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23.6.13

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्याति  संयाति नवानि देही  ।।
गीतायां  कथितमस्ति  यत यथा मनुष्यः एकं वस्त्रं त्यक्त्वा अन्यं वस्त्रं गृह्णाति अर्थात धारयति तथैव आत्मा अपि  जीर्णं शरीरं विहाय अन्यं शरीरं धारयति ॥
उत्तराखंडे  प्राकृतिकजलविपदायां यत  दृष्टं , श्रुतं तत्सर्वं दृष्ट्वा श्रुत्वा विचारयामि - आत्मा जीर्णं एव शरीरं त्यक्त्वा नूतनं शरीरं धारयति अथवा नूतनं शरीरं त्यक्त्वा अपि  अन्यं शरीरं अपि  धारयति । यथा जनाः बालाः युवानः युवतयः वृद्धाश्च तत्र समानभावेन जलजाले निमग्नाः  जाताः  तेन तु  प्रतीयते यत आत्मा तु  जीर्णं शरीरं न पश्यति , यस्य शरीरस्य समयः पूर्णः जातः तं शरीरं त्यक्त्वा अपरं शरीरं धारयितुम अनंते ब्रह्मांडे विचरति  तथा एकं शरीरं चिनोति , पुनः पृथिव्याम समायाति । शरीरास्तु तत्र शिशूनाम अपि  आसन ये आत्मना परित्यक्ता ।
in geeta it has been said that as man wears new dresses quitting old cloths , in the same way aatmaa quits old bodies and wears new bodies.
but in uttarakhand and everywhere i see that aatma chooses the body whose expiry date has been approached , it does not matter it is old or new body . because as in this disaster children younger elder old person man and women have been quit by aatma that proves that aatma does not see only old bodies , it sees and quits that body whose last date approached and than aatma wonders in eternal and chooses a new body and comes on earth wearing a new body.

22.6.13

प्राकृतिक आपदा में चन्दा की संस्कृति से आगे का रास्ता

प्राकृतिक आपदा के तुरत बाद देश के दुसरे हिस्से की सरकारों का कुछ कर्त्तव्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। प्राकृतिक आपदाग्रस्त  राज्य की सरकार और जनता के प्रति दुसरे राज्यों की सहानुभूति के सच को दो घटनाओं से समझा जा सकता है - एक राज्य के मुख्यमंत्री ने दुसरे राज्य के दौरे के दिन उस राज्य की जनता को समाचार-पत्रों में पुरे पन्ने के विज्ञापन द्वारा यह एहसास करवाया कि एक राज्य ने दुसरे राज्य को इतनी राशि की मदद की है। वहीं इस दुसरे राज्य की सरकार ने अपने ही राज्य के (दो दिन पहले बर्खास्त किए गए ) स्वास्थ्य मंत्री की प्राण रक्षा की गुहार को बिलकुल अनसुना कर दिया, जबकि यह जगजाहिर है कि उत्तराखंड में बड़ी संख्या में बिहारी भाई-बहन भी फंसे हुए हैं। जो सरकारें अपने राज्य की बड़ी राजनीतिक हस्तियों को बचाने के लिए कोई औपचारिकता नही करती वे सरकारे एक दो करोड़ का चेक देकर अपने किसी अफसर को मातमपुर्सी के लिए भेज देतीं हैं। वही दुसरे राज्य पर एहसान जतानेवाले मुख्यमंत्री एक  फिर हेलीकप्टर पर चढ़ कर एहसान जताने निकल पड़ते हैं।
किसी भी आपदा के आने में जनता की भूमिका नगण्य है. संविधान ने देश की संस्कृति का की रक्षा का भार जिनके ऊपर दे रखा है वे ही समलैंगिकता को मुख्यधारा बनाने पर तुले हुए है तो पोलिथिन संस्कृति और केदारनाथ  मौज मस्ती करने जाने की संस्कृति का दोष जनता पर डाल कर देश का ही नुकसान कर रहे हैं। इसलिए इस परिस्थिति में मेरे विचार में देश की आपदा प्रबंधन नीति कुछ इस प्रकार की होनी चाहिए:-

1.      प्राकृतिक आपदा की प्रथम सूचना मिलते ही युद्ध स्तर पर दुसरे राज्य सरकारों को सामग्री जुटाने का काम शुरू कर देना चाहिए। साथ ही जो भी दूसरी संस्थाएं मदद करने की इच्छुक हो उन्हें भी यही करना चाहिए। मौसम के साफ़ होने तक के 12, 24 या 48 घंटो तक यह काम चलता रहे तो देश के 24 राज्य सरकारों और इतने ही स्वयंसेवी संगठनो द्वारा मौसम साफ़ होते ही क्षेत्र में राहत सामग्री लेकर प्रवेश करना आसान होगा। सनद रहे कि  एक राज्य सरकार एक रात की नोटिस पर १-२ टन सामग्री तो भेज ही सकती है और ऐसा वे सभी दूसरी संस्थाए भी कर सकती हैं जो 1000  से 10000 करोड़ का आयकर प्रपत्र दाखिल करती हैं।

2.      मौसम साफ़ होने के बाद ये सभी संगठन अपने दल-बल के साथ क्षेत्र में अलग अलग दिशाओं से घुस जाएं। जान बचाने को वरीयता तथा स्थानीय लोगो को आसरा देते हुए स्थानीय लोगो तथा उस क्षेत्र में रह रही पुलिस सेना आदि की मदद लेते हुए ये आगे बढती जाएँ, तो जान बचने की तथा चिकित्सा सुविधा मिलाने की संभावनाए बढ़ जायेगी।


3.      ज़रा सोचिए जिस राज्य में आपदा आयी है वह सिर्फ नागरिको के ऊपर ही नही आयी है बल्की वहा के कर्मचारियो-अधिकारियों पर भी आयी होती है। जो खुद ही तबाह हो गया हो उससे मदद की उम्मीद करना कहा तक सम्यक है। इस परिस्थिति में देश न जाने किस कानून से कल रहा है कि प्राकृतिक आपदा से जुझने की पुरी जिम्मेवारी स्थानीय प्रशासन से शुरू और सैन्य बलों  पर ख़त्म हो जाती है।

4.      इसके बाद तबाही की सूचना जैसे जैसे बड़ी होती जाए वैसे वैसे बिना किसी अपने पराये का भेद किए तमाम राज्य सरकारे अपने कर्मचारियो को इस काम में झोकती जाएं। ऐसा करने से प्रथम और सतत मदद मिलना संभव हो जाएगा।


5.      सेना नौसेना और अर्धसैनिक बलों  को इस बात की आजादी दी जानी चाहिए कि  शांतिकाल में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं में मदद हेतु युद्धस्तर पर अधिकतम प्रयास करने, वांछित  संख्या में जवानो और उपस्करों के इस्तेमाल करने हेतु वे स्वतन्त्र हैं। इससे हेलीकोप्टर की कमी जैसे मुद्दों से निबटने में आसानी होगी।

6.      जब देश की राज्य सरकारे स्वयं स्वत:स्फूर्त मदद नही दे सकतीं तो जनता से चन्दा इकट्ठा करने का कोई मतलब नही है। उसी प्रकार यदि  देश के किन्ही 5-10 जिलों में आपदा आयी हो और बाकी लोग हवं करते रहे, मोमबत्तियां जलाते रहें,प्रार्थना करते रहें तो यह खुद के साथ भी छल है और उनलोगों के साथ भी जिन्हें मदद के लिए हाथ चाहिए, वे पैसा खाकर नही जी सकते। यदी पैसा खाकर जीना संभव होता तो 100  रुपये में बिस्कुट और पानी नही खरीदना पड़ता।


7.      देश के 25 राज्य सरकारों के पास अपने मुख्यमंत्रियों  के चढाने के लिए कम से कम 25 हेलीकोप्टर तो होंगे ही लेकिन घोटाले के उद्देश्य से खरीदे हुए , सेना और वायुसेना के हेलिकोप्टर के भरोसे ये खुद ही उड़ते है। फिर भी इनमे से किसी ने नही कहा कि मेरा हेलीकोप्टर ले जाओ, सभी ने करोड़ का चेक थमा दिया। 


8.      देश की सभी राज्य सरकारो और स्वयंसेवी संस्थाओं की  टीमों को एन डी  आर  एफ  से निर्देशन एवं सहयोग लेते हुए राष्ट्रवादी  एकजुटता की भावना से 10 - 20  दिनों तक भारतमाता की सेवा में जुट जाना चाहिए।

नालंदा विश्वविद्दालय के पुस्तकालय में लगी आग को किसी ने बुझाया क्यों नहीं?

नालंदा विश्वविद्दालय भारत ही नहीं विश्व का अपने समय का महानतम विश्वविद्दालय हुआ करता था। भारत के पूरब से पश्चिम तक जहां भी मानव सभ्यता मौजुद थी, वहां से कोई-न-कोई व्यक्ति शिक्षा ग्रहण करने भारत के नालंदा विश्वविद्दालय आया और वह व्यक्ति जब वापस गया तो अपने देश के बौद्धिक जगत में आध्यात्मिक क्रान्ति का प्रसार किया।


उस काल में सीमेंट और कंक्रीट की उपलब्ध नहीं था। ऐसी स्थिति में जब यह कहा जाता है कि नलंदा विश्वविद्दालय का पुस्तकालय नौ तलों का था तो यह कल्पना करना मुश्किल हो जाता है कि कैसे वह भवन बनाया गया होगा, कैसा दीखता होगा, उसमें क्या सुविधाएं होंगी आदि। उसमें हजारो छात्र अध्ययन करते थे और ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखे लाखों ग्रंथ संग्रहित किए जाते थे।

यह प्रश्न आज भी कपोल-कल्पित विवेचना का विषय है कि इस महानतम विश्वविद्दालय के विशाल पुस्तकालय में आग लगायी गयी वह आग छ: महीने तक जलती रही लेकिन किसी ने बुझाया क्यों नहीं। इस प्रश्न का उत्तर मैं अपनी कपोल कल्पना से देने का प्रयास करना चाहुंगा, मेरी यह धृष्टता जिन्हें पसंद न आये वे क्षमा करेंगे। मेरी नजर में जो बातें मैं कहने जा रहा हुँ वह नालंडा विश्वविद्दालय के लिए तो क्ल्पित है, मैकाले की शिक्षा पद्धति का जनता से समर्थन का एक कारण है और आज के शिक्षा व्यवस्था के लिए भी उतना ही सही और चेतावनी है।

(अ). आम जनता, खासकर मध्यवर्ग का विश्वास और सम्मान हासिल करना और बनाये रखना किसी भी व्यवस्था के सुदीर्घ होने की प्रथम जरुरत है। जनता का विश्वास और प्रेम खो देने के बाद बड़ी से बड़ी सैनिक व्यवस्था टिक नहीं सकती। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं :

(क). स्थापना के प्रारंभिक कुछ शताब्दियों तक इस विश्वविद्दालय को समय समय पर राज्यों से धन-दान मिलता रहा। लेकिन जब राज्याश्रय बंद हुआ तो विश्वविद्दालय अपने आस पड़ोस के चंद गावों पर आधारित हो गया जो उसे अपना खर्च चलाने के लिए राजाओं से दान में मिले थे। लेकिन तबतक इस विश्वविद्दालय का काफी विस्तार हो गया था और छात्रों और शिक्षकों की संख्या काफी बढ़ गयी थी जिसका भार उठाना चंद गांवों के लिए संभव नहीं था।

(ख). इस प्रकार से सवर्ण से अवर्ण तक और गरीब से अमीर तक, पास पड़ोस के गावों में बसने वाली जनता इस विश्वविद्दालय के छात्रों और शिक्षकों की भारी भरकम फौज का बोझ उठाते-उठाते थक गयी और इस बोझ को उतार फेकना चाहती थी। इसलिए जब विश्वविद्दालय में नरसंहार के बाद पुस्तकालय में आग लगायी तो आस-पास के लोगों ने बुझाने का कोई खास प्रयास नहीं किया।

(ग). उस विश्वविद्दालय के ज्ञानी-तपस्वी लोगों ने अति-आधात्मिकता के आगे भौतिक विकास की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। जिससे आम जनता को उस विश्वविद्दालय से कोई खास लाभ नहीं दिख रहा था। यहां इस तथ्य की अनदेखी की गयी कि शिक्षा समाज के सर्वांगीण विकास के लिए होनी चाहिए। वर्तमान में अति-भौतिकता के आगे आध्यात्मिकता की अनदेखी हो रही है।

(घ). विश्वविद्दालय ने बदले में उन गावों को क्या दिया। उस विश्वविद्दालय में नामांकन की शर्तें ऐसी थीं कि आस-पास के गावों से चंद लोग ही उस विश्वविद्दालय में अध्ययन कर पाये। दुसरी तरफ विश्वविद्दालय उन्हें कोई भौतिक लाभ देने से रहा।

(ङ). शंकराचार्य ने इस विश्वविद्दालय के लिए उतना भी नहीं किया जितना गया के गयापालों के लिए किया। दुसरी तरफ इस विश्वविद्दालय के ज्ञानीजन न तो शंकराचार्य को हरा पाये न ही कोई सौहार्द्रपूर्ण संबंध कायम कर पाये। दुसरी तरफ शंकराचार्य और उनसे शास्त्रार्थ करने वाले लोग इस विश्वविद्दालय से संबंधित नहीं थे, जिसे इस विश्वविद्दालय की स्थिति में पराभव का लक्षण माना जा सकता है। इन घटनाओं ने जनता के मन से विश्वविद्दालय के लिए आदरभाव को नष्ट किया।

(च). पिछले हजार सालों से देश में अपने-अपने जगह पर सैकड़ों धर्माचार्यों के रहते हुए भी हिन्दू धर्म से दुसरे धर्म में धर्म परिवर्तन निरंतर जारी है, इसे अगर अपने मुंह मियां मिठ्ठुओं के तप में कमी माना जाए तो इसी प्रकार की कमी उस विश्वविद्दालय के आचार्यों में भी पिढ़ी दर पिढ़ी बढ़ती गयी। तप्श्चर्या के अभाव में मंत्र और पूजा के अभाव में देवता श्रीहीन हो जाते है, यही स्थिति इस विश्वविद्दालय की हो गयी। इस परिस्थिति ने जनता के मन से गर्वभाव को समाप्त करने का काम किया।





(ब). स्थापना के प्रारंभिक कुछ शताब्दियों तक इस विश्वविद्दालय को राज्याश्रय प्राप्त था। मुस्लिम आक्रमण के बाद तत्कालीन राजसत्ताएं खुद के बचाव के आगे इस विश्वविद्दालय पर ध्यान नहीं दे पायीं।



(स). जब राज्य और राजा ही परास्त हो गये तो विश्वविद्दालय की रक्षा कौन करता। जब हमला हुआ तो जनता अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगी। भयानक आग लगी तो इसे बुझाने वाला कोई व्यक्ति-समूह वहां रहा ही नहीं। चार-छ: माह बाद, जबतक जंगलों से वापस लौटकर लोग वापस आये तबतक पुस्तकालय जल चुका था।

खुदरा नहीं है

खुदरा माफिया से बेफिक्र भारतीय वित्त व्यवस्था


देश के बिहार जैसे राज्य जिन्हें अक्सर बीमारु राज्य कह दिया जाता है उनकी एक विशेषता यह है कि दुनिया के सबसे सस्ते शहरों में से कई यहीं हैं। अमीर राज्यों में प्रति व्यक्ति आय ज्यादा होने से क्रयशक्ति ज्यादा है और क्रेडिट कार्ड जैसे आधुनिक विनिमय साधन भी ज्यादा है जिसकी वजह से महंगाई ज्यादा है।



कम क्रयशक्ति वाले बाजार में खुदरा की जरुरत ज्यादा होती है बजाए उनके जो क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करते हों। लेकिन गरीब की बात सुनता कौन है। आज भी बिहार के गावों में तीन रुपये में समोसा और दो रुपये में खीरा मिल जाता है, लेकिन वहां बाहरी लोगों को सिर्फ इसलिए भुखा रहना पड़ सकता है क्योंकि खुदरा आपके पास नहीं है और विक्रेता के पास भी नहीं है। गांव तो भूल जाइए, बिहार के आधे पंचायतों मे अभीतक बैंक ही नहीं पहुंचा है तो खुदरा कौन उपलब्ध करवाए – ऐसी स्थिति में छोटी जोत वाले जो किसान रोज बाजार में टोकरी में सब्जी लेकर बेचने जाते हैं, खुदरा की उपलब्धता में कमी का दर्द उन्हें ही पता है।



दुसरी तरफ ग्रामीण खुदरा दुकानदार उधार ले-देकर काम चलाते हैं जिससे करेंसी से काम चल सके, लेकिन इसकी मार उसके व्यवसाय पर पड़ती है क्योंकि कभी-कभार आनेवाले या अंजान ग्राहकों को उधार नहीं दिया जा सकता। ये समाज के वे लोग हैं जिन्हें आज भी एक रुपये की अहमीयत का एहसास है और यह समाज का वह हिस्सा है जहां दो रुपये के सिक्के के लिए 10 रुपये का नोट लेकर एक घंटा घुमना पड़ता है।



शहरों की हालत भी बड़ी अच्छी नहीं है। कई बार ग्राहक और दुकानदार इस बात को लेकर भीड़ जाते हैं कि खुदरा रखना किसकी जिम्मेवारी है। सुबह-सुबह टेम्पो ड्राइवर की बोहनी खुदरा की वजह से खराब होगी तो गुस्सा ग्राहक पर ही उतरता है।



“5 किलो आलु बेचने पर 2 रुपया बचता है, बाजार रोज ऊपर नीचे होता रहता है, कंपीटिशन अलग से है, इसलिए 2-3000 रुपया का खुदरा रोज लेकर बाजार में बैठना पड़ता है” पटना के राजाबाजार के एक सब्जी विक्रेता अनिल ने बताया। रोज सब्जी लाने और बेचने के अलावा खुदरा का जुगाड़ करना भी इनकी रुटीन में शामिल हो गया है। पहले तो आइसक्रीम वाले से जुगाड़ हो जाता था, जब से आइसक्रीम 5-10 रुपये के डिब्बे में आने लगी वह रास्ता भी बंद हो गया। पंडित जी एक दुसरे श्रोत थे लेकिन अब उन लोगों ने भी बाजार में आरती घुमाने का काम बटाइदारी पर देकर खुद बड़े कर्मकांडों को पकड़ लिया।



यह पुछने पर कि बैंक से खुदरा मिलता है क्या, उसने बताया कि बैंक रोज इतना खुदरा नहीं देते इसलिए कुछ तो बैंक से जुगाड़ करना होता है और कुछ बाजार से (बैंकिंग की समांतर व्यवस्था) से खुदरा उठाना पड़ता है।



शहरों मे खुदरा की कमी का विकल्प बन कर उभरा है 50 पैसे और एक रुपये का चॉकलेट, लेकिन एक रुपये की कीमत समझने वाले कुछ लोग इसका विरोध करते है और दुकानदार के पास खुदरा आने का इंतजार करते दीख जाते हैं। झुंझलाते-बुदबुदाते ये लोग यह नहीं समझ पाते कि पैसे से खात्मे से शुरु हुआ रुपये की हत्या की राष्ट्रीय योजना रुपी नदी, महंगाई और खुदरा की कमी तो दो किनारों के बीच ही बहती है।



पेश हैं कुछ तथ्य:

• 10,000 रुपये प्रतिदिन कारोबार करने वाले औसत सब्जी दुकानदार को जरुरत होती है प्रतिदिन 200-300 रुपये के सिक्के और 2000 रुपये के खुदरा नोटों की।

• बैंक इतना खुदरा रोजाना देने से कतराते हैं, जिससे दुकानदारों को 5-10% के बट्टे पर ब्लैक मार्केट से खुदरा लेना पड़ता है।

• शहरी क्षेत्रों में चाकलेट बने खुदरा के विकल्प, दुकानदार देते तो हैं लेकिन लेते नहीं, चाकलेट कंपनियों की बल्ले-बल्ले।

• एक निश्चित सीमा से ज्यादा खुदरा लेन देन पर बैंक विशेष अधिभार लगाते हैं।

• बड़े शहरों की कुछ ही बैंक शाखाओं में खुदरा देनेवाली ए0टी0एम0 उपलब्ध हैं, उनपर पर भी एक बार में खुदरा प्राप्ति की सीमा निश्चित है।

• खुदरा न रहे तो ग्रामीण क्षेत्रों मे रहना पड़ सकता है आपको भूखा, चाय भी नहीं मिलेगी।

• ग्रामीण क्षेत्रों के व्यवसायियों का बुरा हाल, लेन-देन की रकम छोटी होती है लेकिन खुदरा उपलब्ध नहीं।

• खुदरा की कमी से ग्रामीण व्यवसायी जान-पहचान के ग्राहकों को उधार देकर चलाते है धंधा।

• सिर्फ बड़े नोट उगलने वाले ए0टी0एम0 भी हैं जिम्मेवार।

• लिक्विडीटी पर तुरत कदम उठानेवाला भारतीय वित्तीय तंत्र खुदरा के मुद्दे पर रहता है खामोश।

• परिणाम भुगतते हैं छोटे सब्जी उत्पादक, छोटे किसान, छोटे व्यवसायी और निम्न तबका।

बाबा, बाबा आप कहां हैं....

उत्‍तराखंड में जलप्रलय के बाद मचा तांडव हमारे अतीत के साथ ही भविष्‍य को भी बहा ले गया है। कहर की विनाशकता को पूरा देश दुनिया जान चुकी है, मदद को हाथ उठने लगे हैं, सहायता देने वालों के दिल और दरवाजे हर तरफ खुल गए हैं। मगर अफसोस कि अभी तक हरसाल योग के नाम पर विदेशियों से लाखों कमाने वाले बाबा, पर्यावरण संरक्षण और निर्मल गंगा के नाम पर लफ्फाजियां भरी बैठकों का आयोजन करने वाले बाबा, गंगा की छाती पर अतिक्रमण करने वाले बाबा, सरकारी जमीनों और मदद की फिराक में रहने वाले बाबा, पीले वस्‍त्रधारी संस्‍कृत छात्रों के बीच चमकने वाले बाबा, कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। आखिर वह अब हैं कहां.. क्‍यों नहीं आए वह अब तक त्रासदी के दर्द को कम करने के लिए, क्‍यों नहीं खुले अब तक उनके खजाने, क्‍यों नहीं भेजी उन्‍होंने अब तक अपनी (तथाकथित) गंगा बचाओ अभियान की फौज मदद के लिए, क्‍यों शोक जताने के लिए सिर्फ एक पेड़ लगाकर इतिश्री कर ली उन्‍होंने, कहां चला गया उनका विभिन्‍न 'टी' वाला प्रोग्राम। कोई अब भी इनके आभामंडल में घिरा रहे तो अफसोस ही जताया जा सकता है।
बंधुओं बात सिर्फ किसी एक बाबा कि नहीं, बल्कि उत्‍तराखंड की धरती से हरसाल मठ मंदिरों में जमकर, तीर्थों में जमीन कब्‍जाने वाले, गद्दियों के लिए लड़ने वाले, आलीशान और फाइव स्‍टार जैसी सुविधाओं वाले आश्रमों और धर्मशालाओं में रहकर अंधभक्‍तों की गाढ़ी कमाई बटोरने वाले बाबा भी दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। उनके सदावर्त चलने वाले भंडारे भी कहीं गायब हो गए हैं। आम आदमी भी मदद को हजार पांच सौ का चेक राहत कोष को दे रहा है, मगर इनके खजाने की चाबी जाने कहां गुम हो गई है।
क्‍या इनके अंधभक्‍तों की अब भी आंखें नहीं खुलेंगी। या फिर वे बाबा के चमत्‍कारों के भ्रम में ही खुद को ठगाते रहेंगे। शहरी विकास मंत्री जी अपनी गंगोत्री के घाव भरने के लिए ही मांग लीजिए इन बाबाओं से जिनकी आप अब तक आराधना करते आए हैं। सीएम साहब आप तो बाबाओं के धोरे जाकर हमेशा रिचार्ज होने की बातें कहते रहे हैं, अब इन्‍हें भी समझाईए कि इन अभागे पहाड़ों को भी कुछ रिचार्ज कर दें। जो इस देवभूमि की बदौलत उन्‍होंने बटोरा है।

21.6.13

आपदा में जाबांज सैनिकों को सलाम!

उत्तराखंड में आयी विनाशकारी आपदा में जाबांज सैनिक जान पर खेलकर सैंकड़ों लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं। उन्होंने किसी का इंतजार नहीं किया ओर बचाव व राहत कार्य में जुट गए। असहाय सरकार भी उन्हीं की भरोसे है। शीर्ष नेता हवाई दौरा करके ही हवा में दर्द समझ रहे हैं उन्हें नहीं पता पीड़ा को समझने के लिये जमीन पर आना होता है। यह लोग भूल जाते हैं कि जनता की वोटों से ही उन्हांेने सत्ता का ताज पहना है। जनता के नेताओं को लेकर जबर्दस्त गुस्सा हैं। यह गुस्सा जायज भी है। हकीकत उन लोगों से पूछिए जिन्हें सैनिकों ने फरिश्तें बनकर बचाया है। यकीनन यदि सैनिक नहीं होते, तो बहुत से लोग जिंदा नहीं होते। वतन व लोगों की हिम्मत आर्मी है। जाबांज सैनिकों को सलाम! जय हिन्द!

STORY ON APPAN SAMACHAR

उत्तराखंड की इस आपदा के समय उत्तराखंड के ७0  विधायक इस समय कहाँ हैं ? या वे भी यह सोचकर चुप बैठे हैं कि  यह तो उस विधायक का क्षेत्र है या यह इस विधायक का क्षेत्र है । जैसे पुलिस अक्सर किसी घटना के समय सोचती है कि  यह उस क्षेत्र की घटना है ? या नेता सोच रहे हैं कि  चलो इससे बहुगुणा सरकार जितना बदनाम हो जाये उतना अच्छा । या हरीश रावत यह सोच रहे हैं कि चलो बहुगुणा बदनाम तो सत्ता हस्तांतरण में आसानी होगी ।

किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम - भगवान दादा

भगवान दादा 
किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम 


भगवान दादा की गिनती हास्य कलाकारों में होती है, क्योंकि उन्होने सैकड़ों फिल्मों में ऐसे रोल किए, लेकिन वे उससे कहीं ज्यादा थे। 19940-50 के दशक में वे फिल्मों के नायक और निर्देशक हुआ करते थे और इतने नृत्य–निपुण थे कि अच्छे–अच्छे नचैयों की छुट्टी कर देते। उनके सधे हुए धीमे स्टेप्स इतने लुभावने थे कि उसकी नकल अमिताभ बच्चन, गोविंदा, मिथुन चक्रवर्ती, ऋषि कपूर आदि कई अभिनेताओं ने सहर्ष की। टीवी सीरियल ‘बाजे पायल’ में आशा पारिख ने उन्हें जानी-मानी नृत्यांगनाओं के समक्ष प्रस्तुत कर उनका उचित सम्मान किया। भगवान किशोरकुमार जैसे हरफनमौला कलाकार थे। बासठ साल के फिल्म करियर में उन्होने वह सब किया जो एक रचनाधर्मी कलाकार कर सकता है। 500 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने अदाकारी के जलवे दिखाए और 36 फिल्मों के निर्माता और निर्देशक रहे। अन्य कंपनियों की फिल्मों का निर्देशक भी किया। अपनी कमाई के बल पर वे बंगला, गाड़ी और स्टुडियों के मालिक बने और अंत में सब कुछ गँवाकर फक्कड़ जिंदगी गुजारी, लेकिन कभी कोई गिला शिकवा नहीं किया। अपनी मिसाल वे आप थे। 

भगवान दादा ने अपनी निर्माण संस्था जागृति-पिक्चर्स के बैनर तले कई सफल कॉमेड़ी फिल्में बनाईं। वे लो बजट फिल्में बनाते थे। 1938 से 49 तक वे स्टंट और एक्शन फिल्में बनाते रहे, जो श्रमिक वर्ग द्वारा पसंद की जाती। 1951 में उन्होंने नाच-गानों और हँसी मजाक से भरपूर ऐसी फिल्म बनाई, जिसका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। यह थी, ‘अलबेला’ जिसमें सी. रामचंद्र का संगीत था और जिसके गाने लता मंगेशकर और स्वयं सी. रामचंद्र ने चितलकर नाम से गाए थे, जो आज भी बड़े चाव से सुने और पसंद किए जाते हैं। मसलन ‘धीरे से आजा री अँखियन से निंदिया’, ‘शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’, ‘बलमा बड़ा नादान रे’, ‘प्रीत की न जाने पहचान रे’, ‘भोली सूरत दिल के खोटे’, ‘शोला जो भड़के दिल मेरी धड़के’ आदि । 


अलबेला में भगवान दादा ने लता के गाने ‘बलमा बड़ा नादान रे’ पर एक मुजरा फिल्माया था। भगवान दादा ने बताया कि तवायफों के कोठों पर जाकर मुजरा देखने और वहाँ नाचने का उन्हें बहुत शौक था। कुछ कोठों की शोहरत सुनकर विभाजन से पहले वे लाहौर तक गए थे। तीन बार वे बनारस भी गए। मिर्जापुर हो या लखनऊ जहाँ भी शूटिंग के लिए जाते कोठों पर मुजरा सुनने जरूर जाते। इसी कारण उनके नाच और भाव-भंगिमाओं में उत्तरप्रदेश और राजस्थान के नचैयों जैसी नजाकत दिखाई देती है। भगवान की अलबेला और राजकपूर की आवारा साथ साथ रिलीज हुई थीं। पलड़ा अलबेला का भारी रहा। उसकी नायिका गीता बाली थीं, जो बाद में शम्मीकपूर की पत्नी बनीं। अलबेला ने अड़तीस वर्षीय भगवान को आपार दौलत और शोहरत दी। अधिकांश फिल्मों में पाँच फुट और बड़ी-बड़ी आँखों वाले भगवान ने भोले-भोले आदमी की छवि ही प्रस्तुत की। 

अलबेला में भगवान दादा ने स्वयं एक गाना गाया था, ‘किस्मत की हवा कभी नरम कभी गरम’। यह उक्ति उन पर ही चरितार्थ हो गई, जब उनकी ‘लाबेला’ और ‘झमेला’ फिल्में प्लॉप हो गई। ये फिल्में उन्होंने ‘अलबेला’ की सफलता से प्रेरित होकर बनाई थीं और इनमें उनके मित्र सी. रामचंद्र का ही संगीत था। इसके बाद उनकी फिल्म ‘सहमे हुए सपने’ को जनता ने पहले शो में ही खारिज कर दी जिससे उन्हें 25 लाख को घाटा झेलना पड़ा। किशोरकुमार के साथ उनकी ‘भागमभाग’ फिल्म अत्यंत सफल रही थी इसलिए उन्होंने यह टोटका भी आजमाया। किशोर को साथ लेकर ‘हँसते रहना’ फिल्म बनाना उनके लिए रोते रहना का पैगाम दे गई। इस फिल्म में उन्होंने दस लाख लगाए मगर यह अधूरी रह गई। उन्होंने जीवन की सारी कमाई गवाँ दी। उनके पास जुहू बीच पर पच्चीस कमरों का बंगला था, सात दिनों के लिए सात कारें थीं और पत्नी आशा के पास ढेर सारे जेवरात थे। सब बिक गए और परिवार को फिर से चाल के दो कमरों में सिमटना पड़ा। मगर वे अभिनय के मैदान में डटे रहे। 

भगवान आभाजी पालव का जन्म मुम्बई में एक अगस्त 1913 को हुआ था। उनका बचपन दादर-परेल की श्रमिक बस्तियों में गुजरा। वे अपने पिताजी से बहुत डरते थे, जो परेल की एक मिल में फिटर थे और पहलवानी भी करते थे। घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उनकी पढ़ाई चौथी कक्षा तक ही हुई। एक दिन उन्होंने पिता से कहा कि फिल्मों में काम करना चाहता हूँ तो वे बहुत नाराज हुए। बोले जाओ, पहले व्यायाम करो, शरीर बनाओ, बाद में काम के बारे में सोचना। भगवान पिता की आज्ञा के पालन में जुट गए। पहलवानी करते-करते मोहल्ले के दादा बन गए। उसी दौरान पड़ौस में रहने वाले कॉमेडियन नूर मोहम्मद चार्ली से उनका सम्पर्क बढ़ा और चार्ली की बातचीत के लहजे से प्रभावित होकर उनकी नकल करने लगे। 


बचपन में वे मास्टर विट्ठल तथा नंदराम पहलवान की मूक फिल्मों और अंग्रेजी फिल्मों के दीवाने थे। उन्हें चार्ली चैपलिन की फिल्में बहुत पसंद आती थीं। वे अंग्रेजी कलाकार डेनीके के भी फैन थे, जो बहुत अच्छे कॉमेडियन और डांसर थे। लारेल हार्डी, मार्क्स बंधु, ग्रेजो ब्रदर्स आदि सभी हँसोड़ लकाकार उन्हें अपनी बिरादरी के लगते थे। इन सबकी हुबहू नकल करने में उन्हें आनंद की अनुभूति होती। दादर के जिस लल्लूभाई-मेंशन में उनकी जिंदगी का अधिकांश समय गुजरा, उसे हॉलीवुड कहा करते थे, क्योंकि रामानंद सागर, चार्ली आदि फिल्मी हस्तियाँ यहीं निवास करती थीं। आसपास ही रंजीत, राजकमल, रूपतारा, फेमस आदि चार-पाँच स्टूडियो थे। चार्ली की वजह से भगवान का झुकाव कॉमेडी की तरफ हो गया, वर्ना वे स्टंट के दीवाने थे। बाबूराव पहलवान उनके जिगरी दोस्त थे। वे दोनों यार-दोस्तों के साथ दादर चौपाटी चले जाते और सुबह से शाम तक हीरो और विलेन का स्वांग बना कर धमाचौकड़ी करते। 

ये गतिविधियाँ वास्तव में नये-नये स्टंट सीखने की ललक का हिस्सा थीं। फेमस स्टूडियो में भगवान दादा का एक परिचित शंकरराव जाधव मेक-अप मैन था, जिसे मालूम था कि भगवान फिल्मों में काम करने के इच्छुक हैं। वह उन्हें फेमस के मालिक दादा गुंजाल से मिलाने ले गया, जो 1918 से मूक फिल्में बना रहे थे। 1930 में अठारह साल की उम्र में भगवान को मूक फिल्म ‘बेवफा आशिक’ में काम मिल गया। इसमें उन्होंने अंग्रेजी फिल्म ‘हंचबैक’ से प्रेरणा लेकर कुबड़े के रोल में स्टंट दिखाए। (अंग्रेजी में ‘हंचबैक’ तीन बार बन चुकी है)। भगवान ने यह फिल्म अपने पिता को फिल्म दिखाई। फिल्म समाप्ति पर लोगों ने उनके नाम की रट लगा दी तो पिता मे पूछा, यह सब क्या है। भगवान ने कहा- लोगों को मेरा काम पसंद आया। पिता को लगा कि भगवान की दीवानगी निश्चित मुकाम पर पहुँच गई है। 

पहली फिल्म के बाद छः महीने तक भगवान को कोई काम नहीं मिला, क्योंकि लोग समझते थे कि भगवान वास्तव में कुबड़ा है। इस बीच एक मित्र ने कहा कि जे.पी. पवांर (ललिता पवांर के पति) के पास जाओ, उनके पास काम है। भगवान पवार से मिलकर उनके साथ काम करने लगे। पवार उन्हें बच्चे के समान स्नेह देने लगे। 1934 में भगवान को चंद्रा आर्ट्स की सवाक् फिल्म ‘हिम्मत-ए-मर्दा’ में काम मिल गया। कुछ समय बाद पवार ने चंद्रा आर्ट्स कम्पनी छोड़ दी तो भगवान भी बाहर आ गये। बाहर दो फिल्मंे की। बाद में चंद्रा आर्ट्स के मालिक अभिनेता चंद्रराव कदम ने उन्हें वापस अपने यहाँ बुला लिया। भगवान बहुत महत्वाकाक्षी होने के साथ ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। वह लेखक, एडीटर, कैमरामेन, निर्माता, निर्देशक, वितरक, प्रदर्शक सभी बनना चाहते थे, इसलिए सभी कामों को समझने की कौशिश में जुट गये। 1936 में उन्होंने ‘बहादुर किसान’ नामक फिल्म का निर्देशन किया, 1942 में निर्माता बनकर ‘बदला’ बनाई और 1948 में वे स्टूडियो के मालिक बन गये। 

भगवान दादा को ‘ला’ शब्द से बड़ा प्यार था, इसीलिए उन्होंने अपनी फिल्मों के नाम ‘अलबेला’, ‘रंगीला’, ‘झमेला’, ‘लाबेला’, ‘हल्लागुल्ला’, ‘समुद्री लुटेरा’ आदि रखे। एक बार शूटिंग में उन्हें ललिता पवार को चांटा मारना था, लेकिन गलती से चांटा जोर से पड़ गया। उनकी आँख में चोट आ गई। फिर ललिता पवार ने कई सालों तक इलाज करवाया पर उनकी आँख कभी ठीक से खुल नहीं पाई।  


युवा भगवान ने 1938-40 के बीच तीन तमिल फिल्मों का निर्देशन भी किया- ‘जय कोड़ी’, ‘मनमोहिनी’ और ‘प्रेम-बंधन’। इनके संगीतकार उनके परम मित्र सी.रामचंद्र ही थे। 1940 में उन्हें एक हिन्दी फिल्म ‘सुखी जीवन’ के निर्देशन का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने शर्त रखी कि संगीतकार और कैमरामैन वगैरह सब मेरी पसंद के होगे। इस तरह उन्होने सी. रामचंद्र को हिन्दी फिल्मों में प्रवेश दिलाया। भगवान और सी. रामचंद्र बड़े खिलंदड़ किस्म के मस्तमौला कलाकार थे। वह हारमोनियम और तबला लेकर बैठ जाते और विदेशी रिकार्ड्स का भारतीयकरण कर धुंने बनाते रहते। ‘शोला जो भड़के’ टाइप के ताल प्रधान गीत उन्होंने इसी तरह बनाए। 

गवान दादा ने ‘रंगीला’, ‘झमेला’, ‘लाबेला’, ‘हम दीवाने’, ‘हल्लागुल्ला’, ‘समुद्री लुटेरा’ आदि फिल्मों का निर्शेदन किया। ‘प्यारा दुश्मन’ में उनके साथ नादिरा और जयराज ने भी काम किया। नादिरा उनकी मुँहबोली बहन थी। ‘बड़े साहब’, ‘दामाद’, ‘गजब’, ‘रामभरोसे’, ‘भूले-भटके’ फिल्मों के वे नायक रहे। मराठी फिल्मों में काम करने की उनकी कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन दादा कोंडके के दबाव के कारण लगभग पन्द्रह मराठी फिल्में भी कर डालीं। असल में हिन्दी में बात करते मराठी भाषी पत्नी इस बात पर झल्लाती थी। उनकी ‘भागमभाग’ फिल्म देखने के बाद अभिनेता बलराज साहनी उतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भगवान दादा के घर जाकर सैल्युट मारा। उनकी इस सादगी पर भगवान निसार हो गए। अपने प्रेरणा स्त्रोत मास्टर विट्ठल को ‘नगमा-ए-सेहरा’ (46) का नायक बनाकर निर्देशक करते हुए भगवान को अपार संतोष हुआ। भारत की पहली सस्पेंस फिल्मों ‘भेदी बंगला’ (48) बनाने का श्रेय भी भगवान दादा को है। इस फिल्म को वी. शांताराम ने भी दिलचस्पी से देखा था। 

भगवान दादा अपने भोलेपन के कारण व्यवसाय की बारीकियों को और जनता की नब्ज़ को ठीक तरह से समझ नहीं पाए। अफलातूनी खर्चों के भी ले अभ्यस्त हो गए थे। यार-दोस्तों ने भी उनका माल बेरहमी से उड़ाया। एक अग्निकांड में उनकी सभी फिल्में स्वाहा हो जाने की त्रासदी भी उन्होंने झेली, लेकिन गनीमत ये रही कि इस ‘अलबेला’ का प्रिंट स्वाहा होने से बच गया, क्योंकि वह एक वितरक के पास गिरवी पड़ा था। फिर भी भगवान दादा ने किसी विपत्ति में हिम्मत नहीं हारी। वे फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर के गुजारा करते रहे। जीवन के अंतिम वर्षों में वे फिल्मों से खुद हट गए थे, क्योकि नया माहौल उन्हों रास नहीं आ रहा था। 3 फरवरी 2002 को 89 की उम्र में अपने साउंड रिकार्डिस्ट बेटे के घर में इस वयोवृद्ध कलाकार का देहावसान हो गया। भगवान दादा सचमुच जोरदार सैल्यूट के हकदार थे।

20.6.13

मूर्ति बहने का राष्ट्री य शोक


ऋषिकेश में एक मूर्ति बही तो देश का पूरा मीडिया ने आसमान सर पर उठा लिया। खासकर तब जब वह न तो ऐतिहासिक थी, न पौराणिक। 2010 में भी मूर्ति ऐसे ही बही थी। जबकि राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में हजारों जिंदगियां दफन हो चुकी हैं। तब भी मीडिया के लिए मूर्ति का बहना बड़ी खबर बनी हुई है। मजेदार बात कि यह क्लिप मीडिया को बिना प्रयास के ही मिल गए। आखिर कैसे.. जबकि ऋषिकेश में राष्‍ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि कार्यरत नहीं है। एक स्‍थानीय मीडियाकर्मी की मानें तो यह सब मैनेजिंग मूर्ति के स्‍थापनाकारों की ओर से ही हुई।
अब सवाल यह कि एक कृत्रिम मूर्ति के बहने मात्र की घटना को राष्‍्ट्रीय आपदा बनाने के पीछे की सोच क्‍या है। इसके लाभ क्‍या हो सकते हैं.. कौन और कब पहचाना जाएगा, या कब कोई सच को सामने लाने की हिकमत जुटाएगा। क्‍या मीडिया की भांड परंपरा में यह संभव है।
किसी के पास यदि इसी स्‍थान की करीब डेढ़ दशक पुराना फोटोग्राफ्स हो तो काफी कुछ समझ आ जाएगा कि क्‍या गंगा इतनी रुष्‍ट हुई या उसे अतिक्रमण ने मजबूर कर दिया। अब एकबार फिर गंगा और मूर्ति के नाम पर आंसू बहेंगे, और कुछ समय बाद कोई राजनेता, सेलिब्रेटी तीसरी बार नई मूर्ति की स्‍थापना को पहुंचेगा। और आयोजित समारोह में निर्मल गंगा और पर्यावरण संरक्षण की लफ्फाजियां सामने आएंगी। जिसे स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय मीडिया एक बड़ी कवायद और उपलब्धि के रूप में प्रचारित करेगा।
धन्‍य हो ऐसे महानतम मीडिया का.....

निर्णय क्षमता

निर्णय क्षमता 

शास्त्र कहते हैं कि संशय में फंसे रहने वाले मनुष्य विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।हमें हाँ और
ना के बीच में फंसे नहीं रहना चाहिए।हम प्रतिदिन कुछ ना कुछ निर्णय अवश्य करते हैं ,क्या
हमारे द्वारा किये गए सभी फैसले सही होते हैं ?....अगर सही होते तो इस विषय पर लिखने
की आवश्यकता भी नहीं थी।

               निर्णय कैसे ले -- निर्णय लेना जीवन को गतिशील रखने के लिए आवश्यक है ,सभी
व्यक्ति निर्णय लेते हैं उसमे से ज्यादातर व्यक्ति अटूट निर्णय के स्तर को नहीं छू पाते ?ऐसा
इसलिए होता है कि उनके द्वारा लिया गया निर्णय तठस्थ होकर नहीं लिया जाता है।हम
निर्णय लेने से पहले सब कुछ अपने अनुकूल सोच कर फैसले पर पहुँच जाते हैं तब इसके
विपरीत परिणाम भोगने पड़ते हैं।

                  निर्णय लेने से पहले सवाल या समस्या के मूलरूप को जानने की कोशिश करे।
जब तक हम स्थिति को मूल रूप से सांगोपांग रूप से समझ नहीं लेते तब तक हमे अपना
समय चिंतन और मनन करने में बिताना चाहिए।जब भी कोई विषय हमारे समक्ष आता
है तब उसे समझे तथा समस्या को खुद से दूर रखकर देखे यदि हम अपनी समस्या में लिप्त
नहीं हिकार तटस्थ भाव से देखेंगे तो हम बात के मर्म को सही मायने में समझ पायेंगे।

                 निर्णय और उतावलापन ,यदि एक साथ किसी भी व्यक्ति में होता है तो वह सही
निर्णय ले ही नहीं पाता क्योंकि उतावलापन उस विषय पर पूरा चिंतन किये बिना ही फैसले
पर पहुंचा देता है। उतावला और जल्दबाज ना तो खुद सही निर्णय कर पाता है और ना ही
किसी को उचित सलाह देने की स्थिति में होता है।जब भी निर्णय करना हो तो उस विषय
के हानि लाभ और दीर्घकाल में पड़ सकने वाले प्रभाव पर शांत चित्त से सोचे।

                 क्रोध की अवस्था में कोई भी निर्णय ना करे क्योंकि क्रोध अविवेक से उत्पन्न
होता है और विवेकशुन्यता की अवस्था में सही निर्णय हो नहीं सकता है।यदि हम गुस्से में
है और निर्णय करना जरुरी भी है तब उस निर्णय को कुछ समय के लिए टालने की नीति
अपनाये,बहुत बार विषम परिस्थितियों में निर्णय ना करना भी एक निर्णय ही होता है।

               चिंता की अवस्था में दिमाग की क्षमता कम हो जाती है यदि हम चिंता में है और
उस समय निर्णय कर लेते हैं तो गलत परिणाम मिल जाते हैं।

             अकेले विचार करके निर्णय पर नहीं पहुंचे क्योंकि हम समस्या का आंकलन पूरी
तरह से करने में चुक गए तो काम बिगड़ भी जाता है और जग हँसाई भी होती है,परन्तु
इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने मन्त्र (योजना )को चोपट कर दे।हमे अपने विश्वनीय
मित्र के साथ बैठ कर मनन करना चाहिए।विश्वनीय का अर्थ जिस पर आप विश्वास करते
हैं ,जो आपकी योजना को खुद तक सिमित रख सकता हो ,जो उस विषय में योग्य हो ,जो
उस योजना की लाभ हानि से जुड़ा  हुआ ना हो।

            निर्णय से अटूट निर्णय की ओर - जब हम उपरोक्त बातों को ध्यान में रख कर
निर्णय लेते हैं तब भी फैसले को अधुरा ही माने क्योंकि अभी तक के मंथन से हमे जो कुछ
हासिल हुआ है वह निर्णय लेने के लिए काफी नहीं है।हमें उस निर्णय पर पुनर्विचार करना
चाहिए।उस निर्णय के हर अंश पर गौर करे ,निर्णय का सूक्ष्मतम अवलोकन करे।उसके हानि
लाभ और प्रभाव को फिर से जांच ले ,मन में यदि लेश मात्र शंका बची हो तो उसका निवारण
करे। निर्णय ही हमे अपने लक्ष्य तक पहुंचाता है इसलिए अटूट निर्णय करना आवश्यक
होता है। अटूट निर्णय का मतलब विकल्प रहित होना है मगर उपाय रहित होना नहीं है।
जब भी हम निर्णय करते हैं उसका अर्थ लक्ष्य को पाना ही होता है मगर हमारे द्वारा लिए
गए निर्णय के कारण लक्ष्य दूर नजर आता हो तो पहले से सोचे गए उपाय का भी उपयोग
कर ले क्योंकि हम सफल होने के लिए ही निर्णय करते हैं।

        पुरे मनोयोग से अमल करे - यदि हम इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं तो हमारा अगला
और महत्वपूर्ण कार्य है निर्णय पर पुरे मन से काम करना।हम यदि पुरे मन से ,अटूट उत्साह
से, निर्णय पर सच्ची श्रद्धा रख कर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ जाते हैं तो मंजिल भी पास आ
जाती है                         

19.6.13

शोभना समर्थ - सीता की छायाप्रति



शोभना  समर्थ 
सीता की छायाप्रति 

आज की युवा पीढ़ी अभिनेत्री काजोल और बहन तनीशा की प्रशंसक है। इसके पहले की पीढ़ी नूतन और तनूजा के दिलकश अभिनय से बखूबी परिचित हैं और उससे भी पहले की पीढ़ी सीता के रूप में जानती है चालीस के दशक की लोकप्रिय तारिका शोभना समर्थ को। रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण में जिस तरह राम (अरूण गोविल) और सीता (दीपिका चिखलिया) को पॉपूलर आर्ट यानी फोटो, पोस्टर, कैलेंटर और कई उत्पादों के जरिये घर-घर में परिचित करा दिया था। वैसे ही कुछ शोभना समर्थ और प्रेम अदीब (राम) के साथ चालीस के दशक में घटित हुआ था। इससे भी बढ़कर धार्मिक आस्था वाले अपने घर के देवालय में इनकी तस्वीर लगाकर सुबह-शाम आरती उतारते थे तथा हल्दी कुमकुम लगाते थे। 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन में जो एकमात्र फिल्म देखी थी, वो "रामराज्य" थी। खुद शोभना समर्थ को भी इस बात का बहुत गर्व था।  

मुंबई के अमीर बैंकर परिवार में शोभना शिलोत्री का जन्म 17 नवंबर, 1916 को हुआ था। पिता पी.एल. शिलोत्री की एकमात्र पुत्री होने से शोभना का बचपन लाड़-प्यार में बीता। बचपन में मराठी रंगमंच पर अभिनय किया। उन पर उस दौर के दिग्गज फिल्मकार बाबूराव पेंढारकर का जबरदस्त प्रभाव था। सिनेमाटोग्राफर कुमार सेन समर्थ से शादी के बाद शोभना समर्थ कहलाई। यहीं से फिल्म करिअर की खिड़कियां खुलना आरंभ हुई। इसके पहले कुलीन परिवार की बहू-बेटियों के फिल्मों में प्रवेश के दरवाजे दुर्गा खोटे ने खोल दिये थे। 


पिता की मृत्यु के बाद मामा जयंत (नलिन जयंत के पिता) ने शोभना को सहारा दिया। विलासी ईश्वर उर्फ ‘निगाह-ए-नफरत’ उनकी पहली फिल्म थी। मास्टर विनायक के कोल्हापुर सिनेटोन की कुछ फिल्मों में शोभना ने अभिनेता मोतीलाल के साथ काम किया। मोतीलाल से उनकी दोस्ती ताउम्र चली और कई बार फिल्म पत्रिकाओं के पन्नों पर गॉसिप की तरह उछली। इसके बाद हिंदी-गुजराती फिल्म ‘दो दीवाने’ में उन्होंने मोतीलाल के साथ लीड रोल किया। नूतन को जन्म देने के लिए करिअर के आंरभ में शोभना ने दो साल का प्रसूति अवकाश लिया। लौटकर फिल्म ‘कोकिला’ और ‘पति-पत्नी’ में काम किया। फिल्में सफल रहीं। वाडिया बद्रर्स उन दिनों सिर्फ स्टंट फिल्में बनाते थे, लेकिन शोभना का अभिनय देखकर उन्होंने एक सामाजिक फिल्म बनाई ‘शोभा’ । 

कोजोल तथा तनीशा की नानी और नूतन तथा तनूजा की माँ शोभना समर्थ को विजय भट्ट ने सीता के रूप में क्या प्रस्तुत किया, वह इस इमेज से बाहर नहीं आ सकी। शोभना एवं प्रेम अदीब सीता और राम के पर्याय हो गये थे। 

शोभना को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता मिली प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘भरत मिलाप’ / ‘भरत भेंट’ से। यह रामायण के एक एपिसोड पर विजय भट्ट द्वारा निर्देशक श्रेष्ठ फिल्म थी। तकनीकी दृष्टि से विजय भट्ट की यह श्रेष्टतम फिल्म है लेकिन ‘रामराज्य’ की लोकप्रियता ने इसे पीछे छोड़ दिया। भरत मिलाप में सीता की भूमिका छोटी थी, जो ‘राम राज्य’ में लार्जर देन लाईफ बन गई। इन दोनों फिल्मों ने शोभना पर सीता और प्रेम अदीब पर राम की मुहर ऐसे लगाई कि ये इस छवि के दायरे से अपने को बाहर नहीं निकल पाये। भारतीय सिनेमा के इतिहास में रामराज्य सबसे अधित सफल पौराणिक फिल्म मानी जाती है। फिल्म का गीत-संगीत ‘वीणा मधुर-मधुर कुछ बोल’ तथा ‘भारत की एक सन्नारी की हम की हम कथा सुनाते हैं।’ हर दर्शक श्रोता की जुबान पर चढ़ा था। इसके बाद प्रकाश पिक्चर्स की फिल्मों – ‘रामबाण’, ‘रामविवाह’, ‘रामायण’ में ये दोनों कलाकार दोहराये गये लेकिन ‘रामराज्य’ जैसी ऊंचाईयां नहीं मिलीं।

अभिनेता मोतीलाल से शोभना के अंतरंग प्रेम सम्बम्धों के चलते उस दौर की पत्र-पत्रिकाओं में उनके गोसिप छपते थे। 

पौराणिक कंदरा से बाहर निकलकर शोभना समर्थ ने पृथ्वीराज के साथ फिल्म ‘नल दमयंती’ की। उनके करिअर का सर्वोच्च अभिनय फिल्म ‘वीर कुणाल’ में देखने को मिलता है। इसे किशोर साहू ने निर्देशित किया था। सम्राट अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता का रोल शोभना ने निभाया, जो अपने सौतेले पुत्र कुणाल से प्रेम करने लगती है। लेकिन सीता सावित्री के रूप में शोभना को चाहने वाले दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया।

शोभना समर्थ को ‘रामराज्य’ में सीता की भूमिका के लिए याद किया जाता है। उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया कि पति से अनबन के बाद सितारे मोतीलाल के साथ लंबे समय तक उनका प्रेम रहा है।
  
सन् 1950 के बाद फिल्म परिदृश्य एकदम बदल गया। धार्मिक पौराणिक फिल्मों का निर्माण कम हो गया। शोभना ने सही समय पर फिल्मों से दूरियां बना कर अपनी जवान होती बेटियों नूतन और तनूजा पर ध्यान देना शुरू किया। नूतन को ‘हमारी बेटी’ से लांच किया और तनूजा के लिए फिल्म ‘छबीली’ बनाई। ‘हमारी बेटी’ में नूतन के पिता की भूमिका माती लाल को दी गई थी। 9 फरवरी, 2000 को शोभना सीता की तरह ही धरती की गोद में समा गई। 




लेखक 
श्रीराम ताम्रकर एम.ए., बी.एड., 
विद्यावाचस्पति, विशारद, एफ.ए. (FTII) 
इन्दौर, म.प्र. 
‘बीते कल के सितारे’ पुस्तक से

प्रकृति का गुस्सा

प्रकृति का गुस्सा  मौत के साथ तबाही का मंजर दिखाता है। उत्तराखंड व हिमाचल में जख्म फिर ताजा हो रहे हैं। अनेक लोग मर चुके हैं। कई जिदंगिया मौत के बेहद करीब हैं, दुआ यही कि सब ठीक रहें! प्रकृति से खिलवाड़ न ही किया जाये तो अच्छा है। हम विकास के नाम पर जंगलों के कटान, दोहन, खनन ओर गंगा के चारों तरफ किये जाने वाले अतिक्रमण की
कीमत चुका रहे हैं। 

17.6.13

नीली आँखों के जादूगर - चंद्रमोहन

नीली आँखों के जादूगर चंद्रमोहन


चंद्र मोहन
जन्म - 1905  
    निधन ---- मार्च, 1949 
फिल्मी दुनिया में कई कलाकार शराब और जुए की लत के मारे काल-कवलित हो गए। उनमें पिछली सदी के तीस और चालीस के दशक के लोकप्रिय और प्रतिभावान अभिनेता चंद्रमोहन भी शरीक थे। लोग गायक-अभिनेता कुंदनलाल सहगल के असामयिक अवसान को भूले भी नहीं थे के दो साल बाद चंद्रमोहन का भी वही हश्र हुआ। सफलता की पायदान चढ़ते ही उन्होंने ‘व्हिस्की’ को अपनी जीवन-संगिनी बना लिया था। उन्हें अपने परममित्र मोतीलाल के समान ही घुड़दौड़ में पैसा लगाने का शौक भी था। फिर भी चंद्रमोहन ने कई ऐतिहासिक और सामाजिक फिल्मों में दमदार भूमिकाएँ निभाकर हिन्दी-सिनेमा को सम्पन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी उनकी ‘अमृत-मंथन’, ‘पुकार’ और ‘शकुंतला’ फिल्में अविस्मरणीय हैं। 

वी. शांताराम की बहुचर्चित फिल्म ‘अमृत-मंथन’ (34) चंद्रमोहन की पहली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने खलनायक राजगुरू की केंद्रीय भूमिका निभाई। इसके लिए शांताराम को उनके जैसे नीली बिल्लोरी आँखों वाले अभिनेता की ही जरूरत थी। इस फिल्म में शांताराम ने उनकी आँखों के ‘क्लोज-अप’ का बारम्बार उपयोग कर फिल्म को सनसनीखेज और प्रभावोत्पादक बनाया। चंद्रमोहन पहली ही फिल्म से हिट हो गए। शांताराम ने अपनी दो अगली फिल्मों, ‘धर्मात्मा’ (34) और ‘अमरज्योति’ (35) में भी उन्हें महत्वपूर्ण भूमिकाएँ दीं, लेकिन नायक के रोल नहीं। इन फिल्मों के नायक बाल गंधर्व थे, मगर चंद्रमोहन को सितारा हैसियत प्राप्त हो गई थी। 
चंद्रमोहन की पहली बहुचर्चित फिल्म अमृत-मंथन थी, जिसमें वी. शांताराम ने उनकी नीली बिल्लोरी आँखों के क्लोज-अपका बारम्बार उपयोग कर फिल्म को सनसनीखेज और प्रभावोत्पादक  बनाया। चंद्रमोहन पहली ही फिल्म से हिट हो गए।

‘अमृत-मंथन’ बनाने वाली प्रभात फिल्म कम्पनी पहले कोल्हापुर में थी। पुणे में उसकी यह पहली फिल्म थी। कोल्हापुर में बाबूराव पेंढारकर खलनायकी के लिए बहुत मकबूल हो चुके थे, लेकिन वे पुणे नहीं आए, इसलिए शांताराम को राजगुरू के रोल के लिए चंद्रमोहन का चुनाव करना पड़ा। बाद में स्वयं पेंढारकर ने चंद्रमोहन के अभिनय की तारीफ में बहुत कशीदे पढ़े। 1941 में पेंडारकर ने ‘अमृत’ नामक फिल्म में एक चमार की बेजोड़ भूमिका निभाई। यह भूमिका चंद्रमोहन को ध्यान में रखकरी लिखी गई थी, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए तो पेंढारकर को यह रोल दे दिया गया। बाद में पेढ़ारकर ने कहा, चंद्रमोहन होते तो मुझसे अच्छा अभिनय करते। 

‘अमृत-मंथन’ में चंद्रमोहन की आँखों का उपयोग खौफ पैदा करने के लिए किया गया था और सचमुच दृश्य इतने डरावने थे कि कोई निर्माता उन्हें हीरो के रूप में लेने की हिम्मत नहीं कर सकता था। लेकिन सोहराब मोदी ने अपनी ऐतिहासिक फिल्म ‘पुकार’ (39) में उन्हें बादशाह जहाँगीर की भूमिका देकर बड़ा जोखिम उठाया। इसमें चंद्रमोहन ने अभिनय-क्षमता का ऐसा जौहर दिखाया के वे खलनायक से नायक बनने वाले पहले सफल अभिनेता साबित हुए। इस फिल्म में उनकी नायिका सायरा बानू की माता नसीम थीं। ‘पुकार’ में चंद्रमोहन को न्यायप्रिय बादशाह जहाँगीर की भूमिका में देखकर के. आसिफ ने उन्हें ‘मुगल-ए-आजम’ में अकबर की भूमिका के लिए चुना था। अनारकली और सलीम की भूमिका के लिए नरगिस और सप्रू लिए गए थे। भारत-पाक विभाजन और चंद्रमोहन के असामयिक निधन की त्रासदियों के कारण आसिफ की योजना धरी रह गई, जबकि आधी शूटिंग हो गई थी। 

आसिफ ने 1951-52 में ‘मुगल-ए-आजम’ की योजना को फिर हाथ में लिया। इस बार चंद्रमोहन की जगह पृथ्वीराज कपूर को लीड रोल दिया गया और नरगिस सप्रू के स्थान पर मधुबाला-दिलीपकुमार लिए गए। यह बात अलग है कि पृथ्वीराज भी अकबर के जामे में खूब फबे और दिलीप-मधुबाला की जोड़ी भी हिट रही। अकबर में पृथ्वीराज अजर-अमर हो गए। जीवन के अंतिम वर्षों में सोहराब मोदी ‘पुकार’ का रिमेक बनाना चाहते थे। उन्होंने जहाँगीर के रोल के लिए दिलीपकुमार का चयन किया, मगर साथ ही यह भी कहा था कि चंद्रमोहन जैसा जहाँगीर दोबारा मिलना मुश्किल है। 

सारी जिंदगी अविवाहित रहने वाले और स्कॉच व्हिस्की की लत तथा घुड़सवारी के शौक की वजह से चंद्रमोहन तंगहाली में मरे। उनका अंतिम संस्कार सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन ने कराया।

बेगम अख्तर के साथ चंद्रमोहन ने मेहबूब की फिल्म रोटी में अभिनय किया था।   

चंद्रमोहन का जन्म नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वे कश्मीरी ब्राह्मण थे उनके पिता ग्वालियर स्टेट की सेवा में थे। चंद्रमोहन की युवावस्था में ही उनके पिता चल बसे, इसलिए वे रोजगार की खातिर घर से निकल पड़े। उन्होंने तरह-तरह की नौकरियाँ कीं, जिसमें से एक फिल्म वितरण कम्पनी थी। इस कम्पनी के लिए फिल्म का अनुबंध करने के सिलसिले में ही उनकी मुलाकात शांताराम जी से हुई। शांताराम को चंद्रमोहन का व्यक्तित्व आकर्षक लगा। उन्होंने उनके समक्ष अभिनेता बनने का प्रस्ताव रख दिया, लेकिन वे राजी न हुए। दो साल बाद, जब चंद्रमोहन नैनीताल के एक थिएटर में मैनेजर थे, फिर शांताराम से मिले तो अभिनय के लिए तैयार हो गए और तीन फिल्मों में वे लगातार आए। 

शांताराम चंद्रमोहन को लेकर चौथी फिल्म भी बनाना चाहते थे, लेकिन मेहनताने के मामले को लेकर बात बिंगड़ गई। शांताराम पुराने रेट पर ही उन्हें अनुबंधित करना चाहते थे, लेकिन चंद्रमोहन के यह बात जँची नहीं कि एक स्थापित कलाकार के रूप में भी वे नवागत कलाकार जैसी फीस लें, जबकि बाजार में उनके दाम बढ़ गए थे। चंद्रमोहन के इंकार से शांताराम तल्ख हो गए और कह बैठे कि वह दूसरा चंद्रमोहन भी पैदा कर सकते है। चंद्रमोहन भी कम स्वाभिमानी नहीं थे। उन्होंने जवाब दिया कि दूसरा चंद्रमोहन तो उनके पिता भी पैदा नहीं कर सके, अब आप भी कोशिश करके देखिए। मगर बाद में दोनों के बीच सुलह भी हुई और चंद्रमोहन ने शांताराम की यादगार फिल्म ‘शकुंतला’ में जयश्री के साथ दुष्यंत की भूमिका निभाई। 

अपने पंद्रह वर्षीय फिल्म करीयर मे चंद्रमोहन ने कुल जमा तीस फिल्मों में काम किया। 1934 से 39 तक प्रतिवर्ष उनकी एक फिल्म प्रदर्शित हुई। 1940 में ‘भरोसा’ और ‘गीता’ नामक दो फिल्में रिलीज हुई। ‘गीता’ में उन्होंने पहली बार डबल राल किया। आगे हिन्दी में बनने वाली डबल-रोल फिल्मों के लिए इसने आदर्श-प्रारूप का काम किया। 1941 में उनकी तीन फिल्में सिनेमाघरों में लगी, जिनमें मेहबूब की ‘रोटी’ भी थी, जिसमें वे प्रख्यात गायिका बेगम अख्तर के साथ आए। दो अन्य फिल्में थी – ‘झंकार’ और ‘अपनाघर’। 43 में उनकी ‘फैशन’, ‘शकुंतला’ और ‘तकदीर’ फिल्में आईं। 44 में उनकी लोकप्रियता का ग्राफ एकदम चढ़ा, जब छः फिल्में प्रदर्शित हुई। इनमें ऐतिहासिक फिल्म ‘मुमताजमहल’ भी शरीक थी। 45 में भी चार फिल्में रिलीज हुई, जिनमें ‘हुमायुँ’ और ‘पन्नादाई’ शामिल थीं। 46 और 48 में तीन-तीन फिल्में आईं। दिलीपकुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्मीस्तान की ‘शहीद’ (48) चंद्रमोहन की अंतिम फिल्म थी, जिसमें उन्होंने दिलीपकुमार के पिता रायबहादूर द्वारकादास का रोल किया था। 

उनकी यादगार फिल्मों में ‘अमृत-मंथन’ के अलावा ‘शकुंतला’, ‘मुमताज महल’, ‘श्रवणकुमार’ (46) और ‘रामबाण’ (48) प्रमुख हैं, जिनमें उन्होंने क्रमशः दुष्यंत शाहजहाँ राजा दशरथ और रावण के बहुआयामी किरदार निभाए। मार्च 1949 में सिर्फ 45 साल की उम्र में उनका देहावसान हो गया। इतनी फिल्मों काम करने के बावजूद चंद्रमोहन कंगाल की मौत मरे । उनका अंतिम संस्कार सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन ने करवाया। चंद्रमोहन के जीवन में कंगाली का आगमन 1945-46 में ही हो गया था। वे शाही खर्च व्यक्ति थे। उनके मंहगे शगल थे, ‘स्कॉच’ और ‘घुड़दौड़’। आखिरी दिनों में मजबूरन उन्हें ठर्रा भी पीना पड़ा। किस्सा मशहूर है कि एक बार मोतीलाल उनसे मिलने गए तो वे स्कॉच की बोतल लिए बैठे थे और मोतीलाल को ऑफर किये बिना अकेले पीते रहे, जबकि वे हमपियाला और हमनिवाला रहे थे। यह रहस्य बाद में उजागर हुआ कि स्कॉच की बोतल में ठर्रा भरा था। 

सोहराब मोदी की फिल्म पुकार में चंद्रमोहन को न्यायप्रिय मुगल बादशाह जहाँगीर की भूमिका में देख के. आसिफ ने उन्हें मुगल-ए–आजम में अकबर की भूमिका के लिए चुना था। भारत-पाक विभाजन तथा चंद्रमोहन की अकाल मौत की वजह से अधिकांश शूटिंग रद्द हो गई।

चंद्रमोहन की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। चंद्रमोहन ने विवाह नहीं किया था। उनकी दिनचर्या अनियमित थी। वे नास्तिक थे, ऊपर से ‘ड्रग-एडिक्ट’ भी। इसलिए पैसा बचने का तो सवाल ही नहीं था। नतीजतन पीने के लिए घर का सारा सामान एक-एक कर बिक गया। बहुत बुरे दिन देखने के बाद उन्होंने सुधरने के प्रयत्न किए, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। आखिरी दिनों में वे देवी-माँ के भक्त हो गए थे और अकसर मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि धर्म-स्थलों पर जाया करते थे। वे मतिभ्रंश के रोगी भी हो गए थे। उनके जीवन पर मित्र मोतीलाल ‘जुआरी’ नामक फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन बाद में मोतीलाल भी चंद्रमोहन की तरह तंगहाली के शिकार हुए और ‘जुआरी’ की योजना धरी रह गई। चंद्रमोहन और मोतीलाल की जोड़ी परदे पर पिता-पुत्र के रूप में दिखाई दी। 1943-44 में बनी ‘तकदीर’ ‘रौनक’ और 

‘उमंग’ में चंद्रमोहन ने मोतीलाल के पिता बनने का साहस दिखाया था। 
उनकी पहली फिल्म अमृत-मंथन में पहली बार टेलीफोटो लैंस और कई नई-नई जर्मन फिल्म तकनीकों  प्रयोग किया गया।  यह पहली भारतीय फिल्म है जिसने सिल्वर जुबली मनाई। 

सोहराब मोदी की फिल्म ‘पुकार’ में चंद्रमोहन को न्यायप्रिय मुगल बादशाह जहाँगीर की भूमिका में देख के. आसिफ ने उन्हें ‘मुगल-ए–आजम’ में अकबर की भूमिका के लिए चुना था। भारत-पाक विभाजन तथा चंद्रमोहन की अकाल मौत की वजह से अधिकांश शूटिंग रद्द हो गई।

कहाँ हुई भाजपा से चूक?-ब्रज की दुनियाकहाँ हुई भाजपा से चूक?-ब्रज की दुनिया

 

मित्रों,अगर आपने भारत का इतिहास पढ़ा होगा तो आप जानते होंगे कि 1789 से 1792 तक मैसूर का तृतीय युद्ध चला था। इस लड़ाई में एक तरफ तो मैसूर के शेर टीपू सुल्तान थे तो दूसरी तरफ थे अंग्रेज,मराठे और निजाम। युद्ध में टीपू बुरी तरह पराजित हुआ था और अगर अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस चाहता तो तभी उसे प्राणहीन और राज्यविहीन कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा किया नहीं और श्रीरंगपट्टनम् की संधि करके टीपू को मैसूर का शासक बना रहने दिया। जब ब्रिटिश सरकार ने नाराज होकर उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं शत्रु को तो समाप्त करना चाहता था लेकिन साथ ही मित्रों को इतना मजबूत भी नहीं होने देना चाहता था कि वे भविष्य में हमारे लिए ही खतरा बन जाएँ। जहाँ तक टीपू को समाप्त करने का सवाल है तो अब तो ब्रिटिश सेना यह काम अकेले भी और जब चाहे तब कभी भी कर सकती है। कहने का आशय यह है कि अगर तब टीपू को समाप्त कर दिया जाता तो अंग्रेजों को उसका राज्य तीन बराबर हिस्सों में बाँटना पड़ता जिससे मराठे और निजाम खासे शक्तिशाली हो जाते।
                        मित्रों,लगता है कि भारतीय जनता पार्टी में कोई भी इतिहासकार या इतिहास का विशेषज्ञ नहीं है नहीं तो वो भी इसी तरह कार्नवालिस की नीति पर चलती। दुर्भाग्यवश भाजपा के साथ ऐसा दूसरी बार हुआ है। पहली बार कुछ ऐसा ही उसके साथ उड़ीसा में भी हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी लालू विरोध की धुन में भूल गई कि अगर कभी नीतीश कुमार ने अकेले ही बहुमत पा लिया तो गठबंधन का क्या होगा। कोई भी पार्टी लगभग 100 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 सीट ही जीत सकती है 122 तो कभी नहीं। हालाँकि पिछले विधानसभा चुनाव में प्रतिशत सफलता के मामले में नीतीश भाजपा से काफी पीछे थे फिर भी उनकी पार्टी ने चूँकि 140 से भी ज्यादा स्थानों पर चुनाव लड़ा था इसलिए उसको 116 सीटों पर सफलता हाथ लगी। राजग तो 24 नवंबर,2010 को ही नीतीश कुमार के लिए बेमानी हो गया था और वे तो तभी से इससे पिण्ड छुड़ाने का बहाना ढूँढ़ रहे थे। जदयू और नीतीश कुमार का यह तर्क भी पूरी तरह से हास्यास्पद है कि नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक हैं तो क्या आडवाणी जो 2009 में राजग की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और कभी नरेंद्र मोदी के तारणहार भी रह चुके हैं सांप्रदायिक नहीं थे और अगर नहीं थे या हैं तो कैसे? आज नीतीश के पास 116 विधायक हैं तो भाजपा बुरी हो गई और अगर यही गिनती 100 से कम होती तो कदापि बुरी नहीं होती। अगर गुजरात के दंगों में भाजपा की प्रदेश सरकार का हाथ था तो क्या कारण था कि नीतीश कुमार ने दंगों के समय या तत्काल बाद केंद्रीय रेल मंत्री के पद से इस्तीफा क्यों नहीं दिया? इतना ही नहीं ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद भी कई बार नरेंद्र मोदी की बड़ाई की है। जाहिर है कि आज समीकरण बदल चुके हैं और नीतीश के पास पर्याप्त संख्या बल है। आज उनको सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा को साथ में लेकर चलने की जरुरत नहीं है कल जरुरत पड़ेगी तो फिर देखा जाएगा। वे घोर अवसरवादी तो हैं ही फिर से हाथ-पाँव जोड़कर चिपक लेंगे।
                          मित्रों,स्पष्ट है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के रणनीतिकारों को तगड़ा झटका दिया है। सबसे ज्यादा सबक ग्रहण किया होगा सुशील कुमार मोदी ने। उम्मीद है कि आगे से भाजपा क्षेत्रीय दलों से सीटों का समझौता करते समय इस बात का ख्याल रखेगी कि सहयोगी को बड़ा भाई न बनाया जाए और खुद वो ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े। नहीं तो उसको इसी तरह लगातार विश्वासघात के झटके लगते रहेंगे और बार-बार धोखे खाने पड़ेंगे। वैसे भी राजनीति में न तो कोई किसी का स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु और प्यार और जंग में सबकुछ जायज तो होता ही है।

कब तक धर्म के नाम पर राजनीति का बोझ उठाएंगें भारतीय ....?

कब तक धर्म के नाम पर राजनीति का बोझ उठाएंगें भारतीय ....?

यह देश सभी धर्मावलम्बियों को साथ लेकर चलता आया है और यही कारण है कि हम अपनी
संस्कृति पर गर्व करते आये हैं।जिस तरह अनेकों नदियाँ अलग-अलग भू भाग से बह कर सागर
में आकर एक  हो जाती है उसी तरह संसार के अनेक धर्म भारत की भूमि पर आकर विश्व बंधुत्व
के सागर में एक होते आये हैं और होते रहेंगे ,क्योंकि हिंदुत्व प्राणी मात्र में समभाव समदृष्टि के
सिद्धांत पर ही बना है।

इस देश का दोहन अंग्रेजों ने किया और अपने स्वार्थ के लिए दौ धर्मो के बीच खाई भी बनाई ,
उन्होंने जो भी किया उसे उनके देश के हित के अनुकूल किया होगा लेकिन 1947 के बाद अब तक
हमारे ही नेताओं ने क्या किया ?

इस देश की सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी भारतीयों के साथ वही खेल चला रही है जो आजादी के
पहले अंग्रेजों का था।सभी पार्टियाँ अल्पसंख्यक समाज को वोट बेंक मानती है और उन्हें
काल्पनिक भय बहुसंख्यकों का दिखाती है।यह एक कटु सच्चाई है कि इस देश में सभी अल्प
संख्यक धर्मावलम्बी किसी पार्टी विशेष की नीतियों के कारण सुरक्षित नहीं है ...नहीं है। वे इस
देश के बहुसंख्यकों की विश्व बंधुत्व और सब में एक ही तत्व ( एक ही ईश्वर )है इस मूल सिद्धांत
से ही सुरक्षित हैं और वे यह भावना जब तक जिन्दा है तब तक सुरक्षित भी रहेंगे। 

स्वतंत्रता प्राप्ति से आज तक कौनसा चुनाव धर्म तथा जातिगत समीकरणों को अलग रख
कर भारतीयों के हितों को ध्यान में रख कर लड़ा गया।एक भी नहीं .......तो क्या इसका यह अर्थ
नहीं निकलता है कि केवल राजनीतिक दल ही साम्प्रदायिक है जो सत्ता के स्वार्थ में सभी
भारतीयों में धर्म का जहर फैलाते हैं और सत्ता सुख भोगते हैं।

सवाल यह है कि हम भारतीय इन राजनेतिक पार्टियों के नेताओं के बहकावे में आकर कब तक
इनका बोझ उठाये रहेंगे ?हम इनसे कब कहेंगे कि आप धर्म और जाती के मामलो से हटकर
इस देश के हित में क्या काम करेंगे इस पर अपने विचार खुल्ले कीजिये ,धर्म और जाती हम
भारतीयों का आस्था का मामला है जो एक दुसरे का पूरक ही है इसमें आप दखल मत कीजिये

आज करोड़ों भारतीय गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे हैं ....क्यों ?किसके पाप के कारण
कोई भी दल इसकी जिम्मेदारी लेगा ....?किसकी नीतियों के कारण करोड़ों भारतीय बदहाली
का जीवन जीने को मजबूर हैं ...क्या यह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सामूहिक जबाबदेही
नहीं निभा पाने के कारण हुआ

क्या अगला चुनाव भी राजनेतिक दल धर्म और जाती को मध्य में रख कर लड़ेंगे या विकास
और देश हित के मुद्दे पर।यह तय करोड़ों भारतीयों को करना है कि हम कब तक तकवादी
लोगो का बोझ ढ़ोते रहेंगे ............