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10.5.11

संस्कारों की कहानी तो यही से शुरू होती है

क्या सिखाते है संस्कार...
बचपन से पापा ने सिखाया बेटा संस्कारी बनो,जेसे हर माता पिता अपने बच्चे को अच्छा बनाने की कोशिश करते है वेसे ही या शायद उससे कुछ ज्यादा ही मेरे मम्मी, पापा ने अपनी तरफ से खूब जमकर संस्कारों की घुट्टी पिलाई पर एक फर्क ये था की उन्होंने हम तीन भाई बहनों की आँखों पे पट्टी नहीं बांधी.
संस्कार दिए तो साथ मैं ये भी सिखाया की गलत बात का विरोध करो,अपने विचार खुलकर सामने रखो , अन्याय को  सहन मत करो क्यूंकि अन्याय करने वाले से ज्यादा अन्याय सहन करने वाला दोषी है .उन्होंने सिखाया की किसी गलत प्रथा ,रीती का हमेशा विरोध करो चाहे उसको मानने वाले तुम्हारे माता पिता ही क्यों न हो ,गलत विचार का समर्थन कभी मत करो.
हमारे संस्कारो की नीव इतनी मजबूत बनाई की आदर सम्मान जेसे शब्द सिखाए पर साथ ही विद्रोह जेसे शब्दों का भी ज्ञान दिया .

शायद सही संस्कार यही है... या शायद और भी कुछ पर मैं इतना जानती हु की एक माँ बाप अपनी संतान को जितना प्यार अपनापन ,स्वतंत्र विचारधारा ,और आत्मसम्मान की भावना दे सकते है उसका एक बड़ा हिस्सा हमें धरोहर के रूप मैं मिला.
शायद सभी माँ बाप यही सिखाते है आप सोच रहे होंगे इसमें नया क्या है? और अपने ब्लॉग पर ये सब लिखकर आखिर मैं कहना क्या चाहती हु?

पर कहानी तो यही से शुरू होती है ...सही है हर माँ बाप यही संस्कार देते है,सब अपने बच्चो को अच्छा सिखाते है ,पर ये सिक्के का १ पहलु है दूसरा पहलु सब जानते है पर कोई बोलता नहीं हम आज उसी पहलु पर  बात करेंगे .
हम में से हर कोई कुरूतियों को तोड़ने,गलत के विरोध मैं आवाज उठाने की बातें करते है पर कितने लोग ऐसे है जो खुद किसी  परंपरा को मानते आ रहे है और १ दिन जब उनके बच्चे उस कुरूति का विरोध करते है तो खुले दिल से उस विरोध को स्वीकार कर पाते है?
 
कितने लोग है जो संस्कारो को, परम्पराओं को धरोहर के रूप मैं देते है, पर धीरे धीरे खुद भी लकीर के फ़कीर की तरह उस कुरूति को अन्धो की तरह मानने लगते है और अपने बच्चो को कभी संस्कार, कभी बड़ो का सम्मान और कभी पूर्वजो के बने नियम के नाम पर मानने के लिए मजबूर कर देते है.
कभी कोई विरोध की चिंगारी उठती है तो भी उसे दबा देते है ये कहकर की बड़े जो कहते है बच्चो के भले के लिए ही कहते है....वेसे इस बात मैं कोई दौमत नहीं की हर माँ बाप अपने बच्चो का भला ही चाहते है और जो कहते है भलाई के लिए ही कहते है ,पर ये भी सच है की बदलते समय के साथ कभी कभी पुराने नियम कानून नासूर बन जाते है और बेहतर यही है की  कोई नियम नासूर बने उससे पहले उसे छोड़ दिया जाए .

कभी कभी इंसान नहीं समझ पाता की वो जो सिखा रहा है या जो करने के लिए मजबूर कर रहा है वो या तो गलत है या पूरी तरह सही नहीं है. ऐसे समय मैं जरुरी है बच्चे उसका विरोध करे और ये तभी संभव है जब माता पिता बचपन मैं बच्चो में इस तरह के संस्कार डालें की वो सही का साथ दे सके और गलत का विरोध कर सके .वो गलत चाहे खुद माता पिता ही क्यों न हो.

बच्चो की जड़े मजबूत बनाना ज्यादा जरुरी है ताकि वो अपनी पूरी उम्र मजबूत  रहे और अपने आस पास के लोगो को भी संबल प्रदान करें...

ये तो हुई ज्ञान की बातें .पर, ज्ञान यही खतम नहीं होता ज्ञान तो यहाँ से शुरू होता है......

अगर बच्चो को कुछ   सिखा रहे है तो खुद भी उसका पालन करने की हिम्मत रखना जरुरी है खुद भी अपने व्यवहार मैं वो सब ले जो आप ज्ञान की घुट्टी के रूप मैं अपने बच्चो को दे रहे है.
हाथी के दाँतों की तरह करने और दिखाने मैं अंतर रखना बेवकूफी है...बच्चो को  बड़ो का सम्मान सिखाइए तो ये भी सिखाइए की जब कुछ गलत हो रहा है तो उसका विरोध केसे किया जाए....

 जब आपके बच्चे आपके दिए संस्कारों पर चलने लगे तो उन्हें रोकिए मत हाँ अगर वो गलत ढंग से विरोध कर रहे है तो उन्हें सही रास्ता दिखाए और खड़े हो जाइये उनकी ढाल बनकर पर हाँ ये बात आप पर तब भी लागु होगी जब बच्चे गलत कर  रहे  हो तो  उसका भी विरोध करिए



7 comments:

अजित गुप्ता का कोना said...

आपने उपदेशात्‍मक बातें तो कई लिख दी लेकिन उदाहरण एक भी नहीं दिया। जैसे किन बातों का विरोध करें? परम्‍पराओं में नहीं बहें? मैं तो देख रही हूँ कि आधुनिकता के नाम पर या फैशन के नाम पर बच्‍चे हम से अधिक परम्‍परावादी हैं। इसलिए परम्‍परावादी होने के लिए बड़े या बच्‍चों में अन्‍तर नहीं है। किसी एक बात को लेकर अपने विचार बताएं कि इसका विरोध होना चाहिए।

kanu..... said...

अजित जी धन्यवाद की आपने मेरा पोस्ट पढ़ा और उस पर अपना कमेन्ट भी दिया .आप बहुत अच्छी लेखिका है एवं ये संभव है की मेरे इस लेख में आपको १ नोसिखिए लेखक की लेखनी की बू आई होगी.पर मुझे जानकर हर्ष हुआ की की आपने अपना समय मेरे विचारो को पढने में लगाया.क्षमा करियेगा अगर मैंने कुछ अनुचित या अस्पष्ट लिखा हो तो क्यूंकि में लेखिका नहीं हु सिर्फ मन जो विचार आए उन्हें लिख दिया.
मेरा लेखन किसी एक मुद्दे को लेकर नहीं था न ही मेरा उद्देश्य कोई उदाहरन देकर लोगो को सोचने के लिए मुद्दा देना था मैं तो सिर्फ ये चाहती थी की लोग बस इतना समझे की बच्चो को मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाना चाहिए ताकि वो कुरीतियों का विरोध कर सके.उदहारण आपको आपके आस पास ही मिल जाएँगे जेसे वो माँ जो अपने ज़माने में घूँघट करने में कष्ट का अनुभव करती थी वही प्रोढ़ महिला होने के बाद इसकी घोर समर्थक हो जाती है, या जो पापा अपने ज़माने में दहेज़ प्रथा के खिलाफ थे वो अपनी बेटी की शादी में दहेज़ देते है या बेटे की शादी में लेते है अगर असे लोग बचपन से ही बच्चो को स्वतंत्र सोच दे तो बेटी दहेज़ लेने वालो के घर शादी नहीं करेगी और बेटा दहेज़ नहीं लेगा चाहे माता पिता लेने या देने के लिए तैयार हो . आपने उदाहरन माँगा इसलिए मैंने दिया पर सच मानिये में उद्धरण देकर में मेरी सोच को सीमित नहीं करना चाहती थी और पाठको को भी ये अवसर देना चाहती थी की वो इस फ़ॉर्मूला को हर आवश्यक स्थान पर प्रयोग में ले.
मैंने अपने घर में ऐसा माहोल नहीं देखा पर फिर भी ऐसे लोग अभी भी भारत में है जो बच्चो को स्वतंत्र सोच और सही गलत का अंतर करने तथा गलत का विरोध करना नहीं सिखाते .
मेरा ये लेख बड़े शेहरो के बहुत ज्यादा पढ़े लिखे और बच्चो के साथ मित्रवत व्यवहार करने वाले समझदार लोगो के लिए नहीं है. उनके लिए है जो आधुनिकता का मतलब सिर्फ कपड़ो में बदलाव और फैशन को समझते है जिन्हें लगता है अच्छे कपडे ही उनकी पहचान है वो इंसान के मन को मोल नहीं देते और यही वो अपने बच्चो को भी सिखाते है,बचपन से ही उन्हें स्वतंत्र सोच नहीं देते और उनके मानसिक विकास को प्राथमिकता नहीं देते .अच्छे स्कूल में दाखिला करवाकर वो अपने कर्तव्य की इति-श्री समझ लेते है.कई बार खुद भी कुरीतियों को मानते है और अपने बच्चो से भी मनवाते है शादी में दहेज़,बड़ा भोज ,बेटी को पराया धन मानना आज भी भारत में होता है और इस सब में शामिल होने वाले कई बार खुद को समझदार कहलवाने से परहेज नहीं करते ....फिर भी में यही कहूँगी की में किसी १ मुद्दे तक इस बात को सिमित नहीं करना चाहती में अब भी यही कहूँगी हर वो बात जो आपको अपने बचपन या जवानी के दिनों में गलत लगती रही है और किसी कारणवश आप उसका विरोध नहीं कर पाए,अगर बड़े होने पर आपके बच्चे उसी गलत बात का विरोध करते है तो समाज के दबाव में आकर ,या लोग क्या कहेंगे सोचकर उनकी बात दबाए नहीं.

अजित गुप्ता का कोना said...

कनु, यही नाम है ना? मैं उस लेखक को अवश्‍य पढ़ती हूँ जिसने कोई विचार दिए हों। तुम्‍हारी पोस्‍ट किसी विचार को लिए थी इसलिए पढ़ा भी और अपनी टिप्‍पणी भी की। ले‍किन मेरा मानना है कि विचार स्‍पष्‍ट होने चाहिए। कई बार अध्‍ययन करने पर, मेरा तात्‍पर्य अध्‍ययन से समाज का अध्‍ययन करने पर एवं मनन करने पर बात का रूख बदल जाता है, इसलिए मेरा आग्रह रहता है कि हम सामान्‍य बात ना करके किसी मुद्दे पर बात करें तो अपने विचारों का परिष्‍कार होगा। हम दहेज प्रथा के लिए अक्‍सर बात करते हैं और इसके लिए पुरातन पीढी को उत्तरदायी और नवीन पीढ़ी को बदलाव वाली मान लेते हैं। लेकिन यदि समाज का अध्‍ययन करोगी तो समझ आएगा कि वर्तमान पीढी के कारण ही आज माता-पिता पर दहेज और विवाह में फिजूलखर्ची का अनावश्‍यक बोझ बढ़ रहा है। इसलिए मैंने लिखा था कि परम्‍परावादी होने या साहसी होने के लिए पुरातन और नवीन पीढ़ी की तुलना नहीं होती, यह व्‍यक्तिगत मामला है। तुम लिखो लेकिन सार्थक मुद्दे पर लिखो, मेरी शुभकामनाएं हैं। मन मे विचार आना स्‍वाभाविक है लेकिन उन्‍हें वास्‍तविक धरातल देना ही लेखक का काम है। पुन: शुभकामनाएं।

kanu..... said...

धन्यवाद् अजित जी .आप मेरा लिखा हुआ पढ़ रही है यही मेरे लिए महत्वपूर्ण है.और आपने अपने सुझाव दिए यही मेरे लिए सम्मान की बात है.जी कनुप्रिया नाम है मेरा . मेरा उद्देश्य पूरा हो गया.मेरे लेख पर आपने कमेन्ट किया तो और भी कई लोगो ने इसे १ बार पढ़ लिया होगा.भविष्य में आपकी सलाह पर अवश्य ध्यान दूंगी.आपसे अनुरोध है १ बार मेरा ब्लॉग अवश्य पढ़े एवं अपने सुझाव देकर मेरा पथ प्रदर्शन अवश्य करे.में आपके सुझावों का इन्तेजार करुँगी.

अजित गुप्ता का कोना said...

तो कनुप्रिया हो तुम। फिर तो मेरे पास सारे ही अधिकार आ गए हैं। तुम्‍हारे कान पकड़ने तक के और गले लगाने के भी। समझ आया कुछ? नहीं ना। मेरी बेटी का नाम भी कनुप्रिया है।

kanupriya said...

ये भी खूब रही.अब तो आपने सरे अधिकार ले ही लिए ,फिर तो मैं भी आपसे मार्गदर्शन की उम्मीद रख सकती हु. तो आपकी बेटी भी मेरी तरह ही होगी थोड़ी जिद्दी और बहुत भावुक .नाम का असर है....मुझे लगता है शायद आपने भी उसका नाम धर्मवीर भारती की कनुप्रिया पढ़कर रखा होगा जेसे मेरे पापा ने रखा था .थैंक्स यशवंत जी को हमें भड़ास के माध्यम से अजित आंटी मिल गई...

kanu..... said...

you are most welcome mam