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22.11.08

पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्रीमद्वल्लभाचार्य



भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्गके प्रणेता श्रीवल्लभाचार्य जी का प्रादुर्भाव संवत् 1535,वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मण भट्टजी की पत्नी इलम्मा गारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार[अग्नि का अवतार] कहा गया है। वे वेदशास्त्रमें पारंगत थे।
श्रीरूद्रसंप्रदाय के श्रीविल्वमंगलाचार्यजी द्वारा इन्हें अष्टादशाक्षरगोपालमन्त्र की दीक्षा दी गई। त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्रतीर्थ से प्राप्त हुई। विवाह पंडित श्रीदेवभट्टजीकी कन्या- महालक्ष्मीसे हुआ, और यथासमय दो पुत्र हुए- श्री गोपीनाथ व श्रीविट्ठलनाथ।भगवत्प्रेरणावशव्रज में गोकुल पहुंचे, और तदनन्तर व्रजक्षेत्रस्थित गोव‌र्द्धन पर्वत पर अपनी गद्दी स्थापित कर शिष्य पूरनमल खत्री के सहयोग से संवत् 1576में श्रीनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वहां विशिष्ट सेवा-पद्धति के साथ लीला-गान के अंतर्गत श्रीराधाकृष्णकी मधुरातिमधुरलीलाओं से संबंधित रसमय पदों की स्वर-लहरी का अवगाहन कर भक्तजन निहाल हो जाते।
श्रीवल्लभाचार्यजीके मतानुसार तीन स्वीकार्य तत्त्‍‌व हैं-ब्रह्म, जगत् और जीव। ब्रह्म के तीन स्वरूप वर्णित हैं-आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी रूप। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को ही परब्रह्म स्वीकारते हुए उनके मधुर रूप एवं लीलाओं को ही जीव में आनंद के आविर्भाव का स्त्रोत माना गया है। जगत् ब्रह्म की लीला का विलास है। संपूर्ण सृष्टि लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्म-कृति है।
जीवों के तीन प्रकार हैं- पुष्टि जीव जो भगवान के अनुग्रह पर निर्भर रहते हुए नित्यलीला में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं), मर्यादा जीव [जो वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करते हैं] और प्रवाह जीव [जो जगत्-प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखोंकी प्राप्ति हेतु सतत् चेष्टारतरहते हैं]।
भगवान् श्रीकृष्ण भक्तों के निमित्त व्यापी वैकुण्ठ में [जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर स्थित है] नित्य क्रीडाएं करते हैं। इसी व्यापी वैकुण्ठ का एक खण्ड है- गोलोक, जिसमें यमुना, वृन्दावन, निकुंज व गोपियां सभी नित्य विद्यमान हैं। भगवद्सेवाके माध्यम से वहां भगवान की नित्य लीला-सृष्टि में प्रवेश ही जीव की सर्वोत्तम गति है।

2 comments:

Dr.Rupesh Shrivastava said...

आदरणीय विनय सर! मैं आपके लेखों का संग्रह कर रहा हूं निःसंदेह ही उत्तम हैं और हां मेरी किसी टिप्पणी को अन्यथा न लेंगे ऐसा निवेदन है।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

डाक्टर साहब,
आप अन्यथा ना लें की बात कह रहें हैं मगर मुझे तो इसमें सिर्फ़ अन्यथा ही अन्यथा नजर आती है,
सारगर्भित सिर्फ़ इतना की इन तमाम लेखों में मान्विया संवेदना और मूल्यों का जिक्र नही, कुरेदता है की क्या हमारी संस्कृति इन्ही मुल्यौं पर आधारित रही जिसमें हमेशा जात पात के आधार पर वरीयता निर्धारित रही.
अगर ऐसा है तो आज के परिपेक्ष में ये बेकाम और बेकाज होने के साथ निरर्थक भी है.
जय जय भड़ास