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17.3.08

बोझ है जिदगीं

बोझ है जिदगीं,मुशकिलातें तमाम हैं,
भूख हर सुबह है,मौत हर शाम है।

दर्दे गम बहुत हैं,दवा कहीं कोई नहीं,
मुफलिसी की जिदंगी मारती सरे आम है।

रोटी नहीं,छत नहीं,काम नही ईमान नहीं,
लेकिन यहाँ जम्हूरियत का इंतजा़म है।

रंगे खूँ एक है,लेकिन इंसान यहाँ कोई नहीं,
हर घर में मगर एक पंडित और एक ईमाम है।

1 comment:

Anonymous said...

SACHMUCH JINDGI PAHELI SE KAM NAHI HAI.BOJH BHI HAI JISE UTHAANE KE LIYE HAM ITNA JADDOJAHAD KARTE HAIN.LEKIN JAB VISANGATION PAR NIGAAH TIKTI HAI TO AJIB LAGNE LAGTA HAI.....VEVASHON KO DEKHKAR KUCHH NAHI KAR PAANE KAA DANSH PEERA DETAA HAI.TO SACHMUCH JINDGI BOJH LAGNE LAGTI HAI.