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27.9.10

हाँ हाँ मुझे भी एक औरत…………….!


सुबह से ही उठ कर नहा धो लेने के बाद मन के उफान को रोकते नाश्ता कर रहे मोहन के माँ को लगा रहा था की आज वो उसे किस तरह से दो रोटी ज्यादा खिला दे उसे लग रहा था की ये दो रोटी ज्यादा खा के जायेगा तो इंतरवियु में इसे सलेक्शन होने से कोई रोक नहीं पायेगा और उसका बेटा नियुक्ति पत्र लेकर ही अपने घर आएगा और फिर शान से उशकी भोली भाली तथा अनपढ़ माँ सबसे कहेगी की मोहन को नौकरी मिल गयी…………….मिठाई खाओ मिठाई खाओ! आखिर सोचे भी क्यों नहीं मोहन दुनिया के लिए कुरूप और बदरंग सही पर उसके लिए तो उसका बेटा था जो उसे बेइंतिहा प्यार करती थी,किचन में बेलन लिए खड़ी बूढ़ी माँ इतना सोचने में गम थी की उसे पता भी नहीं चला की उसके रोटी न सेक पाने की वज़ह से लेट हो रहा मोहन एक रोटी कम ही खा मुह को धोकर जैसे ही बोला अच्छा माई अब मै जा रहा हूँ और आशीर्वाद दे की आज नौकरी मिल ही जाय, की आवाज सुन अचानक ध्यान टुटा और दौड़ते हुए उसके माथे को चूम के बोल पड़ी अरे पगले तू आज भी आधे………….चल जा मै तो हमेशा तेरे साथ हूँ बेटा,तथा उसके जाने के बाद अचानक ही रोते हुए सोचने लगी कि अगर उसका बेटा इतना कुरूप न होता तो उसको कबकी नौकरी मिल गयी होती तथा अन्दर ही अन्दर डर रही थी कि कहीं आज भी उसके साथ वही न हो जो पिछले कई महीनो से पढाई ख़त्म करने के बाद हो रहा है को सोचते सोचते बिना खाए पिए जमीं पर ही सो गई! इधर अति सरीफ तथा बाहर से जितना कुरूप शायद भगवान ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी उसके कुरूपता में उतना ही अन्दर से साफ मोहन जो कोलेज के समय से लेकर अब तक की जिन्दगी में शायद ही मन से दिल भर किसी लड़की या औरत को देख पाया होगा तथा शायद उसके तो बस में चढ़ते ही लड़कियों के साथ साथ आदमी भी अपने आप किनारा दे दिया करते थे की क्या मजाल की वो किसी लड़की को सही से देखे,को बीशों इंतरवियु से हटाने के बाद आज फिर एक चांस मिला था और ये चांस मोहन कतई गवाना नहीं चाहता था क्योंकि वो जनता था कि अगर अब उसने जल्दी से नौकरी नहीं पकड़ी या मिली तो लोग उसके पढाई पर उँगलियाँ उठाने लगेंगे और उसकी बूढ़ी माँ को लोंगो के ताने भी सहने पड़ेंगे, लेकिन बिचारा क्या करे पर अब इतने इंतरवियु को फेश करने के बाद मोहन को भी यह अनुभव हो चुका था कि आखिर उसका सलेक्शन क्यों नहीं होता है क्यों कोई मालिक उसे नौकरी पे नहीं रखना चाहता,वो ये जान चूका था कि आज के समय में डिग्री के साथ साथ पर्सनालिटी भी चाहिए ना,पढने लिखने में काफी इंटेलिजेंट और बुधि के धनि वाले ब्यक्तित्व का मोहन बस में पीछे वाली सिट पर बैठ यही सोच रहा था कि किस तरह से पिछले वाले इंतरवियु में वो मस्त मैडम ने हंस कर उसके रिसुमे को लौटा दिया था और मुह घुमा कर मना किया था,और उसके पिछले वाले में भी तो यही हुआ था जब हर जबाब को देने के बाद न चाहते हुए भी सलेक्टरों ने राय मश्बरा कर उसे रिजेक्ट कर दिया था,अब वह समझ चुका था कि उसकी पर्सनालिटी का एक कोना खाली था फिर भी दुनिया कि अनेको बातों को सुनने के बाद परवाह न करने वाला मोहन को अचानक ही एक आवाज़ सुनाई पड़ी हे मिस्टर हे मिस्टर…………………अचानक ही सँभालते उसने देखा कि बगल में बैठी हुई लड़की जो अपने सरीर को हर तरह से बचने कि कोशिश करती ही दिख रही थी कि कहीं शारीर न टच हो जाय दुबकने के साथ उससे निकले के लिए रास्ता मांग रही थी,लड़की के उतरते ही बस जैसे ही चली कि मोहन को फ़ौरन याद कि उसे भी तो पीछे वाले स्टॉप पर ही उतरना था फिर संभल कर दौड़ते हुए ड्राईवर के पास जा कर बोल पड़ा भाई साहब जरा रोक दीजिये मुझे भी पीछे ही उतरना था……………हर ब्यक्ति के प्रताड़ना का शिकार मोहन को यंहा भी वही मिला जो हमेशा हर जगह मी जाया करता था….. हये चुप कर बे……………. कह कर चुप करा दिया गया खैर डरा सहमा मोहन अगले स्टॉप पर उतर कर दो किलोमीटर पीछे पैदल चल कर इंतरवियु देने ऑफिस में पहुँच अपना बायोडाटा जमा करा बैठ कर अपनी बारी कि प्रतीक्छा भगवान से प्रार्थना के साथ करने लगा,तथा थोड़ी देर बाद नंबर आने पर अन्दर जाते ही मोहन के साथ वो हुआ जो पहले कभी किसी इंतरवियु में नहीं हुआ था तथा सलेक्टरों ने नहीं किया था यंहा तो डिग्रियों को देखने के बाद काम सम्बन्धी कोई सवाल ही नहीं पूछा गया सिवाय कुछ के………………हाँ तो तुम क्या करना चाहते हो………सर नौकरी, इसके पहले क्या किया…………………सर कई इंतरवियु दिया लेकिन कंही मौका नहीं मिला, हँसते हुए क्यों भाई तुम्हारे पास डिग्री तो अच्छी है फिर भी………………….मैडम पता नहीं, क्यों किसी ने बताया नहीं,इधर उधर कि बातें और सवाल सुन मोहन समझ गया कि ये भी मौका गया तब तक, अच्छा एक बात बताओ तुमने कभी सोचा है कि तुम्हे कभी कोई आदमी या कोई औरत देखना चाहेगा या चाहेगी या फिर कभी किसी औरत ने तुमको प्यार किया है पसंद किया है…सवाल सलेक्टरों में से एक लड़की ने हंस कर पूछा ये बता दो और अगर हाँ तो नौकरी पक्की…………………जन्म से ही इन्सल्ट को सहते तथा काफी देर से यंहा हंसी का पात्र बना मोहन अचानक ही झल्ला कर बोल पड़ा जी हाँ ,हाँ हाँ हाँ किया है मैडम, किया है और करती भी है इतना ही नहीं वो तो मुझे रोज चूमती भी है और अपने बांहों में भी भरती है और वो भी एक दो दिन से नहीं पिछले छ्बीस साल चार महीने से अरे पचीस साल सात महीने से तो छू कर और गोंद में उठा बिठा सुला के और नौ महीने अनुभव करके,इतना ही नहीं जब तक घर नहीं जाऊंगा तब तक खाएगी भी नहीं और पता नहीं अब कब तक उसे ये मौका मिलेगा, वो तो मेरे नौकरी का समाचार सुनने के लिए पागल है और अब शायद ज्यादा दिनों तक साथ भी न दे पाए क्योंकि नौकरी न मिलने कि वजह से वो जमती सी जा रही है…….अरे मै पूछता हूँ कि आखिर मै कुरूप हूँ तो इसकी सजा सिर्फ मुझे मिलनी चाहिए उसे क्यों,उसका क्या दोष है,ये कि उसने मुझे पैदा किया…………हं, धन्यवाद मैडम लेकिन जब नौकरी में डिग्री वाले कुरूपों को नहीं रखना तो इश्तिहार में क्यों नहीं लिखवा देते आप लोग……………… और पता नहीं क्या क्या बडबडाते मन कि भड़ास को निकालते मोहन डिग्रियों को सँभालते हुएपीछे घूम कर चलना सुरु किया कि अचानक ही लगा जैसे वो किसी से टकरा जायेगा अंततोगत्वा बचते बचते टकरा ही गया……………………माफ़ कीजियेगा मै आपसे टकरा गया वो थोडा दिमाग पर काबू नहीं रहा पाया, चलिए जाईये आप अपना इंतरवियु दीजिये हाँ आप तो सलेक्ट हो ही जाएँगी आखिर आप इतनी सुन्दर जो है……… बोलते तथा हाथ जोड़ कर संभलते हुए खड़ा हो ही रहा था कि उस महिला ने उसे गले से लगा बोला कि अब दिमाग पर काबू रखना पड़ेगा मिस्टर, क्योंकि यहाँ पर काबू रख करके ही काम किया जाता है… मोहन आश्चर्य चकित होकर क्या,क्या कहा आपने मुझे नौकरी……………………..हाँ हाँ उसके सामने खड़ी एम् ड़ी महोदया जो मोहन को झल्लाते देख दरवाजे के बाहर ही रुक सारी बाते सुन रही थी ने उसके पीठ को थप-थपाते हुए बोला अब जल्दी जाओ और अपनी माँ को मिठाई खिलाओ हर माँ को इसका इंतजार रहता है और कल से समय से आफिस…………………………..!

3 comments:

vandan gupta said...

बहुत खूब्……………कुछ कहने लायक नही छोडा।

Sunita Sharma Khatri said...

बहुत अच्छी कहानी है.....।

Pravendra singh said...

उम्दा लेख लिखा है आप ने .. पर अंतिम क्षणों में कुछ और भी रोचक हो सकती थी ! परन्तु आप के इस लेख के लिए नमन.