Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

22.2.09

नर्गिस का असली नाम क्या था ?

राज्य सभा में पहुचने वाली पहली अभिनेत्री नर्गिस थीउनका असली नाम क्या था ? मदर इंडिया आस्कर के लिए नोमीनेट हुई थी .....उस फ़िल्म में उनका नाम क्या था ?
नर्गिस को पहला नेशनल अवार्ड किस फ़िल्म के लिए मिला ?......
सुना है उनके नाम पर कोई अवार्ड भी दिया जाता है ?
वह कैंसर से मरी पर किस साल ?
आपसे नीवेदन है .... आप कुछ और जानते है तो मुझे लाभान्वित करें
आपका ऍम के राय .....

तुम्हारी याद

तुम्हारी याद में चहका, तुम्हारी याद में महका
तुम्हारी याद में निखरा, तुम्हारी याद में बिखरा
तुम्हारी याद मुझको रात भर सोने नहीं देती,
कभी हंसने नहीं देती, कभी रोने नहीं देती।
तुम्हारी याद मेरे घर के चौकीदार जैसी है,
जो पूरी रात जगती है, सुबह करवट बदलती है।
तुम्हारी याद दादी माँ की उस लोरी सरीखी है,
कि जो बच्चों की मीठी नींद में अक्सर टहलती है।
तुम्हारी याद घर आई हुई चिट्ठी की तरह है,
जो अपने दूर के संदेश भी नजदीक लाती है।
तुम्हारी याद पूजाघर में प्रातः वंदना जैसी
जिसे हर रोज़ मेरी माँ बड़ी श्रद्धा से गाती है।
तुम्हारी याद मुझको भीड़ में खोने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।

तुम्हारी याद मेरे सोच की गहराइयों में है
तुम्हारी याद मेरी रूह की परछाइयों में है।
तुम्हारी याद मेरी चेतना के पंख जैसी है
तुम्हारी याद सन्नाटे में गूंजे शंख जैसी है।
तुम्हारी याद मरुथल में भटकती प्यास भी तो है
तुम्हारी याद सीता का कठिन वनवास भी तो है।
तुम्हारी याद जीने का सबक देती तो है, लेकिन
तुम्हारी याद मरने तक कोई संन्यास भी तो है।
तुम्हारी याद क्यों मुझको, मुझे होने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।

तुम्हारी याद फूलों सी, तुम्हारी याद शबनम सी,
हवा के मंद झौकों सी, नए मदमस्त मौसम सी।
तुम्हारी याद झूलों सी, तुम्हारी याद सावन सी,
तुम्हारी याद अंगडाई, तुम्हारी याद धड़कन सी।
तुम्हारी याद राधा-कृष्ण में व्याकुल सी मीरा सी,
तुम्हारी याद तुलसी, सूर, रत्नाकर, कबीरा सी।
तुम्हारी याद जयशंकर, महादेवी, निराला सी,
तुम्हारी याद बच्चन की छलकती मस्त हाला सी।
सुमन जैसी तुम्हारी याद, दिनकर सी, भवानी सी,
तुम्हारी याद कोमल गीत, चौपाई, कहानी सी।
तुम्हारी याद समझौता कोई ढोने नही देती,
कभी हंसने नही देती, कभी रोने नही देती।

चेतन आनंद
[डब्लू डब्लू डॉट तुम्हारी याद में डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम ]

एक दिन दोस्तों के नाम

बचपन से ही यारबाजी में महारत हासिल कर रखी है या यूँ कहें की बिना यारबाजी के चैन नहीं मिलता, आखिरी तमन्ना भी यही है की दोस्तों के बीच ही अंतिम सांस टूटे, अरसे से दिल्ली के चूतियापों से ऊब हो गयी थी, तरीका भी कुछ सूझ नहीं रहा था, लेकिन हर सुबह शानदार नहीं होती, देर रात घर लौटने और अमूमन लोगों के जागने के समय सोने के कारण अपनी सुबह कोई दोपहर एक बजे के करीब होती है, दुनिया भले इसे दोपहर कहती हो पर ''जब जागो तभी सवेरा'' तोः अपनी सुबह इतने ही वक़्त होती है, अभी ठीक से आँख खुल भी न पायी की दिन की शुरुआत बड़े भाई समान ''आदर्श दादा'' के फ़ोन से हुयी, इधर बात ख़त्म हुयी उधर निखिल और अजित सिंह का आना हुआ, जब दिमाग की दही हो जाए और इतने बड़े शहर में बोअरियत होने लगे तोः दोस्तों का मिलना किसी कीमती वस्तुके मिलने से भी कहीं ज्यादा सुखद अनुभूति का एहसास कराती है, लगा की वक़्त को समेट लिया जाए, पर न मेरे हाथ में वक़्त आने से रहा न वक़्त का गुजरना, एक बार फिर दोस्तों के करीब होने का मतलब सबसे ज्यादा पता चला और ये भी की ''दोस्त जिन्दा मुलाकात बाकी'' अगर आप भी जिंदगी से ऊब गए हों तोः दोस्तों से मिलें, अच्छा और तरोताजा महसूस करेंगे, और अचानक दोस्तों से मिलें उन्हें खोजें और उनके साथ कुछ वक़्त बिताएं ......उर्जा से लबालब होने के लिए इससे सस्ता नुस्खा किसी हकीम के पास भी शायद ही होः, वैसे कई दोस्तों को शिकायत है की उन्हें वक़्त नहीं दे पाता ''काकू'' भी यही कहता है लेकिन मिलने के लिए मिला जाए इसलिए बहुतों से नहीं मिलता , काश की '' काकू'' समेट बहुत से दोस्त इस मजबूरी को समझ पाते, लेकिन अब सोचा है की हर हफ्ते किसी करीबी दोस्त से जरुर मिलूँगा, लिस्ट बहुत लम्बी है और वक़्त बहुत कम है इसलिए मैं भी अभी से जुट जाता हूँ दोस्तों से मिलने की योजना बनाने में और आप भी बना लीजिये अपनी योजना.... इस बीच बहुत याद आती है कभी दिल के बेहद करीब रहे आशुतोष नारायण सिंह ( मौजूदा समय में आई बी एन -७ में किसी महत्वपूर्ण पद पर) , प्रमिला दीक्षित ( आजतक की बेहद उर्जावान रिपोर्टर ), वीरेंदर श्रीवास्तव ( स्टार टीवी में इंजिनियर ), दीपांकर नंदी ( आजतक) और तनसीम हैदर (आजतक) के साथ विनय शौरी ( क्राइम रिपोर्टर दैनिक जागरण, पटियाला) की.... इन सबने यारबाजी की मिसाल कायम की थी कभी अगर दोस्ती का इतिहास लिखा जाता तोः इन सबका नाम मैं जरुर उस किताब में लिखवाने की हर मुमकिन कोशिश करता, किसी के लिए अपना इम्तिहान छोड़ देना( आशुतोष) , एक दोस्त के आयोजन को सफल बनाने के लिए तपते बुखार मेंजी जान लगाकर आयोजन को सफल बनाना( प्रमिला) , गर्मियों में बिजली गुल हो जाने पर कमरे में बंद होकर नंगे होकर नाचना( वीरेंदर), बेहद गुरबत के दिनों में भी जूनियरों को छोटे भाइयों की तरह ट्रीट करना( दीपंकर दादा) , ई टी वी में मेरे हर दुःख दर्द को अपने सर लेना( तनसीम भाई) और एक अजनबी शहर में किसी कमी का महसूस न होने देना(शौरी पाजी) आज भी ठीक वैसे याद है , कुछ खफा हो गए कुछ खो गए कुछ से मिलने का वक़्त नहीं मिलता लेकिन आज भी एक दिन तोः क्या जिंदगी उन्ही दोस्तों के नाम करने का मन करता है, हर बार बार बार .....अगर किसी को आशुतोष, प्रमिला और दीपंकर दादा का नंबर मिले तोः भेजनेकी तकलीफ करें मेरी बहुत शुभकामनायें आपको मिलेंगी, बाकी ''अजनबी शहर है दोस्त मिलाते रहिये, दिल मिले तभी हाथ मिलाते रहिये ''...सभी दोस्तों की बेहतरी और शानदार जिंदगी की दुआ के साथ ''हृदयेंद्र ''

आस्कर अवार्ड की शुरुआत कब हुई ?

आजकल इस अवार्ड की काफी चर्चा हैसभी के जबान पर इसका नाम आता हैआपको अगर कुछ और पता है तो जरुर लिखे

एक दिन ब्लोगरों का...............!!

दिनांक २२-०२-२००९,स्थान-कश्यप आई मेमोरियल हॉस्पिटल सभागार,रांची (झारखंड)डाक्टर भारती कश्यप,श्री शैलेश भारतवासी,श्री घनश्याम श्रीवास्तव,श्री मनीष कुमार...........तथा अन्य लोगों के सहयोग से पूर्वी क्षेत्र के ब्लोगरों (यानि चिट्ठाकारों)का जमावडा यानि सम्मलेन एक बेहद अनौपचारिक माहौल में हँसी-खुशी भरे होलियाना अंदाज़ में अभी थोडी ही देर पहले संपन्न हुआ....!!स्थानीय पत्र रांची एक्सप्रेस के संपादक श्री बलबीर दत्त जी,दैनिक आज के संपादक श्री दिलीप जी ,स्वयं डॉ. भारती जी ब्लोगिंग की बाबत अपने विचारों से सभी को अवगत कराया.शैलेश जी एवं मनीष जी ब्लोगिंग के तकनीकी पक्षों और इसके सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डाला तथा ब्लोगरों को अनेकानेक चीज़ों की जानकारी प्रदान की.
इस जमावडे में संगीता पुरी(बोकारो)गत्यात्मक ज्योतिषी वाली,पारुल जी (चाँद पुखराज का तथा सरगम),रंजना सिंह,टाटा(संवेदना संसार)शिव कुमार मिश्रा,कोलकाता(शिवकुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पांडे का ब्लॉग)श्यामल सुमन (मनोरमा)शैलेश भारतवासी(हिन्दी युग्म)दिल्ली,मनीष कुमार(एक शाम मेरे नाम और मुसाफिर हूँ यारों),प्रभात गोपाल झा,अंकुर सिंह,पवन कुमार,कामेश्वर कुमार श्रीवास्तव,अनिल चक्रवर्ती,अमिताभ (किससे कहें),अभिषेक मिश्रा(धरोहर)अश्विनी जी,संजीव शेखर(गुडमोर्निंग झारखड),नीरज पाठक,नदीम अख्तर(रांची हल्ला),भूतनाथ, नहीं भाई राजीव थेपडा(बात पुरानी हैएवं रांची हल्ला),आनंद कुमार,सुनील चौधरी(दहलीज,रांची हल्ला),विनय चतुर्वेदी(संघतिया),प्रभाकर अग्रवाल,कौशल आनंद ,विजय पाठक,नरेन्द्र नाथ (आई नेक्स्ट),प्रवीर पीटर,शुभाद्र अखौरी,सीमा कुमारी,सुधा कुमारी,विनय कृष्ण,रंजित कुमार,शकर कुमार,मोहम्मद मुद्दसर नज़र,वरुण सिन्हा,दिवाकर शाहदेव.शांतनु सेन,एस.के.बरियार,लालन कुमार सिंह,अरुण महतो,कुमुद रंजन,उमेश कुमार,संजय पांडे,सुधीर कुमार आदि लोगों ने हिस्सा लिया.
इस कार्यक्रम की ख़ास बात यह रही कि ब्लोगिंग को अभी इस देश में उपयुक्त सम्मान न मिलने और इसके प्रति लोगों के संजीदा ना होने के बावजूद अभी इसकी महज शुरुआत बताते हुए लगभग सभी वक्ताओं ने यह मुखर रूप से कहा कि पहले अखबार,फिर इलेक्ट्रिक मीडिया,फिर टेलीविज़न,फिर इंटरनेट और अब ब्लोगिंग को आने वाले समय की मुख्यधारा बताया जा रहा है.समय के साथ यही मीडिया का विकास है.यहाँ आए तकरीबन सभी ब्लोगरों ने ब्लोगिंग पर अपने विचार बांटे.नेट ब्लोगिंग अनजान लोगों का आपस में मिलना-जुलना हुआ......और एक-दूसरे को यह बताते हुए कि अरे हमने तो सोचा था कि आप ऐसे हो....मगर आप तो ऐसे निकले....!!इस रोमांचक माहौल में सबने अपने अनुभव तो बांटे ही,साथ ही एक दूसरे के दोस्त भी बने.....पारुल जी और श्यामल सखा सुमन ने अपने गीतों और गज़लों से सबको भाव विभोर भी किया....
कुल मिला कर यूँ कि इस क्षेत्र में हुए इस अनौपचारिक से सम्मलेन में इस तरह सबका मिलना-जुलना आने वाले वर्षों में ब्लोगरों की होने वाली अहमियत का आभास करा गया....ब्लोगिंग बेशक कोई आन्दोलन नहीं किंतु वैचारिक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म अवश्य बन सकता है....और अब ब्लोगिंग निजी डायरी से ऊपर उठकर एक वैचारिक रूप ले भी रहा है....और देखा-देखी और भी लोग इसके प्रति संजीदा हो रहे है....ऐसे उत्सुक लोगों ने भी इस सम्मलेन में शिरकत की और अपने प्रश्न वक्ताओं के सम्मुख रखे....इस छोटे से किंतु अहम् कार्यक्रम से यह विश्वास पुख्ता हुआ कि आने वाले दिनों में ब्लोगर भी किसी बदलाव का वाहक बनने वाले हैं.....!!

हिन्दी ब्लॉग्गिंग किसके लिए है?

आज से ३ आगे पहले नटखट बच्चे आगे पढ़े पोस्ट लिखी थी की " हिन्दी ब्लॉग्गिंग लौंडो -लापाडो के लिए नही है"
उसको १५ कमेन्ट मिले उनसे लोगो ने जवाब माँगा था की आप बता दे किसके लिए हैं लेकिन उसने जवाब नही दिया मैंने यह पोस्ट कल देखी थी तो सोचा के यह गहन विचार विमर्श का मसला है, क्यूंकि मैंने कई ब्लोग्स पर उम्र मे बडो लोगो को छोटो की खिचाई करते पाया, किसी कम उम्र के व्यक्ति के लिए ऐसा पढ़ कर थोड़ा बुरा लगता है.......

इसीलिए सोचा क्योँ इस विषय पर विचार किया जाए, लोग कहते है की अक्ल उम्र और तजुर्बे के साथ आती है लेकिन अब यह सब बदल चुका है पहले इंसान की उम्र ९० -१०० साल हुआ करती थी इसीलिए उसका दिमाग एक वक्त के बाद अच्छा चलता था.....लेकिन अब इंसान की उम्र बहुत कम हो गई तो उसका दिमाग काफ़ी तेज़ी से काम करता है, आज कल के बच्चे के सामने आप कोई काम कर दीजिये वो फ़ौरन उसको दौराहेगा और एक - दो कोशिशों मे ही उसे ठीक से कर लेगा और हो सकता है की कुछ दिनों बाद वो उस काम को आप से अच्छी तरह और आप से जल्दी करने का कोई तरीका निकल ले..... आगे पढ़े

जय हो ... इक श्रद्धांजलि गरीबी को

श्रद्धांजलि गरीबी को ... बधाइयाँ सरकार को ... गरीबी का पता नही, गरीब तो हट ही गया ... ये वो बस्ती है जिसकी हस्ती सरकार ने गोमती के सौन्दर्यीकरण के नाम कुर्बान कर दी .. यहाँ बच्चे गाते थे "भारत प्यारा देश हमारा.... " उन्हें मालूम नही कि उनके माँ बाप को हिन्दुस्तानी होते हुए भी बांग्लादेशी साबित कर दिया गया है ...... नही मालूम कि उन्ही के जैसे बच्चों पर बनी फ़िल्म दुनिया में नाम के साथ करोड़ों कमा रही है... ऐ आर रहमान का गीत उनके जैसे ही लोगो की जय जयकार कर रहा है ... "जय हो ...."


चाहत ....

तुम्हे पहले आना था । अब काफी देर हो चुकी । जिंदगी उदास हो गई है । आसमान में बादल आ चुके है । वैसे मैंने काफी इन्तजार किया । मुझे यकीं था तुम आओगी पर इतनी देर कर दी ... अब रात हो गई ।किस्मत सो गई .... आखे थक गई । अब जाओ ..... मै भी जा चुका । अब मुझे तन्हा रहने दो । मुझे मजाक बनने दो .... तुमसे कोई शिकायत नही । गलती मेरी है । इतना चाहा । सारा जीवन दे दिया । अब मेरी शाम आ गई है तो तुम भी ...पागल था । तेरी मुस्कुराहटों का । जागता था रातभर तुमको यादकर ..... तुमने अपनी अदाओं से जादू कर दिया ।मै खिचता चला गया । तू मेरी मंजील थी । अब मै क्या राहें भी थक गई पर तेरा दर्शन नही हुआ । अब मै जा रहा हूँ ...... सबको छोड़कर ।अब तो कुछ बचा ही नही । अब तो ख़ुद से बातें करता हूँ । अपना हमसफ़र हो गया हूँ । हाँ तेरी याद जरुर है। कैसे छोड़ सकता हूँ .... वह तो धडकनों शामिल है । भला अपनी रूह को छोड़ सकता हूँ । कभी नही । तेरे बाद .... ये यादें ही तो जिंदगी है । मेरे पास तो अब यही है । जींदगी भर की कमाई ।एक समय था । मै एक राही था । सुनसान राहों में अकेले भटकता रहा । तब तेरी याद आती थी । काश तुम हमसफ़र होती । अब तो पावों में जंजीरें है । मुझे बांधकर ले जाया जा रहा है । वह तेरी जरुरत नही । मै खुदगर्ज नही । अकेले जाना है । जी जी कर मरना है ......

जंगल का कानून


कुछ दिनों से 'वाइल्ड लाइफ' के प्रति अचानक मेरा रुझान बढ़ गया है या ये कह सकते है; की अचानक मेरा जंगल तबादला हो गया हो । मैंने कहा डिस्कवरी में तो बहुत देखा है थोड़ा आमने सामने से रूबरू होकर भी वाइल्ड लाइफ का लुत्फ़ उठा लिया जाए । हुआ ये की मैं बहुत दिनों से वाच कर रहा था के कान्हा के शेरो के एक समूह में एक ग्रुप लीडर टाइप के शेर ने अचानक एक कुत्ते को ग्रुप में शामिल कर लिया, यही नही अब शेर उसे दहाड़ने, शिकार, मेनेजमेंट के फंडे भी सिखाने लगा। कुछ दिनों में कुत्ते ने सब कुछ ऐसे फोलो किया की मानो जन्मजात शेर हो। अब वह लगभग भूल चुका था कि वह तो कुत्ता हैअब इम्तिहान की घड़ी आई कुछ दिनों तक लीडर, कुत्ते को ग्रुप में ज़माने पल पल साथ रहा। जहा कुत्ता गलती करता और विरोध होता तो लीडर दहाड़ मर कर सब को शांत करा देता।

अब एक दिन लीडर को यकीन हो गया कि अब कुत्ता पुरी तरह से ग्रुप में घुल मिल गया है, और अब वह आराम से उस पर भरोसा कर सकता है।

इधर लीडर सपनो के आसमान में उड़ रहा था तो दूसरी तरफ़ असंतुष्ट शेरो के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। अब लीडर शेर ने ख़ुद आराम से बैठकर कुत्ते को अपना प्रतिनिधि बनाकर ग्रुप के साथ शिकार पर भेजना शुरू किया। इस तरफ़ शेर ने आराम से कुत्ते को ग्रुप के साथ शिकार करने भेजा और उस तरफ़ कुछ ही दिनों बाद ग्रुप नम आँखों के साथ एक दुःख भरी ख़बर के साथ लौटा ।बिलखते बिलखते ख़ुद को संभल कर एक बुजुर्ग शेर ने लीडर को बताया माननीय प्रतिनिधि जी अब नही रहे।

लीडर शेर ने तब तो काल का ग्रास बने अपने प्रति निधि की मौत पर सब से मौन करवा कर शोक व्यक्त करा लिया, लेकिन बाद में मामले की उच्च स्तरीय जाँच भी करा ली मामले में मर्ग कायम कर बॉडी को पोस्ट मार्टम के लिए भेज प्रकरण विवेचना में लिया गया । मामला तब और सनसनी खेज हो गया जब पोस्ट मार्टम के दौरान यह बात सामने आई कि दरअसल वह कुत्ता नही सियार था। जो कुत्ते की खाल पहन कर ग्रुप में शामिल हो गया था । बहरहाल मामला प्रतिष्टा का बन गया था ; साम, दाम, दंड और भेद से जैसे तेसे सियार वाली बात दबाने ग्रुप लीडर ने जोर लगाया और बाकि बातो को दबाने में तो ग्रुप तत्पर था ही । अब शेरो की वारदात में कौन गवाही देकर बुरा बने, लिहाजा मौत पुरी तरह से दुर्घटना साबित हुई और केस फाइल खात्मे में डाल दी गई । इस घटना के बाद मुझे महसूस हुआ कि सरकार के वादे कि शहर कि तरह कस्बो, गांवो और जंगलो के विकास कि बाते मिथ्या नही हैं । जो आरोप लगते है वो जाकर देख लें । मुझे महसूस हुआ की अब जंगल में भी कानून शहर की तरह तरक्की कर रहा है एक बात और सुना है ग्रुप में इन दिनों एक और कुत्ता भाग्य अजमा रहा है और लीडर का खास बनने प्रयास रत है ।

आरा ...ऐतिहासिक स्थल...बदहाली की ओर धरोहर.

बिहार को जो जनता है वो आरा को बहुत बढ़िया से जानता है। पहले जब लोग बाहर जाते थे तो सिर्फ़ एक बात कहते थे " आरा जिला घर बा तकवना बात के डर बा"। कुछ लोग इन् बातों को सुनकर आरा के बारे में जान गए, जो ऐसे सोच के थे। तो कुछ लोग जो इतिहास के बारे में जानते हैं वे लोग किताबों के जरिये जान गए। मैं जो लिख रहा हूँ वो आरा की ऐतिहासिक होने की बातें कहती हैं। आरा से बहुत से गिरमिटिया भी गुलामी के दौरान बिदेस गए, जिनकी चर्चा गिरिराज किशोर की किताब " पहला गिरमिटिया में भी है" । आरा वो शहर है जहाँ कुंवर सिंह ने आरा हाउस , जो महाराजा कॉलेज परिसर, आरा में स्थित है , उसके अन्दर अंग्रेजों को बंधक बनाया औरउन पर जीत हासिल की थी। आज उस आरा हाउस की बदहाली देखते बनती है। लाखों रुपये खर्च किए गए पर बदहाली जस का तस् बरक़रार। वही आरा मुफ्फसिल थाना के पास स्थित है प्राचीन बीबी जान का हाता। जिसका निर्माण शाहजहाँ के देखरेख में बीबी जान ने अपने पति शाहाबाद के पहले कलक्टर सर जॉन डिन् की याद में बनाया था। परन्तु आज इसकी सुधि लेने वाला कोई नही। भूमाफियाओं ने इसकी जमीं हथिया ली, जॉन डिन् का स्मारक टुटा पड़ा है। वहीँ आरा का नगरी प्रचारिणी सभागार भी अपने आप में ऐतिहासिक है। हिन्दी भाषा को बढावा देने के लिए उन्नीस सौ दो में कुछ बुधिजीविओं ने इसकी स्थापना की थी। कहा जाता है की इस नाम से एक बनारस और दूसरा आरा में ही सभागार है, जिसमे महात्मा गाँधी, पन्त जी जैसे कई महँ बिभुतिया आ चुकी हैं । परन्तु यहाँ अभी तक नाटो किताबों को रखने का सही प्रबंध है, नाही पढने के लिए उचित लाईट। भवन भी जर्जर होता जा रहा है। नगरी प्रचारिणी की अध्यक्ष डी एम् होती हैं परन्तु शुरू में तो वो इस्सका नाम भी नही जानती थी। ऐसे ही कई अन्य स्थल भी हैं ....जैसे बाल हिन्दी पुस्तकालय ,जहा बापू गए और उनका कक्ष भी बना है। जैन ओरिएण्टल लाइब्रेरी, होली चर्च, रमना मैदान आदि है। परन्तु सबकी स्थिति बदहाल है॥ नाटो सरकार सुधि लेती है और नही कोई और। आरा रेलवे स्टेसन पे क्रिश्नागढ़ देवरिया को ऐतिहासिक स्थल बताया गया है, परन्तु वह ऐतिसिकता के नाम पे अब खँडहर भवन ही शेष है। शायद दुसरे राज्यों में कोई ऐसा स्थल होता तो वो वो बिस्व पटल पे अपना नाम , अपनी पहचान ऐतिहासिक स्थलों में रखता.

विज्ञापन की पाठशाला ... मतिभ्रम की पाठशाला

मीडिया (सभी माध्यम) में गला काट प्रतियोगिता और विज्ञापन लेने की होड़, कभी-कभी ऐसी हास्यास्पद या शर्मनाक स्थिति बना देती है जो सिर्फ़ हमे आपको माथा पीटने पर मजबूर कर देती है... ऐसा ही एक उदहारण यहाँ भी है, नीचे तस्वीर पर नज़र डालें और सोचें किस इस तरह ख़बर परोसने के मायने क्या हो सकते हैं. क्या अपराधी को अपराध करने से पहले यह गुरु ज्ञान पढ़ना चाहिए था... या यह अपराध करने और उस से बचने का नायाब तरीका बताया जा रहा है ???


भाग्य फलति सर्वत्रम.....

भाग्य फलति सर्वत्रम , न च विद्या ,न च पौरुषम ।

हम भी कहाँ सहमत थे इससे , किंतु अंततः माने हम ।

सुख के लिए सौ लाख जतन ,पर बिना प्रयत्न पा जाते ग़म ।

उसका चेहरा खिला-खिला ,पर सोच क्यों तेरी आँखें नम ।

कर्म से सब मिल जाता तो, क्यों कौन किसी से होता कम ।

प्रबल वेग रत रथ कर्मों का , भाग्य पवन से जाता थम ।

सत्य जगत में एक दैव का ,बाक़ी सब ये करम, भरम ।

आज मिला फल हमको उनका , पिछले जनम जो किए करम ।

पर क्या बोलें उस जीवन को, जो था अपना प्रथम जनम ।

देखें तो सब व्यर्थ है ये ,पर सोचें तो है गहन मरम ।

भाग्य में था बस लिखते जाना ,इसीलिए मिल गयी क़लम ।

और 'संजीव' है भाग्य यही , जो लोग तुझे पढ़ते हैं कम ।

संजीव मिश्रा

http://trashna.blogspot.com



शर्मनाक यानि अविनाश

बड़े दिनों की शांति के बाद फिर बौधिक जुगाली करनेवाले चिपचिपे और पिलपिले किस्म के लोग इनदिनों व्यस्त हैं इस मुहीम में की ब्लॉग की दुनिया का जानवर ( माफ़ करें इससे बेहतर शब्द मैं इस्तेमाल नहीं कर सकता ) यानि बहुतों का भाई सखा और अन्नदाता अविनाश घटिया है या नहीं, अभी बहुत वक़्त नहीं हुआ जब मुझे , यशवंत जी और दूसरे ब्लाग्गरों को बाकायदा इस '' जानवर'' से मोर्चा लेना पड़ा था, कहानी बड़ी है वक़्त कम है,
इस बार भी ये जानवर चर्चा में हैं हमेशा की तरह अपनी हरकतों की वजह से, हरकतें जिनसे न पत्रकारिता का भला होना है न पत्रकारिता बिरादरी का, हाँ पूरी पत्रकारिता बिरादरी का भरोसा जरुर दांव पर है, कैसे... माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों की एक साथी और शायद कल की होनहार पत्रकार को पत्रकारिता के बेहतरीन सबक देने के बजाय अपनी बाजारू कारीगरी से न सिर्फ वरिष्ठ पत्रकारों के प्रति इन नौनिहालों के मन में ढेर
सारी आशंकाएं भर दी हैं बल्कि अपनी ''जिस किस्म की भी हरकत हो'' उससे जिस बिरादरी का झंडाबरदार होने की कोशिश ये जानवर करता रहा है उसे न सिर्फ इस बार फिर शर्मिंदा किया है बल्कि पत्रकारों के पतन की एक और कहानी जो अक्सर दब जाया करती हैं जाहिर किया है, और जाहिर होने के बाद कईयों के निशाने पर भी है,
व्यक्तिगत रूप से कुछ ईमेल और मेल के आदान प्रदान के बाद इस '' जानवर'' को मैंने बहुत पहले ही खारिज कर दिया था, कईयों ने किया, इसकी नीचता का गवाह भी मैं हूँ की किस तरह हमको अपने ब्लॉग के जरिये ये धमकी देता रहा की आप मुझसे माफ़ी मांगे वरना साइबर क्राइम का मुकदमा आपके खिलाफ कर दूंगा, जब मैं अपने रिपोर्टर मित्रों के जरिये बाकायदा साइबर क्राइम सेल में पड़ताल कराई तो पता चला की ऐसी कोई रिपोर्ट तो दूर कोई शिकायत तक हमारे पास दर्ज नहीं है कहना था साइबर क्राइम सेल प्रभारी का, किसी को मापने के हजार पैमाने नहीं होते, इसकी कमीनगी मेरे सामने थी, खैर ....इस बार पत्रकारिता की एक छात्र ने छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज करायी है इस जानवर के खिलाफ, इस मौके पर कई बरसाती मेढक किस्म के लोग जिन्हेंअविनाश के पिछले रिकॉर्ड को लेकर पूरा भरोसा है की सेटिंग और चालबाजी में माहिर ये जानवर फिर कहीं न कहीं अपनी गोटी फिट कर लेगा और जल्द किसी संस्थान के मलाईदार पद पर बैठा होगा वो इस मौके पर इसके साथ खड़े होकर सहानुभूति दर्ज कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे, आखिर अविनाश के बुरे वक़्त में वो खड़े होंगे तोः उनके बुरे वक़्त में भी अविनाश खडा होगा ही, डीबी स्टार में भी अपने कई चप्पुओँ को इसने फिट ही किया है खैर......
लिजलिजे वामपंथियों का बैठकों में चाय और दारु गटकते हुए क्रांति करने और पैसेवाले घरों के लड़के और लड़कियों को विचारों की चासनी चटाकर उनका और उनके धन और शरीर और संसाधनों का शोषण करना जेएनयू में हजारों बार देखा है, अविनाश भी कुछ नया नहीं कर रहा इधर से उधर से किसी भी मुद्दे पर विचारों का मुलम्मा चढाकर नए लौंडोंको बरगलाता और हाशिये पर पड़े गुमनाम से चरित्रों को कृतार्थ करने का काम करता रहा है, अफ़सोस हर बार अविनाश का नाम चर्चा में आता है लेकिन किसी न किसी बुरे कर्म के चलते, शायद इस जैसों को पीट-पीटकर बचपन में सिखाया गया हो की की बेटा नाम '' बदनाम'' होकर भी होता है, प्रभात खबर में हरिवंश ने इसे बहार का रास्ता दिखाया, '' हरिवंश'' गलत थे, एनडीटीवी प्रबंधन गलत था अभी भास्कर प्रबंधन भी गलत है वजह की ब्लॉग में चौधराहट दिखानेवाले चौधरी अविनाश को इन सबने बाहर का रास्ता जो दिखाया,
शर्मनाक सिर्फ इतना है की अपनी-अपनी वजहों से अपने अपने हितों को सुरक्षित रखने की गरज से कुछ वामपंथी निठल्ले ओर अविनाश जैसी सोच रखनेवाले उसको सिर्फ इसलिए पाक-साफ़ घोषित करने में जुटे हैं क्यूंकि अगर एक छात्र के साथ छेड़छाड़ करनेवाले अविनाश की ये हरकत भी अगर दबा दी जाती है उनके लिए अच्छी खबर होगी जो इस जैसी हरकतों को अंजाम देने के सपने संजोये बैठे हैं, दो पत्रकारिता संस्थानों में पढाने के साथ साथ पिछले ६ साल से टीवी, रेडियो ,प्रिंट में घूमने के बाद भी इस किस्म के एक भी आरोप न लगने को अपनी उपलब्धियों में ही शुमार करना चाहूँगा, लेकिन इधर जिस तरह से एक विवादित चरित्र के जानवर( दूसरो के मामले में आदमी समझें) को कुछ बेशर्म बचाने में लगे हैं उसपर वाकई शर्म के सिवाय क्या भेजूं इनको, साहित्य में एक परंपरा सी हो गयी है की बिना दारूबाजी व एक आधे स्कैंडल के कोई साहित्यकार नहीं माना जाता या यूँ कहें की साहित्यकार बनाने या वामपंथी विचारक होने के लिए इस किस्म की वीभत्स हरकतें को अंजाम देना एक अनिवार्यता सी बनती जा रही है उससे भी शर्मनाक ये की ऐसी हरकतों को अंजाम देनेवालों को बेहद निरीह व कुचक्रों का शिकार बेचारा घोषित करवा दिया जाता है ताकि कुछ साझा हित साधकर बड़े सलीके ओर करीने से ऐसी शर्मनाक हरकतों के आगे किये जाने का रास्ता खुला रह सके, शायद तभी पत्रकारिता में कई कमीनगी को अंजाम देने के बाद ये घटिया जानवर बेहद मासूमियत से अपने किये पर पर्दा कुछ यूँ डालता है'' मेरी सहानुभूति उस लड़की व मेरे आलोचकों के साथ है''
प्राकृतिक न्याय में भरोसा रखने के कारण उम्मीद करता हूँ की अविनाश नामके जानवर को प्रकृति अपने तरीके से दंड देगी व इसे फिर से खुद को बेगुनाह साबित करने ओर शब्दों के साथ हेरफेर करके खुद को बचने का मौका नहीं मिलेगा, आमीन
( माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वे छात्र जिनका हौसला डिगा है, उनसे अनुरोध की अपनी शानदार-जुझारू परंपरा को जारी रखें )....शुभकामनाएं.....

21.2.09

कहाँ गए दिन फूलों के

अँधियारा जंगल-जंगल,
दूर-दूर तक अब केवल,
दिखते झाड़ बबूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
हर पनघट सूना-सूना,
सूनी-सूनी चौपालें,
मौन चतुर्दिक घूम रहा-
पहन हादसों की खालें,
गुमसुम नीम, मौन आंगन,
ठिठका सा देखे सावन-
मुखड़े सहमे झूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
अंकुर की करतूतों पर-
बादल भी शर्माता है,
पूरब का सारथी यहाँ-
पश्चिम को मुड जाता है,
छल से भरे स्वयम्वर में,
और झूठ के ही घर में-
चर्चे हुए उसूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
महानगर में हँसना तो-
केवल एक बहाना है,
सच तो ये है आंसू का-
हम पर बड़ा खजाना है,
ऊपर सुमनों के लेखे,
भीतर तक किसने देखे,
खाते तीखे शूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के

चेतन आनंद
[डब्लू डब्लू डब्लू डॉट तुम्हारी याद में डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम ]

निशा का पिंक एलिफेंट

हिन्दुस्तान टाइम्स में chaddi kissa continues .. शीर्षक से छपे निशा सुसान के वक्तव्य से समझ में आ रहा है कि वे अपनी पिंक चड्डी कैम्पेन का ऑफ्टर इफैक्ट्स भुगतने जा रही हैं, साथ उनके ऐसी गर्ल्स शिकार होंगी (या हो रही हैं) जो पिंक चड्डी कैम्पेन की जानकारी से कोसों दूर हैं। फागुन के महीने में मनचलों की शिकार वे साधारण गर्ल्स ही होंगी .
निशा सुसान को लोग फोन करके परेशान कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके मोबाइल नम्बर पर वेलेंटाइन के दुश्मनों के फोन आ रहे हैं और वे अभद्र आचरण वाली बातें कर रहे हैं....अपना मोबाइल नम्बर आपने ही वेबसाइट्स और मिडिया पैर डाला था, तब भूल गई थी -न्यूटन का थर्ड लॉ- एवरी एक्शन हैज एन इक्वल रिएक्शन

अफसोस
अब मैडम वे अभद्र आचरण वाली बातें करेंगे ही, जो चंद रुपयों और शराब-शबाब के लिए नेताओं की जागीर चलाते हैं, उन्हें आप से और सामान्य जन से क्या मतलब। वो तो ऐसे लोग हैं, जो अपनी बहू-बेटियों को नहीं छोड़ते। फर्क इतना है कि बाहुबल की वजह से ये चीखें चाहरदीवारी में दफन हो जाती है।
और आपको परेशान करने का मतलब है मिडिया के जरिये गर्ल्स के जेहन में डर पैदा
पिंक चड्डी कैम्पेन पिंक पॉलिटिक्स से जुड़ गया है ये तो आपने हिसाब लगा लिया होगा ?



कब सुधरेंगे हम.....

आज की ताज़ा ख़बर ये है की...अमेरिका में सभी लोग भारतियों को .सल्म्दोग कहने लगें है। ये तो होना ही था क्यूंकि विदेशों में यही सब तो बिकता है.उन्हें यहाँ की गरीबी,गन्दगी,झुग्गी झोपडियां और हमारा अपमान ही तो .सुहाता....है.वे कभी भी नहीं भूलते की यही भारत ..है.....गाहे बगाहे वे .हमें...अहसास कराते रहते है की तुम बस यही कुछ हो.हमारे यहाँ की ऐसी बातें उन्हें बहुत पसंद आती है तभी तो भारत की बढ़िया से .बढ़िया...फ़िल्म उन्हें निराश करती है जबकि सलाम दोग उन्हें आकर्षित करती है....इसे वे सभी सम्मान मिल जाते है जिनके लिए बड़े से बड़े निर्माता निर्देशक तरसते रहते है...लेकिन ये सब हमारे लिए निसंदेह शर्मनाक है...हमारी बेचारी बेबसी को बेच कर कोई हमें लज्जित करे ये हमें नहीं .पसंद...पर क्या करें ...पोपुलर होने....की चाह में हम सब भूलते जा रहे है....

शांति और आनंद के दाता शिव


विनय बिहारी सिंह

एक दिन बाद शिवरात्रि है। माना जाता है कि शिवरात्रि की रात जाग कर शिव जाप करने से वे प्रसन्न होते हैं। प्रसन्न हो कर क्या करेंगे। कहा जाता है- वे जीवन में शांति लाते हैं। हमें तनाव मुक्त करते हैं। शिव जी जिसको प्यार करते हैं, उसे किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं। इसीलिए तो उन्हें औघड़ दानी कहते हैं। वे सिर्फ देना जानते हैं। देना और उद्धार करना। भगवान शिव तुरंत प्रसन्न होने वाले देवता हैं। वे ज्यादातर ध्यान मुद्रा में बैठे रहते हैं। लेकिन समूचे ब्रह्मांड की गतिविधियां उनकी जानकारी में रहती हैं। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि पुराणों में जिन्हें कृष्ण कहा गया है, तंत्रों में उन्हें ही शिव कहा गया है। वही परमब्रह्म हैं। चाहे कृष्ण कहें या शिव, चाहे काली कहें या दुर्गा। वही सृष्टि करने वाले, उसका पोषण करने वाले और अंत में संहार करने वाले हैं। ऋषियों ने कहा है कि जो पैदा होता है वह खत्म भी होता है। लेकिन जो सनातन है, वह कभी खत्म नहीं होता। ईश्वर के अलावा सब कुछ तो नश्वर है। और शिव जी तो वीतरागी हैं। एक मृगछाला पहने, शरीर में भभूत लगाए और ध्यान में बैठे हैं। न उन्हें अच्छा खाना चाहिए और न कपड़ा। हां, अगर समुद्र मंथन में भयंकर विष निकलता है तो उसे पीने के लिए वे तैयार हो जाते हैं। इसीलिए उनका नाम नीलकंठ है। राजा भगीरथ जब स्वर्ग से गंगा नदी को धरती पर ले आए तो उन्हें चिंता हुई कि आखिर गंगा का वेग रुकेगा कैसे? कहीं पूरी पृथ्वी की आबादी बह न जाए। उन्होंने शंकर भगवान से प्रार्थना की। उन्होंने गंगा के प्रचंड वेग को अपनी जटाऔं में उलझा दिया। वेग शांत हो गया। तब गंगा नदी स्वाभाविक गति से धरती पर बहने लगीं। भगवान शंकर के ही पुत्र हैं गणेश भगवान। वे सिद्धि विनायक हैं। कोई भी काम करने से पहले हम सब कुछ मंगलमय हो, इसके लिए गणेश जी की पूजा करते हैं। इस महाशिवरात्रि में क्यों न हम कुछ देर शांति से बैठ कर भगवान शिव का ध्यान करें और अपना मंगल तो चाहें ही, सबके मंगल की भी कामना करें।

हाथो से हाथ छूट गया

ये दूर जाने वाले कभी तो पलट के देखा होता,
एक साथी जो तेरा था वो राह में छूट गया!
प्यारे से बंधन को जो हम निभा रहे थे,
न जाने किसकी गलती से वो टूट गया!

अब तो तन्हाईया और गम ही संग हैं,
और साथ देने को आँखों से आँसू भी छूट गया!
न जाने कितने रंग दिखायेगी ये जिंदगी,
जब जिंदगी का सितारा ही टूट गया!

जिंदगी में प्यार का जो अनमोल खजाना था,
वो न जाने कौन अनजाना लूट गया!
दो पल की ये जिंदगी अब नजर आती है,
नजरो का सपना जब से टूट गया!

न हो तुम पर तुम्हारी यादे ही सही,
इन यादो का दामन तो न छूट गया!
प्यार बहुत किया था मैंने तुम्हे पागल,
पर एक मोड़ पे हाथो से हाथ छूट गया!

deep madhav
deep_sa15@yahoo.co.in
www.sapnemere.blogspot.com

ऐसे जज को हटा देना ही सोलुशन है ....

संविधान के आर्टिकल 217 में हाई कोर्ट जज को हटाने की व्याख्या है। नियमों के तहत किसी जज को हटाने के प्रस्ताव को पारित होने कोर्ट लिए संसद के दोनों सदनों में वोटिंग में उपस्थित सांसदों का दो तिहाई समर्थन होना जरूरी है। उसके बाद ही राष्ट्रपति संबद्ध जज को हटाने का आदेश जारी कर सकते है । इस आधार पर राज्यसभा के सदस्यों ने कोलकाता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन पर महाभियोग लगाने की सिफारिश की है ।
संविधान के अनुसार हाई कोर्ट के किसी जज को हटाने के प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों के साइन होने चाहिए। अगर संसद महाभियोग पर विचार करती है तो यह किसी जज को हटाने का दूसरा प्रस्ताव होगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट जज वी. रामस्वामी के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था। उन पर आरोप था कि जब वह पंजाब हाई कोर्ट के जज थे उस समय उन्होंने पद का दुरुपयोग किया था।लेकिन वह प्रस्ताव पास नही हो पाया था ।

कलम लेखको से लहू मांगती है!

अभी रिक्त भरना है! खाका चमन का,
नया रूप गढ़ना है! उजडे वतन का
पहाडो का दामन न छुए पडोसी,
सुला कर न गर्दन दबाये सपन का
सजाले पुजारी हृदय की उषा को,
धरा यह रवानी की बू मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

वतन के लिये ही कलम जन्मती,
समर्पण वतन के लिये जानती है
वतन के बिना शब्द रहते अधूरे,
वतन को कलम ज़िन्दगी मानती है
हवन हो रहा है युगों से वतन पर,
वतन की चिता ज़िन्दगी मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

प्रखर चेतना के नये गीत लेकर,
बहाती प्रवाहों की धारा धरा पर
क्षितिज लाल पूरब का करती कलम ही,
कुहासे की धूमिल घटाएँ हटा कर
विषम काल से जूझती है मगर अब,
शहादत की वेदी पे खू मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

कलम क्रांति का कर रही है आमंत्रण,
कलम शांति का कर रही है निमंत्रण
कलम काल का भाल रंगने चली है
चली है दमन पर अमन का ले चित्रण
कलम सर कलम कातिलो का करेगी,
कलम आँसुओं की दुआ मांगती है

कलम लेखको से लहू मांगती है!

अधिक कविताओं के लिए देखें यायावरी

उसके हिम्मत और खुद्दारी को सलाम करता हूँ...

आज मैंने एक रिक्शेवाले को देखा ....मेरा मन दहल गयाउसका एक हाथ कटा हुआ थाएक ही हाथ से रिक्शा चला रहा थाउसके हिम्मत को देखकर मै चकीत रह गया .....सोच रहा हूँ एक हाथ से रिक्शा चलाना कितना मुश्किल होगाउसने बताया की शुरू में तो यह संभल ही नही रहा था लेकिन धीरे धीरे आदत हो गई और अब चला लेता हूँ
सोचता हूँ उसने बहुत हिम्मत का परीचय देते हुए यह रास्ता चुना है ...... वह चाहता तो भिखमंगों की कतार में शामिल हो सकता था लेकिन उसने ऐसा नही कियामैंने कुछ अधिक पैसे देने की कोशिश की पर असफल रहा
इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया है ...... शायद भविष्य में कभी निराश हो जाऊं तो उसका चेहरा जरुर याद करूँगाउसके हिम्मत और खुद्दारी को सलाम करता हूँ

youth ko sirf nare mat de

युवा टारगेट पर इनकी सोचता कौन है?
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सुना है अब पीएम इन वेिटंग एलके आडवाणी भी युवाओं को चुनावी लछय में शािमल िकया है। इसके िलए भाजपा ने नयी रणनीित नबायी है। िजसमें यूिनवरिसटी और कालेजों के छातरों को अपनी तरफ लाने की कोिशश होगी। ये नुसखा काफी समय से कांगरेस के युवराज लाहुल गांधी भी अजमा रहे है। राहुल गांधी को देख ही भाजपा के रणनीितकारों ने यह नीित बनायी है। राहुल गांधी देश की यूिनवरिसटी कालेजों का दौरा कर रहे है। युवाओं के साथ, खासकर लड़िकयों के साथ उनकी फोटो अखबारों में खूब छप रही है। अब देश की दो पारटी िजस तरह से युवाओं को टारगेट कर रही है उससे पता चलता है िक चुनाव के िलए दोनों पारटी हर तरह की योजना को अंजाम दे रही है। अब सवाल उठता है िक इनकी कोिशश िकतनी रंग लाएगी? युवा वरग इनसे िकतना परभािवत होगा यह समय ही बताएगा?दरअसल देश का युवा वरग शुरू से राजनीितक दलों के िनशाने पर रहा है। देश के राजनीितक आंदोलनों को एक िदशा इस देश के युवाओं ने दी है। जेपी मूवमेंट के सूतरधार भी युवा ही थे। उसी जेपी आंदोलन के कई युवा आज देश के कई राजयों के मुखयमंतरी पद पर िवराजमान है। इसिलए युवाओं को टारगेट करना कोई नई बात नहीं है। पर सवाल उठता है िक आडवाणी और राहुल गांधी कया उतना परभाव इन युवाओं पर डाल पाएंगे तो जेपी ने डाला था। जेपी आंदोलन के बाद युवा सवगीॆय वीपी िसंह के टारगेट भी रहे। पूरे देश में वीपी िसंह को युवाओं से समरथन िमला। पर मंडल आंदोलन के बाद युवा दो वरगों मे बंटा और एक वीपी िसंह िवरोधी हो गया तो एक वीपी िसंह समरथक। वीपी िसंह ने देश के युवाओं को जाित के नाम पर हटा और मुददों से हटकर आंदोलन में िनजी सवराथ नजर आया। हलांिक यह इंटरेसट िनजी होते हुए भी सामूिहक था। एक जातीय पहचान िलए जो युवा राजनीित देश में हुई वो भाजपा बरदाशत नहीं कर सकी। उसने भी कमंडल की राजनीित को तेज िकया। इसका पिऱणाम यह हुआ िक युवाओं की काफी संखया कमंडल की राजनीित में भी आ गई। ये युवा देश में मुददों से हट ईंट पूजने लगे। अयोधया में राम मंिदर बनाने लगे। यहीं से युवा वरग की राजनीित की एक अलग िदशा तय हुई। आडवाणी और राहुल गांधी को युवाओं को टारगेट करने से पहले िसथितयों को समझना चािहए। जेपी के समय में जो आंदोलन युवाओं ने शुरू िकया वो आंदोलन शुरू करने का दमखम आज युवाओं में नहीं है। दूसरी बात वीपी िसंह ने भी िजन युवाओं को अपने साथ रखा उनकी सोच काफी पिरपकव थी और उनहोंन मुददों को समझा। देश की राजनीित में अपनी भागीदारी बनाए रखी।जेपी और वीपी के आंदोलन में गांव और कसबों के युवाओं की भागीदारी थी। आज िजस युवा वरग की बात आडवाणी और राहल कर रहे है वो लैपटाप संसकृित के युवा है। इनकी पकड़ गांवों और छोटे कसबों में नहीं है। खबर है िक आडवाणी के टारगेट अरबन यूथ है। ये अरबन यूथ िकतनी आडवाणी की जीत तय करेंगे समय बताएगा। ये अरबन यूथ लैपटाप,पीजा संसकृित के है। चुनाव के िदन को ये छुटटी के िदन के तौर पर िबताना चाहेंगे। चुनाव के िदन अकसर देखा जाता है िक ये यूथ छुटटी मनाने कहीं औऱ चला जाता है। ये मतदान केंदर तक पहुंचने का जहमत नहीं उठाना चाहता है। जेपी आंदोलन के युवाओं और राहुल,आडवाणी के युवाओं में फरक है। जेपी के युवा इमरजेंसी के िखलाफ आंदोलन चलाने में लगे तो महीनों जेल में रहे। इलाहाबाद यूिनवरिसटी,बनारस िहंदू यूिनवरिसटी,पटना यूिनवरिसटी के कई छातर महीनों जेल में रहे। नीतीश कुमार, सुशील मोदी जैसे नेता मीसा में बंद थे। लेिकन राहुल िजन युवाओं को लेकर समाज में पिरवरतन की बात कर रहे है अगर उनहें थाने में पकड़ कर पुिलस ले जाए तो शायद पेशाब बाहर आ जाए। ये वो युवा है जो रात में बारह बजे तक पब में दारू पीकर नाचने में समय गवांते है। उनहें देश के मुददों से कोई लेना देना नहीं है। उनका एक ही मुददा है फन।दोनों बड़ी पारिटयों को इस बात पर िचंतन करना चािहए की छोटे राजनीितक दल युवाओं को कयों टारगेट नहीं कर रहे है?बसपा,सपा, जद यू,बीजद जैसे राजनीितक दल के नेता यूिनवरिसटी के चककर कयों नहीं काट रहे है?वो फोटों कयों नहीं िखंचवाते? बात समझतने की है। इन सारे दलों ने छोटे कसबों और गांवों के युवाओं पर अपनी पकड़ बना रही है। ये वो युवा है जो बूथ पर पहुंचते है। पोिलंग के परितशनत को बढाते है। ये इनकी भावनाएं राहुल गांधी जैसे युवराज से जुड़ने के बजाए मायावती,मुलायम िसंह, नीितश कुमार,नवीन पटनायक जैसे नेताओं से जुड़ी है। इनकी भावनाओं में जातीय और रीजनल पहचान की पकड़ है ये राहुल और आडवाणी के झांसे में नहीं आ सकते। वहीं युवाओं का एक वरग देश के िविभनन आंदोलनों से जुड़ चुका है जो िहंसक है। वो चाहे नकसली आंदोलन हो,जो देश के कुछ राजयों में चल रहे अलगाववादी आंदोलन।अब िवचार करे। देश के युवाओं ने आंदोलन में अपने आप को आगे िकया और देश के कई आंदोलनकारी युवा देश में नेता बने। कई युिनवरिसटी के छातर संघ के पदािधकारी देश की राजनीित में छाए। िबहार की राजनीित में राज ही जेपी आंदोलन के युवाओं का है। िपछले बीस सालों से िबहार की राजनीित में इनहोंने कांगरेस को हािशए पर रखा। देश के संसद में भी कई युवा नेता पहुंचे। ये वो युवा नेता थे जो संघरष कर आगे आए। जेलों में गए। िफर सांसद और िवधायक बन कर आए। पर देश में कई एेेसा युवा है िजनहोंने जेल तो कया एक घंटे तक थाने में भी नहीं बैठे। हालांिक युवाओं के नाम पर अपनी रोटी चला रहे है पर सांसद इसिलए बने िक ये िकसी बड़े नेता के बेटे है। माधव राव िसंिधया के बेटे जयोितरािदतय,राजेश पायलट के बेटे सिचन पायलट,मुरली देवड़ा के बेटे िमिलंद देवड़ा,िजतेंदर परसदा के बेटे जितन परसाद कांगरेस के युवा आंदोलन के परतीक है। एसी कमरे से िनकल दो घंटे तक सड़क पर खड़े नहीं हो सकते। आंदोलन को शउरू करने की बात छोड़ दे। यही हाल भाजपा का है। आंदोलन के युवा नजर नहीं आते। इनके युवा सांसद है जसवंत िसंह के बेटे,वसंुधरा राजे के बेटे, परेम कुमार धूमल के बेटे। अब इनहें मुददों और आंदोलनों की िकतनी समझ है ये सारा देश जानता है?िसरफ िकसी बड़े राजनेता के बेटे होने के अलावा इनकी कोई और उपलिबध नहीं है।आडवाणी जी और राहुल गांधी को समझना चािहए िक मैनेजमेंट और आईआईटी उनकी चुनावी नैया को पार नहीं लगाएंगे। नैया के पार लगाने वाले युवा िफलहाल छोटे राजनीितक दलों के कबजे में आ चुके है। जो युवा वोट में रुिच रखते है और मतदान केंदर पर पहुंचेंगे उऌकी पहचान जातीय हो चुकी है। उनके कमर में िरवालवर भी होता है। िजनके कमर में िरवालवर होता है वो नेता होता है और उसके साथ एक छोटा सा गरुप होता है। ये युवा बीडीपीओ दफतर,डीसी दफतर पर अपना दबदबा रखता है। ये अपने साथ के युवाओं को ठेकेदारी िदलाता है। ठेका िदलवानें,रोजी रोटी उपलबध करवानें में रीजनल पारटी के नेता उनहें सहयोग देते है। िफर ये राहुल और आडवाणी से कयों जुड़े। ये तो वो नेता है जो चुनाव जीतने के बाद जेड पलस में छुप जाएंगे। मलाई खाने की बारी आएगी तो २४ अकबर रोड और ११ अशोक रोड में बैठे बड़े पदािधकारी खाएंगे। जब युवा इनके पास कोई काम लेकर आएंगे तो अनुशासन का पाठ पढ़ाएंगे। खुद मलाई खाएंगे और युवाओं को राषट सेवा की पाठ पढ़ाएंगे।अब टीवी चैनलों को देखे। कई युवा रािबन हुडों की आलोचना होती। सूरजभान,पपपू यादव,धनंजय िसंह,शाहाबुदीन,मुखतार अंसारी जैसे लोगों से लोगों को सावधान िकया जाता है। टीवी चैनलों पर कहा जाता है िक इनहें चुन कर अपना वोट मत खराब करे। ये अपराधी है। कई लोगों की हतया कर चुक है। लूट और िफरौती के मामले इन पर दरज है। अगर एेेसे लोग संसद में पहुंच कानून बनाएंगे तो देश कया करेगा। अब लोगों की दरद तो अखबार और टीवी चैनल समझते नहीं है। देश की जनता उसे चुनना पसंद करती है जो उनके िलए आशानी से उपलबध है। ये रािबन हुड बेशक अपराधी है पर अपने इलाके की जनता के िलए भगवान से कम नहीं है। उनका काम िमनटों मं होता है। इऌ अपरािधयों के आदेश पर िमनटों में जनता का काम होता है। िफर देश की जनता कया करे? उनहें चुने जो जेड पलस में हो और िदलली से बाहर न िनकले?िफर ये अपराधी सांसद कया करे? अब ये भाजपा और कांगरेस के िकसी बड़े राजनेता के बेटे तो है नहीं िक इनहें तुरंत लोकसभा का िटकट िमल जाएगा। िफर एेसी योगयता के आभाव में हिथयार और रािबन हुड कलचर ही एक एेसी योगयता है िजसके सहारे ये चुनकर आ सकते है?

मैं और मेरी तन्हाई...

मैं और मेरी तन्हाई
अक्सर ये बातें करते है
तुम होती तो ऐसा होता
तुम होती तो वैसा होता
पर सच कहूँ?
मैं और मेरी तन्हाई
कभी कोई बातें नही करते
मैं कभी तन्हा होता ही कहाँ
तुम्हारी याद मुझे कभी
तन्हा होने ही नही देती है
तुम्हारी याद कभी
तेरी याद आने नही देती है
वरना......
मैं और मेरी तन्हाई भी
अक्सर बातें करते

20.2.09

मेरे शहर का एक आदमी.........!!

मेरे शहर का एक आदमी.............!!
..........कब,क्या,क्यूँ,कैसे.........और किस परिणाम की प्राप्ति के लिए होता है......ये किसी को भी नहीं पता.......!!हर कदम पर कईयों भविष्यवक्ता मिलते हैं.....लेकिन अगर आदमी भविष्य को पढ़ ही पाता....तो दुनिया बेरंग ही हो जाती.....!!अभी-अभी हम घर से कहीं जा रहे हों.........और अचानक कहीं किसी भी वक्त हमारे जीवन के सफर का अंत ही हो जाए....!!अभी-अभी हम जिससे मिलकर आ रहे हों........घर पहुँचते ही सूचना मिले कि वो शख्स अभी दस मिनट पहले दुनिया से कूच कर गया........!!हमें कैसा लगे....??हमारे मर जाने की सूचना पर किसी और को कैसा लगे....??
जीवन कैसा है.....जीवन कितना है....जीवक कब तक है....ऐसे प्रश्न तो सबके ही मन में पता नहीं कितनी ही बार उमड़ -घुमड़ करते ही रहते हैं.........मगर जवाब....वो तो सबके ही लिए हर बार ही नदारद होता है.....जीवन को ना जाने कितनी ही उपमाओं से लादा गया है.........मगर इसकी गहराई की थाह भला कौन नाप पाया.........??चलते-फिरते अचानक ही हम पाते हैं की फलां तो चला गया....!!.......हमारे मन में भला कहाँ आता है कि हम ही चले गए.....मौत का स्वाद किसी को भी अच्छा नहीं लगता.........और मौत का रंग...सबको बदरंग.....और हम पाते हैं मगर कि हर और मौत का आँचल लहरा रहा है....हर तरफ़ मौत का खौफ तारी है....!!
.............हर जगह जनसामान्य लोगों के बीच बहुत सारे अलग किस्म के लोग भी होते हैं.....जो समाज की धुंध में......वातावरण के सन्नाटे में कुछ रचते ही रहते हैं.... अपनी ताकत भर कुछ ना कुछ बुनते ही रहते हैं....बेशक समाज उस रचना को बहुत महत्व नहीं देता.....मगर किसी के महत्त्व ना देने भर से अगरचे चीज़ें खारिज हो जाया करती तो,,, मरे हुए लोग सदा-सदा के लिए भूला ही जाते...मगर समय इतना अन्यायी कभी होता कि सबको यूँ ही खारिज कर दे....!!
..........और खारिज किया भी नहीं जाना चाहिए......!!..........रांची जैसे शहर में आज से कोई बीस वर्ष पूर्व एक नाटक का प्रदर्शन हुआ था........"अमली" नाम था उसका.....और इस नाटक के प्रदर्शन के साथ ही रांची के रंगमंच ने जिस शख्स को सही तरीके पहचाना.........उसका नाम था "अशोक कुमार अंचल.....".........बेशक ये नाम नाट्य -जगत में पहले भी सुना जा चुका था.........और पहले ही स्वयम के द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक "पागल-खाना" से सु-विख्यात और सु-चर्चित था..........और उनके पागलखाना ने ढेरों पुरस्कार आदि भी बटोरे.........और प्रशंसित भी हुआ.......और अनेकानेक बार मंचित भी.......और सही मायनों में पागलखाना आज के परिवेश की वीभत्स सच्चाईयों को....और क्रूरताओं को बड़ी गहराई से अभिव्यक्त करता था.......अगर यही नाटक दिल्ली या मुम्बई के किसी निर्देशक ने मंचित करवाया होता तो पता नहीं उसे कहाँ-कहाँ और कितने और कितने ऊँचे बैनर के पुरस्कार मिले होते.....मगर चूँकि रांची मुंबई या दिल्ली तो नहीं........सो इस पर चर्चा बेमानी ही है ना.......!!
..........फुल लेंथ प्ले के रूप में अंचल जी का "अमली" नाटक बहुचर्चित और बहुप्रशंसित रहा.........हाँ मगर उसके अनेकानेक मंचन ना हो पाये........मगर उसने रांची के रंगमच पर उस वक्त गहरी छाप छोड़ी.........और उसके लोक गीत अक्सर रांची के कलाकारों के द्वारा गुनगुनाये जाते रहे..........मुझे याद है कि मैं तब रोज रांची के महावीर चौक में अवस्थित संस्कृति विहार में बिला नागा रिहर्सल देखने जाया करता था.........उन दिनों मैं ख़ुद नाटकों का दीवाना था.......और सच कहूँ तो उस उम्र में यानि १८ वर्ष में पचासों नाटक के मंचन बतौर अभिनेता कर चुका था....तो भला अंचल जी से भला दूर कैसे हुआ होता......उनसे हँसी-मजाक और भी ना जाने कितनी ही बातें.......अब तक भी याद हैं......!!
.........और बाद में उनका एक और रूप उभर कर सामने आया उनका कवि....शायर........गीतकार........और तरन्नुम में ग़ज़ल गाने वाला गायक भी होने का........और आज मुझे यह सोचकर आनंद भी हो रहा है........और कातर भी हो रहा हूँ कि........कम-अज-कम मैं उनके साथ पचास से ज्यादा कवि गोष्ठियों में शामिल रहा होऊंगा....और उनकी तमाम रचनाओं का जवाब मैंने अपनी आशुकविता के रूप में उसी वक्त दे दिया करता था.........पहले तो ख़ुद गद-गद हो जाया करते थे....और फिर उनकी प्रंशंसा से मैं ख़ुद भी....!! कादम्बिनी क्लब की माहवार गोष्ठियों में वे बिला नागा उपस्थित होते थे....अभी तक यह सब सोचना बहुत ही मामूली था.........मगर आज यही कार्य बड़ा दुष्कर हो रहा है...और बड़ा ही अजीब............अब तक ये हम दोनों की यादें थीं मगर आज से ये यादें सिर्फ़ मेरी ही रह गयीं.....वो यादों से ऊपर ही उठ गए.....हर महीने उन्हें किसी ना किसी कार्यक्रम में शरीक देखना या अखबार में पढ़ना गोया मेरी दैनिक दिनचर्या में शुमार हो गया था.........कादम्बिनी क्लब का बंद होना इसके सारे सदस्यों को जैसे एकदम से विलग ही कर गया....और जिनकी कविताओं के मैं जवाब दिया करता था........सब के सब अपनी-अपनी व्यस्तता में डूब गए....और सबसे ज्यादा तो मैं ख़ुद.....!!
और उनमें से सबसे ज्यादा हँसता,बोलता,गाता...और पान खाता शख्स आज से हम सबके बीच है ही नहीं....यह कहना तो दूर अभी तो यह सोचना भी अजीब लग रहा है.... अशोक कुमार अंचल....जिनके कृतित्व को मापा जाना अभी शेष है....आकाशवाणी.....दूरदर्शन.........टेलीविजन धारावाहिक....और भी ना जाने क्या-क्या...हाँ मगर सबका रूप नितांत देशी ही.....ख़ुद उनकी तरह....!!जब किसी का कृतित्व उसके ख़ुद के व्यक्तित्व या चरित्र से मेल खाता हुआ सा लगे तो समझ लो वो आदमी ज्यादातर इमानदार ही है...अपने प्रति भी अपने परिवेश के प्रति भी.....और बेशक वो ज्यादा कुछ समाज को देता हुआ प्रतीत नहीं होता.....मगर यह नहीं दे पाना भी उसमें एक अवयक्त किस्म की छटपटाहट के रूप में व्यक्त होता ही रहता है........और मैंने यह बात बेशक कहीं ना कहीं अंचल जी में में देखी.......और वही एक देशी किस्म का अल्हड व्यक्ति एक सड़क दुर्घटना में मारा जा चुका है.....यह बात दिल को पच ही नहीं पा रही..........और मजा यह की दिल्ली में बैठे मेरे मित्रों यथा अनुराग(अन्वेषी)....पराग(प्रियदर्शन).....राकेश(प्रियदर्शी).....आदि लोगों को रात ही पता चल गई.....और मुझे सुबह नौ-दस बजे....और तिस पर भी मैं ना तो उनके घर....और ना ही घाट पर जा पाया..........और अब रात को अपने ही घर में उस शख्स की बाबत अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ....और अभी कुछ ही देर में ये विचार नेट पर प्रकाशित हो जाने को हैं....कहीं उन्हें याद करके भी तो मैं एक स्वार्थ भरा कार्य नहीं कर रहा.....??........यदि ऐसा है तो भाई "अंचल" मुझे माफ़ कर देना.........मुझे पता भी नहीं कि मैं किस किस्म का गुनहगार कहा जाऊं.....!!

खुदा का शुक्र है मैं मुसलमान नही

ये मेरे साथ पहली बार नही हुआ है। करियर बनाने की धुन के संघर्षमय दौर में ये चोथी बार हुआ है। और सोचता हूँ कि क्या भारत में मुसलमान होना इतना बड़ा जुर्म है ? जिसे ख़ुद एक मुसलमान भाई भी नही जानता होगा। खुदा की मर्जी से इंसान जन्म लेता है और जिन्दगी की गुजर बसर करता है। इस दुनिया में जन्म लेने से पहले अगर इश्वर पूछता कि अमुख व्यक्ति कंहा जन्म लेना चाहता है तो शायद ही कोई भारत में मुसलमान और पकिस्तान में हिंदू बनकर जन्म लेने की हामी भरता ?

मैंने अपना देश देखा है इसलिए अपनी बात करता हूँ। पिछले कुछ दिनों से एक कमरे कि तलाश में घूम रहा हूँ। ठीक वैसे ही जब पहली बार कुछ कर गुजरने की चाहत लिए दिल्ली की गलियों की ओर गाँव से कसबे, कसबे से ग्वालियर जैसे महानगर में और फ़िर ग्वालियर से राजधानी दिल्ली की ओर कूच कर बैठा। तब पहली बार जाना था कि अगर मैं मुसलमान होता तो कितनी मुश्किलें ख़ुद व ख़ुद घेर लेती। कमरे को किराए पर देनी की पहली शर्त मुसलमान न होना थी। यही शब्द फ़िर मेरे कानो में हाल ही में गूंजे हैं जो चोथी बार है।

बात उन दिनों की है जब जनसत्ता अखबार में इन्टर्न शिप करने के लिए पहली बार मैं दिल्ली आया था। दो माह की इंटर्नशिप थी। इसकारण रहने और खाने पीने का आस्थाई इंतजाम करना जरूरी था। काफी पूछ ताछ के बाद पता चला की सस्ता और सुलभ कमरा न्यू अशोक नगर में मिल सकेगा। सो तलाश जारी कर दी। जितने मकान मालिको से बात हुयी सबका पहला सवाल था मुस्लमान तो नही हो ? मैं अचरज में पड़ गया था, यह सोच कर की गर मैं मुसलमान होता तो क्या वाकई मुझे कमरा नही मिलता ? शुक्र है खुदा का मैं मुसलमान नही हूँ। फ़िर चाहे हिंदू होकर ही कितना भी कमीना, मदिरा पान करने वाला, मांस खाने वाला व अयियास क्यों न होऊ। कोई फर्क नही पड़ता। यहाँ तो हिंदू और मुसलमान जैसे शब्दों पर ही सारे समीकरण अटक जाते हैं। एक दूसरे से नफरत का कारन हिंदू और मुसलमान होना काफी है। हाल ही में फ़िर से कमरे की तलाश में घूम रहा हूँ। खूब भटका हूँ पर पहले वाला सवाल आज भी पहले पायदान पर ही हैं,, सच मैं मुसलमान नही हूँ, और होऊ भी तो क्या इस तरह के माहौल में कोई अपने धर्म को बताएगा ? न भी बताएगा तब भी कहा छोड़ा जाता है दंगो में। गाँव और मुहल्ले धर्म के नाम पर जला दिए जाते हैं। महिलायों की इज्जत महज इसलिए लूट ली जाती है क्योकि वह दूसरे धर्म की होती हैं। क्या किसी की सामाजिक जिन्दगी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर देनी चाहिए की वह दूसरे धर्म की हैं ?

आहत हूँ ये सोचकर, इसतरह का व्यवहार करने के बावजूद हम उम्मीद करते हैं की अमुख धर्म के लोग इक होकर रहे, देश का सम्मान करे ?

भीष्म साहनी की उपन्यास तमस की गन्दी राजनीति याद आती हैं जिसमे मुस्लिम नेता हिंदू के हाथो सूअर मरवा कर मस्जिद में डलवा देता है। फ़िर दंगे होते हैं, हर धर्म का जिहादी काफिला अपनी मर्दानिगी के किस्से सुनाते हैं की किस गाँव में कितनी महिलायों और लड़कियों के साथ बलात्कार किय है, वह किस्सा आज भी नही भुला पाता हूँ जब रातों को दंगा कर के टोली लौटती है और इक बहादुर किस्सा सुनाता है - अरे उस महिला को देखा था कैसे हम लोगो को देखकर हाथ जोड़कर चिला उठी थी की मेरे साथ कुछ भी कर लो पर मुझे छोड़ दो। फ़िर भी हम माने नही थे, पूरा सबक सिखाया था। तभी एक और बहादुर कह उठता है अरे जब तक मेरी बारी आई साली मर ही गई थी।

सब कुछ जानते हुए भी हम आज भी वैसे ही है जैसे पहले थे। भाजपा मदिर के नाम पर वोट मांग रही है। मोदी मुख्यामंत्री बन जाता है ? धर्म के नाम पर नफरत के नाम पर.... फ़िर भी हम प्यार तलाशते फ़िर रहे है ? अमन से रहने की बात करते फ़िर रहे हैं ? फ़िर कल ही मन्दिर मस्जिद की दीवार हिलेगी और लाशो के ढेर लग जायेंगे। और तस्लीमा नसरीन की उपन्यास लज्जा का नायक दस रुपए देकर भी जबरदस्ती करेगा क्योकि वह मुसलमान की लड़की है ........

राहुल कुमार

दलित हितैषी सरकार ने दलितों-गरीबों को बेघर किया

दलित हितैषी सरकार ने दलितों-गरीबों को बेघर कियानदवा झोपड़-पट्टी को प्रशासन के बुलडोज़रों ने तोड़ गिराया आज बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा के इशारे पर स्थानीय प्रशासन ने लखनऊ के डालीगंज छेत्र में नदवा झोपड़-पट्टी को बुलडोज़रों से तोड़ गिराया। २५० से भी अधिक लोग बेघर हो गए। यह घटना प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती के दावे पर सवाल खड़े कर देती है जो मायावती ने अपने जन्मदिन पर किया था - कि उत्तर प्रदेश के हर गरीब को घर मिलेगा. जब वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता एवं रैमन मैग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित डॉ संदीप पाण्डेय नदवा झोपड़-पट्टी की और जा रहे थे तब पुलिस ने उनको जबरन हिरासत में ले लिए और नदवा जाने से रोका, और हसनगंज पुलिस थाने में रोक कर रखा.

'बेसिक सर्विसेस फॉर उर्बन पुअर' या BSUP के तहत जो मकान गरीबों को मिलने वाले थे, उनको पाने के लिए इस झोपड़-पट्टी में रहने वाले लोग पैसा इकठ्ठा कर रहे थे। इससे पहले कि BSUP वाले घर बन कर तैयार हों, प्रशासन ने इनको बर्बरतापूर्वक बेघर कर दिया। इस नदवा झोपड़-पट्टी में अधिकाँश लोग जो रहते हैं वोह दलित हैं.

जब दोपहर में डॉ संदीप पाण्डेय को हसनगंज पुलिस थाने से बहार जाने की अनुमति मिली, तब तक नदवा झोपड़-पट्टी को बुलडोज़रों ने पूरी तरह से तोड़ दिया था। जो २५० लोग बेघर हुए थे उन्होंने विधान सभा के सामने धरना देने के लिए प्रस्थान कर दिया कि उनको वैकल्पिक रहने की जगह मिले जबतक BSUP वाले मकान बन कर तैयार नहीं हो जाते.

रास्ते में ही इन विस्थापित लोगों में से एक महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। अपर जिला मजिस्ट्रेट ओ.पी.पाठक ने समय से एंबुलेंस बुला कर इस महिला को जिला अस्पताल में भिजवाया जिससे इसको उपयुक्त चिकित्सकिये सहायता मिल सके।लखनऊ के नागरिक, तमाम सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने और जो २५० से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, उन्होंने प्रदेश सरकार से वैकल्पिक रहने के स्थान के लिए मांग की है, और जल्द-से-जल्द BSUP वाले मकानों को पूरा बनाने के लिए और इन लोगों को आवंटित करने के लिए भी मांग की है.

साभार: http://hindi-cns.blogspot.com/2009/02/blog-post_19.html

.........वो दिन जो चले गए

याद नही वो दिन जो चले गए
शायद देखा एक सपना
सपने में दिखा उजाला
सपना टूट गया
अन्धेरें रह गए
याद नही वो पल जो चले गए
चाँद सितारों की बातें
अब नही कहना
मर मर के अब
नही जीना
अबतक तो
मर मर के ही जीते रहे
याद नही वो दिन जो चले गए
आशा की किरणों से
मेरा नाता टूट गया
आगे मै बढ़ चला
कुछ पीछे छुट गया
अबतक तो
ऐसे ही चलते रहे
याद नही वो दिन जो चले गए

भारत को पहला आस्कर एवार्ड .....

भारत के लिए एकमात्र आस्कर जीत चुकी ड्रेस डिजाइनर भानु अथैया का मानना है की एटनबरो ने गाँधी फ़िल्म में भारत का वास्तविक चित्रण किया है । १०० से अधिक फिल्मों में ड्रेस डिजाइन कर रिकार्ड बुक में अपना नाम दर्ज करा चुकी है । अथैया ने कहा, “एटनबरो ने जुलाई 1982 में मेरा साक्षात्कार लिया था। इसके बाद उन्होंने मेरा ऑडिशन किया। 15 मिनट के भीतर उन्होंने अपने दफ्तर में फोन करके यह सूचना दे दी कि उन्हें ड्रेस डिजायनर मिल गई है। उन्होंने मुझे एक सितंबर को नई दिल्ली के अशोक होटल पहुंचने को कहा। फिल्म की शूटिंग एक नवंबर से होनी थी।

आथैयाके अनुसार गाँधी में करना बहुत बड़ी चुनौती थी ।

नारी कब तक रहेगी उपेक्षित

पचमढ़ी में ७० फीट की ऊंचाई से फेंकी गई बच्ची गुड़िया ने एक बार फिर मुझे नारी के अस्तिव पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।" नारी यत्रत पूजते, रमते तत्र देवता " की संस्कृति पर विश्वास करने वाले इस देश में पल-पल नारी अस्मिता से होता खिलवाड़, निहित स्वार्थो के लिए सामाजिक संस्कार और रीति रिवाजों के नाम पर क्षण भर में उसके स्वप्नों को तोड़ता ये सामाजिक परिवेश, क्या इसकी ही परिणीति नहीं है, गुड़िया का उसकी अपनी मां द्वारा ही परित्याग करने की यह घटना, इससे भी दुखद पहलू है कि एक शिक्षित नारी जब ऐसा कदम उठाने में गुरेज नहीं करती तो, गांव-देहातों की अशिक्षित महिलाएं यदि बेटी होने पर हो हल्ला मचाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। इस शिक्षिका मां का ये कृत्य तो सामने आ गया, लेकिन क्या हम जैसी कितनी ही शिक्षित महिलाएं कभी-कभार सोच में ही सही ऐसे कृत्यों को अंजाम नहीं दे चुकी होती है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो क्या नारी अपने ही एक अंश के रूप में नारी को जन्म देना किसी दुस्वप्न से कम नहीं मानती, ऐसा नहीं है कि केवल बेटी की शादी और दहेज के पक्ष को देखते हुए महिलाएं ऐसा सोचने पर मजबूर होती है, इसकी प्रमुख वजह है समाज द्वारा नारी को दिया गया परिवेश। हम ऐसे सामाजिक परिवेश में बेटियों के सदियों तक उपेक्षित होने की बात सोच सकते है, जिस परिवेश में पुरूष वर्ग अपमानित करने के लिए ही नारी अस्मत को ही हथियार बनाता है, समाज के ठेकेदार कहलाने वाले लोग बात-बात पर मां- बहन को गालियां और अपशब्द कहकर अपने अहम को तुष्ट करते है, क्यों बात-बात पर लोग बाप-भाई की गाली क्यों नहीं देते। इसके अलावा संचार क्रांति और विकास के इस युग में नारी को अपमानित करने के एमएमएस जैसे हथियार भी नारी की अस्मिता को बेधने के लिए ईजाद कर डाले है। क्या प्रकृति से मिला शारीरिक संरचना का यह उपहार हमें अभिशप्त होने के लिए मजबूर नहीं करता, इसमे हमारा क्या दोष है कि ईश्वर ने हमारी रचना ही जन्मदात्री के रूप में की है। अपने ही घर की चारदीवारी में छोटी-छोटी बच्चियों से होता ब्लात्कार, गली मोहल्ले, कार्यालयों, बसों, ट्रेनों में होते अश्लील इशारे, क्या कोई भी नारी अपने ही नारी अंश को दुनिया में लाकर इस हकीकत से रूबरू कराना चाहेगी ? यह सवाल दुनिया के सृजन के साथ शुरू हुआ है और दुनिया के खत्म होने तक भी इस सवाल का किसी के पास कोई उत्तर नहीं होगा। इस गीत की ये लाइन दोहराते हुए मुझे ना तो शर्म महसूस हो रही है और न ही कोई गिला...
" अगले जन्म मुझे बेटी ना कीजो"

मछली का बाजार.......संसद

....... आप सब हार जायें ....आपको जनता के धन में से एक ठेला भी नही दिया जाना चाहिए । .....आप इसके हकदार नही है .....आप जनता को मुर्ख बना रहे है .....आप उनका अपमान कर रहे है ।
ये शाप है व्यथित लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का ।
आज संसद लोकतंत्र के मन्दिर के रूप में अपनी पहचान खोता जा रहा है ....लगता है ....वहां मछली का बाजार लगा है । गंभीर चर्चा की बात तो छोडिये ,किसी भी तरह की चर्चा होना मुस्किल हो गया है
हमारे जन प्रतिनिधि कैमरे के सामने कुतों की भाँती भौकने का कोई भी अवसर नही छोड़ते ।
सोमनाथ जी ने सही कहा .....हंगामा करने वालों को एक फूटी कौडी भी नही देना चाहिए ।
.....पर हमारे आदरणीय सांसदों को इससे क्या लेना .....वे तो कसम खाए बैठे है ....हम तो हुडदंग करेगे ही ...
संसद से सम्बंधित कोई नियम कानून बनने के सवाल पर तो उनकी जबान बंद हो जाती है ........
ऐसे हम और आप जैसे लोग सोमनाथ जी की तरह व्यथित हो अपनी भडास ही निकाल सकते है ......

पत्नी की आरती


आज बंडमरु गिरी करने का मन किया है। शुरुआत कर रहा हूँ पत्नी की आरती से ....मुझे मेरे मित्र ने मुझे एक मेल किया उस मेल को मैं यथावत आपके सामने परोस रहा हूँ... मुझे आच्छा लगा आपको भी आच्छा लगेगा। ऐसा विश्वाश है। आप अपनी राय जाहिर करें... कैसा लगा......धन्यवाद ।

विचार नही,स्टार चाहिए

---- चुटकी----

विचार नहीं,खेल
फ़िल्म,टीवी के
बड़े स्टार चाहिए,
सांसद बनना है तो
आप भी हमारे
झंडे के नीचे आइए।

घटिया, घिनौना और शर्मनाक..यानि अविनाश..

बड़े दिनों की शांति के बाद फिर बौधिक जुगाली करनेवाले चिपचिपे और पिलपिले किस्म के लोग इनदिनों व्यस्त हैं इस मुहीम में की ब्लॉग की दुनिया का जानवर ( माफ़ करें इससे बेहतर शब्द मैं इस्तेमाल नहीं कर सकता ) यानि बहुतों का भाई सखा और अन्नदाता अविनाश घटिया है या नहीं, अभी बहुत वक़्त नहीं हुआ जब मुझे , यशवंत जी और दूसरे ब्लाग्गरों को बाकायदा इस '' जानवर'' से मोर्चा लेना पड़ा था, कहानी बड़ी है वक़्त कम है,
इस बार भी ये जानवर चर्चा में हैं हमेशा की तरह अपनी हरकतों की वजह से, हरकतें जिनसे न पत्रकारिता का भला होना है न पत्रकारिता बिरादरी का, हाँ पूरी पत्रकारिता बिरादरी का भरोसा जरुर दांव पर है, कैसे... माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों की एक साथी और शायद कल की होनहार पत्रकार को पत्रकारिता के बेहतरीन सबक देने के बजाय अपनी बाजारू कारीगरी से न सिर्फ वरिष्ठ पत्रकारों के प्रति इन नौनिहालों के मन में ढेर
सारी आशंकाएं भर दी हैं बल्कि अपनी ''जिस किस्म की भी हरकत हो'' उससे जिस बिरादरी का झंडाबरदार होने की कोशिश ये जानवर करता रहा है उसे न सिर्फ इस बार फिर शर्मिंदा किया है बल्कि पत्रकारों के पतन की एक और कहानी जो अक्सर दब जाया करती हैं जाहिर किया है, और जाहिर होने के बाद कईयों के निशाने पर भी है,
व्यक्तिगत रूप से कुछ ईमेल और मेल के आदान प्रदान के बाद इस '' जानवर'' को मैंने बहुत पहले ही खारिज कर दिया था, कईयों ने किया, इसकी नीचता का गवाह भी मैं हूँ की किस तरह हमको अपने ब्लॉग के जरिये ये धमकी देता रहा की आप मुझसे माफ़ी मांगे वरना साइबर क्राइम का मुकदमा आपके खिलाफ कर दूंगा, जब मैं अपने रिपोर्टर मित्रों के जरिये बाकायदा साइबर क्राइम सेल में पड़ताल कराई तो पता चला की ऐसी कोई रिपोर्ट तो दूर कोई शिकायत तक हमारे पास दर्ज नहीं है कहना था साइबर क्राइम सेल प्रभारी का, किसी को मापने के हजार पैमाने नहीं होते, इसकी कमीनगी मेरे सामने थी, खैर ....इस बार पत्रकारिता की एक छात्र ने छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज करायी है इस जानवर के खिलाफ, इस मौके पर कई बरसाती मेढक किस्म के लोग जिन्हेंअविनाश के पिछले रिकॉर्ड को लेकर पूरा भरोसा है की सेटिंग और चालबाजी में माहिर ये जानवर फिर कहीं न कहीं अपनी गोटी फिट कर लेगा और जल्द किसी संस्थान के मलाईदार पद पर बैठा होगा वो इस मौके पर इसके साथ खड़े होकर सहानुभूति दर्ज कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे, आखिर अविनाश के बुरे वक़्त में वो खड़े होंगे तोः उनके बुरे वक़्त में भी अविनाश खडा होगा ही, डीबी स्टार में भी अपने कई चप्पुओँ को इसने फिट ही किया है खैर......
लिजलिजे वामपंथियों का बैठकों में चाय और दारु गटकते हुए क्रांति करने और पैसेवाले घरों के लड़के और लड़कियों को विचारों की चासनी चटाकर उनका और उनके धन और शरीर और संसाधनों का शोषण करना जेएनयू में हजारों बार देखा है, अविनाश भी कुछ नया नहीं कर रहा इधर से उधर से किसी भी मुद्दे पर विचारों का मुलम्मा चढाकर नए लौंडोंको बरगलाता और हाशिये पर पड़े गुमनाम से चरित्रों को कृतार्थ करने का काम करता रहा है, अफ़सोस हर बार अविनाश का नाम चर्चा में आता है लेकिन किसी न किसी बुरे कर्म के चलते, शायद इस जैसों को पीट-पीटकर बचपन में सिखाया गया हो की की बेटा नाम '' बदनाम'' होकर भी होता है, प्रभात खबर में हरिवंश ने इसे बहार का रास्ता दिखाया, '' हरिवंश'' गलत थे, एनडीटीवी प्रबंधन गलत था अभी भास्कर प्रबंधन भी गलत है वजह की ब्लॉग में चौधराहट दिखानेवाले चौधरी अविनाश को इन सबने बाहर का रास्ता जो दिखाया,
शर्मनाक सिर्फ इतना है की अपनी-अपनी वजहों से अपने अपने हितों को सुरक्षित रखने की गरज से कुछ वामपंथी निठल्ले ओर अविनाश जैसी सोच रखनेवाले उसको सिर्फ इसलिए पाक-साफ़ घोषित करने में जुटे हैं क्यूंकि अगर एक छात्र के साथ छेड़छाड़ करनेवाले अविनाश की ये हरकत भी अगर दबा दी जाती है उनके लिए अच्छी खबर होगी जो इस जैसी हरकतों को अंजाम देने के सपने संजोये बैठे हैं, दो पत्रकारिता संस्थानों में पढाने के साथ साथ पिछले ६ साल से टीवी, रेडियो ,प्रिंट में घूमने के बाद भी इस किस्म के एक भी आरोप न लगने को अपनी उपलब्धियों में ही शुमार करना चाहूँगा, लेकिन इधर जिस तरह से एक विवादित चरित्र के जानवर( दूसरो के मामले में आदमी समझें) को कुछ बेशर्म बचाने में लगे हैं उसपर वाकई शर्म के सिवाय क्या भेजूं इनको, साहित्य में एक परंपरा सी हो गयी है की बिना दारूबाजी व एक आधे स्कैंडल के कोई साहित्यकार नहीं माना जाता या यूँ कहें की साहित्यकार बनाने या वामपंथी विचारक होने के लिए इस किस्म की वीभत्स हरकतें को अंजाम देना एक अनिवार्यता सी बनती जा रही है उससे भी शर्मनाक ये की ऐसी हरकतों को अंजाम देनेवालों को बेहद निरीह व कुचक्रों का शिकार बेचारा घोषित करवा दिया जाता है ताकि कुछ साझा हित साधकर बड़े सलीके ओर करीने से ऐसी शर्मनाक हरकतों के आगे किये जाने का रास्ता खुला रह सके, शायद तभी पत्रकारिता में कई कमीनगी को अंजाम देने के बाद ये घटिया जानवर बेहद मासूमियत से अपने किये पर पर्दा कुछ यूँ डालता है'' मेरी सहानुभूति उस लड़की व मेरे आलोचकों के साथ है''
प्राकृतिक न्याय में भरोसा रखने के कारण उम्मीद करता हूँ की अविनाश नामके जानवर को प्रकृति अपने तरीके से दंड देगी व इसे फिर से खुद को बेगुनाह साबित करने ओर शब्दों के साथ हेरफेर करके खुद को बचने का मौका नहीं मिलेगा, आमीन
( माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वे छात्र जिनका हौसला डिगा है, उनसे अनुरोध की अपनी शानदार-जुझारू परंपरा को जारी रखें )....शुभकामनाएं.....

19.2.09

फूल

चाहे मन्दिर में माला पहनाओ
चाहे मस्जिद में चादर चढाओ
नहीं दिखता मुझमें कोई भरम
मैं फूल हूँ नहीं देखता जात और धरम

गर हो तुम्हारे घर शादी
या किसी के यहाँ मातम
चाहे खुशिओं में सजाओ
चाहे मइयत पर चढाओ
मैं फूल हूँ मुझमें है संयम

रब की चाहत मुझसे
खुशी का इजहार मुझसे
दोस्ती की फरमाइश मुझसे
दिलों का इकरार मुझसे
मैं फूल हूँ मुझमे हैं कई रंग

दिलों के खेल का हथियार हूँ मैं
रूठने मनाने का आधार हूँ मैं
न इर्ष्या न जलन शिर्फ़ सादगी है मुझमे
इसीलिए गम का भी इलाज हूँ मैं
मैं इसी में खुश हूँ मैं फूल हूँ, मैं फूल हूँ, मैं फूल हूँ

ज्ञानेंद्र
rastey2manzil.blogspot.com

हाय समाज.............हाय समाज...........!!

............न पुरूष और न ही स्त्री..............दरअसल ये तो समाज ही नहीं.........पशुओं के संसार में मजबूत के द्वारा कमजोर को खाए जाने की बात तो समझ आती है......मगर आदमी के विवेकशील होने की बात अगर सच है तो तो आदमी के संसार में ये बात हरगिज ना होती.......और अगरचे होती है.....तो इसे समाज की उपमा से विभूषित करना बिल्कुल नाजायज है....!! पहले तो ये जान लिया जाए कि समाज की परिकल्पना क्या है.....इसे आख़िर क्यूँ गडा गया.....इसके मायने क्या हैं....और इक समाज में आदमी होने के मायने भी क्या हैं....!!
..............समाज किसी आभाषित वस्तु का नाम नहीं है....अपितु आदमी की जरूरतों के अनुसार उसकी सहूलियतों के लिए बनाई गई एक उम्दा सी सरंचना है....जिसमें हर आदमी को हर दूसरे आदमी के साथ सहयोग करना था....एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करना था.....एक आदमी ये काम करता.....और दूसरा वो काम करता....तीसरा कुछ और....हर आदमी अपने-अपने हुनर और कौशल के अनुसार समाज में अपने कार्यों का योगदान करता....और इस तरह सबकी जरूरतें पूरी होती रहतीं.....साथ ही हारी-बीमारी में भी लोग एक-दूसरे के काम आते....मगर हुआ क्या............??हर आदमी ने अपने हुनर और कौशल का इस्तेमाल को अपनी मोनोपोली के रूप में परिणत कर लिया...........और उस मोनोपोली को अपने लालच की पूर्ति के एकमात्र कार्यक्रम में झोंक दिया.......लालच की इन्तेहाँ तो यह हुई कि सभी तरह के व्यापार में ,यहाँ तक कि चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में भी लालच की ऐसी पराकाष्ठा का यही घृणित रूप तारी हो गया.....और आज यह राजनीति और सेवा कार्यों में तक में भी यही खेल मौजूं हो गया है....तो फ़िर समाज नाम की चीज़ अगर हममे बची है तो मैं जानना चाहता हूँ कि वो है तो आख़िर कहाँ है....एक समाज के सामाजिक लोगों के रूप में हमारे कार्य आख़िर क्या हैं.....कि हम जहाँ तक हो सके एक-दूसरे को लूट सकें...........????
....................क्या यह सच नहीं कि हम सब एक दूसरे को सहयोग देने की अपेक्षा,उसका कई गुणा उसे लूटते हैं.....वरना ये पेटेंट आदि की अवधारणा क्या है......??और ये किसके हित के लिए है.....लाभ कमाने के अतिरिक्त इसकी उपादेयता क्या है.....??क्या एक सभ्य समाज के विवेकशील मनुष्य के लिए ये शोभा देने वाली बात है कि वो अपनी समझदारी या फ़िर अपने किसी भी किस्म के गुण का उपयोग अपनी जरूरतों की सम्यक पूर्ति हेतु करे ना कि अपनी अंधी भूख की पूर्ति हेतु......??मनुष्य ने मनुष्य को आख़िर देना क्या है.....??क्या मनुष्यता का मतलब सिर्फ़ इतना है कि कभी-कभार आप मनुष्यता के लिए रूदन कर लो.....या कभी किसी पहचान वाले की जरुरत में काम आ जाओ....??..........या कि अपने पाप-कर्म के पश्ताताप में थोड़ा-सा दान-धर्म कर लो.......??
.......................मनुष्यता आख़िर क्या है...........??............अगर सब के सब अपनी-अपनी औकात या ताकत के अनुपात में एक दूसरे को चाहे किसी भी रूप में लूटने में ही मग्न हों....??..........और मनुष्य के द्वारा बनाए गए इस समाज की भी उपादेयता आख़िर क्या है..........??.........और अपने-अपने स्वार्थ में निमग्न स्वार्थियों के इस समूह को आख़िर समाज कहा ही क्यूँ जाना चाहिए..........??.........हम अरबों लोग आख़िर दिन और रात क्या करते हैं........??उन कार्यों का अन्तिम परिणाम क्या है......??अगर ये सच है कि परिणामों से कार्य लक्षित होते हैं.............तो फ़िर मेरा पुनः यही सवाल है कि इस समूह को आखर समाज कैसे और क्यूँ कहा जा सकता है......और कहा भी क्यूँ जाना चाहिए.......??
जहाँ कदम-दर-कदम एक कमज़ोर को निराश-हताश-अपमानित-प्रताडित-और शोषित होना पड़ता है......जहाँ स्त्रियाँ-बच्चे-बूढे और गरीब लोग अपना स्वाभाविक जीवन नहीं जी सकते........??जहाँ हर ताकतवर आदमी एक दानव की तरह व्यवहार करता है........!!??
.........दोस्तों मैं कहना चाहता हूँ कि पहले हम ख़ुद को देख लें कि आख़िर हम कितने पानी हैं.....और हमें इससे उबरने की आवश्यकता है या इसमें और डूबने की........??हम ख़ुद से क्या चाहते हैं.........ये अगर हम सचमुच इमानदारी से सोच सकें तो सचमुच में एक इमानदार समाज बना सकते हैं............!!याद रखिये समाज बनाने के लिए सबसे पहले ख़ुद अपने-आप की आवश्यकता ही पड़ती है........तत्पश्चात ही किसी और की.....!!आशा करता हूँ कि इसे हम पानी अपने सर के ऊपर से गुजर जाने के पूर्व ही समझ पायेंगे..........!!!!

......क्यों भूलते जा रहे हैं हम अपने राष्ट्र खेल को.

मैं मीडिया से जुड़ा हुआ परसन हूँ, परन्तु कभी कभी मीडिया की कमी को देख कर परेसान सा हो जाता हूँ। अब देखिये हमारे राष्ट्रिय खेल में हमारे खिलाड़ियों ने अपने देश में ही सही परन्तु विश्व चैम्पियन को हराया , परन्तु मीडिया ने उस ख़बर को ज्यादा तवज्जो नही दिया, जिस कारन से देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा ये नही जान पाया की हमने हॉकी के विश्व चैम्पियन को हराया है। आज देश के होकी खिलाड़ियों की इतनी बड़ी उपलब्धी दबा दी गई। इसके लिए जितने जिम्मेदार हमारे देश के नेता हैं, उस से अधिक जिमेदार मैं मीडिया को मानता हूँ। कारन ये है की जिस तरह श्री लंका में भारत ने अपना पहला मैच जीता और उसे मीडिया ने खूब उछाला। उस तरह होकी को भी मीडिया तवज्जो देता तो आज ये खेल बदहाल नही होता। सचाई तो यही है की आज ये खेल बदहाल स्तिथि में है। ...आज लोग भूलते जा रहे हैं अपने इस राष्ट्रिय खेल को। मीडिया का ही देन है की आज गाँव के लोग क्रिकेट के बारे में जितनी जानकारी रखते हैं उसका जरा सा भी जानकारी हॉकी के बारे में नही रखते। कभी-कभी अफ़सोस होता है ख़ुद को मीडिया पर्सन कहने में, फ़िर सोचता हूँ मैं कोशिश जरूर करूंगा, अपने राष्ट्रीय खेल को जन-जन में पहचान दिलाने की। अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है की क्रिकेट को राष्ट्रीय गेम घोषित कर दिया जाएगा। परन्तु ऐसा अगर होता है तो ये सही नही होगा। मीडिया को अपनी ख़बरों में हॉकी को तवज्जो देनी होगी, ताकि इसकी पहचान हमारे रास्ट्रीय खेल के रूप में बनी रहे। हमारी आदत नही है पीछे हटने की तो फ़िर क्यों हम हॉकी को तवज्जो नही दे रहे हैं... मीडिया से जुड़े लोगों अपनी मानसिकता को जरा सा बदलो देखो हॉकी के सितारे भी बुलंदी पे होंगे। हमें युवाओं को प्रोत्साहित करने की भी जरुरत है, साथ ही फिल्मों के जरिये होकी को बढावा देने वाले कलाकारों को भी वास्तव में आगे आना होगा ताकि होकी की एक मुक्कमल पहचान कायम रहे।

मै ........एक साधारण आदमी

कुछ ख़ास नही ....साधारण आदमी ......जो अपने को जानने की कोशीश कर रहा है । कुछ हद तक परेशान है ....नए रास्ते खोज रहा .....उसी क्रम में भारतीय प्रशासनीक सेवा का साक्छात्कार भी दीया । लिखने में मन लगता है ....... कुछ नया करना चाहता है ......जहाँ बाजारवाद न हो । सचिन और किशोर दा का फैन है ......जिंदगी अभावों में कट रही है .......इसका भी लुफ्त उठाता है ......सोचता है ....दुनिया से दो कदम पीछे रह गया .....पर कोई मलाल नही ।लेखन का शायद दशमलव भी नही जानता पर ......हाथ मार रहा ....कोई राह नही दीखती पर .....चलते जा रहा है ।..................... और यही करता रहेगा ......... जबतक जीवन रहा ...........

गीतकार नीरज ने किया विमोचन


राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राजेन्द्र कुमार मीणा के प्रथम काव्य संग्रह आबशार-ऐ-अश्क का विमोचन प्रख्यात गीतकार,कवि डॉ० गोपाल दास नीरज ने अलीगढ में किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस पुस्तक की सुगंध राजस्थान में ही नहीं पूरे देश में फैलेगी। श्री नीरज ने कहा कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आज पतन का दौर चल रहा है। राजनीति और साहित्य दोनों भ्रमित हैं। आज पैसा ही सब कुछ हो गया है। श्री मीणा ने कहा कि श्री नीरज जी के आशीर्वाद से ही मेरी कल्पनाएँ पुस्तक के रूप में आ सकीं हैं। अलीगढ में कवि सम्मलेन भी हुआ। [विडियो में पुस्तक का विमोचन करते हुए श्री नीरज,कवि सम्मलेन में कविता पाठ करते हुए श्री नीरज जी, श्री मीणा जी।]
श्री नीरज जी शब्दों में"श्री राजेन्द्र कुमार मीणा 'राजेन्द्र' की कुछ कवितायें मैंने सुनीं। श्री राजेन्द्र एक प्रशासनिक अधिकारी हैं। आश्चर्य की बात है कि अपनी प्रशासनिक सेवा में अति व्यस्त रहते हुए भी सौन्दर्य और प्रेम की तथा प्रेम पीड़ा की जो कवितायें लिखी हैं वैसी मैंने पहले न तो कभी सुनीं और न कभी किसी पत्रिका में पढ़ी। वे सहज कवि हैं और ऐसा लगता है कि कवितायें उन्होंने नहीं बल्कि उनके भीतर बैठी हुई गहन अनुभूतियों के कारण स्वंय लिख-लिख गईं। वे मैथिल कोकिल विद्यापति के आधुनिक रूप में मुझे सदा ही प्रभावित करते रहेंगें और सदा याद आते रहेंगें। इस आधुनिक विद्यापति को मेरी हार्दिक शुभकामनायें।" यह सब श्री मीणा की पुस्तक में लिखा हुआ है।





जीवन धारा: याद नही वो दिन .....

जीवन धारा: याद नही वो दिन .....

नेपाल में भारत फेल होने के कगार पर .....

नेपाल में माओवादियों के आने से निश्चित ही नेपाल पर भारत का प्रभाव कम हुआ है। चीन अपनी फॉरवर्ड डिफेंस पॉलिसी के तहत नेपाल और पाकिस्तान में अपना दखल बढ़ाना चाहता है। इसमें माओवादी सरकार चीन की मदद भी कर रही है। नेपाल में माओवादी संगठन भारत विरोध की बुनियाद पर ही खड़े हुए हैं। प्रचंड ने कई बार सुगौली समझौते का हवाला देकर कहा कि नेपाल आज भी भारतीय उपनिवेशवाद के अधीन है। बिहार में कोसी नदी के तांडव से हुई बर्बादी और काठमांडू स्थित पशुपति नाथ मंदिर में भारतीय मूल के पुजारियों की बर्खास्तगी को लेकर हुए विवाद में भी उनकी इसी मानसिकता की झलक मिलती है।

दोनों देशों की जनता का एक सहज-स्वाभाविक संबंध वर्षों से बना हुआ है। इसपर किसी भी प्रकार से आंच नहीं आनी चाहिए। भारतीय विदेश नीति के लिए भी एक चुनौती है कि वह नए नेपाली नेतृत्व को कैसे उसके भ्रम से निकालें। सबसे पहले हमें वहां की सभी पार्टियों को भरोसे में लेना चाहिए तथा नेपाल की सरकार को अपनी चिंता से दृढ़ता पूर्वक अवगत कराना चाहिए। लग रहा है भारतीय विदेश नीति के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण दौर है। इसका सामना बुद्धिमानी के साथ करना होगा।

दाल भात मैं मूसरचंद

मेरी आवाज़ तो आपको सुननी ही पड़ेगी, मानना न मानना आपकी मर्ज़ी । मैं गुमनाम{अनोनिमस} शब्द या प्रश्न भी नहीं उछालना चाहता इसलिए सीधी बात मन की भड़ास के रूप में निकाल रहा हूँ.हो सकता है कि मैं अभिव्यक्ति की अपनी जिस स्वतंत्रता का उपयोग करने जा रहा हूँ उससे मैं ही टारगेट बन जाऊँ.जी हाँ,मेरा इशारा पिछले दो तीन दिनों से जारी उस शब्द युद्ध की ओर है जिसमें व्यक्तिगत खुन्नस ज्यादा नज़र आ रही है.छत पर धूप क्षसेंकने के साथ -साथ एक-दूसरे के सर से जुएँ बीनती महिलाऐं ,चौपाल पर बरगद के नीचे बैठकर हुक्का गुडगुडाते बुजुर्ग या दालान के कोने में अलसाई दुपहरिया में बात- बेबात मुस्कराती किशोरियों के बीच भी सदियों से बातचीत का यही प्रिय विषय रहा है. उनके लिए यह विषय महज़ टाइम पास का साधन हुआ करता था.मगर यहाँ यह कीचड उछालने का गंभीर माध्यम बन गया है। अरे भई,माना कि दोनों पक्ष कमजोर नहीं पर उस बेचारे तीसरे पक्ष का भी तो ख्याल रखें जो संख्या में नब्बे फीसदी है .जिसके लिए ब्लॉग 'सृजन' की सौगात लेकर आया है.भड़ास ओर अभिव्यक्ति में आख़िर फर्क ही क्या है?इन ब्लोगेर्स में कॉलेज में पढने वाले स्टूडेंट्स भी हैं तो पूरी दक्षता के साथ घर सम्भाल रहीं गृहणियां भी.भावुक कवि हैं तो आंखों में ढेरों सुनहरे सपने लेकर पत्रकारिता के पवित्र पेशे में कदम जमाने का प्रयास करते युवा भी.उनकी इस पवित्रता को बना रहने दें.सेक्स वैसे भी नितांत व्यक्तिगत क्रिया होती है.इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है.देश के संविधान में भी अठारह वर्ष से ज्यादा उम्र के प्रत्येक युवक-युवती को मन-माफिक बेड- पार्टनर चुनने का हक दिया गया है.उन्हें चुनने दें ना...? हम क्यों दाल-भात में मूसरचंद बनना चाहते हैं? यदि काम ग़लत हुआ है तो मामला थाने में जाना चाहिए,थाने के बाद अदालतें होती हैं और अदालत तो हम हैं नहीं......!

एक औरत की मौत !

आवेश

'अगर यह मृत्यु है तो मुझे इसके बारे में अब नही सोचना है ',ये शब्द प्रख्यात अंग्रेजी साहित्यकार लिटन की जुबान से निकले आखिरी शब्द थे ,लिटन के ये शब्द मुझे कभी नही भूलते आपने कभी अपनी मौत के बारे में सोचा है ?कैसी होनी चाहिए मौत ?क्या मृत्यु नितांत व्यक्तिगत चीज है ?क्या इसमे रंग भर के इसे उत्सव की चीज नही बनाया जा सकता ?क्या मौत भी मनोरंजन का विषय बन सकती है? अगर आपको मेरा ये सवाल परेशान कर रहा है तो आप जेड़ से मिलें .बिग ब्रदर नामक रियलिटी शो,और उसमे की गई अपनी रंगभेदी टिप्पणियों को लेकर चर्चित गुडी का मैं कभी फैन नही रहा ,हाँ शिल्पा पर उसकी टिप्पणियों से मैं आम हिन्दुस्तानियों की तरह आहत जरुर हुआ .लेकिन उसकी एक बात ने मुझे मजबूर कर दिया की मैं उसे विश्व इतिहास के महानतम लोगों की सूची में शामिल करूँ .सर्वाइकल कैंसर से दिन रात जूझ रही जेड़ की जिजीविषा को मेरा प्रणाम है .अब पूरी दुनिया उसकी मौत का अनूठा रियलिटी शो देखेगी ,जेड़ ने अपनी मृत्यु के लाइव टेलीकास्ट के लिए LIVING TV को मीडिया राईट दे रखा हैं,LIVING TV की चीफ क्लौडिया कहती है 'उसने ऐसा अपने बच्चों के लिए किया है वो इससे मिलने वाले पैसे का अपने बच्चों के लिए सुरक्षित रखना चाहती है ,साथ ही दुनिया को ये दिखाना चाहती है की कैंसर से कैसे लड़ा जाए 'जेड की जिन्दादिली तो देखिये ,कैंसर क्लीनिक से बाहर निकलने के बाद उसने अपने प्रेमी जैक ट्वीड के साथ शादी करने का ऐलान किया और अपने छोटे बच्चों के साथ खरीददारी करने निकल गई जेड़ के producers को इस बात की चिंता है की वो अपने हैल्थ पर ध्यान देने केबजाय अपनी शूटिंग पर ज्यादा ध्यान दे रही है.
जेड एक महिला है .वो उतनी ही औरत है जितनी कोई आम हिन्दुस्तानी औरत वो उतना ही बिलबिला कर रोती है जितना कोई और औरत,वो उतना ही हंसती है जितनी कोई जिंदगी से लबरेज नवयोवना हंसती है ,वो उतने ही प्यार से अपने बच्चों का माथा सहलाती है जितना हमारी माएं ,लेकिन वो मौत से उतना नही डरती जितना एक आम पुरूष डरता है ,भौतिक सुख सुविधाओं की बदौलत १०० फीसदी जीने का दावा करने वाले हम सब मौत की दस्तक सुनते ही अक्सर लाचार हो जाते हैं या फ़िर वैचारिक कोमा में चले जाते हैं .नतीजा ये होता है न तो हम बचे हुए दिनों को जी पाते हैं न होठों पर मुस्कान लिए मर पाते हैं ,मानवीय जीवन का सबसे बड़ा कौतहुल मृत्यु ,और उस मृत्यु को मनोरंजन का हिस्सा बनाती जेड ऐसे में हमें बहुत कुछ सिखा जाती है ,जेड़ की मित्र मेक्स कहती हैं की वो ख़ुद को व्यस्त रख कर मृत्यु की सत्यता से पैदा हुए आघात और दर्द को अनवरत झुटला रही है ,और वो इसमे सफल हुई है .
जेड की मौत सिर्फ़ रियलिटी शो का हिस्सा नही होगी ,वो हाइपररियलिटी मौत होगी जो हमें सिखलाएगी की रियलिटी और फंतासी में क्या अन्तर होता है न उसमे बिग बॉस की तरह बनाया गया घर होगा और नही कैमरे को देखकर एवं पब्लिसिटी पाने के लिए बोले जाने वाले संवाद ,वहां एक सच्ची मौत होगी ,क्या करेंगे आप और हम ?उसकी मौत को चाय के प्याले के साथ आँख आँख गडाये देखेंगे या आँख मूँद लेंगे ?अगर आप इस सवाल का जवाब गुडी से लेंगे तो वो कहेगी ,नही आइये आप देखिये ,मेरे बच्चों के लिए देखिये ,उन लोगों के लिए देखिये जिनकी मौत बेहद कष्टकर होती है और साथ में अपने लिए देखिये .मुझे ये पोस्ट लिखते वक्त जिम कैर्री की अवार्ड प्राप्त फ़िल्म 'THE TRUMAN SHOW' का अन्तिम दृश्य याद आ रहा है ,जिसमे कैरी अपने लाखों दर्शकों के सामने कहता है कि'मान लीजिये मैं आपको दुबारा न देख पाऊं तो इसलिए अभी से आप सबको सुप्रभात,शुभरात्रि ' शायद जेड भी यही कह रही है .
अपने एक हालिया साक्षात्कार में गुडी ने कहा कि 'मैंने अपनी सारी युवावस्था अपनी जिंदगी के बारे में सोचते हुए बिता दी अब अन्तर सिर्फ़ इतना है कि में अपनी मौत के बारे में सोच रही हूँ मैंने अपनी सारी जिंदगी कैमरे के सामने बीता दी और मरना भी कैमरे के सामने तय कर लिया है ,में जानती हूँ कि कुछ लोगों को मेरे निर्णय से नाराजगी होगी लेकिन मुझे इसकी परवाह नही है '!आज इस वक्त जब आप मेरी ये पोस्टिंग पढ़ रहे होंगे living tv पर 'jade's progress' नामक उस रियलिटी शो का सीधा प्रसारण हो रहा होगा जिसमे ये दिखाया जाएगा कि जेड का प्रेमी वापस उसके पास लौट आया है ,और कैमरे के सामने जेड कीमोथेरेपी कराते हुए ख़ुद को और मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है .आपको शायद ये जानकर आश्चर्य होगा कि उसके प्रेमी जैक ट्वीड ने उसके सामने उस वक्त विवाह का प्रस्ताव रखा था जब उसे पता चला गुडी का कैंसर लाइलाज है.
बिग बॉस से जाते वक्त गुडी कि आंखों से बहते हुए आंसू हममे से बहुतों को याद होंगे ,उस वक्त भी उसकी आंखों में कैंसर का भय कम अपने हिन्दुस्तानी मित्रों से बिछड़ जाने का दर्द अधिक नजर आया था ,वो शिल्पा के प्रति अपनी टिप्पणियोंका पश्चाताप करने आई थी ,और यहाँ से ढेर सारा प्यार लेकर वापस लौट गई .डाक्टरों ने साफ़ तौर पर कहा है की गुडी कुछ ही महीनो की मेहमान है हो सकता है उसके बच्चों और उसके प्रशंसकों की दुआएं फलीभूत हो,ये भी हो सकता है हम उसे खो दे अगर उसकी मौत होती है लेकिन एक बेहद शक्तिशाली ,और आत्मविश्वास से भरी असाधारण महिला के रूप में वो हमें हमेशा याद रहेगी , उसकी मौत जिंदगी का फलसफा बयां करने वाला अब तक का सबसे विश्वस्त दस्तावेज होगा ,सलाम गुडी ......

आतंकवाद के दोनों नाम

---- चुटकी----

आतंकवाद के
दोनों नाम,
पाकिस्तान कहो
या
तालिबान।

मीडिया पर एक और तालिबानी हमला

उमेश पंत
http://naisoch.blogspot.com/

पाकिस्तान की स्वात घाटी में एक बार फिर पाकिस्तान की तालिबानी ब्रिगेड ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या की है। दरअसल यह हत्या उस पाकिस्तानी पत्रकार मूसा खान की हत्या ही नहीं है बल्कि यह मामला हमारी मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार के हनन का मामला है। यह हत्या भले ही पाकिस्तान में हुई हो लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी और देश के लिए इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। यहां सवाल आतंकवाद के बुलन्द होते हौसलों का है। दरअसल तालिबान को पैदा करते वक्त अमेरिका ने शायद ही सोचा हो कि आने वाले समय में वह अमेरिका को न केवल आंख दिखाने लगेगा बल्कि इतना मजबूत हो जायेगा कि उसे हिला देने की क्षमता रखने लगेगा। लेकिन तालिबान अमेरिका की छत्रछाया में पैदा हुआ, पला बढ़ा और अब अमेरिका की ही गले़ की हडडी बन गया है। तो बात जाहिर है कि जो संगठन विश्वभर में सर्वशक्तिमान होने का दम भरने वाले अमेरिका को आतंकित कर सकता है उसके लिए भारत जैसे देश की कोई खास बिसात नही होगी। और यह बात वह हाल ही में मुम्बई में हुए आतंकी हमले में सिदध कर ही चुका है। पाकिस्तान में हुई मौजूदा घटना से आतंकवादी यही संकेत देना चाहते हैं कि खौफ फैलाने की उनकी मुहिम में उन्हें रोकने वाला कोई माई का लाल कहीं नहीं है। मीडिया पर होने वाला हर हमला दरअसल एक सांकेतिक हमला भी होता है जिसका उददेश्य जाहिराना तौर पर खौफ की संवेदनशीलता को सीधे तौर पर बढ़ा देना होता है। क्योंकि एक पत्रकार की हत्या को विश्व मीडिया में ज्यादा से ज्यादा कवरेज दिया जाना लाजमी है। यह बात ऐसे संगठन अच्छी तरह जानते हैं। इससे पहले भी पाकिस्तान में पत्रकारों की हत्याएं होती रही हैं। लेकिन यहां सवाल पाकिस्तान की इस घटना पर प्रतिक्रिया कास है कि वो इस मसले को कितनी गंभीरता से लेता है। हांलाकि यह वही पाकिस्तानी प्रसाशन है जो समय समय पर मीडिया को प्रतिबंधित कर देने में गुरेज नहीं रखता। जिसके साये में जनसंचार एक स्वायत्त संस्था न रहकर सरकारी गुलाम भर बनकर रह जाती है। ऐसे में देखने वाली बात यही होगी कि पाकिस्तानी पत्रकारों का जोे विरोध पत्रकार की हत्या की घटना को लेकर हो रहा है वह पाकिस्तानी सरकार के कान में जूं रेंगने के लिए काफी होगा या नहीं। अगर अभी कोई कड़ा कदम न लिया गया तो सम्भव है कि पत्रकारों की हत्या आतंकवादियों के बीच एक ट्रेंड बन जाये और व्यावसायिकता के दौर इस में स्वतंत्र और निडर पत्रकारिता विश्वभर में जितनी बची खुची भी रह गई है वह भी आतंक के साये में कही पूरी तरह खो जाये।

18.2.09

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं

दुष्यंत के एक शेर से मै अपनी बात शुरू करता हूं
यहां तो सि्र्फ गूंगे आैर बहरे लोग बसते हैं,
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा
भडा़स हम पढे लिखे सो काल्ड मीडिया के लोगों का ब्लाग हैं। मै लंबे समय से इस पर आता रहा हूं किंतु मुझे निराशा ही हाथ लगी। हम सब यहां आते अपने मन की बात कहते एवं गायब हो जाते है। कहने वाले की बात से किसी को कोई सरोकार नहीं। कोंई हंगामा नही। पढने वाले के मन मे कोई लहर नही उठती। कोई प्रतिक्रिया नही नजर आती। किसी की अच्छी गजल या कविता है तो कोई बधाई देने वाला नही , कोई अच्छा लेख आया तो कोई ताली बजाने वाला नहीं हम सब गूंगे तो हैं नही। यहां हमें अपने विचार व्यक्त करने है, किंतु हम लिखने वाले ही दूसरोके विचार पर चुप्पी साधेगें तो कैसे होगा एसा क्यों
कई लेख ,कविता देखता हूं किंतु उस पर कोई टिप्पणी पा निराशा ही हाथ लगती है। ५७५ सदस्यो वाले ब्लाग के लेख पर यदि २५ _३० टिप्पणी हो तो इसे क्या कहा जाएगा। यह महफिल है, पढे लिखो की वजम है,मेरा अनुरोध है कि बजम में कलाम पढने वालो की होसला अफजाही नही होगी, तो यह गूंगो की पंचायत सी ही लगेंगी। अपने लेख के साथ, दूसरों के लेख पर अपनी टिप्पणी देकर हमें अपनी जींवंतता का परिचय देना चाहिए
गजल के शेर मे दोष हो तो उसे इंगित किया जाए ताकि हमारा साथी उसमें सुधार कर सके। किसी की कविता हो तो उसे क्षेत्र के जानकारों की टिप्पणी मेरी राय में जरूर आनी चाहिए