Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

16.11.07

ये बाजार है बाबू, न मैं बचा, न तुम

कल दिन में खबर मिली, वाया एसएमएस। विनोद कापड़ी स्टार न्यूज से निकाल दिए गए। एसएमएस में साफ-साफ यही लिखा था। मैं उस वक्त मलयाला मनोरमा द्वारा होटल इंपीरियल में आयोजित फ्रीडम आफ प्रेस एट एज आफ वायलेंस विषय पर लेक्चर सुन रहा था। एसएमएस इगनोर किया। आफिस पहुंचा। काम निपटाया। शाम को जब घर के लिए चला तो ढेर सारे एसएमएस आए। कई फोन भी। कुछ मुझसे ही पूछ रहे थे, कुछ मुझे बता रहे थे। घर पहुंचकर कुछ लोगों से मैंने भी फोन कर पूछा। सबने कहा- हां भई, खबर सच है। क्यों, कैसे, किसलिए....। ये सारे ढेर सवाल हर पत्रकार के निकाले और रखे जाने के दौरान सुने-सुनाए जाते हैं लेकिन जब कोई निकाला जाता है तो उस समय ये बातें ज्यादा ही फैलती हैं। मुझे इस खबर से बस ऐसा लगा.....इतनी जल्दी कपड़िया गयो कापड़ी..... मुझे विश्वास नहीं हो रहा।

विनोद कापड़ी से मैं मिला नहीं हूं लेकिन मिलने के लिए टाइम लेने की कोशिश के दौरान उनसे दो-चार बातें हो गईं और उन्होंने अपने तेज दिमाग और खोजी पत्रकार वाले स्टाइल में सब कुछ सनसनी टाइप स्टिंग जैसा कर दिया और जैसा कि हर स्टिंग के बाद होता है, दोषी चाहे जो हो लेकिन कैमरे या रिकार्डर में जो फंसा है, गाज उसी पर गिरती है। नशे में गालीगलौज करने का आरोप और इसके प्रमाण में कापड़ी जी द्वारा किया हुआ स्टिंग।

हालांकि मैं अब भी अपनी ही गलती मानता हूं क्योंकि बड़े और सीनियर लोगों के लिए प्रोफेशन की किताब में बदतमीजी करना, हड़काना, कड़क बोलना.. उनके जन्मसिद्ध अधिकार की तरह दर्ज और निहित होता है। अगर मैंने उनसे मिलने की कोशिश के तहत फोन कर दिया और उन्होने डांट दिया या आड टाइम होने की बात कह दी तो मुझे तुंरत सारी बोलकर फोन बंद कर लेना चाहिए था लेकिन मैंने जवाब दे दिया, भई...प्यार से बोल लो, इतनी हेकड़ी भी ठीक नहीं। बात बढ़ती चली गई।

बाद में मैंने अपनी गलती के लिए कापड़ी जी से एसएमएस के जरिए माफी मांगी, अपने संस्थान से लिखित माफी मांगी। इसके पीछे मकसद नौकरी बचाने की कोशिश करना तो था ही, ऐसी अनचाही स्थितियों के भविष्य में न आने का बल पैदा करना भी था। इस बेहद प्रोफेशनल और कारपोरेट दौर में अराजकता की गुंजाइश बिलकुल नहीं है। ऐसा मैं मानता था और मानता भी हूं।

तो मैं कह रहा था कि विनोद कापड़ी से मेरी मिलने की तमन्ना के पीछे और कुछ नहीं बल्कि उनका अमर उजाला बरेली से शुरू हुआ करियर, अपने सीनियर साथी और पत्रकार स्वरगीय हरेराम पांडेय द्वारा विनोद कापड़ी आदि के आगे बढ़ने की कहानियों से उपजी उत्सुकता थी। मन में दूसरी बात भी थी, दिल्ली आये हो तो लोगों से मिलते जुलते रहो, तेल मक्खन लगाते रहो, न जाने कब कौन काम आ जाएगा। लेकिन यहां तो उलटा ही पड़ गया, तेल लगाने की कोशिश में वही तेल खौलने लगा और मेरे पर ही पलट गया।

मेरी दिली इच्छा है कि वे कापड़ी जी जल्द ही फिर कहीं बास बन जाएं। मैं कतई नहीं चाहता कोई पत्रकार या संपादक कभी बेरोजगार या बेकार रहे। हालांकि अब वो दौर भी नहीं रहा कि कोई बेरोजगार रहे क्योंकि हर रोज एक नया प्रोजेक्ट और वेंचर मार्केट में हाजिर है और उसके लिए लायक लोग नहीं मिल रहे। इसलिए कापड़ी जी कल को फिर किसी जगह सुपरबास की भूमिका में होंगे ही, ये मैं मानकर चल रहा हूं लेकिन एक अनुरोध है, छोटों को हमेशा प्यार दीजिए, वे आपके लिए जान देंगे। अगर बड़े पद पर जाकर विनम्रता बरकरार न रखी जा सके तो इसका मतलब जो अंदर का मनुष्य है वो बहुत छोटा है।

खैर, बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय।

देवांग की एनडीटीवी से बेदखली को उस समय इसी रूप में लिया गया था कि वे मनुष्येतर हो चुके थे और सीधे मुंह बात करना उनकी शान के खिलाफ हो चुका था। मतलब आम आदमी और आम पत्रकार से फोन और आफिस में बदमतीजी से पेश आना उनकी शगल में शामिल था, ऐसा बताया गया। मेरा निजी अनुभव भी कुछ ऐसा ही था।

अभी पता नहीं चला कि देबांग आखिर हैं कहां और क्या कर रहे हैं।

स्टार न्यूज के कई साथियों ने खबर दी कि विनोद कापड़ी के स्टार से हटाए जाने का मेल सारे इंप्लाइज के पास आ चुका है। 15 नवंबर उनका लास्ट वर्किंग डे था। मेल में कापड़ी जी के बारे में ढेर सारी और भी बातें कही गई हैं जिनका उल्लेख यहां करना उचित न होगा।

आगे क्या....अब कोई कह रहा है कि वे बैग ज्वाइन करने जा रहे हैं तो कोई एनडीटीवी में जाने की बात कह रहा है। अच्छा है, जहां भी जाएं, फूले-फलें लेकिन सहजता और सरलता के साथ। अपन की और सारे भड़ासियों की दुवायें-शुभकामनाएं उनके साथ है।

चलिए, कापड़ी जी...आप भी जल्द ही मेरी तरह कुछ दिनों की बेकारी के बाद कहीं नई नौकरी करते दिखिए।

निष्कर्ष साफ है....मार्केट उर्फ बाजार में अगर कोई बडे़ पद पर है तो वो पद शाश्वत नहीं है। कुछ क्षण का तमाशा है सब। अगर वो पद पीछे से हट जाए, खिसक जाए, खिसका दिया जाए तो क्या बचता है...बस वही देह मांस का पुतला। शाश्वत है तो सिर्फ मनुष्यता, सहजता और सरलता। यही वो बेसिक चीजें हैं जो ऊंचे पद से नीचे गिरने के बाद भी आपको लोगों के नजरों से गिरने नहीं देती है।

श्रद्धांजलि....
: सहारनपुर में आईबीएन के पत्रकार नीरज चौधरी के निधन की दुखद सूचना से मर्माहत हूं। नीरज से दो-तीन अच्छी मुलाकातें थीं। एक बार सहारनपुर में होटल में रात में देर तक बैठे थे। एक बार नीरज दिल्ली आए थे, रियाज के साथ तो काफी देर तक बतियाते गपियाते और पीते खाते रहे। संभावनाओं से भरा चेहरा और चमकती आंखें अब भी याद हैं। छोटे जिले से होने के बावजूद जो पत्रकारीय चपलता और तेवर उनमें थे, वे ढेर सारे दिल्ली वालों में देखने को नहीं मिलते। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिजनों को इस दुखद घड़ी में खुद को संभालने का संबल।

भड़ासियों से अनुरोध है कि वे इस आकस्मिक मौत की घड़ी में अपनी संवेदना व्यक्त करें। एक प्रस्ताव है, अगर हम सभी उस परिवार की कुछ आर्थिक मदद कर सकें तो ज्यादा अच्छा है। इसके लिए क्या किया जाना चाहिए...हम सब सोचें। भविष्य में भी ऐसी दुखद स्थितियों के कारण परिवार पर आने वाली विपदा को कम करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है, इस बारे में हम सभी पत्रकारों को सोचना चाहिए। आज जो व्यक्तिवाद और पैसे का दौर है उसमें हम दूसरों के दुख और पीड़ा से खुद को बस केवल कुछ क्षण तक ही जोड़ पाते हैं और फिर लग जाते हैं अपने काम में। मेरा मानना है कि हम सभी पत्रकार भाइयों को एक सामूहिकता विकसित करनी चाहिए ताकि सुख में न सही, दुख में तो काम आवें.....

यशवंत सिंह

आत्मा की परेशानी को समझिए और बस लिख भेजिए

भड़ास फिर से सब के लिए खुल गया. शायद मेरे नाम से आप लोंगों को अचंभा हो.
लेकिन क्या करूँ दुनियाँ में कोई आदमी ऐसा नही है जिसकी आत्मा कभी ना कभी परेशान ना होती हो. इस कारण मैने अपना नाम परेशान आत्मा रख लिया.
जब भी आपकी आत्मा परेशान होगी, यक़ीन दिलाता हूँ आपकी कलाम ज़रूर परेशान आत्मा के रूप में लिखने के लिए बेचैन होगी.
बस दिल और आत्मा की आवाज़ तो सुनिए.
परेशान आत्मा

Thanks, Yashwantjee to open Bhadas.

15.11.07

शोक समाचार

सहारनपुर में कार्यरत IBN -7 के युवा पत्रकार नीरज चौधरी का कल देर रात
एक सड़क दुर्घटना में देहावसान हो गया।
नीरज सहारनपुर की पत्रकारिता में अपने अच्छे स्वभाव एवं
उत्कृष्ट काम के लिये जाने जाते थे।
नीरज अपने परिवार में अपनी धर्म पत्नी एवं चार वर्षीय पुत्र पीछे छोड़ गये हैं।
प्रार्थना है, परमेश्वर उनके परिवार को इस कठिन समय से निकलने में सहायता करे।
अंकित माथुर...

लो फिर आ गये भड़ासी, अब ना रहेगी उदासी

भड़ास के दोबारा शुरु हो जाने पर सभी भड़ासीयों को शुभकामनाऐं। खासतौर पर यशवंत भाई को जिन्होने भड़ासियों को पुन: ये ब्लाग दे दिया। अब हमारे कई साथी जो भड़ास के बन्द हो जाने से निराश थे, वो खुश नज़र आयेंगें। उम्मीद है आप सभी लोग भड़ास के साथ-साथ रंगकर्मी को भी अपने विचारों से सुशोभित करेंगें। भड़ास और रंगकर्मी दोनो ही ब्लाग आप के लिये है जो कहना है खुलकर कहिये। चाहे हो अन्दर की बात या फिर किसी चिरकुट की कारस्तानी। (चिरकुट कहने से हमारी पुरानी कम्पनी के एक पुराने कुलीग को थोड़ी परेशानी होती है, इस लिये माफी के साथ ये शब्द इस्तेमाल कर रहा हुँ।) अपने दिल मे कुछ मत रखिये बस कह ड़ालिये मेरा मतलब है कि लिख ड़ालिये।

परवेज़ सागर
www.rangkarmi.blogspot.com
parvezsagar.cneb@gmail.com

सुनिए, क्या कह रहे हैं वेद व्रत गिरी जी....

ढेर सारे ऐसे मेल आते हैं जो प्रमोशनल होते हैं। कई बार ये जानकारियां बेहद जरूरी होती हैं और कई बार अनावश्यक। जो जरूरी जानकारियां हैं उसे भड़ासियों से शेयर करने का दिल करता है। उम्मीद करता हूं, बाकी भड़ासी भी ऐसा करेंगे। तो ये जो वेदव्रत गिरी जी का मेल है, उसमें उन्होंने अपने 15 वर्षीय पत्रकारीय करियर के बाद कुछ निष्कर्ष निकालकर कुछ नया काम शुरू किया है। सिटीजन जर्नलिज्म का आजकल जोर है। कई लोग लगे हैं। मुंबई में शशि जी बिलकुल लंगोटा पहनकर चौबीसों घंटे के लिए जुट गए हैं। वेदव्रत जी ने भी आगाज कर दिया है। तो भई भड़ासियों, आपके लिए एक बड़ी खुशखबरी तो है कि ये जो पत्रकारिता का दौर है, वाकई स्वर्णकाल है, बस आप अपने का नये मौकों के लायक तैयार करके रखिए। पढ़ते लिखते रहिए, तकनालजी से दोस्ती गांठते रहिए, नेट और नये ट्रेंड से गलबहियां करिए...देखिए, आप कहां से कहां पहुंचते हैं। दिक्कत बस यही है आप अपने बारे में जब आंकें तो कम न आंकें, आप वो हैं जो आपको खुद ही नहीं मालूम। सुबह सुबह भाषण देने का मूड नहीं था लेकिन क्या करें, कोई मिला ही नहीं तो सोचा चलो भड़ासियों के सामने ही निगल देते हैं। तो वेदव्रत जी को पढ़िए, जरूरी लगे तो संपरकियाइये, बतियाइये...

और हां, कई लोगों ने शिकायत की कि भड़ास का मेंबर बनने के दौर कोई इरर आ जा रहा है तो आज मैंने कुछ दुरुस्त किया है, अगर फिर दिक्कत आए तो जरूर बताएं....

यशवंत

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वेद व्रत गिरी का पत्र
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Dear Friends,
It's About MyNews Interactive
It is about a unique citizens' news portal - www.mynews.in. This has been widely appreciated as a pioneering initiative in citizen journalism in India. The www.mynews.in respects a writer in you. It also values your keen observations and invites you to express common concerns, which otherwise die out for want of suitable media. The www.mynews.in claims to be the first Indian Portal of its kind in many respects. It is a complete democratic forum. No prejudices for views and no bars on expressions. The ''of the people, by the people and for the people'' dictum comes alive with the www.mynews.in. We believe every citizen is a reporter/broadcaster for us and can freely contribute news/views/images/videos/blogs/debates/forums etc. What you think is of immense value for us and therefore be in public domain. We promote positive thinking, encourage critical analysis and dissenting voices for greater common good. We hold that your thoughts can help policy makers and professionals change and amend their approaches. You can have feed back about the impact of your dispatches on http://www.mynews.in/. Register yourself as citizen journalist and start sending us stories.

After 15 years in active journalism, I have come to a conclusion that we mainstream journalists have to ignore public interests for a variety of reasons. The focus of mainstream media suffers many biases. The voices of common people remain unheard. My endeavour, through www.mynews.in is to provide all thinking members of the society an opportunity to express themselves. The response is very encouraging.

I seek your esteemed participation in the mission as a citizen journalist and commentator. Please write for www.mynews.in and extend your support for outreaching www.mynews.in to one and all.

I am waiting for dispatches from your side. Please, reply.

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Thanks with regards.
Yours' Sincerely:
VED VRAT GIRI
E-mail: vedvgiri@gmail.com
: vedvgiri@mynews.in
Cell Phone No.: 919826169126

14.11.07

परवेज के ब्लाग से एक और माल...., शादी की पार्टी कब दे रहो हो अंकित

अंकित और यशवंत जी को ढेरों शुभकामनाऐं
हमारे पुराने साथी अंकित माथुर ने कुंवारों की मंड़ली से इस्तीफा दे दिया है। अभी हाल ही मे वो ज़िन्दगीभर के लिये बेड़ियों मे जकड़े गये है। उनके साथ ये हादसा अपने शहर सहारनपुर मे ही पेश आया। अंकित को बांधने वाली हमारी भाभीजान भी सहारनपुर से ताल्लुक रखती है। माथुर जी इस नयी ज़िन्दगी के लिये ढेरों शुभकामनायें।
भड़ास के ज़रीये हिन्दी ब्लाग को नयी दिशा देने वाले हमारे साथी यशवंत सिंह जी ने नयी जगह नयी ज़िम्मेदारी सम्भाली है। इसके लिये उन्हे शुभकामनायें। उम्मीद है यशवंत भाई कामयाबी के नये रास्ते पर आगे बढते रहेगें। इसी उम्मीद के साथ आपका...................
परवेज़ सागर
Posted by PARVEZ SAGAR at 7:13 AM 1 comments
Show Original Post
अंकित माथुर said...
परवेज़ भाई, इन बेडियों से कौन बच पाया
है। आप तो हमसे भी पहले शहीद हो चुके थे।
लेकिन फ़िर भी हमें आपकी बधाई स्वीकार है।
November 7, 2007 6:55 AM
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(चोरी-चोरी बियाह कर लिया, भड़ासियों को बुलाया तक नहीं...चलो, भई, अब पार्टी तो दे दो....वैसे, शादी के बाद से अंकित काफी ठंडे से लग रहे हैं...तभी सब लिखना-बोलना बंद है.....यशवंत)

परवेज का ब्लाग है रंगकर्मी, उनकी खुद की खबर पढ़िए...

आज तक को अलविदा, सीएनईबी से नाता
बहुत दिन बाद लिख रहा हूँ। दरअसल इस बीच वक्त ही नहीं मिल पाया। साढे चार साल तक "आज तक" के साथ काम किया। इस बीच ज़िन्दगी ने कई सबक सिखाये। कुछ अच्छे तो कुछ बुरे। बहुत कुछ था जो यहां सीखने को मिला। सबसे अहम ये कि दिल्ली मे काम करने वाले लोगों को समझने का अनुभव। जो शायद अभी भी पूरा नही हो पाया। खैर इस मुद्दे पर बात करुगां तो दूर तक चली जायेगी। बस कहना चाहूँगा उन लोगों के बारे मे जिन्होने मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाया और निराश होने पर मुझे प्रोत्साहित किया। यहां उनके बारे मे जितना लिखूँ कम है। वो हैं श्री जे पी दीवान और श्री राजेश बादल।
"आज तक" को अलविदा कहने के बाद मैने CNEB NEWS चैनल मे काम शुरु किया है। नया चैनल, नया ओहदा और नयी ज़िम्मेदारी इन दिनों थोड़ा व्यस्त चल रहा हूँ। एक अच्छी टीम बनाने की कवायद मे जुटा हूँ। कोशिश जारी है। काम थोड़ा सा मुश्किल है क्योंकि अधिकतर लोग यहां पर फ्रेशर है। जल्द ही ये अलग तरह का न्यूज़ चैनल आप लोगों के सामने होगा। ये चैनल भूत प्रेत नाग नागिन और अश्लीलता दिखाने के बजाय खबरें दिखायेगा। उम्मीद है सबको पसन्द आयेगा। अब लिखना बन्द कर रहा हूँ। बाकी बाते बाद मे होगीं।

परवेज़ सागर
साभारः रंगकर्मी

महिलाओं के लिए इंडिया टुडे का नया न्यूज़ पेपर

इंडिया टुडे ग्रुप जल्दी ही डेली मेल से साथ देश की राजधानी नई दिल्ली से एक समाचार पत्र शुरू करने जा रहा है, खबरों के अनुसार एक लाख बीस हजार कापी के साथ यह जल्दी लांच होने वाला है. यह ४८ पेज का पेपर होगा. यह समाचार पत्र विशेष रूप से महिलाओं के लिए निकाला जायेगा..साभार - बोल हल्ला

Invitation for VIKALP: A 10 day residential camp in Bihar from 22-31December 2007

Dear Friends

Greetings from Safar!

Safar is going to organize VIKALP a 10 day residential camp in the
Tariyani Chhapra Village of Bihar from 22nd to 31st December 2007. The
main aim of this camp is to explore various tools and ways of
communication, which give the participants some food for thought. The
camp will provide an opportunity for them to share their knowledge &
skill and to have an experience of rural life. We hope that it will
help the participants to begin a journey of their choice.

VIKALP is designed in such a way that it becomes an interesting
interactive learning experience. The participants will make
acquaintance with the new media technologies, interview the villagers,
and shoot photographs and videos. They will play with sound & images,
design books, make comics, write stories, poems, etc. Besides, there
will be a couple of community meetings, where the participants will
get to know about the local way of living, arts & crafts, culture and
practices.

No formal qualification is required to attend the workshop. We are
asking that people cover their own travel to-from Tariyani Chhapra and
contribute Rs.500 for food, accommodation and other accessories. Your
additional contribution will support other's participation. Safar is a
self-funded organization. It accepts event/program based support from
friends and well-wishers.

All are welcome, and please share the invitation with others. Last
date of registration is 25th November 2007. Let us know as early as
possible if you are interested in coming.


Tariyani Chhapra is 40 kilometers from Muzaffarpur Railway Station.
There are direct trains from almost all major cities to Muzaffarpur.
For registration and any other query please write to safar.delhi@gmail.com
or call @
+91 9811 972872 (Rakesh),
+91 9971 393 818 (Gautam)

Best Regards
Rakesh
for SAFAR


--
SAFAR a collective journey of researchers, journalists, students,
lawyers, activists, cultural practitioners and performing artists with
a deep commitment to the ideals of social and gender equality. This is
an open space for the dialogue, betterment and empowerment of the
marginalized.

http://safarr.blogspot.com
http://www.freewebs.com/safarindia

सितारों के आगे भी एक मुकम्मल जहाँ होगा !

आरकुट में फ्रेंड लिस्ट में 103 दोस्त हो गए। आज जो ताजा दोस्त बने हैं वो हैं मीडिया के छात्र विनय जायसवाल। उनकी बायोग्राफी पढ़ रहा था तो उसमें एबाउट मी खांचे में कुछ अच्छी चीज पढ़ने को मिली। सोचा, चलो भड़ासियों के सामने भी परोस दूं। अब क्या करें, पेट में कुछ पचता नहीं जो......
about me:
सितारों के आगे भी एक मुकम्मल जहाँ होगा !
उस जहाँ में सबसे सुंदर हमारा आशिया हिंदुस्तान होगा !
जहा न होगी गरीबी और बुराई !
जहा सबको नसीब रोटी,कपड़ा और मकान होगा !
हर एक होंगे जहा शिक्षित और हर हाथ को रोजगार होगा!
घिरिणित आतंकवाद की जगह यहाँ अमन का पैगाम होगा !
न होगा कोई भाषाई विभेद न कोई धार्मिक उन्माद होगा!
हम होंगे सिर्फ भारतीय और हमारा भारत देवताओ का वरदान होगा!
थम जाएँगी सरे विश्व की नज़रे हम पर
जब हममे वह प्रकाश बेशुमार होगा.............................
लोग कहते हैं हुई थी बारिश उस रोज़,
उन्हें क्या पता ग़म-ए-हिज़्र में रोया था कोई।

यूँ साए देख कर खुश होते हैं सब ग़ाफ़िल,
उन्हें क्या पता कल धूप में सोया था कोई।

कतरा-कतरा कर के मुस्कुराते हैं सभी,
उन्हें क्या पता चश़्म-ए-तर का रोया था कोई।

मंज़िल-ए-आखिर को चलते हैं अब राहिल,
उन्हें क्या पता इन राहों पर खोया था कोई।

रहते है साथ साथ मै और मेरी तनहाई--
करते है राज की बात मै और मेरी तनहाई--

दिन तो गुज्ञर जाता है लोगों की भीड़ में--
करते है बसर रात मै और मेरी तनहाई--

सांसो का क्या भरोसा कब छोड जाये साथ--
लेकिन रहेंगे साथ मै और मेरी तनहाई--

आए ना तुम्हे याद कभी भूल कर भी शायद--
करते है याद तुम्हे मै और मेरी तनहाई--

आ के पास क्यं दूर हो गये--?????
करते हैं तुम्हारा इंतजार मै और मेरी तनहाई .

विनय तक पहुंचने के लिए आप इस लिंक को क्लिक कर सकते हैं, बशर्ते आप का आरकुट में खाता चल रहा हो। लिंक है...
http://www.orkut.com/Profile.aspx?uid=4223539831650805970

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मीरा, अंकित, आलोक, रियाजुल, राहुल, विशाल....जमने लगी है मंडली। लेकिन अभी ढेर सारे भड़ासी गायब हैं। उनको खोज-खोजकर पकड़ना होगा, तभी असल भड़ास की शुरुआत होत सकेगी। अरे हां, वो सचिन कहां है, मेरठ से लुधियाना वाला। उसने अपने नये शहर के मिजाज पर अभी तक कुछ लिखा नहीं। उम्मीद है वो भी जल्द दर्शन देगा। रियाज सहारनपुरी, डा. मांधाता कोलकाता वाले, दिलीप मंडल जी....पता नहीं कहां हैं ये लोग....
फिर मिलते हैं....

सभी का स्‍वागत

भडास शुरू हुआ स्‍वागत है

बॉस कुछ और पुरानी पोस्‍ट अगर हों तो वो भी लगाइये

शुभकामनाओं के साथ

जय भडास

नोमश्कार

नोमश्कार कोरता हूँ बोंधू लोगो
हम फिर शे वापस आ गया हूँ, मुला इश बार तनिक ओंदाज़ ओलग होगा
एक शेर कहता हूँ , खैर छोडिये , नही कहूँगा।
नही कहूँगा तो कोई क्या कर लेगा !!

13.11.07

मेरी शराफत...

नमस्कार मित्रोमीरा जी की बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ की भड़ास में अब वैसा नहीं होना चाहिए जिसे यशवंत जी बुरा अनुभव कह सकें। इस बार मैं भी इस चर्चा का हिस्सा बनाना चाहता हूँ परन्तु मीरा जी की सलाह के मुताबिक मेरे अपने पास कोई भी "रिफरेन्स" नहीं है. बस इतना ही कह सकता हूँ की मैं जैसा भी हूँ... मेरी शराफत का एक ही प्रमाण है और वो है मेरा अपना ही ब्लॉग॥

www.punitomar.blogspot.comआप
के लिए जिन्दगी का एक दिन और सही॥

चाहे तो इसे ही देख लें.. और बाक़ी मैं अपने बारे में क्या कहूँ अब..

लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास

लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास।
बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे।
आपका थोबड़ा किससे मिलता है???
मेरा सभी लोगों से गुजारिस है की अपना-अपना थोबड़ा पहचाने
मैं स्पोर्ट्स देखता हूँ इसलिए डेविड बेककहम का थोबड़ा मुझसे मिलता है हाआआआआआ
फिर से बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे। यशवंत भैया की जे।

लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास

लो खुल गया, खुल गया, खुल गया भड़ास।
बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे।
आपका थोबड़ा किससे मिलता है???
मेरा सभी लोगों से गुजारिस है की अपना-अपना थोबड़ा पहचाने
मैं स्पोर्ट्स देखता हूँ इसलिए डेविड बेककहम का थोबड़ा मुझसे मिलता है हाआआआआआ
फिर से बोलो शियाराम की जे। हनुमान की जे। यशवंत भैया की जे।

एक बार सोच लीजिये

यशवंत जी एक बार सोच लीजिये , इस बार बहुत सोच समझ कर और फूंक फूंक कर कदम रखने की आवशयकता है. मेरा एक सुझाव है की भड़ास को वही लोग ज्वैने करें जो किसी के परिचित या रेफरेंस से आयें. हालांकि मैं मेम्बेर्स में कोई अन्तर नही करना चाहती ये बस इसलिए की पिछली बार की तरह कुछ ग़लत लोग भड़ास से न जुड़ें.खैर आप जो उचित समझाने वो करने के लिए स्वतात्न्त्र हैं ये केवल एक सुझाव मात्र है.
-मीरा

नई शुरुआत, नई भडास। जो भी हो जय भडास...

बड़के भईया यशवंत भडासी को नमश्कार॥
पता नही कौन सी खटिया के तले पडे थे।
फ़ुनवा भी कभी मिल जाये तो मिल जाये नही तो आउट आफ़ कवरेज एरिया।
खैर छोडिये जो हुआ सो हुआ।
अब भडास फ़िर निकलेगी और खूब ज़ोर से निकलेगी।
हमने तो कहीं भी लिखना पढना भी छोड़ दिया था।
यकायक भडास बंद, सारी पोस्ट गायब!
हैरान और परेशान होने के अलावा कुछ बचा ही नही।
रात को ही फ़ोन करा और पाया कि कुछ तकनीकी खराबी नही है,
यशवंत भाई ने खुद ही ब्लाग डिलीट मार दिया है।
कारण तो पता नही चल पाया, लेकिन निवारण उन्होने खुद ही कर डाला है अब।
खैर मज़ा आ गया।
जय भडास॥ जय भडास ॥
जय भडास॥
अंकित माथुर...

आपका थोबड़ा किससे मिलता है???









I have updated my blog....अनिल पाण्डेय

I have updated my blog. please visit this url..

http://aneelpandey.blogspot.com/

and comment on it....

Thanks with regards :
--
Anil Pandey
Sub-Editor, News Today
(Powerd by Mid Day)
Phone : (0731) 4222584 | Fax : (0731) 4222585
IM : anil4pandey@gmail.com
http://aneelpandey.blogspot.com

जी, कार्टून से भड़ास निकालेंगे तो महाकलाकार कहलाएंगे

कीर्तीश भाई ने पूछा है कि ......

यशवंत जी,
सादर वंदे
में भड़ास का सदस्य तो बन गया लेकिन आपसे पूछना भूल गया कि क्या में अपनी भड़ास कार्टूनों के माध्यम से निकल सकता हू ?

विनीत
कीर्तीश भट्ट

मेरा जवाब है.....कीर्तीश जी, लिखकर और बोलकर भड़ास निकालने वाले तो बहुते लोग हैं, कलाकारी करके भड़ास निकालने वाला मुझे सिर्फ आप ही दिक्खे हैं। तो बरखुरदार, जरूर करटूनियाइए और अपनी भड़ास निकालकर गर्दन और गला हलकाइए, अरे नहीं, हलका करिए.....। और महाकलाकार कहलाइए।
शुक्रिया...

आलोक जी, आपका ब्लाग है, सब आपका है, मेरा क्या है.....गूगल का एड लगा नहीं कि आपने सवाल कर दिया, घर में लक्ष्मी तो आने देते....आपका भाई अगर धनी हो जाए तो आपको कष्ट होगा क्या.....ये तो मैं मजाक कर रहा था लेकिन आपने बिलकुल सही सवाल उठाए हैं। गूगल से एड आने पर मैं अपनी कंपनी खोलूंगा....यशवंत सिंह प्राइवेट लिमिटेड। इसमें जितने नशेबाज पत्रकार हैं, उनका इलाज कराया जाएगा ताकि वो दारू-वारू छोड़कर नार्मल जीवन जी सकें। जाहिर है, मेरे नाम से कंपनी होगी तो तब तक मैं नहीं रहूंगा और मेरी स्मृति में ही कंपनी खुलेगी। और यह भी बात स्पष्ट है कि दारू दारू पीते पीते किडनी फेल होने से ही मौत होगी, इसलिए आलोक भइया, खुदा का शुक्र मनाइए कि गूगल बाबा का जो चेला बना हूं, तो उससे कुछ फल भी मिले और लक्ष्मी आवें। दीवाली में साढ़े आठ सौ रूपये जुवे में जीता था, उसकी गरमी आज तक महसूस कर रहा हूं।

यशवंत

यशवंत जी बधाई हो

यशवंत जी को और भड़ास के सभी साथियों को शीना का नमस्कार...अच्छा लगा कि भड़ास अब फिर से हम सबके सामने अपने पुराने रूप में आ रहा है....यशवंत जी इसके लिए आपको बधाई ....शीना राय

wah gurudev maza aa gaya

मेरे गुरु बड्डे भाई और एक्स बॉस (आज भी उसी रूप में देखता हूँ ) यशवंत जी का अंदाज़ ही निराला है। यह कब कौन सा धमाका कर दें कोई नहीं जानता और अब भड़ास का नया रूप भई मज़ा आ गया। यह सुनकर बड़ी निराशा हुई थी की भड़ास अब कमुनिटी ब्लोग के रूप में नहीं चलेगा। टू सचिन भाई कहाँ हो? भड़ास आवाज़ लगा रहा है.

भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास

पहले लिख ही दिया है, कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ, पर फिर से दोहरा रहा हूँ, कि मेरा किसी समाचार-संगठन से दूर दूर तक का कोई वास्ता नहीं है, इसलिए मैं बस बतौर उपभोक्ता खबर लूँगा, दूँगा नहीं। और मेरी दिलचस्पी हिंदी अखबारनवीसी और टीवीनवीसी में होने वाले तकनीकी बदलावों में ज़्यादा है, तो उन्हीं के बारे में लिखूँगा और सवाल पूछूँगा। अब हो सकता है सवाल पूछते पूछते जवाब मिलें, या न मिलें, या सवाल ही बदल जाएँ, या सवाल किससे पूछ रहा हूँ, वह ही बदल जाए। जो भी हो।

तो बस यूँ कहिए कि अपने आपको एक जागरूक समझने वाला और सनकी उपभोक्ता हूँ। इस बात में भी दिलचस्पी है कि १०,००० प्रयोक्ताओं वाला चिट्ठा कैसे सँभलेगा, चाहता भी हूँ कि यह प्रयोग सफल हो। तो यदि कोई तकनीकी मदद चाहिए हो तो निस्संकोच पूछें, हाँ, मदद मैं अपने समयानुसार ही दे पाऊँगा, मगर इसका मतलब यह नहीं कि आपको मदद माँगने में संकोच करना होगा।

हाँ, तो १०,००० लेखकों वाला चिट्ठा, जो एक व्यक्ति - या बाद में कुछ अधिक व्यक्ति - संचालित कर रहे हों, कैसा लगेगा? इस समय कल्पना कर पाना मुश्किल है। अक्षरग्राम पर जब मिर्ची सेठ के सादर आमंत्रण पर पहला लेख लिखा था, तो उसमें काफ़ी भड़ासात्मकता थी।

उसी भड़ासात्मकता को जीवित रखने का प्रयास करते हुए यहाँ शामिल होने का न्यौता स्वीकारा है। कोई भी सामूहिक काम आपसी सहयोग और सूझ बूझ के बिना नहीं चल सकता है, तो योगदान यदि किसी और प्रकार का चाहिए हो तो मुझे बताएँ। और कुछ बातें स्पष्ट होनी भी ज़रूरी हैं, जैसे कि, ये जो गूगल के विज्ञापन यहाँ लगे हैं, उसका पैसा कहाँ जाता है? सवाल यह नहीं है कि पैसा आ रहा है या नहीं, यह भी नहीं है कि कहाँ जाता है। बस, स्पष्ट होना चाहिए - क्योंकि कई लोग यहाँ लिख रहे हैं।

दूसरी बात यह कि जो भी लेख यहाँ छपते हैं, उनके पुनर्प्रकाशन का और अन्य अधिकार - यानी सर्वाधिकार - किसका है - भड़ास का या मूल लेखक का? वही सवाल, भड़ास पर होने वाली टिप्पणियों के बारे में भी।

यह दो सवाल मैं अलग से यशवंत जी को भी पूछ सकता था लेकिन क्योंकि यह सार्वजनिक महत्व के हैं तो मैंने सार्वजनिक रूप से पूछ लिया है। जवाब जो भी हों, मुझे तो स्वीकार्य ही हैं, पर शुरुआत में ही स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जवाब हैं क्या। बस इसीलिए पूछा है।

तो जाते जाते यशवंत जी की ही थोड़ी खबर ले लूँ - आप जब किसी और लेख या टिप्पणी का हवाला देना चाहें, तो उसकी कड़ी प्रदान कर सकते हैं - जो लोग आपका लेख पढ़ रहे हैं वह कड़ियों पर चटके बाज़ी जम कर करते ही हैं, साथ ही वहाँ छपी नई टिप्पणियाँ या संशोधित लेख तक भी लोग अपने आप चले जाएँगे। पर शायद टीवी वालों को बार बार वही विज़ुअल दोहराते दोहराते आदत बुरी पड़ गई हो!

खैर अब तक पिछले अनुच्छेद से आप समझ ही गए होंगे कि मैं यहाँ किस तरह की सामग्री परोसूँगा, तो मिलते रहेंगे।

badhayi.......learn english

bhadas phir shuru hone pe badhayi.....

rajkumar.....

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भड़ास की ये स्पीड...बाप रे, नजर न लगे....

भड़ास को फिर से कम्युनिटी ब्लाग के रूप में शुरू करने के दो घंटे के अंदर कुल पांच मेंबर बन गए और पांच कमेंट भी आ गए। अरे, इतनी तेज स्पीड। दुश्मनों का कहना है कि जो तेज भागता है वही तेज गिरता है, भड़ाक से। और मुंह फोड़ लेता है, हाथ तोड़ लेता है। तो कहीं इस बार भी....। नहीं, बिलकुल नहीं। आशीष का सही कहना है, यशवंत जी, फिर झटका न दीजिएगा। तो भई, झटका नहीं, इस बार भड़ासियों को पुरस्कार मिलेगा, यह पक्की बात है, लालीपाप नहीं।

अरे ये लो,,,,,अपने भड़ासी गुरु अनिल सिन्हा और डा. सुभाष भदौरिया तो जैसे इसी इंतजार में बैठे थे कि भड़ासियों का फिर जुटान हो। लो गुरुवरों, फिर आ गए, उसी रंग और तेवर के साथ। बल्कि थोड़ा और खर। दोनों गुरुवरों को प्रणाम और नमस्कार और सलाम। उम्मीद है, वे अपने बिंदास और बेबाक अनुभवों, आइडियाज और फंतासियों से हम सभी को शिक्षित प्रशिक्षित करते रहेंगे। पेश है...भड़ास के फिर से शुरू होने के दो घंटे के अंदर आई पांच टिप्पणियों की एक झलक....इसमें कई टिप्पणी करने वाले साथी भड़ास के मेंबर नहीं बने हैं। मेंबर बनने के लिए वे बाईं और लिखे भेज रहा हूं न्योता के नीचे भड़ासी बनिए को क्लिक करें, अपनी ई-मेल आईडी और अपना वाला पासवर्ड डाल दें, बस नाम आ जाएगा मैं ऐसा क्यों हूं के नीचे.....तो भई आलोक, आपको मिल गया होगा आपके सवाल का जवाब........
जय भड़ास....

5 comments:
12 November, 2007 22:57
डॉ.सुभाष भदौरिया. said...
ये ग़ज़ल मैं अपने तमाम भड़ास के दोस्तों को पूरे एहतिराम के साथ नज़र कर रहा हूँ और गुज़ारिश करता हूँ कि उनका बयान ज़ारी रहे.उनके कलाम में गीता और कुरान की पाकीज़गी हैं जो मैने अक्सर महसूस की है.सतही तौर पर उनमें भाषाई नुक्श भले हों.अंदरूनी जज़्बात बड़े गहरे हैं जिन्हें मैं तस्लीम करता हूँ.
बकौले मीर तकी मीर
सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ.
मुस्तनद है मेरा फ़र्माया हुआ.

डॉ.सुभाष भदौरिया.
ता.13-11-07 समय-1-00PM

ग़ज़ल भड़ास के नाम
तुम क्या गये की नेट की दौलत चली गयी.
ऐसा लगा कि अपनी मुहब्बत चली गयी .

है कीर्तन का दौर ये देखो तो दोस्त अब.
गाली में जो हयात थी उल्फ़त चली गयी.

गूँगों में एक तेरी ही आवाज़ थी भड़ास,
सच कहने की तो लोगों में शिद्दत चली गयी.

हम अपने ही ग़मों से परेशान थे बहुत,
जाने जो तेरे ग़म तो मसर्रत चली गयी.

हम आज भी हैं तेरे तलबगार जानेमन,
तेरी ये कब कहा कि ज़रूरत चली गयी.
12 November, 2007 23:41



आशीष said...
जय भड़ास

12 November, 2007 22:18
Basant Arya said...
पुरस्कार शुरू कर रहे है ये सराहनीय है. लगे रहो

12 November, 2007 22:42
आलोक said...
यशवंत जी,
मैं भड़ासी बनना चाहता हूँ। आपने यह तो लिखा ही नहीं कि भड़ासी बनने के लिए करना क्या होगा? या यह न्यौता केवल आपसे पहले जान पहचान रखने वालों के लिए ही है? मैं मीडिया से जुड़ा नहीं हूँ, उपभोक्ता के तौर पर खबर लूँगा ही, दूँगा नहीं।
आलोक

12 November, 2007 22:56
Sanjeet Tripathi said...
बहुत खूब!!
शुभकामनाएं बंधु!

यशवंत जी इस बार झटका मत दीजियेगा

लीजिए एक बार फिर से भड़ास का मंच सबके लिए खुल गया है, जहाँ कोई भी दस्तक दे सकता है और अपनी भड़ास निकाल सकता हैं..लेकिन भड़ास की फिर से शुरुआत के साथ मन में एक और डर बैठा हुआ है. और इसका हल सिर्फ़ यशवंत जी ही कर सकते हैं..यशवंत जी कहीं पिछले बार की तरह हम लोगों को कहीं एक बार और झटका मत दे दीजियेगा.. नहीं देंगे ना ? क्यूंकि जब पिछली बार आपने भड़ास को उडाया था तो मुझे बहुत बड़ा झटका लगा था.. लेकिन मुझे इस बार पूरी उम्मीद है कि कुछ भी हो जाए आप भड़ास के हक से हमें वंचित नहीं करेंगे,...क्या यह वचन देते हैं आप?

भड़ास के शुरू होने पर बधाई

भड़ास के दुवारा शुरू होने पर बधाई। विश्वास है कि अब यह जारी रहेगा।

(अजीत कुमार मिश्रा)

आओ बनाएं एक बेहतर भड़ास

फिर से भड़ास शुरू करने के लिए बधाई। शायद सबसे पहला सदस्य मैं ही हूं इस बार।
अनिल सिन्‍हा

भेज रहा हूं न्योता, भड़ासी बनिए....मतलब जोर से कहो, खुल के कहो...जय भड़ास

लीजिए, उसी तेवर और उसी दमखम के साथ फिर आ गया भड़ास। मीडिया वालों की खबर देने और खबर लेने। लेकिन यह काम तो तभी होगा ना जब फिर भड़ासियों की फौज तैयार हो। तो, एक बार फिर भेज रहा हूं न्योता। नेह निमंत्रण नहीं न्योता। नेह निमंत्रण का दौर गुजर गया है। अब साफ-साफ न्योता देने का दिन आ चुका है। पिछले अनुभवों से सबक लेकर अबकी जो भड़ास आपके सामने हाजिर किया जा रहा है वो दरअसल ज्यादा मेच्योर और ज्यादा सहज है। हालांकि मेच्योरिटी और सहजता में आपस में उलटा वाला रिश्ता होता है लेकिन इस बार वाकई हम सभी भड़ासी एक नई क्रांति की बुनियाद रखने वाले हैं, वो है सूचना और जानने की क्रांति का अधिकार। हर रोज मीडिया में इतनी सारी चीजें हो रही हैं कि उन्हें बताने वाला कोई नहीं है। अफवाहों से सही खबरें कम, झूठी खबरें ज्यादा मालूम होती हैं। तकनालजी में रोज नई चीज आ रही है। जिन्हें ये सारी जानकारी पता है वो तो भौचक्क है और सोच रहा है कि बाप रे, इतना सारा बदलाव, इतने फटाफट तरीके से। जिन्हें नहीं पता है वो भी भौचक, मुंह बाये, कुछ इस अंदाज में भाव दिखाते हुए....हें हें हें भाई...हमका तो कुछउ नाहीं मालूम....ऐही खातिर भौचक्क बानी...। तो भई, अगर आगे जाना है, रेस में बढ़ते जाना है, करियर और प्रोफेशन की बुलंदी छूना है तो थोड़ा आरगेनाइज, थोड़ा इनफारमेटिव, थोड़ा प्रोफेशनल और थोड़ा अराजक....होना पड़ेगा। अराजक इस नाते कि जब तक आप थोड़ा अराजक नहीं होते, अपने व्यक्तित्तव में छिपी नई चीजों को तलाश नहीं पाते। अब मझको ही देखिए ना.....पत्रकारिता से बिजनेस तक की यात्रा इसी अराजकता ने ही करा दी। लेकिन सलाह यही है, बड़े भाई या दोस्त की तरह.....दुस्साहस करिए लेकिन प्लांड तरीके से। मुझसे जो चीजें हुईं उसमें प्लांड कम था, स्पानटोनियस ज्यादा था। इसलिए थोड़ी दिक्कत भी झेलनी पड़ी। खासकर मानसिकत ज्यादा।
तो चलिए फटाफट भड़ास का मेंबर बनिए, और भड़ास के फिर से री-लांच और पुर्नजन्म का स्वागत करिए और अबकी बार इस वादे और नारे के साथ कि चलते जाना है, बढ़ते जाना है, मंजिल पाना है......। मेरा एक छोटा सा ख्वाब है...जो पिछले भड़ास के दौर में भी था....काश....हम प्रिंट पत्रकारिता और गैर-पत्रकारिता श्रेणी में 10 तरह के पुरस्कार शुरू कर पाते। और, दोस्तों, आपको सचमुच आश्चर्य होगा कि यह ख्वाब अगले वर्ष के शुरू में सच होने जा रहा है। जो भी भड़ास का मेंबर होगा वो इस पुरस्कार के लिए मान्य होगा। और हां, मेंबर बनने के साथ आप अपना फोन नंबर मुझे निजी तौर पर मेल करिएगा ताकि आपको प्रोफेशन से जुड़ी कुछ जरूरी सूचनाओं को एसएमएस के जरिए भेजा जा सके। यह एक नई सेवा है जिसका ट्रायल चल रहा है। पुरस्कार और नई सेवा के बारे में बाद में बतायेंगे। फिलहाल आज इतना ही कि अगले दो महीनों में भड़ास के सदस्यों की संख्या दस हजार करनी है ताकि भड़ास विरोधियों को अबकी करारा जवाब दिया जा सके। मैंने लैपटाप ले लिया है, मैंने जो नई कंपनी ज्वाइन की है उसने खुद भड़ास को चलाने और इसे आगे बढ़ाने का वादा किया है। है न मजेदार खबर......तो फिर जोर से बोलो, खुल के बोलो....जय भड़ास।
भड़ास के सभी पुराने साथियों से आह्वान है कि वो भड़ास से फिर जुड़ें और इस सकारात्मक और सर्वहिताय आंदोलन का आगे बढ़ाएं। खासकर स्वामी विकास मिश्र से अनुरोध है कि वो नाराजगी छोड़कर फिर एक बार मैदान में आ जाएं।
जय भड़ास
यशवंत सिंह

8.11.07

दिनेश की मेहनत रंग लाई....

दिनेश श्रीनेत की पाती मिली, मगर देर से। दरअसल जिल मेल आईडी पे उन्होंने यह भेजा था, उसे कम ही खोलता हूं लेकिन जब आज उसे खोला और उसमें दिनेश श्रीनेत की पाती मिली तो खुशी हुई। खुशी इसलिए कि वे जिस मकसद से बेंगलूर गए थे, वो मकसद अब सबके सामने आ गया। मतलब, वो जिस कंपनी की हिंदी वेबसाइट के बतौर एडीटर वहां काम कर रहे हैं, वो हिंदी वेबसाइट लांच हो गई। काफी देर तक देखता रहा, बोधिसत्व जी की प्रेम कविताएं पूरी पढ़ी। इसके बाद एओएल कंपनी की सारी खबरें पढ़ीं, होम पेज देखा.....वाकई, पढ़ और देखकर लगा कि कंपनियां किस तरह पूरी दुनिया में छा जाने की मुहिम में जुटी हुई है। मजेदार यह है कि इस कंपनी ने हिंदी के साथ तमिल में भी साइट लांच की है। अब जब दिनेश जी ने इतने नेक काम की जानकारी मुझे दी तो क्यों न इसे जन जन तक पहुंचाया जाए, इसी मकसद से इसे भड़ास पर डाल रहा हूं. अगर आप लोगों को कोई प्रतिक्रिया दिनेश तक पहुंचानी हो तो उन्हें इस पते पर मेल कर सकते हैं....। नीचे वो पत्र, वो लिंक हैं जिनके जरिए एओएल के काम-नाम के बारे में जान सकते हैं।
dshrinet@gmail.com
शुक्रिया
यशवंत
---------------



Now our site is officially launched, u can see the work of our Hindi team.
I know there are many things that we can improve, plz give ur suggestions and comments.
www.aol.in/hindi
regards
Dinesh Shrinet


See here some news about our Hindi site.
New York, October 31: AOL plans to launch Wednesday Hindi and Tamil language versions of its Internet portal in India as part of an aggressive global expansion that will see it in 30 regions by the end of 2008. The online unit of one of the world's biggest media companies, Time Warner Inc., will also enable video searching in eight regions outside the United States.
read full story in-
http://www.aol.in/news/story/2007103103009019000001/index.html


AOL takes a giant step towards its expansion goal with the launch of a local language version of its web search portal in India. Coming into the Indian web market are a slew of AOL web services spearheaded by AOL's video search portal Truveo. Truveo is launching its international editions in eight major countries today as well.
read full story-
http://www.searchenginejournal.com/aol-launches-indian-language-portal/5928/

At a press conference that AOL (NYSE: TWX ) held on the sidelines of the Fortune Global Forum, the company announced the launch of local language portals in Hindi and Tamil, and the launch of video search Truveo; Jeff Bewkes, Time Warner President and COO reiterated the importance of India for Time Warner, saying that AOL plays an important part in teaching the company what is possible in India.
read full story-
http://www.contentsutra.com/entry/419-aol-launches-hindi-tamil-portals-truveo-video-search/

AOL.in is launching content channels in the Hindi and Tamil languages, improving the breadth of AOL's offerings at a time when the online audience in India is skyrocketing. The number of Internet users in urban India has grown by 28% in the past year, and about 60% of all active online Indians (30 million) prefer to read in local Indian languages.* The Hindi and Tamil language portals will have language sections in News, Cinema and Astrology.

read full story-
http://eon.businesswire.com/releases/india/video/prweb565650.htm

7.11.07

अपना काम करते हुए लोकमंच से जुड़ें, उचित मानदेय भी पायें

वरिष्ठ ब्लॉगर और पत्रकार शशि सिंह और उनके साथियों द्वारा शुरू किया प्रकल्प www.lokmanch.com निरंतर सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। अब लोकमंच अपने विस्तार की योजना पर काम कर रहा है... इस योजना के तहत लोकमंच को हर जिले में लेखक, पत्रकारों और जागरूक ब्लॉगरों की आवश्यकता है। लोकमंच से जुड़ने को इच्छुक इस ई-मेल shashikumarsingh@gmail.com पर सीधे शशि सिंह से संपर्क कर सकते हैं। योजना के तहत योग्य प्रत्याशियों को उचित मानदेय देने की भी व्यवस्था है।

5.11.07

सड़क पर जंग--- बाइक सवार पैदल सेना, मिसाइल बनीं कारें, गदा उठाए ब्लूलाइन, मरने को तैयार भाईलोग.....जय हो

शाम को आफिस से घर जाते हुए आईटीओ ब्रिज ज्यों क्रास करता हूं, दाईं तरफ एनएच-24 पर चकमकाती कारों का जो रंग-बिरंगा रेला दिखता है, उसे देखकर पहले दिन तो मेरी आंखें उसी तरह फटी रह गईं जैसी किसी देहाती की, जो जीवन में पहली बार दिल्ली और मुंबई आया हो। बाप रे, इतनी कारें। सब तरह-तरह की लाइट फेंकती, आगे से, पीछे से, दाएं से, बाएं से। जितनी गाड़ियां जा रही हैं उतनी आ रही हैं। इन गाड़ियों की सम्मिलित रोशनी से माहौल दिवाली वाला दिखता है। भई, यहां तो रोज दिवाली है। सड़कों पर वैसे ही सोडियम लाइटें और न जाने कौन कौन सी लाइटें सरकार ने लगवा रखी हैं। उसके बाद इन कारों की रंग बिरंगी रोशनियों ने माहौल को और रंगीन कर दिया है। रात में इन चकमक चकमक को देखते हुए लग सकता है कि वाह, अपनी दिल्ली कितनी महान। अपना देश कितना धनवान। लेकिन इन कारों में बैठे प्राणियों और सड़क पर फंसे अन्य मानवों के दिलों से तो पूछिए, गांड़ का गुह निकल जाता है इनका काम में। दिल दिमाग दोनों बंद। बस, दो पैग मारा तब आदमियत आई और तीसरे पैर में नींद रूपी छोटी मौत ने आगोश में ले लिया। या इसके पहले कुछ घंटों तक धमाचौकड़ी। बस। बंदा त्रस्त और बंदा मस्त। इसी में जी रहे हैं दिल्लीवाले। दुनिया जाए भांड़ में। पाकिस्तान में इमरजेंसी हो तो हो। अपना का देश गांवों का हो तो हो। किसान मरें तो मरें। गरीबी-बेकारी बढ़े तो बढ़े। शहर में चकमक है। शहर में तो जगमग है। धन्य हैं। जय हो।

हां तो कह रहा था कि शाम को सड़क पर एक इंच की जगह खाली नहीं। गाड़ियां बिलकुल सेट हैं। कहीं कोई गैप नहीं रखा। स्पीड बिलकुल स्लो। सड़क की फटी पड़ी है, अबे सालों, थोड़े कम हो जाओ, इतने ढेर सारे एक साथ चढ़ोगे तो मेरी जान निकल जाएगी। पैदल सेना के बाइक वाले सवार थोड़े से गैप को पाते ही लप्प से उसमें घुस जाते हैं और किसी योद्धा की तरह हेलमेट पहने वे करामाती सैनिक से लपलपाते हुए आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। कारें भी हर जाति की दिखती हैं। छोटी कारें दलितों-पिछडों की तरह दिखती हैं, बड़ी कारें ठाकुरों-बाभनों-बनियों की तरह। एकदम से रेल दिया और ठेल दिया और पेल दिया और निकल गए आगे फुर्र सुर्र ठुर्र करते......मक्खन मलाई की तरह कारें। कितनी चिकनी बाडी। कारें सड़कों पर चलने वाली जंग में दरअसल किसी कमसिन की तरह नजर आते हैं, सबसे बचना भी है, सबसे आगे भी रहना है, बिलकुल नहीं ठुकना है, कोई छू दे तो उस पर तुरंत छेड़खानी का आरोप। कभी कभी ये कारें किसी मिसाइल की तरह लगती हैं। तरह तरह के योद्धाओं के बीच से स्यूं स्यूं करती आगे निकल जाते हैं, मंजिल पर भड़ाक से गिरने के लिए। अब लीजिए ब्लूलाइन को। साली को हनुमान जी का साक्षात रूप कहिए। मुंह फुलाए, गदा उठाए, चल पड़े हैं हनुमान। जो आगे आएगा, रेला जाएगा, पेला जाएगा, जान गंवा जाएगा। इनसे नर, नारी, वानर, पशु-पक्षी और नाना प्रकार के जीव-जंतु तुरंत भय खाते हैं। इनका नाम सुनते ही तमाम घरों में सिसकारी गूंजने लगती है। तमाम घरों में मातम का माहौल फिर लौट आता है। लेकिन ये ब्लूलाइन रूपी आधुनिक हनुमान के बिना जीवन चलता भी नहीं। अब तो मुझे लगना लगा है कि ब्लू लाइनें कम मारती हैं, लोग मरने खुद ब खुद चले आते हैं। दो बसें एक साथ आईँ, रुकी नहीं लेकिन लोग कुत्ते की तरह शक्ल लिए बस के सामने दौड़ पड़ते है। अरे भाई, उसे रोकने दो चढ़ जाना। लेकिन किसे फुर्सत है साहब। सब भगवान के यहां से लंबे चौड़े कामों के लिस्ट लेकर इस धरती पर अवतरित हुए हैं। वे काम होने से रह जाएंगे, इसलिए वे काम करते हुए ही शहीद होकर भगवान के पास जाना चाहते हैं ताकि बता सकें, हे भगवन, मैं तो आपके काम करते हुए ही मरा हूं इसलिए मुझे शहीद का दर्जा देते हुए अप्सराओं वाले स्वर्ग में भेज दो ताकि मृत्युलोक पर पनपी कामनाओं और लालसाओं और वासनाओं की प्रतिपूर्ति कर सकूं। अब उन सालों को क्या पता कि वे पीछे पैदा कर गए हैं कई बच्चे, छोड़ गए हैं सिंदूर पोछने के लिए किसी औरत को। नहीं...जान देंगे, ब्लू लाइन ले लो तो भला, न लो तो काम हो ही जाएगा।

शायद संवेदनाएं जब ढीठ हो जाती हैं तो उसमें कोमलता और नाजुकता का अंत हो जाता है। जीवन-मृत्यु और मानवता से परे होने के भाव उगने लगते हैं और आदमी जो सोचे है, उसे पूरा करने को किसी हद तक चला जाता है, ब्लू लाइन से कुचलकर मरने तक भी। सड़क पर किसी से गाड़ी टच होने पर उसे स्वर्ग भेजने तक भी।

हां, तो बात हो रही थी सड़क पर चलने वाली जंग की। अगर कहीं रेड लाइट दिखी तो सबसे पहले पैदल सेना वाले बाइक सवार एकदम से रेड लाइट के पास पहुंच जाते हैं, बिलकुल आगे, कारों रुपी मिसाइलों के आगे ताकि सिग्नल मिलते ही पहले हमला करने के लिए पैदल सेना दौड़े, फिर महारथी रूपी कारें और फिर राक्षस और वानर सेना मतलब ब्लूलाइन, मिनी बस, कैंटर, जीप, कैब आदि.....।
इस सब में जो सुकून देने वाला पल होता है वो बाइक पर बैठे प्रेमी प्रेमिकाओं को देखना। एक दूसरे पर गिरते पड़ते ये लोग तमाम दिलों को शांति प्रदान करते हुए खुद भी बेहद सुकून से घर रूपी मंजिल पर पहुंचने की ओर अग्रसर होते हैं ताकि वे बेहद रोमांचित और रोमांसित जीवन को खुल दिल दिमाग से जी सकें। जय हो।

अप्पू घर में प्रेम तमाशा...

बात चली है जोड़ों की तो या आया कि कल संडे को दिल्ली में अप्पू घर गया, सपरिवार। आईटीओ और बहादुरशाह जफर मार्ग के आसपास ही दो ढाई किमी में अप्पू घर, चिड़ियाघर, इंडिया गेट आदि है। जब यह मालूम हुआ तो लगा कि इन चीजों का दर्शन खुद भी करना चाहिए, परिवार को भी कराना चाहिए। ये चाहत पहले भी थी लेकिन रास्ता न मालूम होने से और भटकने के भय से मैं कभी जाने को लेकर उत्साहित नहीं रहता था। इसलिए आज तक दिल्ली की किसी भी खास चीज को न देख सका। लेकिन जब नए आफिस के लिए आने-जाने में रास्तों की शिनाख्त कर ली तो एकदम से लगा कि संडे की छुट्टी के दिन बच्चों को घुमा लाना चाहिए। और, मेरा अनुभव....माइंड ब्लोइँग। लगा, न आकर गलती की थी। बच्चों ने वाटर पार्क और एम्यूजमेंट पार्क का इतना मजा लिया, मैने झूलों पर इतना हल्ला किया और गवाह बनीं अपनी श्रीमती जी। रोपवे मतलब वो जो पहाड़ों पर बिजली के तार पर लटककर चलता है....पहली बार चढ़े, लगा लंदन टू शिमला या शिमला टू लंदन की यात्रा पर है। दुनिया बहुत छोटी हो गई थी, हम बहुत बड़े दिख रहे थे। कुछ कुछ जहाज से उड़ने का अनुभव हो रहा था। ऐसा ही लगता होगा न जहाज पर चढ़ने पर, लौंडे ने पूछा तो मैंने हां में गर्दन हिला दिया। अब देक्खो भइया जहजवा पर कब चढ़ते हैं।
दरअसल तमन्ना ये है कि जहाज पर चढ़कर बनारस बाबतपुर एयरपोर्ट पर उतरूं और आने की सूचना गांव भेज दूं ताकि गांववाले मय ट्रैक्टर के हवाई अड्डे के बाहर जमा रहें और मुझे देखते हुए नारेबाजी करने लगें, इसलिए कि उनके गांव का एक लड़का जहाज से आया है...जसवंत भइया की जय, जहाज मइया की जय......। जय हो।

तो मैं कह रहा था जोड़ों की बात। अप्पू घर में जो झूले हैं उसमें कुछ झूले इस तरह डिजाइन हैं कि उसमें दो दो लोगों की टीम अलग अलग डिब्बों में बैठेगी और झूले जब तेज चलेगी तो दूसरा व्यक्ति पहले के देह पर इतनी बुरी तरह गिरा रहेगा कि अगर दोनों आदमी हुए और अपिरिचित हुए तो भिड़ जाएंगे...अबे हट, अबे कैसे हटूं झूली ही इधर गिरा रहा है। अगर मियां बीवी हुए तो मस्त। अगर प्रेमी प्रेमिका हुए तो.... अहा.....फिर तो सब फिट। इन झूलों पर सबसे ज्यादा संख्या में यही जोड़े थे। सब जोड़ीदारिनें जोड़ीदारों के देह पर गिरी पड़ी थीं उह आह की आवाज निकालते। दरअसल झूलों की स्पीड इतनी ज्यादा है कि यहां बिना चिल्लाए रहा नहीं जाता। बच्चों की कम उम्र से इस झूले पर चढ़ना एलाउ नहीं था और वाइफ ने इतनी स्पीड को झेलने से मना कर दिया। तो मैं अकेले ही खुद को सिकंदर समझते हुए एक अकेले बैठे सज्जन के बगल में बैठ गया और जब झूले ने स्पीड में अपना रूप दिखाना शुरू किया तो मेरा पूरा शरीर उन सज्जन की दुबली पतली देह पर। मुझे लग रहा था कि उनका चिल्लाना झूले की स्पीड से नहीं बल्कि मेरे शरीर के वजन से उनके दबने के कारण हो रहे दर्द के कारण था।

दोस्तों को दिया दिल
यह सप्ताह दोस्तों को दिल देने के नाम पर रहा। पहले एक ऐसी स्थिति में आ गया था कि सबसे भरोसा उठता नजर आ रहा था लेकिन अब लगता है, न यार, दुनिया में अगर कोई साथी है तो अच्छा दोस्त ही है, बस उसे पहचानने की अक्ल आनी चाहिए क्योंकि फर्जी दोस्त दाएं बाएं ढेरों हैं। ये आपकी सुनेंगे और उसी बात को दूसरों को तेल मिर्च लगाकर सुनाएंगे। ऐसे दोस्तों, ऐसे दोगलों से सावधान। दोस्त जो असली होगा वो बार बार दोस्त होने की बात न कहेगा, वो बस, समय आने पर आपके लिए साबित हो जाएगा, कर दिखाएगा। पिछले दिनों भड़ास के बेगूसराय के पाठकों के फोन आए। फर्रुखाबाद से फोन आए। न जाने कितने फोन आए जो सिर्फ भड़ास की वजह से मुझे जानते थे। पता नहीं यह क्या है लेकिन मुझे अच्छा लगा, लोग सच कहने और खुलकर कहने वालों का साथ देते हैं। तो दोस्तों, दोस्तों को चुनिए गुनिए और उनके लिए दुवाएं करिए। मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा, दोस्तों के लिए।

जय हो
यशवंत

आजा घरे छोड़ के तू दिली......

दिली मतलब दिल्ली को समझने की सही शुरुआत अब हुई है। अब लगता है कि दिल्ली में नोकरी कर रहा हूं। एक तो ड्यूटी टाइम बिलकुल शुद्ध देसी है। मतलब ब्रह्म मुहूर्त में आंख खोल देना है, बिस्तर से उठ जाना है, नहा लेना है और आठ बजते-बजते गाड़ी को सड़क पर रेल देना है। मयूर विहार फेज थ्री से मयूर विहार फेज वन और टू होते हुए, अक्षरधाम मंदिर वाली सड़क से होते हुए फिर पुराने आईटीओ ब्रिज को पार करने के बाद आईटीओ और बहादुरशाह जफर मार्ग पर गाड़ी रुकती है। अभी ठीक से तो हिसाब नहीं किया है लेकिन लगता है कि कार रोजाना सुबह शाम आने-जाने को मिलाकर 50 किमी चल ही लेती होगी। आते वक्त जिस तरह से लोग अपनी कारों और बाइकों को लेकर दिल्ली की ओर भागते हैं वो वाकई मजेदार है। मैं तो नया नया मुल्ला हूं। रोज अगल बगल की कारों वाले भाइयों-बहनों की शक्लों को देखता हूं, पढ़ने की कोशिश करता हूं। अब एक दो हफ्ते बीत रहे हैं तो लगता है कि वही भाव मेरे चेहरे पर भी आने लगे हैं। किसी ने थोड़ी भी गलत तरीके गाड़ी ओवरटेक की, कोई साइकिल वाला एकदम से आगे आ गया, आगे वाली गाड़ी बार बार इशारा करने पर भी दाएं-बाएं होने के लिए जगह नहीं दे रही.......तो चेहरा फनफना जाता है, शक्ल कुत्ते की होने लगती है, मुंह से भौं भौं की आवाज आती हुई महसूस होती है। लेकिन मैंने महसूस किया कि दरअसल दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली कारों और बाइक वालों को तय कर लेना चाहिए कि ड्राइविंग और ट्रैफिक के दौरान हुए किसी गड़बड़ घोटाले पर आपस में कभी नहीं भिड़ेंगे। रोज देखता हूं कई कार वाले कुत्ते की तरह भौंकते हुए आपस में एक दूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं। तूने मेरी गड्डी पर क्यों ठोंक दी तो तूने बिना सिग्नल दिए गाड़ी क्यों रोक दी। हे भगवान...सालों के पास कोई काम नहीं है क्या....जो काम भी होगा उसमें एक चीज तो बिलकुल पक्की है कि उस काम से उस कंपनी का भले लाभ हो जाए और इन महाशय का भले कल्याण हो जाए लेकिन किसी आम आदमी का तो भला नहीं होने वाला क्योंकि ये कायदे से खुद आदमी नहीं बन पाए हैं तो आम आदमी को क्या समझेंगे......यही सब सोचते गुनते घर पहुंचा तो टीवी पर टीसीरीज वालों की साइट पर एक भोजपुरी गाना चल रहा था...आजा घरे छोड़ के तू दिली......। गाने की धुन और बोल और गायिकी लाजवाब......मन में हूक उठी...आ तो रहा ही था घर लेकिन जाने फिर कैसे हाथ-पांव मारकर दिल्ली में रह गया.....हांफने-भागने और रोज थोड़ा सा कम हो जाने......

31.10.07

आपके लिए भी लाया हूं आफर.....

कल्पना करिए, एक बार की मेहनत और उसके बाद घर बैठे एक लाख रुपये प्रति महीने की आमदनी। असंभव लग रहा है ना। लेकिन है मुमकिन। बस, बंदे को दिल मजबूत कर उतरना पड़ेगा मैदान में। दरअसल, जिस जगह मैं काम कर रहा हूं वहां कुछ प्रमुख शहरों जैसे मेरठ, कानपुर, देहरादून, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, चंडीगढ़, लुधियाना, जयपुर, भोपाल, इंदौर...आदि में कंपनी के लिए काम करने वाले कुछ ऐसे बंदे चाहिए जो फ्रेंचाइजी के रूप में काम कर सकें। वे अपनी बात अच्छे से रख सकें, सामने वाले को प्रभावित करने के साथ उसे अपना प्रोडक्ट खरीदने के लिए तैयार कर सकें। वे हाइटेक हों, लैपटाप से लैस हों तो ज्यादा अच्छा। ये उनके लिए भी है

सवाल है, प्रोडक्ट है क्या। दरअसल, मोबाइल की दुनिया अब सिर्फ बातचीत की दुनिया नहीं है। इससे जुड़े एक हजार बिजनेस इस समय बड़ी शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। इससे जुड़ी कंपनियां करोड़ों के फायदे में हैं। तो उन्हीं मोबाइल बिजनेस के इस दौर में कुछ नई तकनीक है जो बड़े बिजनेस हाउसेज और शहर के मशहूर लोग तुरंत परचेज कर रहे हैं। जो यह दौर है उसमें हर बड़ा आदमी खुद को ज्यादा आर्गेनाइज और प्लांड रखना चाहता है, उसके लिए वह हर नई तकनालजी को, जो उसके बिजनेस को फायदा पहुंचाए, तुरंत अपनाना चाहता है। यह प्रोडक्ट मोबाइल से जुड़ी ही तकनालजी है। इसे विस्तार से बाद में समझाऊंगा। लेकिन जरूरी सूचना यह है कि हम लोग अब इन शहरों में रहने वाले ऐसे उत्साही, हाईटेक और हाइसोसाइटी से संपर्क में रहने वाले उन बंदों को तलाशने जा रहे हैं जो हमारे लिए काम करें और उन्हें प्रति क्लाइंट 2000 रुपये तक मिलेंगे। मतलब, अगर एक बार एक क्लाइंट बना लिया तो वह क्लाइंट जब तक बना रहेगा, बंदे को 2000 रुपये मिलता रहेगा। इसका मतलब हुआ, एक बार मेहनत करके पचास क्लाइंट बना लिया तो दो लाख रुपये हर महीने मिलते रहेंगे, दुबारा बिना मेहनत किए। इसमें कोई छिपा एजेंडा नहीं है। कोई सेक्योरिटी मनी नहीं है। ट्रेनिंग व कम्युनिकेशन स्किल के गुण व गुर कंपनी की तरफ से मुहैया कराया जाएगा। यह जरूरी नहीं कि यह काम कोई नौजवान ही करे, शिक्षक, डाक्टर, वकील, छात्र...कोई भी जो चाहता हो अपनी किस्मत खुद बनाना, वो यह काम कर सकता है।

यह प्रस्ताव खासतौर पर मैं उन बंदों के लिए रख रहा हूं जो बेहद महत्वाकांक्षी हैं, अपने तरीके से अपनी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिन्हें 10-12 घंटे की मेहनत के बदले कुछ हजार रुपये महीने कमाने की जद्दोजहद की जगह अपना काम शुरू करने की तमन्ना हो, इस समय अपनी पूरी ऊर्जा और प्रतिभा के होते हुए भी दरकिनार किए जाने सा महसूस कर रहे हों......

कृपया ऐसे लोग जरूर संपर्क करें....मेल करें........मिलने आएं........

मेरी नई मेल आईडी व मोबाइल नंबर है...

yashwant.singh@livem.in
mobile... 09999330099
call time 1 pm to 8 pm)

कुछ लोगों को जरूर लग सकता है कि यशवंत ने पिछले दिनों मेगा वेबसाइट बनाने की बात कही थी, अपना बिजनेस शुरू करने की बात कही थी, अब जबकि कहीं फिर नौकरी कर ली, नए आफर के साथ हाजिर हो गया...तो मेरा यही कहना है कि सब कुछ एक ही दिशा में जा रहा है, बस रास्तें अलग-अलग दिख रहे हैं। बिना मजबूत अनुभव और आधार के कोई नया काम सफल नहीं हो सकता। इसलिए अनुभव की दुनिया से नया कुछ निकालने के लिए नया काम कर रहा हूं जिसमें सौ फीसदी सफलता की गारंटी है। यहां से जो अनुभव रूपी अमृत हासिल होगा, वो भविष्य में काफी काम आएगा। हां, इसके साथ अगर मुझसे जुड़े या मेरे चाहने वाले सैकड़ों साथियों का भी भला हो जाए तो कोई हर्ज नहीं।

फिलहाल इतना ही
यशवंत

30.10.07

लो, फिर नोकरी करने लगा......

एक महीने तक बेरोजगारी का दुख-सुख झेलने के बाद काम पे लग गया। एक मोबाइल कम्युनिकेशन कंपनी में मीडिया और बिजनेस हेड के बतौर। आईटीओ पर आफिस है। फिर चल पड़ी है गाड़ी। दोस्तों-मित्रों का साथ काम आया। भरोसा और तसल्ली देने के साथ हर तरह के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की उनकी इच्छा से मैं अभिभूत रहा। चलिए, लगा, दिल्ली में सिर्फ बेदिल वाले ही नहीं रहते। दिल वाले हैं तभी तो दिल्ली है। कहा था ना, रहिमन दुख हो भला जो थोड़े दिन होय.....वाकई इस बार के दुख (या सुख) ने मुझे फिर से मनुष्यों को समझने की दृष्ठि दी है। जो आपके ज्यादा अरीब-करीब दिखते हैं, मौका पड़ने पर वही सबसे पहले मूतते हुए भागते नजर आते हैं। काम आते हैं वो लोग जो आपको लगता नहीं कि आपके नजदीक हैं लेकिन वो दिल से आपके नजदीक होते हैं, आपकी हरकतों में भले न शामिल होते हों।
खैर, ये बेरोजगारी पुराण यहीं बंद। काफी यंग एंग्री मैन टाइप काम कर लिया जिंदगी में। काम कम, चूतियापा ज्यादा। दोस्त ज्यादा बने, जिंदगी ज्यादा जी, पद ज्यादा बढ़ाया, तनख्वाह भी बढ़ती रही, शहर बदलता रहा...हां, लेकिन बैंक बैंलेंस नहीं बना। सहजता के साथ जिंदगी का सुख लेता रहा। दुखों को चुनौती मानता रहा। मुश्किलों के वक्त अंदर से खुद को मजबूत करता रहा। इनसे फायदा मिला। खूब मिला। संघर्षों के रास्ते लगातार आगे बढ़ते रहने से अनुभवों की जो पूंजी जुटी है, वो अंदर से काफी मजबूती प्रदान करती रहती है। संभवतः जिंदगी को इतने बिंदास और इतने नजदीक जाकर देखने और जीने का मौका बहुत कम ही मिल पाता है। अब इन सबसे मन भर गया लगता है। पता नहीं क्यों, शांति और सुकून की दरकार ज्यादा महसूस हो रही है।
दोस्तों और मित्रों ने मुझे काफी समझाया बुझाया है। डा. मांधाता सिंह ने एक प्यारा सा पत्र भेजकर मुझे आगाह किया है कि यशवंत भाई, लाल रंग से रिश्ता तोड़ लो। मेरे खयाल से लाल रंग से उनका आशय दारू से ही है। मुझे अच्छा लगा कि कोई आदमी इतनी खरी खरी कहने की हिम्मत रखता है। मैं मांधाता जी को शुक्रिया देने के साथ भरोसा दिलाता हूं कि दरअसल मेरा भी मन लाल रंग से भर चुका है और उसको लेकर अब कोई उत्तेजना बची नहीं। लाल रंग ने जिंदगी और करियर में काफी कुछ दिया है तो काफी कुछ नाश भी कराया है। मैंने काफी हद तक इससे तौबा कर ली है। बाकी लंगोटबांध कसम तो नहीं खाया है क्योंकि मेरा अनुभव रहा है कि कसम खाओ तो साली टूटती जरूर है।

मैं उन सभी दोस्तों और मित्रों को दिल से साधुवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे साथ खड़े होकर मुश्किल वक्त में मेरा साथ दिया और हौसला बढ़ाया।

फिर मिलेंगे।
यशवंत सिंह

21.10.07

जाहिलों के नये गाँव (नगर) से

बड़ा आसान है आसानी से जीना
हमारे, आपकी खातिर
लेकिन जाने क्या है वो
जो कहती रहती है...
बेटा, तड़प ताकि तुझे
दर्द का एहसास हो

जाने क्यों बना हुवा हूँ बेचैन भारत
पर जाने कौन कहता है...
तेरे ही गाँव में पड़ोस में रहता हूँ
दक्षिण टोला में
देखता है न, मेरा घर
जाने कितने दिनों में, चढ़ती है
हांडी....

लेकिन ये क्या चूतियापा है
मैं तो छोड़ आया सब
बहुत पहले
जब गाँव में चली थी गोली
पानी को लेकर
और मेरी जान जाने को आई थी
तब बाबा ने सिखाया था
जाहिलों की है ये बस्ती
निकल जा तू यहाँ से
पढ़ लिखकर....

लेकिन बाबा,
मैं तो जाहिलों के गाँव से निकलकर
अब चला आया हूँ जाहिलों के नगर
जो अपनी सभ्यता में हगने मूतने को भी
मानते हैं किसी की जान से ऊपर
वो तो पानी की बात थी
यहाँ तो पानी वानी की कोई बात नहीं
सब बेपानी के जिंदा लाश टाइप लोग
कहते हैं मर जावो, पानी वालों
जन्मे ही थे इसीलिए....

पर आपने जब भेज ही दिया था
पानी की जंग से परेशान होकर
तो फिर लड़ लेते हैं एक और
हारी हुयी जंग
बर्मा के बुध्धिष्ठों की तरह
बेपानी वालों से

ताकि ठीक से आता रहे
आपके मेरे गाँव में पानी जहाँ से आप
दुखी होकर मरे थे
और मैं
डर के भागा था
जान बचाने
और जिंदगी बनाने

लेकिन फिर पहुंच गया हूँ जाहिलों के बीच
जंग लड़ने
लेकिन......
जाने अब कौन बचायेगा, भगायेगा.....
जाहिलों के नये गाँव (नगर) से
--यशवंत

20.10.07

अल्लाह जानता है...

बेरोजगारी के दिनों को कैसे काटा जाए? कानपुर में बेरोजगार हुवा था तो घर में खूब खाना पकाना किया करता था. बच्चा लोग के साथ फ़िल्म देखने में जुटा रहता था. आजकल भी यही कर रहा हूँ. पिछले दो-तीन दिनों में तीन फिल्में देखीं. लज्जा, वेद और कम्पनी. ये सारी पुरानी फिल्में हैं जिन्हें मैंने देखी नहीं थी. तीनों को ही ढेर सारी सराहना दी मैंने. क्या फिल्में हैं. लगता रहा जैसे कोई उपन्यास पढ़ रहा हूँ. महिलावों पे लज्जा, गुजरात दंगों पे वेद और अंडरवर्ल्ड पे कम्पनी. इनसे इतना कुछ जानने सिखने को मिला की क्या बताऊँ. बीबी बच्चों के साथ किसिम किसिम के खाना खाने और बनाने का स्वाद बहुत दिनों बाद मिला.

सोचता हूँ कि आख़िर बेरोजगारी के दिनों में ही इतने चैन से क्यों जी पाता हूँ. नौकरी करते हुवे इस तरह जीता हूँ जैसे सब कुछ भागा जा रहा हो और मैं पीछे छूटने वाला हूँ. दारु को भी आजकल मुंह नहीं लगा रहा. ये घटना पिछले तीन दिनों की है. घर और बाहर कितनी शान्ति महसूस हो रही है. बिल्कुल सहज जीवन.

इन दिनों में मुझे आदमी को फिर से पहचानने की कोशिश करनी पड़ रही है. कितने स्वार्थी हो गए हैं रिश्ते. खाने-पीने तक तो साथ-साथ होते हैं लेकिन उसके बाद अगर कभी कोई दोस्त संकट में पड़ता है तो पीछे झांक कर नहीं देखते. मुझे लगने लगा है कि हम गावं वाले लोग दिल्ली में फिट नहीं हैं. या तो दिल्ली के हिसाब से स्वार्थी और कपट भरा जीवन जीना होगा या फिर दिल्ली छोड़ना होगा. खैर, मैं अभी दिल्ली नहीं छोड़ रहा और कपट भरा जीवन भी नही जीने जा रहा. लेकिन रहिमन दुःख हो भला जो थोड़े दिन होए. वाकई, मैं अभी नादान टाईप आदमी हूँ. थोडी दुनियादारी सीखने में लगा हूँ.

जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं सोचा. भला ही करता रहा. शायद इसी का नतीजा है की मैं अपने जीवन में कभी हारा नहीं, आगे ही बढ़ता रहा. जीतता रहा. हमेशा ऐसे लोगों ने बांह थाम कर पार लगाया जिनसे कभी कोई उम्मीद नहीं रखी थी. जिनसे उम्मीद रखी थी वे सब एन मौके पे स्वार्थी निकले. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है.

जल्द ही एक बार फिर नयी नौकरी की शुरुवात करने वाला हूँ. नई जगह, नया काम और नए तेवर के साथ. इसके साथ ही जीने के नए ढंग को आत्मसात कर रहा हूँ. क्योंकि अब तो हर शख्स कहने लगा है.....भाई सुधर जावो. मुझे समझ में आ रहा है, कितना और कहाँ बिगड़ा हुवा हूँ. ठीक है दोस्तों, अब मैं वाकई सुधर के दिखाता हूँ.

मेरे एक मित्र का फोन आया, यशवंत जी, आपके लिखे में एग्रेसन नहीं दिख रहा है अब? सवाल लाजिमी है, लेकिन भई, एग्रेसन का ठेका यशवंत जी ने ही तो नहीं ले रखा है. कुछ तुम भी तो कह के, कर के दिखावो.

मैं शायद कुछ ज्यादा ही भावुक किस्म का इंसान हूँ जो लोगों पे तुरत फुरत विश्वास कर लेता है, सबका भला चाहता है, जो बुरा है उसको तुरंत बोल देता है लेकिन दुनिया तो ऐसी नहीं है. लोग अपनी कुछ हजार कि नौकरियों के लिए किस तरह रीढ़ को घुमा घुमा कर नाचते हैं, वो मैंने देखा है. शायद वो सब कभी मंज़ूर नहीं किया इसलिए लोगों की आंखों में खटकता हूँ. पर मेरा विश्वास है कि दुनिया सरल और सहज लोगों की है और इमानदार लोग इतने ज्यादा हैं कि ख़राब माहौल से परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. खैर, मैंने अपनी भड़ास निकाल ली. काफ़ी हल्का महसूस कर रहा हूँ. आप सभी प्यारे साथियों और भाईयों का शुक्रिया जो अब भी मेरे साथ खड़े हैं.

अंत में एक ग़ज़ल की कुछ लाईनों के साथ अपनी बात ख़त्म करता हूँ....

किस्मत का नाम तो सब जानते हैं लेकिन
किस्मत में क्या लिखा है, अल्लाह जानता है.
बन्दे के दिल में क्या है, अल्लाह जानता है...
ये सुबहो शाम देखो ये धूप छाँव देखो
ये कैसे हो रहा है, अल्लाह जानता है....

एक और....
मैं सच के साथ शाम तक खड़ा रह गया
झूठ एक एक कर बिक गया बाज़ार से.....

यशवंत

19.10.07

रहिमन चुप हो बैठिये.....

किसी को मारना आसान होता है लेकिन मारकर जिंदा करना बहुत मुश्किल. भड़ास को मूल रूप में जिंदा तो नही किया जा सकता लेकिन पुराने भड़ास की चुनिंदा पोस्टों को डाला जा सकता है. आज मैंने यही महान काम किया.

भड़ास पे कई चुनिंदा पुरानी पोस्टें फिर से डाल दी हैं. हालांकि भड़ास के कम्युनिटी ब्लॉग के रूप में फिर शुरू होने के आसार नही हैं. उस मकसद के लिए एक अलग से हिन्दी डॉट कॉम को लाने पे काम चल रहा है लेकिन भड़ास को एक ब्लॉग के रूप में ज़रुर चलाया जाता रहेगा.

आजकल जीवन के कुछ मुश्किल दौर से गुजर रहा हूँ. इसमे कई ऐसी चीजे हुयी हैं जो काफ़ी सबक देने वाली हैं और आँख खोलने वाली भी. उम्मीद है, जब अपनी आत्मकथा लिखूंगा तब काफ़ी तफसील से इस बारे मे ज़िक्र करूँगा. फिलहाल, अपनी जिंदगी की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने में जुटा हूँ. भड़ास को भी जिंदा कर हत्या के पाप का प्रायश्चित करने में लगा हूँ. आप सब का प्यार बना रहेगा, ये उम्मीद करता हूँ.

हमेशा की तरह इस बार भी कई साथी मुश्किल वक्त में हाल पूछना गवारा नहीं कर रहे लेकिन गर्व इस बात का है कि ढेरों ऐसे साथी मेरे साथ है जो हर तरह से मदद करने के लिए तत्पर हैं.... तन, मन, धन......सबसे, आप सभी का शुक्रिया.

और अंत में....

रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर
जब नीके दिन आयेंगे, बनत न लागे देर


यशवंत
yashwantdelhi@gmail.com
9999330099

यूपी में कभी जरूरत ही नहीं पड़ी डीएल-ऊएल दिखाने की...

आजकल मुसीबत है। मजा भी इसी में है। मुसीबत चुनौती देती है। और चुनौती स्वीकारने पर देनी होती है आत्मविश्वास की परीक्षा। आत्मविश्वास तगड़ा रहे तो मुसीबतें को मार-मार कर पलीता लगाया जा सकता है। अब जैसे एक दिन हुआ क्या कि रात में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ज्यों मुड़ा वापस आने के लिए, भाई लोगों ने पकड़ लिया। दिल्ली पुलिस की टीम जुटी थी चेकिंग में। सामने नंबर प्लेट न देखकर एक हरियाणवी जवान ने गाड़ी रुकने का इशारा किया। पूछा- नंबर प्लेट कहां है? मैंने कहा- पीछे लगी है। उसने बोला- गाड़ी किनारे करो, आगे भी लगवाता हूं। मुझे लग गया, साले छोड़ेंगे नहीं। खैर, रजिस्ट्रेशन के कागजात तो दिखा दिए पर डीएल खोजे नहीं मिला। यूपी में कभी जरूरत ही नहीं पड़ी डीएल-ऊएल दिखाने की। अगले दिन हालांकि डीएल गाड़ी में ही पड़ा मिल गया लेकिन चार पैग लगाने की वजह से उस समय मैं खोज नहीं पाया। अंत में सबने मिलकर तय किया कि इस गाड़ी वाले ने पांच तरह के नियमों का उल्लंघन किया है। मैंने भले बच्चे की तरह पूछ लिया- अंकल, कौन-कौन से नियम तोड़े हैं मैंने। उन्होंने कहा- पहला- डीएल नहीं, दूसरा- आगे नंबर प्लेट नहीं, तीसरा- मोबाइल पर बात कर रहे थे गाड़ी चलाते हुए, चौथा - म्यूजिक चलाए हो, पांचवां- ड्रिंक किए हो। मैंने सारे अपराध स्वीकार कर लिए क्योंकि ये सभी सच थे। मुझे लगा अब बचना मुश्किल है। उधर से आवाज आई, १० हजार रुपेय जुर्माना और एक साल जेल की सजा का प्रावधान बनता है। सुनते ही नशा हिरन हो गया। स्वामी विकास मिश्रा के वचन याद आए, जहां कोई तरकीब काम न करो वहां शब्दाडंबर पर खेल जाओ। मैंने दरोगा की नेम प्लेग देखी। सरदार जी थे, नाम के आखिर में गिल लिखा था। उम्रदराज थे। मैं बोल पड़ा- गिल साहब, देश में दो ही गिल हुए, एक केपीएस गिल और दूसरे आप। केपीएस गिल साहब ने कर्तव्य निष्ठा, बहादुरी और विजन का जो उदाहरण पेश किया वो एक मिसाल है और देश उन्हें गर्व से याद रखता है। उन्होंने कही किसी दबाव के आगे न झुकते हुए सदा सच्चाई और कर्तव्य के रास्ते पर आगे बढ़े। दूसरे आप हैं- जो बिना किसी दबाव के अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे जज्बे को मैं सलाम करता हूं। मुझे खुशी होगी इस सजा को भुगतने में क्योंकि मैं वाकई अपराधी हूं, यातायात कानून तोड़ने के घोर पाप का भागीदार हूं, मुझे जेल भिजवा दीजिए. लेकिन अंकल एक बात सोच लीजिए....मैं अभी नया आया हूं, बास ने बांस किया तो उन्हें छोड़ने स्टेशन पहुंचा था, पहली बार दिल्ली में घुसा था मुझे खुद पता था नियम तोड़ रहा हूं लेकिन मजबूरी थी। और पहली बार किए गए अपराध को अपराध नहीं माना जाता, सुधरने का मौका देकर छोड़ दिया जाता है। रही ड्रिंक करने की बात तो अंकल गांधी के बेटे ने बाप के सिद्धांत को नहीं माना और जमकर दारू पी। आपके बेटे की तरह हूं, आपका बेटा भी पीकर आता होगा, उसे पीने की जुर्म में जुर्माने का शिकार नहीं होना पड़ता होगा, तो फिर मैं भी पुत्र की ही तरह हूं। बाकी आपकी मरजी, जो हुक्म देंगे वह शिरोधार्य होगा।
वो अनुभवी सरदार इस दौरान लगातार लिखता-पढ़ता रहा। मुझसे आंखें नहीं मिलाईं। उसने धीरे से कहा- यहां साइन कर दो। मेरी तो पूरी तरह फट गई। गए बेटा पानी में। झेलो जेल। हो गई पत्रकारिता। अब पीसो जेल की चक्की। बीवी बेटे कल सुबह सुबकते हुए जेल गेट पर मिलने आएंगे। तभी सरदार जी की आवाज आई..बेटा, छह सौ रुपये का जुर्माना करके छोड़ रहा हूं। अगली बार से ध्यान रखना। मैंने तुरंत छह सौ दिए और जुर्माने की रसीद लेकर चला आया। गिल साहब का नंबर ले लिया ताकि इस एहसान के बदले उन्हें धन्यवाद दे सकूं।
अगले दिन ये किस्सा कइयों को बताया तो लोगों ने कहा बेटा सस्ते में छूट गए। सिर्फ मोबाइल पर बतियाते पकड़े जाने पर १५०० रुपये का जुर्माना देना पड़ जाता है।
तो भाइयों, दिल्ली में कभी दारू पीकर और बिना कागज पत्तर के गाड़ी न चलाना वरना मारे जाओगे। मैंने तो भुगत लिया। अब दिल्ली वाली गलियों में नहीं टहलना।
जय भड़ास
यशवंत

अनकही बात को समझोगे तो याद आउंगा...

कुछ यादों में कुछ ख्वाबों में
कुछ गुज़री उम्र अज़ाबों में
कुछ सहराओं में वक्त कटा
कुछ बीता वक्त गुलाबों में
कुछ आस रही कुछ प्यास रही
कुछ बहती आंख शराबों में
कुछ आये पल बेकारी के
कुछ पाये दर्द किताबों में
कुछ इश्क अना में डूब गया
कुछ किस्मत के जवाबों में
कुछ दिल भी थक कर बैठ गया
कुछ हम भी रहे हिसाबों में
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काग़ज़ कागज़ हर्फ सजाया करता है
तन्हाई में शहर बसाया करता है
कैसा पागल शख्स है सारी सारी रात
दीवारों को दर्द सुनाया करता है
रो देता है आप ही अपनी बातों पर
और खुद को आप हंसाया करता है
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तुम मेरी आंख के तेवर ना भुला पाओगे
अनकही बात को समझोगे तो याद आउंगा
हमने खुशियों की तरह देखे हैं गम बिकते हुए
सफहा-ए-ज़ीस्त को पलटोगे तो याद आउंगा
इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे
किसी मजबूर को देखोगे तो याद आउंगा
हादसे आयेंगे जीवन में तो तुम होंगे निढाल
किसी दीवार को थामोगे तो याद आउंगा
इसमे शामिल है मेरे बख्त की तारीकी भी
तुम सियाह रंग जो पहनोगे तो याद आउंगा
..........................................
रियाज़

ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी.........

((छात्र राजनीति के दिनों में जब सांस्कृतिक मोर्चे से जुड़ा था, गोरख पांडेय को खूब गाता था। दस्ता की टीम के साथियों के साथ कुछ वक्त गुजारने को मिला तो उनसे गोरख पांडेय, धूमिल, पाश जैसे कवियों और उनकी जिंदगी के बारे में जानने को मिला। इनकी रचनाओं को नाटकों, गीतों और पोस्टरों को हिस्सा बनाया गया। गोरख की ज्यादातर रचनाओं को हम लोग गाते थे, ढपली के साथ, गांव-गांव में जाकर। कविता पोस्टरों पर लिखकर कैंपस के बाहर-भीतर चिपकाते थे। जब नेट पर गोरख की रचनाओं को देखा तो उनकी एक भोजपुरी रचना को आप लोगों के सामने लेने के लिए बेचैन हो उठा। पढ़िए और बूझिए...जय भड़ास, यशवंत सिंह)
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कविता संग्रह का मुखपृष्ठ: स्वर्ग से बिदाई
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सूतन रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया,
फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा
उजर घर आँगन हो सखिया,
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया,
गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं
भगवलीं महाजन हो सखिया,
केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
ढहल इनरासन हो सखिया,
बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया ।
-गोरख पांडेय
(रचनाकाल : 1979)
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कोई ग़म ना करो...

दर्द कैसा भी हो, आंख नम ना करो
रात काली सही, कोई ग़म ना करो
इक सितारा बनो, जगमगाते रहो
ज़िंदगी में सदा मुस्कुराते रहो
बांटनी है अगर, बांट लो हर खुशी
ग़म ना ज़ाहिर करो तुम किसी पर कभी
दिल की गहराई में, ग़म छुपाते रहो
दुख का सागर भी हो, मुस्कुराते रहो
अश्क अनमोल हैं, खो ना देना कहीं
इनकी हर बूंद है, मोतियों से हसीं
इनको हर ‘रियाज़’ से तुम चुराते रहो
ज़िंदगी में सदा मुस्कुराते रहो
-रियाज़
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सदा देती है खुशबू, चांद तारे बोल पडते हैं।
नज़र जैसी, नज़र हो तो नज़ारे बोल पड़ते हैं॥
तुम्हारी ही निगाहों ने कहा है हमसे ये अक्सर।
तुम्हारे जिस्म पर तो रंग सारे बोल पड़ते हैं॥
महक जाते हैं गुल जैसे सबा़ के चूम लेने से।
अगर लहरें मुखातिब हों, किनारे बोल पड़ते हैं॥
ज़ुबां से बात करने में जहां रुसवाई होती है।
वहां खामोश आंखों के इशारे बोल पड़ते हैं॥
छुपाना चाहते हैं उनसे दिल का हाल हम लेकिन।
हमारे आंसुओं में ग़म हमारे बोल पड़ते हैं॥
तेरी पाबन्दियों से रुक नही सकती ये फ़रियादें।
अगर हम चुप रहें तो ज़ख्म सारे बोल पड़ते हैं॥
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आज मौसम बड़ा बेईमान है
बड़ा बेईमान है आज मौसम
आने वाला कोई तूफान है,
कोई तूफान है, आज मौसम...

क्‍या हुआ है, हुआ कुछ नहीं है
बात क्‍या है, कुछ पता नहीं है
मुझसे कोई खता हो गयी हो तो
इसमें मेरी खता कुछ नहीं है
खूबसूरत है तू, रूत जवान है

काली काली घटा डर रही है
ठंडी आहें हवा भर रही है
सब को क्‍या क्‍या गुमा हो रहे हैं
हर कली हम पे शक कर रही है
फूलों का दिल भी कुछ बदगुमान है

ऐ मेरे यार, ऐ हुस्‍नवाले
दिल किया मैने तेरे हवाले
तेरी मर्जी पे अब बात ठहरी
जीने दे चाहे तू मार डाले
तेरे हाथों में अब मेरी जान है
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वो अपने चेहरे में ....

वो अपने चेहरे में सौ अफ़ताब रखते हैं
इस लिये तो वो रुख़ पे नक़ाब रखते हैं

वो पास बैठे तो आती है दिलरुबा ख़ुश्बू
वो अपने होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं

हर एक वर्क़ में तुम ही तुम हो जान-ए-महबूबी
हम अपने दिल की कुछ ऐसी किताब रखते हैं

जहान-ए-इश्क़ में सोहनी कहीं दिखाई दे
हम अपनी आँख में कितने चेनाब रखते हैं
--हसरत जयपुरी
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ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी

ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी
फ़िज़ा महकी महकी हवा महकी महकी

वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा
हथेली पे उसके हिना महकी महकी

ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी
वो क़ातिल अदा वो सबा महकी महकी

सवेरे सवेरे मेरे घर पे आई
ऐ "हसरत" वो बाद-ए-सबा महकी महकी
--हसरत जयपुरी
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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं...
(आज दिल्ली में रिमझिम बारिश है, मौसम ठंडा-ठंडा है, ऐसे में कुछ मूड नहीं कर रहा है। लड़ाई-झगड़े की बातें बहुत हो लीं, अब थोड़ा रुमानी होने का मन कर रहा है, बचपन के और गांव के दिन याद आ रहे हैं, जब बरसाती पानी वाली गली में इतनी स्पीड से पैरों से पानी उड़ाते थे कि अगल-बगल वाले गंदे हो जाते थे और वे हमें मारने को दौड़ाते थे फिर हम लोग उसी तूफान गति से भागते थे....उन्हीं दिनों की याद कर गोपालदास नीरज की एक कविता पेश कर रहा हूं....वीर रस में...यशवंत)


मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

---गोपाल दास नीरज

सुबह का घर लौटा शाम को भूल जाता है.......

रोज सुबह सोचता हूं, साली दारू छोड़ देनी चाहिए, यह चूतियापा कब तक चलता रहेगा। कुछ लिखने-पढ़ने का काम भी करना है, जीवन क्या नौकरी और पीना-पिलाना और मौज करना ही है....??? लेकिन सुबह का घर लौटा शाम को फिर सब भूल जाता है। जाने क्या है यह बला, मुंह को लगी तो छूटती ही नहीं। ढेरों मित्रों, संपादकों, पत्रकारों, परिजनों ने सलाह दी, बेटा दारू कम कर दो, बाकी तो तुम बड़े काम के आदमी हो। मैं कहता हूं- भाई पीता कम हूं, पादता ज्यादा हूं। लेकिन लोगों को बात पचती ही नहीं। वैसे भी प्रिंट मीडिया के इस समय के एक सुपरहिट समूह संपादक ने एक बार एक मुलाकात में (जाहिर सी बात है, नौकरी के चक्कर में कभी गया था मिलने) मुझे साफ-साफ चेता दिया था, पीना बंद कर दो छह महीने तक तभी तुम काम के आदमी साबित होगे। ज्यादा पीने की वजह से देखो तुम्हारी आंखों के नीचे फूला हुआ सा है। ज्यादा पीने से तुम्हारी निर्णय लेने की प्रक्रिया अतार्किक हो गई लगती है.....मैं हक्का-बक्का उन्हें सुनता रहा। अब उन्हें कौन बताए आपने बिना पिए जितने अतार्किक कृत्य अतीत में या वर्तमान में किए हैं, उसकी भरपाई कैसे करोगे। इसी तरह, अब भी सत्ता से सजी महफिलों के कोने-अंतरे में कोई देख न ले के अंदाज जब चार पैग मारते हो तो वो क्या समुद्र मंथन का अमृत पीते हो....लेकिन उनसे कहे कौन? बड़े आदमी हैं, वरिष्ठों ने समझा रखा है- बेटा, मीडिया की छोटी दुनिया होती है, सबसे बना के रखा करो, जाने कब कौन कहां टकरा जाए...। शायद इसी से चुप रह गया और न पीने की कसम खाकर लौट गया। लेकिन मुझे बहुत ग्लानि हुई। आदमी जब उपर जाता है तो उसे कुछ भी बोलने का लाइसेंस मिल जाता है, शायद मै तो बहुत छोटा हूं लेकिन मैंने भी ऐसे बर्ताव किए होंगे कई लोगों से....। खैर, गलतियों का पश्चाताप कर स्वर्ग जाने का रास्ता बनाने की मेरी कोई मंशा नहीं है। हां, तो भई, उनसे तौ मैंने कह दिया कि- हां, छोड़ दूंगा। लेकिन दिक्कत है अकेले तो मैं पीता नहीं, हफ्तों-महीनों गुजर जाएं, यह काम तो नोएडा आते ही कर लिया था। लेकिन अगर दोस्त-यार मिलते हैं तो भी न पिएं। ना बाबा, हमसे ऐसा न होगा। वो स्वामी विकास जी कौन सा शेर सुनाते हैं....जीना हो यदि शर्तों पर तो जीना हमसे ना होगा, महफिल में हो वीरानी तो पीना हमसे ना होगा, माना वो हैं लाखों में और लाखों उनके आशिक हैं, पर हम उनको सर पर बिठा लें, ऐसा हमसे ना होगा, कहो तो खुश करने को कह दूं मेरी दुनिया तुम ही हो, किसी की खातिर दुनियां छोड़ें ऐसा हमसे ना होगा, आप हमें मगरूर समझ लें, आप की मर्जी है लेकिन, सबसे बढ़कर हाथ मिलाएं ऐसा हमसे ना होगा।....(अनुरोध पर स्वामी ने शेर पूरा कर दिया है)। तो मैं कह रहा था कि पत्रकारिता में ढेरों ऐसे हैं जो करते सब कुछ हैं लेकिन जबान से चूं नहीं कहते, कुछ अपन जैसे हैं, करते थोड़ा सा हैं तो गाते दुनिया भर में हैं। अब इसे बड़बोलापन मान लो या दुस्साहस, हम ऐसे ही हैं। किसी के कहने पर क्यों गाना गाएं कि ...मैं ऐसा क्यों हूं....मैं वैसा क्यूं हूं? भई, हम तो ऐसे ही हैं। हालांकि समय और हालात बड़े-बड़ों के गाने का राग बदलने को मजबूर कर देते हैं तो मैं क्या चीज हूं। लेकिन जब पड़ेगी तो देखी जाएगी...फिलवक्त तो जोर से कहो....जय भड़ास...एक और शेर....नासिर काज़मी साहब का लिखा हुआ....मुझे अच्छा लगा...
कितना काम करेंगे, अब आराम करेंगे, तेरे दिये हुए दुख, तेरे नाम करेंगे, अहल-ए-दर्द ही आख़िर, ख़ुशियाँ आम करेंगे, कौन बचा है जिसे वो, ज़ेर-ए-दाम करेंगे, नौकरी छोड़ के "नासिर", अपना काम करेंगे।

अभिषेक द ग्रेट उर्फ मेरठी आए थे दिल्ली...
मेरठ के अपने मित्र और सीनियर जर्नलिस्ट अभिषेक शर्मा नोएडा आए तो गरियाते-दहाड़ते मिलने आ पहुंचे। भाई ने कसम खा रखी है कि मेरठ में कभी नहीं पिऊंगा। इसके सीमा क्षेत्र से बाहर निकलते ही बिलकुल नहीं छोड़ूंगा। सो वह भूखा-प्यास भाई बोतल कांख में दबाए आ गया। स्वामी को भी दूरभाष यंत्र से खबर दी गई। कान में बात पड़ते ही स्वामी कनमनाए और दाब दी फ्रीडम। तयशुदा जगह पर मिले चार यार तो फिर जम गई महफिल। जाम पर जाम, मटन कोरमा (हालांकि स्वामी व अभिषेक जी शाकाहारी हैं लेकिन उनसे ज्यादा लोग मांसाहारी थे) पनीर टिक्का.....और फिर शुरू हुआ बातों का दौर...। बात खत्म न हो। रात बीत रही थी। स्वामी अड़ गए। न हिलेंगे न चुप होंगे। कई तरह की भावनाएं उमड़ीं। सब तृप्त हुए। लगा मेरठ के दिन फिर लौट आए हैं। कमी खल रही थी अपने रियाजुद्दीन की। भाई से नशे की अभिन्न अवस्था में ही हम सभी ने फोनुआ पर बात की। गान भी सुनाया, भाई से भी सुना....अंत में जय भड़ास कर मीटिंग बर्खास्त कर दी गई। इससे एक रोज पहले अपने सचिन बुंदेलखंडी उर्फ नई इबारतें लिखने वाले क्रांतिकारी अपने सत्या-राजपाल जैसे साथियों के साथ आए थे। उस रात भी नोएडा-दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी दौड़ती रही।

माचो की तो माचु गई....कंटेंट कोड भी डिकोड हो गया
दो अच्छी खबरें हैं। विशाल ने पहले ही बता दिया। माचो जैसे विज्ञापनों की मा...चु...गई। इसी तरह इलेक्ट्रानिक मीडिया पर लगाम कसने के लिए जो कंटेंट आफ कोड लाया जा रहा था, प्रसारकों ने उसे डिकोड कर दिया और उसे मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया। मतलब, अब यह कानून नहीं बन पाएगा। लेकिन इन दोनों खबरों के पीछे की खबर पर आत्ममंथन तो हम लोगों को ही करना होगा। माचो जितने दिन धड़ल्ले से चल चुका है और उसे सब दर्जनों बार देख चुके हैं, ऐसे में उसे बैन करने से क्या लाभ? कायदे से तो कोई विज्ञापन प्रसारित किए जाने से पहले सेंसर बोर्ड जैसे किसी बोर्ड के पास जाए ताकि उनसे होने वाले नुकसान का पहले से ही आकलन किया जा सके। जैसे फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है उसी तरह टीवी व प्रिंट विज्ञापनों के लिए भी एक संवेदनशील सेंसर बोर्ड टाइप बोर्ड होना चाहिए जो खामखा अड़ंगेबाजी करने के बजाय गंभीरता से देखे और तुरत-फुरत निर्णय दे।
इसी तरह कंटेंट आफ कोड को लेकर टीवी प्रसारकों ने भले ही मना कर दिया हो लेकिन उन्हें अपने गिरेबान में झाकना तो पड़ेगा ही कि आखिर उन्होंने क्यों अपनी विश्वसनीयता इतनी गिरा दी है कि अब सरकार उन्हें दबोचने की फिराक में ऐसे-तैसे कानून लाने की कोशिश कर रही है। न्यूज को हंसी के फव्वारे बना देने वाले या मनोहर कहानियां का रूप देने वाले टीवी चैनलों से पूछा जाना चाहिए (और यह काम दर्शकों को ही करना चाहिए) कि भाई, समाचार दिखाने के नाम पर लाइसेंस लिया है, दिखा रहे हो अंड-बंड-संड। यह कब तक चलेगा। दुनिया को कब तक मूर्ख बनाओगे। टीआरपी के चक्कर में कब तक मराओगे। नंबर वन कहे जाने वाले चैनल की हालत आजकल पतली है। फिर भी आज जो प्रोग्राम प्राइम टाइम पर चला वह १४ साल की लड़की का था जो छोटे बच्चे जितनी लंबाई की थी। पूरी शाम और रात यही खबर दिखाई जाती रही, उसकी पसंद के गाने गायकों से गवाए जाते रहे। चलिए यह ठीक है, हलका-फुलका भी बीच-बीच में चाहिए। लेकिन भाई खबर तो सिरे से गायब कर दी है। क्या देश-विदेश में कहीं कुछ नहीं मिल रहा है? खोजेंगे तो मिलेगा ही लेकिन उसके लिए चैनलों के कर्ताधर्ताओं और न्यूज डायरेक्टरों में इच्छा शक्ति होनी चाहिए। तेजी से आगे बढ़ रहे एक संसाधनविहीन चैनल को देखो तो भाई वो सांप-भूत-सेक्स-मानो या न मानो....जाने क्या क्या दिखाकर दुकान आगे बढ़ा रहा है। एक चीज लगने लगी है, हमाम में सब नंगे हो गए हैं। अब जल्द ही वो दौर आएगा जब सारे चैनल सब कुछ छोड़कर फिर न्यूज की तरह भागेंगे। लेकिन वह दौर आने के लिए चैनलों के वर्तमान मठाधीशों को जाना पड़ेगा। क्योंकि न्यूज के बेसिक सिद्धांत को सीखकर पत्रकारिता में आने वाले इन बंधुओं ने अपने को इस कदर रीढ़विहीन बना लिया है कि इनकी समझदानी ही बेकार हो चुकी है। टीआरपी मैया के आगे माथ झुकाते-झुकाते दिमाग की हर खिड़की बंद कर दी है। अब जो कुछ छिछला, सतही, छिछोरा, गप्प, मिथ, अश्लील ...माल मिलता है, धड़ल्ले से चला देते हैं। खैर, मेरी बात का बुरा न मानना। मन की भड़ास थी, निकाल लिया। ये भी कह सकते हैं कि चैनल में नहीं हैं तो खट्टे हैं अंगूर की तरह गरिया रहे हैं। जो भी मान लो भई, लेकिन भड़ास है तो निकलेगी...।

जय भड़ास...
यशवंत सिंह

वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम....

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये
वाह री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम

होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी
इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम

बेनियाज़ी को तेरी पाया सरासर सोज़-ओ-दर्द
तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम

भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती
उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम

हुस्न को इक हुस्न की समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़'
मेहरबाँ नामेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम
-फ़िराक़ गोरखपुरी
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जीना हो यदि शर्तों पर तो जीना हमसे ना होगा।
महफिल में हो वीरानी तो पीना हमसे ना होगा।
माना वो हैं लाखों में और लाखों उनके आशिक हैं,
पर हम उनको सर पर बिठा लें, ऐसा हमसे ना होगा।
कहो तो खुश करने को कह दूं मेरी दुनिया तुम ही हो।
किसी की खातिर दुनियां छोड़ें ऐसा हमसे ना होगा।
आप हमें मगरूर समझ लें, आप की मर्जी है लेकिन,
सबसे बढ़कर हाथ मिलाएं ऐसा हमसे ना होगा।
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पहली बार चखी तो बुरी लगी

का कह रह हो गुरु। हम भी दारूबाजी के किस्से बताएं. अब इसे आज्ञा मानें या विनती? विनती तो आजकल प्रेमिकाओं की भी नहीं सुन रहे इसलिए क्यों लिखें आपकी मानकर. लेकिन डर लग रहा है कहीं यह आज्ञा होगी तो दिल्ली विजिट पर एक अड्डा कम हो जाएगा. सत्या नौकरी छोडे बैठा है. और साले जेएनयू वाले बडे काईयां होते जा रहे हैं यानी सूखले सूखले रहने का खतरा है. गुरु आज्ञा मानकर लिख ही देता हूं.
तो अपने साथ तो ऐसा हुआ कि दुष्यंत कुमार बोले पहली बार चखी तो हमें भी बुरी लगी, कडवी तुम्हे लगेगी मगर जरा सी तो लीजिए। का करते बडे कवि का बडबोला आदेश. मामा के सानिध्य में रहते थे. देखते महसूसते थे कि मामा एक लाल पेय ठंडे पानी के साथ गटकते हैं, छककर खाते हैं और लंबी तान कर सो जाते हैं (कुंवारे थे उन दिनों). कभी कभी महकते हुए रात 11 बजे कुंडी खटखटाते तो हम दरवाजा खोलते मामू खुद सातवें आसमान में होते अंगूर की बेटी से सोहबत करने के बाद और हमें थमा देते वनीला का एक लार्ज पैक. दिन में हम घर में अकेले होते थे उन दिन लडके और लडकी में सही फर्क करने की तमीज नहीं थी नहीं तो यहां कोई और ही किस्सा सुना रहे होते. तो हुआ यूं कि कई दिनों फ्रिज में रखी उस बोतल को देखने के बाद एक दिन दोपहर में हम, बंटी, सुनील, श्याम, मोना, रूबी और शायद सपना या प्रतीक था, लूडो और आइस बाइस खेल कर जी बहला रहे थे. हम श्याम और बंटी को लाल पेय की जादूगरी बता चुके थे और साथ ही यह भी बता चुके थे कि अभी हम लोगों की पहुंच में है. श्याम स्वाद पहले ही चख चुका था सो उसने और गुणगान किये. गुरु बोतल से जिन्न को आजाद करने को हम तीनों उत्सुक थे, लेकिन अन्य चपडगंजुओं की मौजूदगी में यह संभव नहीं लगता था. सुनील को तो क्रिकेट टीम में जगह देने के नाम पर बहलाया जा सकता था, लेकिन असली खतरा रूबी से था, श्याम ने मोना की गारंटी ले ली कि वो किसी से नहीं कहेगी. पर हम खतरा नही लेना चाहते थे. सो श्याम को कहा कि उसे बाहर करे. श्याम बोला समझाकर आता हूं और वह मोना को लेकर दूसरे कमरे में चला गया तब तक हमने बाकी कमजोर कडियां ठीक कर लीं. तकरीबन एक घंटे बाद श्याम और मोना कमरे में आए तब श्याम बोला मामला ठीक हो गया है (अब समझ में आता है कि उसका मामला कैसे ठीक हुआ था).
फिर हमने वह जिन्न आजाद किया सबने थोडी शराब और ज्यादा पानी मिलाकर पैग तैयार किये और एक ही सांस में खींच गये। गले से पेट तक एक सन्नाटा खिंच गया. बाकी सब तो ठीक थे लेकिन बंटी को दर्द होने लगा और कहने लगा तुमने तेजाब पिला दिया है अब मैं मर जाउंगा. हम लोगों को भी लगा कि पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है. सब इसी पसोपेश में थे तब तक श्याम ने बोतल से जितनी शराब निकाली थी उतना पानी मिला दिया. सबको अपने अपने घर भेजकर मैंने बिस्तर पकड लिया. पहले सिर घूमा फिर नींद आई और जब जागा तो रात के आठ बज चुके थे. यह था मेरा पहला शराब से मिलाप.
आगे कैसे बना पेट ड्रम और अखिलेश ने मुझे कैसे बनाया दारूबाज यह फिर कभी।
जय भडास
सचिन
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बेटे का नाम स्कूल से कटवा दिया....

पांच साल का हो जाएगा, अगले महीने। 25 को उसकी बर्थडे है और 26 को मेरा जन्मदिन। ये बात अभी से तय कर रखी है मैंने और आयुष ने (वो क्या तय करेगा, मैं ही उसे सुनाता रहता हूं)कि जब आयुष बीयर-दारू पीने की वैधानिक उम्र हासिल कर लेगा तो मैं और वो 25 अगस्त की शाम को साथ बैठकर चीयर्स करेंगे और 26 की सुबह तक खाना-पीना-गाना करेंगे। मतलब बाप-बेटा दोनों अपने बर्थडे-जन्मदिन को एक रात में मना लेंगे। हालांकि जब वो पैदा होने को था तो मैंने बनारस में डाक्टर ऊषा गुप्ता से अनुरोध किया था कि जब सिजेरियन ही होना है तो प्लीज एक दिन और रुक जाओ, 26 को आपरेट करना, लड़का-लड़की जो भी होगा-होगी, बर्थडे तो एक साथ मनाएंगे और थोड़ा मामला रोचक भी रहेगा। लेकिन अपनी पत्नी को क्या कहूं, मारे दर्द के खामखा चिल्लाने लगीं और मुझे गरियाने लगीं...तोहार मुंह झऊंस जाए, तोहरे पेट पे होत तब ना..., चले आए भाषण देने....जइबा कि ना इहां से....। फिर डाक्टर की तरफ मुखातिब होकर उन्होंने कहा---डक्टराइन साहिब, प्लीज...आपरेशन अब कर दीजिए...। और मेरी रणनीति फेल रही। आयुष जी एक रोज पहले आ गए। जब पहले आ गए तो फिर नया प्लान बना दिया। 25-26 अगस्त की रात को पूरी रात हंगामा करने वाला। वैसे नहीं तो ऐसे, अपनी वाली कर ही ली। लो, बात कुछ और कहना चाह रहा था और कह कुछ और रहा हूं....।
हां, तो कह रहा था कि पिछले तीन महीने से आयुष जी स्कूल से जुड़े नहीं थे और जाने कहां-कहां की यात्रा की। ननिहाल और अपने गांव के अलावा तीन-चार और जगहों पर घूमने गए। खांटी देहात में रह के आए हैं। कानपुर से स्कूल छूटने के बाद से और मेरे नौकरी छोड़ने के बाद से सभी लोग गांव में ही रहे। जब नोएडा में नौकरी शुरू की तो सभी आए। इस महीने की शुरुआत में एडमीशन भी करा दिया। लेकिन आयुष नई ड्रेस और नई किताबों और नए स्कूल के लालच में कुछ दिन तो स्कूल गए लेकिन पांचवें दिन ही ऐलान कर दिया...नाम कटवा दो। नहीं पढ़ना मुझसे। गांव भेज दो, बाबा के साथ रहूंगा। या म्यूजिक में नाम लिखवा दो। या स्केटिंग करवाना सिखवा दो। लेकिन पढ़ना नहीं है मुझे। उनसे भांति-भांति तरीकों से पूछा गया...भइया, गलती क्या हो गई, कमी क्य रह गई?? जब पूछो तो वो एक नया बहाना मारते थे...स्कूल में मैडम अंग्रेजी बोलती है, नहीं पढ़ना। वहां लाइट जाने पर गरमी लगती है, नहीं पढ़ना। वहां बच्चे मुझसे दोस्ती नहीं कर रहे, नहीं पढ़ना। वहां मैडम गुस्से में रहती है, नहीं पढ़ना। वहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई होती रहती है, खेलने-कूदने के लिए टाइम नहीं दिया जाता, नहीं पढ़ना...। पहले तो मजाक माना। लेकिन सुबह स्कूल जाने के समय दंगा शुरू करता और जबरन भेजने के बाद स्कूल से लौटने पर जो हिचक-हिचक कर रोना शुरू करता तो हम लोगों का भी कलेजा पिघल गया। लगा, बच्चा स्कूल में कुछ संकठ में है। गए स्कूल और मैडम से मिले। मैडम काफी सुंदर थीं। नाक में नथुनी वगैरह पहने और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते वो मुझे तो अच्छी लगीं। हालांकि बच्चे की शिकायत भी यही थी कि अंग्रेजी ज्यादा बोलती हैं और वो गांव से भोजपुरी सीखकर और पहले पढ़ी गई अंग्रेजी भूलकर लौटा है। मैडम ने मुझे आश्वस्त किया, उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी जाएगी। अगले दिन फिर पंगा। उसके रोने पर स्कूल नहीं भेजा। लेकिन स्कूल की किसी तरह की चर्चा छिड़ते ही वह बुरी तरह रोने लगता। बाद में उसे बुखार भी हो गया। खाना-पीना छोड़ दिया। मुंह ऐसा हो गया जैसा कभी खाना न मिला हो। अंत में मैंने पत्नी को विश्वास में लेकर उसके सामने ऐलान कर दिया कि बेटा, फोन से बात कर ली है, तुम्हारा नाम कटवा दिया है। अब तुम घर पर मौज करो। उसके बाद से वो इतना खुश है कि क्या बताऊं। बिटिया सुबह स्कूल चली जाती है तो वो घर पर ही अपना बैग लेकर पढ़ने बैठ जाता है और थोड़ी बहुत देर मुझे बेवकूफ बनाने के बाद कार्टून चैनल खोल लेता है। लेकिन है बिलकुल मस्त। मैने उससे कहा-- बेटा नहीं पढ़ोगे तो तुम्हें गोबर फेंकना होगा, गरीब बच्चों की तरह कूड़ा बीनना होगा...जाने कितने तरीकों से उसे डराता हूं लेकिन वह सबका जवाब एक-एक कर देता रहता है। जैसे वह कहता है कि गोबर क्यों फेंकूंगा..गांव में नौकर होते हैं न, वो काम करते हैं, मैं तो ठाकुर हूं। बाबा ने सब बता दिया है। मुझे कहना पड़ा-- भाई साहब, मैं तो चमार हूं। लेकिन पढ़ना तो शुरू करो। फिर वो कहता है....गरीब बच्चों की तरह कूड़ा नहीं बीनूंगा..तुम मुझे एक सर जी को घर पर लगा लो, वो रोज पढ़ाने घर पर ही आएँगे। लेकिन मैं स्कूल नहीं जाऊंगा.....।।

फिलहाल चार दिन हो गए। वो स्कूल नहीं जा रहा। उसे पता है कि उसका नाम कटवा दिया है लेकिन दरअसल कटवाया नहीं है। 30 तारीख की सुबह उसे जबरन स्कूल भेजने की तैयारी है। देखता हूं, क्या होता है। लेकिन उसकी दशा देखकर मेरी तो इच्छा उसे पढ़ाने की नहीं हो रही। सोच रहा हूं, म्यूजिक वाली क्लास में ही एडमीशन करा दूं। लेकिन पत्नी हैं कि दुर्गा बनी हुई हैं। आफिस से घर लौटने पर बताती हैं कि इसने घर में कितने बवाल काटे और कितने सामान तोड़े-फोड़े।

और अंत में....
एक दिन वीकली आफ के दिन कार पर आयुष आगे बैठ मेरे साथ निकले। बिटिया और उनकी मम्मी को घुमा-खिला कर घर छोड़ने के बाद निकले थे। आयुष और मैं ऐसा मानते हैं कि जब औरतें घर चली आएं तो पुरुषों को एक बार फिर निकलना चाहिए बाहर। यह तर्क अपने स्वार्थ में इजाद किया था। उनके सामने तो पीने से रहा। बाद में अकेले निकलता हूं तो कहीं क्वाटर या बच्चा लेकर गाड़ी में बैठे-बैठे ही मार लेता हूं। तो उस दिन जब देर तक घूमते रहे तो आयुष ने मन की बात तड़ ली। बोला--बहुत देर से इधर-उधर गाड़ी घुमा रहे हो। चलो मुझे पेप्सी दिलवा दो और अपने लिए दारू ले लो। फिर घूमेंगे। मैं भौचक....उसने मेरे दिल की बात कैसे जान ली?? फिर मुझे लगा...भई, ये नई पीढ़ी तो बहुत चतुर-सुजान है। हम लोग खामखा अपने को तुर्रम खां समझते हैं। ये सब तो अपन के सिर के सारे बाल बीन ले जाएंगे.....।
फिलहाल मुझे टेंशन उसकी कल की क्लास को लेकर है...। भगवान मुझे ताकत दे और भड़ासी अपनी सलाह दें....।

जय भड़ास...
यशवंत

आखिर मैं किस दिन डूबूँगा, फिकरें करते हैं....

कल मोबाइल का इनबाक्स खाली कर रहा था। अमूमन मैं सभी नसीहत टाइप, या कोरी भावुकता वाले या फिर फालतू की शेरो शायरी के मैसेज पढते ही डिलिटिया देता हूं, बस अच्छे वाले कपडों के अंदर झांकते थोडे हिलोरें जगाते और फाडू टाइप के मैसेज ही रखता हूं. लेकिन साल की शुरुआत का एक मैसेज अभी तक मरा नहीं था ससुरा कोना पकडे मेरा मुंह चिढा रहा था. ओपन किया तो देखा मैसेज था--
तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो/
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो.


हम हैरत में कि ऐसी सलाह कौन दे रहा है और क्या खाकर दे रहा है. ये कानपुर वाले दिनों का मैसेज था. यानी सचिन भाई बुंदेलखंडी को कोई उंगल कर रहा था. दिमाग पर जोर डाले तो पता चला यह नंबर अपने यंशवंत गुरु इस्तेमाल करते थे कानपुर में. बात समझ गये. शेर तो उन्होंने छांटकर मारा था. हां याद आया कि उस समय हम भी जवाब भेजे थे कि--- हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही.
लेकिन भडासियों यंशवंत भाई वाला शेर था दमदार। सोचा यशवंत भाई ने लिख मारा क्या? फिर अपनी ही सोच पर हंसी आई कि भाई ऐसे कामों में दिमाग उन दिनों नहीं लगाते थे. तब तो बस आई नेक्स्ट आई नेक्स्ट ही भजते रहते थे. कमाल का डेडीकेशन था. खैर फिर सोचा कहीं रियाज भाई ने तो माल मुहैया नहीं कराया. उनका यह शगल है जब जिसे जरूरत हो रियाज भाई मौका देखकर चौका मारने वाला शेर पटक देते हैं. बिल्कुल चैलेंज के अंदाज में कि लो अब इससे बेहतर हो तो सुनाओ नहीं तो निकल लो.
काफी जद्दोजहद के बाद मुझे अगली लाइन याद आई ॥ तो मामला कुछ यूं बना कि --
तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो।
फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो।


लगे हाथ शायर का नाम भी याद आ गया। राहत इंदौरी। और जिज्ञासा बढी तो किताबें खंगाली.

इनमें राहत भाई अर्ज करते हैं---
आज हम दोनों को फुरसत है, चलो इश्क करें/ इश्क दोनों की जरूरत है, चलो इश्क करें
इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है/ ये मुनाफ़े की तिजारत है, चलो इश्क करें
आप हिन्दू, मैं मुसलमाँ, ये ईसाई, वो सिख/ यार छोड़ो ये सियासत है, चलो इश्क करें


और भी है जरा गौर फरमाइये. मुझे लगता है यह शायरी में एक अलग किस्म का प्रयोग है. हिंदी में यही भारतेंदू के बाद इधर विनोद कुमार शुक्ल ने किया हुआ है

उसकी कत्थई आँखों में है, जन्तर-मन्तर सब/ चाकू-वाकू, छुरियाँ-वुरियाँ, खंजर-वंजर सब
जिस दिन से तुम रूठी, मुझसे रूठे-रूठे हैं/ चादर-वादर, तकिया-वकिया, बिस्तर-विस्तर सब
मुझसे बिछड़ कर वो कहाँ पहले जैसी है /ढीले पड़ गए कपड़े-वपड़े, जेवर-वेवर सब
आखिर मैं किस दिन डूबूँगा, फिकरें करते हैं/ दरिया-वरिया, कश्ती-वश्ती, लंगर-वंगर सब


जय भडास
सचिन

कोई दोस्त है ना रक़ीब है.......

((जगजीत सिंह की गायी और राना सहरी की लिखी एक गजल और पेश कर रहा हूं))

कोई दोस्त है ना रक़ीब है,
तेरा शहर कितना अजीब है.

वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है.

यहां किसका चेहरा पढा करूं,
यहां कौन इतना क़रीब है.

मैं किसे कहूं मेरे साथ चल,
यहां सब के सर पे सलीब है.

तुझे देख कर मैं हूं सोचता
तू हबीब है या रकीब

तेरा शहर कितना अजीब है.

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ऐ ग़म ए दिल क्या करूं

((कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा है पर वो नज़्म जो मजाज़ की लिखी है,
मैं यहां लिख देता हूं.))

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्‍म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
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मायने - नाशादो-नाकारा-उदास और बेकार, क़ुमक़ुम- बिजली की बत्ती, शमशीर- तलवार, तसव्वुर- अनुध्यान, मैखाना- मधुशाला, शहनाज़े लाला रुख़- लाल फूल जैसे मुखड़े वाली, काशाने- मकान, इशरत- सुखभोग, फ़ितरत- स्वभाव या प्रकृति, हमनवा- साथी, तूफ़ाने-बला- विपत्तियों का तूफ़ान, वा- खुले हुए, अहदे-वफ़ा- प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा, माहताब-चांद, अमामा- पगड़ी, मुफ़लिस- ग़रीब, शबाब- यौवन, मज़ाहिर- दृश्य, सुल्ताने जाबिर- अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां- शयनागार, क़स्रे सुल्तान- शाही महल
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अनिल सिन्हा

बाजार में सब नंगे हैं...

कई विषय हैं जिन पर भडा़स मन में भरी पड़ी है। आज सोच रहा हूं एकृ-एक कर सभी को निकाल ही दूं। सबसे पहले अशोक मलहोत्रा के बारे में।
हर्षद मेहता, तेलगी और अब अशोक मलहोत्रा... बाजार में सब नंगे हैं...
दिल्ली विधानसभा की कैंटीन का ठेकेदार जो कभी तिपहिया चलाता था, आज अरबपति बना बैठा है। उसके पास पचासों गाड़ियां मिला हैं जिसके नंबर वीवीआईपी मतलब एक या दो या तीन टाइप के नंबर हैं जो सीधे दिल्ली का परिवहन मंत्री हारून जारी करता है। यह तो साफ है कि हारून का यार है अशोक मलहोत्रा। दूसरे, भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं के अलावा अफसरों का भी दामाद है अशोक मलहोत्रा। भाई, क्या जमाना आ गया है। अगर तीन-पांच में आपकी रुचि है तो आप भी कभी भी बड़े आदमी बन सकते हो। कुछ मेरे पत्रकार मित्र मुझे फोन कर बताते हैं कि वो देखो, फलां पत्रकार ने ये गाड़ी ले ली, फलां पत्रकार ने वो वाला बंगला खरीद लिया, फलां पत्रकार ने बर्थडे पर क्या शानदार पार्टी दी है.....तो मैं यही कह सकता हूं भाई कि, अगर आप तीन-पांच नहीं कर रहे हो तो तीन-पांच करने वालों से जल क्यों रहे हो। अगर वो अफसरों और नेताओं को पटा कर खुद कमा रहा है और उनको लाभ दिला रहा है तो हम लोगों को जलने की जरूरत क्या है। लेकिन, सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ऐसे हर्षद मेहता, तेलगी और अशोक मलहोत्रा अब इस देश में बिखरे पड़े हैं। ये सब बाजारवाद की देन हैं। बाजारवाद कहीं किसी को नैतिक नहीं रहने देता। अब ढिबरी लेकर खोजने पर लोग मिलेंगे जो कहेंगे कि मैं नैतिक हूं। जो जहां हैं वहां कमाने की फिराक में है। और, मजेदार तो ये है कि संस्थान, सत्ताएं और संगठन अब कमाई करने को कतई गलत नहीं मानते। बस, इनका ये मानना है कि अकेले ना कमाओ, हमें लाभ पहुंचाओं, अपने लिए भी माल बनाओ। पत्रकारिता में ही देखिए.....जिनके पास मिशन चलाने का काम था अब वो रेवेन्यू का काम देखने लगे हैं। जो इस काम को गलत कहेगा उसे पागल घोषित कर दिया जाएगा। मैं भी थोड़े खुले दिमाग का हो गया हूं। कम बोलता हूं इन विषयों पर वरना हाशिए पर जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। हालांकि हाशिए पर जाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन बात वही है ना, जब क्रांति करने गए थे और न कर पाए तो अब जब नौकरी करने आए हैं तो कम से कम यही काम ठीक से कर लें। लेकिन बावजूद इसके.....इन तेलगियों, हर्षद मेहातओ और अशोक मलहोत्राओं के कारनामों के सुनकर झांटें सुलगती रहेंगी।

मैं तो कोदे के खिलाफ और संजय के साथ हूं
राहुल भाई बजार वाले ने संजय को सजा मिलने वाले दिन ही धांय से लिख मारा.....ठीक हुआ कुत्ते को सजा मिल गई....कुछ इसी टाइप में अपनी भड़ास निकाल ली लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है कि यह रेयरेस्ट मामला है। आरोपी अब पूरी तरह सुधर चुका है, जब उसने गलती की थी वो एक बेहद दहशत के दौर में की थी जब मुंबई में दंगे हो रहे थे और उसके सेकुलर पिता को मारने और घर को उड़ाने की धमकियां दी जा रही थीं। उसे लगा, जब मर ही जाएंगे तो उससे अच्छा है जीते जी न मरने का इंतजाम कर लिया जाए। भाई ने जहां से हो सका हथियार बटोरा और घर पर रखा। भई, ये तो हम लोग भी करते हैं। मैं तो अपनी गाड़ी में एक लंबा वाला छुरा लेकर हमेशा चलता हूं। पता नहीं, रात-बिरात कभी किसी शैतान से भिड़ंत हो जाए तो केवल हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता ही ना रहूं बल्कि मौका देखकर उसकी गांड़ में घुसेड़ दूं। तो यह आत्मरक्षा का अधिकार है। बाकी रही बड़े अपराधियों के साथ रिश्ते रखने की तो भई कौन नहीं रखता। चैनल वालों ने न जाने कितने वीडियो दिखाए हैं जिसमें विदेश में भाई लोगों की पार्टीज में बालीवुड वाले किस तरह नाचते गाते रहते हैं। लेकिन इनमें से किसी का कुछ नहीं हुआ। वैसे भी, संजय दत्त ने जो कुछ किया वो सहजता में किया और उसके पीछे मंशा देश और समाज को नुकसान पहुंचाने की कतई नहीं थी। दरअसल ये जो जज कोदे है ना, उसने जानबूझकर ऐसा फैसला दिया ताकि न्यायिक इतिहास में वो अमर हो जाए और उसे कहा जाए कि वह सेलेब्रिटी के आगे झुका नहीं। बात यहां झुकने की नहीं, बात यहां जेनुइन जस्टिस की है। जैसे जेसिका मर्डर केस में गवाह और साक्ष्य न होते हुए भी और फाइल बंद करने के फैसले के बावजूद लोगों के विरोध के बाद कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर मामले को फिर से खोला और लोगों को उकसाकर गवाही कराई और फिर दोषियों को सजा सुना दी। इसी तरह इस मामले में भी मुन्नाभाई के मन की मंशा को समझते हुए उसके व्यवहार को देखते हुए और उसके द्वारा किए गए कारनामे को एक आत्मरक्षार्थ कार्रवाई बताते हुए उसे दो वर्ष की काटी गई जेल के आधार पर रिहा कर दिया जाना चाहिए। मतलब दो साल की सजा होनी चाहिए थी और ये सजा काट चुके होने के कारण उसे रिहा कर दिया जाना चाहिए। भई, मैं तो दिल से कोदे के खिलाफ हूं और संजय के साथ हूं।

फिलहाल इतना ही
जय भड़ास

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इस दौड धूप में क्या रक्खा....
यहां मैं दुष्यंत कुमार के कुछ कम परिचित शब्दों का गुच्छा प्रस्तुत कर रहा हूं....


इस दौड धूप में क्या रख्खा आराम करो आराम करो
आराम जिंदगी की कुंजी इससे न तपेदिक होती है
आराम सुधा की एक बूंद तन का दुबलापन खोती है
आराम शब्द में राम छुपा जो भव बंधन को खेता है
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है
इसलिए तुम्हें समझाता हूं मेरे अनुभव से काम करो
इस दौड धूप में क्या रख्खा आराम करो आराम करो.....

जय भडास
सचिन