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13.1.12

कहाँ खुद को

कहाँ खुद को समझ पाया हूँ आजतक यारों ,
तुम समझ जाओ ही मुझको ये जरूरी तो नहीं ।
आज हर ओर पैमाने की गंध आती है ,
बात रह जायेगी इस रात अधूरी तो नहीं ।
धुंद की चादरें हटती नहीं हैं देर तलक ,
मान लें हम इसे मौसम की मजबूरी तो नहीं ।
मेरी बाँहों में और साँसों में जब उतरते हो ,
दिलों में फिर भी रह जाती कोई दूरी तो नहीं ।
मैं आँधियों के समंदर को तैर जाऊं जो ,
फिर भी तस्वीर बनती लग रही पूरी तो नहीं ।

1 comment:

S.N SHUKLA said...

सार्थक पोस्ट, सादर.
कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर स्नेह प्रदान करें.