धनंजय कहिन: आप या तो इधर हैं या उधर: इस उभार पर सवालिया निशान लगाने वाले भी सक्रिय हैं,उनके हवाले से कहा जारहा है की इस भीड़ में गाँव,मजदूर दलित,दमित,आदिवासी नहीं है.ये विद्वान कह रहे हैं की वो टीवी नहीं देखते और फेसबुक,ट्विटर के अंतरजाल तक उनकी पहुँच नहीं है इसलिए उदासीन हैं.
तरस उनकी सोच पर, इस उभार ने आम आदमी के अन्दर के आक्रोश को अभिव्यक्ति दी है. जबरी मारे और रोने भी न दे की मानसिकता से बाहर निकलने का मौका मिला है.
18.8.11
धनंजय कहिन: आप या तो इधर हैं या उधर
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