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27.8.12

देशहित में किए जा रहे हैं घोटाले-ब्रज की दुनिया

मित्रों,बात बहुत पुरानी है मेरे जन्म के समय की लेकिन क्या करूँ देशहित में हम अपने मन में दबाए हुए थे। दरअसल इससे पहले देश की हालत कुछ अच्छी नहीं थी। कोई भी काम देशहित में नहीं हो रहा था। अब चूँकि देश में प्रत्येक काम देशहित में हो रहा है यहाँ तक कि घोटाले-महाघोटाले भी देशहित में हो रहे हैं इसलिए मैंने भी सोंचा कि चलिए अब भेद खोल ही देते हैं। दरअसल बात यह है कि जब मेरा जन्म हुआ तब पंडित जी ने पोथी-पत्रा देखकर यह महान भविष्यवाणी की थी कि यह बालक देशहित में जन्मा है इसलिए बड़ा होकर यह अपने सारे काम देशहित में ही करेगा। पंडित जी तो भरी जवानी में अपनी झगड़ालु मगर खूबसूरत पत्नी को विधवा बनाकर दुनिया से खिसक लिए लेकिन आगे चलकर उनकी भविष्यवाणी एकदम सटीक साबित हुई। दरअसल मैं आज एक नेता हूँ और वह भी केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का। आलाकमान का चहेता हूँ सो मुझे केंद्र में कैबिनेट मंत्री बना दिया गया है और हर तरह की छूट भी दी गई है। बस मुझे इतना ही ध्यान में रखना होता है कि मैं जो कुछ भी करूँ वह देशहित में हो। सो मैं अपने हरेक उल्टे-सीधे काम को चुटकियों में देशहित में किया गया ठहरा देता हूँ। वास्तव में मेरी पूरी जिन्दगी ही देशहित में बीती है। देशहित में ही मैंने कई जरूरतमंद अबलाओं का उद्धार किया है और महिला-सशक्तीकरण के काम को नई गति और नया आयाम दिया है। देशहित में ही मैंने अनगिनत हत्याएँ करवाई,अनगिनत बलात्कार किए और डाके डलवाए-अपहरण करवाए। अब आप ही बताइए कि अगर मैंने यह सब करके अपने हुनर को प्रदर्शित नहीं किया होता तो क्या मुझे सत्तारूढ़ पार्टी ने लोकसभा का टिकट दिया होता? फिर कैसे मुझे देशहित में प्रत्येक कर्म करने का सुअवसर मिलता?
                       मित्रों,आप ही सोंचिए कि अगर 2-जी घोटाला नहीं हुआ होता तो जनता कैसे राजा बनती और फोनकॉल कैसे सस्ता होता? फिर भी देखिए मूर्खों को कहते हैं कि राजा ने घोटाला किया। राजा ने तो भिखारी को भी टेलीफोन का राजा बना दिया और देशहित में फिर जेल भी गया। इसी तरह अगर कोयला घोटाला नहीं हुआ होता तो देश को सस्ती बिजली कैसे मिलती (मुझे तो मुफ्त में ही मिल जाती है इसलिए मेरे लिये तो सस्ती ही हुई न?)। इसी तरह अगर देश में राष्ट्रमंडल घोटाला नहीं होता तो देश की जनता सवा लाख की घटिया कुर्सी पर कैसे बैठती? देश के लोग नासमझ हैं वास्तविकता को समझना ही नहीं चाहते। घोटाला मतलब देशहित और इसके सिवा और कुछ नहीं। मेरा बैंक अकाउंट इन दिनों देशहित में लबालब भरा हुआ है। क्या करूँ पूरी दुनिया में घूम-घूमकर बैंकों में खाता खोलता फिर रहा हूँ। साथ ही दिखावे के लिए देशहित के भी कुछ काम कर लेता हूँ जिससे पूरी यात्रा देशहित में हो जाए। विदेशों में विकास के नए-नए तरीकों की खोज होती रहती है। देश में वापस आते ही देशहित में उनकी योजना बनाता हूँ और फिर देशहित में एक और घोटाला सम्पन्न कर लेता हूँ।
                                      मित्रों,अब तक तो मेरा देशहितवाला तर्क खूब काम करता रहा है लेकिन अब यह सोशल मीडियावाला सब गलत-सलत अफवाह फैलाकर हमारी देशहित वाली महान थ्योरी को फ्लॉप करवाने में भिड़ गया है। बड़ी माथापच्ची की हमने कि देशहित में इस नामुराद से कैसे निबटा जाए। मौका मिल ही नहीं रहा था अब असम दंगा को लेकर मची भगदड़ ने हमको वह सुनहरा मौका भी दे दिया है। सो हमने सोशल मीडिया को पूरी तरह देशहित के खिलाफ खतरा घोषित करने का अभियान ही छेड़ दिया है और इत्मिनान रखिए बहुत जल्दी हमारी गोबयल्स सेना इसे इतना बदनाम कर देगी कि हम आराम से इस बिगड़ैल को पूरी तरह से रास्ते पर ले आएंगे। फिर इस पर भी देशहित में वही सब दिखेगा जो कुछ हम देखना और दिखाना चाहेंगे। क्या करें हम देशहित के अलावा और कुछ कर ही नहीं न सकते हैं क्योंकि आप तो जानते हैं कि हमारा जन्म ही देशहित में हुआ है। उस मुए पंडित से भी बड़ी भविष्यवाणी अब हम करते हैं आखिर हमारी आपबीति का अंत भी तो शुरुआत की तरह ही धमाकेदार होना चाहिए न. मेरी भविष्यवाणी यह है कि मैं जीने की तरह मरूंगा भी देशहित में ही घोटालों द्वारा अर्जित रुपए को गिनता हुआ। अब जब दो-दो लाख करोड़ रुपये का महाघोटाला होगा तो उसे गिनने में कम-से-कम 20-30 साल तो लगेगा ही न।

अन्ना की छाया बनी केजरीवाल की छटपटाहट !


अन्ना की छाया बनी केजरीवाल की छटपटाहट !

जंतर मंतर पर सफेद टोपी पहने लोगों को हुजूम...जिस सफेद टोपी पर 25 दिन पहले तक लिखा होता था मैं अन्ना हूं...उसी टोपी पर जब निगाह पड़ी तो मैं और हूं तो था...पर मैं औऱ हूं के बीच में ढाई शब्दों की बजाए पांच शब्द नजर आए। टोपी पर मैं और हूं के बीच में अन्ना की जगह लिखा था केजरीवाल...मैं केजरीवाल हूं। ये वही केजरीवाल हैं जो खुद कल तक अन्ना की टोपी लगाकर घूमा करते थे...लेकिन अब ये वो केजरीवाल नहीं हैं...अब शायद ये चाहते हैं अन्ना के परछाई से बाहर निकलकर अपनी ऐसी काया बनाई जाए जो दूसरों को परछाई दे सके। जंतर मंतर पर 3 अगस्त 2012 को टीम अन्ना का आंदोलन जब चुनावी विकल्प के एलान के साथ समाप्त हुआ था उसके बाद से ही अन्ना हजारे और उनके सहयोगी सुर्खियों से उतर गए थे। इसके ठीक बाद 9 अगस्त 2012 को बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के खिलाफ ताल ठोक दी तो मीडिया जगत की सुर्खियों में छाने के साथ ही सरकार की सबसे बड़ी परेशानी का सबब भी बाबा बन गए...और आखिरकार 14 अगस्त को बाबा ने अपना अनशन खत्म किया। इस आंदोलन ने टीम अन्ना के आंदोलन की चमक फीकी कर दी थी...ऐसे में अरविंद केजरीवाल एंड टीम को शायद ये समझ में आ गया था कि जनता की निगाहों में चढ़े रहना है तो सुर्खियां तो बटोरनी ही होंगी...क्योंकि हिंदुस्तान की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है...या यूं कहें कि जनता को शार्ट टर्म मेमोरी लॉस की बीमारी है...जिसके चलते ये बहुत जल्दी चीजों को भूल जाती है और गलती करने वाले को जल्दी ही माफ भी कर देती है...ऐसा न होता तो सत्ता से बेदखल होने के बाद बार – बार भ्रष्टाचारी सत्ता में काबिज ही न होते। खैर इस केजरीवाल एंड टीम ने कोयला घोटाले को हथियार बनाकर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई और दिल्ली पुलिस को छकाते हुए ये लोग अपने मंसूबों में कामयाब भी रहे...साथ ही केजरीवाल ने इस बहाने सरकार को अपनी ताकत का एहसास भी करा दिया कि अन्ना हजारे इस प्रदर्शन में साथ नहीं है तो क्या फिर भी लोग हमारे साथ हैं...औऱ कुछ हद तक इससे केजरीवाल अन्ना की परछाई से बाहर झांकने में कामयाब भी हुए हैं। केजरीवाल एक अच्छे मकसद के लिए लड़ रहे हैं...और अब वो इस लड़ाई को राजनीति के मैदान में उतरकर ही लड़ेंगे...जो केजरीवाल के लिए आसान तो बिल्कुल नहीं होगा...क्योंकि केजरीवाल अन्ना की परछाई से बाहर झांकने में तो कामयाब रहे हैं...लेकिन अन्ना की तरह लाखों – करोड़ों लोगों के लिए एक ऐसी काया बनना जो उनको परछाई दे सके...केजरीवाल के लिए मुश्किल भरा और सालों लंबा रास्ता भी है। इस काया को पाने के लिए जब अन्ना जैसे व्यक्तित्व को करीब 30 से 40 साल का वक्त लग गया तो केजरीवाल तो अभी उनका अंश मात्र भी नहीं हैं। वो भी ऐसे वक्त में जब उनके सहयोगियों से उनके विचार उनकी भाननाएं मेल नहीं खा रही हैं। यहां बात हो रही है इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रमुख सदस्य किरण बेदी की...जो आईएसी की नींव का मजबूत हिस्सा भी हैं। लेकिन भाजपा के विरोध के मुद्दे पर केजरीवाल और बेदी की सोच अलग – अलग प्रतीत होती है। केजरीवाल सबको भ्रष्ट मानकर उनका विरोध करने की बात करते हैं तो किरण बेदी इससे इत्तेफाक नहीं रखती। उनकी नजर में भाजपा का विरोध करना ठीक नहीं है क्योंकि भाजपा सत्ता में नहीं है। ये मतभेद आगे चलकर गहरा जाते हैं और केजरीवाल के साथ बेदी की जुगलबंदी अगर टूटती है तो इसका सीधा असर आईसीए के साथ ही केजरीवाल की क्रेडिबीलिटी पर पड़ेगा और लोगों का विश्वास उन पर कम हो सकता है...जिसका सीधा असर उनके आंदोलन पर पड़ेगा। बहरहाल ये तो भविष्य के गर्भ में है...लेकिन जो वर्तमान में है उसकी अगर बात करें तो पीएम मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास के घेराव के बाद केजरीवाल अपने मकसद के पूरा होने की बात करते हैं...ऐसे मे सवाल ये उठता है कि आखिर केजरीवाल का समर्थकों संग घेराव का मकसद था क्या...? ऐसा तो नहीं कि केजरीवाल को लगता हो कि अगस्त 2011 में और 25 जुलाई 2012 से 3 अगस्त 2012 तक जंतर मंतर पर अन्ना हजारे के साथ मिलकर भ्रष्टाचार से घिरी सरकार और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जो माहौल देशभर में टीम अन्ना ने तैयार किया कहीं उसका फायदा कोई और या यूं कहें मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा उठा ले जाए...और शायद इसी वजह से पीएम औऱ सोनिया के आवास के साथ ही आईएसी ने विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के निवास का घेराव कर जनता को ये संदेश देने की कोशिश की...कि भाजपा भी दूध की धुली नहीं है और भाजपा के नेता भी भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रहे हैं...लिहाजा कांग्रेस का विकल्प भाजपा तो नहीं हो सकती। केजरीवाल अगर ऐसा सोचते हैं तो आईएसी के इस घेराव से जहां कांग्रेस को फायदा मिलता दिखाई दे रहा है वहीं भाजपा को इससे नुकसान ही हुआ है। कांग्रेस को फायदा इसलिए भी हुआ है क्योंकि कांग्रेस तो पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है और ताजा कोयला घोटाले में भाजपा ने उसकी नाक में दम कर रखा था...ऐसे में कोयला घोटाले पर आईएसी का कांग्रेस के साथ ही भाजपा का भी विरोध करने और कोयला घोटाले में भाजपा के भी शामिल होने के आरोप लगाने पर कांग्रेस ने राहत की सांस ली होगी...जबकि भाजपा को इन आरोपों पर सफाई देनी पड़ सकती है।

deepaktiwari555@gmail.com

बेटी बचाओ अभियान में जोड़ें एक नया अध्याय


कितना तड़पी होगी वो! क्या वो इसका मतलब भी समझती होगी? मानसिक एवं शारीरिक रूप से शोषित होती यह बच्ची, जब माँ बनने के अर्थ को समझ आने की अवस्था में होगी, तब उस सुंदर अहसास से परे घृणित भाव से भरी होगी और घिरी होगी प्रश्नों के जंजाल में कि क्यों उसके माता-पिता ने ही उसके विश्वास को तार-तार किया? क्यों नहीं कर पाये वे उसकी रक्षा? क्यों ईश्वर उसकी किस्मत लिखते समय इतना निष्ठुर हो गया? कहाँ रहा नौ महीने ‘लड़कियों का रक्षक समाज’? क्या उसकी पीड़ा की चीख़ किसी के कानों में नहीं पड़ी? क्या इतने दिन किसी की दृष्टि उसके उभारों से प्रश्न न कर सकी? क्या किसी के मन में उसके लिए करूणा नहीं उमड़ी? यहाँ तक कि उसके अपने माँ-बाप के मन में भी नही! वह तेरह वर्ष की उम्र में एक बच्ची की माँ बन गई। अभी तो वह खुद माँ की गोद में सिर रख दुलार के हाथ की प्रतीक्षा कर रही थी कि स्वयं उसकी गोद से किलकारियों की आवाजें आने लगी! कौन है इसका जिम्मेदार? वे जो उसके संरक्षक हैं या वह जो अपने हसरतें पूरी कर चला गया? क्या एक बार भी उन बाल अंगों पर तरस नहीं आया उसे? अब क्या? क्या अब उस मासूम को उन हाथों की कठपुतली बनने के लिए छोड़ देना चाहिये? क्या उनके साथ उसका व उसकी बच्ची का भविष्य सुरक्षित है? क्या गारंटी है कि भविष्य में वह बच्ची व उसकी बच्ची उन संरक्षकों के लिए कमाई का साधन नहीं बनेगी? क्या आयेगा कोई उन दोनों की रक्षा के लिए? और इन सबके साथ-साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न-चिन्हः आखि़र कब तक चलेंगी ये कहानियाँ? और कितनी लम्बी होगी यह कतार? ज़रा कचौटिये अपनी मृत भावनाओं को, शायद कोई हल निकल आये और बचपन की मीठी यादें ज़हरीले भाग्य से मुक्त हो जायें।

26.8.12

माटी का शेर निकला सोशल मीडिया-ब्रज की दुनिया

मित्रों,मुझे ज्वलंत मुद्दों पर लिखने का शौक तभी से है जबसे मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में आया। वर्ष 2007 के 1 सितंबर को जब मैंने पटना,हिन्दुस्तान ज्वाइन किया उससे पहले ही मेरे कई आलेख भोपाल और नोएडा के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे। हिन्दुस्तान में भी कोशिश की लेकिन मेरे जैसे प्रशिक्षु पत्रकार को कहाँ इस विशालकाय अखबार में स्थान मिलनेवाला था? मन कचोटता,मन में नए-नए विचार उमड़ते और शब्दों का रूपाकार ग्रहण करने लगते। कई बार दिल्ली स्थित महामेधा आदि छोटे अखबारों को ई-मेल भी किया परन्तु किसी ने मेरी ओर दृष्टिपात तक नहीं किया। एक आलेख जरूर दिसंबर,2009 की योजना पत्रिका में प्रकाशित हुई और मुझे मेहनताना के तौर पर 800 ऱू. का चेक भी मिला। अंत में तबके मेरे सहकर्मी और मेरे प्रति बड़े भाई जैसा स्नेह रखनेवाले वीरेन्द्र यादव ने मुझे ब्लॉगों की दुनिया से अवगत कराया। अंधा क्या मांगे दो आँखें। लगा जैसे मुझे अपने जीने का उद्देश्य प्राप्त हो गया। मैंने झटपट blogspot.com पर ब्रज की दुनिया नाम से एक वेबसाईट बना डाली और सबसे पहले प्रायोगिक तौर पर सिर्फ यह देखने के लिए कि क्या सचमुच मैं जो कुछ भी यहाँ लिखूंगा वह ऑनलाइन हो जाएगा,जिन्दगी एक जुआ शीर्षक से छोटी-सी बतकही डाल दी। फिर तो जैसे लेखन का सिलसिला ही चल पड़ा। मेरा मिशन कभी भी पैसा कमाना नहीं था और न ही यहाँ लिखने से पैसा मिलने ही वाला था बल्कि मेरा मिशन था एक सोये हुए राष्ट्र की आत्मा को जागृत करना,उसे झकझोरना और दुनिया को खूबसूरत बनाना। बाद में मैं blogspot.com के अलावे media club of india,indyarocks.com,जनोक्ति,जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर भी लिखने लगा,स्वान्तः सुखाय, सर्वजन हिताय;पूरी तरह से निःशुल्क।
                      मित्रों,मेरे आलेख इस बात के गवाह हैं कि मैंने कभी सांप्रदायिक या जातिवादी दृष्टिकोण से कोई भी आलेख नहीं लिखा। मैंने जो भी लिखा दिमाग से नहीं दिल से लिखा। बाद में मेरे आलेख देश के लगभग सभी प्रमुख हिन्दी समाचार-पत्रों में प्रकाशित भी किए गए लेकिन मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ। मैं देशहित और जगतहित में अनवरत लिखता गया,बस लिखता गया। यहाँ मैं blogs in media वेबसाईट के संचालक श्री बी.एस.पाबला जी का आभार प्रकट करना चाहूंगा जिन्होंने मुझे समय-समय पर देश के विभिन्न अखबारों में छपनेवाले मेरे आलेखों के बारे में जानकारी दी। मैं खुश था कि अब मेरी लेखनी किसी संपादक या प्रकाशक की कृपादृष्टि की मोहताज नहीं है। अब मैं खुद ही अपना प्रकाशक भी था और संपादक भी। मैंने हमेशा भारत और विश्व में व्याप्त राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्थाओं और विद्रुपताओं पर करारा प्रहार किया। सिर्फ समस्याएँ नहीं गिनाईं वरन् समाधान भी प्रस्तुत किए। लगा जैसे मेरे कलमरूपी आजाद पंछी को उड़ने के लिए अनंत आकाश मिल गया है जहाँ वह निर्बाध उड़ान भरने लगा। हालाँकि इसी बीच केंद्र की वर्तमान नाकारा और नालायक सरकार की ओर से सोशल मीडिया के हम आजाद पंछियों के पर कतरने के प्रयास भी शुरू हो गए थे लेकिन तब से न जाने किस कारण से उसके प्रयास बेकार जा रहे थे। फिर पिछले दिनों प्रदेश की कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों की वजह से असम में दंगे होने लगे और धीरे-धीरे उसकी आँच पूरे देश में पहुँचने लगी। अब दुर्योधनरूपी केंद्र सरकार को जैसे श्रीकृष्णरूपी सोशल मीडिया को बांधने का बहाना मिल गया। सैंकड़ों ऐसी वेबसाईटें जो सरकार की नीतियों की प्रबल विरोधी थीं को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया गया। खुद मेरे ब्लॉग से आज 25-08-2012 को भारत में बकरीद के दिन खुलेआम सड़कों पर काटी जा रही गायों की तस्वीरें हटा दी गईं हैं एक साथ brajkiduniya.blogspot.com,bhadas.blogspot.com और नवभारत टाईम्स रीडर्स ब्लॉग डॉट कॉम के ब्लॉग से। भड़ास और ब्रज की दुनिया ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम पर तो मैंने फिर से तस्वीरें लगा भी दी है लेकिन नवभारत टाइम्स के ब्लॉग पर उसकी जगह को पूर्ववत खाली ही छोड़ दिया है।
                    मित्रों,हो सकता है कि निकट भविष्य में सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय के लिए सदैव तत्पर मेरे ब्लॉग को ही पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाए। आज मेरे ब्लॉग से तस्वीरों को जिस प्रकार हटा दिया गया है उससे मुझे घोर निराशा हुई है। मुझे निराशा अपनी केंद्र की सरकार की ओर से नहीं हुई है क्योंकि ये लोग ऐसे ही हैं जो स्थितियों में बदलाव के लिए प्रयास नहीं करते बल्कि येन केन प्रकारेण अपने आलोचकों का मुँह बंद कर देना चाहते हैं। मुझे निराशा हुई है सोशल मीडिया वेबसाइटों के संचालकों से। कहाँ तो जनाब दुनियाभर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अमेरिकी ठेकेदार,झंडाबरदार और रक्षक बने फिरते थे और कहाँ तो महाभ्रष्ट और महाबेकार साबित हो चुकी भारत की केंद्र सरकार ने जरा-सी घुड़की क्या दिखाई कि जनाब झुकने के बदले सीधे पेट के बल रेंगने लगे। जिनको हमने असली शेर समझा था वे तो मिट्टी के शेर निकले और वह भी भुरभुरी मिट्टी के बने हुए। निकट भविष्य में मेरा ब्लॉग प्रतिबंधित होने से बचता है या नहीं अभी कहा नहीं जा सकता लेकिन अगर ऐसा हुआ तो मैं कहाँ और कैसे लिखूंगा पता नहीं। मगर अब तो तब का शौक आदत बन चुकी है। इतना तो निश्चित है कि अब मैं बिना लिखे रह ही नहीं सकता सो विकल्प तो ढूंढना ही पड़ेगा।
                     मित्रों,मैं अंत में अपनी विश्वासघातिनी और महाघोटालेबाज केंद्र सरकार से जानना चाहता हूँ कि क्या इस समय देश में किसी तरह का आपातकाल लगा हुआ है? फिर वह क्यों और कैसे हमारे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.(1)(क) में दिए गए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को हमसे छीन सकती है? क्या हमने अपने इन अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया है? अगर नहीं तो फिर यह जुल्म क्यों और अगर हाँ तो वह हम पर मुकदमा क्यों नहीं चलाती और हमें अदालत से सजा क्यों नहीं दिलवाती? साथ ही मैं भारत के सर्वोच्च न्यायालय जिसे संविधान द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक बनाया गया है से निवेदन करता हूँ कि वह भारत सरकार द्वारा अपने नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किए जा रहे प्रहार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई करे अन्यथा निकट-भविष्य में लोकतंत्र इस महाभ्रष्ट सरकार का बंधक हो जाएगा और भारत में केंद्र सरकार की तानाशाही कायम हो जाएगी। साथ ही भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू से भी मेरी करबद्ध प्रार्थना है कि वे हम जैसे छोटे पत्रकारों के अधिकारों के रक्षार्थ अविलंब समुचित कदम उठाएँ। 

25.8.12

सहयोग की अपेक्षा




 
समाज सेवा के मकसद से अदनान वेलफेयर सोसाइटी  का गठन किया गया है।
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हाथीचक - चक दे फट्टे

थीचक- चक दे फट्टे

हाथीचक या आर्टिचक एक बड़ा और अनूठा कंद है, जो 3000 वर्ष से प्रयोग में लिया जा रहा है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। इसकी उत्पत्ति युरोप के भूमध्य रेखीय संभाग से हुई है, मिश्र के प्राचीन दस्तावेजों में भी इसका जिक्र मिलता है, जिनमें इसे त्याग और पुरुषत्व का प्रतीक माना गया है। यह थिसल प्रजाति का सदस्य है। इसका वान्पतिक नाम चिनारा स्कोलिमुस (Cynara scolymus) है, जो लेटिन शब्द कनिना canina (जिसका मतलब है canine) और ग्रीक शब्द skolymos (जिसका मतलब है thistle) से बना है। 15 वीं शताब्दी में यह ब्रिटेन पहँचा, जहाँ इसे आर्टिचॉक नाम दिया गया। आज अमेरिका में इसका सबसे अधिक उत्पादन कैलीफोर्निया में होता है। भारत में इसकी खेती शायद बहुत ही कम होती है। डॉ. बुडविग ने अपने कैंसर उपचार में इसके प्रयोग की विशेषतौर पर सलाह दी है।    इसकी कई किस्में जैसे ग्रीन ग्लोब, डेजर्ट गेलोब, बिग हार्ट और इंपीरियल स्टार आदि उपलब्ध हैं। इसका कांटेदार पत्तियां हरे रंग की होती हैं और अंदर का हृदय या गूदा हल्के हरे रंग का होता है। इसकी पत्तियां और गूदा दोनों ही खाये जाते हैं। लेकिन कुछ लोग गूदा पसन्द करते हैं तो कुछ पत्तियां खाना पसन्द करते हैं। अपनी अपनी पसन्द है। यह देखने में कांटेदार, स्वाद में मजेदार और सेहत में दमदार है।
सन् 2004 में अमेरिका के कृषि विभाग ने बड़े स्तर पर विभिऩ्न भोज्य पदार्थों में एंटीऑक्सीडेंट्स के विश्लेषण हेतु अध्ययन करवाया था। अचरज की बात यह रही कि एंटीऑक्सीडेंट्स की दृष्टि से हाथीचक ने सर्वश्रेष्ठ सात भोज्य पदार्थों में स्थान बनाया और सब्जियों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ चार में स्थान प्राप्त किया। ब्लूबेरी, रेडवाइन, ग्रीन टी भी पीछे रह गये।
पत्ते पत्ते में छुपे हैं एंटीऑक्सिडेंट
हाथीचक फाइबर का उत्कृष्ट स्रोत है। इसमें मेग्नीशियम, मेंगनीज, पोटेशियम और क्रोमियम प्रचुर मात्रा में बोहोते हैं। यह  विटामिन-सी, फोलिक एसिड, बायोटिन, विटामिन-ए, थायमिन, नायसिन और राइबोफ्लेविन का भी अच्छा स्रोत है।  
हाथीचक में अनेक फाइटोन्युट्रियेंट्स  (“fight-o-nutrients”) होते हैं। फाइटोन्युट्रियेंट्स पौधों में पाये जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर तत्व होते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए उत्कृष्ट और जरूरी होते हैं।
        
Artichoke cooked boiled, salted
Nutritional value per 100 g
Energy
220 kJ (53 kcal)
10.51 g
Dietary fiber
5.4 g
0.34 g
2.89 g
Thiamine (Vit. B1)
0.05 mg
Riboflavin (Vit. B2)
0.089 mg
Niacin (Vit. B3)
0.111 mg
Pantothenic acid (B5)
0.240 mg
0.081 mg
89 ?g
7.4 mg
21 mg
0.61 mg
42 mg
Phosphorus
73 mg
Potassium
276 mg
Zinc
0.4 mg
Manganese
0.225 mg
क्युअरसेटिन Quercetin क्युअरसेटिन एक फ्लेवोनॉयड है। यह कैंसररोधी और एंटीऑक्सीडेंट है। कैंसर और हृदय रोग से बचाता है।  
रूटिन  Rutin यह भी एक फ्लेवोनॉयड है और रक्त-वाहिकाओं को स्वस्थ रखता है। यह कैंसर कोशिकाओं के अनियंत्रित विभाजन को बाधित करता है। यह प्रदाहरोधी (anti-inflammatory) और एंटी-ऐलर्जिक है।
ऐन्थोसायनिन्स Anthocyanins यह कुछ तरह के कैंसर का खतरा कम करता है। साथ में यह मूत्रपथ का स्वस्थ रखता है, स्मरणशक्ति बढ़ाता है और आयुवर्धक है।
गेलिक एसिड Gallic Acid यह एंटीऑक्सीडेंट रेड वाइन और ब्लैक टी में भी पाटा जाता है। यह प्रोस्टेट कैंसर में कैंसर कोशिकाओं के विकास को बाधित करता है। 
ल्युटियोलिन और सायनेरिन Luteolin and Cynarin ल्युटियोलिन पॉलीफेनोल एंटीऑक्सीडेंट है और कॉलेस्टेरोल को कम करता है। हाथीचक में विद्यमान सायनेरिन कॉलेस्टेरोल को कम करता है, साथ ही यह पाचन तंत्र के विकार आइ.बी.एस. (IBS) और अपच में भी फयदेमंद है। सायनेरिन यकृत की कोशिकाओं का जीर्णोद्धार करता है और यकृत में पित्त के स्राव को प्रोत्साहित करता है, जिससे फैट्स के पाचन मदद मिलती है और विटामिन्स का अवशोषण बढ़ता है।
कैफिक एसिड और क्लोरोजेनिक एसिड Caffeic Acid and Chlorogenic Acid
यह कैंसररोधी, जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी है और बुरे कॉलेस्टेरोल को कम करता है। 
सिलीमेरिन Silymarin यह यकृत की कोशिकाओं का जीर्णोद्धार करता है।
पकाने के निर्देश -  
सबसे पहले इसे धोना चाहिये। इसके बाद पत्तियों के नुकीले सिरे काट देना चाहिये। आप चाहें तो अंगुलियों से पत्तियों को थोड़ा खोल सकते हैं। इसके बाद इसे पानी या सिरके में 25-30 मिनट तक उबाल लीजिये। अब पत्तियों को तोड़ कर सॉस या किसी शोरबे में डुबो कर चूसा जाता है। चूस कर पत्ती को अलग कर देते हैं। सारी पत्तियां चूसने के बाद अंदर का गूदा साफ करके पूरा खाया जाता है। इसके स्वाद में थोडा कड़वापन होता है।
हाथीचक के फायदे
·       यह भूख बढ़ाता है।
·       पित्त का स्राव बढ़ाता है। यकृत की कोशिकाओं की सुरक्षा करता है। अल्कॉहल के कुप्रभावों से बचाता है
·       कॉलेस्टेरोल का स्तर कम करता है।
·       फाइबर से भरपूर है हाथीचाक - हाथीचाक फाइबर का अच्छा स्रोत है। आजकल हम भोजन में फाइबर कम लेते हैं, जिससे अपच और कब्जी की तकलीफ हो जाती है।      
·       कैंसररोधी -  हाथीचक में पॉलीफीनोल श्रेणी के कई शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे रूटिन, क्यूअरसेटिन, और गैलिक एसिड होते हैं, जो प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और ल्यूकीमिया से बचाव और उपचार में असरदार माने गये हैं। ये कैंसर कोशिकाओं की बाधित हो चुकी योजनाबद्ध मृत्यु (apoptosis) को शुरू करते हैं और कोशिकाओं के अनियंत्रित विभाजन में रुकावट पैदा करते हैं।  

24.8.12

मध्यावधि चुनाव चाहती है भाजपा !



कैग ने संसद में कोयला आवंटन पर रिपोर्ट क्या पेश की बवाल मच गया। रिपोर्ट पेश होने के बाद चार दिनों में प्रधानमंत्री के इस्तीफे को लेकर विपक्ष के हंगामे के चलते संसद 4 मिनट भी नहीं चली और विपक्ष के हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही चार दिन तक लगातार स्थगित होती रही। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सिर्फ हंगामा करने से किसी चीज का समाधन निकल सकता है...जाहिर है नहीं लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने लगातार हंगामा कर सदन को नहीं चलने दिया। ये बात भाजपा भी अच्छी तरह से जानती है कि पीएम इस मामले पर किसी भी सूरत में इस्तीफा नहीं देने वाले...क्योंकि प्रधानमंत्री अगर इस्तीफा देते हैं तो ये सीधे तौर पर सरकार की हार होगी...प्रधानमंत्री की हार होगी...और ये मान लिया जाएगा कि कोयला घोटाले में सरकारी खजाने को 1 लाख 86 हजार करोड़ रूपये का नुकसान जानबूझकर पहुंचाया गया...और क्योंकि उस समय कोयला मंत्रालय खुद प्रधानमंत्री के पास था तो इसके लिए प्रधानमंत्री भी जिम्मेदार हैं...ऐसे में सरकार इस मुद्दे पर बहस के लिए तैयार होने की बात कर रही है...लेकिन भाजपा इस्तीफे की अपनी मांग पर अड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस बहस के लिए इसलिए भी तैयार हो गयी है कि क्योंकि कांग्रेस चाहती है कि अगर हार हो तो बिना लड़े क्यों हारें...कम से कम संसद में बहस के बहाने लड़ाई तो लड़ी ही जा सकती है...और विपक्ष के सवालों में सरकार न उलझी तो जीतने का एक मौका तो रहेगा ही...लेकिन बिना बहस के ही प्रधानमंत्री इस्तीफा दें दें...तो फिर ये एक तरह से साबित भी हो जाएगा कि कोयले में दलाली तो हुई ही है। भाजपा भी चाहे तो प्रधानमंत्री के इस्तीफे की जिद छोड़ कर बहस में हिस्सा लेकर सरकार को घेर सकती है...हो सकता है कि बहस के दौरान इस मामले की ऐसी कई बारीकियां निकल कर सामने आ जाएं...जो उनके सवालों को और पैना कर दे...और सरकार घिर जाए...लेकिन यहां पर ऐसा लगता है कि भाजपा अंदरखाने कुछ और ही रणनीति पर काम कर रही है। इसको इस तरह से भी देख सकते हैं कि बीते कुछ महीने से लगातार जिस तरह से जंतर मंतर पर लोकपाल को लेकर टीम अन्ना ने आंदोलन किया...उसके बाद 09 अगस्त से दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव ने लोकपाल, कालाधन वापस लाने और सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला...उसके बाद से ही देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बना हुआ है...औऱ इन दोनों आंदोलनों में जनता की भागीदारी ने इस बात को पुख्ता भी किया है। लोगों ने खुलकर इन आंदोलनों में हिस्सा लिया जो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का जनाक्रोश था। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो रामदेव के मंच पर जाकर आंदोलन का खुलकर समर्थन भी किया था। भाजपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को कहीं न कहीं भांप लिया है और ऐसे वक्त पर भाजपा के हाथ ये मुद्दा भी लगा है...तो भाजपा शायद यही चाहती है कि मौका देख कर चौका मार दिया जाए...यानि सरकार को इस मुद्दे पर घेरकर पूरी तरह बैकफुट पर लाया जाए...और ऐसी स्थिति उत्पन्न की जाए ताकि देश में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए...और लोगों के बीच यूपीए सरकार के घोटालों का ढिंढ़ोरा पीट पीटकर सत्ता की चाबी हथिया ली जाए। भाजपा को ये लगता है कि अगर ऐसा होता है तो उसके लिए केन्द्र की सत्ता में लौटना का इससे सुनहरा अवसर दूसरा नहीं हो सकता। इसके अलावा कोई दूसरा कारण भाजपा की इस बालहठ के पीछे फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा है...क्योंकि भाजपा ये भी अच्छी तरह से जानती है कि संसद में हंगामे के कारण रोजाना करोड़ों रूपये फिजूल बर्बाद हो रहे हैं। संसद की कार्यवाही के दौरान बात करें तो प्रति मिनट 26 हजार रूपये का खर्च आता है...जबकि प्रति घंटा ये खर्च 22 लाख रूपये है...और पूरे दिन का खर्च 7.8 करोड़ रूपये है। यानि कि चार दिनों तक जो संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ी उसमें तकरीबन 15 करोड़ रूपये बर्बाद हुए। सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलती तो जनकल्याण की कई योजनाओं पर चर्चा हो सकती थी...जन कल्याण से जुड़े कई बिल पास हो सकते थे...लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ...क्योंकि हमारे देश के राजनेताओं को जनता के हितों से शायद कोई सरोकार नहीं है। सरोकार होता तो शायद कोयला आवंटन में घोटाला ही न होता...इससे पहले के कई घोटाले ही नहीं होते...और संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट नहीं चढ़ती। उम्मीद करते हैं हमारे राजनेता अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर जनता के हितों की बात करेंगे...जनकल्याण के लिए काम करेंगे...ताकि लोगों का विकास हो देश का विकास हो।  

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आरक्षण - सड़क से संसद तक

प्रमोशन में आरक्षण को लेकर घमासान जारी है...सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ आरक्षण को लेकर बवाल मचा है। मायावती को इससे कुछ ज्यादा ही प्यार है...हो भी क्यों न भई आखिर माया की राजनीति भी तो आज तक इसी के सहारे परवान चढ़ती आयी है। अब 2007 की ही बात कर लेते हैं...उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो शायद ही मायावती ने सोचा होगा कि उनका हाथी विधानसभा की दो तिहाई सीटों पर कब्जा कर लेगा। अब भला क्यों माया आरक्षण को लेकर हो हल्ला न मचाए...अभी तो बहुत साल राजनीति करनी है इन्हें। ये हाल सिर्फ मायावती का नहीं बल्कि देश के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओँ को भी यही हाल है...वे भी अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने अपने वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण की बात करते आये हैं। चलिए ये तो थी माया औऱ दूसरे राजनेताओं की बात जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए आरक्षण के जिन्न को समय समय पर बोतल से बाहर निकालने से गुरेज नहीं करते। आप ही सोचिए क्या वाकई में सरकारी नौकरी में आरक्षण के बाद प्रमोशन में भी किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षण जायज है। क्यों नहीं योग्यता का पैमाना ही यहां पर उपयोग किया जाए। लेकिन अफसोस ऐसा है नहीं...जाति धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले सरकार चला रहे हमारे राजनेताओं को तो अपने वोट बैंक को साधना है...ऐसे में वे ये कैसे होने देते...नौकरी में प्रमोशन के लिए सत्ता पर बैठे इन लोगों ने आरक्षण लागू कर दिया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनुचित ठहराते हुए इस पर रोक तो लगा दी...लेकिन इसके बाद भी हमारे नेतागण हर इस जुगत में लगे हैं कि प्रमोशन में आरक्षण बहाल करने के लिए संविधन संशोधन विधेयक पास हो जाए। हालांकि कांग्रेस पहले ही इसके पक्ष में दिखाई दी जब 9 अगस्त 2012 को सरकार ने सदन में जोरदार हंगामे के बाद इस विधेयक को सदन में पेश करने की बात कही। हालांकि विधेयक रखे जाने से पहले प्रधानमंत्री ने अपने निवास पर 21 अगस्त 2012 को इस पर आम सहमति के लिए सर्वदलीय बैठ भी बुलाई...लेकिन ये बैठक भी बेनतीजा ही समाप्त हुई। सपा नेताओं के संविधान संशोधन विधेयक का पुरजोर विरोध करने के बाद सरकार ने 22 अगस्त को सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश करने की योजना टाल दी। हालांकि सरकार ने अपनी मंशा तो जाहिर कर ही दी है कि वो देर सबेर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लेकर आएगी...यानि की प्रमोशन में आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फिर से लागू हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इस मुद्दे को लेकर दो गुटों  में बंटे सरकारी कर्मचारी कैसे एक दफ्तर में एक छत के नीचे साथ काम कर पाएंगे...वो भी उस स्थिति में जब एक कर्मचारी का जूनियर उसका सीनियर हो चुका होगा...या हो जाएगा...जाहिर है इससे कर्मचारियों में कुंठा आएगी...औऱ वो अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाएंगे...जो वैसे भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारी नहीं देते हैं। खैर ये तो प्रमोशन में आरक्षण लागू होने के बाद की बात है...लेकिन इसको लागू करवाने में सरकार के सामने भी मुश्किलें बहुत हैं। मनमोहन सरकार कभी नहीं चाहेगी कि सपा की नाराजगी दूर किए बगैर वो संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश करे...औऱ सरकार की पूरी कोशिश विधेयक को पेश करने से पहले सपा को मनाने की भी होगी। साथ ही सरकार के सामने सबसे बड़ी और मुश्किल चुनौती सरकारी कर्मचारियों का वो बड़ा गुट है जो लगातार प्रमोशन में आरक्षण का विरोध कर रहा है। इस गुट ने साफ भी कर दिया है कि अगर प्रमोशन में आरक्षण लागू होता है तो वो बिना सूचना के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे। अब सरकार अगर प्रमोशन में आऱक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पेश करती है तो सरकार को सरकारी कर्मचारियों के इस गुट की नाराजगी झेलनी पड़ेगी जो सरकार को 2014 के आम चुनाव में भारी पड़ सकती है। ऐसे में सरकार भले ही बिल को लेकर अपनी मंशा जाहिर कर चुकी हो...लेकिन अंदरखाने इसको लेकर चिंतन जरूर चल रहा है कि आखिर वो करे तो क्या करे। बहरहाल सड़क से लेकर संसद तक जारी इस लड़ाई में किसके चेहरे पर खुशी झलकेगी और किसके चेहरे पर नाराजगी ये तो वक्त ही बताएगा...फिलहाल प्रमोशन में आरक्षण के जिन्न ने सबकी नींद जरूर उड़ाकर रखी है।

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नेताजी,मानता हूँ ।




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नेताजी, मानता  हूँ ।


मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी, हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


नेताजी, फिर  भी  आप  रह   जायेंगें   भूखे,  मैं   जानता  हूँ ।


१.

झूठे  -  मूठे   वर   देंगें,  रहने   को   ये   घर  देंगें,  खुशी   मना..!

कैसा  घर, कैसी  खुशी, महँगाई  ने  तिल-तिल  कर  हमें  मारा ।

नेताजी,  आप  तो  कभी  न   थे   इतने  सस्ते?  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर   भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


२.


हाल  -  बेहाल  हम  रहते   हैं   और   मजबूरी   में   जीते   हैं ।

कब का  भूल चूके  हैं  रोना, दर्द  पर  भी  हम  तो  हँसते   हैं..!

नेताजी,  दर्द   की  आँख   के  आप   सितारे   हैं , जानता  हूँ ।

मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


३.


मत  मारी  गई  थी  हमारी, जो   हमने  आप  का  बटन  दबाया ।

जंगल  जाने   को  बचा   था, एक ही  लोटन,  वो  भी  बिकवाया?

नेताजी,  फिर   भी   आप   रह   जायेंगे   प्यासे,  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर    भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०८-२०१२.

23.8.12

दिल की दरार । (गीत)




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दिल की दरार । (गीत)



दिल   की   दरार  से,  दर्द  का  लावा  बह  रहा  है ।


दोस्त,राख बन कर अब वो,पछतावा  कर  रहा  है ।


(लावा=ज्वालामुखी पदार्थ;  छलावा= धोखेबाज़ी)



अंतरा-१.



इश्क  से   परहेज़   करने  के   पल  आ  गए,  शायद..!


किनारा  करते  हैं  हम  से  वो,  भुलावा   कह  रहा  है । 


दिल    की   दरार   से,  दर्द   का   लावा  बह  रहा  है ।

(परहेज़= एहतियात; भुलावा=  चकमा देना)



अंतरा- २.



अरमाँ भरा  चमन  खिला  तो  था, गुलों  के  लिए, पर..!


महफ़िल   सजाएगें   अब   कांटें,  बुलावा  कह  रहा  है ।


दिल    की     दरार   से,  दर्द    का   लावा  बह  रहा  है ।

(गुल= फूल; बुलावा= निमंत्रण)



अंतरा-३.



मुस्कुराहटों  में   तेरी,  ये  दिल  भी  तहत  था, मगर..!


दिल  की    दरार  से  देख अंदर,  छलावा  हँस  रहा  है ।


दिल    की     दरार   से,  दर्द    का   लावा  बह  रहा  है ।

(तहत= शामिल होना)



अंतरा-४. 



जाए  तो   जाए  कहाँ,  बेकस, टूटा - फूटा  सा  दिल..!


शायद,  मयक़दे   की  ओर,  ये  कारवाँ   चल  रहा  है?


दिल    की     दरार   से,  दर्द    का   लावा  बह  रहा  है ।

(बेकस= लावारिस)


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२३-०८-२०१२.

22.8.12

महंगाई से खुश मंत्री, जनता बेहाल


देश की जनता भले ही महंगाई से त्रस्त हो। आम आदमी की कमर भले ही टूट रही हो, लेकिन ऐसे में कोई मंत्री महंगाई से खुश हो, तो आश्चर्य ही होता है। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि महंगाई बढ़ेगी तो किसानों का फायदा होगा। इसलिए वह बढ़ती महंगाई से खुश है। पता नहीं ही चला कि मंत्री का यह कोन सा गणित था। प्रधानमंत्री महंगाई पर चिंता जाहिर करते हैं उसे चुनौती भी बताते हैं ओर उन्हीं का मंत्री उनकी चिंता की हवा निकाल देता है। जमीनी हकीकत यह है कि महंगाई का असल फायदा दलालों, बिचौलियों को होता है। कृषि प्रधान देश में किसान ही आत्महत्या करते हों, तो दुर्भाग्य को समझा जा सकता है। महंगाई, भ्रष्टाचार व घोटालों से जनता में पहले ही आक्रोश है। इस तरह के बयान जनता के जख्मों पर नमक डालने जैसा है। ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब हरविंदर नामक एक युवक ने कृषि मंत्री शरद पंवार को चाटा जड़ दिया था। कानूनी रूप से यह अपराध था जिसके लिये उसे जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उसके आक्रोश को झलकाता था। वह महंगाई से परेशान था। पंवार महंगाई पर अपने बयानों को लेकर चर्चित रहे थे। कभी कहते थे कि वह कोई ज्योतिष नहीं कि बताये कब घटेगी महंगाई, कभी कहते थे कि चीनी या दूध के दाम बढेंगे। उनके बयान के बाद ही रेट बढ़ जाते थे। जरूरी हो जाता है कि जनता के आक्रोश को समझना चाहिए। क्योंकि जनता की मार कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे खुदा की बेआवाज लाठी।

चुकंदर - सेहत का सिकंदर


चुकंदर - सेहत का सिकंदर


चुकंदर या बीटा वल्गेरिस (Family Chenopodiaceae) अनेक विटामिन, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट से भर पूर एक सुपर फूड है। यह पीले, लाल, बैंगनी या जामुनी कई रंगों में मिलता है। चुकंदर हर सलाद, व्यंजन और सब्जियों में एक नया रंग भर देता है। यह सेहत के लिए बहुत उपयागी है, हम इसे सेहत का सिकंदर कहते है। कैंसर समेत कई बीमारियों में इसका उपयोग होता है। इसे कच्चा, उबाल कर या सब्जी बना कर खाया जाता है। इसकी पत्तियां और जड़ दोनो खाये जाते हैं। आयुर्वेद में इसका प्रयोग औषधि के रूप में भी होता है। इसका ज्यूस एक उत्कृष्ठ टॉनिक है।
चुकंदर का पौष्टिकता और स्वाद बनाये रखने के लिए इसको बिना छिलका निकाले डेढ़ दो इंच टहनी के साथ ही 15 मिनट तक भाप में पकाना चाहिये। पकने से इसकी ऊपरी परत आसानी से निकल आती है और यह अन्य व्यंजन बनाने के लिए तैयार हो जाता है।

इतिहास
चुकंदर की खेती 4000 वर्षों से की जा रही है। आयुर्वेद के कई ग्रंथों में चुकंदर के औषधीय गुणों का वर्णन मिलता है। सबसे पहले बेबीलोन साम्राज्य में इसे खाना शुरू किया गया। ग्रीक और रोम ने इसकी जड़ को औषधी के रूप में और पत्तियों को सब्जी के रूप में प्रयोग किया। हिपोक्रेट्स चुकंदर की पत्तियों से घाव की ड्रेसिंग करता था। इंगलैंड में इसका ज्यूस बूढ़े, कमजोर और रुग्ण लोगों को पिलाया जाता था। अफ्रीका में इसे सायनाइड पॉइजनिंग के उपचार  में प्रयोग किया जाता था।
पोषक तत्वों का गुलदस्ता
चुकंदर में लगभग 10 % जटिल शर्करा होती है, जो शरीर को ताकत देती है। इसमें  विटामिन-ए, विटामिन बी-6, विटामिन बी-12, विटामिन-सी, विटामिन-के, फोलिक एसिड आदि और पोटेशियम, कैल्शियम, मेगनीशियम, मेंगनीज, फोसफोरस, कॉपर, लोह, बोरोन आदि खनिज होते हैं। विदित रहे इसमें केले से भी ज्यादा पोटेशियम होता है। यह घुलनशील फाइबर का भी अच्छा स्रोत है। इसमें कई फाइटोन्यूट्रिएंट्स जैसे बीटाकोरोटीन, ल्यूटिन, जियाजेंथिन, बेटेन, ट्रिप्टोफेन आदि होते हैं।
चुकंदर में कुछ गहरे रंग के स्वास्थ्यवर्धक तत्व होते हैं जिन्हें बीटालेन (betalains) कहते हैं। बीटालेन दो तरह के होते हैं। 1- बीटासायनिन (betacyanins)  और 2- बीटाजेंथिन (betaxanthin)। बीटासायनिन लाल-बैंगनी रंग का तत्व है, जबकि बीटाजेंथिन पीले या नारंगी रंग का तत्व है। बीटानिन बीटरूट में प्रचुर मात्रा में होता है और इसका नाम भी उसी से निकला है। यह एक ग्लूकोसाइड है, जो निर्जलीकृत (hydrolyze) होकर ग्लूकोज और बीटानिडिन बनाता है। यह खाद्य पदार्थों को रंग देने के काम में आता है। बीटानिन नाम के बीटासायनिन तत्व पर बहुत शोध हुई है। हल्के या गहरे लाल, बैंगनी या जामुनी रंग के चुकंदर में मुख्यतः बीटासायनिन तत्व होता है।  पीले चुकंदर में मुख्य तत्व बीटाजेंथिन होता है। सभी बीटालेन में मुख्य अणु बीटालेमिक एसिड होता है, जिससे अमाइनो एसिड डेरीवेटिव जुड़ कर बीटालेन तत्व बनता है। अमाइनो एसिड डेरीवेटिव के आधार पर बीटालेन की पहचान होती है। बीटालेन पानी में धुलनशील होते हैं।  चुकंदर में बीटानिन के अलावा वल्गाजेंथिन, आइसोबीटानिन, प्रोबीटानिन और नियोबीटानिन अन्य बीटालेन होते हैं।  
बीटालेन एरोमेटिक इंडोल डेरीवेटिव हैं, जो टायरोसीन से बनते हैं। बीटालेन की रासायनिक संरचना एंथोसायनिन से बिलकुल भिन्न होती है, ये तो फ्लोवानॉयड भी नहीं हैं। बीटालेन में नाइट्रोजन होती है, जबकि एंथोसायनिन में नाइट्रोजन होती है। हर बीटालेन एक ग्लूकोसाइड है, जिसमें एक शुगर और रंग तत्व होता है। इनका निर्माण प्रकाश की उपस्थिति में प्रोत्साहित होता है। 
अधिकांश बीटालेन एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेट्री होते हैं। इसके साथ ही ये बहुत जल्दी ऑक्सीडाइज हो जाते हैं। चुकंदर के अलावा रूबार्ब, कॉर्ड, एमरेंथ, प्रिकली पियर केक्टस, नोपल केक्टस आदि भी इनके अच्छे स्रोत हैं।
चुकंदर के औषधीय गुण
हृदयरोग में उपयोगी - चुकंदर रक्तचाप कम करता है। हार्टअटेक और स्ट्रोक के जाखिम का कम करता है। चुकंदर में नाइट्रेट्स होते हैं, जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं और रक्तवाहिकाओं को डायलेट करते हैं और रक्तचाप कम करते है। चुकंदर में मौजूद पोटेशियम स्ट्रोक से बचाने में मदद करता है। चुकंदर के बीटासायनिन एल.डी.एल. कॉलेस्टेरोल को ऑक्सीडाइज होने के रोकते है, जिससे धमनियों की भित्तियों में फैट्स जमा नहीं हो पाते हैं और हर्ट अटेक और स्ट्रोक का जोखिम कम होता है। होमोसिस्ट्रीन रक्तवाहिकाओं को क्षतिग्रस्त करता है और बीटेन शरीर में होमोसिस्ट्रीन के स्तर को कम करता है।
डायबिटीज में सहयोगी - चुकंदर में फैट्स बिलकुल नहीं होते और कैलोरी भी कम होती है। इसका ग्लायसीमिक इंडेक्स 64 (मध्यम) और ग्लायसीमिक लोड बहुत कम 2.9 होता है, जिसका मतलब है कि इसके कोर्बोहाइड्रेट बहुत धीरे ग्लूकोज में परिवर्तित होते हैं और इस तरह रक्तशर्करा के स्तर को स्थिर रखते हैं। 
यकृत का रक्षक - चुकंदर में विद्यमान बीटासायनिन निर्विषीकरण या शरीर के टॉक्सिन्स का उत्सर्जन (detox) करने में यकृत की बहुत सहायता करते हैं। साथ ही रक्तवाहिकाओं को साफ रखते हैं।
कैंसर का भक्षक - चुकंदर ल्यूकीमिया और कैंसर के उपचार में बहुत प्रभावशाली पाया गया है। यह यकृत, गुर्दा, पित्ताशय, रक्त और लिम्फ का शोधन करता है। चुकंदर में बीटालेन प्रजाति के एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेट्री तत्व होते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं का भक्षण करते हैं। बीटासायनिन डी.एन.ए. म्यूटेशन को बाधित करते हैं। इसमें एक बीटेन नाम का कैंसररोधी एमाइनो एसिड होता है।
विस्कोसिन-माडिसन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध में यह पाया है कि चुकंदर में विद्यमान लाल रंग का तत्व शरीर में विशेष तरह के प्रोटीन्स का स्तर बढ़ाता है, जिन्हें फेज II एंजाइम कहते हैं। ये एंजाइम्स कैंसर पैदा करने वाले टॉक्सिन्स को निष्क्रिय करके विसर्जन करते हैं। (जरनल ऑफ एग्रीकल्चरल एण्ड फूड कैमिस्ट्री) सन् 1950 से सोमा हॉस्पीटल, हंगरी के डॉ. फेरेंजी सिर्फ चुकंदर से कैंसर का उपचार करते आ रहे हैं। वे चुकंदर के अलावा कुछ भी प्रयोग नहीं करते हैं।
बीटेन लाये खुशियों की बयार - चुकंदर में बेटेन और ट्रिप्टोफेन नामक फील गुड तत्व होते हैं जो मन को शांत करते हैं,  प्रसन्न रखते हैं, डिप्रेशन दूर करते हैं और मूड एलीवेटर का काम करते हैं।
बोरोन लाये यौवन की बहार - चुकंदर में बोरोन नामक तत्व पर्याप्त मात्रा में होता है, जो सीधा लैंगिक हार्मोन्स का निर्माण बढ़ाता है। इसलिए इसे प्राकृतिक कामोद्दीपक कहा जाता है। कई लोग इसे प्राकृतिक वियाग्रा मानते हैं। रोमन साम्राज्य में इसका ज्यूस कामोद्दीपक द्रव्य माना जाता था। पोम्पेई में स्थित प्राचीन काल के विख्यात वैश्यालय ल्यूपनारे की दीवारों पर लगे चित्रों में चुकंदर को  कामोद्दीपक के रूप में दिखाया गया है।
अन्य प्रयोग - इसमें विद्यमान विटामिन-सी अस्थमा से बचाव करता है। बीटाकेरोटीन मोतियाबिंद और मेक्यूलर डीजनरेशन से बचा कर रखता है।  चुकंदर में मौजूद फाइबर कब्जी में लाभ पहुंचाते हैं। स्वास्थ्य के साथ ही यह त्वचा के लिए भी बहुत उपयोगी है। चुकंदर के रस को थोड़े से सिरके में मिलाकर सिर में लगाने से यह रूसी को दूर करता है।  चुकंदर का प्रयोग टमाटर के पेस्ट, सॉस, डेज‌र्ट्स, जैम, जेली, आइसक्रीम और मिठाई में रंग द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है।
चुकंदर में सिलिका नामक खनिज होता है जो शरीर में कैल्शियम की उपयोगिता को बढ़ाता है, जिससे हड्डियां  स्वस्थ और मजबत बनती हैं। और ऑस्टियोपोरोसिस से बचाता है। चुकंदर में फोलिक एसिड होता है, जो भ्रूण की स्पाइनल कोर्ड के विकास के लिए बहुत आवश्यक होता है। और जन्मजात विकार स्पाइना बाइफिडा से बचाता है।
सावधानियां
·       इसका ज्यूस  हमेशा किसी अन्य सब्जी या फल जैसे गाजर, सेब, अजमोद आदि के ज्यूस में मिलाकर पीना चाहिये। खाली चुकंदर का ज्यूस पीने से वोकल कोर्ड में क्षणिक तकलीफ हो सकती है। 
·       कई बार चुकंदर खाने से लाल रंग का पेशाब आ सकता है। इसे बिटूरिया कहते हैं। लेकिन यह हिमेचूरिया नहीं है और चिंता का विषय भी नहीं है। यह सामान्य घटना है और थोड़ी देर बाद स्वतः नारमल यूरीन आने लगता है। यह रक्तस्राव नहीं है।
·       इसके पत्तों में ऑग्जेलेट होता है, यदि शरीर में इसकी मात्रा अधिक होने पर यह क्रिस्टलाइज हो सकता है। इसलिए पथरी के रोगियों को इसकी पत्तियां नहीं खाना चाहिये।