Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

22.12.07

88 भड़ासी--- साथियों से अपील

नए साल में 100 भड़ासी
भड़ास की सदस्य संख्या बस कुछ ही दिनों में 100 का आंकड़ा छूने को है। आज सदस्य संख्या देखने लगा तो कुल 88 लोग दिखे। बढ़िया है, भड़ास का भविष्य उज्जवल है। दरअसल, कई बार मुझे खुद लगता है कि आखिर भड़ास में क्या रखा है जो लोग उसे देखने, पढ़ने या मेंबर बनने आते हैं। इसका जवाब मेरे कई साथियों ने दिया, जो भड़ास को गाहे बगाहे देखते रहते हैं। उनका कहना है कि दरअसल भड़ास हम लोगों के लिए एक ऐसी जगह है जहां पर लगता है कि हम सभी अपने दिल की भाषा में बात कर रहे हैं। वो जो चीजें रोज रोज महसूस कर रहे हैं पर कह नहीं पा रहे हैं। वो बातें जो किसी से कहना चाहते हैं पर डर लगता है कि किससे कहें क्योंकि आजकल दीवारों के भी कान होते हैं। ये सारी बातें भड़ास में इतनी सहजता से लिखने और कहने और पढ़ने को दिल करता है कि लगता है जैसे भड़ास कोई ब्लाग नहीं बल्कि एक जिंदा पर्सनाल्टी लिए हुए कोई व्यक्ति हो। भड़ास एक फ्री स्पेस है, पर्सनाल्टी को रिलीज करने के लिए या अपने अंदर के कूड़े-कचरे को निकालने के लिए।
चलिए....भड़ास के सदस्यों की शतक सख्या पूरा होने का जश्न जल्द ही करेंगे। उम्मीद है कि नए साल में भड़ास कुल 100 की सदस्य संख्या के साथ प्रवेश करेगा।

भई, सभी भड़ासी लिखते रहें, आगे काम आएगा...
और हां, इस मौके पर मैं खुद सारे भड़ासी साथियों से अपील करूंगा कि वे गाहे बगाहे लिखते रहें। खासकर उन लोगों से जिन लोगों ने आजतक भड़ास पर कुछ नहीं लिखा। यह कहने के पीछे मेरा हित थोड़ा जो है सो है ही, आपका हित ज्यादा है। दरअसल, जिस तेजी से आनलाइन जर्नलिज्म का दौर आ रहा है और जिस तेजी से बड़े बड़े ग्रुप हिंदी में आनलाइन पत्रकारिता के लिए अपने अपने पोर्टल लांच करने लगे हैं वैसे में यह बहुत जरूरी है कि आप सभी पत्रकार और गैर पत्रकार मित्र खुद को आनलाइन लाइफ के साथ अभ्यस्त कर लें। इसके लिए जरूरी है कि आप यूनीकोड डायनमिक हिंदी फांट के साथ अभ्यस्त हों। उसमें कंपोज करना शुरू करें। मैंने हाल फिलहाल जिन शहरों की यात्रा की उनमें कई साथियों को ब्लागिंग करना और हिंदी टूल किट डाउनलोड करने के बाद कंप्यूटर में इंस्टाल कर टाइप करना बताया। इससे उन साथियों में अब गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है। वे लोग अब अखबार की नौकरी-चाकरी के साथ साथ एक नई दुनिया के बारे में सोचने-विचारने लगे हैं ताकि कल को किसी आड स्थिति में वे खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकें या फिर वे एक नई दुनिया की जरूरत के हिसाब से खुद को सक्षम बना सकें। आनलाइन जर्नलिज्म के बारे में जानने को लेकर और भड़ास से संबंधित अगर किसी साथी के मन में कोई सवाल हो तो बेहिचक मुझसे फोन पर या मेल के जरिये बात कर सकता है।

लेखन में विविधता लाएं
और हां, लिखने के लिए यह कतई जरूरी नहीं कि आप बहुत धीर गंभीर ही लिखें। आप चुटकुले, संस्मरण, कविता, गाने, व्यंग्य...कुछ भी लिख सकते हैं। और यह सब करने के लिए बड़ा आसान तरीका है, पहले भड़ास का मेंबर बनिए,,,दाएं तरफ लिखे भड़ासी बनिए वाले लिंक को क्लिक करके। उसके बाद उसमें अपनी मेल आईडी और पासर्वड डाल देंगे तो भड़ास के मेंबर बन जाएंगे। फिर नई पोस्ट पर क्लिक कर टाइटल में हेडिंग टालिए और नीचे के बड़े खाने में मैटर। और सबसे नीचे लिखे पब्लिश पोस्ट पर टाइप करिए, बस आपका लिखा भड़ास में छप जाएगा। उम्मीद है आप लोग एक बार ट्राइ जरूर मारेंगे। जो साथी लगातार लिखते रहे हैं उनसे अपील है कि वे अपने लेखने में विविधता लाएं। बोले तो कभी व्यंग्य तो कभी चुटकुला तो कभी संस्मरण तो कभी खबर तो कभी कहानी....। टेस्ट बदलते रहने से मूड हलका रहता है। मुझे ही देखिए ना, इन दिनों में क्या खूब बैटिंग कर रहा। कहानी लिखा, फिर खुद को स्वामी बनाया अपनी तस्वीर डालकर। उसके बाद बाबा ने सवालों के जवाब दिए। उसके पहले संस्मरणात्मक आलेख लिखे। चलिए, भाषण बहुत हो गया। 88 सदस्य बनने की खुशी में हम सभी मिलकर कहते हैं.... जय भड़ास
यशवंत

21.12.07

पत्रकारों के सवाल, भड़ासानंद के जवाब-- संपादक जासूसी कराना चाहता है, मैं यह करना नहीं चाहता, क्या करूं ??

आधा दर्जन शहरों की यात्रा करने के बाद और ढेर सारे पत्रकार व गैर पत्रकार मित्रों से मिलने के बाद मुझे लगा कि अब तो पत्रकारों के दुखों का शमन करने के लिए हेल्पसेंटर खोल देना चाहिए। पिछली पोस्ट स्वामी भड़ासानंद के यूं दिखने वाली डाली तो वाकई कई पत्रकार मित्रों के फोन व मेल आए। स्वामी जरा हमारे कष्ट को दूर करिए। मैंने पूछा क्या कष्ट है बच्चा, तो कुछ यूं बोले--

सवाल--15 वर्षों से पत्रकारिता में हूं, संपादक का खास हूं, लेकिन संपादक चाहता है कि मैं पूरे आफिस में कौन क्या बोल सोच व कह रहा है, इसकी जासूसी करूं और उसे एक एक लाइन बताऊं, बताइए भला, ऐसा कोई कैसे कर सकता है, आप मेरे कष्ट को दूर करिये??

तो मैंने उन सज्ज्न को जो समझाया वो इस प्रकार है....


स्वामी भड़ासानंद का जवाब-- हे बुजुर्ग बोले तो सीनियर पत्रकार। इस धंधे में चापलूसी और जासूसी अनिवार्य तत्व हैं। अगर आप जासूसी कर कर के आज तक आगे बढ़े हैं तो फिर इस काम को और अधिक गहराई व चालाकी से किए जाने के संपादक के डिमांड से दुखी क्यों हो रहे हैं? वैसे कई बार होता है कि डाकू का भी हृदय परिवर्तन होता है तो वो गैंग छोड़कर नार्मल जीवन जीने की कोशिश करता है लेकिन डाकुओं को तो उस पर मुखबिर हो जाने का शक हो जाता है और उसकी इहलीला खत्म कर डालते हैं। इसी प्रकार आप जिन चापलूसी और जासूसी के गुणों के आधार पर आज तक पल्लवित-पुष्पित हुए हैं, उसे छोड़ देंगे तो संपादक आपको उसी तरह शूट कर देगा जिस तरह गैंग छोड़कर जाने वालों को गैंग वाले शूट कर देते हैं। आप संपादक की इच्छाओं का शमन करिए लेकिन आप नई जगह नौकरी तलाशते रहिये पर ध्यान रखिएगा, नई जगह बात करते वक्त निष्ठावान होने और संपादक का झंडा फहराने जैसी बात न करियेगा वर्ना वह फिर जासूसी व चापलूसी की मांग करने लगेगा। आप सिर्फ और सिर्फ बेहतर कंटेंट देने, बेहतर अखबार निकालने व बढ़िया रिजल्ट देने की बात करिये, उम्मीद है आपको नई नौकरी में दिक्कत नहीं आएगी।


वो भक्त संतुष्ट दिखे। लेकिन थोड़े नाराज भी थे, मेरे साफ साफ बोल देने से, लेकिन मैंने जैसे ही बताया कि बच्चा, मेरे इर्द गिर्द कोई नहीं बैठा है और ये बातें सिर्फ एक्सक्लूसिव आप तक ही पहुंच रही हैं तो वे नार्मल हुए। आप के भी कोई कष्ट हों तो स्वामी के कान में बोल सकते हैं, दुख दूर करेंगे बाबा.....

अगले रोज एक नए सवाल और जवाब के साथ फिर हाजिर होंगे बाबा, तब तक के लिए भक्तों जोर से बोलो......

जय भड़ास

यशवंत

20.12.07

शोक संवेदना

हमारे सक्रीय साथी अंकित माथुर के पिता जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है..

मैं उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुये उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करता हूँ
ईश्वर इस दुख की घड़ी मे उनके परिवार को धैर्य रखने की शक्ति दे
उनके परिवार के साथ मेरी पूरी संवेदना है..

Interesting Comments

Marriages are made in heaven,
then what are made in Hell?
Ans : the days after marriage


During Marriage ceremony why is the bridegroom is made to sit on the horse ?
He is given his last chance to run away.


I wrote ur name on the sand ............ ..
it got washed away,
I wrote ur name in air......... ......... ........
it got blown away,
So i wrote ur name in my heart....... ......
I got a HEART ATTACK

आजकल यूं दिखते हैं स्वामी भड़ासानंद !



(तस्वीर अविनाश जी के सौजन्य से। श्रावणी दीदी को देखने के लिए बीते रविवार को अपने कुनबे के साथ पहुंचा था उनके मोहल्ले में। इसी दौरान अविनाश जी ने स्टिंग शुरू कर दिया। मोबाइल फोन के कैमरे में मेरा पूरा कुनबा आ गया लेकिन मुझे सबसे अलग तस्वीर खुद की दिखी। यूं भी, आत्ममुग्ध आदमी को खुद की ही तस्वीर हर जगह दिखती है। तो लगा, कि यह तस्वीर तो भड़ास के भड़ासानंद जैसी लग रही है। फिर स्वामी भी जोड़ दिया, जब डेवोशन और स्प्रिचुवलिज्म के फील्ड में आफिसियल काम कर रहा हूं तो निजी जीवन को भी इससे अलग क्यों रखा जाए। तो चलिेए, स्वामी भड़ासानंद के दर्शन कीजिए और अगर मन में कोई शक, शुबहा, परेशानी, दिक्कत, तकलीफ, द्वेष, ईर्ष्या...किसी तरह के कोई भाव हों तो कमेंट के रूप में या मेल के रूप में या रिंग करके जरूर जाहिर करें। अब क्या करें, जब कोई बाबा की जय नहीं कर रहा तो खुद ही बोल देते हैं,,,स्वामी भड़ासानंद की जय....स्वामी भड़ासानंद जिंदाबाद....

जय भड़ास
यशवंत

19.12.07

एक दुखद समाचार

आप सभी साथियों को खेद के साथ सूचित कर रहा हूँ कि हमारे सक्रीय साथी अंकित माथुर के पिता जी का आज दोपहर सहारनपुर मे निधन हो गया। श्री माथुर पिछले एक लम्बे अर्से से बिमार चल रहे थे। उन्होने अपनी अन्तिम सांस अपने गिल कॉलोनी स्थित निवास पर ली। स्वर्गीय श्री माथुर दुनिया की जानी मानी कम्पनी आईटीसी से रिटायर होने के बाद सहारनपुर मे ही रहे। स्वभाव से वे शान्त और मिलनसार थे। मैं और रंगकर्मी परिवार उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुये उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करते है। ईश्वर इस दुख की घड़ी मे उनके परिवार को धैर्य रखने की शक्ति दे।

परवेज़ सागर
एंव समस्त रंगकर्मी परिवार

www.rangkarmi.blogspot.com
www.parvezsagar.blogspot.com

18.12.07

चुनाव और पत्रकार

चुनाव और पत्रकारों का रिश्ता दिनों दिन ऐसा होता जा रहा है जैसा कि जनम जनम के साथी हों । भाई ये सब तो ठिक है लेकिन उस देश में जहाँ लोग भावना जाती धर्म पर वोट देते हैं वहाँ चुनावी जीत कि भविस्वानी ठिक नहीं । गलती हम लोगों कि भी नहीं , आख़िर इस विज्ञापन कि दुनिया में जहाँ सत्य कि जगह सनसनी पर जोर हो , कोई क्यों बक्सा खुलने का इंतजार करे। कहीं आप हाथ हाथ पर धरे रह जाएगें और चुनावी जीत कि भाविश्वानी कर कोई और अपने को तेज दिखाकर आस विज्ञापन झटक ले जाएगा। हमें तो लगे रहना है । उस मशीन कि तरह जो चलने लायक नहीं रहता है तो उसे बदल या कबार में बेच दिया जाता है। करवा लिखने के लिए के लिए क्षमा।

एक नया ब्लाग-- बेहया, आइए स्वागत करें

आजकल दौरे पर हूं। आगरा में। आफिसियल काम निपटाने के साथ साथ मित्रों-दोस्तों और अग्रजों से भी मिलना जुलना हो रहा है। इसी क्रम में एक ऐसे पुराने साथी मिले जो बनारस से लेकर मेरठ तक आफिस और परिवार के हिस्से बने रहे। आजकल आगरा में है। नाम है जेपी नारायण। पेशे से पत्रकार हैं लेकिन दिल से कवि और एक अच्छा इंसान। अपनी जमीन और अपने मनुष्यों की फिकिर चिंता में हमेशा बेचैन से रहते हैं। इस मतलबपरस्त दौर में अपने दिल का हाल कहें तो किससे कहें। सो, संवेदनाओं को शब्दों का रूप देकर उसे कागज पर उतार देते हैं। देखते देखते एक दशक बीत गया और उनके पास इकट्ठी हो गईं ढेरों कविताएं। संकोची स्वभाव के कारण वे कभी कोशिश नहीं किए कि इन कविताओं को पुस्तक का रूप दिया जाए। बाद में जब दोस्तों ने उनकी कविताओं को कई बार सुना तो सलाद दे डाली कि इन्हें तो प्रकाशित कराया जाना चाहिए लेकिन जेपी जी टालते रहे। आखिर में मित्रों के दबाव में उन्हें अपने कविताओं को प्रकाशन के लिए देना पड़ा।

दो कविता संग्रह हैं उनके। ज्यादातर वक्त आफिस में बीतता है और बाकी वक्त घर गृहस्थी चलाने में सो इंटरनेट और ब्लागिंग से दूर ही रहते लेकिन जब मैं आगरा में उनके घर मिला और ब्लागिंग के बारे में जानकारी दी, साथ ही उनके कंप्यूटर पर उन्हें ढेर सारे ब्लाग दिखाए तो उनका भी मन हुआ की हिंदी के इस विश्व विजय के इस अभियान में वे भी शरीक होना चाहेंगे, अपने ब्लाग के जरिए। बस क्या था, नेकी और पूछ पूछ। मैंने तुरत फुरत उनका ब्लाग बनवा डाला। एक आपरेटर की तरह उन्हें ब्लाग के तकनीकी और क्रिएटिव पक्ष समझाता रहा और वे एक ब्लागर की तरह अपने ब्लाग के नाम से लेकर उसकी पंचलाइन तक पर सोचते विचारते और सुझाते रहे। इस क्रम में जन्मा बेहया। आप जब उनके ब्लाग पर जाएंगे तो उनकी जो पहली इंट्रोडक्ट्री पोस्ट हैं उसमें ब्लाग के नाम के बारे में व्याख्या भी पाएंगे।

तो मैं सभी ब्लागर दोस्तों, भड़ासियों और पाठकों से अनुरोध करूंगा कि वो बेहया ब्लाग को जरूर पढ़ें और जेपी नारायण जी का उत्साहवर्द्धन करें ताकि हिंदी ब्लागरों की दुनिया में एक नये शख्स का मनोबल बढ़ सके। उनके ब्लाग का यूआरएल इस तरह है....
http://behaya.blogspot.com

आगरा के बाद मथुरा और वृंदावन जाना है, वहां से लौटकर आने पर फिर तफसील से बात होगी, तब तक के लिए जय भड़ास...
यशवंत

16.12.07

नमस्कार

भड़ास के सभी सभी साथियों को मेरा नमस्कार प्रशांत जैन नवभारत टाइंमस

कोई मेरी मदद कीजिए

मुझे अखबार में जगह चाहिए कोई सहयोगी बनेगा
कृपया मेरी मदद कीजिए

कैसे हुई लुधियाना में भास्कर की लांचिंग

15 दिसंबर. नार्थ इंडिया की पत्रकारिता का एक और खास दिन. हिंदी पत्रकारिता का एक और मुकाम. पंजाब के सबसे जीवंत शहर और आर्थिक राजधानी से दैनिक भास्कर की शुरुआत के रूप में. मैं लुधियाना भास्कर की लांचिंग टीम का एक अदना सा हिस्सा. गिलहरी योगदान देने वाला "एडम ब्रिज" का मजदूर कल कराउंगा इस रचना प्रक्रिया के कुछ हिस्सों से वाकिफ. कल यानी 17 दिसंबर को आप जानेंगे लुधियाना की धडकनों में शामिल हुए अल्फाजों के जादू का संगीत जो अब भी बज रहा है. जिसकी हल्की धुन आपके कीबोर्ड की ठकठकाहट के साथ एक नया वातावरण पैदा कर रही है. अभी अभी जब आप माउस को स्क्रौल कर रहे हैं लुधियाना पढ रहा है भास्कर. समूचा पंजाब पढ रहा है भास्कर. एक पत्रकार की जुबानी पत्रकारिता की यह कहानी. कीजिए कल तक इंतजार.
शब्बा खैर
सचिन लुधियानवी

15.12.07

ड्रामा था रूबिया सईद का अपहरण

एक अखबार में छपी खबर के मुताबिक कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत करने वाले बहुचर्चित रुबिया सईद अपहरण कांड, जो तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी थी, असल में एक ड्रामा था जो राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए रचा गया था।
अलगाववादी नेता हिलाल वार की ‘ग्रेट डिस्क्लोजरः सीक्रेट अनमास्क्ड’ पुस्तक में सनसनीखेज दावा
रियासत में खूरेंजी आतंकी हिंसा को बढ़ावा कब मिला? आईसी 814 विमान को हाईजैक कर कंधार ले जाकर आतंकी कमांडरों को रिहा कराने की साजिश को किसने प्रोत्साहित किया?
इन सवालों का जब भी जवाब तलाशा जाता है तो पहला जवाब अकसर यही आता है कि अगर 13 दिसंबर, 1989 को तत्कालीन केन्द्र सरकार ने आतंकियों के आगे झुकने से इंकार करते हुए रुबिया सईद को रिहा ने कराया होता तो शायद कश्मीर में आतंकी हिंसा 1990 के दशक के प्रारंभ में ही समाप्त हो जाती। अलबत्ता, अब एक अलगाववादी नेता ने अपनी किताब में रुबिया सईद अपहरण को लेकर एक नया खुलासा करते हुए आरोप लगाया है कि यह सिर्फ एक ड्रामा था जो तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जेकेएलएफ के कमांडर यासीन मलिक के साथ मिलकर रचा था। पीपुल्स पोलिटिकल पार्टी के चैयरमैन हिलाल वार द्वारा लिखी गई किताब ‘द ग्रेट डिस्क्लोजर, सीक्रेट अनमास्क्ड’ में इस अपहरण को ‘ओछी राजनीति की महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा’ बताया गया है। किताब के पृष्ठ नंबर 289 पर हिलाल वार ने साफ शब्दों में है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद को लगता था कि जम्मू-कश्मीर की सियासत से उनका पत्ता साफ करने के लिए शेख अब्दुल्ला का खानदान जिम्मेवार है इसलिए जब वह केन्द्र में गृहमंत्री बने तो उन्होंने उसी समय फारुक अबदुल्ला की सरकार गिराने की साजिश रचनी शुरु कर दी थी। पहले तो उन्होंने जगमोहन को राज्यपाल बनवाने का प्रयास किया लेकिन जब फारुक अब्दुल्ला ने इस पर इस्तीफे की धमकी दी तो जगमोहन को राज्यपाल बनाने का मुफ्ती का दांव खाली चला गया। हिलाल वार ने इसी पृष्ठ पर आगे लिखा है कि इसके बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने एक और योजना बनाई। इसके तहत जेकेएलएफ के संस्थापक सदस्यों में से एक और 1965 में कश्मीर के प्रमुख अलगाववादियों में से एक मियां सरवार को जेकेएलएफ के तत्कालीन कमांडर मोहम्मद यासीन मलिक से मिलने और उसे रुबिया सईद के अपहरण का ड्रामा करने के लिए कहा गया। इसके बाद दिसंबर 1989 के पहले सप्ताह में किसी रात राज्य पुलिस के तत्कालीन डीजी गुलाम जिलानी पंडित के मकान पर एक गुप्त बैठक हुई। इसमें मियां सरवर, यासीन मलिक और डॉक्टर गुरु शामिल हुए। इसी बैठक में अपहरण के ड्रामे की रुपरेखा तैयार करते हुए फैसला किया गया कि मुफ्ती मोहम्मद सईद की डॉक्टर बेटी रुबिया सईद ललदेद अस्पताल से एक सार्वजनिक मिनी बस में बैठकर घर के लिए रवाना होगी। उसके साथ कोई सुरक्षाकर्मी नहीं होगा जो एक गृहमंत्री की बेटी के साथ होना चाहिए। इसके बाद योजना के मुताबिक आठ दिसंबर 1989 को रुबिया सईद अस्पताल के बाहर से मिनी बस में सवार हुई। बस में जेकेएलएफ के लड़के भी बैठ गए लेकिन इन्हें इस ड्रामे की असलियत नहीं मालूम थी। आबादी वाले इलाके से आगे निकलने पर नौगाम बाईपास के नजदीक ही एक जगह सड़क पर डॉ गुरु अपनी मारुति कार में बैठा था। जब मिनी बस इस कार के पास पहुंची तो रुबिया सईद ने कुछ डरने का ड्रामा करते हुए जेकेएलएफ के लड़कों के साथ नीचे उतरकर डॉ गुरु की कार में सवार हो गई। रुबिया को भी इस ड्रामे का पता था। हिलाल वार ने आगे लिखा है कि इसके बाद रुबिया सईद को एक खास जगह सुरक्षित ले जाया गया। इस जगह के बारे में यासीन मलिक, मियां सरवर, डॉ गुरु, मुफ्ती मोहम्मद सईद और तत्कालीन डीजी को भी पता था। इसके बाद पांच आतंकी कमांडरों को छोड़ने की मांग की गई और उसके बाद जो हुआ वह सबको मालूम है। ‘द ग्रेट डिस्क्लोजर’ में दावा किया गया है कि इस प्रकरण के बाद जगमोहन राज्यपाल बने और फारुक अब्दुल्ला ने त्यागपत्र दे दिया, जबकि मलिक को इस ड्रामे को अंजाम देने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री ने जेकेएलएफ के अध्यक्ष अमानुल्ला खान के स्थान पर बतौर एक प्रमुख अलगाववादी नेता व जेकेएलएफ कमांडर के रुप में प्रचारित कराया।
आतंकी जो छोड़े गए – शेख हमीद, नूर मोहम्मद कलवाल, अल्ताफ अहमद लांचर, जावेद जरगर और शेर खान। इनमें शेर खान गुलाम कश्मीर का रहने वाला था और रिहा होने के बाद एक मुठभेड़ में मारा गया। शेख हमीद भी बाद में मारा गया। अल्ताफ लांचर इस समय बेंगलूरु मे किसी रेस्तरां में काम कर रही है जबकि जावेद जरगर और नूर मोहम्मद कलवाल अभी भी यासीन मलिक के साथ हैं।
आज क्या कहते हैं यासीन मलिक – इस बात को हुए जमाना बीत गया है। आप इस इश्यू पर क्यों बात करते हैं। इसे कुरेदने का कोई फायदा नहीं है।
हिलाल वार की चुनौती – मैंने जो कुछ किताब में लिखा है, वह बिलकुल सही है। अगर मुफ्ती मोहम्मद सईद, तत्कालीन डीजीपी या यासीन मलिक कहते हैं कि मैंने झूठ लिखा है तो वे मुझ पर मुकद्दमा करें। मैं असलियत लाया हूं।

साभार - नारद /नटराज (उपरोक्त पूरी ख़बर लोकमंच मे प्रकाशित है)

मीडिया से जुड़ी कुछ खबरें

भास्कर का लुधियाना संस्करण लांच
भास्कर का आज से लुधियाना संस्करण लांच हो गया है। यह दैनिक भास्कर 40वां संस्करण है.
अब भास्कर लाएगा आईपीओ

दैनिक भास्कर जल्दी ही एक हजार करोड़ रूपये जुटाने के लिए अपना एक आईपीओ लाने वाला है. माना जा रहा है कि अगले साल फ़रवरी में इसका आईपीओ बाज़ार में आ जाएगा. भास्कर से पहले जागरण और हिंदुस्तान टाइम्स का आईपीओ बाज़ार में आ चुका है.
विजय झा अब दैनिक जागरण के साथ
नवभारत टाइम्स वाले विजय झा अब दैनिक जागरण के साथ हो लिए हैं। विजय कुमार झा का नभाटा से दैनिक जागरण जाना उलटी गंगा बहने की तरह ही है लेकिन ये नया नहीं है.
नितिन आईबीएन ७ में
नितिन ने आईबीएन ७ में नॉएडा में ज्वाइन कर लिया है. नितिन संजय पालीवाल की टीम के सदस्य होंगे. इससे पहले नितिन स्टार न्यूज़ में अपनी सेवा दे चुके हैं.
मीडिया से जुड़ी ख़बरों के लिए बोल हल्ला पर क्लिक करें.

आशीष

हालचालः शादी, नौकरी और हिंदी ब्लागिंग पर कवर स्टोरी

दो दोस्तों का बियाह हो गया। कुछ का होने वाला है। लगे रहो भाइयों। कानपुर में आईनेक्स्ट वाले ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने अपनी बर्बादी की कहानी खुद अपने हाथों लिख ली है और शादी कर ली है। बड़े धूमधाम से हल्दी लगवाया और दुल्हन ले आये। खैर, ये ऐसी बर्बादी है जिसे सब लोग हंस हंस कर स्वीकार करते हैं, फिर बाद रोते हैं। लेकिन बेहद जरूरी और अनिवार्य बर्बादी जिसमें आबादी की गुत्थी छुपी हुई है। इसी तरह अपने राजपाल मीणा राजस्थान वाले से न रहा गया। आखिर में शादी कर ही ली। भाई ने बड़े प्यार से बुलवाया था लेकिन इ सकुरी नोकरी ने न तो धर्मेंद्र के यहां जाने दिया और न ही राजपाल के यहां। लेकिन दोस्तों दिल से दोनों की शादियों में मैं मौजूद रहा हूं। उम्मीद है, ये दोनों जोड़े जिंदमी में विश्वाश और प्यार की जो इबारत लिखेंगे उसके लिए मेरी शुभकामनाएं तहे दिल से स्वीकारेंगे। आगे आने वाले दिनों में कई साथियों की शादियां हैं। जिनके बारे में मुझे पता है उनके नाम गिनाना चाहूंगा...कानपुर में हिंदुस्तान वाले मनीष और अमर उजाला वाले पीयूष की आगे आने वाले दिनों में शादियां हैं। इसके अलावा फैजाबाद वाले अपने बड़े भाई गोपाल राय भी जल्द ही हल्दी लगवाने वाले हैं। इन सभी शादियों के लिए शुभकामनाएं।

एक खबर ये है कि अपने नवभारत टाइम्स वाले विजय झा अब दैनिक जागरण के साथ हो लिए हैं। बाजार के सूत्र बताते हैं कि माल अच्छा खासा मिला है लेकिन किसी विश्वस्त सूत्र या आधिकारिक सूत्र ने अभी तक मुंह नहीं खोला है। लेकिन अब ये बात कोई भी समझ सकता है कि उलटी गंगा बहाने के लिए मेहनत तो की ही गई होगी। नवभारत टाइम्स ने अमर उजाला और दैनिक जागरण के ढेर सारे होनहारों के अपने नए एनसीआर वाले अखबार के लिए तोड़ लिया था। इससे दोनों ही अखबारों को दिल्ली में थोड़ी स्टाफ क्राइसिस झेलनी पड़ रही है। विजय कुमार झा का नभाटा से दैनिक जागरण जाना उलटी गंगा बहने की तरह ही है लेकिन ये नया नहीं है क्योंकि हाल के दिनों में क्वालिटी को लेकर जो सजगता जागरण, उजाला और भाष्कर आदि में आई है इसके चलते पैसे रुपये वाले बैरियर टूटने लगे हैं और ये अखबार अच्छे लोगों को हर दाम और हर पद पर लाने के लिए तैयार होने लगे हैं। इसी के चलते हिंदुस्तान और नभाटा के कइयों लोग अब उजाला, जागरण और भाष्कर ज्वाइन करने लगे हैं। इसे एक अच्छे संकेत के रूप में लेना चाहिए। इससे उम्मीद बंधती है कि क्वालिटी की इस जंग के कारण अखबारों के अंदर का सिस्टम बेहद ट्रांसपैरेंट और मेरिट वाला हो जायेगा जिससे प्रतिभाशाली पत्रकारों को कुंठित होने के मौके कम मिलेंगे।

तीसरी खबर है कि अमर उजाला में हिंदी ब्लागिंग पर अबकी कवर स्टोरी प्रकाशित हुई है। आज के अंक में जो फीचर परिशिष्ट है उसमें कवर स्टोरी की हेडिंग है ....कहो न ब्लाग है। इस स्टोरी के जरिए ब्लागिंग की दुनिया को पूरे देश के आम जन तक पहुंचाने की कोशिश की गई है जो काफी सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है। इस कवर स्टोरी के लेखक अनुराग मिश्र को इस नेक काम के लिए धन्यवाद और पूरी फीचर टीम को इस आइडिया पर काम करने के लिए बधाई....। उम्मीद है हिंदी और तकनीक को लेकर इस तरह के लेख समय समय पर इन अखबारों में मिलते रहेंगे। इससे पहले अमर उजाला में ही संपादकीय पेज पर भूपेंद्र सिंह ने हिंदी ब्लागिंग पर लिखा था।

फिलहाल तो यही सारी खबरें हैं। ...बाकी साथियों से अनुरोध है कि अगर आप के आसपास कुछ घटित हो रहा है तो जरूर भड़ास से शेयर करें, yashwantdelhi@gmail.com या 09999330099 के माध्यम से।
जय भड़ास
यशवंत

14.12.07

एक अधूरी कविता

शब्दों को हाथों में
समेटकर चली थी मैं
बिखर ना जाएं कहीं
इस डर से दिल से लगाए थी मैं

शब्द जो दिल में थे
होठों तक आ ना जाएं
उन्हें अंदर ही अंदर
दबाए हुई थी मैं

वो बातें जो कहनी थीं
पर कभी कही ना जा सकीं
वो तमाम मुलाकातें
जो कभी हो ना सकीं

ज़िंदगी के रासायनिक समीकरण

कितना अच्छा होता !
अगर -
ज़िंदगी के समीकरण भी -
कुछ वैसे ही होते ;
जैसे रसायन शास्त्र के,
रासायनिक समीकरण।
जिससे हमें पता चल जाता -
परिणाम का,
दो विचारों के मिक्स होने के पहले ही।
काश,
हम सेट कर पाते -
अपनी उद्विग्न सोच को -
पहले से ही-
उचित "ताप और दाब" पर... ।
और हम कर पाते -'
बैलेंस -
ज़िंदगी के उलझे, कठिन-
समीकरणों को-
परिणाम और निष्पत्ति के बाद भी.

एक फ्रेशर पत्रकार के एक्सपीरियेंस्ड बनने की दास्तान

((यह सच्ची कहानी है। कमजोर दिल वाले संवेदनशील लोग न पढ़ें। पत्रकार जरूर पढ़ें, क्योंकि आफिस के अंदरूनी शाब्दिक लातम-जूतम से ढीठ व दहपट हो चुके होते हैं। बेसिकली, एक फ्रेशर को कितनी दिक्कतें झेलनी होती हैं, यह इस सच्ची कथा का केंद्र है लेकिन इसी बहाने पत्रकारिता के एक खास ट्रेंड को पकड़ा गया है जो इस चौथे स्तंभ को चारों खाने चित करने के लिए काफी मजबूत स्थिति में आ चुका है। डाक्यूमेंट्री सरीखी यह कहानी थोड़ी लंबी जरूर है, इसे कई किश्तों में पढ़ाया जा सकता था लेकिन पाठकों की सहूलियत की खातिर एक ही बार में दे रहा हूं। चाहें तो धीमे-धीमे करके कई दिनों में पढ़ें लेकिन इतना दावा है कि एक बार पढ़ेंगे तो बिना पूरा किये हटेंगे नहीं। खैर, अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की मेरी पुरानी आदत रही है और कई साथी आत्ममुग्धता का शिकार होने का आरोप लगाते रहे हैं। सबकी जय जय। --यशवंत))

पार्ट एक
विपिन ने नोएडा के एक संस्थान से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म का कोर्स किया। पत्रकार बनने के लिए मैदान में उतरा। वही तरीका अपनाया जो इस देश के आम छात्र अपनाते हैं। आम छात्र माने जिसका बाप संपादक न हो, जिसका भाई सीनियर जर्नलिस्ट न हो, जिसके परिवार या कुनबे में कोई बड़ा अफसर या प्रभावशाली व्यक्ति न हो। तो पत्रकारिता का यह शिशु आंखों में एक सफल पत्रकार बनने का सपना लिये मैदान में कूदा।

विपिन ने संपादकों और बड़े पत्रकारों के मोबाइल नंबर तभी से इकट्ठा करना शुरू कर दिया था जबसे उसने पत्रकारिता का कोर्स शुरू किया था। टीवी और प्रिंट की दुनिया में होने वाली हर हलचल या उड़ने वाली अफवाह से खुद को बड़ा ही इमोशनली अटैच करके रखता था। सुन रखा था, पत्रकार जन्मना होता है, डिग्री-डिप्लोमा से नहीं, उसे अंदर-बाहर सबकी खबर रखनी चाहिए। किस अखबार में किस जगह पर कौन व्यक्ति नौकरी देने की हालत में है, किस टीवी को कौन सा नामी गिरामी व्यक्ति हेड कर रहा है और उसका अतीत क्या रहा है, सबकी केस हिस्ट्री तैयार कर रखी थी। नौकरी दे सकने वाले हर अखबार व टीवी के सिरमौरों की छवि अपने आंखों में कैद कर रखी थी।

विपिन रात में सोता तो सपने देखता। सीधे प्रणय राय उससे कहीं टकरा गये। उन्होंने देखते ही कहा- अरे, तुम तो वही हो जिसे अब तक हिंदी पत्रकारिता को तलाश थी। तुरंत चलो मेरे साथ। ज्वाइन करो एनडीटीवी। सपने में ही विपिन खुद पर मुग्ध हो गया। खुद से कह उठा--देखा, देश में अभी जिनुइन लोगों के लिए बहुत मौके बचे हैं। उसके अंदर का पत्रकार आखिर एक जौहरी द्वारा पहचान ही लिया गया। ईश्वर के घर में देर है, अंधेर नहीं। विपिन ने एनडीटीवी ज्वाइन कर लिया। रोज प्रणय राय मीटिंग लेने आते। नये आइडाइज पर बात चलती तो विपिन जो कुछ कहता, उस पर वो मोहित हो जाते। विपिन टीवी पर प्राइम टाइम में आने लगा। टीवी पर अपने बेटे को देख मां खुशी से झू्म उठीं। आखिर, बेटे ने नाम रोशन कर ही दिया खानदान का। मोहल्ले, गांव, गली के लोग विपिन को काफी सम्मान देने लगे। गाड़ी और बंगला के बाद आखिर वो लड़की भी मिल ही गई जिसे वर्षों से वह तलाश रहा था। वो टीवी चैनल में ही थी, विपिन के स्टाइल और दिमाग पर रीझ गई थी। उसी ने एक दिन प्रपोज कर दिया- आई लव यू विपू, विल यू मैरी मी? विपिन लड़कियों की तरह शरमा गया। सीन एकदम से चेंज हो गया, हिंदी फिल्मों की माफिक। लड़की के साथ हरे भरे बगीचे में विपू गाना गाने लगा। लड़की रीप्ले स्टाइल में बाहें फैलाये दौ़ड़े आ रही है, विपिन भी कुलांचे लगाता बढ़ रहा है....दोनों करीब आते हैं और एक दूसरे को बाहों में भींच लेते हैं। मंजिल मिल गई। सब कुछ मिल गया। नौकरी, पैसा, यश, ग्लैमर, पापुलरिटी और ऐश्वर्या राय सरीखी सुंदर, सेक्सी और दिमागदार लड़की। अब जीने को क्या चाहिए......।

लेकिन ये सब तो सपना था। आंख खुली तो थोड़ा निराश हुआ लेकिन सपने में इतना सब कुछ पाजिटिव देख उत्साह तो आ ही गयी। कोर्स कंप्लीट होते ही सीधे एनडीटीवी के दफ्तर गया। प्रणय राय से मिलने की बात कही। पर अंदर ही नहीं घुस पाया, गार्डों ने समझा-टरका दिया, एप्वाइंटमेंट वगैरह न होने की बात कहकर। जी न्यूज, आईबीएन, आज तक, स्टार न्यूज और बाद में टोटल, एसवन, लाइव इंडिया....। परिंदे ने कोई ठिकाना नहीं छोड़ा। हर जगह एक ही सवाल, फ्रेशर हो तुम। अभी कोई अनुभव नहीं है। अभी यहां कोई जरूरत नहीं है। कई बार तो मुच्छड़ सेक्युरिटी गार्डों ने खुद उसका रिज्यूम लिया, सूंघा, देखा, नापा-जोखा और वक्तव्य दे दिया- फ्रेशर हो तुम। विपिन मन ही मन सोचता--अबे, सूप तो सूप बोले, चलनी भी बोले जिसमें छप्पन छेद। भोसड़ी वाले, ये सब भी खुद को प्रणय राय से कम नहीं समझते।

विपिन अब सपने की दुनिया से हकीकत के मैदान में था। एक फ्रेशर का रीयल स्ट्रल शुरू हो चुका था। टीवी से निराश होने के बाद सेकेंड प्रियारिटी पर रखे अपने मंजिल....अखबारों के दफ्तरों की गड़ेश परिक्रमा शुरू कर दी। हर उन संपादकों, इंचार्जों और ब्यूरो प्रमुखों से मिलने और फोनियाने की कोशिश में लगा जिनका भोकाल है। अव्वल तो उसे इंटरटेन ही बहुत कम लोग करते, जो थोड़े इमोशनल नकाब वाले लोग उससे बात करते, ज्यादातर यही जवाब देते, फ्रेशर हो तुम। अभी जरूरत नहीं है फ्रेशरों की। यहां जरूरत तो है लेकिन एक्सपीरियेंस्ड लोगों की।


विपिन टूटने लगा। सबको फोन मिला चुका था। जिन-जिन लोगों ने फोन उठाया, उनसे उसने विनम्रता की सारी हदें पार करते हुए अभिवादन के साथ बात की। लेकिन उस छोर पर हां, हूं करने वाले हर शख्स ने अंत में ना, नू करके फोन काट दिया। हर आफिस के चक्कर मारे। हर बड़े शख्स से मिलने के लिए अप्वाइंटमेंट लिये। लेकिन हाय, नौकरी कहीं हाथ न आई। सिर्फ रात के सपने में ही पकड़ में आती। बाद में वह थोड़ा और चतुराई से मिलने की कोशिश करने लगा।

एक दिन उसे विश्वस्त सूत्रों के जरिये पता चला कि फलाने चैनल के फलाने हेड फलां रेस्टोरेंट में खाना खाने गए हुए हैं। उसने उनसे अतीत में मिलने की कई बार कोशिश की थी लेकिन सेक्युरिटी गार्डों ने उसे कभी अंदर जाने नहीं दिया था। वह सूत्र पर भरोसा करते हुए सूचना पर खेल जाने का निर्णय कर गया। वह रेस्टोरेंट पहुंच गया। धीरे-धीरे सरकते हुए चैनल हेड के टेबल के पास पहुंच गया। वो किसी से बातचीत में मशगूल थे। उसने साहस करके अपना परिचय दिया, जमाने भर की सारी विनम्रता झोंकते हुए...
गुड आफ्टरनून सर, मैं विपिन हूं, आपका बहुत बड़ा फैन, बचपन से आपको टीवी पर देखता आया हूं, आपसे मिलने की तमन्ना थी लेकिन मिल नहीं पा रहा था, क्या आप दो मिनट बात करने का मौका दे सकते हैं?
चैनल हेड ने समझ तो लिया, टिड्डा दल का सदस्य है, नौकरी मांगेगा, लेकिन विपिन ने इंट्रों में ही जो तेल झोंक दिया था, उसने थोड़ी देर के लिए असर दिखाया, चैनल हेड को हां कहना पड़ा।
विपिन बोला- सर, मैंने मास काम और जर्नलिज्म का कोर्स कंप्लीट किया है, आपके साथ काम करने का मौका चाहता हूं। आपको निराश नहीं करूंगा। संस्थान की शोहरत और साख को बुलंदियों तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा। बस, सर प्लीज, मुझे एक मौका दे दीजिए।

इतना कहते हुए विपिन ने बायोडाटा आगे बढ़ा दिया।

चैनल हेड ने देखा, थो़ड़ी देर निगाह रिज्यूम पर उपर नीचे दौड़ाने के बाद बोले- देखो, तुम फ्रेशर हो, अभी फ्रेशर्स को रिक्रूट नहीं कर रहे हैं। जब जरूरत होगी तो तुम्हें काल करेंगे। ठीक है ना। ओके।
इतना कहते ही उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। विपिन ने हाथ उनसे मिलाया। इशारा काफी था, बेटा निकल लो। खाने-पीने-हगने-मूतने की जगहों पर भी इन टिड्डा दल सदस्य, संवाद सूत्र-मलमूत्र टाइप के लोगों ने जीना हराम कर दिया है। मन ही मन चैनल हेड उसे गरियाते रहे। चेहरे पर कंप्यूटरी स्माइली बिखेरते रहे। और विपिन, वह वहां से फिर से झुककर थैंक्स करने के बाद पीछे लौटने लगा। जैसे, राजा के दरबार से आम लोग बिना मु़ड़े सिर झुकाए पीछे हटते जाते थे।

पाठकों की सहूलियत की खातिर किस्से को लंबा न करते हुए, विपिन को संपादकों, प्रभारियों, ब्यूरो प्रमुखों, चैनल हेडों ने जो जवाब दिये थे, वो सार-संक्षेप और एक नजर में दिए जा रहे हैं.....कुछ खबरें रिपीट सी लगेंगी लेकिन यह मानवीय गलती हो जाया करती है......
अभी तुम फ्रेशर हो, और ऐसों की अभी यहां जरूरत नहीं है।
एक्सपीरियेंस्ड चाहिए, बाद में मिलना।
टच में बने रहना, कुछ होगा तो जरूर बतायेंगे।
अब सिखाने और अनुभव देने का दौर कहां रहा दोस्त। रेडीमेड खरीदने का दौर है। कहीं सीख लो। फिर आना।
रिज्यूम छोड़ दो, समय पर काल किया जायेगा।
टेस्ट दे दो, बाद में बता दिया जायेगा।
हम टीवी के ही एक्सपीरियेंस्ड लोगों को लेते हैं।
फ्रेशर रखने की परंपरा यहां नहीं है।
रिज्यू्म मेल कर देना, देखा जायेगा।
यहां अभी कोई जगह नहीं है।
बिना अप्वाइंटमेंट लिये कैसे चले आए, रिज्यू्म रख दो, देखेंगे।
खबर बनाने और लिखने का अनुभव कहीं ले लो, फिर आना।
ट्रांसलेशन कर दो, फिर देखेंगे।
आदि आदि।

विपिन ने बहुत स्ट्रगल किया। कई बार रोया। बेहद फ्रस्टेट हुआ। सारे संपादकों और चैनल हेडों को अकेले में खूब गरियाता। कई बार पंखे की ओर देखते हुए आत्महत्या के बारे में प्लान करता। कई बार फ्रेशर शब्द से नफरत होती। लेकिन उसने स्ट्रगल जारी रखा। चेहरे की कांति खत्म होने लगी। शरीर कमजोर होने लगा।

अब इतना डिटेल में जायेंगे नहीं। बड़ी खबरों को अब कोई पाठक नहीं पढ़ता इसलिए कापी बढ़िया रखने की कोशिश करते हुए सीधे छह माह बाद के विपिन के पास पहुंचते हैं।

पार्ट दो
जी, विपिन आजकल एक छोटे से अखबार में ट्रेनी है और क्राइम रिपोर्टिंग करता है। यह अखबार एक बिल्डर ने अपने प्रापर्टी के धंधे को चमकाने के लिए और धंधे के काले स्याह को सफेद करने के लिए, अफसरों पर दबाव बनवाने के लिए, नेताओं-मंत्रियों से मीटिंग फिक्स करवाने के लिए लांच किया था। एनसीआर के इस अखबार में जो संपादक हैं वो अपने रिपोर्टरों के पैसे से दारू पीते हैं। पीने के बाद उन्हें पत्रकारिता के टिप्स देते हैं। अखबार और टीवी में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों से अपने याराना संपर्कों को गिनाते हैं, उनके साथ जिये पलों के झूठे-सच्चे किस्से सुनाते हैं और आखिर में नशे की अभिन्न अवस्था में लोकधुन के गीत गाते हुए अपनी माटी को याद करते हैं। ये बताते हुए कि अगर तुम्हें पत्रकारिता में आगे बढ़ना है तो मेरे जैसे महान व्यक्ति के अनुभवों को जरूर सुनना चाहिए, दारू पीना चाहिए और इसी पीने के दौरान खबर के नए-नए बिंब पर सोचना और मथना चाहिए।

विपिन चमत्कृत था। संपादक जी के ज्ञान और कनेक्शन का लोहा मानते हुए एक पक्के शिष्य की तरह जी सर, जी सर करता। वह शुरू में ज्यादा बोलने के लिए डांट खा चुका था और एक अच्छे शिष्य के लक्षणों को ज्ञात कर चुका था। वह सिर्फ संपादक जी की इच्छाओं का खयाल रखता, इस हद तक कि अगर वो कहें कि खोलकर झुक जाओ तो वह यह भी कर देता। यहां श्रद्धा और आस्था का मामला था, दिमाग का इस्तेमाल करना पाप था। दो पैग बाद संपादक जी बोलते, जरा सिगरेट देना। नहीं है क्या? कोई बात नहीं, ये पैसे लो, जरा लेते आओ। अरे सर, पैसे है, आपका ही है। विपिन भागकर जाता और लाता। मसाला है? नहीं है, जरा लेते आओ।

पीने के दौरान सिगरेट और चिकन न हो तो पीने का मजा ही क्या। बीच-बीच में गुटखा कंसनट्रेट कर देता है। विपिन ढाई हजार रुपये पाता है। इतना वो अपनी बाइक में तेल भराने में फूंक देता है। तो संपादक को दारू कहां से पिलाता है? वो जो पैसे घर से आते हैं, उससे।

विपिन को संपादक ने गुरु मंत्र दे दिया था। देखो, लाला की दुकान है, ज्यादा आदर्श के चक्कर में पड़ोगे तो भूखे मरोगे और जिंदगी भर ट्रेनी बने रहोगे। थाने और पुलिस से काम कराओ। पैसे कमाओ। स्टिंग करो। दबाव बनाओ। पैसे न मिले तो अखबार में छापो। ज्यादा बढ़िया और दमदार स्टिंग हो तो टीवी वालों को बेच देंगे। मतलब, संपादक जी ने पत्रकारिता से परे की उस अज्ञात दुनिया के सारे भेद खोल दिये और सारे टिप्स दे दिये, जिसके बारे में विपिन को बिलकुल अंदाजा नहीं था। लेकिन वह इसे वाकई जानना चाहता था। उसे दिल्ली से हारकर नहीं लौटना था। उसे सफल होना था। वह नहीं चाहता था कि वह इस छोटे अखबार से भी बाहर हो जाए। उसे पता था, लोगों ने समझा रखा था, सभी बड़े पत्रकार छोटे जगहों पर ही गांड़ घिसकर और मराकर आगे बढ़े हैं। उसे अब भी उम्मीद थी कि एक दिन प्रणय राय जरूर कहीं टकरायेंगे और उसके छोटे अखबार में फ्रंट पेज पर छपी इलाके के थानेदार के खिलाफ वाली खबर की तारीफ करते हुए अपने चैनल में ज्वाइन कराने ले जाएंगे।

विपिन ने जब दारू पीना सीखना शुरू किया तो शुरू में कई दिनों तक उल्टियां हुईं। उल्टियां करते विपिन को देख संपादक बाकी पत्रकार चेलों को रोकते हुए कहते, उलटने दो उसे, जो कुछ गले में, पेट में फंसा है। ये वो कचरा है, ये वो भड़ास है, जिसे उसने अपने परिवार और समाज के संस्कारों के चलते जमा किया हुआ था। ये अब तक ठीक थे लेकिन आगे के लिए श्राप हैं। नए संस्कार सीखने होगे। बिना इसे पुराने संस्कार और भड़ास को उगले यह पत्रकारिता के नये संस्कारोंस आदर्शों को अपना ही नहीं पायेगा। और सभी ट्रेनी पत्रकार अपने ट्रेनी दारूबाजी के शुरुआती दिनों में इस तरह उलटते हैं। दरअसल बाडी अपने को इस नये दौर के साथ एडजस्ट करती है..... ये सब कहते-सुनाते हुए संपादक जी को अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं जब वो खुद एक संपादक के ट्रेनी हुआ करते थे और जब वो उल्टियां करते तो वो संपादक भी यही डायलाग मारा करते थे। और बाद में उनके नक्शे कदम पर चलते हुए, उनके अनुभवों का फायदा उठाते हुए पत्रकारिता में काफी आगे गये। लेकिन इसके आगे की सोचते व खयाल आते ही एकदम से चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। तनाव में आने लगे।

संपादक जी को वो दिन याद आ गया जब वो एक बड़े राष्ट्रीय अखबार के स्थानीय संपादक हुआ करते थे और ज्यादा माल कमाने की होड़ में जनरल मैनेजर से गुपचुप पंगा ले बैठे। जीएम ज्यादा प्रोफेशनल निकला। इस जीएम ने दो दांव खेले, एक अंदरुनी और दूसरा बाहरी। बाहरी वाला तो संपादक जी को पता चल गया, लेकिन अंदरुनी वाला तब मालूम हुआ जब वे अखबर से बाहर हो गये। पहले बाहरी वाला बताते हैं-हुआ ये कि जीएम ने हर जिले में अपने आफिसियल कम पर्सनल चेलों को गुप्त संदेश भेजकर सरकुलेशन गिरवाने के निरदेश दिए। मालिक ने एजेंटों और जीएम की मीटिंग बुलाई तो सबने एक सुर में कहा कि अखबार में कुछ पढ़ने लायक ही नहीं है, इसीलिए लोग अखबार बंद करा रहे हैं। मतलब, कंटेंट कमजोर होने की गाज सीधे-सीधे संपादक पर गिरी। स्थानीय संपादक ने लाख सफाई दी लेकिन जीएम की बात मानी गई क्योंकि वो हर साल बिजनेस के टारगेट को पूरा करता और मालिक की हर अदा को बखूबी पहचानते हुए उनके मनमाफिक रिस्पांस करता। एक दुर्भाग्यशाली दिन (संपादक जी अक्सर कहते हैं कि अंकज्योतिष, न्यूमरोलाजी के हिसाब से सबसे खराब डिजिट, अंक वही है ही) मालिक ने संपादक को आखिरकार कह ही दिया, महीने भर में कहीं देख लीजिये।

संपादक को बाहर होने के बाद पता चला कि वो जिन रिपोर्टरों को खास समझते हुए उनके साथ दारू पीते थे और धंधे पानी की साझेदारी करते थे वे सब के सब डबल एजेंट निकले। तभी से उन्होंने कसम खा लिया था कि अपना आदमी बनाने में हमेशा सावधानी बरतेंगे। तभी से वे पुराने चघड़ हरामियों की बजाय नए घोड़ों पर दांव लगाते थे जिनका दिल और दिमाग कच्चे घड़े की तरह होता था, जैसा चाहे ढाल दो।

विपिन में उन्हें अपार ऊर्जा दिखी थी। उसे उन्होंने एक नजर में ही भांप लिया। बच्चे को मौका दिया। दो महीने तक सिर्फ खबर और खबर की बात की। उसकी खबरों को प्रमुखता से छापते रहे। विपिन नतमस्तक। उसे गांड़फादर मिल चुका था। एक दिन उसे क्राइम बीट दे दी गई। वो वाकई परफार्म कर रहा था। उसे रोज टिप्स देते। पुलिस वालों को पटाओ, न पटे तो गांड़ फाड़ दो। अपने आप गिर जायेगा। कई बार हुआ उल्टा। अखबार तो राष्ट्रीय स्तर का था नहीं, बिकता-विकता था नहीं, इसलिए पुलिस वालों की गांड़ फटने की बजाय पुलिस वालों ने विपिन की ही फाड़ दी। विपिन संपादक के पास जाकर घटनाक्रम बयान करता तो वे उसे पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों से ही गुजरकर महान बनने की परंपरा का सनाम उदाहरण व सीख देते। लेकिन संपादक भी खुद को अंदर ही अंदर समझाते। छोटे अखबार का असर नहीं होता। संपादक ने भी खुद को बदला, समय के साथ जैसे हमेशा बदला। पाजिटिव (तेल लगाने वाली) खबरों का दौर है, नए जमाने का जर्नलिज्म यही है। नए ट्रेंड को पकड़ो। वो निगेटिविटी अब नहीं चलती। ये सब बोलते बोलते संपादक जी अंदर ही अंदर खुद को समझाते---फाड़ने में तो किसी दिन खुद की फट जायेगी।

फिर छह महीने आगे कूदते हैं और विपिन की नई स्थिति पर नजर डालते हैं।

पार्ट तीन
विपिन के अनुभवों का छठां महीना था। वो बिलकुल पक्का हो गया है। थाने में जो मामले आते, थानेदार उसे मध्यस्थ बना देता। डील करने और कमाने के सारे तरीके बखूबी समझ चुका था विपिन। संपादक भी बेहद खुश। विपिन अपने हिस्से के पैसे से ही दारू-मुर्गा मैनेज करता। लायल्टी और चेलहाई की नई मिसाल कायम करने लगा विपिन। कई मोबाइल सेट और गिफ्ट दे चुका था संपादक के घरवालों को। जिन कुछ दिनों में विपिन संपादक के घर न जाता, संपादक की पत्नी खुद पूछ लेतीं, अपना विपिन नहीं आ रहा है आजकल। संपादक आफिस में विपिन से अकेले में बताते—अरे भई, तुम्हारी तो मेरी घर तक चर्चा है। तुम्हारी भाभी पूछ रहीं थीं, कई दिनों से नहीं दिखे इसलिए। ये आदर्श स्थिति है। अगर गांड़फादर के होम को सेट कर लिया, इंप्रेस्ड कर दिया तो बस, फ्यूचर उज्जवल है।

विपिन दारू का आदी हो गया। उसे मजा आने लगा। विसंगतियों और कड़वे अनुभवों से उबर जाता। वह दिन भर बैल की तरह दौड़ता और रिपोर्टिंग करता। हालांकि उसके अंदर-अंदर काफी कुछ चलता भी रहता लेकिन वह फैसलाकुन स्थिति तक पहुंचने से पहले रही दारू पी लेता और पैसे की महिमा की जय जय करने लगता। दिल-दिमाग के द्वंद्व पर फैसला लेने की बजाय उन्हें टालता जाता, भूलता जाता, आगे बढ़ता जाता। उसे याद आ जाते वो सारे बड़े चेहरे जहां वह नौकरी मांगने गया था। वो उन लोगों के पास किसी हालत में फिर नौकरी मांगने नहीं जाना चाहता। पत्रकारिता के सारे सूत्र पकड़ में आ चुके थे। मसलन, अगर पत्रकारिता में पीआर अच्छा नहीं है तो कहीं कुछ नहीं होने वाला। दुबले पतले विपिन का शरीर अब ठीक ठाक हो चुका था। दारू और मुर्गे ने तोंद निकाल दी, चेहरे की हड्डियों पर मांस चढ़ चुका था, शरीर भरने लगा था। वह एक्सपीरियेंस्ड के साथ-साथ आकर्षक भी हो गया था।

वह अब फ्रेशर नहीं, एक्सपेरीयेंस्ड सा था। वह जो दिल में सोचता उसे मुंह तक नहीं लाता और जो मुंह पर लाता वह कतई दिल में नहीं होता। वह सिर्फ और सिर्फ दिमाग की प्लानिंग से जीने लगा। इमोशन और दिल का इस्तेमाल महफिल लूटने, पीआर ठीक करने के लिए ही इस्तेमाल करता। दिमाग के आदेश पर ही दिल व इमोशन को काम करना पड़ता। वाह, एक एक्सपिरियेंस्ड पत्रकार विपिन।

एक और दारू भरी रात।

संपादक के यहां फिर दारू पार्टी थी। उनके एक मित्र भी आये थे जो एक राष्ट्रीय अखबार में रिपोर्टिंग इंचार्ज हुआ करते थे। मित्र क्या, कभी शिष्य थे, अब राष्ट्रीय अखबार में ठीकठाक पद पर हैं तो वे बराबरी का रिश्ता रख सकते थे। इतनी छूट समय के साथ दे दी जाती है। दारू पार्टी का मैनेजिंग डायरेक्टर विपिन ही था। उसे पहले ही हिदायत दे दी थी संपादक जी ने, वो आ रहा है, उससे तुम्हारी बात करूंगा। विपिन उत्साहित था। उसने सब कुछ मैनेज किया। रोज के मुकाबले दोगुने रुपये फूंके। नतीजा भी आया।

उसे राष्ट्रीय अखबार वाले रिपोर्टिंग इंचार्ज ने बताया कि उनके यहां रिपोर्टिंग टीम में जरूरत है और वो जिसे रिकमेंड करेंगे उसे ही रखा जायेगा। विपिन की स्वामिभक्ति और चेलहाई उन्हें भा गई। जात बिरादरी भी मिल रही थी। बस, अंदर ही अंदर उन्होंने फैसला ले लिया। इस हीरे को साथ रखना है। दूर तक साथ देगा, हंड्रेड पाइपर की तरह। पता भी नहीं चलेगा, नशा भी चढे़गा।

नशे की अभिन्न अवस्था में जब संपादक और उनके मित्र अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो विपिन संपादक जी की हिदायत के अनुपालन में अपनी बाइक पर बिठाकर उन रिपोर्टिंग इंचार्ज को उनको घर छोड़ने ले गया। रास्ते में उस सज्ज्न ने विपिन से बस इतना कहा, कल आफिस में सुबह 10 बजे आ जाना। अनुभवी विपिन ने बस जवाब दिया, जी सर। उन्हें घर छोड़कर और पैर छूकर वापस लौट आया।
विपिन अगले दिन बताये हुए आफिस गया। पैर छुआ। उसे एक और सज्ज्न के पास ले जाया गया जिनका केबिन थोड़ा और बड़ा था। उसने जाकर उनका भी पैर छुआ। टेस्ट लिया गया। इंटरव्यू का एक राउंड चला। उसके बाद करियरका नापजोख किया गया। आखिर में उसका ओके हो गया।

विपिन अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित एक राष्ट्रीय अखबार में उप संपादक, बोले तो सब एडीटर हो गया है। उसे अब पूरे 12 हजार रुपये मिलने लगे हैं। वह रिपोर्टिंग पूरी गंभीरता से करने लगा है। वह पत्रकारिता के आदर्शों पर उसी तरह बात करता है जैसे बाकी लिखने पढ़ने वाले साहित्यकार और पत्रकारर और संपादक लोग करते हैं लेकिन वह फील्ड में वही करता है जो बाकी समझदारर लोग करते हैं। पैसे, कनेक्शन, बिजनेस, पीआर.....।

विपिन का एनर्जी लेवल और बाडी लैंग्वज और भी ज्यादा डायनमिक और एक्सपेरीयेंस्ड दिखने लगी। फील्ड में जो नहीं पटता, उसकी विपिन फाड़ देता। उस खबर को विशेष या ब्रेकिंग न्यूज का लोगो लगाकर प्रकाशित किया जाता। जो पट जाता उसके लिए विशेष तरीके से दिमाग लगाकर भांति भांति की खबरों में उसका वर्जन पेल कर उसे सेलिब्रिटी बना दिया जाता।

विपिन ने बढिया मकान ले लिया है। उसके घरवाले भी आने और रहने लगे हैं। विपिन के यहां अब हर सामान है। उसने कार लेने की प्लानिंग कर ली है। ढेर सारी लड़कियों की तस्वीर लेकर पिता जी भी आये थे, उसने एक लड़की के लिए हां कर दी। उस लड़की के पिता पीसीएस रैंक के अफसर हैं। लड़की थोड़ी काली और मोटी है लेकिन पैसा खूब मिल रहा है और अफसर सकुर। कनेक्शन का नया खेल शुरू होगा। विपिन ने ओके कर दिया। विपिन को पता था, हाथी के खाने और दिखाने के दांत अलग अलग होते हैं।

बस, कहानी खत्म। क्योंकि विपिन अभी इसी स्थिति में है।

दोस्तों, विपिन बदला हुआ नाम है। विपिन मेरा नया-नया मित्र बना है। और, जानते ही हैं, मेरी मित्र मंडली शिव जी की बारात की तरह है और उसमें भांति-भांति के जीवनानुभवों से ओत-प्रोत लोग हैं। सबको मेरा आशीर्वाद होता है। बाबा का आशीर्वाद। भड़ासी बाबा का प्यार और दुलार।

विपिन मुझे औरों से थोड़ा प्यारा इसलिए लगा क्योंकि उसने बोलकर ही सही, अपनी भड़ास मेरे से निकाली। और ये भी कहा, इसे भड़ास पर डाल दीजियेगा, नाम व हालात बदलकर। सो, मैंने डाल दिया।

आदर्शवादी और नैतिकतावादी कहेंगे, कहानी से संदेश क्या दे रहो हो भड़ासी बाबू?

मैं कहूंगा.....ये भड़ास न्यूज चैनलों की तरह ही है, जो बिना खबर के सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव को समझे बिना किसी भी ऐसी तैसी खबर पर खेल जाते हैं, उसी तरह यहां हम भी हर पत्रकार के जीवन के अच्छे-बुरे पक्ष को एक साथ रखेंगे।

चलिए....फिर मिलेंगे....किसी और पत्रकार मित्र की दास्तान के साथ।


जय भड़ास
यशवंत
(अपने सुझावों को आप इस मेल पर या इस मोबाइल पर शेयर कर सकते हैं)
yashwantdelhi@gmail.com
09999330099

12.12.07

कल से एक और न्यूज़ चैनल...बाप रे बाप

कल शाम पांच बजे से बैग फ़िल्म एंड मीडिया लि. अपना २४ घंटे का न्यूज़ चैनल न्यूज़ २४ ला रहा है. इस चैनल ने युवाओं को अपना टारगेट किया है. चैनल की टैग लाइन है नज़र हर खबर पर. अब देखना यह है कि किस किस खबर पर नज़र रखी जाती है. चैनल ने देश भर में अपने तेरह ब्यूरो बनाये हैं. जबकि ३०० पत्रकारों की टीम बनाईं गई है.

यह खबर बोल हल्ला पर भी देखी जा सकती है.

सत्‍ता के पुजारी

ये नफ़रत की आंधी
वे ही चलाते है,जो लगाते है टोपी गांधी
दो भाईयों के बीच खोदते है खायी
जिनको सिर्फ सत्‍ता ही देती है दिखाई
दो धर्मो के बीच वे ही खडी करते है दीवार
जिनका मानवता से नही कोई सरोक़ार
तो फिर हम क्‍यो बहाते है अपनों का ही खून
उनके लियें,जिन्‍हे है सिर्फ सत्ता का ही जूनून
गांधी को तो सिर्फ ब्राण्‍ड के लिये ही प्रयोग करते है
अन्‍दर तो हिंसा,दंगे,नफ़रत व आतंकवाद ही भरते है
गीता यह कहती है कि आत्मा कभी नही मरती है
यह विश्‍वास तब और दृण हो जाता है
जब तू पहले अयोध्‍या व उसके बाद गोधरा में नज़र आता है
दोनो जगह मरी तो मानवता ही मरी है
और बची है तो सिर्फ तेरी सत्ता ही बची है । तेरी सत्ता ही बची है ।

कानपुर से
शशिकान्‍त अवस्‍थी

झुलनी के रंग साचा हमार पिया

बचपन से एक गाना सुनता चला आ रहा हूँ। " झुलनी के रंग साचा हमार पिया" । जब गाँव जाता था तो अक्सर ये गाना सड़क वाली बजार पर सुनने को मिल जाता था। या फिर जब हाट वगैरह लगती थी तो भी। कभी कभी ये गाना आकाशवाणी पर भी आता था। इस गाने को आजकल सुनने का बड़ा मन हो रहा है। इस गाने के बारे मे पता लगाया तो पता चला कि इसे इलाहाबाद के एक लोक गायक रमेश बैश्य ने गया है। गायक के नाम के बारे मे मैं सौ प्रतिशत श्योर नही हूँ लेकिन ये बात पक्की है कि उन्हें आँख से दिखाई नही देता था।
बहरहाल, जब भी ये गाना सुनता हूँ या गुनगुनाता हूँ, मुझे अपने गाँव की बड़ी याद आती है। अगर गाँव मे होने वाली गन्दी राजनीति और लड़ाई झगडे से बाहर निकलकर खेतों मे अकेले टहला जाय, नाहर किनारे जाकर बैठा जाय और गन्ना चूसा जाय तो इस गाने को सुनने और गाँव को महसूस करने का अपना ही आनंद है। मिटटी की वो सोंधी महक, किसी पानी भरे गढ्ढे के बगल से गर्मी की शाम मे गुजरते वक़्त भुने हुए आलू की महक... और फिर से यही गाना गुनगुनाना, झुलनी के रंग साचा , हमार पिया...झुलनी के रंग साचा ....

11.12.07

मन, ब्लागर और पत्रकार पर कविताई.....कोई हरामी द ग्रेट कमीना है तो कोई सागरो-मीना है

अपन का मन, अपन के ब्लागर भाई और अपन के पत्रकार बंधु...तीन बड़े टापिकों को एक ही पोस्ट में समेटा है। श्रोताओं और पढ़ाकुओं से दाद चाहूंगा। दिल खुश हो तो ताली बजायें, नाराज हो तो भड़ासियों को दिल खोलकर गरियायें। वैसे, भी दिल्ली में मौसम बेहद सर्द है। गालियों से कुछ तो गरमी आयेगी। उम्मीद है आप लोगों को पसंद आयेगा.....

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अपन का मन..
इलाहाबद गया और लौटा। एक हफ्ते बीता। नेट और ब्लाग से दूर रहा। लोगों से घुला मिला। कुछ नया ताजा टाइप का काम किया, कुछ नौकरी की खातिर, कुछ अपन की खुशी की खातिर। दिल्ली लौटा तो फिर वही रास्ते, वही नौकरी, वही ब्लाग, वही घर, वही मैं....। बहुत जल्दी उबने लगता हूं किसी भी चीज से। थोड़ा घूमफिर कर आया था तो मन ताजा था। लेकिन दो दिन बीतते बीतते ही लगने लगा, फिर फंस गये। दिक्कत नौकरी की नहीं, पैसे की नहीं, प्रतिष्ठा और जान-पहचान की नहीं, मन की है। और ये जो मन होता है बहुत ही शैतान और बेचैन बच्चे की तरह होता है। सबका नहीं होता, कुछ कुछ लोगों का होता है। मेरा भी है। ये जो मन है ना, कभी बहुत ढीठ हो जाता है तो कभी बहुत दयालु। कभी एंग्री यंगमैन माफिक वाइल्ड हो जाता है तो कभी प्रेमिका के पैर चूमते प्रेमी जैसा पागल। कभी बाबा के साथ धूनी रमाते हुए राधे राधे सा आध्यात्मिक हो जाता है तो कभी घर, परिवार और बच्चों के साथ हंसता-खिलखिलाता बेहद सांसारिक। 34 पार होने के बावजूद भी किसी सुंदर लड़की को देख कर किसी किशोर सा धकधक करते दिल में तब्दील हो जाता है मन तो कभी बिकती मछलियों को देख मछुवारे की तरह तुरंत बना-पका कर खा लेने को जिद्दी। कभी प्रवचन देने तो कभी सुनने को कहता है मन। कभी किसी को लतियाने तो किसी को चूमने को कहता है मन। कभी तकनीक का मास्टर बनने को रोमांचित होता है, तो कभी थिएटर और संगीत की दुनिया में हाथ आजमाने के लिए लंबा आलाप लिये आगे बढ़ लेता है। कभी इं(अं?)टरप्रेन्योर बनने को लंगोटी बांधकर मार्केट और बिजनेस में उतरता है तो कभी समाज सुधारक बन हर आम को हर संभव आगे बढ़ाने को जिद ठानता है मन। कभी कवि की तरह कविता कहता, लिखता रहता है मन तो कभी शिकारी की तरह शिकार पर झपट्टा मारने को रणनीति बुनता रहता है मन। कभी सुध बुध खोकर औघड़ हुआ रहता है मन तो कभी सचेत, सतर्क होकर दुनियावी मायाओं से एक एक कर निपटता रहता है मन। मन मन मन....। वाह रे मन। हाय रे मन। बेचारा मन। मार्वलस मन। शैतान मन। अबोध मन। बच्चा मन। बुड्ढा मन। विकृत मन। कुंठित मन। कितने रूप हैं तेरे मन....। बाबा रे, इस मन को मारो, बड़ा मतवाला, बड़ा पगला है मन।
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अपन के ब्लागर भाई
कभी ब्लाग और ब्लागरों से घृणा करता है मन, कभी इन्हें फालतू और बेकार समझता है मन। कभी इनकी बातों में दम देखता है मन, कभी इनके दोगलेपन पर हंसता है मन। कभी इनकी जिनुइऩनेस को सराहता है मन। कभी इनके नशे को लताड़ता है मन। कभी इनको अपना अतीत मानता है मन, कभी इनको अपना वर्तमान जानता है मन। ये ब्लाग और ये ब्लागर। इनकी दुनिया, अबोध दुनिया, सच्ची दुनिया, छोटी दुनिया, पाखंडी दुनिया, अपनी दुनिया, ओरीजनल दुनिया..। छल छलावा है तो दिखता है। जो सच है तो वो बेहद नंगेपन के साथ सच है। जो ढंकते हैं वो ढंकते हुए दिखते हैं। जो फंसते हैं वो फंसते हुए कहते हैं कि हां, फंसने के लिए जान बूझकर फंसा हूं। इनसे दूर करो भाई, इनके पास ले चलो भाई। ये बुद्धिजीवियों की दुनिया है भाई....ये नौकरी करते हुए बुद्धजीवियों की दुनिया है। सब खुद को निश्चिंत करके देश की अनिश्चितता पर आंसू बहा रहे हैं, समाज की हालत पर गा रहे हैं, मौसम पर बतिया रहे हैं, किचेन की रेसिपी बना रहे हैं, एक दूसरे की लंगोटी उघाड़ रहे हैं....ये तो बिलकुल अपने गांव जैसा है भाई....चालाक की चलाकी समझ में आती है भाई। नए लोगों को चढ़ाते हैं भाई, फंसे हुए को पुचकारते हैं भाई, दुख में इकट्ठा हो जाते हैं भाई, दुश्मन पर मिलकर चढ़ाई करते हैं भाई। ये ब्लागरों की दुनिया है भाई, इनसे बचाओ भाई। हर कोई डब्लू डब्लू डब्लू लगाये है, आनलाइन आते ही लिंक भेज पढ़वाए है। सब अपने अपने लिख के मगन है, डालडा को कहते देसी घी और फिर मगन हैं। कोई बच्चा है, कोई बूढ़ा है, कोई सियासी है कोई रंगा सियार है। कोई माता हैं कोई गुरुमाता हैं, कोई व्याख्या हैं, कोई गाता-बजाता हैं। कोई खाई पीई अघाई कविताई है कोई कुछ छिपाकर कुछ और ही दिखाई है। कोई चघड़ है, कोई रगड़ है। कोई सिक्कड़ है, कोई फक्कड़ है। कई गलियां हैं, कई मोहल्ले हैं, कई कस्बे हैं, कई विनम्र हैं, कई आसमान हैं, कई तितलियां हैं, कई भड़भड़िया हैं, कई चुपचपिया हैं, कोई गलबहियां है, कोई कमेंटिया है, कोई महंत है कोई संत है। कोई अफसर है कोई दफ्तर में है। कोई व्यंगियाते हैं कई लंघियाते हैं, कई चमड़िया उघाड़ते हैं कई चमड़िया बचाते हैं। कोई गाना बजाते हैं कोई फिलिम दिखाते हैं। कोई गला फाड़ चिल्लाते हैं कोई चिल्ला चिल्लाकर बेहोश हो जाते हैं। ये ब्लाग की दुनिया है भाई, ये बेचारों की दुनिया है भाई, ये बहादुरों की दुनिया है भाई, ये घिघियाये हुए लोगों की दुनिया है भाई। ये चवन्नी में खुश हैं, कोई आसमान में भी खुश है। कोई नुक्ताचीनी में लीन है, कोई बहादुरी में मस्त है। कोई साफ बोलने से बदनाम है, कोई झूठ बोलकर महान है।
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अपन के पत्रकार बंधु
ये पत्रकारों का चक्कर है। कोई घनचक्कर है, कोई रफूचक्कर है। कोई तेलमालिश वाला है, कोई बौद्धिक दिवालिया के बावजूद लाला का खास साला है। कोई मतवाला है, कोई पगला दिलवाला है। कोई सठियाया चतुर चिरकुट है। कोई दरुयाया विकट उजबक है। कोई लंठ है, कोई सेंट परसेंट है। कोई इंटेलेक्चुअल है लेकिन जबरदस्त टांग खिचव्वल है। ये जर्नलिस्ट हैं भाई, ये चोचलिस्ट हैं भाई, ये प्रोफेशनलिस्ट हैं भाई, ये अबूझ पहेली हैं भाई। कोई बाहर से सुंदर है अंदर से बंदर है। कोई लंगूर है, जी भर खाता तंदूर है। कोई पंडित है कोई तेली है। कोई ठाकुर हैं कई विकट पहेली हैं। कोई टीवी है कोई प्रिंट है। कोई संट है कोई टिंट है। कोई दिमाग वाला भी पैदल है कोई पैदल वाला भी दिमागदार है। कई लड़की तो लड़का हैं, कई लड़के तो चटकदार हैं। कोई नौकरी से परेशान है, कोई नौकरी छोड़ने को बेकरार हैं। कोई कम पैसे से दुखी है, कोई ज्यादा पाके हर खुशी से दुखी है। कोई दिल से दुखी है कोई जन्मना दुखी है। किसी की आत्मा दुखी है, किसी की पर्सनाल्टी दुखी है। ये पत्रकारों का चक्कर है भाई, इनमें आपस में है जबरदस्त लड़ाई। तारीफ करे तो समझो भेद है, बुराई करे तो समझो मनभेद है। मतभेद तो सरेआम है, अंदर से दुख-दुख, बाहर बड़े तामझाम हैं। कोई पीएम है तो कोई सीएम है, कोई डग्गा है तो कोई डग्गामार है। कोई दल्ला है तो कोई निठल्ला है। कोई साला है तो कोई ठेलावाला है। कोई पंचर है तो कोई हंटर है। कोई बेनाम है तो कोई महान है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई। कोई हरामी द ग्रेट कमीना है तो कोई सागरो-मीना है। कोई तितली है तो कोई फुलजरी है। कोई लड़ी है तो कोई अभी खड़ी है। कोई नाड़ी है कोई पनवाड़ी है, कोई बातूनी है कोई चुप्पा है, कोई घिघियाया है कोई अभी बियाया है। कोई नहाया है कोई कमाया है, कोई उगाहता है कोई बहाता है। कोई चोर है कोई उचक्का है कोई पक्का है कोई कच्चा है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई। कोई अंग्रेज है तो कोई बिना वेश है, कोई गांव और देहाती है तो कोई गजब लगता शहर बसाती है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई....।
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जय भड़ास
यशवंत

नवभारत टाइम्स ज्वाइन किया सर्वेश ने

सर्वेश पाठक ने मुम्बई में नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया है. इससे पहले सर्वेश नेटवर्क १८ समूह के कमोडीटी कंट्रोल. कॉम में कार्यरत थे.

साभार बोल हल्ला

10.12.07

सूरज जी को चाहिए आपका साथ

दोस्तो हमारे समय के वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश जी का आज सुबह लगभग सात बजे रोड एक्सीडेंट हो गया. वे नोयडा के सैक्टर 62 में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सेदारी करने जा रहे थे. दुर्घटना के वक्त सूरज जी के पिताजी भी उनके साथ थे. वे दोनों बाइक से फरीदाबाद से नोएडा जा रहे थे और रास्ते में किसी भारी वाहन की चपेट में आ गये. वे काफी देर तक सडक पर ही पडे रहे. बाद में मोबाइल से उनके घरवालों को सूचित किया गया. घरवालों ने उन्हें फरीदाबाद के फ़ोर्टिस (एस्कार्ट्स) अस्पताल में भर्ती कराया. फिलहाल वे आईसीयू में हैं. उन्हें 48 घंटों के लिए गहन चिकित्सा में रखा गया है.

बधाई गौरव वाकई गौरव है


स्‍टार न्‍यूज के विशेष संवाददाता गौरव सावंत ने आकाश से छह छलांग लगाकर भारतीय नौसेना के ‘आईएनएस डेगा, विशाखापत्तनम’ का “विंग्स” प्राप्‍त किया है। गौरव इकलौते भारतीय पत्रकार हैं जिन्हें विंग्स प्रदान किए गए हैं। इसके लिए पूरी पत्रकार बिरादरी की ओर से हार्दिक बधाई। चार दिन में यह उपलब्धि हासिल करने के लिए गौरव का नाम ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में एंट्री के लिए भेजा गया है।
डिफेंस से जुडी खबरों में विशेष दखल रखने वाले गौरव को स्काई डाइविंग का प्रशिक्षण इंडियन नेवी स्काई डाइविंग टीम के प्रमुख इन्सट्रक्टर लेफ्टीनेंट कमांडर एन. राजेश ने दिया। कमांडर राजेश आकाश से 1700 छलांग लगा चुके हैं।
वैसे जोश गौरवजी के खून में ही उनके पिता चितरंजन सावंत भारतीय सेना में ब्रिगेडियर पद से रिटायर हुए हैं। उनकी पत्‍नी आदिति अरोडा सावंत स्‍टार न्‍यूज में ही लाइफ स्‍टाइल कारस्‍पोंडेंट हैं।
गौरवजी करगिल के दौरान अपने ए‍क्‍सपीरियंस पर एक किताब डेटलाइन करगिल भी लिख चुके हैं।
पत्रकार बिरादरी की ओर से इस बहुमुखी पत्रकार को कीर्तिमान बनाने पर हार्दिक बधाई

सारे भड़ासियों का भड़ास की दूसरी पारी की सफलता की बधाई.....जल्द ही आपको लखनऊ के तापमान से वाकिफ कराउंगा.....जय भड़ास.
अरविंद मिश्रा
आईएएनएस

9.12.07

त्रिलोचन नहीं रहे


हिंदी की प्रगतिशील कविता की अंतिम कडी त्रिलोचन शास्त्री का रविवार शाम उनके निवास पर निधन हो गया. 91 वर्षीय त्रिलोचन पिछले कई महीनों से बीमार चल रहे थे. कविता संग्रह ताप के ताए हुए दिन के लिए उन्हें 1981 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कठघरा चिरानी पट्टी में 20 अगस्त 1917 को जन्में त्रिलोचन का मूल नाम वासुदेव सिंह था. उनके पुत्र अमित प्रकाश ने बताया कि त्रिलोचन ने गाजियाबाद में वैशाली स्थित निवास पर शाम साढे सात बजे अंतिम सांस ली.

प्रमुख रचनाएं

धरती, गुलाब बुलबुल, दिंगत, ताप के ताये हुए दिन, शब्द, उस जनपद का वासी हूं, तुम्हें सौंपता हूं, आत्मालोचन इत्यादि त्रिलोचन की प्रमुख रचनाएं हैं. वे हिंदी दैनिक आज, जनवार्ता, साहित्यिक पत्रिका, हंस, कहानी, चित्रलेखा से भी जुडे रहे. वृहद हिंदी कोष और हिंदी-उर्दू कोष तैयार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा.

त्रिलोचन के निधन को नामवार सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, विष्णु खरे समेत कई लेखकों और कवियों ने हिंदी साहित्य के एक युग का अंत बताया है.

त्रिलोचन की कविताएं पढने के लिए यहां क्लिक करें

8.12.07

प्रिय तुमने जब से



प्रिय तुमने जबसे मेरी आस्तीन छोड़ी तबसे मुझे अकेलापन खाए जा रहा है । तुम क्या जानो तुम्हारे बिना मुझे ये अकेला पन कितना सालता है । हर कोई ऐरा-गैरा केंचुआ भी डरा देता है।
भैये.....साफ-साफ सुन लो- "दुनियाँ में तुम से बड़े वाले हैं खुले आम घूम रहें हैं तुम्हारा तो विष वमन का एक अनुशासन है इनका....?"
इनका इनका कोई अनुशासन है ही नहीं ,यार शहर में गाँव में गली में कूचों में जितना भी विष फैला है , धर्म-स्थल पे , कार्य स्थल पे , और-तो-और सीमा पार से ये बड़े वाले लगातार विष उगलतें हैं....मित्र मैं इसी लिए केवल तुमसे संबंध बनाए रखना चाहता हूँ तुम मेरी आस्तीन छोड़ के अब कहीं न जाना भाई.... ।
जीवन भर तुम्हारे साथ रह कर कम से कम मुझे इन सपोलों को प्रतिकारात्मक फुंकारने का अभ्यास तो हों ही गया है।
भाई मुझे छोड़ के कहीं बाहर मत जाना । तुम्हें मेरे अलावा कोई नहीं बचा सकता मेरी आस्तीनों के कईयों को महफूज़ रखा है। बाहर तो तुम्हारे विष को डालर में बदलने के लिए लोग तैयार खड़े हैं जी । सूना है तुम्हारे विष की कीमत है । तुम्हारी खाल भी उतार लेंगें ये लोग , देखो न हथियार लिए लोग तुम्हारी हत्या करने घूम हैं ।नाग राज़ जी अब तो समझ जाओ । मैं और तुम मिल कर एक क्रांति सूत्र पात करेंगें । मेरी आस्तीन छोड़ के मत जाओ मेरे भाई।
फोटो:-साभार डॉ.सुभाष भदौरिया.

6.12.07

चन्द लफ़्ज़ उसकी तारीफ़ में

उसकी महिमा अपरम्पार है। वह रोज़ आप की पीठ पर बोझा लाद्ता है और साबित करता है कि तुम गधे हो। उसके खुर की चोट आप दिमाग के दरवाजे पर हरदम महसूस करते हैं, वह आपकी किस्मत बना सकता है। वह सर्वगुण सम्पन्न है। वह इसी धरती पर पैदा हुआ पर वो दुनिया से जुदा है उसकी हर अदा बांकी है। जब वो हिनाहिनाता है तो फिजा में बहार आ जाती है, आसमान से फूल झरने लगते हैं। वह इसकी तारीफ में अपने शायर दोस्त विवेक भटनागर का यह शेर अर्ज़ कर रहा हूँ-

आजकल सब उस गधे को बाप कहने लग गए,
वो गधे को बाप कहते-कहते इस काबिल हुआ ।

इससे ज्यादा उसकी तरीफ़ मे और क्या कह सकता हूँ ।

5.12.07

हल्ला घर

क्या आपको नहीं लगता कि भारत की संसद एक ऐसा हल्ला घर बन गया है जहाँ कोई एक दुसरे को सुन नहीं सकता और सिर्फ अपनी बातों को जोर शोर से इसलिए बोलना चाहता है कि आप मुझे जानो कि मैं पक्ष हूँ तो मैं विपक्ष हूँ। रोज रोज करोंरों रुपया बर्बाद होता है इस बेतुकी हल्लाम्गुल्ला से किन्तु इसकी फिकर काहे को हो मेरे इन जनप्रतिनिधियों को । क्या किसी मुद्दा को सौम्य बहस से नहीं सुलझाया जा सकता?

4.12.07

सेकुलारिसम मोदी के बिना भी रहेगा भाई......

देश भर के सेकुलर लोगों के पास इन दिनों एक ही काम है , मोदी को गाली दो।
मेरे भाई लोगों क्या हिंदुस्तान का लोकतंत्र और धरम निर्पेछ्ता मोदी के घर जा के बैठ गयी हैं।
मैं मोदी का हिमायती नही हूँ लेकिन इतना अतिरेक भी अच्छा नही लगता । कल एन.डी टी वी। पर विनोद दुआ जी गुजरात-गुजरात खेल रहे थे, रेलवे स्टेशन पर गंदगी का जिम्मेदार मोदी का
(कु) शासन है........एक लड़की १२ साल की उम्र से स्टेशन पर कम कर रही है.... मोदी की जिम्मेदारी .....????
माफ़ कीजिए आम गुजराती मुसलामानों के जख्म कुरेदने का अधिकार आप को नही दिया गया है जो आप उनसे पूछते हैं कि ४ साल पहले आप के घरवाले मार दिए गए थे॥ आप को कैसा लगता है गुजरात में????
आप किसी माँ से जाके पूछें की आप का जवान बेटा दंगों में मारा गया था ,आप को उसकी याद
आती है???
नंदीग्राम में जो कुछ हुआ गुजरात के कारन, असाम में सब कुछ गुजरात के कारन , शायद १९८४ में दिल्ली में जो हुआ वो भी गुजरात के कारन,या कश्मीर में हिन्दुओं के साथ ....
इन मुद्दों पर आप क्यों नही बोलते ?
मैं नही कहता की उज्रात कोई पैमाना है कि वहाँ सब बढिया चल रहा है लेकिन वहाँ की भोली भली जनता के साथ मेंटल रेप करने की छूट आप बौद्धिक बनने कला नाटक कर के नही ले सकते जनाब......

आती है..

विज्ञापनो का हरामीपन : भाग दो!

विज्ञापनो के हरामीपन पर हम लोग पहले भी एक बार चर्चा कर चुके हैं।
उस वक्त भडास अपनी शैशवावस्था मे था।
आज फ़िर एक विज्ञापन ने मुझे इस बारे मे एक बार फ़िर लिखने पर
मजबूर कर दिया है। आप सभी ने भी देखा तो होगा ही,
एक नया डियोडेरेण्ट मार्केट मे आया है,
जिसके विज्ञापन नीयो स्पोर्ट्स पर दिखते रहते हैं।
इस विज्ञापन ने तो अमूल माचो के अलावा और भी ना जाने कितने ही
विज्ञापनो को पीछे छोड़ दिया है।
अनसेंसर्ड विज्ञापन देखें और प्रतिक्रिया दें।
http://www.youtube.com/watch?v=85dcxgRqM90
धन्यवाद...
अंकित माथुर...

3.12.07

"मैडम जी आप कहाँ थी?"

"मैडम जी आप कहाँ थी?"

***राजीव तनेजा***


"अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव?"

"मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके"...

"हाँ!..उन्हीं के"....

"जिनकी वजह से तो आज मेरा ये हाल है"...

"आज अगर मेरा काम-धन्धा...मेरा घरबार...

सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण"


"दोराहे पे खडा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?"...

"इस ओर...या फिर उस ओर"...

"जाऊँ तो जाऊँ कहाँ...बता है दिल...कहाँ है मेरी मंज़िल?"



"कौन ऐसा नहीं होगा जो...मेरा मज़ाक...

मेरी खिल्ली नहीं उडाएगा?"....


"सब के सब यही कहेंगे कि बडा अपना 'टीन-टब्बर' सब उखाड ले गया था पानीपत कि..

अब तो वहीं सैट होना है"...

"वही मेरी कॉशी...वही मेरा मक्का"


"आ गए मज़े?"...

"ले लिए वडेवें?"...

"हर जगह अपनी ही चलाता था"...

"अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है?"जैसे ताने बारम्बार मेरे कानों के पर्दों को बेंध ना डालेंगे?"


"उनका भी क्या कसूर?"


"मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बडे-बडॆ दावे करता था कि...

'मेरी दिल्ली मेरी शान'...

'दिल्ली पैरिस बन के रहेगी'...


"माँ दा सिरर बन्न के रहेगी"...

"ढेढ साल में तो कुछ हुआ नहीं"....

"अब वैसे भी वक्त ही कितना बचा है मैडम जी के पास?"

"खेल सर पे तैयार खडे हैँ होने को और मैडम जी अभी 'फ्लाईओवर' भी पूरे नहीं बनवा पाई हैँ"...


"पिछले ढेढ साल में और अब में कितना फर्क पड गया है?"...


"टट्टू जितना भी नहीं"


"दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन ...

हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ"...


"वही आँखे मूंद!..बेतरतीब दौडती भीड"....

"वही हमेशा!..दुर्घटनाएँ करती बेलगाम ब्लू लाईन बसें"....

"वही उनकी!..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग"...

"वही उनकी!..लफूंडरछाप दादागिरी"...


"कुछ भी तो नहीं बदला है"


"वही सरे आम!..अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले"...

"वही केंचुए की चाल!..रेंगता ट्रैफिक"

"वही बिजली के!..लम्बे-लम्बे कट"..

और वही जम्बो जैट के माफिक!..बिजली के तेज़ दौडते मीटर"


"कुछ बदला भी है कहीं?"...


"हाँ!..बदला है अगर कुछ...तो वो है आम आदमी का मायूस चेहरा"...

"हाँ!..मायूस कहना ही सही रहेगा"...


"इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरे के पीछे ज़रा ठीक से झांक कर तो देखो मैडम जी"

"कैसे मर-मर जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये"

"लेकिन पराई पीड आप क्या जानो?"...

"आपका क्या है?"..

"कौन सा आपको भाग कर बस या गाडी पकडनी है?"...

"कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?"...


"कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोडा बजाया जा रहा है?"


"कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को 'सील'लग रही है?"...


"दिल्ली 'पैरिस' बने ना बने लेकिन इतना तो सच है ...कि आपके घर ....

ऊप्स!...घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?"...

"सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ"...

"आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ"...


"हैँ ना!...?"...


"आपके बँगले बनेंगे...ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर"..


"यही सच है ना?"...


"पैरिस क्या...फ्राँस क्या...और लंदन क्या...

दुनिया के हर देश...हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे"

"और!...वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर"


"हाँ!...हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर"मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था


"पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया"..

"सालों साल एडियाँ रगड-रगड कर अपना रोज़गार जमाया"...

"जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि...

"चलो!..भागो यहाँ से"...

"टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर"..

"धब्बा हो दिल्ली की शान में"


"सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ"...

"तोड देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान"...

"नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने"...


"अरे!...काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?"..

"पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने"


"पता भी है तुम्हें कि कितने सालों से?"...

"क्या-क्या जतन करके...कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा और...

अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है...या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है"...


"हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?"


"हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है"


"चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है...

माने सरकारी ज़मीन लेकिन...

तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैस ए ले-ले यहाँ खेतों में धडाधड कलोनियाँ बसाई जा रही थी?"

"तब क्यों नहीं रोका था हमें?"

"तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?"

"वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे"मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला


"उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर 'शटर' के हिसाब से...

नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि...


"हाँ!...दल दो हमारे सीने पे दाल"..

"हम पत्थर दिल हैँ"...

"हमें कोई फर्क नहीं पडता"..


"ठीक उनके दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने"...

"कोई रोकने वाला...कोई टोकने वाला नहीं था...

नोटों भरा जूता जो मार चुका था पहले ही" ..


"ये तो बाद में पता चला कि सालों ने पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला सीने में"...

"सालों!..को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी"

"सो!...बेदाग बचाने को सारी कसरतें की जा रही थी"...

"ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना"...

"बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही"..

"वाह!...क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने"...

"जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही"


"कहने को तो जनता के सेवक हैँ"...

"सेवा करना इनका धर्म है...तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी"..


"अजी छोडो ये सब!...काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?"...


"सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे"

"लानत है ऐसे जीवन पर"...

"इनकी सेवा भी करो और इनका पानी भी भरो"


"मैडम जी!...आपका डिपार्टमैंट कहता है कि सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ"..

"अरे!...पहले ठीक से घर-घर पहुँचाओ तो सही इसे"...

"फिर हम ना पिएँ तो कहना"


"वैसे एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची?"

"आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?"....

"कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?"


"है ना?"...


"इसका मटमैला रंग देख तो उबकाई भी आने से मना कर देती है"..


"ठीक है!...माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ....

नहाने के लिए भी और *&ं%$# के लिए भी"...


"किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ"...

"अल्सेशियन जो ठहरे"

"अरे!...हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप"

"प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि...

ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें"


"तब कहाँ गई थी मैडम जी आप?"

"जब पुलिस वाले बीट आफिसर बारम्बार मोटर साईकिल पे चक्कर काट काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और...

बाद में चौकी इंचार्ज को भेज दिया था कि जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा"..

"हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली"


"आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो...

आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?"

"क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?"

"कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?"

"क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की...हमें नहीं?"

"क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ...हमारी नहीं?"


"अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया...ध्वस्त कर दिया लेकिन...

क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?"

"उचित समझा?"


"नहीं ना!...?...


"किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव ...जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है"

"रेत के ढेर पे तुम भी खडे हो और हम भी पडे हैँ"...

"ना तुम सही हो...ना हम ही सही हैँ"


"अरे!..हमारा दिल देखो....हमारा जिगरा देखो"...

"आपने हथोडा बजाया"...

"कोई बात नहीं"...

आपने सील लगाई"...

"कोई बात नहीं"

"लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि...

अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो

कम से कम आपके वहाँ से हथोडी की महीन सी ...बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि ..

कानून सबके वास्ते एक है"...


"हम चुपचाप संतोष कर अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि...

"कोई छोटा...कोई बडा नहीं है कानून की नज़र में"

"वो सबको एक आँख से देखता है"

"लेकिन अफ्सोस!...जो हुआ...जैसा हुआ...

उस से तो लगता है कि इससे तो अच्छा था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती"...

"यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता वो"..


"कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ"..

"अगर ये भ्रम मात्र है हमारा तो प्लीज़...इसे भ्रम ही रहने दें"

"करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ...जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है"


"तब कहाँ चली जाती हैँ मैडम जी आप?...

जब चौक पे खडे हो ड्यूटी बजाने के बजाए आपके ट्रैफिक हवलदार झाडियों के पीछे छुप...

पहले तो आम आदमी को कानून तोडने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर...

चालान से सरकारी खजाना भरने से पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ"...


"ठीक है!...माना कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के...कोई सीधे-सीधे दे के राज़ी नहीं है लेकिन...

ये कहाँ का इंसाफ है कि सीधे तरीके से जब घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?"


"चालान तो आपने वही रखा सौ रुपए का ही लेकिन...टैक्स के नाम पर पाँच सौ का फटका अलग से लगा दिया"...

"वाह री शीला!...देख लिया तेरा इंसाफ"

"ज़ोर का झटका...सचमुच बडी ज़ोर से लगा दिया ना?"...


"आप कहती हैँ कि इससे तो गाडे-घोडे वालों को ही फर्क पडेगा...आम आदमी को नहीं"...

"ये तो बताओ मैडम जी कि ये फालतू का खर्चा कहाँ से ओटेंगे वो बेचारे?"


"किराए बढा दिए जाएँगे...आटा...दाल-चावल...कपडा-लत्ता सब मँहगा हो जाएगा"

"कुछ खबर भी है आपको?"


"एक तो पहले से ही बढे हुए कम्पीटीशन से कमाई में कमी...

ऊपर से सीलिंग और मँहगाई की मार"...


"वाह मैडम जी...देखा तेरा पलटवार"

"अरे!...अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें...उनके बैंक एकाउंट...

उनके बँगले...उनकी जायदादें आदि...सब खंगाल मारो"...

"गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या...चौगुना क्या और सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा"

"क्यों ठिठक के रुक क्यों गयी आप?"...

"अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा होगा?"


"ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौ तरफी मार मारें आप?"


"एक तरफ सीलिंग का डंडा"...

"मँहगाई की मार".. .

"हर समय घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर"


"आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ"...

"आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन...

फिर भी आम जनता बसों में बाहर तक लटकी क्योँ नज़र आ रही है?"


"आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन...

फिर भी छोटे अनाअथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड से क्योँ अटे पडे हैँ?...क्योँ भरे पडे हैँ?"..


"आप कहती हैँ कि सडकों की लम्बाई-चौडाई बढ रही है लेकिन...

फिर भी रेहडी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खडे हैँ?"


"आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन...

फिर भी सडको से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?"


"कहने को...लिखने...बहुत कुछ है बाकी था ए राजीव लेकिन...

बोल बोल के...सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने...

मेरा साथ छोड नींद का दामन थामने का ऐलान कर दिया है ...

सो बाकी की अगली बार उगल देंगे"....

"फिलहाल चलता हूँ....लौट के जल्दी ही मिलता हूँ"...

"जय हिन्द"...

"मेरी दिल्ली मेरी शान"


***राजीव तनेजा***

बदलते दौर में मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा

((आशीष के अनुरोध पर मीडिया को लेकर जो विचार मैंने व्यक्त किये, उसे उन्होंने अपने ब्लाग पर डाला और पांच प्रतिक्रियाएं भी आईं। हर प्रतिक्रिया में एक सवाल भी है। पर इस विषय पर बात और बढ़नी चाहिए, इसके लिए इस आलेख को हल्लाबोल से चुराकर भड़ास पर डाल रहा हूं ताकि भड़ासी और भड़ास को पढ़ने वाले भी अपनी राय रख सकें। राय देने की मंशा न हो तो कम से कम मन ही मन उधेड़बुन में लग सकें।....यशवंत))

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मूल लेख
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मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न रखें???
यशवंत सिंह

मेरे मित्र आशीष महर्षि ने अनुरोध किया कि यशवंत जी मीडिया पर कुछ लिखें। मैंने कहा- साथी, आदेश करें। उन्होंने कहा कि ये जो पत्रकारिता का पतन है उस पर कलम चलाएं। मैंने कहा- इसे पतन क्यों कहते हैं आपत? पहली बात की मार्केट इकोनामी के इस स्पीडी फेज में किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से यह अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह अपना बिजनेस छोड़कर समाज और देश की नैतिकता के नाम पर काम करती रहे और एक दिन अपने प्रतिद्वंदियों से पिछड़कर बंद हो जाए। जैसे अन्य सारे बिजनेस हैं वैसे ये भी है, इसलिए ये जो विषय इस पर जो कुछ भी लिखा जाएगा वो सिवाय भाषणबाजी के कुछ न होगा। पर आशीष नहीं माने, बोले- यही लिख दीजिए। हमने कहा- बिलकुल, उत्तम विचार है, चलो लिखता हूं। और बस, इसके बाद इस शीर्षक से ....मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न रखें....लिख रहा हूं। पसंद आए तो कमेंटियाइए, न आए तो भी।
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बाजार का स्पीडी फेज है। ध्यान दें, स्पीडी फेज है, इनिशियल नहीं, वो राजीव गांधी वाला काल नहीं, नरसिंहराव वाला काल नहीं। ये मनमोहनी काल है। इसमें मार्केट इकोनामी अपने पूरे स्पीड में है। सेंसेक्स कुछ कुछ सेक्स की तरह मजा दे रहा है, कर्ताधर्ताओं को, मालिकों को। कंपनियां खूब कमा रही हैं। कंपनियां खूब आ रही हैं। जो जहां हैं वहां अपने हाथ-पांव फैला रहा है। दोनों हाथों से बटोर रहा है। नई नीतियों की देन ने देश को बेरोकटोक बना दिया है। कमा सके तो कमा। बना सके तो बना। दिमाग ला, टैलेंट ला। खूब पैसे दो। और खूब पैसे बटोरो। क्या इन सब बातों से मीडिया अनजान बना है या बनना चाहेगा? बिलकुल नहीं। आजादी के सपनों के साथ अपने विजन को जोड़कर शुरू हुए हिंदी अखबारों ने इस स्पीडी इकानामी वाले दौर में अपना सारा चोला उतार फेंका है। उन्हें ढेर सारी चिंताओं से जूझना पड़ रहा है। मार्केट में एक-एक फील्ड में कई-कई मंझे हुए खिलाड़ी है। सब ग्लोबल हैं, मतलब- टेक्नालाजी में ग्लोबल, विजन में ग्लोबल, कंटेंट में ग्लोबल। और इन्हें ग्लोबल कंपटीटर से लड़ना है या लड़ना होगा। ऐसे में उन्होंने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ठीक करने शुरू कर दिये हैं। सर्कुलेशन की वो टीम रखो जो बेहद प्रोफेशनल हो, ग्लोबल विजन से लैस हो, नए चैलेंजेज से वाकिफ हो। मार्केटिंग में वो गुरु ले आओ जो रेवेन्यू को डबल ट्रिपल कर सके। इसके लिए जो जितना पैसा ले, दे दो। अखबार को प्रोडक्ट बनाओ और प्रोडक्ट को एक बेहद फेमस ब्रांड में तब्दील कर दो। ब्रांड चमकेगा तो प्रोडक्ट खुद ब खुद बिकेगा। ब्रांड कंटेंट से बनता है लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण मार्केटिंग हो गई है। मार्केटिंग अगर ठीक नहीं है तो अच्छी से अच्छी क्वालिटी-कंटेंट वाला सामान भी कूड़ा साबित होगा, कंपटीशन में। और मार्केटिंग सही है तो थोड़ा कमतर प्रोडक्ट भी अच्छा बिकेगा, दौड़ेगा बाजार में। पेप्सी-कोक को देखिए। माल वही है, बस विज्ञापन नया होता है, नारा नया होता है। बोतलों की साइज बदलती रहती है, ब्रांड एंबेसडर बदलते रहते हैं, खूब बिक रहे हैं, खूब कमा रहे हैं, हर साल गजब का मुनाफा ढा रहे हैं। कौन देखता है कि इन बोतलों में क्या है? कुछ लोगों ने सवाल खड़े किए तो उसके जवाब में इन काले-गोरे पानी वाली ग्लोबल कंपनियों ने ऐसा मार्केटिंग युद्ध छेड़ दिया कि ये ब्रांड फिर सबकी जुबान पर आ चुके हैं, स्वाद देने लगे हैं। यह सब ब्रांडिंग और मार्केटिंग का खेल है। जो जहर को अमृत बना दे और अमृत को जहर, उसी को कहते हैं मार्केटिंग और ब्रांडिंग।

बात अखबारों के संपादकीय की हो रही थी। सारे बड़े अखबार प्रोफेशनल और कारपोरेट विजन से काम करने में जुटे हैं। उनकी संपादकीय टीम इस विजन से अलग नहीं हो सकती। वहां, नये नियम कानून चुपके से आ रहे हैं, जगह बना रहे हैं, लागू हो रहे हैं, चल रहे हैं। ढेर सारे संपादकीय साथियों को इसकी भनक तक नहीं लगती। बस, उन्हें दिक्कत महसूस होने लगती है। वे कहने लगे हैं....पहले तो ऐसा नहीं होता था, पहले तो वैसा नहीं था, पहले तो यह सब नहीं था, ये क्या हो रहा है, किधर जा रही है पत्रकारिता....इस तरह के ढेरों सवालों के जरिए अपनी दिक्कतों को आवाज देने लगे हैं। पर इनका जवाब कौन देगा? जवाब देने वाले माननीय लोग कारपोरेट विजन को अपनाने की ट्रेनिंग लेने में लगे हैं। उन्हें यही समझाया जा रहा है, प्रोडक्ट और ब्रांड को क्वालिटी दो। और आज क्वालिटी के पैरामीटर्स क्या हैं? अखबारों की बात करें तो एडीटोरियल क्वालिटी का मतलब हो गया है... जो पढ़ा जाए। जो पढ़ा जाए भी बेहद मोटा वाक्य है, जनरलाइज सेंटेस है। इसे और पतला करते हैं, स्पेशलाइज करते हैं...किसको पढ़ाना है, कौन पढ़ेगा....ध्यान रहे, रिक्शा वाले के लिए नहीं हैं टीवी और अखबार, गरीब के लिए नहीं है टीवी और अखबार, बिना पैसा वाले के लिए नहीं हैं मीडिया माध्यम। अपमार्केट लोगों के लिए है। नौजवानों को पढ़ाना है। उसमें भी ऐसे नौजवानों को जो पैसे वाला है। सबसे ज्यादा युवा हैं देश में। उनको टारगेट रीडर बनाओ। उनको टारगेट आडिएंश मानो। तो आज का युवा क्या पढ़ता है? सर्वे एजेंसियों ने बताया है कि इस नए जमाने के युवा को पुरानी चीजें और पुराने अंदाज पसंद नहीं। उसे राजनीति न दो। उसे समाज की समस्याओं न गिनाओ। उसे खून खच्चर और गोलीबारी में न उलझाओ। ये सब सार संक्षेप या ब्रीफ में ले जाओ। पढ़ाओ... पैसे-रुपये कमाने और खर्चने के बारे में, नेट एंड तकनालजी के बारे में, गैजेट्स और ग्लैमर के बारे में, सेक्स और टशन के बारे में। हेल्थ और टेंशन के बारे में, डेटिंग और बोटिंग के बारे में, टूरिज्म और सिनेमा के बारे में.......। और जब ये सब पढ़ा पाओगे तभी इन युवाओं को अखबार से जोड़ पाओगे। इस तरह की खबरें अगर पहले पन्ने पर परोसोगे, कैरीकेचर, कार्टून और पैकेज की खबरों के साथ तो भला कौन नहीं निगाह मारेगा। सेक्स की बातें भले कोई आमने-सामने न करे लेकिन सेक्स से जुडी खबरें सब पढ़ते हैं। बस, सेक्स पढ़ाने और उसे प्रजेंट करने के दौरान साफ्ट रहो, एस्थेटिक बने रहो। लक्ष्मण रेखा को याद रखो। आंख मार भी दो और किसी न टोक दिया तो कह दो कि आंख फड़कने की आदत है, आंख मारने की नहीं। काम कर गुजरो लेकिन लगे की पूरी गंभीरता बरकरार है। फिर देखो, सब तुम्हें और तुम्हारे प्रोडक्ट को सिर आंखों पर रखेंगे। गंभीरता बनाये रखो। अखबार को न्यूज वाला लगना चाहिए इसलिए गंभीर हार्ड न्यूज को भी दो लेकिन उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो। सिर्फ ये नहीं कि फ्लैट खबर लगा दो...मुशर्रफ ने वर्दी उतार दी। उतार दी वर्दी, ये तो पता है, पता चल जाएगा लेकिन वर्दी कैसे उतारी....उसकी कहानी बताओ। इसमें ड्रामा क्रिएट करो, इसमें सस्पेंस पैदा करो, इसमें ट्रेजडी और विक्ट्री का भाव डालो। मतलब पूरी बालीवुड की मसाला मूवी बना डालो हार्डकोर खबर को। और ये मूवी रूपी स्टोरियां राजनीतिक शब्दावलियों से न भरी अंटी हो। उसे जवानी दो, उसे युवापन से भर दो, उसे अल्हण बनाओ। लगे जैसे मुशरर्फ ने वर्दी उतारी है तो उनसे कुछ पाया जा सकता है, उनसे कुछ सीखा जा सकता है, उससे कुछ ह्यूमर निकाला जा सकता है, उससे कुछ कहानियां बनाई जा सकती हैं। मतलब जो कुछ भी है उसके साथ ढेरों इन्नोवेशन करो, ड्रामा करो, नाटक करो, फर्जीवाड़ा करो।

बात संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा की हो रही है। कंटेंट के लेवल पर जब हमने पुराना चोला उतार कर नया पहन लिया है, और ये जो नया है, मार्केट ओरियेंटेड है, टीजी (टारगेट ग्रुप) ओरियेंटेड है, रेवेन्यू ओरियेंटेड है तो फिर पत्रकारों या कंटेंट जनरेट करने वालों से भी अपेक्षा की जाएगी कि वो नई चीजों को समझें। उसे बहुत जल्दी अपने भेजे में उतारें। उस पर जल्दी अमल करें। और ये जल्दी जल्दी की अपेक्षा कई कंटेंट वाले लोगों को समझ में नहीं आ रहा। इसलिए उन्हें दिक्कत हो रही है।

मेरे खयाल से दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि पहली बात, किसी एक माध्यम से इस नए और बदले दौर में इतनी अपेक्षा रखनी नहीं चाहिए। वजह, हर माध्यम की हर समय एक खास वैल्यू होती है। कभी रेडियो ही रेडियो था। रेडियो में काम करने वाले सेलिब्रिटी हुआ करते थे, अब नहीं हैं। रेडियो की जरूरत नए समय में कम होती गई। उसकी जगह टीवी ने ले ली। टीवी के चेहरे अब सेलिब्रिटी की श्रेणी में हैं। टीवी नेशनवाइड दिखता है, प्रभाव क्रिएट करता है इसलिए टीवी का चेहरा पूरे देश का जाना पहचाना चेहरा बन जाता है। लेकिन टीआरपी के खेल ने जिससे कि विज्ञापन और विज्ञापन से रेवेन्यू जुड़ा हुआ है, इन माध्यमों को ऐसी लड़ाई में उतार दिया जिससे अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन टीवी न्यूज चैनलों के लिए संपादकीय नीति क्या है। मतलब, अगर आप टीवी में हैं तो कनफ्यूज हैं कि आप को दिखाना क्या है, करना क्या है। जितने भी चैनल हैं वो हर दिन नए रयोग कर रहे हैं। कभी गंभीर कहे जाने वाले चैनल अपने प्राइम टाइम में माधुरी के नच ले फिल्म के बहाने फिल्मों में हीरोइनों के डांस पर पैकेज दिखाने लगते है तो कभी कोई चैनल किसी एक शहर में सीएम के पुतला दहन और पत्रकारों की पिटाई को देश की सबसे बड़ी खबर बनाकर पेश करता है। कभी हंसी और ठहाके के कार्यक्रमों को लाइव कवरेज दिया जाता है तो कभी इतना क्रिकेट क्रिकेट होता है कि समझ में नहीं आता कि देश की सबसे बड़ी खबर किस चैनल पर खोजें। तो अगर कोई टीवी पत्रकार संपादकीय नीति की अपेक्षा करता है, किसी नैतिकता की अपेक्षा करता है तो शायद उसे पिछड़ा और कोरा आदर्शवादी ही ही माना जाएगा। एक नई चीज हो रही है, न्यूज के इस समय के जो परंपरागत माध्यम हैं- अखबार और टीवी, इनके मार्केट ओरियेंटेड हो जाने से वो जो खबरें इन पर आनी चाहिए थी लेकिन नहीं आ रही, वो अब कहीं और प्रकट हो रही हैं। ये ब्लागों पर, वेब पर, मोबाइल पर, मेल पर प्रकट हो रही हैं। ये नए मीडिया माध्यमों पर अवतरित हो रही हैं। इन मीडिया माध्यमों में लोग आंखों देखी को खबरों के रूप में लिख -पढ़ रहे हैं। ब्लाग में बातें खुलकर लिखी जाती हैं। यहां अभी कोई रेवेन्यू या मार्केट का इशू नहीं है। यहां अभी किसी हानि और लाभ का मामला नहीं है। यहां मिशन है, शौक है, भड़ास है, सरोकार है, भाव है, रुमानियत है....। यहां चूंकि चीजें खुद की नैतिकता और विजन से जुड़ी हैं इसलिए जाके रही भावना जैसी के अंदाज में हर ब्लाग अपना एक कैरेक्टर लिए हुए है। एक उदाहरण देता हूं......एक साथी ने सवाल किया, नोएडा में कोई ऐसी संस्था है जो गरीब व अनाथ बच्चियों की देखभाल करती हो, तो उन्हें कहा गया कि वो इस बात को ब्लाग पर डाल दें, कोई न कोई ब्लागर साथी जरूर मदद करेगा। तो ये जो काम अखबारों के माध्यम से होता था, अखबारों में फोन करके होता था, वो अब ब्लागों के जरिये हो रहा है। जो गंभीर बहसें अब अखबारों में नहीं हो पातीं, वे अब ब्लागों पर चलने लगी हैं। नंदीग्राम पर जिस तरह की बहस ब्लागों पर हुई, असम में नंगा करके लड़कियों औरतों की पिटाई पर जो बातें ब्लागों पर हुई वो परंपरागत मीडिया को आइना दिखाने के लिए काफी है। इसका सीधा संदेश मीडिया को है--- मार्केट को पकड़ो लेकिन इतना नहीं कि बाद में कहीं अपना ही चेहरा आइने में पहचान में न आए। मीडिया पर जो चीजें होनी चाहिए वो ब्लागों पर लिखी जा रही हैं, इसीलिए अखबार अब मजबूर हैं ब्लाग के बारे में बात करने के लिए। लोग शायद इसीलिए इन ट्रेडीशनल मीडिया माध्यमों पर कम विश्वास करने लगे हैं। अखबार और टीवी से जानी सुनी बातों पर लोगों का भरोसा कम हुआ है। लोग कहते हैं---अरे, इन टीवी वालों का क्या भरोसा, पता नहीं किस चीज को तिल का ताड़ बनाकर दिखा दें। इसीलिए तो एक टीवी चैनल सेक्स से जुड़े सवाल जवाब के जरिए खूब टीआरपी बटोरने में सफल हुआ।

मैं अपनी बातों को समेटना चाहूंगा। कुछ संकेत देना चाहूंगा। बहस आगे बढ़ाने के लिए कुछ प्वाइंट छोड़ना चाहूंगा....
  1. परंपरागत मीडिया नए दौर में नए हथियारों से लैस हो रहा है क्योंकि उसे एक ऐसे मार्केट में कंपटीट करना है जहां सारा खेल टीआरपी और प्रसार पर आधारित होता है और टीआरपी व प्रसार के फंडे संपादकीय की परंपरागत नैतिकता से अलग हो चुके हैं, इसलिए क्या मीडिया को टीआरपी व प्रसार की चिंता छोड़कर संपादकीय नैतिकता को पकड़ने रखना चाहिए, खुद के नष्ट हो जाने की आशंका के बावजूद या फिर मार्केट इकानामी में सरवाइवल के सारे हथियारों से लैस होकर मीडिया के हर कल पुर्जे को नए अंदाज में ढालना चाहिए ताकि ग्लोबल वार में वे हर तरह से मुकाबला कर सकें, सरवाइव ही नहीं बल्कि चैंपियन बन सकें.....तो इतनी बड़ी चिंता की अनदेखी संपादकीय नैतिकता के पैरेकारों को करना चाहिए?
  2. मीडिया के नए विजन को समझते हुए उसकी सीमाओं और मजबूरियों को अच्छी तरह देखते हुए उससे अपेक्षा भी उतनी ही रखनी चाहिए ताकि बाद में खुद को और समाज को निराश न होना पड़े या फिर मीडिया से उसके मीडिया होने के बारे में सवाल शुरू किये जाने चाहिए ताकि वो अपनी मूल आत्मा को जिंदा रखे और बाजार से निपटने की प्रचलित की बजाय नई रणनीति पर विचार करे
  3. अन्य कंपनियों और प्राइवेट लिमिटेड की तरह मीडिया को भी खूब मुनाफा कमाने की छूट दी जानी चाहिए या फिर उससे मीडिया होने के नाते उसकी देश व समाज के प्रति जवाबदेही के बारे में सवाल किया जाना चाहिए। जैसा कि कपिल सिब्बल ने एक सेमिनार में कहा था कि इस समस्या का हल यही है कि प्राइवेट लिमिटेड की पद्धति को खत्म कर एक ट्रस्ट के रूप में मीडिया हाउसेज को चलाने के लिए दबाव बनाया जाना चाहिए या कानून बनाना चाहिए
  4. जो यह नया दौर है उसमें न्यूज की परंपरागत परिभाषा के आधार पर मीडिया का मूल्यांकन करने और बात करने का मतलब ही नहीं। हर दौर में वैल्यूज अलग अलग होते हैं। आज जो वैल्यूज स्वीकारे जाते हैं वो कभी पाप माने जाते थे। तो उसी तरह जो बदला हुआ न्यूज वैल्यू टीवी व अखबार में दिख रहा है उसे इस समय और समाज का सच मानना चाहिए अन्यथा खुद के दिमाग की खिड़कियों के सही होने पर सवाल करना चाहिए कि क्या बदले दौर में पुराने तरीके से सोचकर हम खुद को ही तो परंपरागत नहीं साबित करने में लगे हैं.

जो भी है, यह सब लिखते हुए लगता है कि आशीष ने वाकई एक ठीक विषय को पकड़ा है। हालांकि इस विषय पर दिलीप मंडल ने कुछ दिनों पहले एक उम्दा आर्टिकल लिखा था। उसमें भी यही बातें थीं कि लाला से पैसे लेकर हमें क्रांति की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मेरे खयाल से दिलीप जी की यह हेडलाइन ही ढेर सारी बातें कह देती हैं।

फिलहाल इतना ही
यशवंत सिंह
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(लेखक 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया से जुड़े रहे हैं। एडीटोरियल कंटेंट की दुनिया में ट्रेनी से एनई तक की यात्रा करने के बाद अब वे मार्केटिंग व रेवेन्यू जनरेशन का काम देख रहे हैं। फिलहाल मोबाइल कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी LiveM में बतौर वाइस प्रेसीडेंट काम करते हैं। एक चर्चित ब्लाग भड़ास का संचालन भी करते हैं। इनसे yashwantdelhi@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है)
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(इस मसले पर कुल पांच प्रतिक्रियाएं हल्लाबोल पर आईं)

5 Comments:

jhoom tara said...
bhaiya itna likh diye koi kamkaj nahin kya?

1 December, 2007 4:32 PM
कमल शर्मा said...
मीडिया पर यह लेख वाकई एक अच्‍छा लेख है। हालांकि कुछ बातों से कई लोगों को परहेज हो सकता है लेकिन यशवंत जी ने बातों को सच्‍चाई के साथ सामने रखा है। मीडिया वालों की जमात में से अनेक लोग इस बहस को आगे बढ़ाएंगे यह उम्‍मीद है। कई बातें या शब्‍द लोगों को चुभ भी सकते हैं और इस लेख पर एतराज भी हो सकता है लेकिन अखबारों और टीवी में आज ऐसी कई खबरें और उनका प्रस्‍तुतिकरण नैतिकता को ताक पर रखकर किया जा रहा है इसमें शक नहीं। हालांकि सारे कार्यक्रम ऐसे नहीं हैं। लेकिन लेखक ने अपने लंबे अनुभव के बाद ही चीजें लिखी हैं और मेरे ख्‍याल से उन्‍होंने सच्‍चाई को करीब से देखा होगा। भाई आशीष के इस ब्‍लॉग पर ऐसे लेख निरंतर आने चाहिए। मेरा अनुरोध है पत्रकारों से कि वे अपना लेखन योगदान देकर इस ब्‍लॉग को समृद्ध बनाए।

1 December, 2007 4:45 PM
Sanjeet Tripathi said...
लिखा तो एकदम सटीक है, सामयिक भी। सहमत भी हूं काफ़ी से ज्यादा हद तक लेकिन मन में कुछ बातें भी उठती हैं। जैसे कि मीडिया से नैतिकता की अपेक्षा क्यों न रखी जाए। लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा जाता है जिसे क्या उसे अनैतिकता का आवरण ओढ़ने की खुली छूट सिर्फ़ इसलिए दी जा सकती है कि वह एक बिजनेस भी है।
मीडिया के पास कोई विशेषाधिकार तो होता नही खबरें निकालने के लिए वह एक आम आदमी को मिले अधिकारों के तहत ही खबरें निकालता है तो फ़िर क्या एक आम आदमी को नैतिक नही होना चाहिए।

मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न की जाए इसका मतलब कि बैठकर उस दिन का इंतजार किया जाए कि अखबारों मे "मस्तराम" की तरह का लेखन आए। क्या संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा न की जाए और उस दिन का इंतजार किया जाए कि कोई समाचार चैनल प्लेबॉय मैगजीन का वीडियो संस्करण दिखाने लगे या कपड़े उतारते हुए समाचार प्रस्तुतिकरण हो!!

वैसे बहस लंबी और अंतहीन ही रहेगी इस मुद्दे पर।

1 December, 2007 4:52 PM
anitakumar said...
आशिष जी
यशवंत जी को अपने ब्लोग पर इस सामयिक मुद्दे पर लिखने के लिए बुलाने के लिए धन्यवाद्। यशवंत जी ने जो कुछ कहा काफ़ी हद्द तक सही है। आज कल मीडिया ही क्युं हर क्षेत्र प्रोडक्ट माना जाता है। पहले क्या स्कूल कॉलेज नफ़ा नुकसान के बारे में सोचते थे? पर आज सोचते हैं , वहां भी प्रोडक्ट मार्कटिंग इत्यादी प्रोफ़ेशनल तरीके से करना शुरु कर दिया गया है। फ़िर भी संजीत जी के कहने से मैं सहमत हूं कि मीडिया, जो दूसरों की नैतिकता पर नजर रखता है, चौथा स्तंभ माना जाता है, उसे बैलेंस्ड रहना चाहिए। इस विषय पर और चर्चा की जरुरत है।

1 December, 2007 5:13 PM
Srijan Shilpi said...
चलिए, आप कहते हैं तो संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा नहीं रखते अखबारों-न्यूज चैनलों से। लेकिन पत्रकारों से फिर पूछने का मन करता है, "तेरा क्या होगा, कालिया?" आप कंपनियों के एक्जीक्यूटिव की तरह काम कीजिए, प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर विशेष सुविधा और सम्मान की अपेक्षा भी मत कीजिए। आप पर भी उसी तरह के कायदे-क़ानून लागू होने चाहिए जो कि किसी कंपनी के कारिंदों पर लागू होते हैं। मीडिया कंपनियों पर यदि केवल मुनाफे के लिए काम करती हैं तो फिर सरकार जब उनपर कॉरपोरेट की तरह ही कुछ शर्तें लगाती हैं तो फिर पत्रकार हायतौबा क्यों मचाते हैं, कि प्रेस की स्वतंत्रता का हनन हो रहा है? स्वतंत्रता तो नैतिकता की शर्त पर ही दी जा सकती है। दोनों हाथ में लड्डू तो नहीं मिलेगा।
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साभारः हल्लाबोल
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आओ फिर बोलें कि हमें बोलने की जरूरत है

भडास की दूसरी पारी में मैं पहली बार आप लोगों से सीधे सीधे मुखातिब हूँ । आप लोगों को नहीं लगता कि इस बार भडासियों की धार कुंद है। जिस काम के लिए हम इकट्ठे हुए हैं उसका व्याकरण ही गडबडा गया लगता है. इस बार सभी अपनी आत्ममुग्धता के सुनहरी हाले में कैद बेहद अकेले और आत्मलीन नहीं लगते? बातचीत का वह अंदाज भी नहीं जो ठुस्की छोडता था. सुर्तीलाल के किस्से भी नहीं और न मनोज झा की दारू पार्टी का कोई जिक्र है. यानी हम सभी बेतुके हो गए हैं. कुछ कुछ इंटलेक्चुअलता से ग्रस्त.
दरअसल आप जानते ही हैं कि मैं सबसे ज्यादा बेतुकेपन से डरता हूँ । और अब तक तुकें ही दूंढता रहा हूँ । इस बेतुकी बात मैं आपकी दिलचस्पी नहीं होगी लेकिन आप इससे जुडे हैं । मैं महसूस कर रह हूँ कि इन दिनों मैं और अधिक बेतुका हो गया हूँ । यहाँ यह बात पूर्व निर्धारित है कि मैं पहले ही यानी जन्मता बेतुका था । असल में मेरे बेतुकेपन में आपका भी योगदान है जिसे कोई कैसे नकार सकता है । आप यानी जो जालन्धर से बंगलूरू और अहमदाबाद से रांची और मुम्बई से गुवाहाटी तक फैले हुए हैं । जो सबसे ज्यादा भोपाल, रांची, दिल्ली और मेरठ में पाये जाते हैं । आप जिनसे मिलकर मैं इतना बेतुका हो गया हूँ कि ना अब कोई तुक की बात लिख पा रहा हूँ ना कह पा रह हूँ ।
मैं चाहता हूँ कि मैं अपने बचपन में लौट जाउँ अपने पूरे बचपने के साथ । इसका एक तरीका यह है कि मैं अपने भीतर अब तक की सारी सीखी सिखाई बातें बाहर उलीच दूं । वे बातें जो चौक-चौराहों, पान की गुमठियों, घरों, दफ्तरों, सड़कों, छतों, पबों यानी हर ऐसी जगह जहाँ दो इन्सान खडे हो सकते हैं, पे आप लोगों से सीखीं । सिग्रेट पीते, पान चबाते और बियर-विहिस्की पीते-पिलाते हुए आपने बताईं । कुल जमा जोड़ यह की जीवन के २६ वें वसंत में मैं थक गया हूँ । और मुझमें भरी आपकी भीड़ धक्कम धक्का रेलमपेल मचाये हुए है । अब आराम से अपने बचपने में जाने का तरीका यही है कि दिमाग का सारा अगड्म बगड्म फैंक डालूँ । इसमें जो सच होगा वह आपके हिस्से का होगा और जो झूठ जैसा लगेगा व होगा मेरे हिस्से का सच । यानी जो लिखूंगा सच लिखूंगा सच के अलावा कुछ ना लिखूंगा और लिखूंगा भी तो सच सच बताकर लिखूंगा । तो शुरू करते हैं शुरू से। तो मैं लिखूंगा आपके बारे में. इसी बहाने साफ करूंगा खुद को.
तो कल तक के लिए शब्बा खैर.

2.12.07

भाई साहेब सुनिए मेरी भी

क्या बात है....! हुज़ूर आप ही आप बोलते जाएंगे ।
स्वतन्त्रता मिली है हमको सिर्फ आपको मिली हों ...?
ऐसा नहीं है। सभी को हक है बोलने का , हम तो ठहरे लेखक लिख मारेंगे आपके बारे में ,और आप की haalat खराब हों जावेगी सो मालिक दायें बांयें देख के बोला करो। आपने शोले तो देखी ही होगी "सूरमा-भोपाली "वाली । कहीं आप कि गत वैसी ही न हों जाए । जब जय-वीरू सामने होगे ..... तो अब मेरी ज़रा सी बात सुन लीजिये ......
"आप देश के बारे में बहुत कुछ करना चाहतें हैं अथवा कर भी रहें हैं तो भी एक बात ज़रूर समझ लीजिये कि आप मुंह चलाने वालों से बड़ा देश सेवक भारत का मज़दूर, किसान, क्लर्क, मास्टर, प्यून,वगैरा हैं "
मुझे बस इतना कहना है.........
जय-भड़ास

भड़ास की मेंबर लिस्ट में एक छोटा लेकिन बड़ा नाम

भडास का औडिएंस ज्यादा रह हूँ, लिखा भी था पेर पुराने वाले भड़ास पेर। भड़ास पढ़ने की आदत रही है। आज इसके मेंबर लिस्ट में घन्नू झारखंडी नाम देखा तो लगा कहीं छिपा सा लेकिन एक बड़ा नाम है ये। वैसे तो झारखण्ड के लिए घनश्याम जी का नाम किसी परिचय का मुहताज नही, लेकिन नॉएडा अभी कुछ ही महीनों पहले आना हुआ है, तो अपने गुरु का एक संचिप्त परिचय जरूर करना चाहूँगा। प्रभात खबर में नए दौर के फीचेर पन्ने कि सुरुआत का श्रेय इन्ही को जाता है। घनश्याम जी ने कई संग्रहणीय अंक का प्रकाशन किया है। जबरदस्त विशन और नए जेनरेशन को समझना इन्हें बखूबी आता है, जो इनकी लेखनी में भी देखने को मिलता है। उर्जावान और नए लेखकों पर विश्वाश करने वाले घनश्याम जी ने कई पत्रकार बनाए हैं, जो आज कई बडे मीडिया हौस में काम कर रहे हैं। खुद कि मार्केटिंग से ज्यादा अपने काम पेर विश्वाश करने वाले घनश्याम जी को भविष्य के लिए सुव्काम्नाएं.

ये नई जनरेशन है

अब तो नई जनरेशन का जमाना है, इधर अखबारों में नए नए लडकों की चल रही है, दफ़तर में घुसते ही पहली आवाज सुनाई पडती हैं, सर आज कुछ नहीं है, स्‍टोंरी के लिए नया आयडिया बता दे दीजिए, अब हम क्‍या बताएं, नए जमाने में इंटरनेट की तूती बोल रही है, खबर नहीं है, इंटरनेट खोल कर बैठ जाओं, कुछ न कुछ मिल ही जाएगा, अब सर लोगों के पास कुछ नहीं रखा, ये पुराने चावल हो गए हैं, अब ये सिर्फ यही कर सकते हैं कि खबर मिली तो उसमें थोडा नमक मिर्च लगाकर उसे चटपटा बना सकते हैं, लेकिन कह दिया जाए कि थोडा खबर बता दीजिए तो ये बताएंगे कि देखो शहर कितना गंदा है, साक्षरता में क्‍या घोटाला हुआ और समाज कल्‍याण से कितनों को पेंशन मिल रही है, सीएम की किस पर गाज गिरने वाली है, अब ये यह नहीं समझते कि नए जमाने में इन खबरों का कोई महत्‍व नहीं है, पहले इन्‍ही खबरों के लिए ये अधिकारी के पीछे महीनों दौडते भागते थे और जब खबर नहीं मिलती थी तो खुन्‍नस में नेगेटिव खबरें लिखी जाती थी बच्‍चु पॉजिटिव नहीं बताओगे तो यही झेलो, लेकि‍न अब तो नेट खोलों, देखों कहां क्‍या चल रहा है, कहीं युवा वर्ग मरने से पहले का स्‍टेटमेंट लिख रहा है तो कहीं मरने की डेट तलाशी जा रही है, कहीं मौज मजे के लिए गेम चल रहे हैं तो कहीं अंतिम इच्‍छा पूछी जा रही है, नेट पर जाओं तो देश दुनिया की खबरें भी मिलती हैं, भई यही तो है नई जनरेशन, नेट पर यह भी है कि देश में कितने एड़स पीडित हैं तो कितनों की आने की संभावना है, रोक के लिए क्‍या किया जाना चाहिए और सरकारें कर क्‍या रही हैं, बच्‍चा खो गया, नेट पर मुकदमा लिखवाओ, अपराधी की तलाश है नेट पर जाओं, बच्‍चा पैदा नहीं हो रहा है नेट पर डाक्‍टर तलाश करों, क्‍या नहीं है नेट, तो बच्‍चा लोगों अब सर का पीछा छोडों और नेट की शरण में जाओं, अब कैरियर का मूल मंत्र बनाओं नेटम शरणम गच्‍छामि
जय भडास
सुनील कमार सिंह, गुडलक
आईनेक्‍स्‍ट, कानपुर

1.12.07

मेरठ दैनिक जागरण में कार्यरत साथी विजय प्रभात शुक्ल के पिताजी श्री कैलाश नाथ शुक्ल (61) का आज सुबह देहांत हो गया. वे काफी दिनों से किडनी की समस्या से पीडित थे. सार्वजनिक जीवन में बेहद शांत और दूसरों के दुख दर्द में हमेशा शरीक रहने वाले कैलाश जी का जाना एक सार्वजनिक क्षति है. तकरीबन साल भर से उनकी लडाई काफी तेज हो गई थी. आज सुबह आखिरकार वे दूसरी दुनिया में चले गये. उनके परिजनों के प्रति संवेदना.

भड़ास वाले यशवंत जी अब बोल हल्ला पर

भड़ास के जन्मदाता यशवंत सिंह से आज सुबह ही मैंने एक निवेदन किया कि क्यों नहीं आप मीडिया की दशा पर बोल हल्ला के लिए कुछ लिखते हैं. पहले तो थोड़ा मना किया लेकिन बाद में मान गए...और उन्हें मनाने में मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पढी. बस क्या था लिख भेजा एक शानदार लेख. हो सकता है मैं यशवंत जी की कुछ बातों से सहमत नहीं रहूँ. लेकिन लोकतंत्र तो इसी से मजबूत होता.. यशवंत जी लिखते हैं कि मार्केट इकोनामी के इस स्पीडी फेज में किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी से यह अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह अपना बिजनेस छोड़कर समाज और देश की नैतिकता के नाम पर काम करती रहे और एक दिन अपने प्रतिद्वंदियों से पिछड़कर बंद हो जाए। जैसे अन्य सारे बिजनेस हैं वैसे ये भी है.. पूरे लेख के लिए यहाँ क्लिक करें...


जय भड़ास
आशीष महर्षि

यशवंत भाई...अमर उजाला में आपका नाम छपा है...!!!

सुबह सुबह मुजफ्फरनगर से अपने मित्र हर्ष का फोन आया...यशवंत जी, हिंदी ब्लागिंग के बारे में अमर उजाला में संपादकीय पेज पर लेख है, किसी भूपेन सिंह का। उस लेख में आपका भी नाम है। मैंने बताया, भूपेन से मिला नहीं हूं लेकिन ये स्टार न्यूज वाले अपने साथी हो सकते हैं। फिर हर्ष से पूछा...क्या लिखा है उसे लेख में। उन्होंने प्यार से दो-तीन पैरे पढ़कर सुनाए। जैसे कि ब्लागिंग पर लिखे किसी लेख में बातें कही जाती हैं...ब्लागिंग की शुरुआत, एग्रीगेटर की भूमिका, मोहल्ला--नारद विवाद बरास्ते बजार व राहुल, हिंदी ब्लागिंग में शामिल बड़े साहित्यकारों के नाम व उनके ब्लाग, कुछ पत्रकारों-फिल्मकारों के नाम और उनके ब्लाग का जिक्र और आखिर में दस बारह नाम गिनाकर कि ये लोग भी ब्लागिंग करते हैं.....आलेक की इतिश्री। मैंने तो अखबार खरीदकर पढ़ा। अच्छा लगा लेकिन जिस तरह के आलेख ये आ रहे हैं इन्हें बहुत शुरुआती किस्म का कहा जाना चाहिए। और इस तरह के आलेख पढ़पढ़कर मन उब गया है। अब थोड़ा एक्सपरटाइज किस्म के लेख लिखे जाने चाहिए, समीक्षाएं की जानी चाहिए। नीलिमा ने हिंदी ब्लागिंग पर दो किस्तों में जो लिखा उसे वाकई सराहनीय कहा जा सकता है। लेकिन बच्चा विश्लेषक दीपू राय ने जो कुछ मोहल्ला पर लिखा, हिंदी ब्लागिंग का कथित विश्लेषण करते हुए, उससे तो मुंह का स्वाद कड़वा हो गया। भाई ने ऐसा आकाश-पाताल नापा कि हिसाब नहीं हो पा रहा, किस स्पीड से और किस यंत्र के जरिये यह दौरा कर लिया...। उसकी बातों को निचोड़ने से एक बूंद पानी नहीं टपक रहा, सब शब्दों की खली ही खली निकल रही है। पर यहां गड़े मुरदे उखाड़ने का कोई मतलब नहीं।
यहां केवल आपको सूचना देना है कि अगर आप आज का अमर उजाला संपादकीय पेज पढ़ लें तो उसमें हिंदी ब्लागिंग के बारे में बड़ा लेख मिल जाएगा। भूपेन को बधाई....एक बड़े मंच पर ब्लागिंग की बात करने के लिए। उम्मीद है आगे के दिनों में विश्लेषण थोड़े माइक्रो लेवल तक जाएगी।
जय भड़ास
यशवंत

रेती में लोटने, बिना मकसद कुछ दिन यूं ही ज़िंदगी जीने....आ रहा हूं इलाहाबाद!!!

एक महीने की गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद ब्लागिंग में हाजिर हुए बोधि भाई ने न सिर्फ हाजिरी बजाई, बल्कि हम लोगों को बडे़ प्यार से ईर्ष्या और द्वेष से भर भी दिया। यह बता बता के उन्होंने किस तरह से उन गुमशुदगी के दिनों में ज़िंदगी की असल खुशबू को महससू किया और जिया। और इन मूल्यवान क्षणों को जीने के बाद उन्होंने आकर बता भी दिया.....गांव वाले कभी नहीं मरते, माटी झाड़कर-पोंछकर उठ खड़े होते हैं। फिर लड़ने, जूझने और जिंदादिली से जीने के लिए। वाह, भड़ासी जिन बातों को समझाने में जाने कितनी पोस्ट खर्च कर देते हैं उसे एक कवि अपने गद्य में कितने आसानी से समझा देता है।

बोधि भाई को पढ़कर दिल मचलने लगा... निकल ले बेटा यशवंत तू भी। दिल्ली-बिल्ली को छोड़कर। यह ससुरी कहां जा रही। यह बिगड़ैल तो यहीं रहेगी, और बिगड़ेगी, और फैलेगी, और मोटी होगी...लोगों को बिगाड़ेगी, लोगों को मोटा बनायेगी, दिमाग में कमीनापन भरेगी। तो ऐसे में बेटा यशवंत जरा तू भी टहल ले। ले ले माटी की सोंधी गंध। नथुने से खींचकर उस खुश्बू को गहरे आत्मा तक उतार ले। जो प्राण उर्जा की तरह तुम्हारे मस्तिष्क से लेकर दिल और मन तक को सींच देगी।

तो भइया....आज प्लान तैयार हो गया। शाम तक रिजरवेशन हो जाएगा। संगम तीरे के लिए। अबकी एक हफ्ते के लिए जा रहा हूं। फिर लौटूंगा। बाद में पूरे एक महीने का तंबू गड़ेगा। लैपटाप लेकर वहीं से ब्लागिंग होगी, लाइव ब्लागिंग...संगम तीरे से।

अबकी माघ मेला में संगम तीरे टेंट लगाकर जीवन जीना है, गांजे के कश खींचते हुए, कबीर को गाते हुए....रहना नहीं देस बेराना है, यह संसार कागद की पुड़िया, बूंद गिरे गल जाना है, यह संसार झाड़ और झांखड़, आग लगे बर जाना है...रहना नहीं देस बेराना है.... और इन मुक्तिदायी आह्वानों के साथ झाल मंजीरे और ढोलक की थाप पर नृत्य करते हुए....ओसो के शब्दों में.... बेतरतीब नाचो, कुछ भी बोलो, लेकिन मुंह खोलो, आसपास के परिवेश से अनजान, दिमाग पर बिना जोर लगाए, गाओ और नाचो, चिल्लाओ और नाचो, रोओ और नाचो....नाचते रहो, गाते रहो, चिल्लाते रहो.....और धड़ाम से लेट जाओ, थक कर। शांत हो जाओ। अंधेरे में खो जाओ। जहां अंधेरा खत्म होगा, अंधेरे की सुरंग जहां खत्म होगी वहां से आगे निकलो तो रोशनी है, कोई और दुनिया है प्रेम की। वहां शांति है। वहां सहजता है। वहां सरलता है। वहां मनुष्य ही मनुष्य नहीं है। वहां सब कुछ है। पेड़, फूल, बंदर, हिरन, चूहा, हवा...सब लेकिन कोई कम और ज्यादा नहीं। सब एक दूसरे के मित्र और साथी.....।

खैर, मुझे लग रहा है कि मैं यह सब लिखते हुए कहीं ध्यान न करने लगूं। खबर यही है कि मैं मंगलवार की सुबह से लेकर रविवार तक इलाहाबाद में हूं। वहां माघ में तंबू गड़वाने से लेकर कुछ और प्रबंध करने के काम को निपटाने के बाद लौट आउंगा।

इस मौके पर मैं उन सभी इलाहाबादी साथियों को याद करना चाहूंगा जो इलाहाबाद में अब भी हैं या इलाहाबाद के हैं या इलाहाबाद में रहे हैं लेकिन अब बाहर हैं। अगर वे साथ चलना चाहें, बीच में जुड़ना चाहें तो निसंकोच बता दें। अगर मेरी मदद करने की स्थिति में हों तो जरूर बता दें। वहां माघ के दौरान ठहरने की उत्तम व्यवस्था करनी है। इसके लिए क्या तरीका अपनना होगा, अभी मुझे मालूम नहीं। यहां यह भी बता दें कि मेरे इस प्लान को मेरी कंपनी लाइवएम ने ओके कर दिया है। तो यह निजी मस्ती कंपनी द्वारा संस्तुत भी है, है न मजेदार....। फिर क्या, फिर तो मिल बैठेंगे चार यार....। चीयर्स...। जय हो।

09999330099 पर उपलब्ध हूं, पूर्व और वर्तमान इलाहाबादियों से अनुरोध है कि वे संगम तीरे की मेरी मुहिम में योगदान करें या योगदान लें। वैसे, मैंने इलाहाबाद के अपने मित्रों को फोन करना शुरू कर दिया है, भइया.....मैं आ रहा हूं....तुम्हारो देस, म्हारो देस, रेती में लोटने। बिना मकसद कुछ दिन यूं ही जिंदगी जीने। आप भी चलोगे?????

जय भड़ास
यशवंत

अनाथ और गरीब बच्चियों के लिए काम करने वाली कोई संस्था है?

अंकित माथुर ने एक अनुरोध किया है, नोएडा में अगर गरीब और अनाथ बच्चियों के लिए काम करने वाली कोई संस्था हो तो उसका नाम बताएं, खुद अंकित और उनके एक दोस्त उसे मदद करना चाहते है और उसके साथ जुड़कर काम करना चाहते हैं। भई, नेकी और पूछ पूछ। बहुत अच्छा विचार है। उम्मीद है भड़ासी साथियों ने यह काम अब तक कर दिया होगा। वैसे, मैं चाहूंगा कि जो भी पत्रकार या गैर पत्रकार साथी यह पोस्ट पढ़ रहा हो वो अपने परिचित से पूछ कर ऐसी संस्था के बारे में पता करे और न सिर्फ अंकित को उनकी मेल आईडी पर मेल करे बल्कि इस संस्था के बारे में भड़ास पर भी डाल दे। ब्लागिंग करने और इससे जुड़ने के यही फायदे हैं कि हम जो बातें फोन पर मित्रों से पूछते हैं उसे ब्लाग के जरिए हजारों मित्रों से पूछ सकते हैं।

जय भड़ास
यशवंत

नए भड़ासियों का स्वागत

पिछले दो दिनों में पांच नये सदस्य भड़ासी बने हैं। इन सबका स्वागत है। इनके नाम इस तरह हैं- घन्नू झारखंडी, gurudatt tiwari, sushant jha, satya prakasha, goodluck singh। उम्मीद है ये लोग गाहे-बगाहे अपने विचारों, टिप्पणियों और अपनी भावनाओं से बाकी भड़ासियों को भी तर रखेंगे।
जय भड़ास
यशवंत