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28.4.09

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो ......

जी टीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो .......को देखा । लाली का गौना होने वाला है । सजी-सवरी लाली खुश है। उसके पति गणेशी को न देखकर गाँव वाले पूछते है की बिना दुल्हे के ही गौना होगा क्या ? लाली के माँ-बाबू बहाना बना देते है की गणेशी ठाकुर साहब के यहाँ कम करता है,वो उसे छोटे भाई की तरह मानते है । विदाई की रस्मो के दौरान अचानक ठाकुर साहब उठ जाते है ,उन्हें याद आता है की लाली तो छोटी जाति की है । उसका शुद्धिकरण किए बिना कार में कैसे बिठाया जा सकता है ! अब शुरू होता है शुद्धिकरण का दौर । मंत्रो को सुनकर गाँव वाले कहते है की ये तो शुद्धिकरण के मंत्र है ......लाली भी इस नए कम से अचंभित है......खैर आगे तो कल ही पता चलेगा की लाली के साथ क्या होगा ? पर ये सारे दृश देखकर मन में सवाल उठता है की जातिवाद हमारे देश में किस गहरे से पकड़ बना चुका है ।
हम सब केवल जाति और समूहों में ही सिमटे हुए है। हमारी सभी बाते बस जाति और धर्म पर आ कर ख़त्म हो जाति है । हाँ ,अपने मतलब या फायदे की बात होते ही हम जाति-धर्म सब भूल जाते है । ऊपर से तो बहुत ज्यादा परम्परावादी बनते है और अंदर एक शैतान छुपा हुआ है ।
अब समाया आ गया है की इन दकियानूसी बातो को भुलाकर केवल देश और समाज की उन्नति के बारे में सोचा जाए । भूल जाना होगा की कौन किस जाति और धर्म का है ,याद रखना होगा तो सिर्फ़ मानवता का धर्म । चेहरे से नकाब उतारकर ख़ुद को सही तौर पर पेश करने की जरुरत है । हम जो है वही रहे क्या जरूरत है की दूसरों के सामने दिखावा करे । बस थोडी सी झूठी तारीफ के लिए अपने को क्या छुपाना.कोई आपकी थोडी सी बुराई ही तो करेगा। कम से कम आप ख़ुद अपनी आत्मा के गुनाहगार तो नही रहेगे ।
आज बस इतना ही दोस्तों,लगता है कुछ ज्यादा ही हो गया पर क्या करू ये भड़ास उगलनी जरूरी थी .........

3 comments:

abhivyakti said...

I agree with your views. But its is hardly possible till the politicians not stop divide the folk in categories and till the quota system is in or country

gargi

RAJNISH PARIHAR said...

इसी जात पात के भंवर में पड़ने से ही हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है...! नयी.. .. सोच विकसित किये.. बिना यही होगा..

alka sarwat said...

नहीं पूछता है कोई ,तुम व्रती ,वीर या दानी हो
सभी पूछते मात्र यही ,तुम किस कुल के अभिमानी हो
मगर, मनुज क्या करे? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं
चुनना जाती और कुल अपने बस की तो है बात नहीं
'दिनकर'