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3.12.07

आओ फिर बोलें कि हमें बोलने की जरूरत है

भडास की दूसरी पारी में मैं पहली बार आप लोगों से सीधे सीधे मुखातिब हूँ । आप लोगों को नहीं लगता कि इस बार भडासियों की धार कुंद है। जिस काम के लिए हम इकट्ठे हुए हैं उसका व्याकरण ही गडबडा गया लगता है. इस बार सभी अपनी आत्ममुग्धता के सुनहरी हाले में कैद बेहद अकेले और आत्मलीन नहीं लगते? बातचीत का वह अंदाज भी नहीं जो ठुस्की छोडता था. सुर्तीलाल के किस्से भी नहीं और न मनोज झा की दारू पार्टी का कोई जिक्र है. यानी हम सभी बेतुके हो गए हैं. कुछ कुछ इंटलेक्चुअलता से ग्रस्त.
दरअसल आप जानते ही हैं कि मैं सबसे ज्यादा बेतुकेपन से डरता हूँ । और अब तक तुकें ही दूंढता रहा हूँ । इस बेतुकी बात मैं आपकी दिलचस्पी नहीं होगी लेकिन आप इससे जुडे हैं । मैं महसूस कर रह हूँ कि इन दिनों मैं और अधिक बेतुका हो गया हूँ । यहाँ यह बात पूर्व निर्धारित है कि मैं पहले ही यानी जन्मता बेतुका था । असल में मेरे बेतुकेपन में आपका भी योगदान है जिसे कोई कैसे नकार सकता है । आप यानी जो जालन्धर से बंगलूरू और अहमदाबाद से रांची और मुम्बई से गुवाहाटी तक फैले हुए हैं । जो सबसे ज्यादा भोपाल, रांची, दिल्ली और मेरठ में पाये जाते हैं । आप जिनसे मिलकर मैं इतना बेतुका हो गया हूँ कि ना अब कोई तुक की बात लिख पा रहा हूँ ना कह पा रह हूँ ।
मैं चाहता हूँ कि मैं अपने बचपन में लौट जाउँ अपने पूरे बचपने के साथ । इसका एक तरीका यह है कि मैं अपने भीतर अब तक की सारी सीखी सिखाई बातें बाहर उलीच दूं । वे बातें जो चौक-चौराहों, पान की गुमठियों, घरों, दफ्तरों, सड़कों, छतों, पबों यानी हर ऐसी जगह जहाँ दो इन्सान खडे हो सकते हैं, पे आप लोगों से सीखीं । सिग्रेट पीते, पान चबाते और बियर-विहिस्की पीते-पिलाते हुए आपने बताईं । कुल जमा जोड़ यह की जीवन के २६ वें वसंत में मैं थक गया हूँ । और मुझमें भरी आपकी भीड़ धक्कम धक्का रेलमपेल मचाये हुए है । अब आराम से अपने बचपने में जाने का तरीका यही है कि दिमाग का सारा अगड्म बगड्म फैंक डालूँ । इसमें जो सच होगा वह आपके हिस्से का होगा और जो झूठ जैसा लगेगा व होगा मेरे हिस्से का सच । यानी जो लिखूंगा सच लिखूंगा सच के अलावा कुछ ना लिखूंगा और लिखूंगा भी तो सच सच बताकर लिखूंगा । तो शुरू करते हैं शुरू से। तो मैं लिखूंगा आपके बारे में. इसी बहाने साफ करूंगा खुद को.
तो कल तक के लिए शब्बा खैर.

1 comment:

अंकित माथुर said...

सचिन भाई आपका कहना एकदम दुरुस्त है।
पहली पारी के कई धुरंधर तो अब कहीं नज़र
भी नही आते भडास पर।
कारण चाहे जो भी हो, धार तो कुंद हुई है।
आपको दुबारा सक्रिय देखकर
अच्छा लगा। कम से कम आप तो कुछ
धार लाईये।
धन्यवाद...
अंकित माथुर...