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15.3.08

सुरेश चिपलूनकर की भड़ास को चिट्ठी....सदस्यता ख़त्म कर दें

भाई यशवन्त जी,

बड़े ही दुःख के साथ अर्ज करना चाहता हूँ कि, मेरे कुछ सब्स्क्राइबरों (महिलायें भी) ने भड़ास को देखा और पढ़ा और वहाँ मेरा नाम देखकर वे चौंके, और मुझे खूब खरी-खोटी सुनाई। इसलिये बुझे मन से ही सही मैं चाहता हूँ कि मेरा नाम "भड़ास" से हटाया जाये। हालांकि मैं कभी भी भड़ासी भाषा का समर्थक नहीं रहा, लेकिन प्रतिबन्ध या बहिष्कार जैसी भाषा का भी मैं समर्थक नहीं हूँ, लोकतन्त्र में हरेक को अपनी बात अपने तरीके से कहने का हक है, लेकिन फ़िर भी मेरे सब्स्क्राइबर की भावना की कद्र करते हुए यह आग्रह आपसे करता हूँ, आशा है अन्यथा नहीं लेंगे…
स्नेह बनाये रखें…


सुरेश चिपलूनकर

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((कोई बात नही सुरेश भाई, आप इतनी दूर तक साथ चले, हम लोगों के लिए इतना ही काफ़ी है. आप ख़ुद अपनी सदस्यता ख़त्म कर सकते हैं. आप अपनी पुरानी पोस्टें भी delete कर सकतें हैं. ये अधिकार हर भड़ास सदस्य को मिला हुवा है. आप जब आना चाहें, आपका स्वागत रहेगा. जहाँ भी रहें, खुश रहें, मस्त रहें, ये हम लोगों की कामना है. आप जुदा हो रहें हैं तो भी हम लोगों के दिलों में रहेंगे.

आपका शुक्रिया, प्यार से विदाई लेने के लिए. ....
हम लोग तो कहते रहेंगे....
जय भड़ास

यशवंत))

1 comment:

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

दादा,बड़े प्यारे बंदे हैं सुरेश भाऊ वरना इतने प्यार से भी भला कोई विदाई लेता है ,"छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा........"
कितने प्यारे कारण बताए उन्होंने भड़ास से पिंड छुड़ाने के कि आप लोगों की भाषा उनके अनुसार नहीं है और कुछ अच्छी महिलाओं ने उन्हें भड़ास पर देखा तो समझाया कि देखो हम लोगों ने जब तक नहीं देखा था तब तक तो ठीक था कि तुम भड़ासी बने रहे लेकिन अब तो हमने देख लिया है तो अब तो अगर हम अच्छी औरतों के बीच में शरीफ़ा(सौरी ,शरीफ़) बन कर रहना है तो भड़ास-भड़ास खेलना बंद करो वरना हम लोग आपके संग नहीं खेलेंगे तो कम से कम अच्छी औरतों के लिये इतना तो किया ही जा सकता है । चलो भईया उठाओ अपनी तशरीफ़ और जहां रहो गंगाजल से नहाओ जरूर इतने दिन भड़ास पर रहने का पाप जो धोना है....
जय जय भड़ास