने नहीं जाते? क्या उनको राज्य की जनता की कोई चिंता भी है? क्या उनको आनन-फानन में मुआवजा और जाँच समिति की घोषणा करने के बदले बचे हुए बीमार बच्चों को जल्दी-से-जल्दी पीएमसीएच लाने का इंतजाम नहीं करना चाहिए था? क्या दो-दो लाख रूपए प्रति मृतक बाँट देने से मरे हुए बच्चे जीवित हो जाएंगे?
                                           मित्रों,अभी पूरे गाँव में शोक का माहौल है। किसी-किसी परिवार ने तो एकसाथ अपने 5-5 नौनिहाल खोए हैं। पूरे गाँव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जल रहा है। कल तक जहाँ किलकारियाँ गूँजा करती थीं आज चीत्कारें आसमान का भी सीना चीर दे रही हैं। कल तक स्कूल के सामने स्थित जिस तालाब किनारे के जिस मैदान में बच्चे कबड्डी खेला करते थे आज उसी मैदान में वे 27 बच्चे सोये हुए हैं,गीली और नम मिट्टी की चादर ओढ़कर। गाँववाले अभी भी उसी मैदान में जमा हैं,हाथों में कुदाल लिए इंतजार में कि न जाने अगली बारी किसके बच्चे की हो और न तो इस समय 18 मंत्रालय संभाल रहे सुशासन बाबू का ही कहीं पता है और न तो जिले के जिलाधिकारी का ही। उत्तराखंड की ही तरह बिहार में भी पूरा-का-पूरा तंत्र लापता हो गया लगता है। दिल्ली में योजनाएँ बनाईं जाती हैं जनता का कुपोषण दूर करने के लिए और लागू करने में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही उसे जानलेवा बना देती है। क्या केंद्र सरकार द्वारा योजना बना देने से ही और राशि का आवंटन कर देने से उसके कर्त्तव्यों की इतिश्री हो जाती है? अगर राज्य सरकारें उनको ठीक तरह से लागू नहीं करे तो उन्हें इसके लिए कौन बाध्य करेगा?
                                       मित्रों,क्या कभी बिहार के हालात को बदला जा सकेगा? मिश्र गए,लालू भी गए और अब नीतीश भी चले जाएंगे लेकिन क्या कभी भ्रष्टाचार राज्य से जाएगा? क्या कभी तंत्र की लोक के प्रति संवेदनहीनता समाप्त होगी? या फिर गरीबों को पढ़ाई की आस ही छोड़ देनी होगी? निजी विद्यालयों की मोटी फीस तो वे भरने से रहे,बच्चों के खाली पेट को भर सकना भी जानलेवा महँगाई ने असंभव बना दिया है तभी तो वे मुफ्त की शिक्षा और भोजन के लालच में बच्चों को सरकारी स्कूल भेजते हैं। अगर बार-बार इसी तरह मिडडेमिल जान लेता रहा तो क्या वे बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने का जोखिम उठाएंगे? क्या वे अपने बच्चों की पढ़ाई छुड़वाकर उनको मजदूरी में नहीं लगा देंगे यह सोंचकर कि जिएगा तो बकरी चराकर भी पेट भर लेगा?
                                       मित्रों,एक बात और! मैं हमेशा से इस तरह की भिक्षुक-योजनाओं के खिलाफ रहा हूँ जिनका वास्तविक उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने वोट-बैंक को बढ़ाना है। देना है तो सरकार बच्चों के माता-पिता को योग्यतानुसार काम दे मिडडेमिल का घटिया भोजन खाकर और घटिया शिक्षा पाकर सरकारी स्कूलों से पास होनेवाले विद्यार्थी भविष्य में करेंगे भी तो क्या करेंगे? कैसा होगा उनका भविष्य? मेरा यह भी मानना रहा है कि शिक्षकों को शिक्षा के अलावा और किसी भी काम में नहीं लगाना चाहिए। शिक्षक पढ़ाए या भोजन बनवाए और उसकी गुणवत्ता जाँचे? इस बीच बिहार के मधुबनी में भी 15 बच्चे मिडडेमिल खाकर बेहोश हो गए हैं। इतना ही नहीं पूरे उत्तर भारत पश्चिम बंगाल से राजस्थान तक से मिडडेमिल की हालत खराब होने के समाचार लगातार हमें मिलते रहते हैं। गुजरात ने जरूर भोजन का शिक्षक द्वारा चखना अनिवार्य किया हुआ है और इस आदेश का अनुपालन भी होता है। जिस तरह कि पूरे उत्तर भारत में इस योजना में अफरातफरी और भ्रष्टाचार व्याप्त है उससे तो यही लगता है कि अच्छा होता कि बच्चों को बिस्कुट वगैरह डिब्बाबंद पौष्टिक खाद्य-पदार्थ दे दिया जाता या फिर घर ले जाने के लिए कच्चा अनाज ही दे दिया जाता। इस बीज बिहार के मुजफ्फरपुर और कई अन्य स्थानों से ऐसे समाचार भी मिल रहे हैं कि कई स्कूलों में आज बच्चों ने मिडडेमिल खाने से ही मना कर दिया है।

काश! ऐसा होता ......................

काश! ऐसा होता ......................

विभिन्न लोक लुभावन योजनाओं में सरकार जनता के धन को खर्च करती है।अरबो 
रुपया मनरेगा ,सस्ता अनाज,खाद्य सुरक्षा,मीड डे मील,निशुल्क दवाइयों पर खर्च 
होता है मगर उसका पूरा फायदा गरीब जनता को नहीं मिलता है,सब योजनाओं में 
खूब धांधली और गपले चलते हैं और गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में 
बेफाम लूट चलती है।सरकार हर योजना को ठीक से संचालन भी नहीं कर पाती है।
क्यों नहीं सरकार इन लोक लुभावन योजनाओं को खत्म करके गरीबो के हित के 
लिए चल रही सभी योजनाओं पर खर्च की जाने वाली राशी को डाकघर के मार्फत
गरीबों के घर तक मासिक रूप से रोकड़ के रूप में पहुँचाने की व्यवस्था कर दे ताकि
गरीबों के हाथों में पूरा रूपया भी पहुंचे और गपले घोटाले भी बंद हो जाए।        

15.7.13

काल्पनिक कुत्ता


काल्पनिक कुत्ता

एक चोपाल पर दो गाँव वाले बैठे थे।करने धरने को कुछ काम नहीं था ,आपस में
बतीया करके भी थक गए तो उनमे से एक बोला - देख फकीरा ,अपन दोनों बातें
करते -करते उब गए हैं इसलिए कुछ करते हैं।

उसकी बात सुन फकीरा बोला-ऐसा करे दयाला  ,अपन आपस में झगड़ पड़े।आपस 
में लड़ेंगे तो और लोग भी इकट्टे हो जायेंगे।

उसकी बात सुन दयाला बोला -बात तो तेरी जँचती है ,मगर बिना बात कैसे लड़ेंगे।

फकीरा बोला -लड़ने का तरीका ....................

दयाला बोला -देख,मैं लड़ने का तरीका बताता हूँ ....इतना कहकर दयाला ने जमीन
पर अंगुली से एक चोरस आकृति बनाई और बोला-फकीरा ,ये मेरा खेत है और
एक और आकृति बनाकर बोला -यह पास वाला तेरा खेत है।

फकीरा बोला -मान लेता हूँ।

उसके बाद दयाला ने कहा -तेरे खेत में फसल मेरे से ठीक पनप रही है परन्तु मेरे
खेत में फसल कम पनप रही है।

फकीरा बोला -तेरे किस्मत ही खराब है तो मैं क्या करू।

इस पर ताव देते हुए दयाला बोला -खेत मेने बनाया ,फसल तेरी ज्यादा पनप
रही है यह बात मेने कही और तू मेरी ही किस्मत को ख़राब बता रहा है।

फकीरा बोला -हाँ,पास -पास में खेत और तेरे फसल कम तो इसको तेरी फूटी
किस्मत ही तो कहूंगा।

दयाला ने गुस्से में कहा -तूने मेरी किस्मत को फूटा कहा ना ,अब ले मैं अपने
खेत में बंधी दोनों भेंसे,चारों गायें तेरे खेत में छोड़ देता हूँ।मेरे जानवर तेरा खेत
उजाड़ देंगे और तेरी किस्मत भी फूट जायेगी।

अब तो फकीरा  भी गुस्से में आकर चिल्लाया  -मेरी फसल को बर्बाद करने वाले,क्या
मेने हाथों में चूड़ियाँ पहन रखी है तेरा एक भी जानवर मेरे खेत से सलामत बाहर
नहीं जायेगा।

दयाला उसे चिल्लाता देख ताव में आ गया और बोला -अगर मेरे एक भी जानवर के
हाथ लगाया तो तेरी हड्डियाँ तोड़ दूँगा।

उसे ताव में देख अब तो फकीरा भी लाल हो गया और पास में पड़े डंडे से एक मार दी।
बस अब तो दोनों गुथमगुथा हो गए।उनको झगड़ते देख लोग इकट्टा हो गए और उनको
अलग किया।एकत्रित भीड़ से एक बुजुर्ग बोला -दोनों तो दोस्त हो ,फिर लड़ क्यों पड़े?

बुजुर्ग की बात का उत्तर देते हुए फकीरा बोला -दादा ,ये मेरे खेत में अपने जानवर
छोड़ने की धमकी दे रहा था।

बुजुर्ग बोला -मगर तेरे पास खेत था कब और दयाला  के पास तो बकरी ही नहीं है फिर
जानवर कहाँ से आ गए।

दयाला बोला -दादा ,हम तो बैठे बैठे थक गये तो काल्पनिक खेल खेलने बैठ गए थे।

                 यही हाल तो इस देश की राजनीति का हो गया है।एक ने उदाहरण दिया
और विपक्षी उस काल्पनिक कुत्ते का पोस्टमार्टम करने लगे,देश का मीडिया,अखबार
उस काल्पनिक कुत्ते पर घंटो बहस करने लगे और पन्ने भरने लगे।वाह ....क्या खेल है
देश चलाने वालों का!!!               
                      

खाद्य-सुरक्षा के नाम पर दे दे रे बाबा-ब्रज की दुनिया

मित्रों,दिवाने तो आपने बहुत-से देखे होंगे मैंने भी देखे हैं। मैंने लोगों को लंगोट में फाग खेलते हुए भी देखा है और खूब देखा है मगर अल्लाहकसम मैंने आज तक किसी लंगोटधारी को दानी बनते हुए नहीं देखा है। मगर यहाँ तो बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है। जिन लोगों ने देश को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों गिरवी रख दिया है और जनता को लगातार महँगाई की चाबुक से मार-मारकर लहूलुहान कर दिया है वही बेईमान और मक्कार लोग आज खाद्य-सुरक्षा कानून लाकर खुद के दुनिया का सबसे बड़ा दानी होने का स्वांग रच रहे हैं।
             मित्रों,पहले घोटाले कर-करके,कर-करके देश के खजाने को लूट लिया,टैक्स और महँगाई बढ़ाकर जनता को भिखारी बना दिया और अब जब सरकार का खर्च भी नहीं निकल पा रहा है,भीख देने को भी जब पास में पैसे नहीं बचे हैं तो सरकार के दो-दो बड़बोले मंत्री जा पहुँचे हैं अमेरिका कटोरा लेकर लेकिन अमेरिका ठहरा विशुद्ध बनिया सो वो क्यों बिना कुछ लिए नाक पर मक्खी भी बैठने दे?
                मित्रों,अगर इन लुटेरों को जनता के लिए अपने निजी धन में से एक पैसा भी खर्च करना पड़े तो ये कदाचित् वो भी न करेंगे। लेकिन खजाना तो जनता का है खाली रहे या भरा इनके बाप का क्या? इन्होंने तो पिछले 9 सालों में अपने निजी कोष में इतना माल भर लिया है अब इनकी सात पीढ़ियों को हाथ-पाँव हिलाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। यह देश का दुर्भाग्य है कि बावजूद इसके इन लुटेरों का लूट से मन ही नहीं भर रहा है और ये लोग लगातार तीसरी बार दिल्ली के तख्त पर बैठने की जुगत भिड़ा रहे हैं।
                   मित्रों,वो कहते हैं न कि सत्ता बड़ी बुरी शह है।  सत्ता की लत पड़ जाती है क्योंकि उसमें नशा भी है अफीम और हीरोइन से भी बहुत ज्यादा। हमारे कांग्रेसी नेताओं को यकीन ही नहीं हो रहा है कि वो लोग 2014 में सत्ता से बाहर भी हो सकते हैं। कलम के जादूगर रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा था कि अमीरी की कब्र पर उपजी हुई गरीबी की घास बड़ी जहरीली होती है सो विपक्ष में बैठने की सोंचकर ही सोनिया गांधी एंड फेमिली के हाथ-पाँव में सूजन आने लगी है। सरकारी खजाने में रोज के खर्च के लिए भी पैसा है नहीं और भूतपूर्व त्यागमूर्ति सोनिया अम्मा को पूरे देश के उन गरीबों को जो उनके और उनके परिवार के भ्रष्टाचार की वजह से भी गरीब हैं,भोज देना है। उनको न जाने कैसे यह मतिभ्रम हो गया है कि भारत के लोग भूखे,भिखारी और परले दर्जे के कामचोर हैं। वो काम करना ही नहीं चाहते इसलिए उनको काम नहीं दो बल्कि बिठाकर पैसे दे दो और रोटी दे दो फिर चाहे देश को खा जाओ,बेच दो,गुलाम बना दो वे बेचारे अहसानों तले इस कदर दबे रहेंगे कि किंचित भी बुरा नहीं मानेंगे।
                     मित्रों,आपने भी कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी सरकारी दफ्तर में यह लिखा हुआ देखा होगा कि शीघ्रता को भी समय चाहिए लेकिन सोनिया जी ने आजतक नहीं देखा। मान लीजिए कि आपको गंगा नदी पर एक पुल बनाना है तो उसमें कम-से-कम 5-7 साल तो लग ही जाएंगे। पहले जमीन का सर्वेक्षण होगा फिर पाया बनेगा तब ऊपर का काम शुरू होगा। कंक्रीट के जमने में समय तो लगेगा ही। अब अगर आप चाहेंगे कि वही पुल 6 महीने में बन जाए तब तो उस पुल का भगवान ही मालिक है। परन्तु इतनी छोटी-सी बात महाभ्रष्ट-देशबेचवा सोनिया गांधी एंड फेमिली के शातिर दिमाग में घुस ही नहीं पा रही है। वो आमादा हैं कि हम तो इसी साल 20 अगस्त से देश के लोगों को भिक्षा (भोजन) की गारंटी दे देंगे। जबकि इसके लिए पहले सही जरुरतमंदों का पता लगाना चाहिए था,फिर पीडीएस को ठीक-ठाक करना चाहिए था,फिर योजना की मॉनिटरिंग और अन्य प्रकार की व्यवस्थाएँ की जानी चाहिए थी तब जाकर अधिकार देना था वरना कागजी अधिकारों और गारंटियों की तो इस देश में पहले से ही बहुतायत है। वैसे गारंटी देने में इस परिवार का भी कोई जवाब नहीं है,इसने सबसे पहले जनता को सूचना की गारंटी दी हालाँकि अब अपनी ही पार्टी को इसकी मार से बाहर करने के लिए छटपटा रही है,फिर इसने 100 दिन के काम की गारंटी दी,फिर लगे हाथों शिक्षा की गारंटी भी दे दी और अब भीख की गारंटी देने जा रही है। हमारे प्रदेश बिहार की जनता तो सूचना के लिए मारी-मारी फिर रही है पर सूचना मिलती नहीं अलबत्ता कृष्ण-जन्मस्थली की तीर्थयात्रा का पुनीत अवसर जरूर मिल जा रहा है। आपके राज्य की आप जानिए। काम की गारंटी ने मुखियों को करोड़पति होने की गारंटी जरूर दे दी है और मजदूरों को या तो पता ही नहीं है कि उनका नाम मनरेगा में दर्ज है या तो उनको बैठे-बिठाए आधा ही पैसा मिल पा रहा है। शिक्षा के अधिकार का तो कहना ही क्या? इस पर तो अभी तक अमल शुरू हुआ ही नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं और अब आ गया है बिना किसी पूर्व तैयारी के एक और महान अधिकार भिक्षा का अधिकार। वास्तव में यह गरीबों के लिए भोजन की गारंटी नहीं है बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में यह पीडीएस के जुड़े मंत्रियों,अधिकारियों,कर्मचारियों व दुकानदारों के करोड़पति होने की गारंटी है। क्या सोनिया एंड फेमिली बताएगी कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी जनवितरण प्रणाली के माध्यम से यह कानून कैसे पारदर्शी तरीके से लागू हो पाएगा? क्या वे लोग जल्दीबाजी करके यह नहीं चाहते हैं कि इस योजना का 12 आना से भी ज्यादा बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचारियों की जेब में पहुँच जाए?
                              मित्रों, जब देश की बीपीएल जनता को पहले से ही हर महीने सस्ता अनाज दिया जा रहा है तो फिर नाम बदलकर उसी तरह की नई योजना लाने का क्या प्रयोजन? यह तो वही बात हुई कि एक ही बार बनी हुई सड़क का शिलापट्ट बार-बार बदल-बदलकर अलग-अलग नेता बार-बार उद्घाटन करें। विपक्ष तो विपक्ष खुद कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के हाथ-पाँव भी खजाने की बुरी सेहत को देखते हुए इस योजना के बारे में सोंचकर ही फूले जा रहे हैं। मगर सोनिया गांधी एंड फेमिली को देश और देश के खजाने से क्या लेना-देना? उनको तो बस एक गेम चेंजर प्लान चाहिए जो अकस्मात् जनता की याद्दाश्त को इस कदर धुंधली कर दे कि वे उनकी सरकार में हुए सारे रिकार्डतोड़ महाघोटालों को भुला दें। वे यह भी भूल जाएँ कि कांग्रेस ने अपनी आवारगी से किस तरह उनकी घरेलू पारिवारिक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी चमकते चांद से टूटा हुआ तारा बना डाला है और एक बार फिर से उसकी झूठ और फरेब की काठ की हाँडी में सत्ता की परम स्वादिष्ट खिचड़ी को वोटों की मीठी आँच देकर पक जाने दें।

13.7.13

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं 

क्या धर्म साम्प्रदायिक होता है ?किस धर्म ग्रन्थ में लिखा कि दुसरे अन्य धर्म हल्के या हिन
हैं ?क्या वेद ऐसा कहते हैं या कुरान  या बाईबल ?संसार का कोई धर्म मानवता में द्वेष करने
का सन्देश नहीं देता है फिर साम्प्रदायिकता की उपज कहाँ से हुयी ?आपस के धर्मों में और
धर्मावलम्बियों में द्वेष की भावना क्यों फैलाई जा रही है ? आपस में धर्मों के नाम पर लड़ाई
करवाने में किसका हित है ?

   एक शब्द का हमारे देश में खूब जोर से इस्तेमाल किया जाता है -कट्टरपंथ या चरमपंथ ?
विश्व का ऐसा कौनसा धर्म ग्रन्थ है जिसमे लिखा है अमुक धर्म का पालन विश्व की जनता
करे ?सभी धर्म स्वधर्म का पालन करने और मानवता  की सेवा का ही सन्देश देते हैं।

  हर धर्म या पंथ परहित चिंतन और उदार भावनाओं का पोषण करता है चाहे वह वेद हो या
कुरान या बाईबल।धर्म का अर्थ है मानवता की भलाई के विचारों का पोषण करना और उन्हें
आचरण में लाना।अभी पवित्र रमजान चल रहा है और हर मुस्लिम बंधू खुदा से इबादत
करके यही दुआ माँगता है कि मनुष्य मात्र का भला हो ,इस भाव में यदि किसी को चरमपंथ
या कट्टरपंथ लगता है तो इस देश को यह कट्टरपंथ स्वीकार होना चाहिए,यदि जैन धर्म के
इन पवित्र महीनों में सद्भाव के प्रवचन दिए जाते हैं और इसमें भी कट्टरपन किसी को दीखता
है तो यह कट्टरपन उचित है यदि श्रावण मास में हिन्दुओ के महादेव जो मानवता की रक्षा के
लिए गरल तक पी जाने का आचरण करने का सन्देश देते हैं तो यह कट्टरपन पुरे विश्व की
आवश्यकता है और विश्व को यह कट्टरपन की वास्तव में अब जरुरत है।

    गीता में श्री कृष्ण अपना मत रखते हैं कि स्वधर्म का पालन करों यदि हम मनुष्य हैं तो
मानव धर्म का पालन राग द्वेष छोड़ कर अविरत करते रहे।श्री कृष्ण ने यह नहीं कहा था की
सब मनुष्य अपने अपने धर्म को छोड़कर किसी एक धर्म का अवलम्बन करे ?क्या यीशु ने
धर्म की कोई अनर्थकारी परिभाषा दी है ,नहीं दी है ,उन्होंने सेवा का सन्देश दिया।यदि यह
बात किसी को चरमपंथ की पोषक लगती है तो कोई क्या करे।

     इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ के तुच्छ नेता ही विभिन्न धर्मो में द्वेष की भावना उत्पन्न
करते है और उसका  पोषण या तुष्टिकरण करते हैं।क्या कारण है कि वे लोग बाहर में  धर्म
निरपेक्षता की बातें करते हैं और दफ्तर,घर या सार्वजनिक जगहों पर जिस धर्म को ही वे
साम्प्रदायिक ठहराते हैं उसी धर्म के देवों की पूजा अर्चना या जियारत करते हैं ?केवल पद
की भूख के लिए एक दुसरे को लड़ाना और द्वेष फैलाना ही उनका काम रह गया है।क्या
किसी धर्म विशेष के लोगों को अनुचित प्रलोभन देकर निरपेक्ष कहलाया जा सकता है ?
नहीं ,अगर बाप एक पुत्र को विशेष सुविधा दे और दुसरे पुत्र को आवश्यक सुविधा से वंचित
रख दे तो यह कृत्य उस बाप की निरपेक्षता नहीं पक्षपात ही कहलायेगा।

          इस देश का मुस्लिम यदि यह कहे कि मैं राष्ट्रवादी मुस्लिम हूँ और मुझे इस पर
गर्व है तो यह बात पुरे देश के लिए गर्व करने की है और यदि एक हिन्दू या अन्य धर्म में
आस्था रखने वाला यह कहे कि मुझे राष्टवादी हिन्दू होने में राष्ट्रवादी इसाई होने में गर्व है
तो यह बात इस देश के सोभाग्य का चिन्ह है।

          धर्म की मनमानी व्याख्या करने वाले कुत्सित मानसिकता वाले राजनीतिज्ञ क्या
हम सबका भला कर पायेंगे या धर्म की मनमानी व्याख्या करनेवाले धर्म गुरु मानवता का
भला करने में समर्थ हैं?

         गलती इस देश की प्रजा की भी है ,शायद वह अनजाने में अनुचित तुष्टिकरण को
सही देख लेती है क्योंकि बार बार बोला जाने वाला झूठ भी सच लगने लगता है मगर सही
क्या और गलत क्या इसमें जब भी संदेह हो जाता है तो उसका सही उत्तर बाहर ढूंढने की
जरुरत नहीं है उनके अपने धर्म ग्रन्थ का अध्ययन उन्हें सही या गलत का रास्ता दिखाने
में पूर्ण रूप से सक्षम हैं।                 

12.7.13

देश में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने में डाक विभाग की अहम भूमिका - कृष्ण कुमार यादव



वाराणसी (पश्चिम) डाक मंडल अन्तर्गत नवीनीकृत प्रोजेक्ट ऐरो औराई व ज्ञानपुर उपडाकघर का लोकार्पण इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा 11 जुलाई 2013 को शिलापट्ट के अनावरण द्वारा किया गया। इस अवसर पर डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने डाकघर में उपलब्ध सेवाओं का अवलोकन किया एवं प्रतीकात्मक रूप में स्पीड पोस्ट बुक कराकर शुभारंभ भी किया। 

    मुख्य अतिथि के रूप में निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपने सम्बोधन में कहा कि प्रोजेक्ट ऐरो डाक विभाग की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका लक्ष्य डाकघरों का चेहरा पूर्णरूप से बदलना है। इसके तहत चयनित डाकघरों की कार्यप्रणाली को सभी क्षेत्रों में सुधार एवं उच्चीकृत करके पारदर्शी, सुस्पष्ट एवं उल्लेखनीय प्रदर्शन के आधार पर और आधुनिक बनाया जा रहा है। श्री यादव ने कहा कि डाक वितरण, डाकघरों के बीच धन प्रेषण, बचत बैंक सेवाओं और ग्राहकों की सुविधा पर जोर के साथ नवीनतम टेक्नोलाजी, मानव संसाधन के समुचित उपयोग एवं आधारभूत अवस्थापना में उन्नयन द्वारा विभाग अपनी ब्राण्डिंग पर भी ध्यान केन्द्रित कर रहा है। ये प्रयास न सिर्फ डाकघरों को उन्नत बनाएंगे बल्कि देश में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने में भी डाक विभाग की भूमिका में अहम वृद्धि होगी। 

    डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रोजेक्ट एरो के माध्यम से डाक विभाग अपनी मूल सेवा डाक वितरण पर विशेष रूप से जोर दे रहा है। डाक वितरण के तहत प्राप्ति के दिन ही सभी प्रकार की डाक चाहे वह साधारण, पंजीकृत, स्पीड पोस्ट या मनीआर्डर हो का उसी दिन शतप्रतिशत वितरण व डिस्पैच, लेटर बाक्सों की समुचित निकासी और डाक को उसी दिन की डाक में शामिल करना, डाक बीटों के पुनर्निर्धारण द्वारा वितरण को और प्रभावी बनाना एवं डाक वितरण की प्रतिदिन मानीटरिंग द्वारा इसे और भी प्रभावी बनाया जा रहा है। इसी प्रकार बचत बैंक सेवाओं  को पूर्णतया कम्प्यूटराइज्ड कर उनकी शतप्रतिशत डाटा फीडिंग और सिगनेचर स्कैनिंग भी कराई जा रही है, ताकि मैनुअली ढंग से कार्य संपादित करने पर होने वाली देरी से बचा जा सके। प्रोजेक्ट ऐरो के तहत बैंकिंग, धन भेजना, सूचनाओं के आदान-प्रदान की सुविधा एक ही खिड़की पर उपलब्ध होगी। उन्होंने बताया कि औराई व ज्ञानपुर उपडाकघर कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत फेज 1बी में शामिल किये गये हैं, तदनुसार कालान्तर में यहाँ भी आनलाइन बैंकिग सेवायें उपलब्ध हो सकेंगी। 

 निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने यह भी बताया कि प्रोजेक्ट ऐरो के अन्तर्गत लुक एंड फील में उत्तर प्रदेश में 189 डाकघर व इलाहाबाद परिक्षेत्र में 25 डाकघर नवीनीकृत हो चुके है। इनमें वाराणसी के वाराणसी प्रधान डाकघर, कैंट प्रधान डाकघर, बी एच यू डाकघर, मुगलसराय डाकघर, भदोही डाकघर, चन्दौली डाकघर, चकिया डाकघर के साथ-साथ अब  ज्ञानपुर व औराई उपडाकघर भी शामिल हैं 
     
            डाक अधीक्षक वाराणसी (पश्चिम) श्री आर एन यादव ने अतिथियों का स्वागत किया एवं कहा कि औराई व ज्ञानपुर डाकघरों के उन्नयन से नागरिकों को काफी सहूलियत होगी एवं उन्हें डाक विभाग की आधुनिक सेवाओं का लाभ मिल सकेगा। इन डाकघरों के प्रोजेक्ट एरो के अन्तर्गत कायाकल्प होने के साथ ही दूर-दराज ग्रामीण अंचलों में इसके लेखान्तर्गत स्थित शाखा डाकघरों की कार्यप्रणाली में भी काफी पारदर्शिता आयेगी।

            इस अवसर पर सहायक डाक अधीक्षक आशीष श्रीवास्तव, आर के श्रीवास्तव, पोस्टमास्टर औराई श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह, पोस्टमास्टर ज्ञानपुर श्री डी के राय, डाक निरीक्षक श्री अर्जित सोनी, संजय सिंह, सहायक अभियन्ता लक्ष्मी शंकर मिश्रा, सिस्टम मैनेजर आर के श्रीवास्तव, सहित तमाम अधिकारी, कर्मचारी, जन प्रतिनिधि, मीडियाकर्मी, बचत अभिकर्ता व नागरिकगण उपस्थित थे। 




नीतीश हैं भारी असमंजस में-ब्रज की दुनिया

मित्रों,यह शायद आपको भी पता होगा कि बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहारी राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। क्यों कहा जाता है कहनेवाले जानें लेकिन फिलहाल तो राजग से अलग होने के बाद श्रीमान् चाणक्य जी की हालत उस मकड़ी वाली हो गई है जो कभी अपने ही बुने जाल में फँस जाती है। विडंबना यह है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के सभी हटाए गए मंत्रियों के विभाग गठबंधन टूटने के 26 दिनों के बाद भी अपने ही पास रखे हैं और मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं। परिणाम यह हुआ है कि बिहार में पूरे शासन-प्रशासन में अव्यवस्था और अराजकता व्याप्त होने लगी है,कामकाज ठप्प पड़ने लगा है।
               मित्रों,कदाचित् नीतीश कुमार को यह भ्रम या घमंड हो गया है कि राज्य में राजनीति सिर्फ उनको ही आती है। उन्होंने सोंचा था कि राजग से अलग होने के बाद देशबेचवा कांग्रेस उनको हाथोंहाथ लेगी और राज्य में वही करेगी जो वे कहेंगे लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा। कांग्रेस ने राजद और लोजपा से दूरी तो नहीं ही बनाई उल्टे झारखंड में राजद की मदद से महाभ्रष्ट हेमंत सोरेन की सरकार भी बनवा दी और नीतीश गुब्बार देखते रह गए। नीतीश भूल गए थे कि कांग्रेस उनसे भी बड़ी,सबसे बड़ी अवसरवादी है और उसको सिर्फ सत्ता से मतलब है धर्मनिरपेक्षता वगैरह तो जनता को फुसलाने और भरमाने के साधनभर हैं।
                     मित्रों,कांग्रेस पर भरोसा करके नीतीश न घर के रह गए हैं और न घाट के। भाजपा जैसा भरोसेमंद,सुख-दुःख में हमेशा साथ निभानेवाला साथी छूटा और नया साथी सौतन को छोड़ नहीं रहा है। ऐसे में बिहार में आगामी चुनावों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति अर्थात् भाजपा,कांग्रेस-राजद-लोजपा और जदयू के बीच हो सकती है जो किसी भी तरह नीतीश जी के लिए शुभ नहीं होगा। वैसे भी अब जनता के बीच लगातार बढ़ते सत्ता-विरोधी आक्रोश को भी उनको अकेले ही झेलना होगा। इस समय यह बताना संभव नहीं है कि नीतीश जी के मन में चल क्या रहा है लेकिन इतना तो निश्चित है कि भाजपा के हटने का शासन-प्रशासन पर बहुत-ही बुरा प्रभाव पड़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा के मंत्री काफी योग्य थे और सुधार भी सिर्फ उन्हीं विभागों में देखने को मिल रहा था जिसके मंत्री भाजपाई थे।
                                                       मित्रों,पिछले 26 दिनों से नीतीश कुमार एक साथ एक दर्जन से अधिक विभागों के मंत्री हैं (क्योंकि भाजपाई मंत्रियों के सारे विभाग अभी उनके पास ही हैं) और मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अभी तक विभिन्न आयोगों और निगमों में काबिज भाजपा नेताओं को भी उनके पदों से नहीं हटाया है जिससे प्रदेश के राजनैतिक हलकों में कई सवाल उठने लगे हैं। क्या वे फिर से राजग में वापसी करने जा रहे हैं या उनको मंत्रिमंडल-विस्तार से पार्टी में विद्रोह का भय सता रहा है? उनको जो भी करना है जल्दी में करें तो अच्छा होगा उनके लिए भी और राज्य के लिए भी क्योंकि देरी करने से शासन-प्रशासन में सन्निपात की स्थिति और भी ज्यादा गहरी होती जाएगी जिसके दुष्परिणाम सीधे-सीधे चुनाव-परिणामों में परिलक्षित होंगे।

10.7.13

जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

आजकल हर किसी पर फेसबुक फीवर छाया हुआ है। पत्रकार हों या बेकार, स्टूडेंट्स हों या कामगार, तथाकथित पढ़े-लिखे हों या गंवार, कामकाजी हो या घरेलू शायद ही कुछ लोग होंगे, जो मामूली टेक्नोसेवी होने के बावजूद इस नेटवर्किंग साइट से न जुड़े हों। इनमें ज्यादातर लोग मूल्यों को ताक पर रखकर अपडेट हिट और लाइक्स के लिए जूझते नजर आते हैं। एक पत्रकार होने के नाम पर इस फेसबुकिया नाम की खुजली मुझे भी लग गई, फिर क्या था शुरू हो गया सिलसिला। लेकिन, हाल की एक घटना ने मन क्षीण कर दिया। 
एक मित्र कुछ हफ्ते पहले बनारस (काशी) की कमियां गिनाते हुए अपडेट कर दिए कि वहां तो गंगा में लाशें बहाई जाती हैं, कब डुबकी लगाते वक्त आपसे कोई लाश टकरा जाए। उस वक्त मैंने उन्हें टोका- भाईसाहब वहां लाशें बहाई नहीं जलाई जाती हैं, संभव है कहीं दूर दराज से लहरों में भटक आई कोई लाश तैरती दिख जाए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप काशी की गंगा में लाशें तैराने लगें। बाद में मैंने उन्हें फोन पर भी टोका कि फेसबुक विश्वमंच है, इस पर अपने शहर या देश की कुंठित तस्वीर न रखें। 
बहरहाल, यह तो एक पहलू था। हाल में, उन्होंने बनारस की तारीफों में लिपटे कई अपडेट किए और बनारस से इश्क तक की बात कर डाली, लोगों को भी बनारस में डूबकर महसूस करने की सलाह दी। इस बार मैंने रिएक्शन दिए बगैर और किसी का नाम लिए बिना खुद अपडेट किया कि एक शहर से नफरत करने वाले उसे प्यार कैसे करने लगे। शायद यह टीआरपी का खेल है, जो गिरगिट की तरह रंग बदलने वालों ने शहर को अपनी लोकप्रियता का माध्यम बना लिया। यह कुछ नहीं, टीआरपी का खेल है। बस, फिर क्या था! शुरू हो गई शाब्दिक जंग और वे सीधे-सीधे नाराजगी जताने लगे। 
इतना ही नहीं, उन्होंने यह चिढ़ पहले मेरे अपडेट पर रिएक्शन देकर निकाली, फिर अपने लगातार अपने अपडेट देने लगे। वे ऐसे नाराज हुए जैसे यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा हो और मैं उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक रहा हूं। बहस को अजीबो-गरीब मोड़ देते हुए वे शहर और शख्सियत की पड़ताल पर उतर आए। साथ में शुरू हो गई लॉबिंग, उन्होंने कई सहयोगियों को साथ लपेटा और जुट गए साबित करने पर कि मैं बेवजह उन्हें झुठला रहा हूं। 

दोहरे चरित्र का भयानक रूप 

कुल मिलाकर मैं समझ गया कि यह इंटरनेट है ही ऐसी चीज, जो कुछ भी उलट-पलट कर सकती है। यही वजह है कि उत्तराखंड में महाप्रलय आया, तो तमाम मीडिया ने अपने-अपने तईं उसे उछाला, परोसा। किसी ने इस मानवीय आपदा से खबर चुराई, तो कोई पुराने और झूठे वीडियो दिखाकर टीआरपी बढ़ाया। यही दृश्य फेसबुकियों के टीआरपी बढ़ाने की तकनीक में दिखा। बनारस से जुड़े अपडेट में शहर का भला हो, न हो! मित्रों के अपडेट पर अपडेट होते गए, लाइक्स और कॉमेंट्स की संख्या बढ़ती गई। आखिरकार, मैंने सोचा कुछ भी बोल, लिखकर पीछा छुड़ाओ! अन्यथा इस फेसबुक के चक्कर में बरसों पुरानी मित्रता लडख़ड़ा जाएगी। फिर एक गजल की लाइन मन में कौंध गई- 
जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा!!

-सर्वेश पाठक 

सुशासन में आकाशकुसुम हुआ न्याय-ब्रज की दुनिया

 
क्या पुष्पम की आत्मा को मिल पाएगा न्याय?

मित्रों,जब ग्राम+पोस्ट-राहतपुर,थाना-बलिया,जिला-बेगूसराय निवासी बलराम सिंह ने वर्ष 2002 में अपनी फूल से भी ज्यादा नाजुक पुत्री पुष्पम का हाथ ग्राम+पोस्ट-हरखपुरा,थाना-गढ़पुरा,जिला-बेगूसराय निवासी चिरंजीवी मुरारी राय के हाथों में सौंपा था तब उन्होंने यह सपनों में भी नहीं सोंचा था कि एक दिन इन्हीं हाथों से उनकी पुत्री की दो-दो बच्चों की माँ बन जाने के बाद चंद रूपयों की मांग को उनके द्वारा पूरा न कर पाने के कारण हत्या कर दी जाएगी। उन्होंने सोंचा तो यह भी नहीं था कि सुशासन की पुलिस मोटी रिश्वत खाकर उनके बजाए उनकी बेटी के हत्यारों की ही पैरोकार हो जाएगी और उनकी बेटी तो क्या उसकी आत्मा तक को भी न्याय नहीं मिल पाएगा।
               मित्रों,बलराम बाबू ने जो सपने में भी नहीं सोंचा था वही हुआ और हकीकत में हुआ। 10/11 मई,2013 की रात में उनकी बेटी पुष्पम को उसके पति और परिवारवालों ने मिलकर मार डाला और चुपके से उसका दाह-संस्कार भी कर दिया। सूचना मिलते ही उन्होंने हत्या का मुकदमा भी किया (केस नं.-46/2013,थाना-गढ़पुरा,जिला-बेगूसराय),डीएसपी उपेन्द्र प्रसाद के यहाँ वीडियो कैमरे के सामने बिटिया की ससुराल के 7 लोगों से गवाही भी दिलवाई लेकिन हुआ कुछ भी नहीं,यहाँ तक कि हत्यारों को गिरफ्तार भी नहीं किया गया। थक हारकर जब वे डीएसपी श्री प्रसाद के यहाँ गुहार लगाने पहुँचे तो पूरे परिदृश्य को ही उल्टा पाया। डीएसपी ने उनको कार्रवाई का आश्वासन तो नहीं दिया लेकिन समझौते के लिए दबाव खूब डाला। यहाँ तक कि हत्यारों से उनकी अपने मोबाईल पर बात भी करवाई और अपने सामने बिठाकर फोन पर उनको गालियाँ भी सुनवाई। उसी दिन डीएसपी कार्यालय के एक स्टाफ ने कार्रवाई के लिए उनसे मोटी रकम की मांग की। बाद में मुकदमे के अनुसंधान पदाधिकारी ने भी उनसे समझौता कर लेने को कहा और यह भी कहा कि वह उनको इसके बदले अच्छी-खासी रकम दिलवा देगा। साथ ही यह धमकी भी दी कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वो मामले को आत्महत्या का मामला बना देगा। अब बेचारे बलराम बाबू,सपरिवार चारों तरफ से असहाय हैं। मन में क्षोभ और गुस्से का लावा उबल रहा है। उनका बस चले तो वे पूरे सरकारी तंत्र को ही जलाकर राख कर दें। आज हत्या को पूरे 2 महीने हो चुके हैं और सुशासन बाबू की पुलिस ने (मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद बिहार के गृह मंत्री भी हैं) हत्यारों की गिरफ्तारी तक नहीं की है और शायद कभी करेगी भी नहीं।
                    मित्रों,पुष्पम का मामला तो सिर्फ एक नमूना है बिहार पुलिस की महानता का। सारे मामलों को तो सात समंद की मसि करौं और लेखनी सब बनराई करके भी स्वयं गणेश जी भी नहीं लिख सकते। बिहार के प्रत्येक थाने में चाहे वो घोषित रूप से आदर्श हों या नहीं सत्य और ईमानदारी के प्रतीक गाँधी जी की तस्वीर जरूर टंगी होती है। ऊपर दीवार पर गाँधी की तस्वीर लगी होती है और उसके ही नीचे बैठकर गाँधी का लेन-देन किया जाता है,व्यापार किया है। थानों में एक पंक्ति भी मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी होती है कि क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ? जबकि वास्तव में लिखा हुआ यह होना चाहिए कि क्या मैं हत्यारों की सहायता कर सकता हूँ? अथवा क्या मैं आपको तंग कर सकता हूँ? अथवा क्या मैं आपको लूट सकता हूँ?
                                  मित्रों,काफी साल पहले मैंने कादम्बिनी पत्रिका में चंबल के मशहूर डाकू मोहर सिंह का साक्षात्कार पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर गाँव का पटवारी ईमानदार रहे तो पूरे चंबल क्षेत्र में कोई बागी नहीं बनेगा। मैं कहता हूँ कि अगर हमारी पुलिस ईमानदार हो जाए तो पूरे भारत में कोई नक्सली नहीं बने और नहीं रहे और साल लगते-लगते नक्सलवाद सिर्फ इतिहास की किताबों में सिमटकर रह जाए। लेकिन ऐसा होगा क्या? जिस देश और प्रदेश में नेताओं द्वारा अधिकारियों की पोस्टिंग रिश्वत लेकर की जाती हो,तबादलों ने उद्यम का रूप ले लिया हो,जहाँ अच्छे अफसरों को (उदाहरणस्वरूप शिवदीप लांडे,अरविन्द पांडे वगैरह) शौक से शंटिंग करके रखा जाता हो वहाँ ऐसा कदापि नहीं होगा। वहाँ तो बस यही होगा कि इसी तरह पुष्पम जलाई जाती रहेंगी,इसी तरह डीएसपी की सहानुभूति पीड़ितों के बजाए पीड़कों के साथ बनी रहेगी और जीवित या मृत पुष्पमों के लिए न्याय इसी तरह आकाशपुष्प बनी रहेगी।

पगथिया: सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश

पगथिया: सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश:  आज की दुनियाँ की सबसे बड़ी समस्या है मैं सफल हो जाऊं चाहे साधन कितना भी अनर्थकारी क्यों ना हो और दु...

9.7.13

तबाही के निशां हमेशा रहेंगे अब सबक लें!

-नेताओं को बयानबाजी, हवाई दौरो व बाबाओं को चुप्पी के लिये याद रखा जायेगा।
-सेना को फर्ज अदायगी के लिये लोग कभी नहीं भुला पायेंगे।
समुंद्र तल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ में आयी मौत की तबाही को सदियों तक याद रखा जायेगा। अब की पीढ़ी न रहेगी तो काला इतिहास दर्ज रहेगा। खास बात यह भी कि नेताओं को बयानबाजी, सिर्फ हवाई दौरे क
रके हवा में ही दर्द समझने व अरबपति ब्रांडेड संतों-बाबाओं को चुप्पी के लिये हमेशा याद रखा जायेगा। दूसरी तरफ राहत का सबसे बड़ा आपरेशन चलाने वाली सेना ने जिस जज्बे के
साथ अपने फर्ज को निभाया उसे भी कभी नहीं भुलाया जा सकता। महत्वपूर्ण सवाल यह भी कि क्या इससे कोई सबक भी लिया जायेगा? प्रकृति को गुस्सा क्यों आया?
आपदा को तो नहीं रोका जाता लेकिन लोगों को बचाया जा सकता था। जाहिर है लापरवाही सरकारी तंत्र की भी रही है। लोगों ने भी केदारनाथ को पिकनिक केंद्र बना दिया। धर्म के नाम पर कम घूमने के लिये लोग ज्यादा जाते थे। कड़वा सवाल ही सही लेकिन बताये कि तीन साल का बच्चा क्या धार्मिक यात्रा पर जा रहा था। लोग इंटरव्यू में बता रहे थे कि हम वहां घूमने गए थे। धर्म के गढ़ में अधर्म की लीला, रासलीला क्या-क्या नहीं हुआ। 50 साल पहले केदारनाथ की तस्वीर देखिए। कितना शांत था। बस चंद बाबाओं की झोपड़ियां। बाद में विकास के पंख लग गए। अनगिनत लोगों की मौत के साथ ही उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके का ढांचा ही गड़बड़ा गया। सभी स्तर बुरी तरह प्रभावित हैं। सैंकड़ों पुल, सड़कें सरकारी-गैर सरकारी इमारतें सबकुछ तबाह। तबाही के निशां अभी बाकी हैं। यह लोगों के दिल-ओ-दिमाग से कभी नहीं मिटेंगे। यूं भी कुछ जख्मों के मरहम ओर ऐसे दर्द की दवा नहीं हुआ करती।-----सेना को फर्ज, नेताओं को हवाई यात्रा व लड़ने ओर बाबाओं को चुप्पी के लिये हमेशा याद रखा जायेगा। ब्रांडेड अरबपति बाबाओं, उनके चेले-चपाटों, समाज-धर्म के ठेकेदारों की चुप्पी भी राज रही। दर्द के तूफान को लोगों ने झेला।

पांच बार से हारने वाले सिवनी विस क्षेत्र के इंका ग्रामीण पृष्ठभूमि के बाईस टिकटार्थी हुये लामबंद
जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह की पहल लायी रंग
सिवनी।जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष ठा. धर्मेन्द्र सिंह की पहल पर ग्रामीण क्षेत्र के इंका के टिकटार्थियों की एक बैठक संपन्न हुयी जिसमें उनमें से किसी को भी टिकिट देने का प्रस्ताव पास किया गया।
सिवनी विधानसभा क्षेत्र्ा के लिय्ो कांग्रेस पार्टी केे ३८ नेताओं ने टिकिट की मांग की है। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया है कि पार्टी हाईकमान द्वारा उनका आग्रह न माने जाने की स्थिति में जिस किसी भी व्य्ाक्ति को पार्टी का उम्मीदवार बनाय्ाा जाय्ोगा उसे विजय्ाी बनाने के लिय्ो जीतोड मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोडी जावेगी।
इस बैठक में ३८ में से जो २२ दावेदार एकत्र्ाित हुय्ो थे वे सभी मूलतः ग्रामीण परिवेश से जुडे हुय्ो हैं। उनके पैतृक घर और कारोबार सभी कुछ गांव पर निर्भर हैं। य्ाद्यपि इनमें से कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने बाल बच्चों के भविष्य्ा को ध्य्ाान में रखकर नगरीय्ा परिवेश में भी निवास करते हैं। किंतु है वे मूलतः ग्रामीण ही और इसी आधार पर य्ो सभी लोग इन २२ में से किसी एक को पार्टी की टिकिट दिय्ो जाने की मांग को लेकर आगामी १२ जुलाई को केन्द्रीय्ा मंत्र्ाी कमलनाथ से मिलने छिंदवाडा पहंुचने वाले हैं।
आज की बैठक में ग्रामीण परिवेश से जुडे जो २२ लोग एकमत होकर शामिल हुय्ो थे उनमें सर्वश्री रमेश जैन,आरिफ  खान, गुलाब साहू, श्रीमती फ रिदा अंसारी, धर्मेन्द्र सिंह ठाकुर, चंद्रभान सिंह बघेल, बसीर खान, बहादुर सनोडिय्ाा, पदम सनोडिय्ाा, शिवराम सनोडिय्ाा, आशा सनोडिय्ाा, कविता कहार, कीरतसिंह बघेल, आदित्य्ा सिंह, मृत्य्ाुंजय्ा सेंगर, मोहन चंदेल, सेवकराम चंद्रवंशी, श्रीमती रंजीता बघेल, जय्ादीप सिंह बैस व ओम प्रकाश तिवारी का समावेश है। ३८ में से कुल ग्रामीण परिवेश के २४ दावेदार हैं। जिनमें दिलीप बघेल और प्रदीप राय के आने का उल्लेख किया गया हैं।
बैठक में उपस्थित इन २२ लोगों ने आपस में विचार विमर्श करने के बाद जिन तथ्य्ाों को पार्टी के हाईकमान और वरिष्ठ नेताओं को अवगत कराने का निर्णय्ा लिय्ाा है उसके अनुसार सिवनी विधानसभा क्षेत्र्ा में ७॰ से ८॰ प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्र्ा के हैं और इसी आधार पर वे य्ाह चाहते हैं कि इस बार पार्टी की टिकिट ग्रामीण परिवेश से जुडे व्य्ाक्ति को ही दी जाय्ो। बैठक में यह भी बताया गया कि 1985 में ग्रामीण परिवेश के रमेश जैन को टिकिट देने और उनके जीतने के बाद भी सन 1990 से सभी नगरीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाये गये और कांग्रेस तभी से चुनाव हार रही हैं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 1990 में स्व. हरवंश सिंह को टिकिट दी थी और वे चुनाव हार गये थे। 
इन्हें नहीं माना गया ग्रामीण परिवेश का
सिवनी। जिला कांग्रेस में सिवनी विस क्षेत्र के लिये टिकिट मांगने वाले नेताओं को ग्रामीण परिवेश का नहीं माना गया। इनमें श्रीमती पुष्पा रमेशचंद जैन,जकी अनवर खान, राजकुमार खुराना, राजा बघेल,हाजी सोहेल पाशा, संजय ारद्वाज, मो.असलम खान,घनश्याम जड़ेजा,श्रीमती नेहा सिंह,अजय पेशवानी,सुश्री हेमलता जैन, श्रीमती अल्पना राणा, खुमान सिंह,जयकिशोर वर्मा,विजय चौरसिया के नाम शामिल हैं। इस बैठक को लेकर कांग्रेस से टिकिट मांगने वाले नेताओं के बीच इस बात को लेकर जमकर चर्चायें जारी हैं कि गांव और शहर की बात चलने के पीछे आखिर कारण क्या है,इसे कौन शह दे रहा हैं और अंततः इससे किसको लाभ होगा?  
बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि उनके इस आग्रह के बाद भी य्ादि पार्टी किसी अन्य्ा व्य्ाक्ति को अपना उम्मीदवार बनाती है तो भी य्ो सभी २२ लोग उसे विजय्ाी बनाने में अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रहने देंगे। उपस्थित दावेदारों ने कहा है कि पार्टी को विजय्ाी बनाने का संकल्प लेने ही आज वे मातृधाम में अपनी इस बैठक को आय्ाोजित किय्ो हैं और माता राजराजेश्वरी के सामने संकल्पबद्घ हो गय्ो हैं।
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले 
09 जुलाई 2013 से साभार 

अत्यंत घिनौने कृत्य के आरोप में स्तीफा देने वाले  वित्त मंत्री राघवजी का पुतला जलाया कांग्रेसियों ने 
 बीते दिनों जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक बरघाट में सम्पन्न हुयी। इस बैठक में राहुल गांधी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक पल्लब लोचनदास भी उपस्थित थे। राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान ब्लाक और जिला संगठन के पदाधिकारियों द्वारा कोई अधिकार नहीं होने की शिकायत की थी। कांग्रेस आला कमान द्वारा प्रत्याशी चयन जैसे महत्वपूर्ण को में ब्लाक और जिला कांग्रेस कमेटियों को यह अधिकार दिया गया था। लेकिन एक दूसरे से बुराई ना होने के चक्कर में संगठन ने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा। इन दिनों प्रदेश का राजनैतिक तापमान एकदम से बढ़ गया हैं। इसकी तपिश ने प्रदेश के 80 वर्षीय बुजुर्ग वित्त मंत्री राघवजी की बलि ले ली हैं। राजधानी के हबीबगंज थाने में उनके एक नौकर रामकुमार दांगी ने उन पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाते हुये शपथ पत्र दिया। इसके बाद पटेरिया,ताजकुमार के पिता और उसके भाई के बयान आदि केस को कमजोर करने वाले साबित होंगें। नपा उपाध्यक्ष राजिक अकील के साथ अन्य युवा कांग्रेसियों ने भी राघवजी का पुतला जलाया।गौगपा के रोको,टोको और ठोंको अभ्यिान का पहला शिकार मुनमुन राय हो गये हैं। सिवनी विस क्षेत्र के एक गांव से उन्हें गौगपा के कार्यकर्त्ताओं ने गांव में घुसने नहीं दिया और बेरंग वापस जाने के लिये मजबूर कर दिया। यह समाचार अखबारों में सुर्खियों में इसलिये आ गया क्योंकि पिछले विस चुनाव में मुनमुन ने लगभग 30 हजार वोट लेकर कांग्रेस को तीसरे नंबंर पर ढ़केल दिया था।
जिला कांग्रेस ने अलाकमान को किया अधिकृत-बीते दिनों जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक बरघाट में सम्पन्न हुयी। इस बैठक में राहुल गांधी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक पल्लब लोचनदास भी उपस्थित थे। यह बैठक आगामी विधानसभा चुनाव के लिये कि जिले के चारों विस क्षेत्रों के लिये कांग्रेस के प्रत्याशियों के चयन के लिये रखी गयी थी। बताया जा रहा था कि इस बैठक में हर विस क्षेत्र से तीन तीन उम्मीदवारों का पैनल बनाना था। उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान ब्लाक और जिला संगठन के पदाधिकारियों द्वारा कोई अधिकार नहीं होने की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि इसी को ध्यान में रखते हुये कांग्रेस आला कमान द्वारा प्रत्याशी चयन जैसे महत्वपूर्ण को में ब्लाक और जिला कांग्रेस कमेटियों को यह अधिकार दिया गया था। लेकिन एक दूसरे से बुराई ना होने के चक्कर में संगठन ने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा। जिला कांग्रेस कमेटी की इस बैठक मे सख्ती के साथ इस बात का ध्यान रखा गया था कि जिले के पदाधिकारियों के अलावा अन्य नेता बैठक में शामिल ना हों। इसीलिये सिवनी नगर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री संतोष उर्फ नान्हू पंजवानी से जिला इंका अध्यक्ष हीरा आसवानी ने अधिकृत नेताओं के नामों की सूची को पढ़वाया। बैठक में सिवनी के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना और प्रसन्न मालू भी शामिल हो गये थे लेकिन पर्यवेक्षक द्वारा उन्हें बाद में मिलकर अपनी बात रखने को कहा और वे बैठक से बाहर चले गये। वैसे जिला इंकाध्यक्ष ने जिले के सभी पूर्व प्रत्याशियों को बरघाट आमंत्रित किया था और कहा था कि बैठक के बाद पर्यवेक्षक आपसे चर्चा करेंगें। कांग्रेसी हल्कों में चर्चा है कि जब दो पूर्व प्रत्याशियों को बैठक में शामिल नहीं होने दिया गया तो फिर एक दर्जन से अधिक जिला कांग्रेस के महामंत्री होने के बाद भी पदाधिकारियों की सूची नगर कांग्रेस के महामंत्री से क्यों पढ़वायी गयी जबकि वे इस बैठक में शामिल होने की पात्रता भी नहीं रखते थे।  राहुल गांधी और आला कमान के निर्देश और गाइड लाइन भले ही पूरे प्रदेश के लिये लागू हो लेकिन जिले में इसको धता बताने में किसी को संकोच नहीं हुआ। इतनी महत्वपूर्ण बतायी जाने वाली इस बैठक में एक मात्र दो लाइन का प्रस्ताव पास करके सभी आवेदन कांग्रेस आला कमान को भेज दिया गया तथा जिला कांग्रेस की ओर से उन्हें अधिकृत कर दिया गया। बैठक के बाद पर्यवेक्षक से मिलकर पूर्व प्रत्याशी आशुतोष वर्मा, राजकुमार पप्पू खुराना,प्रसन्न मालू और नपा अध्यक्ष के पूर्व प्रत्याशी संजय भारद्वाज ने चर्चा कर राजनैतिक स्थिति से अवगत कराया।
अत्यंत घिनौने आरोप में नप गये राघवजी-इन दिनों प्रदेश का राजनैतिक तापमान एकदम से बढ़ गया हैं। इसकी तपिश ने प्रदेश के 80 वर्षीय बुजुर्ग वित्त मंत्री राघवजी की बलि ले ली हैं। राजधानी के हबीबगंज थाने में उनके एक नौकर रामकुमार दांगी ने उन पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाते हुये शपथ पत्र दिया और साथ में एक सी.डी. भी पुलिस को सौंप दी हैं। उसने अपने शपथपत्र में कहा है कि यह सी.डी. उसके दोस्त ने बनायी है। मूल दस्तावेज लेने वो जो गया है तो उसका पता नही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के निर्देश पर राघवजी का स्तीफा मंजूर हो गया है।स्तीफे के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और विदिशा के ही भाजपा नेता एवं प्रदेश के पूर्व निगम अध्यक्ष शिवशंकर पटेरिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस लेकर यह दावा किया कि यह सी.डी. उन्होंने बनवायी है और वे भाजपा से गंदगी साफ करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने 22 सी.डी. बनवायीं हैं। प्रदेश भाजपा ने पटेरिया को निलंबित कर दिया है। इसके बाद दो दिनों से लापता राजकुमार के पिता ने मीडिया को यह बयान देकर सबको चौंका दिया है कि उनका पुत्र मांसिक रूप से बीमार है और उसने पहले भी एक बुजुर्ग आदमी पर ऐसा इल्जाम लगाकर उसके पैसा वसूला था। उसके पिता ने यह प्रमाणपत्र भी दे डाला कि राघवजी उसके पुत्र को बेटे की तरह रखते थे। इसके साथ ही राजकुमार के भाई ने विदिशा जिले के कुरवायी थाने में यह रिपोर्ट दर्ज करायी है कि मांसिक रूप से बीमार उसका भाई तीन महीनों से लापता हैं। अब यहां एक सवाल यह उठना स्वभाविक ही है कि यदि राजकुमार तीन तहीनों से लापता था तो भोपाल में राघवजी के खिलाफ शपथपत्र देने और दो दिनों से लापता होने के बाद ही उसके भाई के द्वारा यह रिपोर्ट क्यों दर्ज करायी गयी? अब राजकुमार ने खुद मीडिया के सामने आकर यह बयान दिया है कि उसके पिता और भाई को धमकी देकर यह सब कराया जा रहा हैं। विधि के विशेषज्ञों का यह मानना है कि थाने में शपथपत्र के साथ राजकुमार द्वारा आवेदन देने के बाद ऐसे तमाम बयान केस को कमजोर करने वाले साबित होंगें और भाजपा तथा प्रदेश सरकार अपने बुजुर्ग नेता राघवजी को बचाने के लिये ये सारे दांव पेंच खेल रही है। राघवजी के विरोध में पूरे प्रदेश में कांग्रेसी उनके पुतले जलाकर उनके खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग कर रहें हैं। इसी क्रम में नपा उपाध्यक्ष राजिक अकील के साथ अन्य युवा कांग्रेसियों ने भी राघवजी का पुतला जलाया। मुख्य प्रश्न तो यह है कि आखिर राजनीति के शिखर में बैठे ऐसे जिम्मेदार नेता ही ऐसा आचरण और अपना चरित्र पेश करेंगें तो उनके अनुयायी और युवा पीढ़ी आखिर किस बात के लिये प्रेरित होंगें?
गौगपा ने मुनमुन को गांव में घुसने नहीं दिया-गौगपा के रोको,टोको और ठोंको अभ्यिान का पहला शिकार मुनमुन राय हो गये हैं। सिवनी विस क्षेत्र के एक गांव से उन्हें गौगपा के कार्यकर्त्ताओं ने गांव में घुसने नहीं दिया और बेरंग वापस जाने के लिये मजबूर कर दिया। यह समाचार अखबारों में सुर्खियों में इसलिये आ गया क्योंकि पिछले विस चुनाव में मुनमुन ने लगभग 30 हजार वोट लेकर कांग्रेस को तीसरे नंबंर पर ढ़केल दिया था। उल्लेखनीय है कि मुनमुन इस बार फिर कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाने लिये चुनाव लड़ना चाह रहें हैं। अभी यह कहना मुश्किल हैं कि मुनमुन की सेंधमारी उन्हें जिताने लायक साबित होती हैं या फिर भाजपा को जिताने में मददगार होती है? गौगपा के ऐसे तीखे तेवरों से यह अंदेशा हो रहा है कि पिछले चुनाव में छपारा ब्लाक की 34 पंचायतों में मुनमुन ने आदिवासियों के काफी वोट ले लिये थे वो अब संभव हो पायेगा या नही? आदिवासी और मुस्लिम वोटों के भरोसे इस बार मुनमुन कितनी सेंधमारी कर पायेंगें? यह कहना फिलहाल संभव नहीं हैं। “मुसाफिर“

साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले 
09 जुलाई 2013 से साभार 

8.7.13

पगथिया: संवेदना

पगथिया: 
संवेदना:
सेठजी अपने आलिशान ऑफिस में बैठे अपने व्यवस्थापकों से राय मशवरा कर रहे थे। चर्चा का विषय था कि उनकी प्रतिस्पर्धी कम्पनियों को कि...

7.7.13

भगवान और बाजार

भगवान और बाजार 

सृष्टि कर्ता के अलावा भी तीन भगवान इस संसार में है 1.माता -पिता ,गुरु और डॉक्टर .इस
युग में ये भी कम ज्यादा मात्रा में बाजारवाद के कुचक्र में फँस गए हैं या फँसते जा रहे हैं।

माता पिता का दायित्व होता है कि वे अपनी सन्तान को गुणवान बनाएँ लेकिन अफसोस है
कि वे भी केवल आर्थिक हित को साधने की कला को ही अपनी संतान के लिए सर्वोपरी मानते
हैं चाहे हित योग्य रीति से पूरा हो या अयोग्य अनैतिक बाजारुपन से।

अगर पिता व्यापारी है तो उसे अच्छे व्यापारी के गुण नहीं सिखाता है उसे ईमानदार ,कर्तव्य-
निष्ठ या संवेदनशील नहीं बनाता है बल्कि ग्राहक को कैसे मिट्ठी बातों में फांस कर उसका
धन हड़पना है या कैसे उसे माप तोल में कम देना है यह परोक्ष -अपरोक्ष रूप से सीखा देता है

अगर पिता नौकरी पेशा वाला है तो पुत्र को लगन और मेहनत की जगह कैसे भ्रष्ट तरीके से
अनैतिक कमाई की जाती है और कैसे कम काम करके भी पूरा पैसा वसूला जाए यह जरुर
सिखा देता है।

कला और पेशे से जुड़े माँ -बाप चार पाँच साल के बच्चे को भी फूहड़ और अश्लील गानों पर
नचाना शुरू कर देते है यानी कि अर्थ के इर्द गीर्द जीवन को घुमाया जा रहा है।

गुरु ,यह शब्द ही कभी अँधेरे में उजाला भर देने की सामर्थ्य रखता था।गुरु का केवल कभी
एक ही ध्येय रहता था कि वह अपनी पाठशाला में राम ,कृष्ण ,अर्जुन ,चन्द्रगुप्त जैसे योग्य
नागरिक का निर्माण करे मगर आज गुरु की जगह पेशेवर शिक्षक ने ले ली है जिसका खुद
का उद्देश्य केवल बच्चों से पेसा अर्जित करना रह गया है।बड़े-बड़े स्कुल कॉलेज ,ट्यूशन
क्लास बनते जा रहे हैंऔर उनसे पैसा बनाने की जुगत बिठायी जा रही है।जो बच्चे पढ़ रहे
हैं उनसे धन वसूलना ही उद्देश्य रह गया है चाहे उसका भविष्य संवरे या बिखरे उससे दूर
तलक कोई लेना देना नहीं है

डॉक्टर और वैद्य -डॉक्टर को जीवन दाता समझा जाता है।रुग्ण ,असक्त ,हताश और निराश
जीवन में आशा भर देता हैडॉक्टर मगर इस युग में जैसे सब कुछ बहता जा रहा है धन के
सामने।बड़े बड़े डॉक्टर,आधुनिक सुसज्जित भवन और उपकरण मगर संवेदन हिन लोगों
का जमावड़ा ही नजर आता है सब जगह।रोगी को ठीक तरह से जांचने से पहले ही अपनी
फीस ले लेना और आधुनिक उपकरणों के जरिये रोगी को भय दिखा कर उसका धन हडफना
बिना जरूरत की दवाईयाँ देना और अनावश्यक जांचे करवाना और शल्य क्रिया करना ये
हिन काम करते डॉक्टर खूब देखें जा रहे हैं।

हर जगह बाजारी करण ,क्या हो गया है मानव को ,अर्थ के इर्द गीर्द दौड़ती असभ्यता को
विकास कहे या पतन .....समझ नहीं आता!!

उपरोक्त तीनों भगवान् यदि वर्तमान में ऊपर लिखी सच्चाईयों के घेरे से बाहर अभी भी
बचे हुए हैं वो वास्तव में देव पुरुष हैं जिन्हें मेरा सादर प्रणाम ..........              

5.7.13

स्मिता भादुड़ी फर्जी एनकाउंटर में आजाद हैं पुलिसकर्मी।

-12 साल से इंसाफ का इंतजार
स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर केस जब मैंने वर्ष 2000 में लिखा, तो सोचा नहीं था कि उसके परिजन इंसाफ के इंतजार में बूढ़े हो जायेंगे। स्मिता का मामला जांच के बाद अब सीबीआई कोर्ट में चल रहा है।  दरअसल बीकॉम कर रही छात्रा स्मिता भादुड़ी को मेरठ पुलिस के दौराला थाने के कथित होनहार तीन पुलिसकर्मियों ने उस वक्त गोली मार दी थी जब वह अपने दोस्त मोहित त्यागी के साथ जा रही थी। इंस्पेक्टर अरूण कौशिक ने कंट्रोल रूम को सूचना भी दी कि उनके व मारूति जैन कार में सवार बदमाशों के बीच गोलीबारी हो रही है इसलिए अतिरिक्त फोर्स भेजा जाये। फोर्स मौके पर गया तो हकीकत पता चली कि कार सीट पर बैठी स्मिता के सीने को पुलिस की गोली ने भेद दिया था। पुलिस ने 11 राउंड फायर किये थे। तीनों पुलिसवाले मुकदमा दर्ज होने पर थाने से फरार हो गए थे। हालांकि बाद में वह जेल गए। उन दिनों काफी हंगामें के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी की गंभीरता के बाद जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। 13 साल होने को हैं, परमोशन व मेडल की चाह में मासूम छात्रा के खून से हाथ रंगने व फर्जी मुठभेड़ को अंजाम देने वाले पुलिसकर्मी आजाद हैं। स्मिता के परिवार के दर्द की भरपाई शायद ही कभी हो सके। 

4.7.13

वाह !अब खाद्य सुरक्षा

वाह !अब खाद्य सुरक्षा 

पहले गरीबी हटाओ ,खूब फेशन चली थी उस जमाने में ,जबरदस्त हथकंडा था कुर्सी पर
विराजने का ,काम भी आया ,क्योंकि खुबसूरत सपना था मगर हश्र यह हुआ कि काठ की
हांडी बन गया।

फिर लाये आर्थिक उदारीकरण ,खूब चला ,पढ़े लिखे भी मुर्ख बन गए हश्र यह हुआ कि बाप
की सम्पति को बेच बेच कर बेटा धनवान दिखने का अभिनय करने लगा और नतीजा यह
कि सब कुछ ठप्प .....

चासनी पीने की आदत वाली जनता को बाद में इन्वेस्टमेंट के नाम पर शेयर का धंधा
बताया ,रातों रात करोडपति बनिए और काम भी मत कीजिये ,वाह! क्या खुबसुरत झूठ
था और खूब चला ,चाय की केंटिन वाला भी शेयर की बात करता था सा'ब और जब फुग्गा
फुटा तो दिन में तारे दिख गए जनाब को ...

मुर्ख बनाने के हजार तरीके होते हैं सा 'ब ,अब नया तुक्का ले आये -रोजगार गारंटी,भाई
को करना कुछ नहीं गड्ढे खोदो और आराम से रूपये ले जाओ ,मरे हुए ,पैदा भी नहीं हुए
और जिन्दे सबने मजा लिया नतीजा जो रोटी रूपये में मिल जाती थी वह पाँच की हो गई
और अरबों रूपये गड्ढों में गिर गए .......

इस बार धार पर थी नारी ...बेचारी भावुक ,बोले कि आप बराबरी करे ,आधी दुनियाँ आपकी
मुठ्ठी में ,शासन में आधा भाग आपका ,बस बात इस तरह उड़ी कि कुर्सी चल कर पास आ गई
और साहब विराजमान हो गए और परिणाम यह की शासन तो दूर की बात ,घर से निकलते
ही डरने लगी .........

फिर मथने लगे तस्वीर बनाने ,सब के सब लग पड़े और ऐसी तस्वीर बनाने लगे कि बेचारा
किशोर समय से पहले जवाँ दिखने लगा ,अब क्या था सब उसके कंधे पर ,माथे पर जहाँ
जगह मिली उस पर सवार होने लगे ,बेचारा किशोर ...बेहाल हो गया और समय से पहले
बोझ से दब गया ........

जो वोट बैंक थी उसे गुमराह करने लगे ,मगर वह भी अब शिक्षित हो गयी ,भला बुरा विचार
सकने की समझ पैदा कर ली और नतीजा यह कि साहब की कुर्सी के पाए चरमरा गए और
कुर्सी लुढकने लगी ............

अब आई नयी नवेली खाद्य सुरक्षा ,बत्तीस और छब्बीस की गणित का सवाल हल करने की
बारी ,छब्बीस और बत्तीस को असल में धनवान बनाने का वादा ,क्या हश्र होगा ,भविष्य के
हाथों तय होगा मगर इस खाद्य सुरक्षा ने एक सच्चाई देश के सामने उगल दी कि इस देश के
67% लोग अजीबोगरीब धनवान हैं जो बाजार भाव से अन्न खरीद सकने की स्थिति में नहीं
है .......
 और अंतिम बात समर्थन मुल्य पर ख़रीदे गए अन्न को पानी में भिगोने की ,साहब के पास
उस अन्न को बचाने की काबिलियत भी नहीं ,बड़े बुजुर्ग ने कहा -67% तथाकथित धनवानों
में बाँट दो,मगर कौन सुने ,क्यों सुने ,आखिर सवाल कुर्सी की बनावट का है ........