अन्ना का अनशन शहादत में बदल गया तो करोडो अन्ना को कैसे संभालेगी सरकार ?
राष्ट्र प्रेमी से मौत भी कांपती है क्योंकि मौत को राष्ट्र प्रेमी की तय सीमा में चलने को मजबूर होना पड़ता है
क्रन्तिकारी खुदीराम बोस को फाँसी होने वाली थी उस दिन अंग्रेज अफसर ने उन्हें एक आम दिया .खुदीराम
आम चूस कर और चुसे आम को फुलाकर रख दिया .थोड़ी देर बाद वह अफसर वापस आया तो उसे लगा
खुदीराम ने आम नहीं खाया है .उस अफसर ने उस आम को उठाया तो वह आम पिचक गया और खुदीराम
ठहाका लगा पड़े .अंग्रेज अफसर ने पूछा,"खुदीराम तुम ठहाका लगा रहे हो ? क्या तुम्हे मालूम नहीं है कुछ
घंटो के बाद तुम्हे फाँसी होने वाली है?"
खुदीराम ने हंसते हुए जबाब दिया- आजादी के दीवाने मौत से नहीं डरते , मौत खुद ऐसे लोगों से डरने लगती
है.
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है, लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत की जनता
अभी भी सरकार को कुर्सी पर बने रहना देख रही है,उनसे अभी तक गद्दी खाली करने का आह्वान नहीं कर पाई है
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत की सरकार खुद जल्लाद बनी हुयी है. अपना पाप छिपाने के लिए ऐसा कर रही है या भ्रष्टाचार की नीव मजबूत बनाने के
ऐसा कर रही है.जनता अभी तक सरकार का मंतव्य नहीं समझ पायी है.
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के जनप्रतिनिधि आवाम को उनके हित का कानून बनकर रहेगा ऐसा आश्वासन भी नहीं दे पाए हैं
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत का मुख्य
विपक्षी दल चुपचाप है. क्या कारण है की विपक्ष मौन है .
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता हरदिन उन्हें शहादत की और धकेल रहे हैं .संसद में कानून बनाने के लिए समय मांगकर जन लोकपाल को
भुलाना चाहते हैं जबकि शाहबानो मामले पर तुरंत कानून लाते हैं
भुलाना चाहते हैं जबकि शाहबानो मामले पर तुरंत कानून लाते हैं
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता काले धन को राष्ट्रिय सम्पति बनाने के सवाल पर चुप हैं
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के अरुणा राय जैसे लोग देश की धारा को नहीं पहचान पा रहे हैं,जब अन्ना टीम इस मसोदे के लिए पुरे भारत में घूम
रही थी तब अरुणा राय जैसे सोये लोग क्यों नहीं जग रहे थे,जो आज लोकपाल का नया नाटक करती हैं
रही थी तब अरुणा राय जैसे सोये लोग क्यों नहीं जग रहे थे,जो आज लोकपाल का नया नाटक करती हैं
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नागरिक
एक दिन का सामूहिक भारतीय उपवास दिवस की घोषणा भी नहीं कर पा रहे हैं
एक दिन का सामूहिक भारतीय उपवास दिवस की घोषणा भी नहीं कर पा रहे हैं
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता
पार्टी लाइन को महत्व दे अपने स्वाभिमान की हत्या कर रहे हैं.जनता की आवाज को बल नहीं देने वालो को
जनता बाहर का रास्ता दिखाने की हुंकार क्यों नहीं भर पा रही है?
पार्टी लाइन को महत्व दे अपने स्वाभिमान की हत्या कर रहे हैं.जनता की आवाज को बल नहीं देने वालो को
जनता बाहर का रास्ता दिखाने की हुंकार क्यों नहीं भर पा रही है?
आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है आशा है की आजाद भारत के जुजारू नागरिक
भी वीरों के पथ पर चलेंगे और अन्ना की तरह शहादत के पथ पर चलेंगे
क्या अन्ना की शहादत हुयी तो सरकार और उसके नुमायन्दे देश को अराजकता से बचा पाएंगे?ये बहरी
सरकार अपने अहंकार को छोड़ देश हित में सोचे ,आज आवाम यही चाहता है.
हम ऐसा जीवन जीने की कोशिश करे की जब हमारी मौत की घडी आ पहुंचे तो हर कोई अफसोस करे.
या सुभाष चाहिए या पटेल चाहिए
भी वीरों के पथ पर चलेंगे और अन्ना की तरह शहादत के पथ पर चलेंगे
क्या अन्ना की शहादत हुयी तो सरकार और उसके नुमायन्दे देश को अराजकता से बचा पाएंगे?ये बहरी
सरकार अपने अहंकार को छोड़ देश हित में सोचे ,आज आवाम यही चाहता है.
हम ऐसा जीवन जीने की कोशिश करे की जब हमारी मौत की घडी आ पहुंचे तो हर कोई अफसोस करे.
या सुभाष चाहिए या पटेल चाहिए

2 comments:
मेरे एक ब्लोगी मित्र ने इस शीर्षक से ब्लॉग लिखा है :
मेरे विचार से , सरकार ऐसा दिखा भर रही है , कि हमने बहुत कोशिश की , मगर सफलता नहीं मिली और अचनाक अन्ना चल बसे.
मेरा विचार है , उनकी शहादत हो गयी तो तुरंत बिल पास कर देगी.
फिर भी यदि कुछ जन आक्रोश हुआ तो , क्या पुलिस , सेना नहीं है .
पुलिस , सेना बेचारी का काम तो हुक्म बजा लाना है ,
जालियां वाला बाग में भी गोलियाँ चलाने वाली देसी पुलिस ही थी
कुछ सैकड़ों , या हज़ार लोग मरेंगे , और फिर जांच कमीशन ,
१९८४ के दंगों की सुनवाई अभी तक चल रही है .
जनता की याद दश्त बड़ी कमजोर होती है
कम से कम अन्ना से तो छुटकारा मिलेगा .
यदि गाँधी को शहादत नहीं मिली होती , तो कांग्रेस ही उनकी मिटटी खराब करने पर उतारू थी .
इसीलिए , १५ अगस्त के जश्न में गाँधी जी शामिल नहीं हुए थे . और कांग्रेस जश्न मन रही थी .
असल में अंग्रेज गाँधी के मरने से डरते थे , क्योंकि कुछ भी कहो वे विदेश में थे , और पुलिस , सेना भारतीय थी , इसलिए वे कोई रिस्क नहीं लेते थे , पर यहाँ तो कोई डर वाली बात ही नहीं है .
यानि कि साफ है कि अन्ना संसदीय व्यवस्था को भंग करने के लिए सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं
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