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22.9.08

आलोचना में टेलीविजन की महारानी

एकता कपूर ऐसी क्यों हैं?

  • अमिताभ बुधौलिया 'फरोग'
    टेलीविजन की दुनिया पर एकता कपूर एकछत्र राज करती हैं। कम उम्र में अप्रत्याशित सफलता व्यक्तित्व पर खासा असर करती है। एकता पर भी आरोप लगते रहे हैं कि वे कामयाबी के मद में इतनी चूर हैं कि स्वयं को टेलीविजन संसार की 'स्वयम्भू महारानी' मानती हैं। एकता की कार्यशैली और बर्ताव फिल्म उद्योग में चर्चा का विषय बना रहता है। संभवतः यह ईर्ष्यावश ही प्रचारित किया गया होगा कि 2004 में रिलीज हुई फिल्म 'गर्लफ्रेंड' उनके ही चरित्र पर रची गई। यह दुष्प्रचार भी हो सकता है और सच भी।
    दरअसल, फिल्मी दुनिया ही कुछ ऐसी है कि यहां हर बात गासिप-सी नजर आती है। सच भी झूठ जान पड़ता है और झूठ सौ टका सच। 22 सितंबर08 को 'दैनिक भास्कर' के भोपाल संस्करण में 'आपस की बात' कालम के अंतर्गत वीना नागपाल एकता कपूर की बॉडी लैंग्वेज को आड़े हाथों लेती हैं। संदर्भ बिग बॉस के घर से जुड़ा हुआ है। एकता अपने भाई तुषार के साथ इस शो में गेस्ट बनकर आई हुई थीं। उनके मुंह में च्युंगम था, सो शिल्पा शेट्टी के हर सवाल के जवाब में उनका मुंह काफी हरकत-सा करता नजर आता। साथ ही वे बात-बात पर तुषार के कंधे या पैर पर हाथ भी पटक रही थीं। एकता का च्युंगम चबाना और बॉडी लैंग्वेज लेखिका वीनाजी को भारतीय नारी के चरित्र के अनुकूल नजर नहीं आई।एकता कपूर के 'सास बनाम बहू' सीरियलों को लेकर भी नुक्ता-चीना होती रही है। तथाकथित समाजसेवियों का तर्क है कि एकता के सीरियलों ने भारतीय नारी की छवि धूमिल कर दी है। उनके सीरियल घरेलू झगड़ों की वजह भी बने हुए हैं, गोया एकता कपूर मनोरंजन के नाम पर मन-दर-मन रंज के बीज बो रही हों? यह दीगर बात है कि ऐसे समाजसेवियों का दर्द सिर्फ इतना है कि पुरुष प्रधान समाज में उनका वर्चस्व डोलने लगा है। नारियां एकता के सीरियल देखकर मुखर/उग्र हो रही हैं। एकता कपूर के सीरियलों में काम करने वाले तमाम कलाकार भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वे एकता की कार्यशैली से भी पीड़ित हैं, लेकिन सैकड़ों संषर्घरत कलाकार ऐसे भी हैं, जो एकता कपूर का गुणगान करते थकते नहीं हैं। एकता का स्वरूप क्या है? इसे समझ पाना शायद तब तक संभव नहीं है, जब तक 'बालाजी टेलीफिल्म' अस्तित्व में है।
    दरअसल, महिमा-मंडन और छीछालेदरी का यह सारा खेल 'बालाजी टेलीफिल्म' के गठन के बाद ही शुरू हुआ है। संभव है कि टेलीविजन के मनोरंजन उद्योग पर बालाजी के वर्चस्व ने एकता में गुरुर पैदा कर दिया हो...और यह भी हो सकता है कि कई लोग उनकी यह अभूतपूर्व सफलता पचा न पा रहे हों? कारण दोनों हो सकते हैं। एकता के चाल-चरित्र को लेकर अब फिल्में भी रची जाने लगी हैं। गणेश आचार्य की 'मनी है तो हनी है' में एकता के 'मर्दाना रवैये ' पर खूब कटाक्ष किया। गोया बालाजी टेलीफिल्म में काम करने वाले कलाकार बंधुआ मजदूर-सरीखे हों। यह हैरानी वाली बात भी हो सकती है कि पिछले कई सालों से एकता फिल्म उद्योग, खासकर टेलीविजन, तथाकथित समाजसेवियों और मीडिया के निशाने पर रही हैं, लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। उनके होंठों पर सदैव मुस्कान अठखेलियां करती रहती है, मानों वे चिकने घड़े का प्रतीक हों।...लेकिन अब अचरज तो यह होता है कि बालाजी प्रोडक्शन की फिल्मों में भी एकता के ऐसे रंग-ढंग को मनोरंजन में ढाला जाने लगा है। हालिया रिलीज फिल्म 'सी कंपनी' इसका ताजातरीन उदाहरण है। यह भी संभव है कि एकता अपनी लोकप्रियता को भुनाने के लिए ऐसा कर रही हों, या वे यह बताना चाहती हों कि उन पर कीचड़ उछालने वाले कोई दूध से धुले नहीं हैं। वहीं ऐसा भी आभास होता है कि एकता यह जताने का प्रयास कर रही हैं कि यह लड़की हर संकट में मुस्कराती रहेगी, जैसा फिल्म के एक दृश्य में होता है। अंडरवर्ल्ड डान यानी मिथुन चक्रवर्ती एकता को कड़ी फटकार लगाते रहते हैं, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं होती और मुस्कराती रहती हैं।
    दरअसल, कोई भी इंसान यह दावा और प्रमाण पेश नहीं कर सकता कि वह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। चूक सबसे होती है, लेकिन जो उनसे सबक हासिल कर लेता है, वह श्रेष्ठ मानवों की श्रेणी में शुमार हो जाता है। एकता कपूर ने भी बहुत गलतियां की होंगी, लेकिन क्या इस बात को नकारा जा सकता है कि बालाजी टेलीफिल्म ने नवोदित कलाकारों के संघर्ष को कम किया है। आज बालाजी से हजारों कलाकार, तकनीशियन और अन्य विधाओं के माहिर लोग जुड़े हुए हैं। बालाजी उनके रोजी-रोटी का जरिया बना हुआ है। बालाजी टेलीफिल्म से जुडे मेरे कुछ मित्र बताते हैं कि वहां काम करके यूं लगता है मानों वे कलाकार नहीं, दिहाड़ी मजदूर हों। लेकिन वे इस बात को भी स्वीकारते हैं कि अगर बालाजी टेलीफिल्म न होता, तो न जाने कितने कलाकार संघर्ष करते-करते बुढा जाते।
    यह विडंबना ही है कि बहुसंख्यक लोग अपनी आलोचना स्वीकार नहीं कर पाते, लेकिन एकता ने अपने असंयमित व्यवहार पर तमाम हो-हल्ला के बावजूद खुद को संयमित रखा। 'सी कंपनी' में एक विदूषक की भूमिका निभाते हुए उन्होंने खुद का उपहास बनाया, ऐसा साहस बहुत कम लोग दिखा पाते हैं। शायद एकता ने यह बताने की कोशिश की है कि आलोचनाएं उन्हें कभी विचलित नहीं का पातीं, या उनके बुरे बर्ताव के लिए दूसरे लोग भी दोषी हैं...या उनके बारे में जैसा प्रचारित किया जाता है, वो सौ टका सच नहीं है! एकता का मकसद जो भी रहा हो, लेकिन उनका यह साहस सलाम के योग्य है।

3 comments:

manjuraj thakur said...

अमिताभ जी,

मुझे यहाँ समझ मैं सिर्फ़ आपकी यही बात आई की आपको बहुत सरे लोगो की रोजीरोटी तो दिख गई पर युवा पीढी जो गर्त मैं जा रही रही इन सीरियल के मार्फ़त उससे आपको क्या.
आपका सोच भी महानगर जैसा ही है कोई बात नही अपने जो कहा आपकी सोच. वैसी भी सवतंत्र भारत मैं सबको आपनी बात कहने का अधिकार है.

जय माता दी
मिस मंजुराज ठाकुर
sabeditor www.narmadanchal.in

sanjeev persai said...

अमिताभ जी,
बहुत अच्छा विश्लेषण किया है आपने एकता कपूर का, दरअसल एकता की कार्य शैली हमेशा चर्चा का विषय रही है उसमें जो विशेष कारक नजर आता है वो है उसका महिला होना, असल में इस समाज में सब कुछ पचाने की ताकत है बजाये की एक महिला की सफलता को दिल से स्वीकारने के.
अब सारे आलोचकों को यह समझ लेना चाहिए की अब सफलता के मायने बदल गए हैं इसीलिए सफल इंसान को उसके शारीरिक हावभाव के बजाये उसके सफल कामों और सही निर्णयों से आंकना चाहिए

amitraghat said...

bandhu bilkul sahi likha hai ekta ki maya khud ekta nahin jaanti. khud likhein khuda baanchain vaali kahavat ekta kapoor par sahi baithagi . jahan tak ekta ki safalta se vichlit hone ki baat hai ye sarasar galat hai unke banay tv serials ka star girta hi ja raha hai ye baat sab jaante hain .