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9.11.09

कामरेड केपी का जाना अपूरणीय क्षति‍ है

प्‍यार से उन्‍हें उनके नाम से ही बुलाते थे। वे सबके 'कुंवरपालजी' थे। छोटे -बड़े सभी उन्‍हें इसी नाम से बुलाते थे। आमतौर पर कोई भी प्रोफेसर अपने को नाम से बुलाना पसंद नहीं करता उसे पदवि‍यों से बुलाना पसंद होता है। लेकि‍न कुंवरपालजी हमेशा सीधे अपने नाम से ही सम्‍बोधन पसंद करते थे। यह उनके पूर्ण आधुनि‍क होने का संकेत है। अगर उनके नाम के साथ कॉमरेड लगाकर बोलो तो सबसे ज्‍यादा खुश होते थे। आम तौर पर उनका जब कि‍सी पार्टी मीटिंग या गोष्‍ठी में दि‍ल जीतना रहता था तो उनके करीबी साथी उन्‍हें कामरेड के नाम से सम्‍बोधि‍त करते थे। अपने वि‍चारों के प्रति‍ कट्टर आग्रह वाले कुंवरपालजी ने हमेशा लोगों की मदद की। उन्‍हें सेवा करने में मजा आता था।

कुंवरपालजी ने आजीवन कर्मठ कम्‍युनि‍स्‍ट की तरह जीवन बि‍ताया। उनके पास जीवन में बहुत सारे काम थे। लेकि‍न मार्क्‍सवादी कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी का काम वे पूरी तल्‍लीनता,ईमानदारी और दि‍लेरी के साथ करते थे। वे अलीगढ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालय में हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफसर थे। अलीगढ की वामपंथी राजनीति‍ की धुरी थे। वर्षों तक माकपा की अलीगढ वि‍श्‍ववि‍द्यालय ब्रांच के सचि‍व भी रहे। एक कम्‍युनि‍स्‍ट और साथ में हि‍न्‍दू होने बावजूद वे अलीगढ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालय की अकादमि‍क परि‍षद में चुने गए। उनका अलीगढ़ के अकादमि‍क जगत में बेहद सम्‍मान था।

मुझे याद आ रहा है वह क्षण जब वे कोलकाता आए थे,कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय में रीडर पद पर नि‍युक्‍ति‍यों के सि‍लसि‍ले में। उस समय पश्‍चि‍म बंगाल के राज्‍यपाल थे प्रसि‍द्ध इति‍हासकार नूरूल हसन। सारा देश उनके गुणगान करता रहता था। कुंवरपाल जी गवर्नर हाउस में ही आकर रूकते थे। मैं उनसे गवर्नर हाउस में मि‍लने गया। उसी समय मैंने पहलीबार राज्‍यपाल नूरूल हसन साहब को भी देखा था ,उनसे बातें भी की थीं। वे कुंवरपालजी की कर्मठता और मार्क्‍सवाद के प्रति‍ गहरी आस्‍थाओं को लेकर भाववि‍भेर होकर बोल रहे थे। मैंने छेडने के लि‍ए कुंवरपालजी के बारे में पूछ लि‍या था। नूरूल हसन साहब लगातार आध घंटे तक उनकी कर्मठता और पार्टी सक्रि‍यता के बारे में बताते रहे। यह सच है कि‍ कुंवरपालजी एकमात्र ऐसे प्रोफसर थे जो आम जनता में जाकर मार्क्‍सवादी कम्‍युनि‍स्‍ट पार्टी के लि‍ए अलीगढ में काम करते थे, सारी जिंदगी पार्टी के साथ जुड़े रहे। पार्टी के प्रति‍ उनकी आस्‍था अटूट थी। पार्टी के हि‍तों की रक्षा के लि‍ए वे कुछ भी कर सकते थे। यही बात उनकी मि‍त्रता पर भी लागू होती है। वे जि‍सके दोस्‍त थे उसके पक्‍के दोस्‍त थे। और जि‍ससे उनकी वैचारि‍क अथवा सामाजि‍क तौर पर नहीं बनती थी उसके खि‍लाफ अपनी राय बड़ी ही बेबाकी से रखते थे। उनका बैर कि‍सी से नहीं था। कुंवरपालजी की मौत ने माकपा ने अपना एक कर्मठ कार्यकर्त्‍ता खो दि‍या है। जनवादी लेखक संघ की वे उत्‍तरप्रदेश में जान थे। सब समय कुछ न कुछ उद्यम करते रहते थे। लेखकों को जोड़ने और लि‍खने के काम में व्‍यस्‍त रखते थे। हमेशा उत्‍साह और प्रेरणा पैदा करने वाली बातें कि‍या करते थे। मैंने उन्‍हें कभी नि‍राशा में नहीं देखा। उन्‍होंने आलोचना की अनेक महत्‍वपूर्ण कि‍ताबें लि‍खी थीं और कई सालों से सारे कष्‍ट उठाकर मि‍शनरी भाव से 'वर्तमान साहि‍त्‍य' पत्रि‍का को नि‍काल रहे थे। कुंवरपालजी की मृत्‍यु मेरी तो व्‍यक्‍ति‍गत क्षति‍ है। मेरी उन्‍होंने हमेशा मदद की। जबकि‍ मैं उनसे कम से कम मि‍ला। बहुत कम बातें हुईं। इस दुख की घड़ी में हम उनकी पत्‍नी कथाकार और संपादक नमि‍ता सिंह ,पुत्र और पुत्री के प्रति‍ अपनी सान्‍त्‍वना संप्रेषि‍त करते हैं।

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