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15.6.20

अर्थ और अनर्थ

पी. के. खुराना

आज हमारा समाज तीन प्रमुख वर्गों में बंट गया है। पहला वर्ग उन अमीरों का है जिनके पास बेतहाशा पैसा है और जो बेतहाशा खर्च कर सकते हैं, दूसरा वर्ग गरीबों और मध्य वर्ग के उन लोगों का है, जो अमीर नहीं हैं, पर अमीर “दिखना” चाहते हैं, और तीसरा वर्ग गरीबों और मध्य वर्ग के उन लोगों का है, जो यह जानते हैं कि वे अमीर नहीं हैं और वे उस स्थिति को स्वीकार कर चुके हैं।

इन तीन वर्गों में इतनी बड़ी खाई है कि उसने पूरा सामाजिक ताना-बाना हिला दिया है। आज सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था ने दिखावे की संस्कृति और उधार की आज़ादी देकर सीधे-सादे शरीफ लोगों को अपराध की ओर धकेलना शुरू कर दिया है। यह स्थिति इतनी भयावह है कि यदि इस ओर तुरंत ध्यान न दिया गया तो यह लाइलाज होकर समाज का कैंसर बन जाएगा।

कुछ वर्ष पूर्व की स्थिति के उदाहरण से बात समझ में आ जाएगी। उदारीकरण के बाद कॉल सेंटर, बीपीओ और केपीओ बूम ने इतनी नौकरियों को जन्म दिया कि ग्रेज्युएशन से भी पहले कालेज कैंपस में ही विद्यार्थियों को ऊंचे वेतन की नौकरियां दी जाने लगीं। जिन बच्चों के पिता दस हज़ार की तनखाह पर रिटायर हो रहे थे, उन्हें पहली नौकरी बारह से पंद्रह हज़ार की मिलने लग गई। कर्मचारियों की महत्ता बढ़ी और कंपनियों के लिए टैलेंट रिटेंशन यानी कर्मचारियों को टिकाये रखना एक प्रोजेक्ट बन गया। नई-नई अमीरी और धन को “संभालने” की शिक्षा के अभाव ने स्टैंडर्ड और दिखावे की एक नई संस्कृति को जन्म दिया।

जहां पहले पूरे परिवार का गुज़ारा दस हज़ार के माहाना वेतन में होता था वहां पंद्रह हजार और आने लगे और ताज़े-ताज़े युवा हुए अमीरों ने इंडियन कॉफी हाउस के बजाए बरिस्ता और कैफे कॉफी डे, हुक्का बार तथा डिस्क की संस्कृति को अपनाया। फिर एक और परिवर्तन आया, एक ही कार्यालय या आसपास के कार्यालयों में काम करने वाले युवक-युवतियों के परिचय बढ़े, संबंध बने और शादी हो गई। यह तो मानो एक क्रांति थी। दस हज़ार से गुज़ारा चलाने वाले परिवार में दो नये कमाऊ सदस्य जुड़ गये और परिवार टाटा-बिरला की तरह सोचने लग गया। नये कपड़े, छुट्टियां, कार, फर्नीचर, बड़ा घर आदि के सपने पूरे होने लग गये। जो पहले विलासिता की वस्तु थी, वह आम हो गई। बैंकों ने कर्ज़ देने के लिए मिन्नतें शुरू कर दीं और क्रेडिट कार्ड डाक से आने लगे। क्रेडिट कार्ड ने “अपना हाथ, जगन्नाथ” की कहावत को एक नई परिभाषा दी और इंप्लसिव शॉपिंग, यानी, आवश्यक-अनावश्यक कुछ भी पसंद आने पर खरीदारी होने लगी। तभी एक और नई खुशी मिली। घर में एक नन्हे मेहमान का पदार्पण हुआ। फिर मुन्ना साहब को सबसे महंगे पब्लिक स्कूल में दाखिला मिल गया। पर तभी किस्मत ने मुंह मोड़ा और कोरोना की आफत आ गई। छंटनी होने लगी। जो रोज़गार में रहे, उनकी तनखाहें घट गईं। बड़ी संख्या में लोग सड़क पर आ गये। क्रेडिट कार्ड की उधारी और परिवार के खर्च ने सारी अकड़ तोड़ दी।

कोरोना का प्रभाव खत्म हो जाने पर भी पुराने दिन फिर कभी नहीं लौटेंगे। कंपनियां टैलेंट रिटेंशन की ओर फिर से ध्यान देंगी तो भी यह चुनिंदा टॉप परफार्मरों तक सीमित रहेगा। इन्क्रीमेंट और प्रमोशन के लिए मारा-मारी होगी। कम स्टाफ से काम चलाने की मजबूरी में प्रेशर बढ़ेगा तो काम के घंटे बढ़ जाएंगे। बड़े शहरों के ट्रैफिक तो कहर ढाता ही है और घर से आफिस और आफिस से घर पहुंचने में इतना समय खपता है कि मियां-बीवी के लिए एक दूसरे की शक्ल देखना भी मुहाल हो जाएगा। पता ही नहीं चलेगा कि कैरिअर के चक्कर में कब परिवार की दूरियां बढ़ीं और एक छत के नीचे रहते हुए भी मियां-बीवी के रास्ते अलग हो गये। फिर एक दिन पता चलेगा कि दब्बू-से दिखने वाले एक सीधे-सादे युवक ने अपनी पत्नी का कत्ल कर दिया है !

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। बड़े शहरों से ऐसी दर्दनाक घटनाओं की आहट आई है, जहां एक सुखी-संपन्न दिखाई देने वाला परिवार अचानक खत्म हो गया है।

समाजशास्त्रियों, मनोचिकित्सकों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसे अपराध उन परिवारों में ज्य़ादा होते हैं जहां पति-पत्नी नौकरी के कारण संयुक्त परिवार से दूर हैं और उनकी सामाजिक गतिविधियां कम हैं। काम के बोझ से दबे पति-पत्नी के बीच संवाद कमतर होता जाता है, कार्यालय का तनाव और पारिवारिक जिम्मेदारियां जीवन को बेहाल करने लगते हैं, ऐसे में पति-पत्नी के बीच कब कोई “वो” आ जाता है, पता ही नहीं चलता। वह “वो” पहले एक सुहानी बयार लगता है पर जब कहीं किसी एक को शक हो जाता है तो यही रिश्ता मृत्यु का कारण बन जाता है।

हमारा समाज विवाहेतर संबंधों को मान्यता नहीं देता। समाज में खुलापन आया है लेकिन विवाहेतर संबंध “अवैध” हैं। पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ी हैं, सहकर्मियों से मिलना-जुलना आम है, इंटरनेट ने सोशल नेटवर्किंग और डेटिंग साइट्स मुहैया करवाई हैं परंतु वैवाहिक जीवन में “वो” कभी सुखद नहीं रहा। इसकी परिणति या तलाक में होती है या यह किसी जघन्य अपराध का कारण बनती है।

अच्छी नौकरियां आसानी से नहीं मिलतीं, उनमें टिके रहना और आगे बढऩा तो और भी कठिन होता जा रहा है। दूसरी तरफ सामाजिक दिखावा भी विवशता है और महंगाई की अपनी भूमिका है। बजट कितने ही ध्यान से बनाओ, किसी न किसी कारण से बिगड़ ही जाता है। समस्या यह है कि सही आर्थिक शिक्षा के अभाव में ज्य़ादा वेतन से भी समस्या का हल नहीं होता क्योंकि वेतन बाद में बढ़ता है, अनुत्पादक खर्चे पहले बढ़ जाते हैं और परिवार कर्ज़ के बोझ तले दबा रह जाता है। कर्ज़ के बोझ तले दबा व्यक्ति अनैतिक साधनों, जुए या लाटरी आदि से पैसे बनाने की तिकड़में लड़ाने लगता है। अक्सर लाटरी और जुए में हार होती है और तनाव और भी बढ़ जाता है। भयभीत मानसिकता वाला व्यक्ति पथभ्रष्ट हो जाता है और अपराध की राह पकड़ लेता है।

इन अपराधों की गइराई में एक कारण छुपा हुआ है जिसकी लगातार अनदेखी की जा रही है। हमारे स्कूलों और कालेजों में हमें “धन के लिए काम करने” की शिक्षा दी जाती है, “धन से काम लेने” की शिक्षा नहीं दी जाती। इसीसे हम अपने आर्थिक साधनों का सही उपयोग नहीं कर पाते और नौकरी चले जाने के डर से तनावभरा जीवन जीते रहते हैं, जिसमें कभी-कभार अगर फिसलन आ जाए तो एक नए अपराध की बुनियाद रखी जाती है। अत: इस समस्या का पहला इलाज यह है कि हम धन के गुलाम बनने के बजाए धन को गुलाम बनाने की कला सीखें और दूसरा इलाज यह है कि परिवारों में संवाद के लिए समय हो, आपसी रिश्ते मजबूत हों ताकि परिवार के विघटन अथवा अपराध की नौबत न आए। “अर्थ” यानी धन को संभालेंगे तो अपराध के अनर्थ से बचे रह सकेंगे। 

 पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं।  

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