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18.6.23

फरमानो की नाफ़रमानी अफ़सरशाही का शग़ल रहा है !


सत्येंद्र कुमार

पहले के राजाओं महाराजाओं के राज्य और सल्तनतें भी काफी दूर दूर तक फैली होती थी । बड़े से बड़े और छोटे से छोटे सूरमाओं के सल्तनतों में हुक्म देने और हुक्म बजा लाने की फटाफट रवायत थी । हुक्म की नजरअंदाजी और नाफरमानी पर ऐसे कठोर दंड का प्रावधान था जिसे सोचकर रूह काँप जाती थी । शायद यही वजह थी कि हुक्म की नाफ़रमानी  करने की मजाल किसी अफसरशाही में नही थी । आज के समय में भी देखा जाए तो अफसरशाही की मुश्कें कसने में पूर्व सी एम  मायावती जितनी कामयाब रहीं शायद ही कोई और सी एम उतना कामयाब रहा हो । 

आज इस भीषण प्रचण्ड गर्मी में सूबे के मुखिया द्वारा बिजली विभाग को प्रदेश भर में निर्बाध तरीके से बिजली आपूर्ति का जो आदेश अभी कुछ दिन पहले ही दिया गया था, उस आदेश को भी बाकी आदेशों की तरह नाफ़रमान अफसरों के अहंकार और निकम्मेपन ने रद्दी में फेंक दिया है । जिलों में संचालित अवैध स्टैंड तथा अवैध शराब को लेकर जारी सी एम के आदेश का भी वैसा ही हश्र हुआ है, जैसा हश्र उन आदेशों का हुआ, जिसमे अधिकारियों को अपना सी यू जी नंबर खुद उठाने और 10 बजे सुबह कार्यालय पहुँच जाने के लिए आदेशित किया गया था। 

आज यूपी में बिजली सप्लाई की बुरी हालत है । लखनऊ में भी चौदह चौदह घंटे की कटौती जोरों पर है । यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत बदतर है । जिलों में भी चौदह से अट्ठारह घंटे की करामाती कटौती हो रही है । ग्रामीण क्षेत्रों में तो महज कुछ घंटे ही बमुश्किल बिजली मिल पा रही है । भीषण गर्मी में जनता गर्मी से चित्कार कर रही है और बिजली संकट का हाहाकार मचा हुआ है ।

स्थिति यह है कि हालात से उपजे बदहालियों औऱ मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद भी अफसर नहीं सुधर रहे हैं । आई. ए. एस. अफसरों ने बिजली विभाग का भट्ठा बैठा दिया है ।कहीं कोई कार्रवाई नहीं है और न ही किसी की कोई जबावदेही है । अफसरों के अहंकार और निकम्मेपन ने अन्य व्यवस्थाओं की तरह बिजली व्यवस्था को भी आज कितना पंगु बना दिया है इसका अहसास सबको हो चला है । बिजली विभाग में दर्जनभर से ज्यादा आई. ए. एस. तैनात हैं लेकिन फिर भी बिजली विभाग की मनमानी को नियंत्रित कर पाना टेढ़ी खीर बना हुआ है । बिजली व्यवस्था सुदृढ़ करने की बजाय काम में अड़ंगा लगाने और फाइलों से पैसा बनाने की अफ़सरशाही प्रवृत्ति और दिलचस्पी ने बिजली विभाग का बेड़ा गर्क कर दिया है। बिजली सप्लाई समान्य कैसे हो इसपर ध्यान नहीं है और मंत्री के एक्शन का भी अफसरों पर कोई असर नहीं है । भीषण गर्मी से पूर्व विभागीय तैयारियों का हाल ऐसा है कि गर्मी से पहले ट्रांसफार्मर्स के आयल तक नहीं बदले गए। 

आदेशों को अनसुना करने की प्रवृत्ति यदि ऐसी ही बनी रही तो मूसलाधार बरसात से पूर्व बन्धों की मरम्मत की तैयारियों का भी बंटाधार होना तय है । हालात यह हैं कि ओवरलोडिंग और प्रॉपर मेंटेनेन्स के आभाव में रोजाना लगभग हजार से ज्यादा ट्रांसफार्मर दग जा रहे हैं और अफसरान हैं कि आपसी गुटबाजी और अहंकार में भ्रष्टाचार के नए नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैँ । हुक्म की नाफ़रमानी वाली प्रवृति आज अफ़सरशाही में इतना भयंकर रूख अख़्तियार कर चुकी है कि नाफरमान अफ़सरशाही को जिल्ले इलाही , सुल्तान, महाराज जी या मुख्यमंत्री के फ़रमान की नाफ़रमानी का कोई खौफ़ बाकी नही रह गया है ।

16.6.23

News18 Punjab/Haryana Presents Education Summit: Exploring the Future of Learning with Artificial Intelligence

News18 Punjab/Haryana Presents Education Summit: Exploring the Future of Learning with Artificial Intelligence

 

Chandigarh, 16th June, 2023 — News18 Punjab/Haryana, the No.1* news channel of the region, is thrilled to announce the Education Summit, a pioneering event aimed at fostering discussions on leveraging technology to revolutionize education. The summit will take place in Chandigarh on 17th June, serving as a platform for educators, experts, and thought leaders to delve into the transformative potential of Artificial Intelligence (AI) in the field of education.

The Education Summit will serve as a catalyst for exploring pioneering solutions and strategies that can revolutionize the quality of education. With a specific focus on the theme "Artificial Intelligence (AI) and the Future of Learning," the summit will delve into the potential of AI in reshaping the landscape of education, equipping students with the necessary skills for a rapidly evolving future.

With a strong focus on innovation and the enhancement of education quality, the Education Summit seeks to spark conversations and highlight the role of technology in shaping the future of learning. The event will showcase panel discussions featuring esteemed guests and representatives from renowned educational institutes in the region, including Dr. Ajay Batish, Deputy Director of Thapar Institute of Engineering & Technology; Dr. Lalit Awasthi, Director of NIT, Uttarakhand; Dr. Padmakumar Nair, Director of Thapar Institute of Engineering & Technology; Dr. Rajeev Ahuja, Director of IIT Ropar; Kanwardeep Kaur, Senior Superintendent of Police, Chandigarh; Group Captain (Retd.) Sangeeta Kathait; Kamal Wadhera, CEO of TCY Online; Dr. Manbir Singh, Pro Vice-Chancellor of C T University; Dr. VK Rattan, Vice-Chancellor of GNA University; and Lieutenant General (Retd.) Deependra Singh Hooda.

The Education Summit will delve into the myriad possibilities presented by AI and its impact on the future of education. Attendees can expect in-depth discussions on how AI can be harnessed to drive innovation, enhance teaching methodologies, and create a personalized learning experience for students. The summit will explore practical solutions and shed light on successful AI implementations in educational institutions.

Tune in to News18 Punjab/Haryana on 17th June at 5:30 PM to watch the Education Summit. This conclave is a testament to News18 Punjab/Haryana's commitment to promoting educational advancements and driving positive change in the region.

 

*Source: BARC, TG: 15+, Period: Wk 23'23, Market: Pun/Cha, AMA 000's, 5 Channels Considered


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जीवन रक्षक दवाओं के दाम 12%बढ़ाने का फैसला रद्द करो


सकल घरेलू उत्पाद का 05% स्वास्थ्य के लिए आवंटित करो

आज दिनांक 16 जून 2023 दिन शुक्रवार को उत्तर प्रदेश उत्तराखंड मेडिकल एन्ड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन (UPMSRA) के आवाहन पर ग़ाज़ीपुर इकाई ने अपनी 7 सूत्रीय मांगों को लेकर दवा प्रतिनिधियों की विशिष्ट आम सभा बड़ीबाग़ स्थित कार्यालय पर आहूत की।
    
बैठक को संबोधित करते हुए प्रदेश सचिव साथी आर0एम0 राय ने बताया कि कोरोना महामारी की मार झेल चुकी जनता पर दवा कंपनियों द्वारा  पहले 10.7% की बढ़त के साथ मंहगी जीवन रक्षक दवाओं का बोझ डाला गया है और फिर तुरंत बाद 12.12% की मनमानी वृद्धि करते हुए आम जन को मंहगी दवाओं का तोहफा दिया है।
     
दवा प्रतिनिधियों के संगठन युपीएमएसआरए और एफएमआरएआई द्वारा इसके विरोध में आगामी 19 और 20 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी के माध्यम से प्रेषित करने और एक पत्रक के माध्यम अपनी मांग और जनता से जुड़ी तमाम परेशानियों जिनमें दवाओं के बढ़ते दाम और उन पर जीएसटी की दरों को संशोधित करने, मेडिकल उपकरणों पर से जीएसटी हटाने,  वार्षिक बजट में केन्द्रीय स्वास्थ्य बजट को 2.4%  से बढ़ाकर कम से कम 5% करने, जनता की स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्धि करने, स्वास्थ्य  क्षेत्रों की स्थिति सुधारने संबंधी बातों का जिक्र है को वितरित करने की योजना सुनिश्चित की गई है।
 
सभा का उद्घाटन करते हुए ईकाई अध्यक्ष चंदन कुमार राय ने दवा के बढ़ते दामों से हो रही दुश्वारियों का जिक्र किया। राज्य कार्यकारिणी सदस्य काम. अफजल ने दवा प्रतिनिधियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हुए बताया कि नेशनल फार्मासीयूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NELM) में शामिल 800 से ज़्यादा जीवन रक्षक दवाओं के दाम 12.12% बढ़ाने का आदेश दिया है इससे एन्टी बायोटिक  व तमाम हृदय, डायबिटीज, कैंसर, HIV व किडनी रोग की दवाओं के दाम में बेतहाशा बढ़ोत्तरी होगी। पिछले साल NPPA ने NELM में शामिल 800 से ज़्यादा जीवन रक्षक दवाओं का दाम 10.7% बढ़ाने का आदेश दिया था, जिसमे हमारी मांग है कि दवाओं से GST शून्य की जाए व उनके डैम कम किये जाएं ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
नैथक में साथी ए0के0 जैन ने  विभिन्न दवा कम्पनी के मालिकान द्वारा हम दवा प्रतिनिधियों के ऊपर हो रहे हमलों पर विस्तृत प्रकाश डाला। 
बैठक में ज़िला मंत्री मयंक श्रीवास्तव ने साथियों से 19 जुन के कार्यक्रम को सफल बनाने का आवाहन किया।
   
सभा में साथी ज्योति भुषण, बि.के. श्रीवास्तव, हरिशंकर गुप्ता, संजय विश्वकर्मा, ए.के. जैन, रईस आलम, दिग्विजय, विकास, शिवम, मोहित, विशाल, अमरनाथ श्रीवास्तव, राजु श्रीवास्तव, निकेत, अविनाश, हेमंत, रितेश , निज़ामुद्दीन, सर्वेश मिश्रा, अंकित वर्मा, आरपीएस यादव, एस0के0 राय, एम0पी0 राय, सौरभ राय, सूरज विश्वकर्मा, सुनील गुप्ता, रामाश्रय, अभिषेक तिवारी, रविकांत तिवारी, रितेश दत्त पांडेय, आशीर्वाद सिंह, हिम्मत राय, कमलेश, अम्बिकेश, प्रेमचंद प्रिंस मोदनवाल, अनिल यादव, अविनाश चौहान, अविनाश शर्मा, शेखर राय, विशाल जायसवाल, राकेश त्रिपाठी समेत सैकड़ों साथियों ने प्रतिभाग किया, अध्यक्षता साथी चंदन राय व संचालन साथी मयंक श्रीवास्तव ने किया।

द्वारा:- चंदन कुमार राय
जिलाध्यक्ष upmsra ग़ाज़ीपुर
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15.6.23

भास्कर को क्या हो गया

जिले भर में चर्चा : माफिया के आगे घुटने टेक गया दैनिक भास्कर

यमुनानगर : मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है लेकिन लगता है कि विज्ञापनों और नोटों के लालच में इसका मानवीय डावांडोल होने लगा है।

दरअसल यमुना नगर के ताजकपुर क्षेत्र में बड़ी संख्या में आज पकड़ी गई थी तथा बकायदा उसकी वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी लेकिन दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने इस खबर को बेहद हल्के अंदाज में प्रकाशित किया है जिसे लेकर जिले भर में चर्चा है लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने में माहिर माना जाने वाला यमुनानगर का प्रतिष्ठित समाचार पत्र दैनिक भास्कर लगता है इन दिनों इस पर काफी नरम रुख अपना रहा है। 

चर्चा है कि बड़ी संख्या में जिस क्षेत्र में खाद के कट्टे पकड़े गए वहां बकायदा पुलिस मौके पर पहुंची थी 112 के साथ-साथ थाना सदर की पुलिस भी वहां पहुंची और उसकी वीडियो भी वायरल हुई लेकिन भास्कर ने इस समाचार को चर्चा कहकर डालने का प्रयास किया और यह भी लिख दिया कि कोई कार्रवाई नहीं हुई जबकि इस मामले में खाकी ने मामला भी दर्ज कर लिया है इस खबर को लेकर काफी चर्चा इस संबंध में दैनिक भास्कर के ब्यूरो चीफ से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया लेकिन वे उपलब्ध नहीं हो सके उनके पक्ष का हमें इंतजार रहेगा।


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नहीं करने का मैं तक़रीर, अदब से बाहर…

पंकज चतुर्वेदी-


कवि केदारनाथ सिंह का कथन है कि मिर्ज़ा ग़ालिब अंग्रेज़ों के भारत में आने के बाद सबसे बड़े भारतीय कवि हैं। उन्होंने मुझसे एक बार कहा कि ग़ालिब ऐसे कवि हैं, जिनके दीवान को आप अपने तकिये के पास रखना चाहेंगे, जो उनकी शाइरी से हो जाने वाली एक अनिवार्य मुहब्बत का सुबूत है। बहुत कम कवियों को यह सौभाग्य हासिल होता है।

आज जिनका भारतीय संस्कृति पर दावा है, वे भले अपनी संस्कृति भूलकर अधिकाधिक अभद्र, उद्दंड और हिंस्र होते जा रहे हों; लेकिन ग़ालिब के लिए संस्कृति का एक साफ़ मतलब यह भी है कि 'अदब का उल्लंघन करके मैं अपनी बात नहीं कह सकता और मर्म को मैं भी जानता हूँ, मगर उसके इज़हार को लेकर मेरे भीतर एक संकोच रहता है।' कहने की ज़रूरत नहीं कि यह संकोच हमेशा एक बड़े रचनाकार की निशानी है :

'नहीं करने का मैं तक़रीर, अदब से बाहर 
मैं भी हूँ वाक़िफ़-ए-अस्रार, कहूँ या न कहूँ'
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Yashwant Singh
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पिटे-खिसके हुए, फूके हुए कारतूसों व रंग-रंगीली होगी मोदी की चुनावी टीम

*आचार्य विष्णु हरि सरस्वती* 
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दस दिन से बैठकें जारी, रफू-तुरपायी के बाद भी छेद ही छेद

केन्द्रीय सत्ता परेशान है, हताश है, निराश है, उसे रास्ता मिल नहीं रहा है, चुनावी कार्य योजना में दम नहीं मालूम हो रहा है। इसलिए लिस्ट बार बार फट रही है, कार्ययोजना की कागजें बार-बार फाडी जा रही है। रफू या तूरपायी चढ़ाने के बाद भी रास्तों व कार्ययोजनाओं में छेद ही छेद दिख रहे हैं।
            
इसी कारण केन्द्रीय मंत्रिमंडल का पुर्नगठन रूका है और पार्टी की केन्द्रीय कमिटी में फेरबदल रूका हुआ है। जब तक चुनावी रास्ता चाकचौबंद नहीं होगा, कार्ययोजना चाकचौबंद नहीं बनती तब तक बैठकें जारी रहेंगी।
        
 हिमाचल प्रदेश में हार के बाद जगत प्रसाद नड्डा से विश्वास उठ गया है, उनकी कार्यक्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसी तरह कर्नाटक में हार के बाद बीएल संतोष पर विश्वास उठ गया है। अध्यक्ष और संगठन मंत्री मिलकर ही चुनाव की कार्ययोजना बनाते हैं। ये पिटे हुए और सिसके हुए मोहरे हैं, फूके हुए कारतूस हैं। 
          
नड्डा और वीएल संतोष ने जो 2024 चुनाव के महाराथी तय कर रहे हैं, वे सबके सब बूझे हुए कारतूस हैं, दलबदलू हैं, या फिर रंग-रंगीला और छबीला हैं, विष कन्याएं हैं। ऐसी रंग-रंगीली लिस्ट देख कर नरेन्द्र मोदी का गुस्सा सातवें आसमान पर हैं। नड्डा और बीएल संतोष द्वारा बनायी गयी सूची को जब नरेन्द्र मोदी की लिस्ट जांचने बैठती है तो पता चलता है कि ये दलबदलू हैं, घिसे-पिटे हुए हैं और अति प्रोफेशनर हैं। मोदी की टीम लिस्ट और योजना को बार-बार खारिज कर रही हैं। कहने का अर्थ यह है कि कार्यकर्ता मिल नहीं रहे हैं।
           
दस साल के शासन काल में जिन लोगों को भी जिम्मेदारियां दी गयी, सत्ता दी गयी वे सभी लूटने और खाने में लग गये, अपने परिवार, अपनी जाति की भलाई करने में लग गये। इनके लिए हिन्दुत्व गयी भांड में। हर जगह कांग्रेसी वर्चस्व कायम रहा। मीडिया से लेकर एनजीओ ही नहीं बल्कि सरकार के हर क्षेत्र में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों का कब्जा बना रहा। कार्यकर्ता घर बैठ गये। कार्यकर्ताओं का सिद्धांत ही बदल दिया गया।
            
मोदी चाहें जितना भी लिस्ट बदलवा लें, जितनी भी कार्ययोजनाएं तैयार करा लें लेकिन उन्हें अपने मन की टीम और योजना कहां से मिलेगी? नड्डा और बीएल संतोष आदि लड़ने वाले और हवा बनाने वाले बलिदानी जत्था खोज कर कहां से लायेगें? कार्यकर्ता बलिदानी क्यों बनेंगे जब नड्डा, बीएल संतोष सहित अन्य सभी रंग-रंगीली हैं।
       
मोदी की 2024 की चुनावी टीम रंग-रगीली ही होगी, फूके हुए कारतूसों, पिटे हुए और खिसके हुए तमाशबाज ही मोदी के चुनावी सेनानी होंगे।

आचार्य विष्णु हरि सरस्वती
मोबाइल ... 9315206123
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14.6.23

प्रो शशिकला के खिलाफ शिकायत पर उप राष्ट्रपति सचिवालय ने लिया संज्ञान

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय भोपाल

भोपाल । माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्विद्यालय भोपाल के कुलसचिव को उप राष्ट्रपति सचिवालय से 20 अप्रैल 2023 को पत्र भेजकर प्रो शशिकला की विभागाध्यक्ष बनाए जाने व पदोन्नति के नियमों की अनदेखी किए जाने की शिकायत की गई थी जिसे संज्ञान में लिया गया है। 

मालूम हो कि चंडीगढ के डॉक्टर आशुतोष मिश्र ने इस संबंध में शिकायत की थी जिसमे यूजीसी द्वारा भी विश्विद्यालय को उचित कार्यवाही करने के लिए कहा गया था। 

डॉक्टर मिश्र ने बताया कि उप राष्ट्रपति सचिवालय से उन्हें भी ये पत्र मिला है जो विश्विद्यालय के कुल सचिव को प्रेषित है तथा उनके 19 अप्रैल को भेजे गए ईमेल पर अनुरोध का निराकरण करने की बात कही गई है।

Dr.  Ashutosh
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दैनिक जागरण आईनेक्स्ट प्रकाशन की मनमानी

एकेडमिक से पत्रकारिता में आए रिपोर्टर देवेश पांडे ने 14 मार्च 2022 को दैनिक जागरण आईनेक्स्ट वाराणसी जॉइनिंग किया ।यहां पर इनकी नियुक्ति बतौर रिपोर्टर हुई। 15 महीने से अधिक समय तक लगातार धमाकेदार, ताबड़तोड़ ,एक्सक्लूसिव, ब्रेकिंग खबरें देते रहे जिससे बनारस में आईनेक्सट की साख बनी रहे। 

इसी बीच आईनेक्सट प्रकाशन के द्वारा देवेश पांडे के अवकाश पर रहने पर टर्मिनेशन का मेल भेज दिया गया। जबकि पारिवारिक कार्यों को ध्यान में रखते हुए देवेश पांडे 1 जून को ही संपादक मनोज वार्ष्णेय को मेल करते हुए अवकाश लिए थे।

इसके बाद भी मैनेजमेंट और रीजनल हेड धर्मेंद्र सिंह अपनी मनमानी जारी रखें। इस दौरान मनोज वार्ष्णेय एवं धर्मेंद्र सिंह के द्वारा के 6 महीने पर प्रोबेशन से कंफर्मेशन होने का फॉर्म भरवा लिया गया इसके बाद भी इनका कंफर्मेशन नहीं किया गया। 

यहां तक की हद तब कर दी टर्मिनेशन मेल में उन्होंने बताया है कि हमने 2 बार लगातार 8 महीने तक प्रोबेशन पीरियड बढ़ाया और रिपोर्टिंग में सुधार नहीं है। जबकि यूनिट हेड मनोज वार्ष्णेय रीजनल हेड धर्मेंद्र सिंह के द्वारा कभी भी मेल या नोटिस देकर के कार्यों के बारे में नहीं बताया गया। या कार्य से संतुष्ट नहीं है ।इसके बारे में नहीं कहा गया। 

इसके बाद अचानक से अपनी गंदी राजनीति और मिलीभगत करते हुए आईनेक्सट मैनेजमेंट कानपुर को अपनी सांठगांठ में लेते हुए छुट्टी के दौरान 3 जून को 6:39 पर टर्मिनेशन मेल चला दिया।इसके बाद से 15 दिन बीत जाने के बाद भी ना ही टर्मिनेशन लेटर नाही एक्सपीरियंस लेटर नाही सैलरी स्लिप और ना ही मई माह की तनख्वाह जारी की। ऐसे में आई नेक्स्ट प्रकाशन मैनेजमेंट गंदी राजनीति के लिए सदैव जाना जाएगा। 
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वर्दी की लालच और ठसक ने योगी सिटी में ले ली एक और जान

सत्येंद्र कुमार-

गोरखपुर : जिस पुलिस को योगी राज में अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए फ्री हैंड किया गया था आज वही पुलिस अपने कारनामो से लोगों के बीच आतंक का पर्याय बनती जा रही है । सी एम सिटी के बांसगांव थानाक्षेत्र में आज उस वक्त एक व्यक्ति की मौत हो गयी जब पुलिस उस व्यक्ति के घर उसे पकड़ने पहुँची थी । 

बताया जा रहा है कि मृतक का अपने पाटीदारों से जमीनी विवाद चल रहा था । मृतक 308 आई पी सी के मुकदमे में वांछित था । प्रत्यक्षदर्शियों व परिजनों का कहना है कि बांसगांव थानेदार दीपक सिंह बार बार मृतक से एक लाख रुपये मांग रहे थे और कह रहे थे कि रुपये दे दो तो समझौता करा दूंगा । एक पार्टी ने रुपये दे दिए लेकिन मृतक रुपये नही दे पाया था । मुकदमे में वांछित होने के बहाने आज सुबह पुलिस मृतक के घर पहुँची और पुलिस ने दौड़ा कर उस व्यक्ति को पकड़ना चाहा। भागम भाग में जब मृतक जमीन पर गिरा तो पुलिस ने पहले उसकी वहीं पिटाई की। वहाँ की पिटाई से पुलिस का मन नही भरा तो फिर थाने ले जाकर उसकी आवभगत की गई । 

पुलिसिया क्रोध मुलजिम के भागने की वजह से बढ़ा हुआ था कि रुपये न देने की वजह से यह तो नही पता लेकिन पुलिसिया आवभगत इतनी ज्यादा कर दी गयी कि मृतक की तबियत बिगड़ गयी । तबियत बिगड़ने पर बांसगांव पुलिस ने मृतक को सरकारी अस्पताल भेजा जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया । 
दूसरी तरफ बांसगांव सर्किल के पुलिस अधिकारी वही अपना पुराना पुलिसिया राग अलाप रहे हैं कि भागते वक्त मृतक की गिरने से मौत हो गयी है और पोस्टमार्टम कराया जा रहा है वगैरह..वगैरह । मतलब किसी जाँच से पहले ही बांसगांव पुलिस और थानेदार बांसगांव को क्लीन चिट दे दी गयी है । क्लीन चिट देने वाले यह भी भूल चुके हैं कि इन्ही बांसगांव थानेदार पर पहले भी एक क्षेत्रीय अपराधी को पैसे के लालच में संरक्षण देने का तथा उस अपराधी को बचाने के लिए अदालत के सामने गलत रिपोर्ट पेश करने का आरोप लगा था । इस मामले की जाँच वर्तमान एस पी सिटी गोरखपुर द्वारा की गई थी । उस जाँच का क्या हुआ किसी को कुछ नही पता । बस इतना पता है कि जाँच कराने वाले व्यक्ति से पलिस ने निजी खुन्नस पाल ली तथा जाँच अधिकारी एस पी सिटी ने जाँच कराने वाले व्यक्ति को उसके बयान की रिसविंग तक देना भी उचित नही समझा । नतीजतन जाँच ठंडे बस्ते में डाल दी गयी । अगर उस वक्त यह जाँच सही तरीके से हो जाती तो आज शायद मृतक का परिवार अनाथ होने से बच गया होता !

उपलब्ध तस्वीरें तथा स्थानीय सूत्र बताते हैं कि दीपक सिंह थानेदार का हौसला इसलिए इतना ज्यादा बुलंद होता गया क्योंकि यहां के एक बड़े स्थानीय समाचार पत्र के पत्रकार से उनकी बड़ी घनिष्टता रही है । अक्सर ये तमाम बड़के स्थानीय पत्रकार थानेदार दीपक सिंह की निजी पार्टियों में शरीक होते कैमरों में कैद हुए हैं । इसी घनिष्टता का असर रहा है कि तमाम थ्री स्टार लोग साहब के कार्यालय में फाइलें ढोते रहे और दीपक सिंह टू स्टार होते हुए भी आउट ऑफ टर्म जाकर थानेदारी की मलाई काटते रहे ।
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Gautam Gambhir's Exclusive Interview Uncovers the Intersection of Cricket, Politics, and Controversies

New Delhi, 13th June 2023 - News18 India, India's No.1* Hindi news channel, conducted an exclusive interview with Gautam Gambhir, a renowned cricketer turned politician. In a conversation with the channel's senior anchor and top journalist Amish Devgan, Gambhir delved into the realms of cricket and politics, addressing critical issues and controversies that have captured the public's attention.


During the interview, Gambhir expressed his unwavering dedication to the country, highlighting that he ventured into politics driven by a genuine desire to make a tangible difference, rather than seeking mere social media popularity. He emphasized the importance of action and ground-level work over empty tweets from air-conditioned rooms.

Shifting the focus to the Delhi government, Gambhir raised valid concerns about the promises made by the current administration and their lacklustre track record in fulfilling those promises. He questioned the lack of transparency surrounding the establishment of schools, colleges, and hospitals in the past eight years.

With a deep-rooted connection to Delhi, Gambhir highlighted his profound love for the city. He stressed the futility of engaging in self-praise, emphasizing that genuine achievements should be recognized by the public, not self-proclaimed.

Addressing the allegations against him, Gambhir dismissed them as baseless. He raised questions about the intentions behind the excise policy and the alleged diversion of funds for electoral purposes. Gambhir also voiced concerns about the government's failure to secure bail for its ministers, despite claims of innocence.

Reflecting on the transformative power of the Indian Premier League (IPL), Gambhir acknowledged its impact on shaping the future of cricket. He highlighted how the tournament has provided a platform for emerging talent and extended the careers of players.

Sharing his observations on Indian cricket, Gambhir expressed concern about the nation's individual-centric approach. He lamented the lack of team spirit and attributed India's failure to win an International Cricket Council (ICC) championship to this obsession with individual performances.

In an era dominated by social media, Gambhir cautioned against becoming consumed by virtual platforms and emphasized the need to maintain a healthy balance. He warned against relying on superficial validation from these platforms and highlighted the importance of avoiding addiction in any form.

Gambhir also revealed his principled stance on not succumbing to monetary incentives for creating biased narratives. He affirmed his commitment to utilizing funds for the betterment of the people, rather than indulging in self-serving storytelling.

Addressing the controversies surrounding the Ekana Stadium incident, Gambhir stood by his actions and expressed his support for Naveen ul Haq, emphasizing his unwavering commitment to righteousness and justice.

Setting aside personal differences, Gambhir expressed respect for his fellow cricketers, including Virat Kohli and MS Dhoni, emphasizing the importance of keeping on-field battles confined to the field and maintaining professionalism. He praised Yuvraj Singh as an underrated cricketer and voiced his opinion on the media's failure to adequately recognize Yuvraj's contributions to Indian cricket.

In conclusion, Gambhir highlighted how the media's obsession with individuals and marketing strategies has distorted the true essence of the game, overshadowing the accomplishments of deserving players.

*SOURCE: BARC | METRIC: AMA | TG: NCCS ALL 15+ | PERIOD: WK 22'23, 24 HOURS, ALL DAYS | MARKET: HSM

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सावधान: ऊपरवाला सब देख रहा है!

 
रजनीश कपूर-

देश की एक नामी सीसीटीवी कंपनी ने अपने विज्ञापन में एक लाइन को प्रमुखता दी 'ऊपरवाला सब देख रहा है'। इस कंपनी का उद्देश्य था कि उनके सीसीटीवी कैमरे की निगाह से कोई नहीं बच सकता। परंतु आज हम जिस संदर्भ में इस बात को कह रहे हैं वो सरकार द्वारा जनता पर नज़र रखने से संबंधित है। यह एक ऐसा विषय है जो आप सभी को सोचने पर मजबूर कर देगा।
 
आपने देश के कई शहरों यातायात पुलिस द्वारा लगाए गये स्पीड कैमरे देखे होंगे। जो भी वाहन चालक स्पीड का क़ानून तोड़ता है। लाल बत्ती पार करता है। लाल बत्ती पर वाहन को स्टॉप लाइन के आगे खड़ा करता है। बिना हेलमेट के दुपहिया वाहन चलाता है या ऐसा कोई अन्य उल्लंघन करता है जो ट्रैफ़िक पुलिस के कैमरों में क़ैद हो जाता है तो उसके घर पर एक चालान पहुँच जाता है। ऐसे चालान आजकल ऑनलाइन भी चेक किए जा सकते हैं जहां पर फ़ोटो द्वारा ट्रैफ़िक नियम तोड़ने का प्रमाण भी दिखाई देता है। ज़ाहिर सी बात है कि जब से ऐसे चालान काटने शुरू हुए हैं जनता काफ़ी सतर्क हो गई है। इससे ट्रैफ़िक नियम उल्लंघन में काफ़ी कमी भी आई है।
 
अब बात करें एक अन्य कैमरे की जो हम पर नज़र रखे हुए है। यह कैमरा पुलिस विभाग द्वारा नहीं लगाया गया है। बल्कि यह कैमरा है ही नहीं। बिना कैमरे की यह निगरानी आयकर विभाग द्वारा रखी जाएगी। इन दिनों ज़्यादातर लेन-देन जब ऑनलाइन हो रहे हैं तो हमें काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है। सतर्क केवल ऑनलाइन फ्रॉड करने वालों से नहीं बल्कि अपने द्वारा खर्च की जाने वाली रक़म पर भी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम जितनी भी ऑनलाइन ख़रीदारी करें वो हमारे खातों में दिखाई देगी। इसलिए आयकर विभाग की इन सब लेन-देन पर नज़र बनी रहेगी।
 
आजकल देश भर में एक से बढ़कर एक लक्ज़री गाड़ियों की भरमार है। पिछले कुछ वर्षों में सड़कों की स्थिति काफ़ी बेहतर हुई है। एक के बाद एक एक्सप्रेसवे जनता के लिए खोले जा रहे हैं। जब गाड़ियाँ और सड़कें बेहतर होंगी तो ज़ाहिर सी बात है कि लोग घूमने या अन्य कामों से अपने घरों से निकलेंगे भी। यहाँ प्रश्न उठता है कि इस सब से आयकर विभाग को क्या? इस सब से हमें सतर्क रहने की क्या ज़रूरत है? तो इसका जवाब है आपकी गाड़ी पर लगा 'फ़ास्ट टैग' जो आपके वाहन को किसी भी टोल नाके से बिना देर लगाए पार करवा देता है।
 
जब भी आप किसी टोल नाके को पार करते हैं तो आपकी गाड़ी पर लगे 'फ़ास्ट टैग' की मदद से टोल का भुगतान हो जाता है। हर वाहन चालक समय-समय पर अपने वाहन पर लगे 'फ़ास्ट टैग' को रिचार्ज भी करता रहता है जिससे कि कम बैलेंस के चलते वाहन को टोल पार करने में कोई दिक़्क़त न हो। परंतु क्या आपने इस बात पर ग़ौर किया है कि जैसे ही आपकी गाड़ी टोल से पार होती है और आपके खाते से टोल की रक़म कटती है तो उस लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रख लिया जाता है। इस रिकॉर्ड के कई फ़ायदे हैं। यदि आपका वाहन चोरी हो जाता है और किसी टोल नाके को पार करता है तो वाहन को पकड़ने में भी मदद मिल जाती है। यदि आपने टोल को पास नहीं किया और फिर भी आपका टोल कट गया है तो आप इसी रिकॉर्ड के माध्यम से काटे गए ग़लत टोल को चुनौती भी दे सकते हैं। पुलिस द्वारा कुख्यात अपराधियों को पकड़ने में भी टोल नाके पर लगे कैमरे अक्सर मददगार साबित होते हैं।
 
इसी श्रृंखला में अब 'फ़ास्ट टैग' आयकर विभाग की मदद भी करने लगेगा। मान लीजिए कि किसी ने छुट्टी मनाने की नियत से एक रोड ट्रिप प्लान किया। इस रोड ट्रिप में उनकी एक दिशा की यात्रा लगभग 700 किलोमीटर की है। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी लंबी यात्रा में वे आरामदायक गाड़ी ही लेकर जाएँगे। मिसाल के तौर पर एक अच्छी एस.यू.वी गाड़ी। ऐसी गाड़ी की ईंधन की खपत आराम से निकाली जा सकती है। जैसे ही यह गाड़ी टोल नाके से पार होगी सो ही उसका पूरा डाटा टोल नाके के कंप्यूटर पर क़ैद हो जाएगा। पूरी यात्रा के टोल से ही अनुमान लग जाएगा कि गाड़ी कितने किलोमीटर चली। सवाल उठता है कि इस सबसे आयकर विभाग को क्या परेशानी?
 
जब तक आप इस यात्रा में इस्तेमाल की गई गाड़ी में ईंधन अपने कार्ड से ख़रीदेंगे तब तक आयकर विभाग को इस सबसे कोई परेशानी नहीं है। लेकिन आमतौर पर यह देखा गया है कि लोग ऐसी यात्राओं पर नक़द ख़र्च करते हैं। क्योंकि कभी-कभी पेट्रोल पम्प पर कार्ड की मशीन काम नहीं करती या अन्य कोई कारण हो। परंतु यदि ऐसी यात्रा कभी-कभी कि जाती है और नक़द ख़र्चे के समर्थन में आपके पास समुचित बैंक की एंट्री है, तो कोई परेशानी नहीं। परंतु यदि आपके द्वारा की गई ऐसी यात्राओं की संख्या अधिक है, जो केवल छुट्टी मनाने के लिए नहीं है और इन यात्राओं में आपने गाड़ी में ईंधन नक़द भुगतान करके डलवाया है तो आप आयकर विभाग की निगरानी में ज़रूर आ सकते हैं। कारण स्पष्ट है आयकर विभाग इस ख़र्चे को आपकी आय से तुलना करेगा। यदि कोई विसंगति पाई जाती है तो आपको उसका उत्तर देना होगा। इसलिए यदि आप ऐसा करते हैं तो आपको सतर्क रहने की ज़रूरत है। बेहतर तो यह हो कि 'डिजिटल' युग में आप नक़द भुगतान कम से कम करें और देश को उन्नति की ओर ले जाएँ। वरना ध्यान रहे 'ऊपर वाला सब देख रहा है!'                                    
 
लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक हैं

Rajneesh Kapur
Mg. Editor
Kalchakra News Bureau

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13.6.23

उस बर्बरतम प्लान को दुनिया होलोकास्ट के नाम से जानती है!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

हिटलर जब सत्ता में आया तो उसके समर्थक नाजीवादियों ने यहूदियों की अलग पहचान के लिए एक अनूठा तरीका अपनाया। इसके तहत, उस वक्त जर्मनी में यहूदियों के घरों और दुकानों पर क्रॉस लगाना शुरू कर दिया गया। यहूदियों को अपने हाथ पर एक अलग तरह का यहूदी स्टार बैंड भी बांधने का आदेश जारी कर दिया गया। जब इन तरीकों से हिटलर की सरकार ने यह जानकारी पुख्ता कर ली कि किस क्षेत्र में कहां, कितने यहूदी हैं तब शुरुआत हुई एक ऐसे बर्बर प्लान को अंजाम देने की, जिसे दुनिया होलोकास्ट के नाम से जानती है।  

होलोकास्ट इतिहास के सबसे बड़े नस्लीय नरसंहार में से एक माना जाता है। बहरहाल, सभी को पता है कि उस वक्त किस तरह पहले यहूदियों को जर्मनी से भगाने की कोशिश हुई। लेकिन पड़ोसी देशों ने जब उन्हें अपने यहां शरण देने से मना कर दिया तो हिटलर ने बाकायदा कैंप बनवा कर यहूदियों को वहां भेजना शुरू कर दिया। फिर गोलियों, जहर, चाकू, तलवार आदि हर सम्भव तरीकों से उनकी हत्याएं की जाने लगीं। 

इस तरह से लाखों हत्याएं करने के बावजूद कैंपों में यहूदियों की तादाद बढ़ती गई तो हिटलर ने जहरीली गैसों का इस्तेमाल करके एक साथ सैकड़ों- हजारों यहूदियों का नरसंहार शुरू कर दिया। बिना बेहोश किए उन यहूदियों पर उसी तरह मेडिकल प्रयोग होने लगे, जैसे लैब में चूहे और मेंढकों पर होते हैं। 

जर्मनी में जगह- जगह मौजूद कैंप में कैद यहूदियों को तब एक चोगे में रखा जाता था। उन्हें खाने और पीने के लिए भी न के बराबर सामग्री दी जाती थी। ऐसे कैंपों और पूरे जर्मनी में तब अंदाजन 60 लाख यहूदियों का नरसंहार हुआ। बाकी जर्मनी में बचे- खुचे यहूदियों को भी सड़कों पर हत्या, बलात्कार, लूटपाट आदि करके भगाने की घटनाएं होती रहीं। 

क्रॉस से शुरू हुई यहूदियों की पहचान के सिलसिले को हिटलर ऐसे बर्बर अंजाम तक पहुंचा कर भी नहीं रुका । उस होलोकास्ट के साथ साथ हिटलर ने अपनी बर्बर व नस्ल आधारित कबीलाई मानसिकता के चलते पूरी दुनिया को सेकंड वर्ल्ड वॉर में ढकेल दिया। 

नतीजा यह हुआ कि न सिर्फ 60 लाख यहूदी नरसंहार में मारे गए बल्कि वर्ल्ड वॉर में भी लगभग सात करोड़ लोग मारे गए। वर्ल्ड वॉर ने खत्म होने से पहले जापान में दो शहरों की पूरी आबादी को परमाणु बमों के विस्फोट में साफ कर दिया तो जर्मनी में भी लगभग पचास लाख लोग मारे गए। 

हिटलर ने हार और जर्मनी की तबाही के बाद अपने सिपहसालारों के साथ आत्महत्या कर ली और रूस व मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने जर्मनी पर कब्जा कर लिया।
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रामेश्वर पांडेय : मुह में ब्राम्हण और बगल में लाल झंडा

आचार्य विष्णु हरि सरस्वती-

ब्राम्हणणवादी पत्रकारिता का बदबूदार उदाहरण थे रामेश्वर पांडेय  


मैंने घोर कम्युनिस्टों का जाति प्रेम साक्षात देखा है, ये किसी कर्मकांडी ब्राम्हण से भी घोर जातिवादी होते हैं। पत्रकारों और लेखकों में जो कम्युनिस्टों के बड़े नाम हैं वे भी घोर जातिवादी होते हैं, यह अलग बात है कि उनका असली चेहरा देखने और समझने की सबमें इच्छा ही नहीं होती है। जातिवादी चेहरे को बेनकाब कर कोई दुश्मनी मोल लेता नहीं। लेकिन मैं रामेश्वर पांडेय का जातिवादी चेहरे उजागर कर जातिवादी ब्राम्हणों के टोलीबाज-यूनियनबाज, गिरोहबाज पत्रकारों से दुश्मनी मोल ले रहा हूं। रामेश्वर पांडेय अपने आप को घोर कम्युनिस्ट ही नहीं बल्कि नक्सली स्थापित करते रहे थे पर नक्सलवाद के खोल में उनका जातिवादी चेहरा छिपा हुआ था। विचार शून्य, संवेदना शून्य इस व्यक्ति को जातिवादी ब्राम्हणों की टोली महान पत्रकार, लेखक और प्रेरणादायी शख्सियत घोषित करने में लगी हुई है।

         रामेश्वर पांडेय की अभी-अभी मृत्यु हुई है। मृत्यु एक सत्य है जो आया है वह जायेगा। भगवान का विधि विधान कहता है कि जो जिंदा में बुरा होता है वह मृत्यु के बाद भी बुरा ही होता है। इसीलिए पाप और पुण्य का विधि विधान भी है। लेकिन भडास नाम का एक मीडिया साइट और सोशल मीडिया पर जातिवादी ब्राम्हणों की टोली ने जिस प्रकार से रामेश्वर पांडेय की महिमा गायी है, झूठ का बीजारोपन किया है और जातिवाद तथा ब्राम्हणवाद का उदाहरण सामने लाया है उस पर चिंता करने की जरूरत है, व्याख्या करने की जरूरत है, मीडिया में आने वाली पीढी को यह बताने की जरूरत है कि कैसे मीडिया में ब्राम्हणवाद का खेल खेला जाता है, जाति के आधार पर किसी को कैसे महान पत्रकार बताया जाता है? रामेश्वर पांडेय का सच जानेंगे तो पायेंगे कि उनके मुंह में जाति बसी हुई है यानी कि ब्राम्हणवाद बसा हुआ है और हाथी की दांत की तरह कम्युनिस्ट बसा हुआ है।

            रामेश्वर पांडेय का ब्राम्हणवाद मैंने सरेआम देखा है, उनके ब्राम्हणवाद का सरेआम स्रोता रहा हूं। घटना आज के कोई 20 साल पूर्व की है। मैं अपने एक परिचित पत्रकार के निमंत्रण पर उनके घर पर भोजन करने पहुंचा था। सत्य प्रकाश नाम का पत्रकार उस समय दैनिक जागरण में काम करता था। मैं जब सत्य प्रकाश के घर पर पहुंचा तो पता चला कि रामेश्वर पांडेय उनके घर पर विराजमान हैं। दैनिक जागरण में काम करने वाले एक अन्य ओझा ने अचानक यह प्रोग्राम रख दिया था। बेचारा सत्य प्रकाश को मजबूरी में अपने वरिष्ठ ओझा का कहना मानना पडा और उन्हें रामेश्वर पांडेय का स्वागत करना पड़़ा।

           दारू और मांस का दौर चल रहा था। दारू जैसे-जैसे रामेश्वर पांडेय के कंठ से नीचे उतरती और मुर्गे की टांग और हड्डिया जैसे-जैसे उनके मुंह में जाती वैसे-वैसे उनका ब्राम्हणवाद जाग जाता, रामेश्वर पांडेय कहते कि मैंने जिंदगी भर ब्राम्हणों का कल्याण किया है, अमर उजाला ही नहीं बल्कि जिन-जिन अखबारों में काम किया उन-उन अखबारों में ब्राम्हणों को भरा, ब्राम्हणों की फौज खडी की, सिर्फ दिखावे के लिए एक-दो अन्य जातियों के लोगों को रखवाया और बाद में निकलवाया भी, अगर जगह नही ंतो फिर अन्य ब्राम्हणों की नियुक्ति भी कैसे कराता? जब दारू की नशा आसमान छूई और मुर्गे के मांस का स्वाद बढ़ा तो फिर उन्होंने अपने ब्राम्हणवाद की नयी-नयी जानकारियां देनी शुरू कर दी। उन्होंने कहना शुरू किया कि कैसे वे पत्रकारिता का उपयोग ब्राम्हणों को अच्छी जगह स्थानांतरण कराने, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के प्रकोप से बचाने के लिए काम किया। मैं तो हदप्रभ तब हुआ जब वे अखबारों के मालिकों के बारे में अपने ज्ञान का प्रसार करने लगे। रामेश्वर पांडेय ने ज्ञान दिया कि ये साले बनिया बहुत हरामी होते हैं, इन्हें ठीक तरह से हैंडिल करो, इन्हें भाई साहब बोलो फिर ये बनिये आपके गुलाम हो जायेंगे और पंडित जी कहकर आपकी चरणवंदना करेंगे। देश में प्रकाशित होने वाले 95 प्रतिशत बडे अखबार और बडे चैनल बनियों के, बनियों के पैसों पर रामेश्वर पांडेय जैसे ब्राम्हणों की जिंदगी चलती है, परिवार चलता है फिर भी बनियों के प्रति इस प्रकार की इनकी धृणित मानसिकता होती है, फिर आप समझ सकते हैं कि जातिवादी ब्राम्हण किस तरह के अनैतिक और मनुष्यता हीन होते हैं।

         ब्राम्हणों की पत्रकारिता की टोली ने प्रचारित किया कि रामेश्वर पांडेय अपने त्रिमूर्ति की अंतिम कड़ी थे। उनकी तिकडी या फिर त्रिमूर्ति क्या थी? रामेश्वर पांडेय, प्रमोद झा और उपेन्द्र मिश्र को त्रिमूर्ति कहा जाता था, तिकडी कहा जाता है। ये तीनों ब्राम्हण हैं। रामेश्वर पांडेय के तिकड़ी में कोई गैर ब्राम्हण नहीं था। इस ब्राम्हणों की तिकड़ी में उपेन्द्र मिश्र थोड़ा अलग थे और क्रांतिकारी जरूर थे, इसीलिए उपेन्द्र मिश्र मेरे मित्र भी थे। उपेन्द्र मिश्र का भी मत रामेश्वर पांडेय के पक्ष में नहीं होता था।

          मैंने पत्रकारिता में ब्राम्हणों की तिकड़ी, त्रिमूर्ति ही नहीं देखी है बल्कि पूरी गिरोहबंदी भी देखी है। राष्टीय सहारा में एक हस्तक्षेप डेस्क था, उस डेस्क पर कार्यरत सभी ब्राम्हण थे, जैसे अरूण पांडेय, दिलीप चौबे, विमल झा और कमलेश त्रिपाठी, इन सभी में गजब की कैमिस्टरी थी, अन्य किसी को फटकने का अवसर भी नहीं मिला। जबकि हस्तक्षेप डेस्क पर जातिवादी गिरोहबंदी बनाने वाले अरूण पांडेय, दिलीप चौबे, विमल झा और कमलेश त्रिपाठी इसके पहले किसी नामी अखबारों में काम भी नहीं किये थे।दैनिक जागरण का नेशनल चरित्र देखिये। विष्णु तिवारी के प्रिय टोली में ब्राम्हण है। प्रतीक मिश्र की टोली में ब्राम्हणों का भरमार है, सिर्फ हाथी के दांत की तरह एकाद अन्य हैं, बनिये तो इनके पास टीक ही नहीं सकते है, पिछडे और दलितों की क्या औकात। संघ के स्वयं सेवक माने जाने वाले अच्युतानंद मिश्र जब माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के चांसलर थे तो फिर ब्राम्हण होने के आधार पर कम्युनिस्टों की भी नियुक्ति करायी थी। फिर भी अच्युतानंद मिश्र संघ के विश्वास पात्र बने रहे थे और पत्रकारिता के पूज्यनीय बने रहे। 

          प्रभाष जोशी सरेआम कहते थे कि मैं ब्राम्हण हूं। प्रभाष जोशी ने सरेआम कहा था कि राहुल गांधी देश का युवराज है और वह भी एक टीवी चैनल बहस के दौरान। प्रभाष जोशी भी राहुल गांधी को ब्राम्हण मानते थे।  फिर भी किसी ने प्रभाष जोशी को इसके लिए कोसा नहीं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, राजतंत्र नहीं। प्रभाष जोशी ने लेकर अभयधर दूबे से लेकर ओम थानवी तक जितनी भी नौकरियां दिलवायी उनमें 90 प्रतिशत लोग ब्राम्हण थे। रामशरण जोशी छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों का यौन शोषण करते थे, गुंडे और दलाल छोटी-छोटी बच्चियों को उठा कर लाते थे और रामशरण जोशी उन छोटी-छोटी बच्चियों को अपने हवश का शिकार बना कर यौन इच्छा की पूर्ति करते थे। इस यौन विकृत मानसिकता के व्यक्ति को कांग्रेेस के राज में अर्जुन सिंह ने बाल संरक्षण आयोग का अध्यक्ष भी बना दिया था। ब्राम्हण होने के कारण रामशरण जोशी के इस अपराध पर कहीं कोई हलचल तक नहीं हुई। अगर रामशरण जोशी ब्राम्हण नहीं होते तो फिर वे आईकॉन नहीं बने रहते, न ही बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष बनते, अर्जुन सिंह की भी छबि धूमिल होती। पर आज कोई ब्राम्हणवादी पत्रकार आदिवासी बच्चियों की इज्जत लूटने वाले घृणित मानसिकता के रामशरण जोशी की आलोचना भी नहीं करता है।

      रामेश्वर पांडेय की मृत्यु के बाद उन्हें महान कम्युनिस्ट बताने वाले, महान पत्रकार बताने वाले लोग कौन हैं, उनकी जाति देखेंगे तो खेल समझ में आ जायेगा। 99 प्रतिशत लोग ब्राम्हण है। जैसे निशीथ जोशी, अशोक मिश्र, प्रद्यूमन तिवारी, राजू मिश्र, विजय शंकर पांडेय,अमिताभ अग्निहोत्री आदि। अगर रामेश्वर पांडेय ब्राम्हण नहीं होते तो फिर ये सभी ब्राम्हण पत्रकार रामेश्वर पांडेय जैसे समूहबाज और जातिवाद के बदबूदार उदाहरण को महान बताने की कोशिश नहीं करते।

       ब्राम्हणों की टोली कहती है कि रामेश्वर पांडेय अच्छे संपादक और अच्छे पत्रकार थे। पर ये ब्राम्हणों की टोली अपने कथन के प्रति आधार भी नहीं देती है,अच्छे पत्रकार का कोई उदाहरण भी नहीं देती हैं। उनकी कोई कालजयी लेखनी का उल्लेख किसी ने नहीं किया है, समाचार लेखन और संपादकीय लेखन का भी कोई अता-पता नहीं है। अगर वे सर्वश्रेष्ठ पत्रकार थे तो फिर उनकी सर्वश्रेष्ठ लेखनी और संपादकीय लेखन क्या-क्या थे? 

          मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रामेश्वर पांडेय अगर ब्राम्हण नहीं होते, उन्होंने ब्राम्हणों को चुन-चुन कर नौकरियां नहीं दिलवायी होती तो फिर उन्हें ब्राम्हण की टोली भी याद नहीं करती। अगर रामेश्वर पांडेय दलित, पिछडे और बनिया होते तो फिर उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने वाले भी सीमित होते, सोशल मीडिया पर महान बताने के लिए कोई आगे भी नहीं आता। रामेश्वर पांडेय कम्युनिस्ट भी नहीं थे, सिर्फ अवसरवादी थे। जैसे ही व्यक्ति जातिवाद के खोल में घूस जाता है, अनैतिकता का चादर ओढ़ लेता है वैसे ही वह कम्युनिस्ट होने या फिर मनुष्यता का सहचर होने का अधिकार खो देता है।

संपर्क
आचार्य विष्णु हरि सरस्वती
नई दिल्ली 
मोबाइल .. 9315206123
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अंग्रेज़ गए, रियासतें गईं, पर ‘राजा‘ बढ़ने लगे!

Ashwini Kumar shrivastava-

- देश में वीआईपी कल्चर कम होने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा 
- ज्यादातर वीआईपी करते हैं जनता के बीच रियासतों के राजा सा बर्ताव 

आजादी के तीन साल के भीतर देश में संविधान लागू कर दिया गया।इस मकसद से कि अब आम जनता ही नहीं बल्कि खुद को वीआईपी समझने वाले लोग भी संविधान और देश के नियम कानून के अनुसार चलें। लेकिन बाद में बनने वाली हर सरकार ने किया संविधान की इस भावना का ठीक उल्टा। 

वीआईपी कल्चर को बढ़ावा देते हुए ऐसे लोगों के लिए हर सरकार ने वेतन- भत्ते, पेंशन, सब्सिडी, सुविधाएं, मकान, गाड़ी, स्टाफ, सुरक्षा आदि में ज्यादा से ज्यादा बढ़ोतरी ही की। 
जबकि होना तो यह चाहिए था कि सरकारें धीरे-धीरे इस वीआईपी कल्चर को खत्म करती रहतीं। अब तो हालात यह हैं कि इस वीआईपी कल्चर ने ही देश में हर कहीं राजा रजवाड़े पैदा कर दिए हैं। जो न सिर्फ आम लोगों के लिए बड़ा सर दर्द बन चुके हैं बल्कि देश के लोकतंत्र के लिए भी बड़ा खतरा हैं। 

कैसे, यह जानने के लिए पहले यह जानना होगा कि संविधान बनाने की जरूरत क्यों पड़ी। दरअसल संविधान बनने से पहले देश में बड़ी तादाद में तमाम ऐसे लोग थे, जो किसी भी नियम- कानून से खुद को ऊपर मानते थे। 

मसलन सैकड़ों रियासतों के राजा- रजवाड़े, धार्मिक कट्टरपंथी नेता, क्षेत्रीय/ भाषाई/ नस्लीय/ जातीय राजनीति करके आपस में लड़वाने वाले नेता, भ्रष्ट नेता, आईएएस, आईपीएस, अफसर, माफिया, धनकुबेर व्यापारी, साधू - संत/ पंडित,  मूल्ला - मौलवी या सेना- पुलिस आदि बलों के ताकतवर लोग आदि। 

इतनी बड़ी तादाद में खुद को नियम कानून से ऊपर मानने वाले ऐसे ही वीआईपी लोगों को देखकर ही संभवतः आजादी देने से पहले तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि भारत लंबे समय तक लोकतंत्र और आजाद देश बना रह पाएगा। उन्हें यह यकीन था कि चाहे जितने नियम - कानून बना दिए जाएं, भारत के ये तथाकथित वीआईपी लोग हर नियम कानून की धज्जियां उड़ा देंगे। 

चर्चिल सही साबित न हों और आजाद भारत में कोई नियम कानून की धज्जियां न उड़ाए, इसके लिए ही आजादी के तीन साल के भीतर संविधान बनाया गया। संविधान बनने से पहले भारत में आजादी के समय ही एक बड़ी अड़चन आ भी चुकी थी, जब सैकड़ों रियासतों का विलय भारत में किया गया था। विलय होने के बावजूद उन रियासतों के राजा आजाद भारत में विशेषाधिकार चाहते थे, जो किसी भी आम नागरिक के मुकाबले उन्हें अलग ही दर्जा दे सके। 

संविधान बनने के बाद सरकार ने कई कड़े कदम उठाकर सबसे पहले उन्हें ही यह एहसास कराया कि आजाद भारत में अब वे भी आम नागरिक ही हैं। उन्हें भी संविधान और कानून के सामने किसी आम आदमी की तरह ही नतमस्तक होना पड़ेगा। हालांकि तब भी कई मांगें सरकार को माननी पड़ी थीं। 

जिनमें से एक उन्हें हर साल प्रिवी पर्स के रूप में सरकारी खजाने से मिलने वाला धन था। यह धन भारत के उन 562 राजाओं को लंबे समय तक सरकार देती थी, जिसे दशकों बाद 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खत्म कर दिया था। 

फिर भी उन दशकों में इन राजाओं को वाकई यह यकीन नहीं आ रहा था कि अब वे भी आम नागरिक हैं। इसलिए आजादी के वक्त हुए रियासतों के एकीकरण के बावजूद वे हर चुनाव में अपनी अलग ही पार्टी बनाकर चुनाव लड़ते रहे। इस उम्मीद में कि उनका राज एक बार फिर लौट आएगा। 

जनता ने उन्हें पहले ही चुनाव में नकार दिया तो उनकी पार्टी खत्म हो गई लेकिन उसके बाद उन राजा - महाराजाओं ने बैक डोर से एंट्री लेकर कांग्रेस और अन्य दलों के टिकट पर चुनाव लड़ना शुरू कर दिया। 

इससे वह पूरी तरह से आम नागरिक बनने से बच गए और सांसद- विधायक आदि पद लेकर फिर से खुद को किसी रियासत का महाराजा समझने लगे। 

धीमे- धीमे उनकी इसी सोच को उन बाकी श्रेणियों के उन्हीं वीआईपी लोगों ने भी अपना लिया, जिन्हें इतनी बड़ी तादाद में भारत में मौजूद देखकर चर्चिल ने उसे वक्त भारत में लोकतंत्र और आजादी के बने रहने पर संदेह जताया था। 

अगर समय रहते इस वीआईपी कल्चर को खत्म नहीं किया गया तो भारत का लोकतंत्र वापस राजा - महाराजाओं के प्राचीन सामंती तंत्र में न बदल जाए, इसका खतरा भी मंडराता रहेगा।
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हिंदू राष्ट्र का मेरा सपना कैसे टूटा

ashwini Kumar Shrivastava-

नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे हिंदू कट्टरपंथी नेताओं का राज यह साबित कर रहा है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना करोड़ों हिंदू देख रहे हैं। इन्हीं करोड़ों लोगों की तरह अपने जीवन में अपनी पूरी युवावस्था तक मैंने भी हिन्दू राष्ट्र का सपना ही देखा है लेकिन अब मैं इस विकराल भीड़ से अलग खड़े होकर बहुत ही कम लोगों की तरह एक ऐसा सपना देखता हूं, जिसमें हिंदू समाज में जातिवाद न हो और समानता हो। 

हिंदू राष्ट्र के सपने से नाता तोड़ने की शुरुआत तब हुई , जब अपने घर- परिवार से दूर निकलकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान मैंने असल हिन्दू समाज को जीकर देखा। वहां मैं तीन साल से ज्यादा समय रहा लेकिन जब यह देखा कि इलाहाबाद पढ़ाई के साथ-साथ जातिवाद का भी गढ़ है तो मुझे हिन्दू राष्ट्र से विरक्ति होने लगी। 

जबकि अपनी युवावस्था तक देखे हिन्दू राष्ट्र के इस सपने के बीज मेरे जन्म से ही मेरे जीवन में थे क्योंकि आम हिंदुओं की तरह बेहद धार्मिक हिन्दू परिवार में मैंने भी जन्म लिया है। 

उसके बाद अपनी शुरुआती पढ़ाई भी आरएसएस के स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर से ही की थी। शिशु यानी केजी से कक्षा पांच तक का मेरा अनुभव वहां बहुत ही शानदार और अविस्मरणीय रहा। 

मैं उस स्कूल में क्लास ही नहीं स्कूल टॉपर्स में था और वहां बच्चों की स्टूडेंट यूनियन शिशु भारती का लगातार दो साल पदाधिकारी व अध्यक्ष भी रहा। 

फिर क्लास सिक्स्थ से लखनऊ के एक बेहद प्रतिष्ठित ईसाई मिशनरी स्कूल में पढ़ाई करने के बावजूद मेरे भीतर भरा हिंदुत्व इस क़दर उफान पर आ चुका था कि सूर्योदय से पहले उठकर घंटों पूजा-पाठ और योग ध्यान करके ही मैं अपने दिन की शुरुआत करता था। उसी दौरान राम मंदिर आंदोलन शुरू हुआ तो मैं भी किशोर उम्र से ही कट्टर हिन्दू संगठनों और भाजपा से जुड़ गया था। 

हिंदुत्व का मेरा यह जुनून हल्का पड़ने लगा , जब स्नातक की पढ़ाई के दौरान इलाहाबाद में मैंने जातिवाद से भरे हिन्दू राष्ट्र का सैंपल बरसों तक उसका हिस्सा बनकर देख- समझ और महसूस कर लिया। 

तिग्मांशु धूलिया और अनुराग कश्यप जैसे नामी गिरामी लोगों को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी समेत पूर्वांचल व बिहार के उसी भयावह जातिवाद का अपनी फिल्मों के जरिए महिमा मंडन करते देखता हूं तो मुझे बड़ी कोफ्त भी होती है। 

क्योंकि उनकी फिल्मों में जिस तरह इसे गर्व करने वाली चीज दिखाया जाता है, दरअसल हिन्दू समाज के लिए सबसे शर्मनाक और सारी समस्याओं की जड़ यही चीज है। 

कैसे, यह बताने के लिए वहां के अनुभवों पर आधारित पोस्ट्स की पूरी सीरीज ही लिखनी पड़ जाएगी। हालांकि व्यक्तिगत रूप से मुझे खुद इस जातिवाद की लड़ाई में कोई नुकसान कभी नहीं हुआ क्योंकि मैं खुद क्षेत्र के आधार पर बने वहां के सबसे मजबूत छात्र गुट का बहुत अहम हिस्सा था। 

मगर मैंने इस जातिवाद के चलते छात्रों के बीच फैले वैमनस्य के ऐसे-ऐसे जीवंत उदाहरण देखे कि तभी मैंने समझ लिया था कि अगर कभी भारत में हिन्दू राष्ट्र आया तो उसका असल परिदृश्य कैसा होगा। 

यही नहीं, तब यह भी समझ गया था कि इतिहास में हमें जिन हिंदू राजाओं पर गर्व करने  की पढ़ाई करवाई जाती है दरअसल वह हिंदू गर्व नहीं बल्कि जातीय गर्व है, जिस पर मुलम्मा हिंदुत्व का चढ़ाकर सबको शामिल करने की कोशिश की जाती है। 
तभी इतिहास की पढ़ाई और हिन्दू समाज व भारत की राजनीति को देखने का मेरा नजरिया एकदम यू टर्न लेकर भाजपा और आरएसएस विरोधी हो गया। 

हालांकि तब तक भी मुझे जातिवाद में छुआछूत और भेदभाव देखने को नहीं मिला था क्योंकि मेरा वास्ता तब पिछड़े और दलित छात्रों से कभी पड़ा ही नहीं। मैंने तो वहां यूनिवर्सिटी में उस जबरदस्त जातीय लड़ाई को ही देखा, जो तब केवल सवर्णों के बीच ही अपने चरम पर थी। वहां तब हर हॉस्टल और कैंपस में पंडित, कायस्थ, ठाकुर और भूमिहार जातीय गुट थे, जो वर्चस्व की लड़ाई में एक- दूसरे से दिन - रात उलझे रहते थे। 

यानी भारत में हिन्दू राष्ट्र भले ही न हो लेकिन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में यह तब पूरी शान से कायम था। मैंने उसी मिनी हिन्दू राष्ट्र में अपने जीवन के तीन-चार साल बिताए, जिस हिन्दू राष्ट्र को पूरे भारत में लागू करने का सपना मैंने अपनी किशोरावस्था से देखना शुरू कर दिया था। 

कैंपस में ही थोड़ा बहुत पिछड़े वर्ग की ताकतवर ओबीसी जातियों से भी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई चलती रहती थी लेकिन कब्जा तब सवर्ण खेमे का ही था। दलित व मुस्लिम खेमे का तो चर्चा भी वर्चस्व की इस लड़ाई में कहीं दूर-दूर  तक नहीं था। 
हिंदू राष्ट्र के उसी सैंपल को जातिवाद के चश्मे से देखने के बाद इसके विरोध का मेरा नजरिया तब और मजबूत हो गया ,  जब  इलाहाबाद के बाद दिल्ली में आईआईएमसी के दौरान मैंने जातिवाद का असली चेहरा देखा, जिसमें दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों को अपने सम्मान, संसाधनों और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ते हुए देखा। 

इतना कुछ देखने, पढ़ने और जीवंत महसूस करने के बाद जब मेरे परिवार,  नातेदार- रिश्तेदार, सहपाठी, कलीग या अन्य परिचित लोग आरएसएस या भाजपा के मेरे विरोध से चिढ़कर मुझसे बहस करते हैं या जबरन मुझे भी हिन्दू राष्ट्र का समर्थक बनाने का प्रयत्न करते हैं तो एक ही शेर मुझे याद आता है कि 

" या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात 
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और" 

उन्हें यह डर है कि जिस तरह पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और कश्मीर में हिन्दुओं का नामोनिशान मिट गया , उसी तरह एक दिन पूरे भारत से इसे मिटाने की कोशिश इस्लामी आतंकवादी या कट्टरपंथी कर रहे हैं। उनका यह डर कहीं से गलत भी नहीं है क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादी सिर्फ हिन्दुओं को ही नहीं, बौद्धों, ईसाईयों और सिखों आदि को भी दुनिया से मिटाकर पूरी दुनिया को केवल एक ही धर्म में रंगना चाहते हैं. 
बिल्कुल उसी तरह , जिस तरह हिन्दू पूरे भारत को भगवा रंग में रंगना चाहते हैं। 

यह धार्मिक लड़ाई तो बाकी सभी धर्मों के बीच भी है, जो इस्लाम के आने के पहले से चल रही है। इस्लाम नहीं आया था तो बौद्ध धर्म से यह लड़ाई हिन्दुओं ने लड़ी। 

मगर अनवरत चलने वाली इस धार्मिक लड़ाई की आड़ में क्या हिंदुओं के बीच फैले इस जातिवादी वैमनस्य को दूर करने की बजाय केवल धार्मिक लड़ाई पर ही फोकस किया जाना चाहिए? 
पहले तो इस कड़वे सच को हजम करना सीखिए कि इतने जातिगत वैमनस्य के कारण कभी एकजुट न हो पाने की वजह से हिंदू यह लड़ाई स्थाई रूप से जीत नहीं सकते। यदि यह धार्मिक लड़ाई थोड़े समय के लिए हिन्दू उसी तरह जीत भी गए, जैसे इतिहास में कई बार जीत चुके हैं.... तो इसकी क्या गारंटी है कि आपस में जातिगत लड़ाई का लंबा दौर फिर शुरू करके यह इसे किसी विदेशी हमलावर धर्म के हाथों गंवा नहीं देंगे? 
जिन्हें इस सच का न पता हो , उन्हें इतिहास खुद पढ़ कर यह जान लेना चाहिए कि जातिवाद के इसी वैमनस्य के चलते हर बार अपने हिन्दू राष्ट्र को हमने खुद ही आपसी लड़ाई और नफरत के खेल में उलझ कर विदेशी हमलावरों को सौंपा है। हमें किसी विदेशी हमलावर या जयचंद ने नहीं हराया है। 

हम तो अपने जातिगत वैमनस्य और इसके चलते बने छोटे छोटे रजवाड़ों की लड़ाइयों से उपजी फूट के कारण हारते रहे हैं। 
बाकी उन अनपढ़ों से क्या बहस करना , जिन्हें इतिहास का या तो ज्ञान नहीं है या फिर वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से ज्ञान लेकर बाकी हिंदुओं और मुसलमानों को दिन रात गरिया कर हिन्दू राष्ट्र बनाने में लगे हैं।
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हिन्दू धर्म में आस्था के चलते मुस्लिम युवक की संकट में आई जान, योगी से की फरियाद

हिन्दू धर्म में आस्था के चलते मुस्लिम युवक की संकट में आई जान, योगी से की फरियाद

संजय सक्सेना,लखनऊ

उत्तर प्रदेश के कानपुर में रहने वाले एक मुस्लिम युवक को अपने घर में देवी-देवताओं की मूर्तियां रखने के कारण जान के लाले पड़ गए हैं.उसे लगातार जान से मारने की धमकी मिल रही है.युवक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा मांगी है. मुस्लिम युवक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से खुद के सनातन धर्म अपनाने की गुहार लगाते हुए कहा है कि योगी जी मुझे सनातन धर्म में शामिल करा दीजिए। इन पापियों से मुझे बचा लीजिए। दरअसल जुनैद अपने घर में भगवान की प्रतिमाएं रखकर पूजापाठ करते हैं। इसके साथ ही भगवा वस्त्र पहनकर मंदिर जाते हैं।यह बात कुछ कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रही है.

मामला कानपुर के बाबूपुरवा कोतवाली क्षेत्र स्थित खटिकाना में रहने वाले जुनैद के साथ जुड़ा हुआ हैं। जुनैद की मॉ रानी बेगम ने बताया कि जुनैद जब छोटा था, तो उसकी आंखों की रोशनी चली गई थी। रानी बेगम जुनैद को लेकर शोभन सरकार दर्शन के लिए जाने लगी थीं। शोभन सरकार जाने और वहां के दर्शन से जुनैद के आखों की रोशनी लौट आई । तभी से मॉ रानी बेगम और बेटे जुनैद का सनातन धर्म के प्रति आस्था बढ़ गई। जुनैद घर में  हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों की पूजापाठ करने लगा। इसके साथ ही भगवा वस्त्र धारण कर मंदिर जाना शुरू कर दिया।

इसी बीच मार्च 2019 में फतेहपुर के बिंदकी में रहने वाली अफरोज से जुनैद का निकाह हुआ था। अफरोज जब निकाह के बाद ससुराल आई, तो उसने पूजापाठ का विरोध करना शुरू कर दिया। सनातन धर्म के प्रति आपत्तिजनक बाते कहने लगी। जिसकी वजह से आए दिन विवाद होने लगा,लेकिन इस सबके बाद भी  जुनैद की सनातन धर्म के प्रति आस्था कम नहीं हुई। जुनैद की पत्नी अफरोज ने पूरा किस्सा अपने मायके में बताया, जिसपर अफरोज कीमां मुस्तकीमा, पिता मुइन अहमद, भाई मुसीर खान और मोहसिन विरोध और मारपीट पर उतारू हो गए।जुनैद को धमकी देने लगे। जुनैद का अरोप है कि सास-ससुर और साले सनातन धर्म को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। मां-बेटे को जान से मारने की धमकी देते हैं। इसके साथ घर आकर गाली-गलौच और मुझसे मारपीट करते हैं। तरह-तरह से प्रताड़ित करते हैं।जुनैद का कहना है जब हिंदूस्तान में रहकर भी हम लोग सनातन धर्म की पूजापाठ नहीं कर पा रहे हैं तो हम कहां सुरक्षित रह सकते हैं। ससुरालियों की प्रताड़ना से परेशान होकर बीते 09 फरवरी 2023 को जुनैद ने मुख्यमंत्री योगी से शिकायत करके पूरा मामला उन्हें बताया और सुरक्षा की मांग की है।

गौरतलब हो,जुनैद ने 08 जून 2023 को बाबूपुरवा कोतवाली में तहरीर भी दी थी। बाबू पुरवा पुलिस ने जुनैद की तहरीर पर आईपीसी की धारा 298, 504, 506 में मुकदमा दर्ज किया है। वहीं,डीसीपी शिवाजी शुक्ला का कहना है कि ऐसा मामला सामने आया है। इसकी जांच कराई जा रही है।



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Bhadas Media 

Stringers Need Wages Not Dismissals, Says DUJ


The Delhi Union of Journalists is shocked but not surprised at the overreaction of Union Minister Smriti Irani and the Dainik Bhaskar management to a journalist's request for a news byte.

The cameraperson Vipin Yadav, along with other local media persons, had waited for the Minister to visit Krishnanagar Chauraha in Amethi. When she came but was leaving without speaking to them, Yadav asked her for a comment. Her reaction was unfortunately arrogant and annoyed. She threatened to complain to the newspaper 'malik' about his temerity. The episode was on camera and it's circulation led to the immediate and blatantly unfair dismissal of both Yadav and the Dainik Bhaskar stringer Rashid Hussain who was also present for the Minister's visit. 

  Dainik Bhaskar tweeted that they had no journalist in the area. Irani added fuel to the fire by tweeting that the journalist himself was 'fake'. While publicly humiliating the journalist the newspaper management privately demanded the return of the Mic ID from Hussain. The ID is the major proof of employment, in the absence of a formal contract. 

The episode focusses attention on the precarious nature of employment offered to local journalists by media outfits. Stringers are badly paid or unpaid and often there is no formal contract. They are simply given an ID card and if they are lucky some equipment. Others have to invest in their own cameras and microphones. Some are paid per newsbyte. Many stringers work merely for the prestige and access to local officials that the job gives them.

The Delhi Union of Journalists demands that such employment be formalised and decent remuneration be given to local journalists who are our grassroots news network. They enable information to percolate upwards. Without them there would be no rural or small town news, only information from state capitals where usually correspondents are employed. 

  Instead of humiliating journalists the Minister is expected to be sensitive to the tough conditions under which journalists work and to advocate decent employment for the profession.

News18 India Open Mic Chhattisgarh conclave concludes on a high note

Chief Minister Bhupesh Baghel speaks extensively about his transformative approach to politics and philosophy for growth and development

Raipur, 13th June 2023 - News18 India, the No.1 Hindi news channel in the country, successfully concluded the second edition of News18 India Open Mic in Chhattisgarh. The conclave provided a platform to celebrate the exceptional achievements of Chhattisgarh and its remarkable people, while fostering engaging conversations and thought-provoking discussions.

दुनिया में कोई कैसी भी मीडिया आ जाए, प्रिंट मीडिया का महत्व कायम रहेगा

छत्तीसगढ़ अंचल के लोकप्रिय दैनिक लोक सदन के14 वे स्थापना दिवस के परिप्रेक्ष्य में रविवार 11 जून को संध्या  कोरबा के पंडित मुकुटधर पांडे साहित्य भवन घंटाघर चौक में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कोरबा जिले के वरिष्ठ और सक्रिय पत्रकार रहे स्व. रमेश पासवान की स्मृति में पत्रकारिता सम्मान कार्यक्रम (द्वितीय वर्ष) 2023 के तहत अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण किया गया। इसके पश्चात स्वर्गीय रमेश पासवान के छाया चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। अतिथियों का स्वागत अभिनंदन उपरांत वरिष्ठ पत्रकार मनोज ठाकुर ने पत्रकार सत्य नारायण पाल को दिए जा रहे सम्मान का पाठ किया। पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए देशबन्धु, कोरबा के पत्रकार सत्यनारायण पाल( सत्या) को  वर्ष 2023 के लिए शॉल-श्रीफल, प्रशस्ति पत्र एवं 10 हजार रुपये की सम्मान राशि मुख्य अतिथि राकेश श्रीवास्तव उपस्थित अतिथियों  एवम सपादक सुरेशचंद्र रोहरा द्वारा चेक भेंट कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई। इस अवसर पर सत्यनारायण पाल  की धर्मपत्नी श्रीमती लाजवन्ती दीवान का भी सम्मान किया गया।
 

सी एम सिटी में भाजपा कार्यकर्ता ने मीडिया से कहा..पुलिस चला रही है गुंडाराज !

सत्येंद्र कुमार-
गोरखपुर: सी एम सिटी में अपने आपको भाजपा कार्यकर्ता बताने वाले आदित्य चौहान भी आखिर खाकी की हनक और सनक का शिकार हो ही गए । जमीन पर जबरिया निर्माण की शिकायत लेकर विधायक और एस डी एम तक पहुँचे भाजपा कार्यकर्ता को उम्मीद नही थी कि अपनी ही पार्टी की सत्ता में इतने अच्छे लिंक के बावजूद उन्हें बेआबरू होकर थाने से निकलना पड़ेगा ।

8.6.23

News18 India presents ‘News18 India Open Mic Chhattisgarh’

Raipur, 8th June, 2023 - News18 India, the No.1 Hindi news channel in the country, is all set to announce its second edition of News18 India Open Mic. The highly anticipated conclave is scheduled to take place on 11th June in Chhattisgarh.

जेलों पर बढ़ता कैदियों का भार एवं उनकी सुरक्षा में लापरवाही!

अभी हाल ही में आपने पढ़ा होगा कि देश की सबसे सुरक्षित कही जाने वाली तिहाड़ जेल में बहुत ही कम अंतराल में दो कैदियों को उनके विरोधी कैदियों ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना सिर्फ दिल्ली की तिहाड़ जेल में ही नहीं हो रही, देश की लगभग सभी जेलों में होती है। और अब यह आम बात होने लगी है, जो अपने आपमें बड़ी चिन्ता का विषय है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ मंडल की जेलों के ताजा आंकड़े जरा देखें। मेरठ जेल की क्षमता 1707, निरुद्ध बंदी 3357; गाजियाबाद की क्षमता 1704 व बंदी 3631; बुलंदशहर में बंद हैं तेईस सौ, जबकि क्षमता है 840। भारत की जेलों में बंद लोगों के बारे में सरकार के रिकार्ड में दर्ज आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। अनुमान है कि इस समय कोई चार लाख से ज्यादा लोग देश भर की जेलों में बंद हैं जिनमें से लगभग एक लाख तीस हजार सजायाफ्ता और कोई दो लाख अस्सी हजार विचाराधीन बंदी हैं। देश में दलितों, आदिवासियों व मुसलमानों की कुल आबादी चालीस फीसद के आसपास है, वहीं जेल में उनकी संख्या दो तिहाई यानी सड़सठ प्रतिशत है। इस तरह के बंदियों की संख्या तमिलनाडु और गुजरात में सबसे ज्यादा है। दलित आबादी सत्रह फीसद है जबकि जेल में बंद लोगों का बाईस फीसद दलितों का है। आदिवासी लगातार सिमटते जा रहे हैं व ताजा जनगणना उनकी जनभागीदारी नौ प्रतिशत बताती है, लेकिन जेल में नारकीय जीवन जी रहे लोगों का ग्यारह फीसद वनपुत्रों का है। मुसलिम आबादी चौदह प्रतिशत है लेकिन जेल में उनकी मौजूदगी बीस प्रतिशत से ज्यादा है।

5.6.23

चेन्नई में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की मूर्ति लगाने के मायने

सौरभ सिंह सोमवंशी
लखनऊ।


प्रयागराज में जन्मे और देश के सातवें प्रधानमंत्री रहे राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह की आदमकद मूर्ति तमिलनाडु के चेन्नई में लगाने का फैसला वहां के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने लिया है। विश्वनाथ प्रताप सिंह के जन्म स्थली प्रयागराज से करीब 2100 किलोमीटर  दूर उनकी मूर्ति दक्षिण भारत में लगाने का फैसला आश्चर्यचकित कर देने वाला फैसला है। वह भी तब जब उत्तर भारत के राजनीतिक दल उनका नाम लेने से डरते हैं।

क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ से अलग हो सकता है भारत

अशोक मधुप, वरिष्ठ पत्रकार

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपने  लिए विटो पावर देने की मांग करता आ रहा है।वह मानता है  कि विटो पावर धारक पांच राष्ट्र  संयुक्त राष्ट्र  संघ को अपनी बपौती समझे  बैठे हैं।वह अपनी मर्जी के हिसाब से इसे  चला रहे हैं। चाहे आतंकवाद का मसला हो, या रूस और यूक्रेन युद्ध का। सूडान के आंतरिक विद्रोह और म्यामार के  मामले में  भी  तमाशबीन के अलावा संयुक्त राष्ट्रसंघ कोई महत्वपूर्ण भूमिका  नही निभा  पा रहा।  मनमर्जी का प्रस्ताव न होने पर विटो पावर धारक कोई भी देश अपनी विटो पावर का इस्तमाल कर प्रस्ताव को रोक देता  है। भारत इस सब हालात को लेकर वह चिंतित है। वह इस व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहा है।  उसकी लंबे समय ये मांग  है कि भारत को विटो पावर दी जाए। किंतु संयुक्त राष्ट्रसंघ में यदि भारत को विटो की पावर न मिली तो हाे सकता  है कि आगे चलकर भारत इससे अलग हो जाए।ये  बात विटो पावर देश  भी  धीरे – धीरे समझने लगे हैं।

27.5.23

सिविल सेवा में चयनित युवाओं को जाति और धर्म में मत बांटिए



अशोक मधुप, वरिष्ठ पत्रकार

संघ लोकसेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा का कल रिजल्ट आया। भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और केंद्रीय सेवा समूह 'ए' और समूह 'बी' में नियुक्ति के लिए कुल 933 उम्मीदवारों की अनुशंसा की गई है। अनुशंसित 933 उम्मीदवारों में से 345 सामान्य , 99 ईडब्ल्यूएस , 263 ओबीसी के हैं, 154 एससी , 72 एसटी के हैं। 178 उम्मीदवारों को वेटिंग लिस्ट में रखा गया है। परीक्षा में इशिता किशोर ने  एयर एक रैंक हासिल की है। उसके बाद गरिमा लोहिया, उमा हरथी एन और स्मृति मिश्रा रहीं। इस बार खास बात यह  की लड़कियों ने परीक्षा में दबदबा कायम किया है।

21.5.23

समय की बात करती हैं प्रमोद दुबे की कहानियां




प्रयागराज। आज के समय में अपनी रचनाओं के जरिए समाज की विडंबनाओं को
उकेरना, ग़लत चीज़ों के खिलाफ़ अपनी रचनाओं के जरिए खड़ा होना बड़ी बात हैं।
कहानियों और ग़़ज़लों के जरिए क़लमकार अपनी बात कहता आया है और आगे भी कहता
रहेगा। यह चीज़ स्पष्ट रूप से प्रमोद दुबे की कहानी संग्रह ‘घोंसला’ और
डॉ. इम्तियाज़ समर के ग़ज़ल संग्रह ‘मोहब्बत का समर’ में दिखाई देती हैं। इन
दोनों ही लोगों ने वर्तमान समय की विसंगतियों को समझा, देखा और परखा है,
इसी हिसाब से सृजन किया है। यह बात रविवार को साहित्यिक संस्था
‘गुफ़्तगू’ की ओर से करेली स्थित अदब घर में अयोजित कार्यक्रम के दौरान
मशहूर न्यूरो सर्जन और कवि डॉ. प्रकाश खेतान ने अपने वक्तव्य में कही।

नौसिखियों की तरह भास्कर हुआ मुंबई में लांच

 

 दैनिक भास्कर जबलपुर समूह मुंबई में लांच हो गया है। लेकिन पहले दिन का इस अखबार को देखें तो यह किसी नौसिखिए की तरह निकला है। इसमें तमाम गलतियों की भरमार है। हालात यह है क‌ि डेटलाइन में मुंबई की जगह कई जगह मंबई छपा है। साथ ही ब्रीफ की खबरों में रिपोर्टर की एक के नीचे एक बाइलाइन है।

तो क्या फर्जी के आगे झुक गए लखनऊ के असली पत्रकार !

sanjay srivastava-

मैं संजय श्रीवास्तव लखनऊ में 28 वर्ष से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़ा हूं। हिंदुस्तान, स्वतंत्र भारत, कुबेर टाइम्स, राष्ट्रीय स्वरूप,  जनसत्ता एक्सप्रेस, श्री टाइम्स, कैनविज टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट इत्यादि में मैंने निष्पक्ष, निर्भीक और ज़मीनी पत्रकारिता की। लखनऊ के सभी वरिष्ठ साथी मेरी पत्रकारिता और आचरण से भली - भांति- परिचित हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नए दौर में साइबर एनकाउंटर्स

 

कौशल किशोर | twitter @mrKKjha

पिछले साल भारत में लगभग बीस लाख साइबर क्राइम की रिपोर्ट दर्ज की जाती है।  इसका मतलब औसतन पांच हजार से भी ज्यादा अपराध प्रति दिन दर्ज किए गए थे। इसके अतिरिक्त भारत और अन्य देशों में रिपोर्ट नहीं किए गए साइबर अपराधों की लंबी फेहरिस्त है। यह बेहद गंभीर मामला है। वैश्विक स्तर पर ठगी का यह आंकलन एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर सालाना हो चुका है। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रणेता और कंप्यूटिंग के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जेफ्री हिंटन को अपनी उपलब्धि पर पछतावा हो रहा है। एक दशक की लंबी सेवा के बाद हाल ही में वह गूगल की मातृ संस्थान अल्फाबेट इंक से इस्तीफा दे चुके हैं। इसके साथ ही एआई के लगातार बढ़ते जोखिम के बारे में खुल कर बात भी करने लगे हैं।

कानपुर में बार एसोसिएशन ने अधिवक्ताओं और पत्रकारों को किया सम्मानित

 



कानपुर बार एसोसिएशन ने शनिवार को अधिवक्ताओं और पत्रकारों को सम्मानित किया। कानपुर कचहरी में पिछले दिनों हुए आंदोलन में शामिल अधिवक्ताओं को सम्मानित किया। वह निष्पक्ष पत्रकारिता से आंदोलन की धारदार खबरें लिखकर अधिवक्ताओं की आवाज़ बुलन्द करने वाले पत्रकारों का भी सम्मानित किया गया। जिसमें कानपुर जर्नलिस्ट क्लब के महामंत्री अभय त्रिपाठी, हिंदुस्तान अखबार के गौरव श्रीवास्तव, जागरण के अलोक शर्मा, अमर उजाला के आशीष अग्रवाल को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किए गए, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से अधिवक्ता और बार के पदाधिकारी कानपुर कचहरी पहुंचे। अधिवक्ताओं को सम्मानित किया गया।

रोने की हजार वजहें कम पड़ जाएं यदि हंसने की एक वजह मिल जाए

आज के भागदौड़ भरे जीवन में लोग तनाव और डिप्रेशन जैसी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इससे न सिर्फ इंसान का काम प्रभावित होता है, बल्कि इसका असर उसके जीवन और परिवार पर भी पड़ता है। आजकल तो चारों तरफ के हालात देखकर व्यक्ति वैसे ही परेशान रहता है। लेकिन हमें अपनी जिंदगी में जरूर खुश रहना चाहिए और हंसना चाहिए। डिप्रेशन और तनाव दूर करने के लिए हंसना सबसे प्रभावी माना जाता है। हंसने से न सिर्फ वह इंसान खुशी महसूस करता है बल्कि उसके आसपास के लोगों पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ता है। हंसने से रोग दूर होते हैं और दिल के साथ-साथ दिमाग भी स्वस्थ रहता है। लोग इस बात को नहीं जानते हैं कि बात करते समय हम जितनी ऑक्सीजन लेते हैं, उससे छह गुना ज्यादा ऑक्सीजन हम हंसते समय लेते हैं। इंसान के जीवन में हंसी के पल बढ़ाने के लिए विश्व हास्य दिवस मनाया जाता है। शरीर में एंडोर्फिन का स्राव होने से हंसी दर्द को कम करने के साथ ही मांसपेशियों के तनाव को भी कम करती है. यह मई महीने के पहले रविवार को मनाया जाता है। विश्व हास्य दिवस लोगों में हंसी के स्वास्थ्य लाभ और चिकित्सीय प्रभावों को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है


 


सुरेश गांधी-

आधुनिक जीवनशैली में तकनीकी विकास ने हमें बहुत सारी चीजें दी हैं, बहुत-सी सुविधाएं प्रदान की हैं। लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया है। इनमें हंसी और खुशी भी शामिल हैं। तमाम भौतिक संसाधनों और सुख-सुविधाओं ने जीवन को आरामदेह और आसान तो बना दिया लेकिन हमसे हमारा वक्त, खुशियां और मुस्कराहटें छीन लीं। ऐसे में हास्य योग मनुष्य के जीवन में बहुत उपयोगी है, इंसान को जिंदगी हंसते-हंसाते हुए गुजारनी चाहिए। जिंदगी में हंसते हुए रहने से शरीर भी पूर्ण रूप से स्वस्थ्य रहता है। हास्य योग के अनुसार, हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और संसार को शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्व उपस्थित रहते हैं। यह व्यक्ति के विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जब व्यक्ति समूह में हंसता है तो यह सकारात्मक ऊर्जा पूरे क्षेत्र में फैल जाती है और क्षेत्र से नकारात्मक ऊर्जा को हटाती है।

दिल्ली वालों के साथ पब्लिक एप्प कर रहा है फ्रॉड

दिल्ली के रिपोर्टरों को जानबूझ कर पेमेंट दे रहा कम

पब्लिक एप्प इन दिनों दिल्ली के रिपोर्टर के साथ फ्रॉड कर रहा है. पब्लिक अप्प ने अपने वीडियो से लाइक और व्यूज ऑप्शन बंद कर  दिया है जिससे कि रिपोर्टर को पता न चल सके कि कितने लोग देख रहे हैं, कितने लाइक कर रहे हैं.

News18 India Open Mic Uttarakhand Celebrates the Spirit of Uttarakhand with Prominent Personalities

 

1st May, Dehradun: News18 India, India’s No.1 Hindi News Channel conducted News18 India Open Mic Uttarakhand as a special initiative to showcase the diversity and talent of Uttarakhand. The conclave brought together leaders, artists, and other prominent personalities to discuss a range of themes and topics. The event was a great success, with inspiring speeches and performances.

आयुष्मान कार्ड से इलाज में खेल, पैसे न देने पर बीमार बच्ची को निकाला अस्पताल से बाहर


निजी अस्पताल आयुष्मान कार्ड से इलाज पर भी कर रहे वसूली, हद दर्जे की बदतमीजी पर उतरा अस्पताल का संचालक डाक्टर

कासगंज। आयुष्मान कार्ड से इलाज के नाम पर शहर के कलावती हॉस्पिटल पर धन वसूली का आरोप लगा है। एक तीमारदार ने आयुष्मान कार्ड होते हुए भी अस्पताल कर्मियों और डॉक्टर द्वारा दबाईयों के रुपये लिए जाने का आरोप लगाया है। इतना ही नही पैसे न दिए जाने पर अस्पताल कर्मचारियों और डॉक्टर द्वारा रोग पीड़ित बच्ची को अस्पताल से बाहर निकालने की बात भी तीमारदार ने कही है।

18.5.23

यूपी बीजेपी के पुराने ब्राह्मण चेहरे हाशिए पर!

 अजय कुमार, लखनऊ

      भारतीय जनता पार्टी में मोदी युग की शुरूआत के बाद कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बीजेपी की पिछले करीब एक दशक की राजनीति पर नजर दौड़ाई जाए तो यह कहा जा सकता है कि जहां कभी पार्टी की विचारधारा सर्वोपरि हुआ करती थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ(आरएसएस) की मर्जी के बिना पार्टी में कोई फैसला नहीं लिया जाता था। संघ के कई नेता बीजेपी में आकर संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाते थे। पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान मिलता था।समय-समय पर उन्हीं में से किसी नेता/कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाया जाता था। ऐसी परम्परागत भारतीय जनता पार्टी में आज की तारीख में विचारधारा की बात गौढ़ हो गई है। अब चुनाव में प्रत्याशी के चयन का आधार उसकी सोच से नहीं उसकी चुनाव जिताऊ क्षमता से तय किया जाता है। इसी प्रकार से अन्य दलोें की तरह बीजेपी में भी अब किसी नेता के ‘कद’ का निर्धारण उसकी विचारधारा और काबलियत से अधिक उसकी आक्रमकता से तय किया जाता है। मौजूदा बीजेपी के लिए वोहि नेता ‘काम’ का होता है जो सच-झूठ सब बोलने की क्षमता के साथ-साथ मतदाता तक अपनी बात सलीके से पहुंचाने में महारथ रखता हो, इसके साथ-साथ वोट बैंक की सियासत में फिट बैठता हो। पार्टी में अब ऐसा नेता ही आगे बढ़ता है। इसी वजह से पिछले कुछ वर्षो में दिल्ली से लेकर राज्यों तक की बीजपी इकाई में आयातित नेताओं के साथ-साथ पूर्व नौकशाहों का भी दबदबा बढ़ा है, जबकि बदलती राजनीति में बीजेपी के लिए अपना पूरा जीवन खपा देने वाले कई दिग्गज नेता हासिये पर चले गए हैं।  

तो क्या अटल बिहारी वाजपेयी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी घुटने टेकने वाले नेता थे नड्डा जी ?

चरण  सिंह राजपूत -

बेशर्मी की पराकाष्ठा है मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले देश को भ्रष्ट और घुटने टेकने वाला बताना

क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा गीत भी मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिखा गया है ? क्या भाखड़ा नागल बांध भी मोदी के पीएम बनने इ पहले बना है ? क्या बैंकों का एकीकरण भी मोदी के पीएम बनने के बाद किया गया है। क्या 1965 और 1971 का युद्ध भी मोदी के पीएम बनने के बाद जीता गया है ?  क्या देश परमाणु शक्ति भी मोदी के पीएम बनने के बाद हुआ है ? क्या सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, गांधी, लोहिया, जेपी सब भ्र्ष्ट और घुटने टेकने वाले थे ? बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के कर्नाटक में दिए गए बयान से तो ऐसा ही लग रहा है।  दरअसल जेपी नड्डा ने कर्नाटक विधान सभा चुनाव में कहा है कि मोदी के पीएम बनने से पहले देश भ्रष्ट और घुटने टेकने वाला था। नड्डा का यह बयान ने केवल आज़ादी के बाद के सभी नेताओं और लोगों का अपमान कर रहा है बल्कि आजादी की लड़ाई में सब कुछ न्यौछावर करने वाले क्रांतिकारियों की शहादत को भी बेकार साबित कर रहे हैं। नड्डा का यह बयान मोदी के पीएम बनने से पहले सेना के जवानों को भी कायर बताने वाला है।

10.5.23

आने वाले 50 से 100 वर्षों में पृथ्वी पर जीवन ही नहीं बचेगा!

राजीव थेपड़ा-

पर्यावरण की दुर्दशा और हमारी मासूमियत... हममें से ऐसा कोई नहीं, जो इस पर्यावरण की दुर्दशा से हैरान और परेशान नहीं । लेकिन  हैरान जिस बात से सबको होना चाहिए, उस पर कोई भी हैरान नहीं । बरसों से पर्यावरण पर आए संकट पर सभी रोना रोते हैं। लेकिन उस संकट का कारण कोई भी स्वयं को नहीं मानता, अपितु सब दूसरों पर दोषारोपण करते हैं ।  एक बहुत छोटी सी बात करना चाहता हूं मैं, यदि इसे कोई उसी रूप में समझ ले, जिस रूप में मैं इसे कहना चाह रहा हूं, तो पर्यावरण के संकट की जिम्मेवारी उसी क्षण हम सब ऊपर, हरेक व्यक्ति पर आ जाती है।

वृद्धावस्था पेंशन लेने के लिए 70 वर्षीय महिला प्लास्टिक की कुर्सी के सहारे नंगे पैर चल रही है!

Naveen sinha-

 

ओडिशा में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से वृद्धावस्था पेंशन लेने के लिए 70 वर्षीय महिला प्लास्टिक की कुर्सी के सहारे नंगे पैर चल रही है। अचानक यह तस्वीर हर किसी का ध्यान आकर्षित करती है और सोशल मीडिया पर मशहूर हो जाती है लेकिन क्योंबैंक ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए अपने बुनियादी ढांचे के अनुकूल क्यों नहीं बनाया है