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22.4.08

गुज्र गई ये बहार भी किसी ज़ख्म की सूरत.....

दहेलिया
सुंदर
क्या खूब
नाज़ुकी
beautiful

कोमल
खुशबू की तरह गुजरो ,कभी मेरी गली से,
फूलों की तरह मुझ पे बरस जाओ किसी दिन
ये रंग,, ये नजाकत
बैठ कर साये--गुल में नासिर
हम बहुत रोये ,वो जब याद आया















खूबसूरत
सुर्ख और मखमली

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मौसम--बहार यानी बसंत ऋतू ,बस रुखसत होने ही वाली है. रंग बिरंगे खूबसूरत फूल अभी खिले हुए हैं पर धुप की बढ़ती तपिश उन्हें हम से अलविदा कहने पर मजबूर कर रही है.मैदानी इलाकों में तो ये मौसम रुखसत हो भी चुका है लेकिन पहाडी इलाकों में इनकी विदाई थोडी देर से होती है . पर यहाँ भी धुप की शिद्दत जल्दी ही इसे आखिरी सलाम कहने पर मजबूर कर देगी.
कितना अजीब होता है ये बहार का मौसम . कहते हैं ये शायेरों का मौसम है.शायेरों ने इसकी खूबसूरती पर दीवान के दीवान लिख डाले हैं.ये जब आता है तो कितने चेहरों को फूल की मानिन्द खिला देता है तो जाते हुए हमेशा कितनी आँखें नम कर जाता है ठीक आते हुए यौवन और जाती हुयी जवानी की तरह .
इस साल भी बहार अपनी पूरी खूबसूरती के साथ आई ,बाग़ बगीचे यहाँ तक कि रास्ते तक फूलों से ढक गए.देहरादून में वैसे भी फूल कुछ ज़्यादा ही खिलते हैं ,ये और बात है कि राजधानी बनने के बाद यहाँ जाने कितने बाग़ उजाड़ कर multiplex इमारतें ,शोप्पिंग कॉम्प्लेक्स या कोठियाँ बना ली गई.ज़ाहिर सी बात है कि फूलों के ठिकानों में तेज़ी से कमी आई है.दिन प्रतिदिन बढ़ती वाहनों की संख्या ने भी पर्यावरण को खूब नुकसान पहुँचाया और आगे भी पहुंचाएंगे ,लेकिन फूलों के करीब रहना यहाँ के लोगों की फितरत में है इसलिए बाग़ बगीचों में सही ,घरों की छोटी बड़ी लान की क्यारियों में ही सही,फूल इस बार भी खिले और इंशाल्लाह खिलते रहेंगे लेकिन फिर भी ,एक अजीब सा दर्द दे के जारही है ये बहार.अपने जाने का नही क्योंकि आना और जाना तो मौसम की फितरत है.ज़िंदगी रही तो ये लौट कर फिर आएगी ही. दुःख तो उन खोती जारही चीजों का है जो हम से रूठ गई तो शायेद हम दोबारा उन्हें वापस पा सकें.
वह चीज़ें जिनके बिना मौसम--बाहर की कल्पना भी नही की जासकती थी .
क्या खुशबुओं ,तितलियों और भंवरों के बिना भी मौसम--बहार का तसव्वुर किया होगा किसी शाएर ने?
पर ऐसा हो सकता है.
फूल इस बार भी खिले पर इन फूलों से खुशबुएँ जैसे रूठ गई थीं,मौसमी फूलों की तो बात छोडिये, गुलाब के फूल जिनकी भीनी भीनी महक रग-रग में ताजगी सी भर दिया करती थी,धीरे धीरे अपनी खुशबू खो रहे हैं.
रात की रानी चमेली ,बेला ,मोतिया,चांदनी या मोंगरा जैसे कुछ फूलों को छोड़ बाकी फूल जैसे कागज़ के खूबसूरत फूल बनते जारहे हैं .
एक ज़माना था जब घाटियों की तो बात छोडिये,गांवों और शहरों में भी मौसम--बाहर में जब हवाएं चलती थीं तो खुशबुओं से लड़ी दूर दूर तक सब के तन मन को महका दिया करती थीं.
जंगली फूल भी अपने अन्दर एक ख़ास सुगंध लिए होते थे.
लेकिन धीरे धीरे बढ़ते प्रदुषण ,मिटटी और खाद में मिले रासायनिक तत्व कब ये अनमोल शै हम से छीनते चले गए ,हम ख़ुद ही जान सके.
मुझे याद है,जब मैं छोटी थी और छुट्टियों में परिवार सहित लखनऊ के पास गाँव में स्थित दादा जान की हवेली में आया करती थी.दादा जान की तरह फूलों से इश्क मुझे वरसे में मिला है.
उनका मुहब्बत से लगाया गया बगीचा हमेशा फूलों से महका करता था. चाचा जान के बच्चे ,हम भाई बहन सारा दिन बस वहीं खेला करते थे और हमारे साथ खेला करती थीं रंग बिरंगी सुंदर तितलियाँ.कली कली को चूमती ये नाज़ुक तितलियाँ अगर डरती थीं तो स्याह गुन-गुन करते भंवरों से,और उनका खेल ध्यान से देखते हुए मेरा मासूम जेहन बेचारे भंवरों को खलनायक के रूप में देखा करता था.
मुझे अच्छी तरह याद है उन दिनों इतने रंगों की तितलियां फूलों से अठखेलियाँ करने आती थीं कि मैं हैरान रह जाती थी कि कुदरत ने कितने रंग इनके पंखों में समो दिए हैं.
आज फूलों कि वही सहेलियां लगभग गायब सी हो गई हैं बगीचों से.लान में रंग बिरंगे हसीन फूल हसरत से अपने उन पुराने दोस्तों की राह तकते- तकते मुरझा जाते हैं लेकिन उनका ये इंतज़ार ,इंतज़ार ही रह जाता है .भूली भटकी कोई तितली या भंवरा कभी भी जाते हैं तो चंद ही लम्हों में जाने कहाँ गायब हो जाते हैं.फूलों से खुशबुओं का, खुशबुओं से तितलियों का और तितलियों से भंवरों का वो अटूट रिश्ता जाने कब और कैसे टूट सा गया है और हम हैं कि अपनी तेज़ रफ्तार में सरपट भागती जिंदगी में मग्न इतनी सारी अनमोल चीजों को हमेशा के लिए खोते हुए देखे जारहे हैं पर उन्हें बचाने और समेटने की हमें फुरसत नही है.
बचाने की कौन कहे,इनके बारे में सोचने का भी समय नही है हमारे पास.
पर ये सब कुछ हमारे आने वाले कल के लिए खतरे की घंटी है.हमें कुदरत के दिए हुए इन अनमोल तोहफों को बचाने के बारे में संजीदगी से सोचना होगा.उन्हें बचाने के कारगर उपाय करने होंगे.अभी इतनी भी देर नही हुयी है.खुशबुएँ फिर से हमें मदहोश करने वापस आसकती हैं,तितलियां फिर से कलियों और फूलों को चूमती हुयी इठला सकती हैं,भँवरे फिर से गुनगुना सकते हैं.
लेकिन जल्दी ही कुछ करना होगा,ऐसा हो कि कल हमारी आने वाली पीढ़ी खुशबुओं,तितलियों और भंवरों को किताबों के पन्नों पर पढ़ते हुए हसरत से सोचा करें कि क्या ये सब भी कभी हमारी दुनिया का हिस्सा थे?

4 comments:

अंकित माथुर said...

काफ़ी तरोताज़गी से भरपूर फ़ूल हैं।
वाकई आज आधुनिकता और भौतिकतावाद की
अंधी दौड़ में हम प्रकृति के साथ
अत्यधिक खिलवाड़ कर रहे हैं।
इससे समूचे मानव जगत को
अत्यंत हानिकारक दुष्प्रभावों से गुज़रना पड़ रहा है।
PS: रक्षंदा जी क्या ये तस्वीरें आपने खुद
खींची हैं?

यशवंत सिंह yashwant singh said...

शानदार है साथी, आपके आब्जर्वेशन और आपकी रिपोर्ट....। ये किसी अखबार के फ्रंट पेज की टाप बाक्स स्टोरी है लेकिन अखबार वाले आजकल संवेदना पर खबरें कम लिखते हैं, पैसे और बाजार के इर्द गिर्द ज्यादा जाल बिखेरते है। आप यूं ही संवेदना के जरिए समाज, प्रकृति, अंतरिक्ष, मनुष्यता, जीवन, समाज, राजनीति.....ढेर सारे सेक्शन्स के अलग अलग अंदाज रंग रप पर लिखते रहिए। शुभकामनाओं के साथ

rakhshanda said...

आप सब की जानकारी के लिए बता दूँ की ये फूल मेरे अपने बगीचे के हैं और ये तस्वीरें मैं ख़ुद अपने कैमरे से ली हैं..बहुत बहुत शुक्रिया.

अंकित माथुर said...

जानकारी के लिये शुक्रिया।
और यदि आप फ़ोटोग्राफ़ी का शौक
रखती हैं तो आपके लिये एक वेबसाईट है,
http://www.flickr.com
इस साईट पर आप अपनी तस्वीरों को अपलोड कर
सकती हैं, और यदि फ़ोटोग्राफ़ी से संबंधित कोई
सवाल या जानकारी हासिल करना चाहें
तो यहां कई ग्रुप्स भी बने हैं।
धन्यवाद...