6.8.12
गर शबाब होता ......
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todaychhattisgarh
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Haiku
[लघु कविता]
* यह तो चिट्ठी है
जिसका इंतज़ार करता हूँ ,
तुम्हें तो जानता हूँ
तुम नहीं आ पाओगे |
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Ugra Nagrik
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Labels: Citizens' blog
5.8.12
जब सारा आलम सो गया । (गीत ।)
जब सारा आलम सो गया । (गीत ।)
जब सारा आलम सो गया, दर्द मेरा ये जाग रहा ।
अंतरा-१.
रात अमा, घना अंधेरा, नज़र न आये कहीं सवेरा ।
अन्तरा-२.
नाकामी की करवट संगत, चीख रहे ये सन्नाटे ।
अंतरा-३.
कलमा भरूँ, सजदा करूं या रहूँ यूँ ही ग़मज़दा ।
अंतरा-४.
अय रात तुम ठहरना ज़रा, अय दिल तुम सँभलना ज़रा ।
Triveni:दोस्ती!
नशा है, जुनूं है, ज़िन्दगी है,बे-मज़हब पर दुरुस्त है.
शराब सी ज्यादा, जरा शातिर कम है ये दोस्ती!
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VIVEK VK JAIN
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4.8.12
करिए करिए शाहा ब्यारी..एक आध्यात्मिक आनंद
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Barun Sakhajee Shrivastav
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ये फुल-टू-फटाक मस्ती लेता हुआ वतन....!!
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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बुडविग प्रोटोकोल के शंसा पत्र (Budwig Protocol Testimonials)
बुडविग प्रोटोकोल के शंसा पत्र (Budwig Protocol Testimonials)
स्तन कैंसर (Breast Cancer)
श्रीमती जीन डी. थोमस उम्र 51 वर्ष वजन 185 पौंड को स्टेज-4 मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर था जो रीढ़ और बांह की हड्डी में फैल चुका था। पिछले वर्ष उसे स्टेज-2बी कैंसर था और 2009 और 10 में उसकी शल्यक्रिया (lumpectomy), कीमो और रेडियो की गई थी। उसे गर्दन, कंधे और पीठ में बहुत दर्द रहता था, जिसके लिए उसे फेन्टेनिल के पेच लेने पड़ते थे। उसे डायबिटीज भी थी। उसने स्पेन के बुडविग सेंटर के डॉ. जेनकिन्स की देखरेख में दिनांक 13 दिसंबर, 2010 से बुडविग उपचार लेना शुरू किया। उसे बहुत जल्दी फायदा हुआ और डेढ़ महीने बाद 5 फरवरी, 2011 को उसने डॉ. जेनकिन को यह पत्र लिखा।
श्रीमती जीन डी. थोमस (wndylynn@comcast.net)
शनिवार, फरवरी 05, 2011 5:18 AM
सेवामें
डॉ. जेनकिन्स,
बुडविग सेंटर, स्पेन
संलग्न – ट्यूमर मार्कर रिपोर्ट
ब्रेन ट्यूमर
बोन कैसर
"डॉक्टर्स ने सहानुभूति जताते हुए मुझसे कहा कि वे मेरे लिए कुछ करने में असमर्थ हैं। पिता की तरह मेरे माथे पर हाथ रख कर कहा कि मेरी स्थिति गंभीर है। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन मैं विचलित नहीं हो रहा था। मैं शुरू से ही धर्म और चर्च से जुड़ा था। मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था। हालांकि मुझे कहा गया था कि मैं मुश्किल से 3 से 6 महींने जी पाऊँगा। कैंसर से मेरा मेरुदंड कमजोर हो चुका था। मेरी रीढ़ की 9 हड्डियां सिकुड़ चुकी थी। इस कारण मेरे कंधे और छाती में बहुत पीड़ा होती थी। हमेशा दर्द-निवारक दवा लेनी पड़ती थी। थोड़े से झटके या दबाव से हड्डी टूटने का खतरा बना रहता था।
डॉ. केली ने मुझे बुडविग उपचार और एंजाइम्स लेने की सलाह दी। मैंने गंभीरता से इस उपचार लेना शुरू किया। एक साल बाद मेरी हालत में बहुत सुधार आया। मैंने पुनः अपनी धार्मिक गतिविधियां और यात्राएं शुरू कर दी।
बोन कैसर
(डॉ. बुडविग की पुस्तक डर टोड डेस ट्यूमर्स – II से [The Death of the Tumor, vol. 2])
टांग की हड्डी में सारकोमा (p. 28)
चेहरे की हड्डी का कैंसर (p. 36)
ब्रेस्ट कैंसर
ब्रेस्ट कैंसर
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Shri Sitaram Rasoi
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3.8.12
दैनिक भास्कर व रजनीगंधा में से कौन सच्चा, कौन झूठा?
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| दैनिक भास्कर में छपी खबर के साथ दी गई वह रिपोर्ट |
पान मसाले पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की दैनिक भास्कर की मुहिम के बीच एक विरोधाभासी मगर साथ ही हास्यास्पद तथ्य उभर कर सामने आया है। विरोधाभासी इसलिए कि एक ओर दैनिक भास्कर को मिली केन्द्रीय तंबाकू अनुसंधान संस्थान उर्फ सीटीआरआई, राजमुंदरी में बताया गया है कि पान मसाला रजनीगंधा में 2.26 प्रतिशत निकोटिन है, जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, जबकि दूसरी ओर रजनीगंधा ने एक विज्ञापन जारी कर खुलासा किया है कि सेंट्रल टोबेको रिसर्च इंस्टीट्यूट-इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकलचर, राजुमंदरी से यह प्रमाणित हो चुका है कि उनके उत्पाद में निकोटिन नहीं है। असल में ये संस्थान और इंस्टिट्यूट एक ही हैं, केवल हिंदी और अंग्रेजी में नाम का फर्क है। और हास्यास्पद इसलिए कि जिस पान मसाला विरोधी मुहिम के तहत दैनिक भास्कर ने 29 जुलाई के अंक में रजनीगंधा सहित अन्य पान मसालों के बारे में रिपोर्ट छापी है, उसी दैनिक भास्कर के 2 अगस्त के प्रथम पृष्ठ पर रजनीगंधा का विज्ञापन छापा है।
सवाल ये उठता है कि आखिर किसकी रिपोर्ट सही है? दैनिक भास्कर को मिली रिपोर्ट, जिसके आधार पर उसने मुहिम पर और अधिक जोर दिया है या फिर रजनीगंधा की ओर से उल्लेखित रिपोर्ट, जो कि बाकायदा विज्ञापन के जरिए बता रहा है कि उसके उत्पाद में न तम्बाकू है और न ही निकोटिन। इसलिए अपने पसंदीदा रजनीगंधा पान मसाला की शुद्धता का आनंद पूरे विश्वास के साथ लीजिए। एक ही संस्थान भला दो तरह की विरोधाभासी रिपोर्ट कैसे जारी कर सकता है? जरूर कोई घालमेल है। उससे भी अफसोसनाक ये कि जो समाचार पत्र पान मसाला विरोधी मुहिम का श्रेय ले रहा है और उत्पाद विशेष का हवाला दे रहा है, वह भला कैसे उसी पान मसाला का विज्ञापन छाप रहा है। ऐसा करके खुद भास्कर ने अपनी ही खबर का खंडन कर दिया है। मगर इससे पाठक तो भ्रमित हो रहा है। वह भला कहां जाए? उसे असलियत कौन बताएगा?
इतना ही नहीं इससे तो गुटका गोवा 1000, गुटका आरएमडी, खैनी राजा व खैनी चैनी-खैनी के बारे में छपी रिपोर्ट पर भी संदेह होता है, जिसमें बताया गया है कि उनमें क्रमश: 2.04, 1.88, 1.02 व .58 प्रतिशत निकोटिन है। और इस तरह से दैनिक भास्कर की वह मुहिम ही सिरे से खारिज होती नजर आ रही है, जिसके अनुसार सादा पान मसाला में भी निकोटिन मौजूद है, अत: उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए।
| दैनिक भास्कर में छपा रजनीगंधा का विज्ञापन |
दैनिक भास्कर के तीन अगस्त की खबर में भी इसी बात पर जोर दिया जा गया है कि राज्य सरकार की ओर से गुटखे पर लगाई गई पाबंदी के आदेशों में हर उस खाद्य पदार्थ पर बैन है, जिसमें निकोटिन मिला है। इसके बावजूद प्रदेश में ऐसे पान मसाले की बिक्री खुले आम की जा रही है, जिनकी जांच में खतरनाक निकोटिन की पुष्टि हो चुकी है। सरकार अब इसे यह कहकर टाल रही है कि केंद्रीय कानून फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट में संशोधन किए बिना रोक संभव नहीं है, लेकिन सरकार के आदेश में स्पष्ट है कि वे खाद्य पदार्थ, जिनमें निकोटिन है उनके भंडारण, उत्पादन व बिक्री पर रोक रहेगी।
लब्बोलुआब, बड़ा सवाल ये है कि जब सादा पान मसालों में निकोटिन होने की रिपोर्ट पर ही सवालिया निशान लग गया है तो दैनिक भास्कर की इस मुहिम के मायने ही क्या रह जाते हैं?
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com
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तेजवानी गिरधर
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आज लिखने-कहने को कुछ भी नहीं है......
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राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ )
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2.8.12
अन्ना, जनलोकपाल और राजनीति !
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राजनीति से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न
राजनीति से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न
टीम अन्ना ने देश के समक्ष प्रश्न रखा है कि क्या राजनीति में आकर ही इस देश में बदलाव की आशा
करनी चाहिए ?इस देश के वर्तमान राजनेता इस तरह संवेदन हिन हो गए हैं कि जनता की इच्छा के
प्रति उन्हें कोई लगाव नहीं रह गया है ?इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे
लोगो से बात नहीं करके ये मूढ़ नेता अहंकारी या राज धर्म से च्युत नहीं हो गए हैं ?
भारत की वर्तमान तस्वीर
1.करोड़ो लोगो को पीने का पानी,दौ जुन की रोटी और माथे पर छत का कोई बंदोबस्त
आजादी के बाद से नहीं हो पाया है
2.शिक्षा की लचर व्यवस्था है ,हजारो गाँवों में शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है
3.लाखो लोग कुपोषण और भुखमरी के शिकार हैं
4.स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था निम्न कोटि की है
5.देश का 97%धन देश के 3%लोगो के हाथ में है
6.किसान को ना समय पर उचित कीमत पर बीज उपलब्ध है और ना ही बिजली .
किसान गरीब होता जा रहा है ,देश का पेट भरने वाला किसान खुद आत्महत्या करने
के लिये मजबूर हो गया है
7. हर काम के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है
8.राजनेता भ्रष्ट होते जा रहे हैं
9.राजनीती को पैसा बनाने का सुगम रास्ता बना दिया गया है
10.राजनेता और बड़े उद्योगपति मिलकर भ्रष्टचार कर रहे हैं।
11.टैक्स की मार से जनता बेहाल है
12.जनता राजनेताओ के घटिया चरित्र का अनुकरण करने को मजबूर होती जा रही है
13.राजनीती में परिवारवाद का रोग फैल चुका है
14.स्वार्थी राजनेता देश हित को गौण बनाते जा रहे हैं
15.भारत की संस्कृति का जानबूझ कर ह्रास किया जा रहा है
16.भारतियों को जाती,धर्म ,अगड़े-पिछड़े में बांट कर राजनेता अपना-अपना उल्लू
सीधा कर रहे हैं
17.गरीब भारतीयों को टैक्स के घेरे में लेकर लुटा जा रहा है और अमीर भारतीयों को
अपरोक्ष रूप से छुट दी जा रही है
18.कानून का पालन सिर्फ गरीब भारतीयों को करना है यदि कोई मजबूर होकर या पेट
भरने के लिए चोरी जैसा घ्रणित काम करता है तो उसके लिए दंड का विधान है मगर
अमीर लोग उस कानून को ठेंगा दिखा देते हैं
19.जनकल्याण की योजनाओं के नाम पर सरकारी अमला जनता के धन को लुट
रहा है और सरकार वोटो के लालच में अनुपयोगी योजनाओं को चालु रखती है
20.आतंकवाद से लड़ने के लिए कोई ठोस कदम सरकार नहीं उठा पायी है .बम्ब
विस्फोट और आतंकी घटनाओं में जनता मारी जाती है
21.हर समस्या को अनदेखा किया जा रहा है या जांच बैठाने की बात कहकर उस समस्या
पर पर्दा डाल दिया जाता है
22छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीयों में भेदभाव किया जा रहा है
इस देश में समस्याएँ बहुत है ,इलाज नहीं है।कुछ लोग गांधीवादी विचारधारा से दौ-दौ हाथ करते हैं
तब सारे दल एक जुट होकर उनका मखोल उड़ाते हैं .ऐसे प्रतिकूल समय में क्या करे भारतीय ,यह
प्रश्न है।
अन्ना टीम इस प्रश्न का हल राजनीती में आकर करना चाहती है ,शायद यह ठीक भी है क्योंकि
देश के संविधान में जरुरी परिवर्तन की अति आवश्यकता है जिसे देश हित की सोच वाले लोग
मिलकर ही कर सकते हैं
टीम अन्ना का यह निर्णय देश को नयी आशा देता है ,नई रौशनी देता है .हम अपने देश की पहचान
भ्रष्ट देश के रूप में सहन नहीं कर सकते .
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संगत का असर
संगत का असर
एक वाटिका में कुछ गमलों में काफी पौधे लगे थे .एक श्रद्धालु महिला नियम पूर्वक उस
वाटिका में आती और तुलसी के गमले में लगी तुलसी की रोली अक्षत से पूजा करती .
एक बच्चा नियमित रूप से उस महिला को पूजा करते देखता था .एक दिन उसने उस
महिला से पूछा -आंटी ,आप रोज किसकी पूजा करने आती है ?
महिला ने जबाब दिया-तुलसी की .
बच्चा बोला - आंटी, आप तुलसी की पूजा करती हैं या उसके बिलकुल पास में लगे ग्वार भाटे
के पौधे की ....
महिला ने देखा वह प्रतिदिन जिस गमले में लगी तुलसी की रोज पूजा करती है उस गमले के
पास में ग्वार भाटे का गमला रखा है ,जब वह तुलसी के रोली और अक्षत चढ़ाती है तब पास
के गमले में लगे ग्वार भाटे के पौधे पर भी रोली के छींटे लग जाते थे और अक्षत भी उस पर
गिर जाते थे .उस महिला ने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा -बेटा,मैं पूजा तो तुलसी की
ही प्रतिदिन करती हूँ परन्तु पास के गमले पर रोली और अक्षत अनजाने में ही लग जाते हैं ,
तुम इससे एक बात सीख सकते हो ?
बच्चा बोला- मैं क्या बात सीख सकता हूँ ?
महिला बोली- अच्छे लोगो की संगत करना .ये ग्वार भाटे का कंटीला पौधा तुलसी की संगती में
रहने के कारण अकारण ही पूजा जाने लगा ,यदि मनुष्य सिर्फ अपनी संगती सुधार ले और
सज्जन और विद्धवानो की संगती में रहने लग जाए तो संसार में पूजा जा सकता है .
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Labels: bodh katha
1.8.12
शिंदे...पावर और धमाका !
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बिहार में सुशासन-मिथक या यथार्थ-ब्रज की दुनिया
मित्रों,आपकी नजर में सुशासन का मतलब क्या है,शायद अच्छा शासन लेकिन बिहार सरकार की दृष्टि में सुशासन का यह मतलब कतई नहीं है.इस महान व ऐतिहासिक प्रदेश की सरकार दुनिया के सारे शब्दकोशों से विलग मानती है कि सुशासन का अर्थ है भ्रष्टाचार को छिपा लेना जिससे जनता और खासकर प्रदेश के बाहर की जनता की निगाहों में शासकीय कालीन के नीचे दबी गंदगी न आने पाए.
मित्रों,राज्य सरकार द्वारा अपने पक्ष में जोरदार प्रचार-प्रसार करने के कारण शायद आपको यकीन नहीं आ रहा होगा परन्तु मेरा सच सोलहो आने सच है.जबसे प्रदेश में नीतीश सरकार का पदार्पण हुआ है "ऊपर से फिट फाट भीतर से सिमरिया घाट" वाला खेल चल रहा है.शासकीय पारदर्शिता की लौ को मद्धिम करने के प्रयास वर्ष २००५ से ही लगातार यत्नपूर्वक किए जा रहे हैं.इस दिशा में सरकार ने पहली कोशिश की सूचना के अधिकार के तहत अपील को मुश्किल बनाकर.संसद द्वारा पारित मूल अधिनियम के तहत जहाँ अपील करने पर कोई फीस नहीं देनी पड़ती है वहीं नीतीश सरकार ने देश के इस सबसे गरीब राज्य की जनता के लिए यह प्रावधान बिहार सूचना का अधिकार नियमावली २००६ के अंतर्गत कर दिया कि उसे अपील में जाने पर ५० रूपये की अतिरिक्त मोटी फीस अदा करनी पड़ेगी.जाहिर है कि सरकार सूचना प्राप्त करने की कोशिशों को हतोत्साहित करना चाहती थी.इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए राज्य सरकार ने लगातार दूसरी बार मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर आई.ए.एस. अधिकारी की नियुक्ति कर दी है.अब शायद राज्य में यह रवायत ही बन जाए कि राज्य का पूर्व मुख्य सचिव मुख्य सूचना आयुक्त होगा.ये पूर्व आई.ए.एस. अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाने से ज्यादा अपीलों को ख़ारिज (निरस्त) करने में ज्यादा यकीन रखते हैं.राज्य के पिछले सी.आई.सी. ए.के. चौधरी ने करीब ३०००० अपीलों को बिना किसी ठोस आधार के निरस्त कर दिया.यह स्वाभाविक है कि अगर किसी प्रबुद्ध नागरिक की अपील बेवजह ठुकरा दी जाती है तो वह शायद ही अपने समय,धन और श्रम की बर्बादी करके दोबारा सूचना मांगने का साहस कर पाएगा.
मित्रों,दिखावे के लिए सरकार ने जानकारी नामक सेवा भी चला रखी है जिसके तहत फोन पर ही सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार किए जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इस प्रक्रिया के तहत कभी कोई भी जानकारी प्रार्थी को नहीं प्राप्त हो पाती क्योंकि तत्संबंधी तंत्र को विकसित ही नहीं किया गया है.वैसे मैंने तो सैंकड़ों बार इस नंबर १५५३११ पर फोन लगाने का प्रयास किया परन्तु फोन कभी लगा ही नहीं.जाने वे कौन लोग हैं और कैसे लोग हैं जिनका फोन मिल जाया करता है?
मित्रों,अगर आप बिहार में रहते हैं तो रोजाना राज्य के प्रमुख अख़बारों में पढ़ते होंगे कि आज अमुक अधिकारी पर सूचना के अधिकार के तहत निर्धारित समय में सूचना उपलब्ध नहीं करवाने के कारण इतने रूपये का जुर्माना किया गया.परन्तु क्या वह जुर्माना उनसे सचमुच में वसूल भी किया जाता है?यक़ीनन नहीं किया जाता.जुर्माना आदि सब दिखावा है.उदाहरण के लिए वित्तीय वर्ष २०११-१२ में राज्य के विभिन्न अधिकारियों पर इस अधिनियम के तहत ८.३१ लाख रूपये का जुर्माना किया गया मगर वसूली की गयी सिर्फ ३२००० रूपये की.इसके लिए जिम्मेदार कौन है निश्चित रूप से राज्य सूचना आयोग जिसका मुखिया स्वयं एक पूर्व अधिकारी होने के नाते अपने मौसेरे भाइयों के खिलाफ (नया मुहावरा अफसर अफसर मौसेरे भाई) सख्त कदम नहीं उठाता और जुर्मानेवाली बात सिर्फ अख़बारों की सुर्खियाँ बनकर रह जाती हैं.प्रार्थी भी पढ़कर खुश हो लेता है कि जुर्माना तो हुआ.दिल को बहलाने के लिए ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है.
मित्रों,सूचना के अधिकार को कौनहारा घाट पहुँचाने के बाद अब राज्य सरकार ने एक अनोखी पहल करते हुए आदेश जारी किया है कि सरकारी व्यय से सम्बंधित एसी-डीसी बिल की जाँच महालेखाकार (ए.जी.) नहीं करेगा बल्कि खुद राज्य सरकार के कर्मचारी यानि कोषागार के अधिकारी करेंगे.यह तो वही बात हुई कि परीक्षार्थी खुद ही अपनी काँपियाँ जाँचें.इसे कहते हैं वास्तविक सुशासन.अद्भुत,चमत्कारिक आइडिया.न भविष्य में कहीं कोई आर्थिक अनियमितता पकड़ में आएगी और न ही सरकार को शर्मिंदगी ही उठानी पड़ेगी.परन्तु क्या इससे या ऐसा करने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा?क्या इससे उसे और भी बढ़ावा नहीं मिलेगा?जिस तरह शुतुरमुर्ग के बालू में सिर छिपा लेने से आसन्न खतरा टल नहीं जाता अथवा जैसे कबूतरी द्वारा आँखें बंद कर लेने से बिल्ला उसे छोड़ नहीं देता उसी प्रकार सरकार द्वारा ऑंखें बंद कर लेने से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की सेहत पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता उलटे उनका मनोबल बढ़ता है.सरकार के इस कदम से हम यह सोंचने के लिए भी बाध्य होते हैं कि क्या यह उसी नीतीश कुमार की सरकार द्वारा उठाया गया कदम है जिन्होंने कभी खुलकर अन्ना आन्दोलन का समर्थन किया था?
मित्रों,इस आलेख को पढने के बाद आप यह समझ गए होंगे कि बिहार में सुशासन एक मिथक था और है और आगे भी मिथक ही बना रहेगा.सिर्फ सुशासन-सुशासन का शोर मचाने से या रट्टा लगाने से आज तक दुनिया में न तो कहीं सुशासन आया है और न ही भविष्य में कभी आनेवाला ही है.आज तक बिहार की किसी सरकार में न तो वास्तविक सुशासन लाने की ईच्छाशक्ति थी और न वर्तमान सरकार में ही है.
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ब्रजकिशोर सिंह
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जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही
जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही
प्रसंग मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम से जुडा है .सीता के अन्वेषण के पश्चात लंका पर धावा करने
की तैयारी थी ,श्रीराम अनुज के साथ पूरी सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँच चुके थे .भगवन राम
समुद्र से विनय कर रहे थे मगर समुद्र रास्ता देने को तैयार नहीं था .राम ने साम नीति का
उपयोग करते हुये अनशन किया मगर तीन दिन बीत जाने के बाद भी समुद्र श्री राम को रास्ता देने
को राजी नहीं हुआ तब श्री राम जो स्वयं मर्यादा पुरषोत्तम थे कि मर्यादा भी टूट गयी और कुटिल,
शठ, अहंकारी के लिए प्रयुक्त की जाने वाली दंड निति का सहारा लेने की घोषणा कर दी .प्राण संकट
में देख समुद्र दंडवत हो गया और अपने ऊपर सेतु बंधवाने को राजी हो गया .
अन्ना और उसके सिपाही मूढ़ सरकार से एक सशक्त लोकपाल देश के लिए मांग रहे हैं और महीनो से
अपनी मांग रख रहे हैं मगर सरकार एक सशक्त लोकपाल देने का इरादा नहीं रखती ...क्यों ?इसका
कारण देश के सामने स्पष्ट है .आज अन्ना अपने सहयोगियों के साथ भूखे रहकर अनशन कर रहे हैं
और मतिभ्रमित देश के शासक अड़े हुए हैं कि लोकपाल अभी नहीं आना है
यह देश की जनता की सब्र की परीक्षा है मगर कब तक भूखे रहकर परीक्षा देना है क्या संवेदनहीन
सरकार को पाठ पढाने के लिए हर भारतीय को अनशन के लिये उतरना पडेगा?
क्या अन्ना और उसकी टीम खुद के लिए सरकार से कुछ मांग रही है ?क्या लोकपाल के लाने से देश
को विपत्ति से झुझना पड जाएगा?आखिर इतना अहंकार क्यों ?
जिनको हमने ही गद्दी पर बिठाया आज वो लोग अपने राज धर्म को भूल गए हैं ,जनता के प्रति अपने
कर्तव्यो को भूल गए हैं उनको याद है सिर्फ अपने अधिकार जो जनता ने ही उन्हें सुशासन के लिये दिए
हैं.
कानून संसद में ही बनेगा यह ठीक है ,जनता से चुने हुए प्रतिनिधि ही कानून बनायेंगे यह भी उचित है
मगर कानून जनता की आकांक्षा पर खरा उतरना चाहिए ताकि जन-प्रतिनिधि या सरकारी नौकर पर
उस कानून का कडक रूप से इस्तेमाल हो सके ताकि जनता के धन का दुरूपयोग रुक सके .
अन्ना की निति साम निति है जिसका अभी तक पुरे देश में समर्थन है मगर यदि उन्होंने मर्यादा को
हाथ में ले लिया तब क्या होगा ...जनता को क्रोध में लाने का काम कौन कर रहा है ?
समय हर पापी को उचित दंड देता रहा है और सत्य की स्थापना होती रही है .इस काल में भी सत्य
को रोका नहीं जा सकता है हो सकता है कुछ भारतियों को जान भी जोखिम में डालनी पड़ जाए.
देश के लिए मर मिटने वाले मतवाले कभी भी किसी भी काल में कम नहीं हुए हैं
अन्ना शायद अपनी शांति की नीति में बदलाव लायेंगे ,कब?यह देखना है।
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