Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

6.8.12

गर शबाब होता ......


दो दिन पहले यानि अगस्त को बिलासपुर जिला कांग्रेस कमेटी {ग्रामीण} के अध्यक्ष अरुण तिवारी का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा हुआ ! कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने की ख़ुशी में एक बैठक जिला कांग्रेस कार्यालय में रखी गई ! कई एजेंडों के बीच एक साल के कार्य-काल का लेखा जोखा भी शेयर किया जाता रहा ! संगठन को मजबूत करने की आपसी राय के बीच मसाले में चिकन और मीट भी पक रहा था ! तिवारी जी ने एक साल पूरा होने की ख़ुशी में पार्टी दी थी ! कांग्रेस भवन में देश के वीर सपूतों और आदर्श महापुरुषों की फोटो के नीचे मांस-मटन के पकने की खुशबु एक ओर जहां कई कांग्रेसियों की भूख बढ़ा रही थी वहीँ कई कांग्रेसी नानवेज कहूँ या काकटेल पार्टी देख हतप्रभ रह गए ! नानवेज के पकते ही औपचारिक बैठक ख़त्म हो गई ! इसके बाद कांग्रेस भवन किसी बार से कम नजर नही रहा था ! बकायदा शराब-बीयर की व्यवस्था के साथ हाशिये पे जा चूका कांग्रेस संगठन मजबूत हो रहा था ! कुछ ने शराब-कबाब के साथ शबाब मिल जाने तक की बात कह डाली ! हालाकि दबी जुबान से कुछ कांग्रेसियों ने अगले बरस की पार्टी में उसकी {शबाब}भी व्यवस्था करवाने का भरोसा दिलाया है ! इस ख़ास मौके पर मिडिया भी आमंत्रित था ! कुछ ने शराब-कबाब का मजा लेकर आत्मा को संतुष्ट कर लिया मगर कुछ की आत्मा जिन्दा थी सो सुबह { अगस्त} अखबार में कांग्रेस संगठन की मजबूती की खबर को तीन कालम की जगह मिल गई ! जो नही जानता था वो भी जिला कांग्रेस कमेटी के नए अध्यक्ष की ख़ुशी से वाकिफ हो गया ! दूसरे दिन खबर तो ये भी आती रही कि कुछ पुश्तेनी कोंग्रेसी कांग्रेस भवन को गंगा जल से शुद्ध करने वाले है
   वैसे जो इस बार हुआ वो यक़ीनन बिलासपुर जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यकाल का पहला सुअवसर था ! कोंग्रेसियों ने पहली बार कांग्रेस भवन में पके चिकन-मटन का लुत्फ उठाया ! जिनको बुरा लगा या जिनको तिवारी जी की ख़ुशी का काकटेल अंदाज पसंद नही आया उनका पेट दूसरे दिन मरोड़ता रहा ! यहाँ वहां जाकर कभी संगठन से इस्तीफ़ा तो कभी आलाकमान से शिकायत का जिक्र करते रहे ! कुछ ने कहा जैसा नंदू भैया {नंदकुमार पटेल} चाह रहे थे वैसा हो रहा है ! मै आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की अरुण तिवारी  प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार पटेल की खोज है ! उनको पूरे जिले में एक भी ऐसा कांग्रेसी नजर नही आया जिसके कंधे पर कांग्रेस को एकजुट करने का बोझ डाला जा सके ! तभी तो एक भगोड़े को जिले की जिम्मेदारी दे दी गई जिसकी घर वापसी को भी ज्यादा दिन नही हुआ है ! ये वो तिवारी जी है जिन्होंने सन १९९८ यानि अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने में सीपत से टिकट ना मिलने पर कांग्रेस की खूब फजीहत की और निर्दलीय चुनाव लड़े ! इन्होने कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रप्रकाश बाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़कर उन दिगज्ज नेताओं को बुरा-भला कहा जिनकी प्रतिमाओं के नीचे तीन दिन पहले ही मटन-चिकन बनवाया गया ! इन्होने १९९९ में सुषमा स्वराज के समक्ष भाजपा में प्रवेश किया ! सुषमा जी १९९९ में एक चुनावी सभा को संबोधित करने कोरबा आई हुईं थी !लगता है तिवारी जी उसी खीज को इस अंदाज में मिटा रहे है !  जिले में हाशिये पर चुकी कांग्रेस की जड़ो में मठा डालने की कोशिश मुझे अब तक तो सफल नजर आती है,पता नही कोंग्रेसी कितना गुड फील कर रहे है ? अब देखना ये होगा की अगले बरस की पार्टी में शराब-कबाब ही रहता है या फिर शबाब की व्यवस्था होगी ! फिलहाल तो आलोचना के भंवर जाल से निकलने के लिए तिवारी जी ये कहते फिर रहे है मांस-मटन कौन नही खाता ? क्या अटल बिहारी बाजपेई नानवेज नही खाते ? ऐसे तमाम तर्क है तिवारी जी की जुबान पर लेकिन वो ये भूल रहे है की बाजपेई जी ने कभी भी भाजपा के दफ्तर में बैथ्कत चिकन-मटन नही खाया होगा ना ही आदर्श मानने वालों की प्रतिमाओं के नीचे नानवेज पकवाया होगा ....! खैर हाशिये पर गई कांग्रेस को मजबूत करने शराब-कबाब की सख्त जरूरत उन कांग्रेसियों को ज्यादा है जिनको गाहे-बगाहे लोग दल-बदलू भी कह देते है

Haiku


[लघु कविता]

* यह तो चिट्ठी है
जिसका इंतज़ार करता हूँ ,
तुम्हें तो जानता हूँ
तुम नहीं आ पाओगे |

5.8.12

जब सारा आलम सो गया । (गीत ।)




http://mktvfilms.blogspot.in/2012/08/blog-post_5.html


जब  सारा  आलम सो  गया  । (गीत ।)



जब  सारा आलम सो  गया, दर्द  मेरा  ये  जाग  रहा ।

इश्क - ए - गुनाह  का हिसाब मुझ से  ये माँग  रहा ।



अंतरा-१.



रात  अमा,  घना  अंधेरा, नज़र   न  आये   कहीं  सवेरा ।

उम्मीद का धागा, चाक़ जिगर कि जैसे तैसे ताग रहा ।

जब  सारा  आलम  सो  गया, दर्द  मेरा  ये  जाग  रहा ।

(अमा=अमावस;  चाक़=शंका; तागना= मोटी-मोटी सिलाई करना ।)



अन्तरा-२.



नाकामी   की   करवट  संगत,  चीख  रहे   ये  सन्नाटे ।

बरबादी के बिस्तर  में  वह, आग का दरिया  दाग  रहा ।

जब  सारा  आलम  सो   गया, दर्द  मेरा  ये  जाग  रहा ।



अंतरा-३.



कलमा   भरूँ, सजदा  करूं  या  रहूँ   यूँ   ही  ग़मज़दा ।

चैन ओ अमन,सुकुन-ए-दिल, हिजाब से  ये भाग  रहा ।

जब   सारा  आलम  सो   गया, दर्द  मेरा  ये  जाग  रहा ।

(कलमा भरना-श्रद्धा रखना ।) (हिजाब=हया,शर्म ।) 



अंतरा-४.



अय रात तुम ठहरना  ज़रा, अय  दिल  तुम सँभलना  ज़रा ।

मयक़दे में शायद अब तक, सुरूर-ए-इश्क  है  जाग  रहा ।

जब   सारा  आलम  सो  गया, दर्द   मेरा   ये  जाग  रहा ।

(सुरूर -ए- इश्क =प्यार का नशा ।)

मार्कण्ड दवे ।  दिनांक-०५-०८-२०१२.

Triveni:दोस्ती!


बड़ी चालाक से किसी को भी बना लेती है अपना,
नशा है, जुनूं है, ज़िन्दगी है,बे-मज़हब पर दुरुस्त है.

शराब सी ज्यादा, जरा शातिर कम है ये दोस्ती!

4.8.12

करिए करिए शाहा ब्यारी..एक आध्यात्मिक आनंद

नर्मदा का रेतीला मैदान, तो कई बार ऊंची घाटी को छूते पल्लड़। यानी कभी गर्मी में तो कभी भारी बारिश तो कभी ठंड की सिहरन में भी मल मास पड़ा। पर महिलाओं में इतना जोश को सुबह 4 बजे से नर्मदा के एक महीने तक लगातार स्नान करतीं। फिर पूजन और एक बहुत ही खूबसूरत भजन गीत: करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराजा अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोली कहा बनी तरकारी। कहने को यह भजन था, लेकिन अध्यात्म के गहरे मंथन सा आनंद इसमें आता। नर्मदा में ठिठुरते हुए स्नान फिर बीच में भगवान की मूर्ति और फिर यह गीत। हम लोग ज्यादा नहीं समझते थे। गांवों में मनोरंजन के साधन भी कम होते हैं, इसलिए ही सही। मगर सब दोस्त टोली बनाकर इस आनंद में शरीख होते जरूर थे। कालांतर प्रकारांतर में पता चला कि यह एक धार्मिक विधि है। सभी महिलाएं मल मास (विक्रम संवत में हर तीन साल में एक महीना अतिरिक्त होता है। इसे ही मल मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है) या कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त की गोधुली बेला में स्नान कर शायद पाप धोना चाहती होंगी, मगर मेरे लिए तो सिर्फ इस गीत का सुमधुर गीतात्मक आनंद जरुरी था। बचपन बीता कुछ चीजों की समझ बढ़ी। तब सालों बाद गांव पहुंचे तो देखा पहले मल मास के स्नान के लिए सुबह से ही महिलाएं घरों घर बुलौआ सा देती हुई जाती थी। यह बुलौआ महज एक आह्वन नहीं हुआ करता था, बल्कि आत्मिक रूप से माईं, चाची, बड़ी अम्मा, दादी या किसी को उनके गांव के नाम वाली फलां के नाम से पुकारती हुईं चली जाती थीं। यह कोई वंृदावन की कृष्ण भक्ति सा नजारा था, लेकिन जब में इस बार गया तो सबकुछ बदल सा गया था। अगस्त में यह मल मास चल रहा है, महिलाएं अब भी उसी नर्मदा में नहाने जा रहीं हैं। किंतु तरीका बदल गया है। पहले जो पूरा गांव एक होकर धमनी के रास्ते, ऊपर के रास्ते से नर्मदा में इकट्ठा होता था, वह अब सब अपनी-अपनी राह से नर्मदा जा रहा था। कोई किसी को नहीं बुलाता, अब बस कुछ झुंड थे। कोई एक जाति के नाम पर तो कोई एक परिवार के नाम पर। इनमें कुछ ऐसे झुंड भी थे, जो मुहल्लों के नाम पर हैं। कुल संख्या में भी कमी आई थी। मेरे लिए यह सब रोमांचक था, चूंकि शहरी परिवेश ने जो दिया सो दिया लेकिन सुबह जल्दी उठने की अच्छी आदत वह हमेशा के लिए लेकर उड़ गया। लेकिन करिए करिए शाहा ब्यारी की एक सुरमयी धुन अभी भी कानों में तैर जाती है, तो एक आध्यात्मिक संगीत मन के भीतर कहीं बज उठता है। निश्चित तौर पर यह एक धार्मिक विधि और पापों से मुक्ति का एक जरिया थी। किंतु यह प्रक्रिया गांवी सहजता, अपने कर्मोंं के साथ ईश्वरीय चिंतन, सबके बीच के प्रेम, उत्सवी भारतीय मानस, को प्रतिबिंबित करती थी। पूरी जिंदगी भले ही सही और गलत के बीच फैसला न कर सके हों, किंतु एक डुबकी इस नाम पर लगाना कि जो कुछ गलत किया उसके लिए माफी अच्छी बात थी। यह उस युगबंधक मनुष्य के मानस पर एक तमाचा भी है, जो यह मानता है कि युग बदला है तो हम सतयुग या अच्छे युग के कैसे हो सकते हैं। एक अलग इंसानी फितरत भी यहां झलकती है कि इंसान चाहे कितना ही आगे पीछे, ऊपर नीचे चला जाए मगर वह अपने गलत कामों को सुधारने की कोशिश करता ही रहेगा। सालों बाद के गांवी गुटों को देखकर तकलीफ होती जरूर है, किंतु यह सोचकर कि इंसान हमेशा सुधरने की कोशिश करता है। इस मामले में भी वह आज नहीं, कल नहीं परसों जरूर अपने मुहल्ला गुटों को खत्म करके एकल गांवी गुट बन सकेंगे। चूंकि इन दिनों मल मास चल रहा है और यह महिलाएं स्नान भी कर ही रहीं है, तो मुमकिन है वे फिर चाची, दादी, बड़ीअम्मा, नन्हेघर की दादी, नैलापुर वाली, कैलकच्छ वाली, भौजी आ जाओ चिल्लाती हुईं नर्मदा जरूर जाएंगी। और मुझे वो गीत सुनने मिलेगा करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराज अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोलीं कहा बनी तराकारी। करिए करिए शाहा ब्यारी... वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

ये फुल-टू-फटाक मस्ती लेता हुआ वतन....!!


थोड़ा चिंतित हूँ और व्यथित हूँ,मगर मेरी जैसी मानसिक दशा वाले लाखों लोग इसी वतन में अपनी चिंताओं को इस तरह प्रकट कर रहे हैं,अगर आपको लगे कि यह वाजिब है तो हमें जगह दें ,हम आपके आभारी रहेंगे !!
ये फुल-टू-फटाक मस्ती लेता हुआ वतन....!!
              अन्ना-टीम के अनशन समाप्त होने के बाद शायद अब आगे अनशन जैसे कार्यक्रमों की संभावना कम ही दिखाई पड़ती है !,अनशन समाप्त करने की वजह प्रकट में चाहे जो भी बतायी जाए मगर अप्रकट में बहुत सारे रहस्य हैं,जिनका प्रकटीकरण अब शायद कभी नहीं हो,ऐसी संभावना भी बनती है,सबसे बड़ी बात तो यह है कि असंवेदनशील-दम्भी-हरामी और चाटुकारों से घिरे शासकों के सम्मुख बीन बजाने का फायदा भी क्या ?
               मगर यहीं पर आगे चीज़ों के उग्र रूप धारण कर लेने की संभावना भी बनती दिखाई पड़ती है !मोटी-सी बात यह है कि आज की परिस्थितियों में साधारण से साधारण चीज़ों के लिए भी,जनता को अपने निम्नतम हक़ के लिए भी सड़क पर आने को विवश होना पड़ता है तो शासकों की यह अंधेरगर्दी भला कब तक चल सकती है ?
               इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि टीम-अन्ना जैसी प्रतिभाशाली लोगों की टीम ने अब तक सिर्फ एक सवाल भ्रष्टाचार को लेकर ही यह आन्दोलन खडा किया है,जिससे शायद शहर की जनता के सिवा किसी को कोई सरोकार नहीं है,बल्कि इस आन्दोलन के चलते अन्य बहुत सारी जन-उन्मुखी समस्याएँ और देश के अन्य कुछ हिस्सों में अन्य कुछ लोगों द्वारा किये जा रहे बहुत से अत्यंत महत्वपूर्ण आन्दोलन भी हाशिये पर डाल दिए गए हैं !
               टीम-अन्ना को अब यह मंथन करना ही होगा कि अगर सच में वो एक राजनीति-दल होने की राह में है तो देश में बेशक भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है मगर साथ ही अन्य बहुत सारे प्रश्न भी हैं और वो प्रश्न इतने ज्यादा अहम् हैं कि ये सारे प्रश्न एक साथ ही अपने हल किये जाने की मांग करते हैं,किसानों-मजदूरोंऔरतों-बच्चों और ऐसे ही आम लोगों से सम्बंधित ऐसे हज़ारों-हज़ार सवाल हैं जो अपने अति-शीघ्र हल किये जाने की तलाश में हैं .
               अब एक प्रश्न मीडिया का भी है,विदेशी पूँजी की चकाचौंध में डूबा इतराता और अपनी पीठ आप ही ठोकता यह मीडिया आज सबसे सिरफिरा दिखाई देता है,भले ही इस मीडिया ने सैंकड़ों पर्दाफ़ाश किये हों मगर सत्ता के साथ इसके गठजोड़ को कौन नहीं जानता है और इस सांठ-गाँठ से यह क्या-क्या हासिल करता है अगर सच में जनता इसे समझ-जान जाए तो आम जनता इसे भी किसी दिन ठोक डालेगी,समझने वाले लोगों ने तो दरअसल इसका विश्वास करना भी छोड़ दिया है क्योंकि अब वो जानते हैं कि बहुत सारे पर्दाफाशों के बाद बहुत सारी बंदरबांट हुआ करती है और इस बंदरबांट के पूर्ण होते ही वही मीडिया अपना मुहं ऐसा सीम लेता है जैसे इसने कभी मूंह खोला ही नहीं था !मगर अब यह रहस्य भी अब बहुत छिपा नहीं रह गया है !
               बीजिंग ओलिम्पिक के बाद इस ओलिम्पिक तक हम ना सिर्फ खेलों में बल्कि तमाम चीज़ों में चीन नामक एक पडोसी देश के उभार को देखते आ रहे हैं !कल तक भारत से भी फिसड्डी यह देश अगर आज विश्व का सिरमौर बनने जा रहा है,बल्कि तकरीबन बन ही चुका है तो इसके पीछे ऐसा क्या है,ऐसी कौन-सी बात है जिसने सवा-डेढ़ अरब लोगों का बोझ ढ़ोते एक भूमि को सबसे आगे ला खडा कर दिया है !!और मज़ा यह है कि इसके पीछे कोई रहस्य नहीं है दोस्तों बल्कि सिर्फ एक वजह है मेहनत-मेहनत और मेहनत !!सिर्फ कार्यकुशल कर्मठता ही बेहतर परिणाम दे सकती है मगर इसके ठीक उलट हम क्या हैं काहिल-नकारा....मेहनत से जी भरकर जी चुराने वाले,सिर्फ सपने देखने और ज़रा-ज़रा सी सफलता पर फूल कर कुप्पा हो जाने वाले एक बेवजह की भीड़.....धरती पर एक बेवजह का बोझ....ज़रा अपने इस फालतुपने पर क्षण भर के लिए ही सही,मगर विचार करें हम एकाध करोड़ मीडिया से जुड़े हुए और विचारों में खुद को बड़े तीसमार खाँ समझते हुए लोग !!
                  फिलहाल टी.वी-इंटरनेट-मोबाइल-आईपॉड और अन्य एप्स के चटखारे लेता हुआ कुछ करोड़ मध्यवर्गियों का यह वतन फुल-टू-फटाक मस्ती की नींद सो रहा है,बिना यह जाने और समझे हुए कि बाकी के अरबों लोगों के साथ दरअसल क्या हो रहा है !जिस किसी भी दिन यह जागेगा और और उन अरबों प्रताड़ित लोगों के दुःख-दर्द से खुद को जोड़ेगा तभी कोई सच्ची और संभावना नज़र आती है और एक बात बता दूं अभी तो यह नज़र ही नहीं आ रही !इसलिए आन्दोलनों की परिणिति ऐसी हुई जा रही है !!
                बिना किसी दिशा के कुछ भी करना एक बहुत बड़ा पागलपन है और यह बेतुका पागलपन सबसे पहले तो यहाँ सत्ता करती है,और उससे भी बड़ा उसका विरोध करने वाले जबकि सबका स्वार्थ महज एक है कि शाम-दाम-दंड-भेद किसी भी प्रकार से अपना घर भरना !!और जब जनता को बार-बार "........"बनाकर सिर्फ सरकार बदलना भर आपका मकसद हो तो जनता आखिर कब तक खुद को ठगा जाता महसूस करके भी आपका साथ देगी....मज़ा तो यह है कि सौ अरब लोगों को तो यह तक मालूम नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा उनके लिए तरह-तरह की योजनायें लागू हैं और वो पूरी-की-पूरी या कुछ या बहुत सारे अंशों में कुछेक हजार लोगों द्वारा हाइजैक कर ली जा रहीं हैं इसमें सत्ता-दलाल-स्वयंसेवी संगठन-मीडिया और कुछ महत्वपूर्ण लोग पूरी तरह से लिप्त हैं और मैं यह सोच कर चिंतित हूँ कि जब जनता को इस भयानक "घोटाले"(इसके अर्थ को पाठक कई गुणा कर लें !!)का पता चलेगा तब वह इस सबमें लिप्त इन सब लोगों का क्या हश्र करेगी !!??

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सोचता तो हूँ कि एकांगी सोच ना हो मेरी,किन्तु संभव है आपको पसंद ना भी आये मेरी सोच/मेरी बात,यदि ऐसा हो तो पहले क्षमा...आशा है कि आप ऐसा करोगे !!


बुडविग प्रोटोकोल के शंसा पत्र (Budwig Protocol Testimonials)


बुडविग प्रोटोकोल के शंसा पत्र (Budwig Protocol Testimonials)

स्तन कैंसर (Breast Cancer)

श्रीमती जीन डी. थोमस उम्र 51 वर्ष वजन 185 पौंड को स्टेज-4 मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर था जो रीढ़ और बांह की हड्डी में फैल चुका था। पिछले वर्ष उसे स्टेज-2बी कैंसर था और 2009 और 10 में उसकी शल्यक्रिया (lumpectomy), कीमो और रेडियो की गई थी। उसे गर्दन, कंधे और पीठ में बहुत दर्द रहता था, जिसके लिए उसे फेन्टेनिल के पेच लेने पड़ते थे। उसे डायबिटीज भी थी।  उसने स्पेन के बुडविग सेंटर के डॉ. जेनकिन्स की देखरेख में  दिनांक 13 दिसंबर, 2010 से बुडविग उपचार लेना शुरू किया। उसे बहुत जल्दी फायदा हुआ और डेढ़ महीने बाद 5 फरवरी, 2011 को उसने डॉ. जेनकिन को यह पत्र लिखा।

श्रीमती जीन डी. थोमस (wndylynn@comcast.net)

शनिवार, फरवरी 05, 2011 5:18 AM

सेवामें

डॉ. जेनकिन्स,

बुडविग सेंटर, स्पेन

संलग्न – ट्यूमर मार्कर रिपोर्ट

डॉक्टर मैं आपको मेरे ट्यूमर मार्कर की रिपोर्ट बताना चाह रही हूँ। 13 दिसंबर, 2010 को जब मैं आपसे मिली थी तब मेरा CA27-29 146.8 था। 2 जनवरी, 11 को ये घट कर 23.7 रह गया है। 0 से 37.7 नोरमल माना जाता है। यानि मेरा नोरमल से भी कम आ गया है। मैं खुशी से रोमांचित हूँ। मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा है कि इतने कम समय में इतना आश्चर्यजनक फायदा हो सकता है। इसके अलावा मुझे तीन फायदे और हुए हैं। एक तो 20 साल से मेरे कूल्हे पर एक गांठ (fatty lump) थी जो गायब हो गई है। मेरे पैर के अगूठे पर भी एक नोड्यूल था वह भी घुल गया है। तीसरा कई वर्षों से मेरी दाहिनी रिंग फिंगर में भी एक छोटी सी गांठ थी, वह भी ठीक हो गई है।

इस उपचार से मुझे बहुत फायदा हुआ है और जब तक आप कहेगे मैं यह उपचार लेती रहूँगी। मैं जानती हूँ कि मुझे यह आहार चिकित्सा लंबे समय तक लेनी है। यह पत्र मैं आपको अभी तक हुए  जबर्दस्त  फायदे बताने के लिए लिख रही हूँ।
-         जीन थोमस

ब्रेन ट्यूमर
नवंबर, 2008 में एक पांच बच्चों की मां लेट्शिया स्पेंसर को ब्रेन ट्यूमर हुआ और विडम्बना देखिये कि इस कठिन घड़ी में उसका पति उसे अकेली छोड़ कर चला गया। ऐसी परिस्थिति में बुडविग सेंटर ने  बिना फीस लिए बुडविग पद्धति द्वारा उपचार शुरू किया और हर्बल दवाइयां भी उपलब्ध करवाई। उसे बहुत फायदा हुआ। 
11 महीने बाद 19 सितंबर, 2009 में वह अपनी प्रतिक्रिया बताते हुए लिखती है, "हलो डॉ. जेनकिन्स, आपने मुझ पर कितना बड़ा उपकार किया है। आपके मार्गदर्शन से ही आज मैं इतना स्वस्थ महसूस कर रही हूँ। मैं सचमुच बहुत खुश हूँ। मेरा वजन भी 31 किलो कम हुआ है। अब मुझे सॉवरक्रॉट पीना बहुत अच्छा लगता है। मेरे बच्चे बहुत खुशकिस्मत हैं। मेरे पी.ई.टी. स्केन में कोई ब्रेन ट्यूमर नहीं आया है। शरीर में कैंसर का कोई निशान नहीं बचा है। इस सबके लिए मैं आपकी शुक्रगुजार हूँ। आपकी लंबी उम्र के लिए दुआ मांगती हूँ। जल्दी ही आपको मेरा फोटो भेजूंगी।
लेट्शिया (natimomof5@yahoo.com )
ब्रेन ट्यूमर
रविवार, 30 नवंबर, 2003 – क्लिफ बेकविद लिखते हैं, " मैं कनाडा के एक रोगी को जानता हूँ, जो बुडविग से उपचार ले रहा था। उसके ब्रेन में ऐडीनोमा नाम का कैंसर था। उसकी हालत बहुत गंभीर थी। उसे  कलर ब्लाइंडनेस हो चुकी थी,  उसे लाल रंग दिखाई नहीं देता था। वह 1997 में बड़ी आशा लेकर बुडविग से मिलने जर्मनी गया था।  कनाडा आकर उसने पूरी ईमानदारी से प्रोटोकोल शुरू किया। दो सप्ताह में उसे अच्छा महसूस होने लगा। तीन सप्ताह बाद उसकी नजर में सुधार आने लगा। कुछ महीनों बाद उसे लगने लगा जैसे उसका ट्यूमर ठीक हो चुका है। कुछ दिनों में चिकित्सकों ने उसकी जांच करके कह दिया कि अब उसके ब्रेन में कोई ट्यूमर नहीं है।  बह बहुत स्वस्थ और खुश है और अपना व्यवसाय कर रहा है। वह अभी भी प्रोटोकोल ले रहा है, लेकिन उतनी सख्ती से नहीं। यह उपचार ल्यूकीमिया समेत सभी तरह के कैंसर में काम करता है।" 
 ब्रेन ट्यूमर
दिसंबर 18, 2005 में मेरी बेटी को ग्लायोमा नाम का ब्रेन ट्यूमर हो गया था। डॉक्टर ने उसे कीमो या रेडियो भी देने से मना कर दिया, क्योंकि उसकी हालत बहुत गंभीर थी और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं बची थी। फिर हमनें उसे बुडविग प्रोटोकोल देना शुरू किया, तीन सप्ताह बाद उसकी हालत में सुधार आने लगा। उसकी देखभाल करने वाले डॉक्टर भी कही कि यह तो चमत्कार ही हुआ है। 

ब्रेन ट्यूमर
33 वर्षीय डोरोथी मेकोर्ड को बांई तरफ फ्रंटल ग्लायोमा, लीवर और ओवेरियन कैंसर था। मेटास्टेसिस भी हो चुके थे। मैं नीचे उसका पत्र दे रहा हूँ जो उसने डॉ. लॉयड जेनकिन्स को उपचार शुरी करने के कुछ महीने बाद लिखा है।
डोरोथी मेकोर्ड (sdmc17@msn.com)
गुरूवार, सेप्टेंबर 2, 2010 4:29 PM
सेवामें
डॉ. लॉयड जेनकिन्स
हेलो डॉ. जेनकिन्स, " मैं आपको अपनी प्रतिक्रिया दे रही हूँ। कल मैंने अपना अल्ट्रा साउंड करवाया है। मेरी ओवरी में अब कोई सिस्ट या गांठ नहीं है (पहले एक सिस्ट तो नीबू के बराबर थी)। मेरी ओवरी अब बिलकुल ठीक है। इसके अलावा मेरे लीवर की गांठ भी 6 सैं.मी. से सिकुड़ कर 1.1 सैं.मी. रह गई है। यह तो चमत्कार हुआ है। मैं अपनी खुशी का इज़हार किन शब्दों में करू। मैं तो खुशी से  फूली नहीं समा रही हूँ। मैं लंबे समय तक इस उपचार को लेती रहूँगी।  मैं आपकी आभारी हूँ और बहुत धन्यवाद देती हूँ।
-         डोरोथी मेकोर्ड

बोन कैसर
इना एस. वेस्ट, फ्लोरिडा

"डॉक्टर्स ने सहानुभूति जताते हुए मुझसे कहा कि वे मेरे लिए कुछ करने में असमर्थ हैं। पिता की तरह मेरे माथे पर हाथ रख कर कहा कि मेरी स्थिति गंभीर है। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन मैं विचलित नहीं हो रहा था। मैं शुरू से ही धर्म और चर्च से जुड़ा था। मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था। हालांकि मुझे कहा गया था कि मैं मुश्किल से 3 से 6 महींने जी पाऊँगा। कैंसर से मेरा मेरुदंड कमजोर हो चुका था। मेरी रीढ़ की 9 हड्डियां सिकुड़ चुकी थी। इस कारण मेरे कंधे और छाती में बहुत पीड़ा होती थी। हमेशा दर्द-निवारक दवा लेनी पड़ती थी। थोड़े से झटके या दबाव से हड्डी टूटने का खतरा बना रहता था।

डॉ. केली ने मुझे बुडविग उपचार और एंजाइम्स लेने की सलाह दी। मैंने गंभीरता से इस उपचार लेना शुरू किया। एक साल बाद मेरी हालत में बहुत सुधार आया। मैंने पुनः अपनी धार्मिक गतिविधियां और यात्राएं शुरू कर दी।  

बोन कैसर

(डॉ. बुडविग की पुस्तक डर टोड डेस ट्यूमर्स – II  से  [The Death of the Tumor, vol. 2]) 

डॉक्टर ने नये और पुराने एक्स-रे का अवलोकन करते हुए कहा कि मिसेज. के. आप बहुत भाग्यशाली हैं। आपकी हड्डियों के आधे से ज्यादा कैंसरग्रस्त टिश्यू ठीक हो चुके हैं (पेज 14)। गली हुई हड्डियां अब मजबूतऔर स्वस्थ हो गई हैं।  कॉलरबोन (Clavicle) का तीन सैं.मी. हिस्सा पूरी तरह गल चुका था जिसमें अब नये स्वस्थ अस्थि ऊतक (Bony Tissue) बन चुके हैं। वह सचमुच अचंभित था। 
टांग की हड्डी में सारकोमा (p. 28) 
डाक्टर्स ने कहा था कि टांग काटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।  लेकिन  डॉ. बुडविग के आग्रह करने पर डाक्टर्स ने रोगी का ऑपरेशन स्थगित कर दिया। फिर डॉ. बुडविग ने बच्चे का उपचार शुरू किया। यह मई, 1956 की बात है। उपचार शुरू करने के सिर्फ 14 दिन बाद बच्चा अपनी टांग को हिलाने डुलाने लगा।  20 अगस्त को हुए एक्स-रे में सुधार दिखाई दिया। टांग में 3 सैं.मी. की गांठ सिकुड़ कर  ½ सैं.मी. की रह गई (यह दिसंबर, 1956 में लिखा गया) ।

चेहरे की हड्डी का कैंसर (p. 36) 
"डॉ. बुडविग, मैं अक्टूबर, 1973 से आपका उपचार ले रहा हूँ और पूरी तरह शाकाहारी बन गया हूँ। मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। आज मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ कि आपकी आहार-चिकित्सा से कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है। अक्टूबर में मैं पूरी तरह हताश हो चुका था और जीने की कोई आशा नहीं  थी। 6 महीनें में 35 रेडियेशन, तीन ऑपरेशन और मेरे लेफ्ट पेलेट में हुई गांठ  ने मुझे पूरी तरह तोड़ कर रख दिया था। जीने की हौसला नहीं बचा था। यदि मैं आपके पास नहीं आता तो मेरा बचना नामुमकिन था। आपसे मिल कर मुझे जीने की इच्छा पैदा हुई। बस मुझे ग्लानि इस बात की है कि यदि मैं आपसे तीसरे ऑपरेशन से पहले मिल लेता तो मुझे अपनी एक आँख, नाक व मुंह का कुछ हिस्सा, पूरा पेलेट (तालु) और ऊपर के कुछ दांत गंवाने नहीं पड़ते।" 
इस रोगी के बारे में बुडविग की प्रतिक्रिया

यह रोगी अक्टूबर, 1973 में मुझसे मिलने आटा था। उसके चेहरे की कई हड्डियों में मेटास्टेसिस हो चुका था। उसके तीन ऑपरेशन भी हो चुके थे, जिनमें उसकी एक आँख, चेहरे के एक तरफ की कुढ हड्डियां, ऊपर का जबड़ा निकाला जा चुका था। अब वह दोराहे पर खड़ा था, एक रास्ता उन कैंसर चिकित्सकों की तरफ जाता था, जो उसकी दूसरी आँख भी निकाल लेना चाहते थे। दूसरा रास्ता मेरी तरफ आ रहा था। उसने मेरे पास आना ही उचित समझा।  मैंने उसे ऑयल-प्रोटीन डाइट और एलडी तेल का लेप करने की सलाह दी। आज वह बहुत अच्छा महसूस कर रहा है। वह स्वस्थ और खुश है। उसकी नजर ठीक हो गई है। (1974 में लिखा गया) 

ब्रेस्ट कैंसर

डालिस जुरादो (dalis1_1999@yahoo.com ),
पनामा
डॉ. जेनकिन्स,
मारीपोसा क्लीनिक, स्पेन।
मैं आपको बहुत अच्छी खबर दे रही हूँ। मैंने अपना केट स्केन, लेब टेस्ट और मेमोग्राफी करवाई है। मैं ईश्वर, अपने परिवार और विशेष तौर पर आपको बहुत बहुत धन्यवाद देती हूँ कि मैं अब बिलकुल स्वस्थ हूँ, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं है, अब मुझे कोई ब्रेस्ट कैंसर नहीं है। मैं आपका उपचार ईमानदारी से ले रही हूँ, परहेज भी कर रही हूँ। मैं आपसे पूछती हूँ कि क्या मुझे अलसी का तेल और पनीर जीवन भर लेना पड़ेगा। मेरा प्रोल्क्टिन हार्मोन थोड़ा ज्यादा है, उसके लिए मुझे क्या करना चाहिये। अगले वर्ष मैं आपसे मिलने स्पेन आ रही हूँ, ताकि मैं आपसे मिल कर आपको धन्यवाद दूँ। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए ईश्वर से दुआ मांगती हूँ। यहाँ मैं अपने पति की बहुत प्रशंसा करना चाहूँगी, जिसने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया, मुझे संबल दिया, चिकित्सक होने के नाते हमेशा आपके उपचार पर पूरा विश्वास रखा और इस उपचार यात्रा में हर कदम पर मेरा शत प्रतिशत साथ दिया। आप मेरी प्रतिक्रिया अपनी सबके साथ साझा करें, जिसे दूसरे रोगी भी प्ररणा ले सकें।  
सन् 2000 की गर्मियों में बेल्जियम की लगभग 50 वर्षीय मगदा को ब्रेस्ट कैंसर बताया गया। उसे हार्मोन उपचार दिया गया, जिससे उसे कई साइड-इफेक्ट्स हो रहे थे। उसे हमारी क्लीनिक के बारे में मालूम था, इसलिए परामर्श के लिए वह मेरे पास आई।  वह बहुत घबराई हुई थी, क्योंकि उसके परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का लंबा इतिहास था और परिवार की कई स्त्रियों ने बड़े कष्ट झेले थे।  लेकिन वह फिर भी खुशकिस्मत थी, क्योंकि उसके कैंसर का निदान प्रारंभिक अवस्था में ही हो गया था। हमने विस्तार से उसके कई परीक्षण किये तथा बुडविग प्रोटोकोल, डिटाक्स प्रोग्राम,  होम्योपेथी और हर्बल उपचार देना शुरू किया। दो महीने बाद वह अपने पुराने चिकित्सक के पास दिखाने गई, जिसने उसे हार्मोन उपचार दिया था। उसके फिर से टेस्ट किये गये और  उसके शरीर में कैंसर के कोई चिन्ह नहीं पाये गये। वह पूरी तरह स्वस्थ है और अहतियात के तौर पर हर्बल उपचार और ओमेग-3 तेल ले रही है।
-         डॉ. जेनकिन्स
ब्रेस्ट कैंसर

जून 2000 में स्पेन की अंतोनिया (उम्र लगभग पचास वर्ष) का मलागा, स्पेन में ब्रेस्ट कैंसर के लिए सर्जरी हुई। साथ में कीमो और हार्मोन उपचार भी दिया गया। कैंसर चिकित्सकों ने उसे पांच साल तक उपचार लेने की सलाह दी। तभी उसे किसी ने हमारे संस्थान के बारे में बतलाया। जब वह हमारे यहाँ आई तो इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उसे  सहारा देकर कार से उतार कर अंदर लाया गया। हमने उसके ई.ए.वी. और खून के टेस्ट किये। कीमो और हार्मोन उपचार लेने के बावजूद भी उसको कई जगह मेटास्टेसिस हो चुके थे। 1 नवंबर, 2000 को हमने उसका उपचार शुरू किया। 6 हफ्ते बाद वह हमारी क्लीनिक पर दोबारा जांच के लिए आई।  हमने जांच में पाया कि उसके शरीर में कहीं भी मेटास्टेसिस नहीं थे। वह काफी ऊर्जावान लग रही थी। वह बड़े आराम से कार से निकल कर अंदर आई। उसकी दिनचर्या में सुधार आ चुका था। उसने खरीदारी और घर के छोटे-मोटे काम करना शुरू कर दिये थे। वह खुश थी और हमारे उपचार से पूरी तरह संतुष्ट नजर आई।   

ब्रेस्ट कैंसर
नीदरलैंड की 49 वर्षीय सबीन हायनमेन (12sabine@gmail.com) बांये स्तन में कैंसर था।  कैंसर तीन लिंफ नोड्स और पीठ में भी फैल चुका था। उसकी सर्जरी हुई और 18 कीमो की सायकल्स दी गई। उसने हमारे यहाँ भरती होकर दो हफ्ते तक इलाज लिया। 7 फरवरी, 2011 को उसने हमारे उपचार को माइंड ब्लोइंग बताते हुए शुक्रिया अदा किया। 25 मार्च को डॉ. नवारो क्लीनिक से उसके टेस्ट की रिपोर्ट मिली। उसका नवारो टेस्ट 51.4 था (49 का मतलब होता है कि आपको कैंसर नहीं है)। वह बुडविग उपचार ले रही है और स्वस्थ महसूस कर रही है।

ब्रेस्ट कैंसर


हेलो डॉ. बेकविद, "मैंने आपके शंसा प्रपत्र की नकल एक महिला (ऐन्डी) को दी, जिसे ब्रेस्ट कैंसर था, और उसका एक ब्रेस्ट निकाल दिया गया था। कैंसर काफी फैल गया था और एक साल के भीतर उसके दूसरे ब्रेस्ट की भी सर्जरी करना जरूरी लग रहा था। उसकी कीमो और रेडियो थेरेपी हो चुकी थी। डॉक्टर्स के पास अब कोई इलाज नहीं बचा था,  इसलिए उसे घर भेज दिया था।  वह मेरे पास आई। वह बहुत कमजोर हो चुकी थी। वह अपने दैनिक कार्य भी नहीं कर पाती थी। उसे कोई उम्मीद नहीं थी कि वह बच पायेगी। उसे प्रोटोकोल दिया गया। शुरू के कुछ दिन तो वह थकावट और कमजोरी की शिकायत करती रही। लेकिन चौथे दिन से उसमें शक्ति का संचार होने लगा और वह अच्छा महसूस करने लगी। कुछ ही हफ्तों में उसने क्लब जाना शुरू कर दिया।  वह कनाडा घूमने भी गई, जहाँ उसे बहुत पैदल भी चलना पड़ा, लेकिन उसे कोई परेशानी नहीं हुई।  दो हफ्ते पहले ही कैंसर चिकित्सक ने उसकी जांच की है। उसका दूसरा ब्रेस्ट पूरी तरह ठीक है और किसी तरह की तकलीफ नहीं है। चिकित्सक ने उसे एक साल बाद जांच के लिए बुलाया है।"
उसने मुझे कल ही फोन करके एक बार फिर शुक्रिया अदा किया है। उसने कहा है कि यह सारा चमत्कार अलसी के तेल का है। उसने वादा किया कि वह 5 टेबलस्पून तेल हमेशा लेती रहेगी।
ब्रेस्ट कैंसर
कुछ सालों पहले हमारी एक मित्र का मेमोग्राम हुआ। डॉक्टर का कैंसर का सन्देह हो रहा था। इसलिए उसने कहा कि कुछ हफ्तों बाद उसकी बायोप्सी करेंगे। लेकिन उसने तुरन्त रोजाना तीन टेबलस्पून अलसी का तेल और पनीर लेना शुरू कर दिया। बायोप्सी रिपोर्ट से सिद्ध हो गया था कि उसे कैंसर है।  उसके दूसरे टेस्ट भी किये गये और मेस्टेक्टॉमी करने का निर्णय लिया गया। लेकिन सर्जन ने कहा कि अभी ऑपरेशन नहीं करेंगे, बल्कि 6 हफ्ते बाद रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के साथ ही मेस्टेक्टॉमी करेंगे। लेकिन बाद में सभी ने सोचा कि सर्जरी में देर करना ठीक नहीं है, क्योंकि कैंसर के फैलने का खतरा था। इसलिए ऑपरेशन द्वारा ब्रेस्ट निकाला गया और बायोप्सी के लिए भेजा गया।  यकीन मानिये बायोप्सी में कैंसर का कोई नामोनिशान नहीं था। उसने सर्जन को बता दिया था कि वह बुडविग प्रोटोकोल ले रही है। अचानक वह चौंका और उससे इस उपचार के बारे में पछताछ करने लगा क्योंकि उसकी पत्नि को भी ब्रेस्ट कैंसर था और उसके दोनों ब्रेस्ट का ऑपरेशन हो चुका था। उसकी हालत बहुत गंभीर थी और वह कई जगह उसका इलाज करवा चुका था, लेकिन कहीं कोई फायदा नहीं हो रहा था। अब उसने पत्नि को बुडविग प्रोटोकोल देना शुरू किया। मैंने सुना है कि उसकी हालत में बहुत सुधार आ रहा है।
   

i-next men mera aalekh

i-next men mera aalekh

3.8.12



दैनिक भास्कर व रजनीगंधा में से कौन सच्चा, कौन झूठा?

दैनिक भास्कर में छपी खबर के साथ दी गई वह रिपोर्ट

पान मसाले पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की दैनिक भास्कर की मुहिम के बीच एक विरोधाभासी मगर साथ ही हास्यास्पद तथ्य उभर कर सामने आया है। विरोधाभासी इसलिए कि एक ओर दैनिक भास्कर को मिली केन्द्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान उर्फ सीटीआरआई, राजमुंदरी में बताया गया है कि पान मसाला रजनीगंधा में 2.26 प्रतिशत निकोटिन है, जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, जबकि दूसरी ओर रजनीगंधा ने एक विज्ञापन जारी कर खुलासा किया है कि सेंट्रल टोबेको रिसर्च इंस्टीट्यूट-इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकलचर, राजुमंदरी से यह प्रमाणित हो चुका है कि उनके उत्पाद में निकोटिन नहीं है। असल में ये संस्थान और इंस्टिट्यूट एक ही हैं, केवल हिंदी और अंग्रेजी में नाम का फर्क है। और हास्यास्पद इसलिए कि जिस पान मसाला विरोधी मुहिम के तहत दैनिक भास्कर ने 29 जुलाई के अंक में रजनीगंधा सहित अन्य पान मसालों के बारे में रिपोर्ट छापी है, उसी दैनिक भास्कर के 2 अगस्त के प्रथम पृष्ठ पर रजनीगंधा का विज्ञापन छापा है।
सवाल ये उठता है कि आखिर किसकी रिपोर्ट सही है? दैनिक भास्कर को मिली रिपोर्ट, जिसके आधार पर उसने मुहिम पर और अधिक जोर दिया है या फिर रजनीगंधा की ओर से उल्लेखित रिपोर्ट, जो कि बाकायदा विज्ञापन के जरिए बता रहा है कि उसके उत्पाद में न तम्बाकू है और न ही निकोटिन। इसलिए अपने पसंदीदा रजनीगंधा पान मसाला की शुद्धता का आनंद पूरे विश्वास के साथ लीजिए। एक ही संस्थान भला दो तरह की विरोधाभासी रिपोर्ट कैसे जारी कर सकता है? जरूर कोई घालमेल है। उससे भी अफसोसनाक ये कि जो समाचार पत्र पान मसाला विरोधी मुहिम का श्रेय ले रहा है और उत्पाद विशेष का हवाला दे रहा है, वह भला कैसे उसी पान मसाला का विज्ञापन छाप रहा है। ऐसा करके खुद भास्कर ने अपनी ही खबर का खंडन कर दिया है। मगर इससे पाठक तो भ्रमित हो रहा है। वह भला कहां जाए? उसे असलियत कौन बताएगा?
इतना ही नहीं इससे तो गुटका गोवा 1000, गुटका आरएमडी, खैनी राजा व खैनी चैनी-खैनी के बारे में छपी रिपोर्ट पर भी संदेह होता है, जिसमें बताया गया है कि उनमें क्रमश: 2.04, 1.88, 1.02 व .58 प्रतिशत निकोटिन है। और इस तरह से दैनिक भास्कर की वह मुहिम ही सिरे से खारिज होती नजर आ रही है, जिसके अनुसार सादा पान मसाला में भी निकोटिन मौजूद है, अत: उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए।
दैनिक भास्कर में छपा रजनीगंधा का विज्ञापन
यहां बता दें कि भास्कर ने अपनी खबर में बताया है कि बाजार में जीरो टोबेको के नाम से बिक रहे मशहूर ब्रांडों के पान मसाला भी गुटखा और तंबाकू जितने ही खतरनाक हैं। इनमें गुटखा और तंबाकू उत्पादों से कहीं ज्यादा मात्रा में निकोटिन पाया गया है, जबकि यह जीरो प्रतिशत होना चाहिए। यह खुलासा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सिफारिश पर केंद्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान सीटीआरआई, राजमुंदरी की जांच रिपोर्ट में हुआ। सीटीआरआई ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सिफारिश पर बाजार में मौजूद पान मसाला, तंबाकू और गुटखा उत्पादों के सैंपल लेकर निकोटिन की मात्रा की जांच की थी। रजनीगंधा में 2.26 प्रतिशत निकोटिन पाया गया, जो सभी सैंपलों में सबसे ज्यादा था। सीटीआरआई तंबाकू पर शोध करने वाली केंद्र सरकार की सर्वोच्च संस्था है। यह संस्थान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद आईसीएआर के अधीन काम करता है। इसकी रिपोर्ट विश्वसनीय मानी जाती है।
दैनिक भास्कर के तीन अगस्त की खबर में भी इसी बात पर जोर दिया जा गया है कि राज्य सरकार की ओर से गुटखे पर लगाई गई पाबंदी के आदेशों में हर उस खाद्य पदार्थ पर बैन है, जिसमें निकोटिन मिला है। इसके बावजूद प्रदेश में ऐसे पान मसाले की बिक्री खुले आम की जा रही है, जिनकी जांच में खतरनाक निकोटिन की पुष्टि हो चुकी है। सरकार अब इसे यह कहकर टाल रही है कि केंद्रीय कानून फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट में संशोधन किए बिना रोक संभव नहीं है, लेकिन सरकार के आदेश में स्पष्ट है कि वे खाद्य पदार्थ, जिनमें निकोटिन है उनके भंडारण, उत्पादन व बिक्री पर रोक रहेगी।
लब्बोलुआब, बड़ा सवाल ये है कि जब सादा पान मसालों में निकोटिन होने की रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लग गया है तो दैनिक भास्कर की इस मुहिम के मायने ही क्या रह जाते हैं?
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

आज लिखने-कहने को कुछ भी नहीं है......

आज लिखने-कहने को कुछ भी नहीं है......और कुछ है भी भीतर से कुछ भी उगलने का मन भी नहीं है....मन आज खट्टा है.....कल से ही हो चूका था 
.....अन्ना-आन्दोलन की समाप्ति की घोषणा ने लाखों-करोडों लोगों की आशाओं पर तुषारापात कर दिया है,इससे यह भी साबित है कि फेस-बुक पर हमारे टायं-टायं करने भर से हम किसी आन्दोलन का हिस्सा नहीं बन सकते....जिस किसी भी जगह पर हम हैं,उसके समर्थन में सड़क पर आ जाने पर ही वह आन्दोलन सफल हो सकता है....जो सरकार या प्रशासन सामान्य-सी नागरिक सुविधाओं को सुचारू रूप से जारी बनाए रखने के लिए अपने नागरिकों का आन्दोलन करने या सड़क पर उतरने का इंतज़ार करता है.....वो भ्रष्टाचार जैसे अपने से जुड़े अभिन्न मुद्दे पर महज कुछेक हज़ार लोगों के खड़े हो जाने पर जागेगा....!!??ऐसी अपेक्षा करना हमारी मूर्खता है.....जिसका परिणाम सामने है.....अब आगे हमारे सामने बस एक ही चारा है........करो.....या मरो......!!  

2.8.12

अन्ना, जनलोकपाल और राजनीति !



भ्रष्टाचार के खिलाफ एक और लड़ाई का अधूरा अंत हो गया...हालांकि इस लड़ाई के नायक अन्ना हजारे कहते हैं कि राजनीति से गंदगी को हटाना है तो राजनीति में ही जाना होगा...या यूं उऩकी बात को समझ लें कि अच्छे लोगों को चुनने का विकल्प जनता के सामने लाना होगा...लेकिन अन्ना ये क्यों भूल गए कि जिस विकल्प की वे बात कर रहे हैं...उसे सामने लाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है...वो भी इतने कम समय में जब डेढ़ साल बाद देश में आम चुनाव होने हैं। माना वो इस चुनौती को पार पा भी लेते हैं तो उससे भी बड़ा सवाल ये है कि उस अलोकप्रिय विकल्प (उम्मीदवार) पर उस क्षेत्र की जनता क्यों भरोसा करेगी...क्यों उसे वोट देकर संसद भेजेगी। हां अन्ना की टीम के कुछ लोकप्रिय सदस्यों मसलन अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसौदिया, कुमार विश्वास आदि भले ही अपनी लोकप्रियता को भुना भी ले जाते हैं तो क्या गारंटी है कि बाकी के अलोकप्रिय विकल्प लोगों के लिए वाकई में एक बेहतर विकल्प बन पाएंगे। ऐसी कई और चुनौतियां...जैसे चुनाव के लिए पैसे का इंतजाम, ग्रामसभा से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपने ईमानदार जुझारू कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी करना आदि टीम अन्ना के सामने आएंगी अगर वे राजनीति में उतरने की बात को अमली जामा पहनाते हैं तो। खैर ये तो वो बातें है चुनौतियां हैं जो फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं...लेकिन सबसे बड़ा सवाल वर्तमान में ये है कि जंतर मंतर पर जनलोकपाल के न आने तक जान देने का दम भरने वाले अन्ना को आखिर ऐसी क्या आफत आन पड़ी कि बीच राह में आर पार की लड़ाई के आंदोलन से अन्ना को कदम पीछे खींचने पड़ गए। अन्ना के पैर पीछे खींचने से उनके समर्थकों के साथ ही भ्रष्टाचार के त्रस्त उन करोड़ों देशवासियों को भी झटका लगा है जिन्हें लगने लगा था कि अन्ना ही वो शख्स हैं जो भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए सरकार को जनलोकपाल लाने पर मजबूर कर सकते हैं। शायद आंदोलन के नौ दिन बाद भी सरकार की बेरूखी...जानबूझकर आंदोलन को नजरअंदाज करना और केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और गोपाल राय की तबियत ज्यादा बिगड़ना भी इसकी बड़ी वजह हो सकता है...लेकिन आंदोलन से पहले टीम अन्ना ने हर स्थितियों पर मंथन कर कोई वैकल्पिक योजना तैयार की होती तो शायद ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। आंदोलन खत्म करने का अन्ना का ये कदम जहां उनके समर्थकों के साथ ही भ्रष्टाचार से त्रस्त हर उस देशवासी को हैरान और निराश करने वाला है...वहीं केन्द्र सरकार को तो मानो मुंह मांगी मुराद मिल गयी हो। अन्ना के मंच से अनशन समाप्त करने की घोषणा करने के बाद कांग्रेस नेताओं को प्रतिक्रिया से इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि अनशन के खत्म होने का वे कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। जंतर मंतर से शुरू हुई इस अधूरी लड़ाई को अन्ना दूसरे रूप(राजनीति) में जारी रखने की बात तो कर रहे हैं...लेकिन इस लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुंचाना आसान तो बिल्कुल भी नजर नहीं आता। लड़ाई का ये दूसरा रूप कीचड़ का वो दलदल है जहां इंसान भले ही कितना भी कुशल खिलाड़ी क्यों न हो अपने आप को लाख कोशिशों के बाद भी घुटने तक दलदल में डूबने से नहीं बचा पाता...टीम अन्ना को तो ऐसी खिलाड़ियों को खोजने के साथ ही उन्हें खेलना भी सिखाना है...वो भी बहुत कम समय में...जबकि दूसरी तरफ उनके सामने दलदल में पहले से ही बड़े बड़े सूरमा ताल ठोक कर बैठे हैं।











दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

राजनीति से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न


राजनीति  से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न 


टीम अन्ना ने देश के समक्ष प्रश्न रखा है कि क्या राजनीति में आकर ही इस देश में बदलाव की आशा
करनी चाहिए ?इस देश के वर्तमान राजनेता इस तरह संवेदन हिन हो गए हैं कि जनता की इच्छा के
प्रति उन्हें कोई लगाव नहीं रह गया है ?इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे
लोगो से बात नहीं करके ये मूढ़ नेता अहंकारी या राज धर्म से च्युत नहीं हो गए हैं ?
भारत की वर्तमान तस्वीर 
1.करोड़ो लोगो को पीने का पानी,दौ जुन की रोटी और माथे पर छत का कोई बंदोबस्त 
आजादी के बाद से नहीं हो पाया है 
2.शिक्षा की लचर व्यवस्था है ,हजारो गाँवों में शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है 
3.लाखो लोग कुपोषण और भुखमरी के शिकार हैं 
4.स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था निम्न कोटि की है 
5.देश का 97%धन देश के 3%लोगो के हाथ में है 
6.किसान को ना समय पर उचित कीमत पर बीज  उपलब्ध है और ना ही बिजली .
किसान गरीब होता जा रहा है ,देश का पेट भरने वाला किसान खुद आत्महत्या करने 
के लिये मजबूर हो गया है 
7. हर काम के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है 
8.राजनेता भ्रष्ट होते जा रहे हैं
9.राजनीती को पैसा बनाने का सुगम रास्ता बना दिया गया है 
10.राजनेता और बड़े उद्योगपति मिलकर भ्रष्टचार कर रहे हैं।
11.टैक्स की मार से जनता बेहाल है 
12.जनता राजनेताओ के घटिया चरित्र का अनुकरण करने को मजबूर होती जा रही है 
13.राजनीती में परिवारवाद का रोग फैल चुका है 
14.स्वार्थी राजनेता देश हित को गौण बनाते जा रहे हैं 
15.भारत की संस्कृति का जानबूझ कर ह्रास किया जा रहा है 
16.भारतियों को जाती,धर्म ,अगड़े-पिछड़े में बांट कर राजनेता अपना-अपना उल्लू 
सीधा कर रहे हैं 
17.गरीब भारतीयों को टैक्स के घेरे में लेकर लुटा जा रहा है और अमीर भारतीयों को 
अपरोक्ष रूप से छुट दी जा रही है 
18.कानून का पालन सिर्फ गरीब भारतीयों को करना है यदि कोई मजबूर होकर या पेट 
भरने के लिए चोरी जैसा घ्रणित काम करता है तो उसके लिए दंड का विधान है मगर 
अमीर लोग उस कानून को ठेंगा दिखा देते हैं 
19.जनकल्याण की योजनाओं के नाम पर  सरकारी अमला जनता के धन को लुट 
रहा है और सरकार वोटो के लालच में अनुपयोगी योजनाओं को चालु रखती है 
20.आतंकवाद से लड़ने के लिए कोई ठोस कदम सरकार नहीं उठा पायी है .बम्ब 
विस्फोट और आतंकी घटनाओं में जनता मारी जाती है 
21.हर समस्या को अनदेखा किया जा रहा है या जांच बैठाने की बात कहकर उस समस्या 
पर पर्दा डाल  दिया जाता है 
22छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीयों में भेदभाव किया जा रहा है 


इस देश में समस्याएँ बहुत है ,इलाज नहीं है।कुछ लोग गांधीवादी विचारधारा से दौ-दौ हाथ करते हैं
तब सारे दल एक जुट होकर उनका मखोल उड़ाते हैं .ऐसे प्रतिकूल समय में क्या करे भारतीय ,यह
प्रश्न है।
अन्ना टीम इस प्रश्न का हल राजनीती में आकर करना चाहती है ,शायद यह ठीक भी है क्योंकि
देश के संविधान में जरुरी परिवर्तन की अति आवश्यकता है जिसे देश हित की सोच वाले लोग
मिलकर ही कर सकते हैं
टीम अन्ना का यह निर्णय देश को नयी आशा देता है ,नई रौशनी देता है .हम अपने देश की पहचान
भ्रष्ट देश के रूप में सहन नहीं कर सकते .    

संगत का असर


संगत का असर 


एक वाटिका में कुछ गमलों में काफी पौधे लगे थे .एक श्रद्धालु महिला नियम पूर्वक उस
वाटिका में आती और तुलसी के गमले में लगी तुलसी की रोली  अक्षत से पूजा करती .
एक बच्चा नियमित रूप से उस महिला को पूजा करते देखता था .एक दिन उसने उस
महिला से पूछा -आंटी ,आप रोज किसकी पूजा करने आती है ?
महिला ने जबाब दिया-तुलसी की .
बच्चा बोला - आंटी, आप तुलसी की पूजा करती हैं या उसके बिलकुल पास में लगे ग्वार भाटे
के पौधे की ....
महिला ने देखा वह प्रतिदिन जिस गमले में लगी तुलसी की रोज पूजा करती है उस गमले के
पास में ग्वार भाटे का गमला रखा है ,जब वह तुलसी के रोली और अक्षत चढ़ाती है तब पास
के गमले में लगे ग्वार भाटे के पौधे पर भी रोली के छींटे लग जाते थे और अक्षत भी उस पर
गिर जाते थे .उस महिला ने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा -बेटा,मैं पूजा तो तुलसी की
ही प्रतिदिन करती हूँ परन्तु पास के गमले पर रोली और अक्षत अनजाने में ही लग जाते हैं ,
तुम इससे एक बात सीख सकते हो ?
बच्चा बोला- मैं क्या बात सीख सकता हूँ ?
महिला बोली- अच्छे लोगो की संगत करना .ये ग्वार भाटे का कंटीला पौधा तुलसी की संगती में
रहने के कारण अकारण ही पूजा जाने लगा ,यदि मनुष्य सिर्फ अपनी संगती सुधार ले और
सज्जन और विद्धवानो की संगती में रहने लग जाए तो संसार में पूजा जा सकता है .
 

1.8.12

शिंदे...पावर और धमाका !


शिंदे...पावर और धमाका !

सुशील कुमार शिंदे का ओहदा जरूर बढ़ गया...लेकिन जिन हालात में शिंदे की ऊर्जा मंत्रालय से विदाई हुई...और गृह मंत्रालय में शिंदे का पहला दिन रहा...उसे शिंदे तो शायद ही कभी भूल पाएंगे। ऊर्जा मंत्रालय में आखिरी दिन पावर ग्रिड फेल होने से जब आधा भारत अंधेरे में डूब गया तो शिंदे के चेहरे की हवाईयां उड़ गयी थी...लेकिन ऊर्जा मंत्रालय के प्रमुख से जवाब तलब करने की बजाए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साहब ने शिंदे को गृह मंत्री बनाकर मानो शिंदे को इसका ईनाम दे दिया हो...कि शिंदे तुमने तो 24 घंटे में नार्दर्न, ईस्टर्न और नार्थ ईस्टर्न तीन ग्रिड को एकसाथ फेल कर वाकई में कमाल कर दिया। शिंदे जानते थे कि ग्रिड फेल होने पर जवाब तो देना ही पड़ेगा लिहाजा उन्होंने देर नहीं कि और अगले दिन सुबह ही गृह मंत्रालय पहुंचकर गृह मंत्री की कुर्सी संभाल ली...लेकिन शिंदे यहां भी नहीं बच पाए और पुणे में एक के बाद एक चार धमाकों ने रही सही कसर पूरी कर दी...अब जवाब तो देना ही था...पावर ग्रिड फेल होने पर मंत्रालय बदल जाने से वहां तो बच गए थे...लेकिन यहां नहीं बच पाए। कहने को उनके पास कुछ था भी नहीं सो जांच की बात कर बचने की कोशिश करते दिखाई दिए। बहरहाल जो भी हो पुणे में रमजान के माह में औऱ रक्षा बंधन से ठीक एक दिन पहले सीरियल ब्लास्ट ने एक बार फिर से खुफिया एजेंसियों के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल के रख दी है। आम आदमी कितना सुरक्षित है इसका अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि आतंकी आसानी से कहीं भी बम रख कर चले जाते हैं...और खुफिया एजेंसियों के साथ ही पुलिस प्रशासन धमाके के बाद हरकत में आते दिखाई देते हैं...हालांकि इस बार अच्छी खबर ये रही कि इन धमाकों में किसी की जान नहीं गयी...और न ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ है...लेकिन विडंबना ये भी है कि इस बात की खैर मनाकर कि कोई हताहत नहीं हुआ है...हमारी सरकार राहत की सांस लेती है...और जांच के बहाने ये मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं....बजाए इसके की आगे से ऐसी घटनाएं न हो...दोषियों की गिरफ्तारी हो औऱ उन्हें सजा हो। चिदंबरम साहब के बाद शिंदे साहब ने गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली है तो उम्मीद शिंदे साहब से भी है कि आम नागरिक की सुरक्षा के साथ कम से कम खिलवाड़ न हो और ऐसी घटनाओं को कम से कम रोकने की पूरी कोशिश तो की ही जाए...लेकिन जिस तरह से शिंदे साहब का गृह मंत्रालय संभालते ही और उनके पुणे दौरे से ऐन पहले चार सीरियल बम ब्लास्ट से स्वागत हुआ है...उसके बाद शिंदे साहब के लिए आम भारतीय की सुरक्षा और ऐसी घटनाओं को होने से रोकना किसी मुश्किल चुनौती से कम नहीं है। हम तो बस यही दुआ कर सकते हैं कि आतंकी अपने नापाक ईरादों में कभी कामयाब न हों...और हिंदुस्तान में हर कोई बिना किसी डर के रह सके...बिना डर के कहीं भी आ जा सके...गुड लक शिंदे साहब गुड लक।  
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

बिहार में सुशासन-मिथक या यथार्थ-ब्रज की दुनिया

मित्रों,आपकी नजर में सुशासन का मतलब क्या है,शायद अच्छा शासन लेकिन बिहार सरकार की दृष्टि में सुशासन का यह मतलब कतई नहीं है.इस महान व ऐतिहासिक प्रदेश की सरकार दुनिया के सारे शब्दकोशों से विलग मानती है कि सुशासन का अर्थ है भ्रष्टाचार को छिपा लेना जिससे जनता और खासकर प्रदेश के बाहर की जनता की निगाहों में शासकीय कालीन के नीचे दबी गंदगी न आने पाए.
           मित्रों,राज्य सरकार द्वारा अपने पक्ष में जोरदार प्रचार-प्रसार करने के कारण शायद आपको यकीन नहीं आ रहा होगा परन्तु मेरा सच सोलहो आने सच है.जबसे प्रदेश में नीतीश सरकार का पदार्पण हुआ है "ऊपर से फिट फाट भीतर से सिमरिया घाट" वाला खेल चल रहा है.शासकीय पारदर्शिता की लौ को मद्धिम करने के प्रयास वर्ष २००५ से ही लगातार यत्नपूर्वक किए जा रहे हैं.इस दिशा में सरकार ने पहली कोशिश की सूचना के अधिकार के तहत अपील को मुश्किल बनाकर.संसद द्वारा पारित मूल अधिनियम के तहत जहाँ अपील करने पर कोई फीस नहीं देनी पड़ती है वहीं नीतीश सरकार ने देश के इस सबसे गरीब राज्य की जनता के लिए यह प्रावधान बिहार सूचना का अधिकार नियमावली २००६ के अंतर्गत कर दिया कि उसे अपील में जाने पर ५० रूपये की अतिरिक्त मोटी फीस अदा करनी पड़ेगी.जाहिर है कि सरकार सूचना प्राप्त करने की कोशिशों को हतोत्साहित करना चाहती थी.इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए राज्य सरकार ने लगातार दूसरी बार मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर आई.ए.एस. अधिकारी की नियुक्ति कर दी है.अब शायद राज्य में यह रवायत ही बन जाए कि राज्य का पूर्व मुख्य सचिव मुख्य सूचना आयुक्त होगा.ये पूर्व आई.ए.एस. अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाने से ज्यादा अपीलों को ख़ारिज (निरस्त) करने में ज्यादा यकीन रखते हैं.राज्य के पिछले सी.आई.सी. ए.के. चौधरी ने करीब ३०००० अपीलों को बिना किसी ठोस आधार के निरस्त कर दिया.यह स्वाभाविक है कि अगर किसी प्रबुद्ध नागरिक की अपील बेवजह ठुकरा दी जाती है तो वह शायद ही अपने समय,धन और श्रम की बर्बादी करके दोबारा सूचना मांगने का साहस कर पाएगा.
                मित्रों,दिखावे के लिए सरकार ने जानकारी नामक सेवा भी चला रखी है जिसके तहत फोन पर ही सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार किए जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इस प्रक्रिया के तहत कभी कोई भी जानकारी प्रार्थी को नहीं प्राप्त हो पाती क्योंकि तत्संबंधी तंत्र को विकसित ही नहीं किया गया है.वैसे मैंने तो सैंकड़ों बार इस नंबर १५५३११ पर फोन लगाने का प्रयास किया परन्तु फोन कभी लगा ही नहीं.जाने वे कौन लोग हैं और कैसे लोग हैं जिनका फोन मिल जाया करता है?
                मित्रों,अगर आप बिहार में रहते हैं तो रोजाना राज्य के प्रमुख अख़बारों में पढ़ते होंगे कि आज अमुक अधिकारी पर सूचना के अधिकार के तहत निर्धारित समय में सूचना उपलब्ध नहीं करवाने के कारण इतने रूपये का जुर्माना किया गया.परन्तु क्या वह जुर्माना उनसे सचमुच में वसूल भी किया जाता है?यक़ीनन नहीं किया जाता.जुर्माना आदि सब दिखावा है.उदाहरण के लिए वित्तीय वर्ष २०११-१२ में राज्य के विभिन्न अधिकारियों पर इस अधिनियम के तहत ८.३१ लाख रूपये का जुर्माना किया गया मगर वसूली की गयी सिर्फ ३२००० रूपये की.इसके लिए जिम्मेदार कौन है निश्चित रूप से राज्य सूचना आयोग जिसका मुखिया स्वयं एक पूर्व अधिकारी होने के नाते अपने मौसेरे भाइयों के खिलाफ (नया मुहावरा अफसर अफसर मौसेरे भाई) सख्त कदम नहीं उठाता और जुर्मानेवाली बात सिर्फ अख़बारों की सुर्खियाँ बनकर रह जाती हैं.प्रार्थी भी पढ़कर खुश हो लेता है कि जुर्माना तो हुआ.दिल को बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है.
                  मित्रों,सूचना के अधिकार को कौनहारा घाट पहुँचाने के बाद अब राज्य सरकार ने एक अनोखी पहल करते हुए आदेश जारी किया है कि सरकारी व्यय से सम्बंधित एसी-डीसी बिल की जाँच महालेखाकार (ए.जी.) नहीं करेगा बल्कि खुद राज्य सरकार के कर्मचारी यानि कोषागार के अधिकारी करेंगे.यह तो वही बात हुई कि परीक्षार्थी खुद ही अपनी काँपियाँ जाँचें.इसे कहते हैं वास्तविक सुशासन.अद्भुत,चमत्कारिक आइडिया.न भविष्य में कहीं कोई आर्थिक अनियमितता पकड़ में आएगी और न ही सरकार को शर्मिंदगी ही उठानी पड़ेगी.परन्तु क्या इससे या ऐसा करने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा?क्या इससे उसे और भी बढ़ावा नहीं मिलेगा?जिस तरह शुतुरमुर्ग के बालू में सिर छिपा लेने से आसन्न खतरा टल नहीं जाता अथवा जैसे कबूतरी द्वारा आँखें बंद कर लेने से बिल्ला उसे छोड़ नहीं देता उसी प्रकार सरकार द्वारा ऑंखें बंद कर लेने से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की सेहत पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता उलटे उनका मनोबल बढ़ता है.सरकार के इस कदम से हम यह सोंचने के लिए भी बाध्य होते हैं कि क्या यह उसी नीतीश कुमार की सरकार द्वारा उठाया गया कदम है जिन्होंने कभी खुलकर अन्ना आन्दोलन का समर्थन किया था?
                    मित्रों,इस आलेख को पढने के बाद आप यह समझ गए होंगे कि बिहार में सुशासन एक मिथक था और है और आगे भी मिथक ही बना रहेगा.सिर्फ सुशासन-सुशासन का शोर मचाने से या रट्टा लगाने से आज तक दुनिया में न तो कहीं सुशासन आया है और न ही भविष्य में कभी आनेवाला ही है.आज तक बिहार की किसी सरकार में न तो वास्तविक सुशासन लाने की ईच्छाशक्ति थी और न वर्तमान सरकार में ही है. 

जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही


जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही 

प्रसंग मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम से जुडा  है .सीता के अन्वेषण के पश्चात लंका पर धावा करने
की तैयारी थी ,श्रीराम अनुज के साथ पूरी सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँच चुके थे .भगवन राम
समुद्र से विनय कर रहे थे मगर समुद्र रास्ता देने को तैयार नहीं था .राम ने साम नीति का
उपयोग करते हुये अनशन किया मगर तीन दिन बीत जाने के बाद भी समुद्र श्री राम को रास्ता देने
को राजी नहीं हुआ तब श्री राम जो स्वयं मर्यादा पुरषोत्तम थे कि मर्यादा भी टूट गयी और कुटिल,
शठ, अहंकारी के लिए प्रयुक्त की जाने वाली दंड निति का सहारा लेने की घोषणा कर दी .प्राण संकट
में देख समुद्र दंडवत हो गया और अपने ऊपर सेतु बंधवाने को राजी हो गया .

  अन्ना और उसके सिपाही मूढ़ सरकार से एक सशक्त लोकपाल देश के लिए मांग रहे हैं और महीनो से
अपनी मांग रख रहे हैं मगर सरकार एक सशक्त लोकपाल देने का इरादा नहीं रखती ...क्यों ?इसका
कारण देश के सामने स्पष्ट है .आज अन्ना अपने सहयोगियों के साथ भूखे रहकर अनशन कर रहे हैं
और मतिभ्रमित देश के शासक अड़े हुए हैं कि लोकपाल अभी नहीं आना है

यह देश की जनता की सब्र की परीक्षा है मगर कब तक भूखे रहकर परीक्षा देना है क्या संवेदनहीन
सरकार को पाठ पढाने के लिए हर भारतीय को अनशन के लिये उतरना पडेगा?

क्या अन्ना और उसकी टीम खुद के लिए सरकार से कुछ मांग रही है ?क्या लोकपाल के लाने से देश
को विपत्ति से झुझना पड  जाएगा?आखिर इतना अहंकार क्यों ?

जिनको हमने ही गद्दी पर बिठाया आज वो लोग अपने राज धर्म को भूल गए हैं ,जनता के प्रति अपने
कर्तव्यो को भूल गए हैं उनको याद है सिर्फ अपने अधिकार जो जनता ने ही उन्हें सुशासन के लिये दिए
हैं.

कानून संसद में ही बनेगा यह ठीक है ,जनता से चुने हुए प्रतिनिधि ही कानून बनायेंगे यह भी उचित है
मगर कानून जनता की आकांक्षा पर खरा उतरना चाहिए ताकि जन-प्रतिनिधि या सरकारी नौकर पर
उस कानून का कडक रूप से इस्तेमाल हो सके ताकि जनता के धन का दुरूपयोग रुक सके .

अन्ना की निति साम निति है जिसका अभी तक पुरे देश में समर्थन है मगर यदि उन्होंने मर्यादा को
हाथ में ले लिया तब क्या होगा ...जनता को क्रोध में लाने का काम कौन कर रहा है ?

समय हर पापी को उचित दंड देता रहा है और सत्य की स्थापना होती रही है .इस काल में भी सत्य
को रोका नहीं जा सकता है हो सकता है कुछ भारतियों को जान भी जोखिम में डालनी पड़ जाए.
देश के लिए मर मिटने वाले मतवाले कभी भी किसी भी काल में कम नहीं हुए हैं

 अन्ना शायद अपनी शांति की नीति में बदलाव लायेंगे ,कब?यह देखना है।