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4.8.15

मजदूरों के अनोखे प्रयोगों का गवाह बनता मधुबन

-रूपेश कुमार


जैन तीर्थयात्रियों के विश्वप्रसिद्ध पर्यटक स्थल के रूप में ख्यातिप्राप्त पारसनाथ पहाड़, जिसे सम्मेद शिखर के नाम से भी जाना जाता है, का ऐतिहासिक विकासक्रम मजदूरों के शोषण व संघर्ष की जीती-जागती मिसाल है। झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड में अवस्थित पारसनाथ पहाड़ सदियों से जैन धर्म के अनुयायियों व संथाल आदिवासियों के लिए अलग-अलग कारणों से पूजनीय है। जहां एक तरफ, जैन धर्मावलम्बियों का मानना है कि इसी पहाड़ पर 24 जैन तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों को मोक्ष प्राप्त हुआ था, वहीं दूसरी तरफ संथाल आदिवासी इसे ‘‘मरांग बुरु’’ मानकर पूजते हैं, जहां जुग जहर स्थित है।



गिरिडीह जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित पारसनाथ पहाड़ 16500 एकड़ के विस्तृत क्षेत्र तक फैला हुआ है। जैन धर्मावलम्बियों के व्यापक प्रचार-प्रसार के कारण जहां ये क्षेत्र विश्व पटल पर जैन तीर्थ स्थल के रूप में ख्याति प्राप्त करने में सफल रहा, वहीं दूसरी तरफ संथाल आदिवासियों का ‘‘मरांग बुरु’’ किसी सुव्यवस्थित प्रचार-प्रसार ना होने के कारण सिर्फ स्थानीय ही होकर रह गया। मालूम हो कि गिरिडीह जिला का पीरटांड़ प्रखंड एक आदिवासी बहुल प्रखंड है।

इस प्रखंड का अधिकांश हिस्सा पहाड़ व जंगलों से आच्छादित है। भयंकर गरीबी, बेरोजगारी, रोजगार के लिए महानगरों में पलायन, मलेरिया व डायरिया जैसी सामान्य बीमारी से मौत, सिर्फ पेट भरने क लिऐ कुछ भी भोजन कर लेना, मांड़ी यानि लोकल दारू से ग्रसित बहुसंख्यक लोग, नदी-नाले की पानी से अपनी प्यास बुझाना व जंगल-पहाड़ पर निर्भरता पीरटांड़ प्रखंड के लोगों को विरासत में मिली है। आज भी पीरटांड़ प्रखंडवासी अपने इस ऐतिहासिक विरासत के भार से कमोबेश दबा हुआ ही है। हां, इतने सालों में एक तब्दीली जरूर आई और वो थी, इस क्षेत्र के लगभग 20 हजार लोगों को रोजगार मिलना, लेकिन 20 हजार लोगों को रोजगार मिलने की कीमत भी इन्हें कम नहीं चुकानी पड़ी है। उस पर हम आगे चर्चा करेंगे।
हां, पारसनाथ पहाड़ व पीरटांड़ प्रखंड को देश के पैमाने पर चर्चित होने का एक कारण और भी रहा, वो था-इस क्षेत्र का माओवादियों के गढ़ के रूप में प्रचार-प्रसार। इस इलाके के एक बुजुर्ग बताते हैं कि ‘‘इस क्षेत्र में काफी गरीबी थी। मजदूरों व किसानों का भयानक शोषण होता था। आदिवासियों पर सूदखोरों व महाजनों का जोर-जुल्म नया इतिहास बना रहा था। ठीक इसी समय एम. सी. सी. वर्त्तमान में भाकपा (माओवादी) के दो-तीन लोग पश्चिम बंगााल से 1970-71 ई. में यहां आए। उन्होंने यहां के ग्रामीणों को उनके शोषण की मूल वजह से अवगत कराया। पहले-पहल तो यहां के ग्रामीणों ने उनपर विश्वास नहीं किया लेकिन जब वे लोग इन्हीं लोगों के बीच रहने लगे व घुलमिल गए। तब ग्रामीणों को उनकी बात पर विश्वास होने लगा। धीरे-धीरे ग्रामीण संगठित होने लगे। उस समय पीरटांड़ प्रखंड के चारों तरफ पालगंज के राजा की जमीन थी। उस राजा का इलाके में इतना प्रभाव था कि पालगंज के 20-25 किलोमीटर के दायरे के सभी आदिवासी-गैरआदिवासी बरसात शुरु होने पर पहला दिन राजा के खेत में बेगारी के तौर पर हल जोतते थे, उसके बाद ही अपना खेत जोतते थे। माओवादियों के आने के बाद व ग्रामीणों के संगठित होने के कारण धीरे-धीरे आम लोगों को महजनों व सूदखोंरों से मुक्ति मिलनी शुरु हुई।

जंगल कटने बंद हो गए। गांव-गांव में जंगल सुरक्षा समिति, क्रांतिकारी किसान कमिटि व नारी मुक्ति संघ का निर्माण हुआ। यही कारण है कि आज भी माओवादियों का ये गढ़ सुरक्षित ही नहीं निरंतर फैलाव की ओर अग्रसर है।’’ वे बुजुर्ग बताते हैं कि ‘‘पहले तो माओवादी गांव में ही रहते थे लेकिन जब से चारों तरफ सी. आर. पी. एफ. कैम्प बना है, वे जंगलों में रहने लगे हैं। अभी पीरटांड़ प्रखंड में तीन सी. आर. पी. एफ. कैम्प है। हद तो ये है कि हरलाडीह कैम्प के लिए तो बच्चों के स्कूल को ही कब्जा कर लिया गया है।’’

खैर, ये वजह तो थी पारसनाथ पहाड़ के चर्चित होने की, लेकिन जो चर्चित नहीं है वो है-मजदूरों के शोषण व संघर्ष की कहानी।

एक तरफ भक्ति तो दूसरे तरफ पैसे की शक्ति
अभी वर्त्तमान में पारसनाथ पहाड़ के नीचे, जिसे मधुबन के नाम से भी जाना जाता है, यहां जैन धर्मावलम्बियों की 27 कोठियां हैं और सभी कोठियों के अंदर एक रेस्त्रां भी है। जैसा कि आप जानते हैं कि जैन धर्म में दो मत को मानने वाले लोग हैं, एक को दिगंबर तो दूसरे को श्वेतांबर कहा जाता है। इन 27 कोठियों में दोनों ही मतों को माननेवालों की कई कोठियां राज्य व क्षेत्र के नाम पर है। इन कोठियों की संख्या हाल के दिनों में ही काफी तेजी से बढ़ी है। जहां 1970 ई. के पहले मात्र तीन कोठी थी-दिगंबर जैन बीसपंथी कोठी, जैन श्वेतांबर सोसाईटी व दिगंबर जैन तेरहपंथी कोठी। यहां तक कि 1990 ई. तक भी मात्र 5 से 6 कोठियां ही थी, लेकिन 1990 ई. के बाद कोठियों के निर्माण में अचानक उछाल आई और अभी कुल 27 कोठियां तैयार है। एक-एक कोठी की लागत करोड़ों में है, तो अभी एक निर्माणाधीन कोठी ‘‘तलेटी तीर्थ जैन श्वेतांबर मूर्त्तिपूजक तपागच्छ ट्रस्ट’’ की लागत अरबों में बतायी जा रही है, इसी कोठी के शिलान्यास के समय बोरे में पैसा घोड़े पर रखकर लूटायी गयी थी। इन कोठियों से सरकार व प्रशासन का रिश्ता हमेशा दोस्ताना रहा है।

चाहे एकीकृत बिहार हो या अब अलग झारखंड, मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री तक के कर कमलों से शिलान्यास या उद्घाटन का सिलसिला जारी है। यहां तक कि राष्ट्रपति भी यहां की शोभा बढ़ा चुके हैं। सबसे रोचक बात ये है कि इन करोड़ों व अरबों की लागत से बनी 27 कोठियों का, जिसमें प्रत्येक साल लाखों तीर्थयात्री ठहरते हैं। एक भी कोठी व रेस्त्रां का राज्य या केन्द्र सरकार के पास पंजीकरण नहीं है। जहां गरीब मजदूरों से भी सरकार विभिन्न रुप से टैक्स वसूलती है, वहीं इन कोठियों व रेस्त्रां से सरकार को एक रुपया भी टैक्स नहीं मिलता है। हां, अन्दर खाने से नेेताओं के पास पैसे जरुर पहुंचाये जाते हैं। इन जैन धर्मावलम्बियों के द्वारा कोठियों के अनवरत हो रहे निर्माण के कारण जमीन दलाली का भी एक बड़ा रैकेट यहां पर खड़ा हो गया है। जो यहां के रैयती जमीन को ओने-पौने दामों पर इन धनकुबेरों के पास बेचकर करोड़ों का वारा-न्यारा कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ गैरमजरूआ जमीन पर भी कोठियां खड़ी हो रही है।

आपको विश्वास नहीं होगा कि 27 कोठियों में से अधिकांश कोठियों का अधिकांश हिस्सा गैरमजरूआ व वन भूमि पर ही है, जिसपर न्यायालय में मुकदमे भी चल रहे हैं। यहां तक कि 1997 ई. में पटना उच्च न्यायालय व  2004 ई. में रांची उच्च न्यायालय ने भी कहा कि इन सभी कोठियों व जिला प्रशासन की एक कमिटी बनायी जाए, जिसके अध्यक्ष डीसी को बनाया जाए और कोठियों के आय-व्यय का ब्यौरा सरकार के पास भेजी जाए। लेकिन उच्च न्यायालय के फैसले को इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इस दिशा में  कोई पहल नहीं ली गई। मधुबन में स्थित कोठियों के प्रबंधकों का दोगलापन एक और भी बात से समझा जा सकता है कि एक तरफ तो इन प्रबंधकों के द्वारा पारसनाथ पहाड़ के आसपास के क्षेत्र को मांस-मदिरा वर्जित क्षेत्र बनाने का रोना हमेशा प्रशासन के सामने रोया जाता है, जबकि कल्याण निकेतन में स्थित सी. आर. पी. एफ. कैम्प व पारसनाथ डाकबंगला में स्थित झारखंड पुलिस के जवान को मांस-मदिरा के सेवन की खुली छूट है, इसके खिलाफ कोठियों के प्रबंधक चूं तक नहीं बोलते। ये इनकी भ्रष्ट प्रशासन के तलवाचाटू प्रवृत्ति को ही सामने लाता है।

गंदगी के कारण अपने नाक पर हमेशा कपड़ा बांध कर चलने वाले जैन धर्मावलम्बी व इन कोठियों के प्रबन्धकों ने कभी भी पारसनाथ पहाड़ व मधुबन क्षेत्र में सफाई की सुध नहीं ली। जहां तक हो सका इन क्षेत्रों को गंदा करने व नदियों को प्रदूषित करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। पारसनाथ पहाड़ की तलहटी मधुबन में, जहां इनकी 27 कोठियां स्थित है, जिसमें प्रतिवर्ष लाखों यात्री ठहरते हैं, किसी भी कोठी में मल-मूत्र व गंदगी को वैज्ञानिक तरीके से डम्प करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इन सभी कोठियों का मल-मूत्र व गंदगी कोठियों के तीन तरफ बने नाले के जरिए जयनगर खपेयवेड़ा नाला में जाता है। ये नाला पीरटांड़ प्रखंड के कई गांवों से होकर गुजरती है।

 इसी नाले के पानी का पीने के लिए उपयोग अभी भी पीरटांड़ प्रखंड के सैकड़ों गांव के लोग करते हैं और नहाना, कपड़ा साफ करना, व बर्त्तन साफ करना तो इसी पानी से होता ही है। पीरटांड़ प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बीमारी को फैलाने में इन प्रदूषित पानी व प्रदूषण फैलाने वाले कोठियों की भूमिका के बारे में प्रशासन की खामोशी इशारे ही इशारे में काफी बातें कहती है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मधुबन से 9 किलोमीटर की उंचाई चढ़ने व पारसनाथ पहाड़ पर 9 किलोमीटर घूमने पर इनके सभी मंदिरों के दर्शन होते हैं, लेकिन इन 18 किलोमीटर के रास्ते में आपको ना तो कहीं पाखना घर, ना ही पेशाब घर और ना ही कोई कूड़ेदान मिलेगा। पीने का स्वच्छ पानी का तो कोई सवाल ही नहीं है। और तो और पहाड़ परिक्रमा की कुल दूरी 24 किलोमीटर है, यहां भी पेशाब, पाखाना व कूड़ेदान की कोई व्यवस्था नहीं है। आप समझ सकते हैं कि यात्री पेशाब व पाखाना कहां करते होंगे और कूड़ा कहां फेंकते होंगे ? मधुबन थाना के सामने बने सार्वजनिक पेशाब घर का तो हाल ये है कि आप नाक बंद करके भी उसमे नहीं जा सकते हैं। और तो और जब मैं वहां पर गया तो दो खाली शराब की बोतल वहां की शोभा बढ़ा रही थी।

धार्मिक जगह पर साफ-सफाई का ये हाल तब है, जब हमारे देश में एक धार्मिक प्रधानमंत्री हो, देश में ‘निर्मल भारत अभियान’ के तहत खुले में शौच पर रोक के लिए अरबों रूपये खर्च किए जाते हों व 2 अक्टूबर से शुरु हुए ‘स्वच्छता अभियान’ के तहत हरेक नेताओं की तस्वीर ‘‘हाथ में झाड़ू’’ लिए हुए इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया में छाया हुआ हो, तब सवाल तो बनता ही है कि आखिर मधुबन व पारसनाथ क्षेत्र में इन कोठियों के प्रबंधकों को गंदगी फैलाने की छूट क्यों ? आखिर पीरटांड़ के लाखों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ क्यों ? आज भले लगभग 20 हजार लोगों को रोजगार मिला हो लेकिन लाखों के स्वास्थ्य की कीमत पर क्यों ? जिन यात्रियों को डोली मजदूर डोली में बिठाकर 27 किलोमीटर चलकर तीर्थस्थलों के दर्शन कराते हैं व 24 किलोमीटर चलकर पहाड़ की परिक्रमा कराते हैं, उनके और उनके ही परिवारों के साथ ये क्रूर मजाक क्यों ?

मजदूरों के संघर्ष का साथी ‘मजदूर संगठन समिति’
मधुबन बाजार में स्थित यहां के एकमात्र मजदूर संगठन ‘मजदूर संगठन समिति’ के कार्यालय में जब मैं पहूंचा, तो वहां संगठन के मधुबन शाखा अध्यक्ष का. अजीत राय, सचिव का. थानू महतो व कोषाध्यक्ष का. द्वारिका राय से मुलाकात हुई। उन्होंने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया और फिर बातचीत शुरु हुई। मजदूर नेताओं ने बताया ‘‘1990 ई. से मजदूर संगठन समिति का कामकाज यहां शुरु हुआ। मजदूरों के संगठित नहीं रहने के कारण कोठी प्रबंधकों का व्यवहार मजदूरों के साथ जानवरों जैसा था। न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती थी। डोली मजदूरों से यात्री काफी मोल-भाव करते थे और रोजगार ना मिलने के कारण काफी सस्ते में काम करवा लेते थे। मजदूरी की दर भी तय नहीं थी।

एक भी कोठी में मजदूरों की नौकरी स्थायी नहीं थी। कोठी प्रबंधक मनमाने तौर पर मजदूर रखते थे और जब चाहे मजदूरों को हटा भी देते थे। इन्हीं अमानवीय व्यवहारों से तंग आकर मजदूरों ने ‘मजदूर संगठन समिति’ के बैनर तले अपने आप को गोलबंद किया।’’ मजदूर नेताओं से ये पूछने पर कि आपके संगठन की उपलब्धि अभी तक क्या है ? मजदूर नेताओं ने जवाब दिया ‘‘सबसे पहले हमारे संगठन ने सदस्यता अभियान चलाकर कोठी में कार्यरत सफाईकर्मी, सुरक्षा गार्ड, दैनिक मजदूर, डोली मजदूर आदि को संगठित किया। उसके बाद कोठी में कार्य कर रहे मजदूरों के स्थायीकरण के लिए आंदोलन चलाया।

आज संगठन के आंदोलन का ही परिणाम है कि लगभग तीन से चार हजार मजदूर यहां स्थायी नौकरी पर है। सभी को ये अधिकार प्राप्त है कि वो अपने मन से जबतक चाहें नौकरी कर सकते हैं और उनके नौकरी छोड़ने के बाद उनके परिवार का एक सदस्य उस जगह पर काम कर सकता है। उन मजदूर की मृत्यु पर अनुकम्पा के आधार पर उनके परिवार के एक सदस्य की नौकरी तो तय है ही यानि कि पीढ़ी दर पीढ़ी एक मजदूर के परिवार का एक सदस्य चाहे तो उस कोठी में नौकरी कर सकता है।’’ यह सुनकर तो मैं अवाक् रह गया क्योंकि सच तो यह है कि पूरे देश में पीढ़ी दर पीढ़ी नौकरी की गारंटी आज तक कोई भी मजदूर संगठन कहीं भी नहीं करा पाया है। मजदूर नेताओं ने आगे बताया ‘‘हमारे संगठन ने यात्रियों के वजन के हिसाब से डोली मजदूरों की मजदूरी तय की। अभी लगभग तेरह हजार डोली मजदूर है। सभी को हमने एक सदस्यता कार्ड उपलब्ध कराया है। डोली मजदूरों की सदस्यता राशि भी मात्र 30 रूपये वार्षिक है।

हमारे संगठन ने डोली मजदूरों के लिए एक ‘कल्याण कोष’ भी बना रखा है, इस कोष में प्रत्येक यात्री से 10 रूपये का सहयोग लिया जाता है और अगर पहाड़ चढ़ते समय किसी मजदूर के साथ दुर्घटना घट जाती है, तो उनके इलाज का पूरा खर्च संगठन के तरफ से दिया जाता है। काम पर मृत्यु हो जाने पर 25 हजार की सहयोग राशि संगठन उनके परिवार को देती है। यहां तक कि घर में भी किसी सदस्य की मृत्यु पर 10 हजार रूपये देती है।’’ उन नेताओं ने बताया कि ‘‘हमलोग सरकार व प्रशासन के भरोसे पर बैठे नहीं रहते हैं, मजदूरों के लिए जो भी वैकल्पिक व्यवस्था हो सकता है, हमलोग करने की कोशिश करते हैं। हमलोगों ने अपने संघर्ष के बल पर प्रत्येक वर्ष महावीर जयंती के दिन स्वतः 15 प्रतिशत डोली मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के सवाल पर जीत हासिल की है।’’ मैंने जब पूछा कि संगठन को आन्दोलन के कारण क्या-क्या परेशानियां हुई ?

उनका जवाब मजदूर नेताओं ने मुस्कुराते हुए दिया कि ‘‘1992-93 ई0 में अनुकम्पा के आधार पर नौकरी दिलाने के लिए ’‘धर्ममंगल जैन विद्यापीठ’ में जब हमलोगों ने आन्दोलन शुरु किया, तो 28 दिनों तक इस कोठी का काम ठप्प कराने के बाद 29वां दिन हमारी मांग मानी गई। पूरा प्रशासन कोठी प्रबन्धकों के पक्ष के खड़ा हो जाता है। हमारे नेताओं को नक्सली बताकर भी जेल में बन्द किया गया है। हमारे कई नेताओ पर भी फर्जी मुकदमे लादे जाते रहे है। लेकिन फिर भी मजदूरों के संगठित ताकत के बदौलत हमलोगों ने कई जीतें हासिल की है और आगे भी जीत हासिल करेंगे।’’ उन नेताओं ने ये भी बताया कि झारखण्ड में जो भी न्यूनतम मजदूरी की रकम निर्धारित है, उसे भी दिलाने के लिए हमलोगों को संघर्ष करना पड़ता है, तब ही कोठी प्रबन्धक उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी देते हैं। अभी यहां पर महिला-पुरुष दोनों को 178 रुपए मजदूरी मिलती है, अभी न्यूनतम मजदूरी 210 रुपए सरकार ने की है, लेकिन यहां लागू नहीं हुआ, बिना आन्दोलन के लागू भी नहीं होगा। हां, यहां पर कभी भी महिला व पुरुष  की मजदूरी में अन्तर नहीं रहा ह,ै संगठन बनने के बाद।

मजदूरों का अपना अस्पताल- श्रमजीवी अस्पताल
इसी साल 5 मई को यहां के मजदूरों ने एक अनूठा प्रयोग किया है। मजदूरों ने ‘‘मजदूरांे का, मजदूरों के लिए व मजदूरों के द्वारा’’ नारे के साथ एक मुफ्त अस्पताल खोलकर करोड़ों व अरबों की लागत से बनी कोठियों के प्रबन्धकों व सरकार की बोलती बंद कर दी है। मजदूर संगठन समिति के नेताओं का कहना है कि यहां पहले भी कोठियों के द्वारा दो मुफ्त अस्पताल रहे है, लेकिन सिर्फ कहने के लिए, क्योंकि वहां भी पर्ची कटाने के लिए पैसे लिए जाते हैं, बहुत दवाईयां तो दी ही नहीं जाती, तो फिर मुफ्त कैसा ? उनलोगों ने जैन संस्था के द्वारा मुफ्त अस्पताल व दवाई वितरण के नाम पर जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ की एक घटना सुनाई, जिसे सुनकर मैं दंग रह गया।

उन्होंने बताया कि ‘‘29 जनवरी 2011 को मधुबन के सिंहपुर गांव में शिविर लगाकर श्री सेवायतन संस्था की ओर से संस्था के अध्यक्ष एम. पी. अजमेरा के निर्देष पर मुफ्त दवाई का वितरण किया गया। इवाई ग्रामीणों के बीच बिना किसी डॉक्टर के सहयोग के ही बांट दी गई। दवाई को खाने के बाद कुछ ग्रामीण की तबीयत खराब होने लगी तो ग्रामीणों ने मजदूर संगठन समिति के शाखा कार्यालय में आकर ये बात बताई।दवाई की जांच करने पर सभी दवाईयां एक्सपायरी निकली। इसके खिलाफ ग्रामीणों ने संस्था के अध्यक्ष का घेराव किया लेकिन वे डर से छुप गए। जब पुलिस आई तो फिर पुलिस सुरक्षा में जनता के बीच आकर उन्होंने माफी मांगी। इस घटना के बाद ही हमलोगों ने एक मुफ्त अस्पताल खोलने की योजना बनानी शुरु कर दी थी।’’  इस अस्पताल का नाम मजदूरों ने श्रमजीवी अस्पताल रखा है, जहां सब कुछ मुफ्त है। मधुबन से पीरटांड प्रखण्ड मुख्यालय जो 5 किलोमीटर दूर है, वहां एक सरकारी अस्पताल है तो जरुर ,लेकिन सिर्फ नाम का। इसलिए श्रमजीवी अस्पताल में मधुबन के 20 किलोमीटर के दायरे के ग्रामीणों को मुफ्त प्राथमिक चिकित्सा देकर एक वैकल्पिक उदाहरण पेश किया है।

मजदूर संगठन समिति के कार्यालय के निचले तल्ले पर स्थित ‘श्रमजीवी अस्पताल’ में जब मैं गया, तो आश्चर्यचकित रह गया। 10 बेड का ये अस्पताल, जहां पर एक डॉक्टर, एक कम्पाउंडर, एक नर्स, एक गार्ड के अलावा पचासों मरीज अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। जब मैं डॉक्टर के केबिन में गया तो अपने व्यस्त कार्य से समय निकालकर 74 वर्षीय सेवानिवृत्त डॉक्टर सुरेन्द्र सिंह (एम. बी. बी. एस. ) ने एक नौजवान की तरह जोशोखरोश से मेरे से हाथ मिलाया और लगभग एक घंटे तक बातचीत की। उन्होंने बताया कि ‘‘मेरा एक दोस्त डॉ. यू. एन. सिंह जैनियों के द्वारा संचालित अस्पताल में यहीं पर कार्यरत हैं, जब उन्होंने मुझे इस तरह के अस्पताल में काम करने का प्रस्ताव दिया, तो मैंने बिना एक मिनट की देरी किए हां कर दी। जब से मैं यहां आया हूं, 24 घंटा अस्पताल में ही रहता हूं, संगठन ने मेरे लिए आवास की भी व्यवस्था की थी लेकिन मैंने वहां रहने से मना कर दिया, ताकि कोई भी मरीज यहां से लौटकर ना जाए। संगठन वालों ने मुझे खुली छूट दी है कि आप दवाई देने में कोई भी कोताही  ना करें, चाहे जितना भी हो दवाई दें ताकि मरीज स्वस्थ होकर यहां से जाएं।’’ उन्होंने बताया कि ‘‘यहां के लोग काफी अच्छे हैं और बहुत ही प्यार करते हैं, लेकिन गरीबी के कारण टूटे हुए हैं। मैं उन्हें दवाई तो दे सकता हूं लेकिन वो तो फिर बीमार होंगे क्योंकि उन्हें ना तो पौष्टिक आहार मिलता है और ना ही पीने व नहाने के लिए स्वच्छ पानी।’’

उन्होंने मेरा ध्यान प्राइवेट चिकित्सकों व झोलाछाप डॉक्टरों के रैकेट की ओर आकृष्ट कराया। उन्होंने बताया कि ‘‘ग्रामीण जब बीमार होते हैं, तो उन्हें बड़ी बीमारी का भय दिखाकर पहले तो काफी पैसा ऐंठते हैं और उसके बाद अपने गुरु, शहरों में स्थित प्राइवेट चिकित्सकों के पास भेज देते हैं। इन रैकेट ने तो आदिवासियों की जिंदगी को और भी बदहाल कर दिया है।’’ उन्होंने इस तरह के अस्पताल को एक अनूठा प्रयोग माना व सहयोग करने का भरोसा उनके मुस्कुराते व दृढ़ चेहरे पर साफ-साफ मुझे दिखाई पड़ा। उनसे बातचीत के बाद जब मैं स्टोर रूम गया तो दवाई का कलेक्शन देखकर भी दंग रह गया। सभी दवाईयां अच्छी कम्पनी की थी। जेनरेटर से लेकर फ्रीज तक की सुविधा अस्पताल में मौजूद थी।

पीछे नहीं है यहां के युवाओं की टोली
इस वर्ष पारसनाथ के युवाओं ने भी अपनी ताकत व जंगल को जलने से बचाकर ये साबित कर दिया कि वैकल्पिक व्यवस्था की लड़ाई में वे भी पीछे नहीं हैं। मकरसंक्रांति के मौके पर पारसनाथ पहाड़ पर बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है, जो कि तीन से चार दिन चलता है। इस मेला में लाखों लोग भाग लेते हैं और मधुबन से लेकर पारसनाथ पहाड़ पर लोगों का रेला लग जाता है, जिसमें व्यवस्था बनाए रखने के लिए 5 साल पहले ‘पारसनसथ मकरसंक्रांति मेला समिति’ का गठन आसपास के ग्रामीण युवाओं ने किया था, लेकिन इस वर्ष इन्हीे युवाओं ने ‘‘जंगल बचाओ, जीवन बचाओ, आओ चलें हरियाली की ओर’’ केन्द्रिय नारे के साथ ‘पारसनाथ वन सुरक्षा समिति’ का गठन किया, इस समिति के अध्यक्ष संतोष महतो, पूर्व सचिव लक्ष्मीकांत महतो, संरक्षक मनोज अग्रवाल व कोषाध्यक्ष दीपक अग्रवाल (ये सभी पेशे से पारा शिक्षक हैं), ने मुझे बताया कि ‘‘पारसनाथ पहाड़ पर आग लगने से लाखों पौधे मर जाते हैं, लाखों जीव-जंतु भी मरते हैं व औषधीय पौधे भी नष्ट हो जाते हैं, इसे बचाने के लिए हमलोगों ने पारसनाथ पहाड़ के चारों तरफ स्थित लगभग 50 गांव में फरवरी से ही वन के फायदे से संबंधित पर्चा वितरण , पोस्टर चिपकाना व सभी गांव में नुक्कड़ सभा का आयोजन किया।

सभी गांवों से दो शिक्षित युवाओं को कमिटि में शामिल किया व उनके मोबाईल नंबर का आदान-प्रदान किया। जब गर्मी में जंगल में आग लगना शुरु हुआ तो जिधर भी कोई भी ग्रामीण आग लगा हुआ देखते थे, फोन से कमिटी के सदस्य को सूचित करते थे, इसी तरह मोबाईल पर एक से दो, दो से चार करके लोगों से सम्पर्क किया जाता था, फिर हम लोग 50 की टोली बनाकर आग बुझाने निकलते थे। आग बुझाने के लिए भी हम लोगों ने नये प्रयोग किये, गर्मी के दिन में वृक्ष से पत्ते काफी मात्रा मे गिरने के कारण जमीन पर पत्ते कि एक मोटी परत बन जाती है, तो सब से पहले जहां पर आग लगी होती थी, वहां से हम लोग पत्तों के बीच आपसी सम्पर्क को ही काट देते थे और उसके बाद हरी पत्तियों वाली टहनी से आग को दबाते थे।’’ उन्होंने बताया कि ‘‘इस पूरे अभियान को प्रशासन या वन विभाग का कोई भी सहयोग नहीं मिला। कुछ दिनों तक दो सौ रूपये की दर से मजदूर रखकर भी हम लोगों ने आग को बुझाया। 7 मई को हजारीबाग से आग बुझाने वाला सरकारी दस्ता आया भी तो आग की भयंकरता को देख कर भाग खड़ा हुआ लेकिन हम युवा पीछे नहीं हटे और रात के 10-12 बजे तक लग कर भी इस काम को सफल किए।’’ उनलोगों से ये पूछने पर कि पहाड़ पर तो माओवादी भी रहते है, उन्होंने इस तरह के कार्य का विरोध नहीं किया ? उन लोगों का स्पष्ट जवाब था ‘‘ माओवादी सही काम का कभी विरोध नहीं करते हैं।’’

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता हे कि मधुबन व पारसनाथ के मजदूरों व युवाओं का जोश व जज्बा एक वैकल्पिक व्यवस्था की आहट है। जब एक तरफ झारखंड सरकार सारंडा के जंगलों में ‘‘सारंडा एक्शन प्लान’’ के जरिए माओवादियों को भगाने का दावा कर रही है और उसी प्लान के अगले हिस्से के रूप में पारसपाथ एक्शन प्लान तो मधुबन डेवलपमेंट एक्शन प्लान के जरिए विकास की बात कह रही है, जिसमें गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड के 6 पंचायत व डुमरी के 4 पंचायत को इस प्लान में शामिल करने की योजना है, तो सवाल उठता है कि सिर्फ 10 पंचायतों में ही विकास की बात क्यों, सभी गांवों के विकास की बात क्यों नहीं ? मधुबन डेवलपमेंट एक्शन प्लान की बैठक में, 11 अप्रेल 2015 को झारखंड के मुख्य सचिव राजीव गोबा को मजदूर संगठन समिति के द्वारा सौंपा गया 9 सूत्रीय मांगपत्र, इस इलाके की समस्याओं से हमें अवगत कराती है, जिसमें डोली मजदूरों के लिए विश्रामगृह, निःशुल्क दवा-चिकित्सा, न्यूनतम कीमतों पर पौष्टिक भोजन, शुद्ध पेयजल, शौचालय की व्यवस्था, मजदूरों के संतानों की निःशुल्क शिक्षा, मधुबन में स्थित तमाम कोठियों द्वारा मल-मूत्र, कूड़ा-कचरा नाला में ना बहाकर वैज्ञानिक पद्धति से डम्प करने की मांग, कोठियों में कार्यरत मजदूरों को झारखंड सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी, बोनस, इ. पी0 एफ. , पेंशन, आवास आदि की मांग व मधुबन से 10 किलोमीटर की परिधि में पानी, बिजली, सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, तालाब, डैम, शौचालय का निर्माण आदि शामिल है।

एक बात स्पष्ट है कि सिर्फ सी. आर. पी. एफ. कैम्प लगाकर, हेलीपैड बनाकर, सड़क निर्माण कर के ही कोई भी एक्शन प्लान सफल नहीं हो सकता है या कहा जाए तो कोई भी क्षेत्र विकास नहीं कर सकता हैं। विकास का मतलब ही हैं समाज में रह रहे अंतिम लोगों तक उनकी जिन्दगी में बदलाव। इस बात को यहां के ग्रामीण भी समझ रहे हैं। इसका परिणाम भी दिखा, जब सरकार ने मधुबन में स्थित एकमात्र फुटबॉल मैदान का अधिग्रहण हेलीपैड बनाने के लिए करना चाहा तो ग्रामीणों ने एक स्वर में विरोध किया और सरकार को पीछे हटना पड़ा। खैर, मधुबन के आसपास के ग्रामीणों व युवाओं के द्वारा किया जा रहा वैकल्पिक व्यवस्था का प्रयास अभी तो शुरुआती अवस्था में है, इसे तो अभी सरकार, प्रशासन, कोठी प्रबंधकों, जमीन दलालों व ठेकेदारों के व्यापक गठजोड़ से भी निपटना होगा, तभी ये आग में तपकर सोना की तरह निकलेंगे। हालांकि, पहले भी मजदूर संगठन समिति के बढ़ते कदम व मजदूरों के बीच इनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखकर झारखंड सरकार ने माओवादियों के मुखौटा संगठन के रूप में इनका नाम भी अंकित कर लिया था, लेकिन मजदूर संगठन समिति एक पंजीकृत संगठन है इसलिए इस संगठन के केन्द्रिय कमिटि ने सरकार से आवेदन के जरिए भी पूछा है कि ‘‘हमारा संगठन माओवादियों का मुखौटा कैसे है ? एक बात जो मजदूर संगठन समिति के मधुबन शाखा के कोषाध्यक्ष का. द्वारिका राय ने कही, वो बात सरकार के कार्यकलाप को देखते हुए सच प्रतीत होती है ‘‘हर सच बोलनेवाला और इस साम्राज्यवादी विकास के मॉडल के बरखिलाफ आम लोगों के विकास की बात करनेवाला सरकार की नजर में माओवादी ही है।’’

लेखक रूपेश से संपर्क kumar185.rupesh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. 

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