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4.2.11

वो इक पल

वो इक पल .................
उस इक पल कि कहानी हे ये ,
नई नहीं पुराणी हे ये ,
उनके अहसास और जज्बात ,
मेरे अल्फाज़ और मेरी ज़ुबानी हे ये....................
वो तेरा बिखराके जुल्फे
हमाम से निकलना,
और यूँ अचानक मेरा बहां चले आना ,
रुखसार पर तेरे चमकता वो कतरा-ऐ- आब ,
शबनम समेटे जेसे कोई खिलता हुआ गुलाब ,
और वो भीगी लटे तेरी चुनरी भिगोती हुई ,
बरसाती हुई घटा हो जेसे ,
दिल मेरा रहता काबू में केसे ,
ना जाने कब ये लव मेरे ,
रुखसार के रूबरू हो गये तेरे ,
वो इक पल ..........
हाँ ,वो इक पल ,
आकर चला गया यूँ अचानक मगर ,
जीने का सहारा दे गया तेरे बगेर ,
वो इक पल ...............
जिन्दा हे आज भी अभी तक
हाँ आज भी अभी तक........................
संगीता मोदी "शमा"

7 comments:

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही खुबसुरत रचना......

PRAGYAN said...

Can I take this poem for our journal. Reach our blog you will have and idea. We publish three issues in a Year. 2500 and more hard copies each.

Dr Om Prakash Pandey said...

bhoole naheen beetee huyee ek chhoti gharee .

निवेदिता श्रीवास्तव said...

अच्छी अभिव्यक्ति ....

mridula pradhan said...

वो इक पल ...............
जिन्दा हे आज भी अभी तक
हाँ आज भी अभी तक........................
bilkul theek....abhi tak....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

भावमयी अभिव्यक्ति

Dr Varsha Singh said...

लाजवाब, सुन्दर लेखनी को आभार...