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21.2.09

कहाँ गए दिन फूलों के

अँधियारा जंगल-जंगल,
दूर-दूर तक अब केवल,
दिखते झाड़ बबूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
हर पनघट सूना-सूना,
सूनी-सूनी चौपालें,
मौन चतुर्दिक घूम रहा-
पहन हादसों की खालें,
गुमसुम नीम, मौन आंगन,
ठिठका सा देखे सावन-
मुखड़े सहमे झूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
अंकुर की करतूतों पर-
बादल भी शर्माता है,
पूरब का सारथी यहाँ-
पश्चिम को मुड जाता है,
छल से भरे स्वयम्वर में,
और झूठ के ही घर में-
चर्चे हुए उसूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।
महानगर में हँसना तो-
केवल एक बहाना है,
सच तो ये है आंसू का-
हम पर बड़ा खजाना है,
ऊपर सुमनों के लेखे,
भीतर तक किसने देखे,
खाते तीखे शूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के

चेतन आनंद
[डब्लू डब्लू डब्लू डॉट तुम्हारी याद में डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम ]

2 comments:

प्रदीप मानोरिया said...

लाज़बाब कविता उत्तम भावः बेहतरीन अभिव्यक्ति
मेरे ब्लॉग पर पधार कर "सुख" की पड़ताल को देखें पढ़ें आपका स्वागत है
http://manoria.blogspot.com

SANJEEV MISHRA said...

bhayee rahul jee evam Chetan ji,
prastut karne evam rachne ke liye dhanyavaad.bahut hi sundar rachna hai. jitni bhi prashansa kii jaye kam hai.