मेरठ से अपने साथी आशुतोष ने एक मेला में एक तस्वीर के जरिए आज के मार्केट में आफर व छूट व सेल जैसे नारों की चुटकी ली है।
और ये सच है, जब आपको पंद्रह हजार रुपये वाला मोबाइल फोन बस 4000 रुपये में देने की बात की जाय तो यह आफर झूठा सा लगता है लेकिन आज के जमाने में ऐसे सच्चे आफर हमारे आपके सामने है, ये आप पर और हम पर है कि इसे स्वीकारते हैं या नकारते हैं। खैर, आशुतोष ने जिस बंपर आफर की सूचना दी है, उसे आप सभी को जरूर स्वीकार करना चाहिए। आफर इस तरह है...
Nokia celebrates its success in India, Don't miss this oppurtunity!
NOKIA MOBILE PHONE WITH CAMERA ONLY Rs. 4000/- (Worth Rs 15,000/-)
Available in all nokia dealers from today!!
Please inform if any of Ur friends want it.........
SEE THE MODEL
मजा आया न ..
...हा हा हा हा
जय भड़ास
यशवंत
9.2.08
पंद्रह हजार वाला मोबाइल फोन मात्र चार हजार में.....!!!
8.2.08
उपराज्यपाल के भी गाल बजे हैं
मुंबई में अब गुंडाराज आ गया है
सच है एक गुंडा राज आ गया है
सच ही एक गुंडा आज आ गया है
नेता है या गुंडा है
ठाकरे परिवार का मुंडा है
फिर भी मचा रहा दंगा है
मारता टैक्सी टैम्पो वालों को
भगा दो इन सब सालों को
अक्खा मुम्बई हमारा है
क्या काम अब यहां तुम्हारा है
देखो देश को बांट रहा है
सबको अब तो डांट रहा है
खुद बना अंग्रेज़ों का साला है
क्या पीकर आया हाला है
दिल्ली के भी हाल वही हैं
दिल्ली उपराज्यपाल के भी गाल बजे हैं
उनसे भी सुर तो यही निकले हैं
देश की दुर्दशा के सिपहसालार बने हैं
इनमें नही बोध तनिक भी है
मन मानस भी तो कम ही है
तभी हरकतें इनकी निन्दनीय हैं
इनसे सबको बचना होगा
इंसानियत की राह पर चलना होगा
विकास देश का सर्वोत्तम होगा
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अविनाश वाचस्पति
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भडासी गुरु यशवंत के फ़ंडे।
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१.) बिना नानवेज दारू नही।
३.) अकेले दारू पीने से बचते है, कम से कम एक साथी तो हो।
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Ankit Mathur
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सो कॉल्ड शोशल वर्कर ज़रा :-"आशीष ठाकुर से सीखो !"
समाज सेवको अँगुली कटा के महाराणा प्रताप बनने वाले नेताओं, समाज सेवा के समाचारों की पेपर कटिंग लेकर जमाने भर को दिखाने वालो , सरकार को दिन भर गरियाने वालो ,सब कान खोल के सुन लो "आशीष ठाकुर " जबलपुर की शान है.... जो न तो पुरूस्कार न तो सम्मान और न ही सराहना के लिए काम,करते है बस अंतरात्मा की आवाज़ बेसहारा , बे जुबां , बेनाता, देहों को पांच तत्व में मिलाने "शव-दाह" की जिम्मेदारी लेते हें , ६ वर्षों से जारी ये सिलसिला अब तक रूका नहीं सरकार आप आशीष के लिए क्या सोच रहे है...मुझे नही मालूम , लेकिन मेरा मन आशीष की समाज सेवा का मुरीद हों गया है॥
एक पुलिस कर्मी का बेटा मेग्मा कम्पनी का एग्जीक्यूटिव आशीष ने १००० बेसहारा-बेनाता देहों का अन्तिम संस्कार किया लोग समझतें हैं "ये सिर्फ आशीष की ड्यूटी है ...!"
धर्म,वर्ग,भाषा,जाति,प्रांत राज नीति के नाम पे हंगामा करने वालो अब तो चेतो आशीष से सीखो सच्ची समाज सेवा.....
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Girish Billore Mukul
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दारू बाजी के तमाम नुस्खे
दारू कि खासियत ही है यसवंत जी जो पीता है वो तो सत्ता के सारे नज़ारे देखता है यू ही जरा गौर से देखे तो एक ही टेबल पर वामपंथी ,और दछिन्न पंथी साथ बैठे एक बहुरास्ट्रीय कंपनी कि दारू चला रहे है भले टेबल के उस पार मन मी न्युक्लिएर डील चल रही हो इससे फर्क ही क्या पड़ता है देश कि जनता तो सेन्ट्रल है और अगर राज ठाकरे का कॉकटेल हो तो बिहारी और उत्तर प्रदेश के भैये फ्री कि दारू भला छोड़ सकते है ? एक यही तो मोका है जब केशरिया लाल हो जाता है .कामरेड तो कहते ही है कि थोडा रंग क ही तो फर्क है वो भी दारू से धुल जाता है कितना अच्छा लगता है कि सब एक ही रंग में रंगा हुआ खतरा किडनी वाले का हो तो आप भी भाग कर नेपाल चले जाना सब नोर्मल हो जाएगा
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PANKAJ UPADHYAY
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दारूबाजी के फंडे
दारूबाजों के बारे में एक से एक किस्से हैं। मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके गांव में एक दारूबाज है जो महीने भर लगातार दिन रात पीता रहता है, माने की टुन्न रहता है। महीने भर ज्यों बीतता है, वह छोड़ देता है, पूरे एक महीने के लिए। फिर वह बिलकुल नहीं पीता महीने भर। उसके बाद जो महीना आता है उसमें फिर वह दिन रात टल्ली रहता है। जब उसका पीने वाला महीना आता है तो उसके पड़ोस वाले बोल पड़ते हैं--लो, पग्गल तो गया। इसके पीने के दिन शुरू हो गए।
और इन पीने वाले दिनों में पग्गल किसी से कुछ नहीं बोलता। बस, वह नशे में रहता है, चिंतन करता रहता है। खाता है और पीता है और सोता है और चिंतन करता है। बस, और कुछ नहीं करता। इन दिनों में वह न घर का न खेत का न मवेशियों का, कोई काम नहीं करता। घर उसके बाकी परिजन चलाते हैं। वह तो सिर्फ नशे में तपस्या करता रहता है।
भई, इन सज्जन के बारे में जानकर मुझे उत्सुकता हो पड़ी है इनसे मिलने के लिए। हां, ये बुलंदशहर जिले के एक गांव के रहने वाले हैं। अगर किसी टीवी वाले भइया को ठीकठाक ब्रेकिंग न्यूज चाहिए तो वहां चला जाए, उनके पीने वाले दिनों की रिकार्डिंग कर ले फिर बिना पीने वाले महीने की उनकी जिम्मेदार व सक्रिय ज़िंदगी की तस्वीर उतार ले, बस हो गया अजब-गजब और परोस दे ब्रेकिन न्यूज बनाके।
एक अपना मित्र था, कानपुर में। उसका भी एक तगड़ा नियम था। वह पीता तो था लेकिन केवल पहला पैग। आप उसके पहले पैग में या एक बूंद दारू दो और बाकी पानी भर दो या पहले पैग में गिलास में केवल निट दारू भर दो, वो मना नहीं करेगा, पी जायेगा। लेकिन उसके बाद दूसरा पैग किसी हालत में नहीं ले सकता। धरती डोल जायें, चांद-सूरज खिसक जायें, पर भाई दूसरा पैग नहीं लेता तो नहीं लेता। उसका यह फंडा हमने हमेशा देखा, बहुत जिद की दूसरा पैग पिलाने को पर भाई ने नहीं पिया तो नहीं पिया। बाद में हम लोगों ने उसके इस नियम को सराहा और सभी दारूबाजों को इसी नियम पर चलने की सलाह दी। सलाह देने में क्या जाता है। भले सलाह खुद फालो करो न करो। यही तो अपने डेमोक्रेसी में मजा है।
एक मेरे और मित्र हैं। वो या तो नहीं पीते हैं। जब पीते हैं तो एक दो पैग पर नहीं रखते। उनका मानना है कि इतना पी लो कि होश ही न रहे। मतलब, वो कम से कम अद्धा तो खत्म ही कर देते हैं। अगर बेहोशी युक्त नशा न हुआ तो फिर एक क्वाटर मंगा लेते हैं। और, आखिर में वो खाली बोतलों को सिर पर रखकर, अदभुत संतुलन साधते हुए नाचने लगते हैं। एकदम मुक्त और मोक्ष की अवस्था में आ जाते हैं। फिर वो अपने लोकधुनों को गा-गाकर रोते हैं, अपने अतीत के सुंदर जीवन को याद करते हैं और वर्तमान के चूतियापे को गरियाते हैं।
एक अन्य साथी हैं। उनका फंडा ये है कि वो अपने पैसे से न पीने की बात करते हैं। पर उन्हें दो पैग कोई पिला दे तो वो एटीएम कार्ड व नगद सामने रख देते हैं। उसके बाद उनके पैसे से चाहें जितना पियो, वो कतई बुरा नहीं मानेंगे, लेकिन अगर शुरू में ही आपने उनसे कह दिया कि आज जरा पिलाइए, तो भाई ऐसा करारा बहाना बनाकर निकल लेगा कि पूछो मत। लेकिन उन्हें आप खुद ही आफर कर दें और एक क्वाटर के दो पैग पिला दें तो फिर वो अपने पैसे से बोतल मंगा लेंगे।
तो ये दारूबाजों के दारूबाजी संबंधी चार फंडे व चार व्यक्तित्व हैं। अब ये न पूछिये, मेरा वाला फंडा क्या है। वो बाद में बताऊंगा। हां, इतना जरूर बता दूं कि मैं एक तो अच्छा खासा गैप देता हूं, नये साल के पहले दिन से ही। वीकेंड पर मटन-चिकन बनाता हूं तो साथ में एक क्वाटर भी ले आता हूं। बस, एक एक घूंट सिप करते हुए प्याज लहसुन काटते, मांस धोते और पकाते निपटा देता हूं। उसके बाद छककर खाता हूं। सुबह उठकर इतना भयंकर एक्सरसाइज करता हूं कि रात का पिया हुआ गायब हो जाता है। मतलब, ड्रिकिंग विथ नानवेज। और सुबह उठकर साइड इफेक्ट दूर करने के लिए प्राणायाम।
तो ये मेरा वाला मिलाकर पांच फंडे हो गए। अगर आपको भी कोई ऐसा दारूबाज मिला हो जिसका दारूबाजी को लेकर कोई फंडा हो तो जरूर भड़ासियों को बताएं। कम से कम मैं तो चाव से पढूंगा इसे।
डाग्डर साहब को यह पोस्ट बकवास लगे या बिंदास, पर मुझे तो ऐसी गपोड़ी चर्चाएं व बतकही करने में बड़ा मजा आता है। मैं जब भड़ास पर लिखता हूं तो देस, समाज, जिम्मेदारी व नैतिकता को भेज देता हूं तेल लेने के लिए। आनलाइन कोई तो स्पेस ऐसा हो जहां दिल की बात लिखी जा सकती हो, और वो स्पेस भड़ास देता है, मेरा अपना स्पेस.....।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: अनुभव, दारूबाजी, पीना-पिलाना, भड़ास, संस्मरण
परवेज़ सागर जी को मिला बेस्ट क्राइम रिर्पोटर ऑफ दि ईयर अवार्ड़
आप सभी जानते हैं कि हमारे परवेज़ सागर जी को मीड़िया जगत के प्रतिष्ठित नेशनल मीड़िया एक्सीलेन्स अवार्ड़ के लिये नामित किया गया था। आपको जानकर खुशी होगी कि गुरुवार की शाम फिक्की ऑडीटोरिमय मे आयोजित दूसरे मीड़िया एक्सीलेन्स अवार्ड़ फंक्शन मे परवेज़ सागर सर को क्राइम श्रेणी मे बेस्ट रिर्पोटर ऑफ दि ईयर अवार्ड़ से सम्मानित किया गया। ये पुरुस्कार उन्हे केन्द्रीय मंत्री मंगत राम सिंघल और झारखण्ड़ के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की उपस्थिति मे राजस्थान के गृहमंत्री गुलाब चन्द कटियार ने प्रदान किया। इस श्रेणी मे देशभर के 39 टीवी पत्रकारों को नामित किया गया था। ये अवार्ड़ परवेज़ सागर सर को 2007 मे आज तक पर दिखाई गयी ज़हरीली सब्ज़ियों वाली सनसनीखेज़ खंबर के लिये दिया गया। इस ख़बर के प्रसारण के बाद दिल्ली सरकार ने कई लोगों के खिलाफ कार्यवाही की थी। गौरतलब है कि इसी ख़बर के लिये परवेज़ सर को वर्ष 2007 मे ही ईएम बेस्ट रिर्पोटर ऑफ दि ईयर अवार्ड़ से सम्मानित किया जा चुका है। दस वर्षों से पत्रकारिता कर रहे परवेज़ सागर जी इससे पहले भी अपनी कई ख़बरों के लिये सुर्खियों मे बने रहें। जिसमें ताज कॉरिड़ोर, आगरा-अलीगढ के दंगे, मथुरा मे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के रिश्तेदार की ट्रेन से फेंककर हत्या और उत्तर प्रदेश के लखनऊ विकास प्राधिकरण का भूमि आवन्टन घोटाला जैसी कई बड़ी ख़बरें शामिल है। उनकी इस उपलब्धि पर उनके सिखाये गये छात्र ही नही बल्कि उनके साथ काम कर चुके और काम कर रहे सभी लोगों मे गौरव की अनुभूति है। देशभर के सभी पत्रकारों और रंगकर्मीयों की और से परवेज़ सर को हार्दिक बधाई....... हम सभी उनके उज्जवल भविष्य की कामना करतें है।
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Naseem Ahmad
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क्या बोलती तू....??

(आजकल यह तस्वीर मेल के जरिये लोगों के बीच जोरशोर से घूम रही है, मेरे खयाल से कवि कहना चाहता है कि क्या ऐसी खबरें भी ब्रेकिंग न्यूज बन सकती हैं? मेरे खयाल से बिलकुल बन सकती हैं और नहीं भी बन सकती हैं। दोनों के लिए अलग अलग तर्क-कुतर्क दिए जा सकते हैं। आपकी क्या राय है?)
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यशवंत सिंह yashwant singh
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7.2.08
कुत्ते कहीं के....
हर बार जब भी मौका लगेगा मैं तो पीछे नहीं हटूंगा और चीखूंगा ,चिल्लाऊंगा जितना हो सकेगा किचकिच करूंगा । मुझे नहीं पता कि उनका नाम मनेका गांधी है या मेनका गांधी ;पर उनका नाम हमेशा ही कुत्तों से मज़बूती से जुड़ा नजर आता है । आप ये न सोचें कि मुझे उनके नाम पर कोई विरोध है । नाम कुछ भी हो पर उनके काम मुझे हमेशा से अपनी आदिम सोच पर खुद की ही लानत-मलानत करने पर मजबूर करे रहे हैं । ये कभी तो कुत्तों की नसबंदी के प्रोग्राम लेकर आती हैं और कभी दूध पीने वालों को पानी पी-पीकर कोसतीं हैं । उनकी नजरों में अगर कुत्तों की आबादी बढ़ती है तो फिर मानव समाज में उनकी कद्र कम हो जाती है तो फिर इस खोते हुए सम्मान को कुत्तों को वापिस कैसे दिलाया जाये ,ये बात मैडम मनेका(मेनका) की नींद उड़ाए हुई थी फिर अचानक उन्हें यह बोध हुआ कि यदि कुत्ते ’कुत्तों’ की तरह सड़कों पर मारे-मारे फिरेंगे तो कोई उन्हें भला क्यों इज्जत देने चला ? फिर क्या था उन्होंने और पशु कल्याण बोर्ड के गुणीजनों ने मिल कर केन्द्र सरकार को समझ दी कि कुत्तों की इज्जत का सवाल है तो आप मेहरबानी करके कुछ तो करिए वरना हम पूरी दुनिया में कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे और सारी दुनिया के सभ्य देश हमारी तरफ हिक़ारत से देखते हुए कहेंगे कि ये हैं वो आदिम सोच वाले भारतीय(क्षमा करिए,इंडियन्स कहीं के !) जो कि देश आज़ाद होने के साठ साल बाद भी अपने देश में कुत्तों को सम्मान नहीं दिला सके ,थू.... है इनकी प्रगति पर । आनन-फ़ानन में केन्द्र सरकार ने कुत्तों के लिये तमाम कार्यक्रमों की घोषणा कर दी ,परिवार नियोजन का कार्यक्रम भी इनमें से एक है । मुझ अल्पबुद्धि को समझ में नहीं आया कि जनता को कुत्तों के काटने से समस्या होती है या उनके प्रजनन करने से । हो सकता हो कि मैडम मनेका(मेनका) ने कोई रिसर्च करी हो जिससे पता चला हो कि यदि कुत्तों को परिवार नियोजन की उपलब्धि मिल जाती है तो वे मनुष्यों को काटना बंद कर देते हैं । अच्छा भले प्राणियों ,एक बात और जान लीजिए कि मैडम मनेका(मेनका) के शहर दिल्ली में ही आधुनिकतम यंत्रॊ से सुसज्जित कत्लखाना है जो कि पशुओं को काट कर उनके मांस को प्रोसेस यानि कि प्रसंस्क्रत कर के बाहर के मुल्कों को भेजता है । ये साला पशु क्रूरता अधिनियम कैसा है जो मैडम मनेका(मेनका) गांधी को सिर्फ़ कुत्तों को ही पशु महसूस कराता है बकरी आदि को नहीं । दरअसल मुझे लगता है कि अभी पशु कल्याण बोर्ड ने बाकी पशुओं के लिये कोई ऐसी योजनाएं नहीं चलाईं हैं कि जिनसे पशु-प्रेमी एन.जी.ओ. लाभान्वित हो सकें । मैं तो पुनर्जन्म के सिद्धांत में यकीन रखता हूं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि कोई ऐसा पशु न बनाना जिसकी मांसपेशियों का स्वाद मेरे प्यारे भारतवासियों को अच्छा लगता हो ,तो प्रभु जी कुत्ता ही बना देना ताकि मैडम मनेका(मेनका) का प्यार भी मिलता रहे और प्राण भी बचे रहेंगे वरना अगर बकरा-भैंसा बना दिया तो फ़ोकट के लेने के देने पड़ जाएंगे क्योंकि इधर तो भाई जो पशु खाने में स्वादिष्ट नहीं लगता एनिमल वेल्फ़ेयर के सारे नियम उसी का बचाव करते हैं या फिर उनका जिससे मैडम मनेका(मेनका) को लगाव हो या फिर जिनसे उनके एन.जी.ओ. को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं जुड़ी हों..............
जय जय भड़ास
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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महर्षि आपको ये जबलपुर याद कर रहा है
*जबलपुर से चले महर्षि महेश योगी ने पूरी दुनिया को शिक्षा दी * सामयिक विषयों पर उनकी टिप्पणी उनकी तत्परता / त्वरितता की निशानी है।
किन्तु मेरा शहर इनको तब कितना दुलारता था मुझे कम ही मालूम है किन्तु एक बात ज़रूर जानता हूँ.... परसाई का शहर ओशो का शहर प्रेम नाथ और अब ज्ञानरंजन के अलावा आदेश श्रीवास्तव , आभास जोषी , प्राजक्ता शुक्रे आदि का जबलपुर जब तक सिद्ध न किया जाए घास भी नहीं डालता । अब उड़न तश्तरी, महेन्द्र मिश्र ,पंकज स्वामी ,विजय तिवारी,जैसे ब्लागर्स को कोई सुनने को खाली नहीं हें। कमोबेस हर शहर की यही हालत है। मुझे यहाँ की गोलबंद साहित्यकारी उर्फ़ दूकानदारी ने खूब नुकसान पहुंचाने की कोशिश की , जबलपुर की तासीर में चुगली भी रच बस सी गयी है...बावरे-फकीरा को लेकर मुझे कईयों ने हतास करने की कोशिश की उनमें एक हैं "श्री ........." जो पेशे से "........"हैं .....उनको मेरी श्रध्दांजलि ...? उस पर मैं आजिज़ आ गया हूँ "उफ़...ये चुगलखोरियाँ....!! " झूठी-सच्ची सब कह देते हैं जा देखो तब उंगली कर देते हैं क्योंकि ""जंग इश्क और अंगुली करने में सब जायज़ है...?"
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Girish Billore Mukul
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Labels: आदेश, आभास जोशी, जबलपुर, प्रेमनाथ, महर्षि, महेश, योगी, श्रीवास्तव
यूनान, मिस्र, रुमा सब मिट गए......
यूनान, मिस्र, रुमा सब मिट गए जहाँ से।
बाक़ी मगर है अब तक नामों निशाँ हमारा।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान........
तब मैं काफी छोटा था जब दादा कि जुबान से डॉक्टर इकबाल कि यह नज्म सुना करता था। मेरे दादा कोई स्वतंत्रता सेनानी नही थे मगर उनको इस बात का गर्व था कि वह सारी हस्तियाँ मिट गईं जिनको खुद पर नाज था मगर हम फिर भी नही टूटे जबकि हमसे पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे राष्ट्र निकल गए। आज वह होते तो निश्चित तौर पर परेशान हो जाते। आज देश के हालत बदल रहे हैं। शायद हम अपनी आने वाली पीढियों को डॉक्टर इकबाल कि उक्त दो लाइनों का मतलब न समझा पाएं। खुदा येसा दिन न दिखाए। जो चिंगारी कल तक देश कि आर्थिक राजधानी मुम्बई मी थी वह आग कि शक्ल में देल्ही पहुंच चुकी है। ओछी राजनीती कि यह चाल अब कम मानसिकता वाले संवैधानिक गलियारे तक आ गई है। अगर इस पर जल्द ही लगाम न लगाया गया तो यह भयानक रूप ले सकती है। और संभव है कि ab यह कोलकाता, अहमदाबाद, सूरत और उसके बाद लुधियाना तक पहुंच जाये।
यह मुद्दा कोई नया नही खास तुर पर मुम्बई और असाम के लिए। असम में भी बिहार के लोगों पर हमले हो चुके हैं। और हम इससे निपटते आये हैं। लेकिन कहीं न कहीं हम वो जमीन तैयार कर रहे हैं जो हमे अलग थलग कर सकता है। हमारा भी हसर रशिया कि तरह हो सकता है। हमारे सियासतदान भले ही इस बात को हलके में ले रहे हों मगर पाकिस्तान और चीन के हाथ हम एक नई सोच दे रहे हैं।
राज thakre जैसे नेता कि बात केवल मुम्बई के कुछ लोगों तक ही थी मगर देल्ही के up rajypal tejindar pal का यह कहना कि uttar bhart के लोग niyamon का palan नही करते एक नई बहस shuru कर सकता है और यह bahs jarurii bhii है आख़िर यह तय हो जाना चाहिए कि हम bhartiy हैं या बिहारी या marathi.
Abrar ahmad
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अबरार अहमद
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सुन भाई sadho
ये जो आदमी नाम का जीव है न मेरे भाई
सचमुच बड़ा अनोखा है
और चूंकि उसे पहचानना मेरा पेशा भी है और शौक भी
तो मैंने कोशिश की है और नतीजे आप को सुनाता हूँ..............
तो मुलाहिजा फरमाइये साहिबान
यहाँ कुछ लोग दुष्यंत कुमार के चेले हैं,
पूरी जवानी अपनी गुंडई और हरामीपने को
दुष्यंत की कविताओं की आड़ देने वाले ये लोग
साये में धूप को छाती से चिपकाये हुए
सुविधाओं से लैस जीवन के बीच
कभी-कभी दौरा पड़ने पे
व्यवस्था के ख़िलाफ़ वमन करते हैं और सो जाते हैं
यहाँ कुछ extreemist मार्क्स के चेले हैं
उन्होंने खोल रखे हैं NGO
सरकारी दफ्तर में ग्रांट के लिए
बाबू को तेल लगाने के बादजो उर्जा बच जाती है
उसका उपयोग वे रात में बिस्तर पर
अपनी स्वयमसेविकाओं के साथ क्रांति करने में करते हैं
ये क्रांतिकारी लिखते हैं प्रेम की कवितायें
जिनमें होता है अफ़सोस अतृप्त कामनाओं पर
उनमें के एक दारु पीकर बड़ी मासूम सी कसम खाता है
कि उसने अपनी प्रेमिका के साथ
(जो अब किसी और की ब्याहता है) कभी सम्भोग नही किया..
बगल में रहता है एक समाजवादी
जो साम्यवाद और समाजवाद पर रिसर्च कर रहा है
वह बहुत तार्किक है और चीजों के प्रति
निरपेक्ष नजरिया रखता है
उसकी प्रेमिका ने दहेज़ के चलते
उसके सबसे करीबी दोस्त के विवाह कर लिया है
इसे वह चयन की स्वतन्त्रता का मामला बताता है
और भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित है
एक धडा कट्टरपंथियों का है जिनको गान्ही से समस्या है?????
गान्ही बाबा ने उनको पचास साल पीछे धकेल दिया
ऐसा उनका आरोप है
बहरहाल शहर में बाकी सब ठीकठाक है .........
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संदीप कुमार
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दर्शील सफारी-छोरे में है दम
मार्च में होने वाले फिल्म फेयर पुरस्कारों में दर्शील सपारी को साल के सबसे बेहतरीन एक्टर वाली टोली में नामांकन मिलने से बॉलीवुड़ के मठाधीश मारे चिंता के दुबले हुए जा रहे हैं, कि कहीं नाटू दर्शील बादशाद खान पर भारी ना पड़ जाए. जिसने भी फिल्म देखी है, उसका सारे सिक्स पैक एब्स वाले मेट्रोसेक्सुअल नायकों से मोहभंग हो गया है और वो सिर्फ दर्शील नाम की ही बांसुरी पिपिहा रहा है. वैसे तारीफ करनी होगी आमिर खान की पारखी नज़र की, जिसे जमीन के दस फुट अंदर धंसा खजाना बिना पुरातत्व विभाग का चश्मा लगाये ही नजर आ जाता है. खुद की जेब ढ़ीली करने और चिकने-चुपड़े चॉकलेटी होने के बावजूद भी उन्होंने अपनी फिल्म में दर्शील जैसे उदन्त बछड़े को मैदान में उतारने का चिकनगुनिया रूपी जोखिम लिया. वरना तो आजकल के बड़े स्टार घर की फिल्म में किसी दूसरे को साइड रोल देने में कई दिन घर में डिस्कशन करते हैं. रोल देते हैं भी तो पटकथा लेखकों पर दबाव बनाकर उस किरदार को इतना कमजोर करवा देते हैं कि वो बेचारा पूरी फिल्म में बीमार नज़र आता है.तारे जमीन पर बनाकर आमिर ने इस बार खुद को ज्यादा हिम्मती साबित किया बजाय दिल्ली के जंतर-मंतर में नर्मदा बांध के खिलाफ आवाज उठाने के. बिना छरहरी नायिका और बिना कम कपड़ों वाली आइटम गर्ल के आमिर ने इस साधारण सी कहानी को लेकर बहुत संवेदनशील फिल्म बनाई, मायानगरी के गुलजार पार्ट-२ प्रसून जोशी ने अपनी कविता और शंकर-एहसान-लॉय की बाजा पेटी तिकड़ी ने आमिर का बखूबी साथ दिया. वैसे चक दे इंडिया में काम तो शाहरुख ने भी धांसू किया है. कम से कम फिल्म देखने के बाद हमारी हॉकी टीम ने एशिया कप तो जीता और देश में कुछ महीने लोग क्रिकेट बुखार से चंगे होकर के हॉकी बुखार की चपेट में आये. अवार्ड किसी को भी मिले काम दोनों का शानदार था. बच्चे दर्शील को मिलेगा तो इससे उसे तो हौसला मिलेगा ही साथ ही हौसला मिलेगा दूसरे फिल्ममेकर्स को कम से कम देखादेखी ही फिल्में बनाएँगे, हौसला मिलेगा अमोल गुप्ते जैसे तमाम और नई पीढ़ी के पटकथा लेखकों को.
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Arvind Mishra
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*जबलपुर से चले महर्षि महेश योगी ने पूरी दुनिया को शिक्षा दी *
*जबलपुर से चले महर्षि महेश योगी ने पूरी दुनिया को शिक्षा दी *
जबलपुर शहर ने हमेशा ही ऐसे विचारो को जन्म दिया जिन्होंने प्राचीन परम्पराओ और चिंतन शैली को नए आयाम दिए है | जबलपुर शहर से जुड़ा एक नाम है महर्षि महेश योगी जिहोने सारी दुनिया मे धर्म और भावातीत ध्यान की पताका फहराई | महर्षि महेश योगी का जबलपुर शहर से बड़ा करीबी रिश्ता रहा है | जबलपुर शहर के हितकारिणी स्कूल से मैट्रिक तक शिक्षा ग्रहण की और उसके बाद जी.सी.एफ मे नौकरी करने लगे | इस शहर के ज्ञानियो से लेकर सामान्यजन तक की वैचारिक उदारता धार्मिक सहिष्णुता और धार्मिक चिंतन से वे प्रभावित हुए वगैर न रह सके और उनकी धार्मिक रूचि बढ़ती गई और उनकी मुलाकात स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती से हुई और वे अध्यात्म की ओर मुड़ गए | उन्होंने विश्व के १२४ देशो मे भावातीत ध्यान योग ओर धर्म का प्रचार प्रसार किया | विश्व को शान्ति का संदेश देने के उद्देश्य से उन्होंने जबलपुर के करौदी मे (जोकि भारत का केन्द्र बिन्दु है) १५०० एकड़ मे आश्रम का निर्माण कराया है जो दिनोदिन विशाल आकार ले रहा है जिसमे करीब १५०० पंडितो के रहने की व्यवस्था की गई है | यहाँ से गुरु पूणिमा के दिन विश्व के करीब १०० देशो को वैदिक अनुष्ठान का सीधा प्रसारण ग्लोवल सॅटॅलाइट के माध्यम से किया जाता है | जबलपुर शहर की मदनमहल की पहडियो मे पाट बाबा मन्दिर और शोभापुर के ऊपर की पहाडी महर्षि महेश योगी की तपोस्थली रही है | शोभापुर के ऊपर की पहाडी मे स्थित हनुमान जी का मन्दिर है जिसमे उनकी अटूट श्रध्दा थी जहाँ पर उनके कहने के अनुसार कई वर्षो से लगातार सवा मन शुध्ध घी के पुए चढाये जाते है | हालेंड से वे समस्त विश्व मे वेद का प्रचार प्रसार करते रहे | २११ देशो मे भावातीत ध्यान पहुच चुका है और इसे कई देशो के विश्व विदयालयो ने पाठ्यक्रम के रूप मे अपना लिया है | संतुलित जीवन शैली से जुड़ी ध्यान और योग की भारतीय पारम्परिक विधा से समस्त विश्व को परिचित कराने वाले महर्षि महेश योगी का कल रात हालेंड के एक छोटे गाँव क्लोड्राप मे उनका नि;शब्द महाप्रयाण (निधन) हो गया है | आज हमारे बीच महर्षि महेश योगी नही है परन्तु उनके द्वारा स्थापित बीटल्स ग्रुप की संगीत साधना के दौरान जन्मा गीत " हरी ॐ नमः " खगोल विज्ञान मे नए आयाम स्थापित करेगा और अपनी ध्वनी से अन्तरिक्ष को भी गुंजित करता रहेगा | महर्षि महेश योगी के निधन पर शहर जबलपुर के वासियो की और से विनम् श्रध्दांजलि अर्पित है .....शत शत नमन .....|
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समय चक्र
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अल्यूमिनियम मैन का संकल्प
कभी लौह पुरुष के अवतारी माने जाने वाले पूर्व उप-प्रधानमंत्री, यात्रा पुरुष और भाजपा के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी रैलियां स्थगित कर दी है। लोगों को याद होगा कुछेक सप्ताह ही पहले भाजपा के यात्रा पुरुष ने भारत के लोगों के प्रति अपीन निष्ठा जताते हुए कहा था कि आतंकवाद और माओवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
बकौल आडवाणी, सुशासन, विकास और सुऱक्षा उनकी प्रतिबद्धताएं हैं। आतंकवाद से लड़ाई एक नया मुद्दा है। बहरहाल, ऐसे जबरदस्त ५ कॉलमी बयान के बाद यात्रा रद्द कर देना और अपनी ज़बान से मुकर जाना गुस्ताख़ को हजम नहीं हो रहा है। लौहपुरुष तो एल्मुनियम के बने मालूम होते हैं।
गुस्ताख को याद आ रहा है कि ऐसी ही परिस्थितियों में राजीव गांधी ने अपनी सद्भावना यात्रा रद्द नहीं की थी। बेनज़ीर का नज़ीर तो सामने है ही। खासकर, भाजपा के ही एक और कद्दावर नेता ने भी खुद को संकल्प का धनी साबित किया था। मुरली मनोहर जोशी ने आतंकवाद के चरम वक्त में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहरा कर अपनी वकत साबित की थी।
उस वक्त जोशी भाजपी के अध्यक्ष हुआ करते थे और तमाम धमकियों के बावजूद आतंकवादियों के गढ़ में वे तिरंगा फहराने गए थे। आरएसएस ने भी उन्हें श्रीनग न जाने की हिदायत दी थी। आंध्र प्रदेश में उनकी जन सभाओं पर बम से दो हमले हो चुके थे। पंजाब में भी आतंकवाद का दौर चल ही रहा था, लेकिन जोशी ने घुटने नहीं टेके थे.
लेकिन चीख-चीखकर आतंकवाद के खिलाफ बयानबाजी करने वाले आडवाणी के ये तेवर उन्हे कहां ले जाएंगे। क्या आतंकवादियों को ये नहीं लगेगा कि विपक्ष का सबसे मशहूर और मजबूत नेता और प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग उनकी धमकियों से डर गया? क्या इससे आतंकवादियों के हौसले बढ़ नही जाएंगे? लेकिन गुस्ताख क्यो सोचे... इनकी तो आदत रही है घुटने टेकने की, आतंकियों को उनके घर तक सकुशल छोड़ आने की।
राम भला करे।
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Manjit Thakur
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राज ठाकरे की चिंतायें जायज हैं, तरीका गलत है…
“नीम का पत्ता कड़वा है, राज ठाकरे भड़वा है” (सपा की एक सभा में यह कहा गया और इसी के बाद यह सारा नाटक शुरु हुआ) यह नारा मीडिया को दिखाई नहीं दिया, लेकिन अमरसिंह को “मेंढक” कहना और अमिताभ पर शाब्दिक हमला दिखाई दे गया (मीडिया हमेशा इन दोनों शख्सों को हाथोंहाथ लेता रहा है)। अबू आजमी जैसे संदिग्ध चरित्र वाले व्यक्ति द्वारा “मराठी लोगों के खिलाफ़ जेहाद छेड़ा जायेगा, जरूरत पड़ी तो मुजफ़्फ़रपुर से बीस हजार लाठी वाले आदमी लाकर रातोंरात मराठी और यह समस्या खत्म कर दूँगा” एक सभा में दिया गया यह वक्तव्य भी मीडिया को नहीं दिखा। (इसी के जवाब में राज ठाकरे ने तलवार की भाषा की थी), लेकिन मीडिया को दिखाई दिया बड़े-बड़े अक्षरों में “अमिताभ के बंगले पर हमला…” जबकि हकीकत में उस रात अमिताभ के बंगले पर एक कुत्ता भी टांग ऊँची करने नहीं गया था। लेकिन बगैर किसी जिम्मेदारी के बात का बतंगड़ बनाना मीडिया का शगल हो गया है। अमिताभ यदि उत्तरप्रदेश की बात करें तो वह “मातृप्रेम,” “मिट्टी का लाल”, लेकिन यदि राज ठाकरे महाराष्ट्र की बात करें तो वह सांप्रदायिक और संकीर्ण… है ना मजेदार!!! मैं मध्यप्रदेश में रहता हूँ और मुझे मुम्बई से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया, सपा और फ़िर बिहारियों के एक गुट ने इस मामले को जैसा रंग देने की कोशिश की है, वह निंदनीय है। समस्या को बढ़ाने, उसे च्यूइंगम की तरह चबाने और फ़िर वक्त निकल जाने पर थूक देने में मीडिया का कोई सानी नहीं है।
सबसे पहले आते हैं इस बात पर कि “राज ठाकरे ने यह बात क्यों कही?” इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबसे (अर्थात गत बीस वर्षों से) दूसरे प्रदेशों के लोग मुम्बई में आने लगे और वहाँ की जनसंख्या बेकाबू होने लगी तभी से महानगर की सारी मूलभूत जरूरतें (सड़क, पानी, बिजली आदि) प्रभावित होने लगीं, जमीनों के भाव अनाप-शनाप बढ़े जिस पर धनपतियों ने कब्जा कर लिया। यह समस्या तो नागरिक प्रशासन की असफ़लता थी, लेकिन जब मराठी लोगों की नौकरी पर आ पड़ी (आमतौर पर मराठी व्यक्ति शांतिप्रिय और नौकरीपेशा ही होता है) तब उसकी नींद खुली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वक्त के मुताबिक खुद को जल्दी से न ढाल पाने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई स्थानीय मराठी लोगों ने, उत्तरप्रदेश और बिहार से जनसैलाब मुम्बई आता रहा और यहीं का होकर रह गया। तब सबसे पहला सवाल उठता है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से लोग पलायन क्यों करते हैं? इन प्रदेशों से पलायन अधिक संख्या में क्यों होता है दूसरे राज्यों की अपेक्षा? मोटे तौर पर साफ़-साफ़ सभी को दिखाई देता है कि इन राज्यों में अशिक्षा, रोजगार उद्योग की कमी और बढ़ते अपराध मुख्य समस्या है, जिसके कारण आम सीधा-सादा बिहारी यहाँ से पलायन करता है और दूसरे राज्यों में पनाह लेता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से आये हुए लोग बेहद मेहनती और कर्मठ होते हैं (हालांकि यह बात लगभग सभी प्रवासी लोगों के लिये कही जा सकती है, चाहे वह केरल से अरब देशों में जाने वाले हों या महाराष्ट्र से सिलिकॉन वैली में जाने वाले)। ये लोग कम से कम संसाधनों और अभावों में भी मुम्बई में जीवन-यापन करते हैं, लेकिन वे इस बात को जानते हैं कि यदि वे वापस बिहार चले गये तो जो दो रोटी यहाँ मुम्बई में मिल रही है, वहाँ वह भी नहीं मिलेगी। इस सब में दोष किसका है? जाहिर है गत पच्चीस वर्षों में जिन्होंने इस देश और इन दोनो प्रदेशों पर राज्य किया? यानी कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी पार्टियाँ। सवाल उठता है कि मुलायम, मायावती, लालू जैसे संकीर्ण सोच वाले नेताओं को उप्र-बिहार के लोगों ने जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया? क्यों नहीं इन लोगों से जवाब-तलब हुए कि तुम्हारी घटिया नीतियों और लचर प्रशासन की वजह से हमें मुंबई क्यों पलायन करना पड़ता है? क्यों नहीं इन नेताओं का विकल्प तलाशा गया? क्या इसके लिये राज ठाकरे जिम्मेदार हैं? आज उत्तरप्रदेश और बिहार पिछड़े हैं, गरीब हैं, वहाँ विकास नहीं हो रहा तो इसमें किसकी गलती है? क्या कभी यह सोचने की और जिम्मेदारी तय करने की बात की गई? उलटा हो यह रहा है कि इन्हीं अकर्मण्य नेताओं के सम्मेलन मुम्बई में आयोजित हो रहे हैं, उन्हीं की चरण वन्दना की जा रही है जिनके कारण पहले उप्र-बिहार और अब मुम्बई की आज यह हालत हो रही है। उत्तरप्रदेश का स्थापना दिवस मुम्बई में मनाने का तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता? क्या महाराष्ट्र का स्थापना दिवस कभी लखनऊ में मनाया गया है? लेकिन अमरसिंह जैसे धूर्त और संदिग्ध उद्योगपति कुछ भी कर सकते हैं और फ़िर भी मीडिया के लाड़ले (?) बने रह सकते हैं। मुम्बई की एक और बात मराठियों के खिलाफ़ जाती है, वह है भाषा अवरोध न होना। मुम्बई में मराठी जाने बिना कोई भी दूसरे प्रांत का व्यक्ति कितने भी समय रह सकता है, यह स्थिति दक्षिण के शहरों में नहीं है, वहाँ जाने वाले को मजबूरन वहाँ की भाषा, संस्कृति से तालमेल बिठाना पड़ता है।
कुल मिलाकर सारी बात, घटती नौकरियों पर आ टिकती है, महाराष्ट्र के रेल्वे भर्ती बोर्ड का विज्ञापन बिहार के अखबारों में छपवाने की क्या तुक है? एक तो वैसे ही पिछले साठ सालों में से चालीस साल बिहार के ही नेता रेलमंत्री रहे हैं, रेलें बिहारियों की बपौती बन कर रह गई हैं (जैसे अमिताभ सपा की बपौती हैं) मनचाहे फ़्लैग स्टेशन बनवा देना, आरक्षित सीटों पर दादागिरी से बैठ जाना आदि वहाँ मामूली(?) बात समझी जाती है, हालांकि यह बहस का एक अलग विषय है, लेकिन फ़िर भी यह उल्लेखनीय है कि बिहार में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, रेल तो उनके “घर” की ही बात है, लोग भी कर्मठ और मेहनती हैं, फ़िर क्यों इतनी गरीबी है और पलायन की नौबत आती है, समझ नहीं आता? और इतने स्वाभिमानी लोगों के होते हुए बिहार पर राज कौन कर रहा है, शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, तस्लीमुद्दीन, आनन्द मोहन आदि, ऐसा क्यों? एक समय था जब दक्षिण भारत से भी पलायन करके लोग मुम्बई आते थे, लेकिन उधर विकास की ऐसी धारा बही कि अब लोग दक्षिण में बसने को जा रहे हैं, ऐसा बिहार में क्यों नहीं हो सकता?
समस्या को दूसरी तरीके से समझने की कोशिश कीजिये… यहाँ से भारतीय लोग विदेशों में नौकरी करने जाते हैं, वहाँ के स्थानीय लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं, हमारी नौकरियाँ छीनने आये हैं ऐसा मानते हैं। यहाँ से गये हुए भारतीय बरसों वहाँ रहने के बावजूद भारत में पैसा भेजते हैं, वहाँ रहकर मंदिर बनवाते हैं, हिन्दी कार्यक्रम आयोजित करते हैं, स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, जब भी उन पर कोई समस्या आती है वे भारत के नेताओं का मुँह ताकने लगते हैं, जबकि इन्हीं नेताओं के निकम्मेपन और घटिया राजनीति की वजह से लोगों को भारत में उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल सकी थी, यहाँ तक कि जब भारत की क्रिकेट टीम वहाँ खेलने जाती है तो वे जिस देश के नागरिक हैं उस टीम का समर्थन न करके भारत का समर्थन करते हैं, वे लोग वहाँ के जनजीवन में घुलमिल नहीं पाते, वहाँ की संस्कृति को अपनाते नहीं हैं, क्या आपको यह व्यवहार अजीब नहीं लगता? ऐसे में स्थानीय लोग उनके खिलाफ़ हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? हमारे सामने फ़िजी, मलेशिया, जर्मनी आदि कई उदाहरण हैं, जब भी कोई समुदाय अपनी रोजी-रोटी पर कोई संकट आते देखता है तो वह गोलबन्द होने लगता है, यह एक सामान्य मानव स्वभाव है। फ़िर से रह-रहकर सवाल उठता है कि उप्र-बिहार से पलायन होना ही क्यों चाहिये? इतने बड़े-बड़े आंदोलनों का अगुआ रहा बिहार इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करके बिहार को खुशहाल क्यों नहीं बना सकता?
खैर… राज ठाकरे ने हमेशा की तरह “आग” उगली है और कई लोगों को इसमें झुलसाने की कोशिश की है। हालांकि इसे विशुद्ध राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है और जैसा कि तमाम यूपी-बिहार वालों ने अपने लेखों और ब्लॉग के जरिये सामूहिक एकपक्षीय हमला बोला है उसे देखते हुए दूसरा पक्ष सामने रखना आवश्यक था। यह लेख राज ठाकरे की तारीफ़ न समझा जाये, बल्कि यह समस्या का दूसरा पहलू (बल्कि मुख्य पहलू कहना उचित होगा) देखने की कोशिश है। शीघ्र ही पुणे और बंगलोर में हमें नये राज ठाकरे देखने को मिल सकते हैं…
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
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“मैडम जी..कहाँ थी आप?”
“मैडम जी..कहाँ थी आप?”
***राजीव तनेजा***
“अब क्या मुँह लेकर अपना हाल ब्याँ करे ये राजीव?”
“मैँ खुद ही तो तारीफों के पुल बाँधा करता था उनके”…
“हाँ!..उन्हीं के”….
“जिनकी वजह से तो आज मेरा ये हाल है”…
“आज अगर मेरा काम-धन्धा…मेरा घरबार…
सब टूट की कगार पर है तो सिर्फ उन्हीं के कारण”
“दोराहे पे खडा आज मैँ सोच रहा हूँ कि किस ओर जाऊँ?”…
“इस ओर…या फिर उस ओर”…
“जाऊँ तो जाऊँ कहाँ…बता है दिल…कहाँ है मेरी मंज़िल?”
“कौन ऐसा नहीं होगा जो…मेरा मज़ाक…मेरी खिल्ली नहीं उडाएगा?”….
“सब के सब यही कहेंगे कि बडा अपना ‘टीन-टब्बर’ सब उखाड ले गया था पानीपत कि..
अब तो वहीं सैट होना है”…
“वही मेरी कॉशी…वही मेरा मक्का”
“आ गए मज़े?”…
“ले लिए वडेवें?”…
“हर जगह अपनी ही चलाता था”…
“अब पता चला बच्चू को कि मंडी में आलू क्या भाव बिकता है?”जैसे ताने बारम्बार मेरे कानों के पर्दों को बेंध ना डालेंगे?”
“उनका भी क्या कसूर?”
“मैँ खुद ही जो छाती ठोंक बडे-बडॆ दावे करता था कि…
‘मेरी दिल्ली मेरी शान’…
‘दिल्ली पैरिस बन के रहेगी’…
“माँ दा सिरर बन्न के रहेगी”…
“ढेढ साल में तो कुछ हुआ नहीं”….
“अब वैसे भी वक्त ही कितना बचा है मैडम जी के पास?”
“खेल सर पे तैयार खडे हैँ होने को और मैडम जी अभी ‘फ्लाईओवर’ भी पूरे नहीं बनवा पाई हैँ”…
“पिछले ढेढ साल में और अब में कितना फर्क पड गया है?”…
“टट्टू जितना भी नहीं”
“दावे तो लम्बे चौडे कर रही है मैडम जी खुद और उनका लाव लश्कर भी लेकिन …
हालात तो अभी भी जस के तस ही हैँ”…
“वही आँखे मूंद!..बेतरतीब दौडती भीड”….
“वही हमेशा!..दुर्घटनाएँ करती बेलगाम ब्लू लाईन बसें”….
“वही उनकी!..रोज़ाना की अन्धी भागमभाग”…
“वही उनकी!..लफूंडरछाप दादागिरी”…
“कुछ भी तो नहीं बदला है”
“वही सरे आम!..अवाम को ठगते-एंठते ऑटो-टैक्सी वाले”…
“वही केंचुए की चाल!..रेंगता ट्रैफिक”
“वही बिजली के!..लम्बे-लम्बे कट”..
और वही जम्बो जैट के माफिक!..बिजली के तेज़ दौडते मीटर”
“कुछ बदला भी है कहीं?”…
“हाँ!..बदला है अगर कुछ…तो वो है आम आदमी का मायूस चेहरा”…
“हाँ!..मायूस कहना ही सही रहेगा”…
“इनके मायूसियत लिए मासूम चेहरे के पीछे ज़रा ठीक से झांक कर तो देखो मैडम जी”
“कैसे मर-मर जीने की चाह में जिए चले जा रहे हैँ ये”
“लेकिन पराई पीड आप क्या जानो?”…
“आपका क्या है?”..
“कौन सा आपको भाग कर बस या गाडी पकडनी है?”…
“कौन सा आपको बिजली,पानी और मोबाईल के बिल भरने हैँ?”…
“कौन सा आपके मकान,दुकान या फैक्ट्री पे हथोडा बजाया जा रहा है?”
“कौन सा आपकी दुकान या बिल्डिंग को ‘सील’लग रही है?”…
“दिल्ली ‘पैरिस’ बने ना बने लेकिन इतना तो सच है …कि आपके घर ….
ऊप्स!…घर कहाँ हुए करते हैँ आपके?”…
“सॉरी!..घर तो हम जैसे मामूली लोगों के होते हैँ”…
“आप लोग तो बँगलो में रहा करते हैँ”…
“हैँ ना!…?”…
“आपके बँगले बनेंगे…ज़रूर बनेंगे लेकिन हम लोगों की जेबों के दम पर”..
“यही सच है ना?”…
“पैरिस क्या…फ्राँस क्या…और लंदन क्या…
दुनिया के हर देश…हर शहर..हर मोहल्ले की पॉश कालोनियों में बनेंगे”
“और!…वो भी एक से एक टॉप लोकेशन पर”
“हाँ!…हमीं लोगों की जेबों की कीमत पर”मेरा ऊँचा स्वर मायूस हो चला था
“पता नहीं कैसे पाई-पाई जोड कर हमने अपना ये छोटा सा आशियाना बनाया”..
“सालों साल एडियाँ रगड-रगड कर अपना रोज़गार जमाया”…
“जब कुछ खाने कमाने लायक हुए तो मैडम जी कहती हैँ कि…
“चलो!..भागो यहाँ से”…
“टॉट का पैबन्द हो तुम दिल्ली के नाम पर”..
“धब्बा हो दिल्ली की शान में”
“सील कर देंगे हम तुम्हारी ये दुकाने. ..ये फैक्ट्रियाँ”…
“तोड देंगे तुम्हारे ये फ्लैट..ये मकान”…
“नाजायज़ कब्ज़ा जमा रखा है तुमने”…
“अरे!…काहे का नाजायज़ कब्ज़ा?”..
“पूरे गिन के करारे-करारे नोट खर्चा किए थे हमने”
“पता भी है तुम्हें कि कितने सालों से?”…
“क्या-क्या जतन करके…कहाँ-कहाँ अँगूठा टेक के पैसा इकट्ठा कर हमने ये छोटा सा दो कमरों का मकान खरीदा और…
अब आप ये कहने चली हैँ कि ये ग्राम सभा की सरकारी ज़मीन है…या फिर एक्वायर की हुई ज़मीन है”…
“हमें कुछ नहीं पता कि ग्राम सभा क्या होती है और एक्वायर किस बिमारी का नाम है?”
“हमें तो बस इतना पता है कि ये दुकान..ये मकान हमारा है”
“चलो माना कि आप सच ही कह रही होंगी सोलह आने कि ये ग्राम सभा की ज़मीन है…
माने सरकारी ज़मीन लेकिन…
तब आपके मातहत कहाँ गए हुए थे जब पैस ए ले-ले यहाँ खेतों में धडाधड कलोनियाँ बसाई जा रही थी?”
“तब क्यों नहीं रोका था हमें?”
“तब क्यों नहीं अन्दर किए थे कॉलोनाईज़र और प्रापर्टी डीलर?”
“वो भी तो पैसे ले कर इधर-उधर हो गए थे”मैँ खुद से बातेँ करता हुआ बोला
“उस वक्त तो पाँच हज़ार रुपए पर ‘शटर’ के हिसाब से…
नकद गिन के धरवा लिए थे सरकारी बाबुओं ने चिनाई चालू होने से पहले ही कि…
“हाँ!…दल दो हमारे सीने पे दाल”..
“हम पत्थर दिल हैँ”…
“हमें कोई फर्क नहीं पडता”..
“ठीक उनके दफतर के सामने ही तो निकाली थी तीन दुकाने मैंने”…
“कोई रोकने वाला…कोई टोकने वाला नहीं था…
नोटों भरा जूता जो मार चुका था पहले ही” ..
“ये तो बाद में पता चला कि सालों ने पैसे भी डकार लिए और पीठ पीछे कंप्लेंट कर छुरा भी भौँक डाला सीने में”…
“सालों!..को अपनी कुर्सी जो प्यारी थी”
“सो!…बेदाग बचाने को सारी कसरतें की जा रही थी”…
“ऊपर दफतर में खिला-पिला के मेरे केस की फाईल दबवा दी कि कुछ भी हो साल दो साल ऊपर उभरने तक ना देना”…
“बाद में अपने आप निबटता रहेगा खुद ही”..
“वाह!…क्या सही तरीका छांटा है पट्ठों ने”…
“जेब की जेब भरी रही और कुर्सी की कुर्सी बची रही”
“कहने को तो जनता के सेवक हैँ”…
“सेवा करना इनका धर्म है…तनख्वाह मिलती है इन्हें इसकी”..
“अजी छोडो ये सब!…काहे के जनता-जनार्दन के सेवक?”…
“सेवा-पानी तो उल्टे अपनी ये करवाते हैँ हमसे”
“लानत है ऐसे जीवन पर”…
“इनकी सेवा भी करो और इनका पानी भी भरो”
“मैडम जी!…आपका डिपार्टमैंट कहता है कि सिर्फ दिल्ली जल बोर्ड का पानी ही पिएँ”..
“अरे!…पहले ठीक से घर-घर पहुँचाओ तो सही इसे”…
“फिर हम ना पिएँ तो कहना”
“वैसे एक बात बताएँगी आप सच्ची-सच्ची?”
“आपने कभी खुद भी पी के देखा है इसे?”….
“कैसे सडाँध मारता है ना कई बार?”
“है ना?”…
“इसका मटमैला रंग देख तो उबकाई भी आने से मना कर देती है”..
“ठीक है!…माना कि आप सिर्फ और सिर्फ फिल्टरड पानी ही इस्तेमाल करती हैँ….
नहाने के लिए भी और *&ं%$# के लिए भी”…
“किसी से सुना तो ये भी है कि आपके कुत्ते तक भी बिज़लरी के अलावा दूजा सूँघते तक नहीं हैँ”…
“अल्सेशियन जो ठहरे”
“अरे!…हमें उनसे भी गया गुज़रा तो ना बनाएँ आप”
“प्लीज़!..विनती है हमारी आपसे कि…
ढंग से बाल्टी दो बाल्टी पीने का पानी ही म्यस्सर करवा दिया करें”
“तब कहाँ गई थी मैडम जी आप?”
“जब पुलिस वाले बीट आफिसर बारम्बार मोटर साईकिल पे चक्कर काट काट अपना हिस्सा ले जा रहे थे और…
बाद में चौकी इंचार्ज को भेज दिया था कि जाओ तुम भी कर आओ मुँह मीठा”..
“हो जाएगी तुम्हारी भी दाढ गीली”
“आप कहती हैँ कि हमने अवैध कंस्ट्रक्शन की हुई है तो…
आप ये बताएं कि किसने नहीं किया है ये तथाकथित अवैध निर्माण?”
“क्या आप नेताओं के निर्माण दूध के धुले हैँ?”
“कुछ अनैतिक नहीं है उनमें?”
“क्या आपको ज़रूरत हो सकती है अतिरिक्त स्पेस की…हमें नहीं?”
“क्या आपकी ज़रूरतें जायज़ हो सकती हैँ…हमारी नहीं?”
“अच्छा किया जो आपने बुल्डोज़र चला हमारा आशियाँ मटियामेट कर दिया…ध्वस्त कर दिया लेकिन…
क्या आपके अपने अवैध निर्माणों की तरफ आप ही के बुल्डोज़र ने निगाह करना भी गवारा समझा?”
“उचित समझा?”
“नहीं ना!…?…
“किस मुँह से पत्थर फेंकते हो ए राजीव …जब आशियाँ तुम्हारा भी शीशे का है”
“रेत के ढेर पे तुम भी खडे हो और हम भी पडे हैँ”…
“ना तुम सही हो…ना हम ही सही हैँ”
“अरे!..हमारा दिल देखो….हमारा जिगरा देखो”…
“आपने हथोडा बजाया”…
“कोई बात नहीं”…
आपने सील लगाई”…
“कोई बात नहीं”
“लेकिन इतना तो ज़रूर पूछना चाहूँगा आपसे कि…
अगर हमारे यहाँ से हथोडों की धमाधम आवाज़ें हमारे दिल ओ दिमाग को बेंधे जा रही थी तो
कम से कम आपके वहाँ से हथोडी की महीन सी …बारीक सी आवाज़ भी हमें तसल्ली दे जाती कि ..
कानून सबके वास्ते एक है”…
“हम चुपचाप संतोष कर अपने रोते हुए दिल को शांत कर लेते कि…
“कोई छोटा…कोई बडा नहीं है कानून की नज़र में”
“वो सबको एक आँख से देखता है”
“लेकिन अफ्सोस!…जो हुआ…जैसा हुआ…
उस से तो लगता है कि इससे तो अच्छा था कि कानून की एक आँख भी ना ही होती”…
“यूँ भेदभाव तो नहीं कर पाता वो”..
“कहने को हम लोकतंत्र में जी रहे हैँ”..
“अगर ये भ्रम मात्र है हमारा तो प्लीज़…इसे भ्रम ही रहने दें”
“करो ना यूँ ज़मीनोदाज़ हमारे आशियाँ…जवाब तुम्हें ऊपर भी देना है”
“तब कहाँ चली जाती हैँ मैडम जी आप?…
जब चौक पे खडे हो ड्यूटी बजाने के बजाए आपके ट्रैफिक हवलदार झाडियों के पीछे छुप…
पहले तो आम आदमी को कानून तोडने के लिए प्रेरित करते हैँ और फिर…
चालान से सरकारी खजाना भरने से पहले अपनी जेब भरने को बाध्य करते हैँ”…
“ठीक है!…माना कि खर्चे बहुत हैँ सरकार के…कोई सीधे-सीधे दे के राज़ी नहीं है लेकिन…
ये कहाँ का इंसाफ है कि सीधे तरीके से जब घी ना निकले तो सरकार भी अपनी उँगलियाँ टेढी कर ले?”
“चालान तो आपने वही रखा सौ रुपए का ही लेकिन…टैक्स के नाम पर पाँच सौ का फटका अलग से लगा दिया”…
“वाह री शीला!…देख लिया तेरा इंसाफ”
“ज़ोर का झटका…सचमुच बडी ज़ोर से लगा दिया ना?”…
“आप कहती हैँ कि इससे तो गाडे-घोडे वालों को ही फर्क पडेगा…आम आदमी को नहीं”…
“ये तो बताओ मैडम जी कि ये फालतू का खर्चा कहाँ से ओटेंगे वो बेचारे?”
“किराए बढा दिए जाएँगे…आटा…दाल-चावल…कपडा-लत्ता सब मँहगा हो जाएगा”
“कुछ खबर भी है आपको?”
“एक तो पहले से ही बढे हुए कम्पीटीशन से कमाई में कमी…
ऊपर से सीलिंग और मँहगाई की मार”…
“वाह मैडम जी…देखा तेरा पलटवार”
“अरे!…अगर खर्चे ही पूरे करने हैँ तो अपने मातहतों की जेबें…उनके बैंक एकाउंट…
उनके बँगले…उनकी जायदादें आदि…सब खंगाल मारो”…
“गारैंटी है कि उम्मीद से दुगना क्या…चौगुना क्या और सौ गुना भी मिल जाए तो कम होगा”
“क्यों ठिठक के रुक क्यों गयी आप?”…
“अपनों के लपेटे में आने का डर सता रहा होगा?”
“ये कहाँ की भलमनसत है कि उन्हें बक्श..आम आदमी को चौ तरफी मार मारें आप?”
“एक तरफ सीलिंग का डंडा”…
“मँहगाई की मार”.. .
“हर समय घरोंदो के टूटने-बिखरने का सताता डर”
“आप ही के मुँह से सुना है कि आप दिल्ली को इंटरनैशनल लैवल का बनाने जा रही हैँ”…
“आप कहती हैँ कि मैट्रो दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बन रही है लेकिन…
फिर भी आम जनता बसों में बाहर तक लटकी क्योँ नज़र आ रही है?”
“आप कहती हैँ कि मॉल रातोंरात ऊँचे पे ऊँचे हुए जा रहे रहे हैँ लेकिन…
फिर भी छोटे अनाअथोराईज़्ड कॉलोनियों में बाज़ार अभी भी भीड से क्योँ अटे पडे हैँ?…क्योँ भरे पडे हैँ?”..
“आप कहती हैँ कि सडकों की लम्बाई-चौडाई बढ रही है लेकिन…
फिर भी रेहडी-पटरी वाले अभी भी जस के तस सडकों पे कब्ज़ा जमाए क्योँ जमे खडे हैँ?”
“आप कहती हैँ कि फ्लाईओवर बन रहे हैँ ..बनते चले जा रहे है लेकिन…
फिर भी सडको से जाम क्योँ खुलने का नाम नहीं ले रहे हैँ?”
“कहने को…लिखने…बहुत कुछ है बाकी है ए राजीव लेकिन…
बोल बोल के…सोच सोच के थक चुके मेरे विचारों ने…
मेरा साथ छोड नींद का दामन थामने का ऐलान कर दिया है …
सो बाकी की अगली बार उगल देंगे”….
“फिलहाल चलता हूँ….लौट के जल्दी ही मिलता हूँ”…
“जय हिन्द”…
“मेरी दिल्ली मेरी शान”
***राजीव तनेजा***
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राजीव तनेजा
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कौन थे वो लोग?
६ दिसम्बर १९९२ की बात है मैं अपनी छह माह की बच्ची को गोद में लिये बाजार की तरफ़ जा रही थी ,बाजार नज़दीक ही था । अचानक भगदड़ मच गई लोग भागने लगे ,दुकानें बंद होने लगीं ,सामने की सड़क से कुछ २०-२२ लोग हाथों में हाकी ,डंडे और पत्थर लिए दौड़े चले आ रहे थे । हर चीज तोड़ी जा रही थी ,दुकानें बंद करवाई जा रही थीं । सड़क के कोने पर एक ६०-६५ साल का बूढ़ा पपीते बेंच रहा था । मैं अक्सर आते-जाते उस बूढ़े से फल लिया करती थी क्योंकि वह अपने ग्राहको से ही नहीं बल्कि सभी से बहुत प्यार से पेश आता था । उस बूढ़े का जवान बेटा रोड एक्सीडेंट में गुज़र गया था और यह बूढा़ ही घर की विधवा बहू और उसके चार बच्चों का खर्च चलाया करता था । भीड़ में से दो मुस्टंडे आए और आ कर उस बूढ़े की फल की टोकरी को पैरों से कुचल दिए और वह बूढा़ बस क्या भाई...क्या भाई कहता हुआ शायद जानना चाह रहा था कि जो लोग कल तक उसे चाचा कह्ते थे वे आज उसे क्यों सता रहे हैं ? उस भीड़ में से एक आदमी ने उसे खूब गालियां देते हुए पास की किराने की दुकान से एक सोडा वाटर की बोतल उठायी और फ़ोड़ कर उसके पेट में घुसेड़ दी ,दो-तीन वार करने से उस बूढ़े की आंतें बाहर निकल आईं और उसने वहीं जगह पर तड़प कर दम तोड़ दिया । मुझे तो जैसे काठ मार गया था मैं गली के कोने में खड़ी ही रह गई और फिर मुझे नहीं पता कि किसने मुझे और मेरी बच्ची को अपने घर में अंदर कर लिया क्योंकि मेरा दिमाग़ काम करना बंद हो गया था । हर ओर खून ही खून और चीख पुकार मची थी । कर्फ़्यू लगा दिया गया ,बहुत से लोग मारे गए उन दंगों में उस बूढ़े फल वाले की तरह जिन्हे पता ही नहीं था कि उन्हें क्यों मारा जा रहा है ; बाबरी मस्जिद क्या है ? कहां है ? क्या किस्सा है ? लेकिन जो बात मुझे आज तक नहीं पता है वह ये कि वो बूढ़ा हिन्दू था या मुसलमान या कोई और ? उसे मारने वाले कौन थे हिन्दू या मुसलमान ? लेकिन एक सच समझ में आया कि लोग अशिक्षा के कारण ही इतने जाहिल हैं कि वे कुछ लोगों के भड़काने से एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं । ठीक वैसा ही माहौल अभी हाल ही में एक क्षेत्रवादी नेता ने हिन्दी और मराठी भाईयों को लड़वाने के लिये रच दिया था मैं चाह कर भी उन डरावनी यादों को नहीं भूल पाती हूं । आप सबसे हाथ जोड़ कर विनती है कि खूब गुस्सा निकालिए लेकिन अपना ही खून बहा कर नहीं और अगर अपना खून बहाना ही है तो वतन की राह में बहाओ ।
भड़ास ज़िन्दाबाद
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मुनव्वर सुल्ताना Munawwar Sultana منور سلطانہ
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हमार हरामजद्दई माफ़ किए चलैं.....
जय हो प्रभु,मालिक कह कर यशवंत दादा ने एक अजीब सी स्थिति पैदा कर दी है;भाई लोग अपुन कुछ मालिक-बीलिक नईं है और सच तो ये है कि यशवंत दादा भी मालिक नहीं हैं वो तो बस एक ब्लोग के रचयिता हैं बाकी भड़ास तो आप लोगों की खुन्नस ,खीझ और अनियमितता के प्रति उपजी खिसियाहट से सांसे लेती है ,जब कभी हममें से कोई आकर भड़ास पर जम कर किसी सिस्टम की मइयो-बहन कर जाता है तो लगता है कि बी.पी. बढ़ गया है भड़ास का तो फिर ऐसे में दादा को जरूरत पड़ जाती है एक झोलाछाप डाक्टर की तो वो माला हमारे गले आ गयी है । अब बस ये बात हो गयी है कि हमें साफ़-सफ़ाई का अधिकार दे दिया है कि बेटा जरा देखो तो कि कहीं कोई उगालदान में "पौटी" तो नहीं कर गया और अगर कर गया है तो उसे तुम साफ़ करो ,देखो कि किसने कितना वमन करा है ? कहीं एक तो उल्टी करके गले में अटकी चीज से छुटकारा पा जाए लेकिन दूसरा अच्छा भला आदमी उसे देख कर उल्टी करना न शुरू कर दे । हमने पहले ही कहा था कि हम तो ऐसी सोच रखते हैं कि हम अगर उल्टी भी करें तो वो भी किसी के खाने के काम आ जाए । अब मैं यह नहीं कहूंगा कि दादा ने मेरे कंधो पर एक बड़ा भार डाल दिया है जिसे मुझे वहन करने के लिये आपके आशीर्वाद की जरूरत है क्योंकि मैं जानता हूं वह तो मेरे साथ उसी समय से आ गया है जब आपने भड़ास को स्वीकारा । हमारी उगली हुई चीज में उसी चीज का बहुतायत अंश रहता है जो हमने निगला होता है लेकिन जब निगल नहीं पाते तो या तो गले में अटका कर नीलकंठ बन जाते हैं या उगल देते हैं । भड़ासी पैथोलाजी आपकी उल्टी को एनालाईज करके देखती है कि आपने जो उगला है वह क्या है ? कितना है? और क्यों है? कहीं कुछ भीतर तो नहीं रह गया ?तो हम फिर आप को न्योत देते हैं कि कुछ बचा हो तो फिर गले में उंगली डाल कर निकाल दो वरना अगर अन्दर रह गया तो नुक्सान ही करेगा ,पचेगा नहीं । भड़ासियों ने बहुत जहर उगला है लेकिन देखिए कि वह जहर समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए दवा का काम करता है अगर हम उसे सही तरीके से प्रयोग कर पाए तो जैसे नाग का विष भी औषधि के तौर पर काम आ जाता है । हमे उगलते रहना है लगातार ......
मेरे बारे में दादा ने जो लिखा वह सही है कि वे मुझे ज्यादा नहीं जानते लेकिन क्या होगा मेरा नाम , उम्र, वल्दियत या फिर निवास स्थान जान कर मुझे आप सब खूब अच्छी तरह से जानते हैं मेरी कोई मौलिकता नहीं है मैं हूं आपके भीतर के आक्रोश का एक अलग शरीर मात्र बाकी सब वैसा ही है जो आप सबके भीतर कसमसा रहा है ,चटपटा रहा है । इसी कारण मुझे क्या जानना और क्या पहचानना ? लेकिन फिर भी औपचारिकता करनी है तो लीजिए बके देता हूं कि मेरे स्व. पिताजी प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के रहने वाले थे और माता जी इलाहाबाद की रहने वाली हैं ,एम.डी.(आयुर्वेद) तक पढ़ा और "आयुर्वेदीय रसौषधियों का परिरक्षण" विषय पर शोध कर पीएच.डी. किया और आगे पोस्ट डाक्टोरल स्टडी करने की इच्छा थी लेकिन अब नहीं है आगे किताबें चाटने की तमन्ना ;(इससे आप उम्र का तो अंदाज लगा ही लेंगे मैं खुद नहीं बताउंगा क्योंकि मै तो वो सांड हूं जो सींग कटा कर बछड़ों में शामिल है ) , अब क्या ऊंचाई और रंग भी बताऊं क्या ? मुंबानगरी में पहले शिक्षा अटकाए थी अब रोटियां नही जाने देतीं तो सोच लिया है कि यहीं त्रिशूल गाड़े रहते हैं जब तक कोई धूनी में आकर पानी न डाल दे । कविताएं लिखने की सनक भी है जो कि तुकबंदी से अधिक कुछ नहीं होती हैं लेकिन आप को सार्थक लगे तो ये बात अलग है ,पेन्टिंग भी करता हूं (यार लोग, वाल-पेन्टिंग के अलावा भी पेन्टिंग होती है ; न समझ में आए तो एम.एफ़.हुसैन की पेन्टिंग देख लेना समझ जाओगे ) । पत्रकारिता मेरे क्रोमोसोम्स में है तो लगे पड़ा हूं दिल्ली के एक अख़बार का नई मुम्बई ब्यूरो चीफ़ हूं । जय श्री राम कहने से मेरे ऊपर भाजपाई होने का लेबल लग गया तो बता दूं कि भाजपाई नहीं बल्कि चारपाई होना पसंद करूंगा जिस पर मरीज स्वास्थ्य लाभ ले सकें और स्वस्थ जन सो कर सपने देख सकें । दर असल मैं मानता हूं कि मैं एक बायोलोजिकल प्रोग्राम हूं जिसका मेरे पिताजी ने स्टार्ट करने का यह पासवर्ड डाल दिया था लेकिन इसे तो मैनेज किया जा सकता है , समाज सेवा नहीं करता बल्कि जो करता हूं "स्वान्तः सुखाय " करता हूं ,आजकल एक बहन अनीता "हिजड़ों का समाज मे स्थान " विषय पर रिसर्च कर रही है तो उसे मदद कर रहा हूं । शादी करने की हिम्मत नहीं हुई अब तो एक्सपायर डेट के हो गये हैं तो लोगों से कह देते है कि कलाम साहब हमारे रोल माडल हैं । बक बक बक बक..........
अब बस एक बात मीरा जी से कि हम पंच परमेश्वर हैं भड़ास पर तो आप ये कैसे मान बैठीं कि पांच लोग होने चाहिए ? अरे ये तो आप यशवंत दादा से पूछ लेना कि उनका मतलब था punch यानि घूंसा छाप परमेश्वर ;बहन ,हम लोग भड़ास के मंच पर हैं मत भूलिये ,ही ही ही........
मेरी परिभाषा के अनुसार भड़ास शब्द कदाचित भद्र+आस से पैदा हुआ है यानि भद्र जन जो आस रखते हैं उसे भड़ास कहा जाना चाहिए इसलिए भड़ासियो की आस को निराश नहीं करना चाहिए ,तो फिर सारे भाई-भौजाई,बहन-बहनोई लोग लगे रहो........
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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सबसे बड़े हरामजादे प्रोफेशनल और बुद्धिजीवी लोग होते हैं
नेताओं का साफ साफ फंडा है, झूठ बोलेंगे, जीतेंगे, राज करेंगे और फिर जीतने के लिए क्राइम से लेकर समाज सेवा तक समब करेंगे। नौकरशाहों का भी साफ साफ फंडा है। नौकरी बचाने के लिए किसी करवट लोट जाएंगे। किसी के तलवे चाट लेंगे। नौकरी में बने रहेंगे और दीमक की तरह सिस्टम को चाटते रहेंगे। ऐसे ही ढेर सारे लोगों की जन्मकुंडली बनाई जा सकती हैं। लेकिन जब आप प्रोफेशनल लोगों और बुद्धिजीवियों की जन्मकुंडली बनाने पर आयेंगे तो आपकी कलम स्याही खुद ब खुद सुखा देगी, या कलम की निब टूट जायेगी या कलम चलने से इनकार कर देगी। मैं बताता हूं, इसकी वजह क्या है?
दरअसल प्रोफेशनल और बुद्धिजीवी इस देश के सबसे बड़े हरामजादे लोग होते हैं। ये अपनी खोल में जीते हैं। अपनी खोल को बड़ा बनाने के लिए बौद्धिक चिंतन करते हैं। इस बौद्धिक चिंतन में ढेर सारे लोगों को मिशनरी की भांति फांसते हैं और फिर खुद निेता और झंडाबरदार बनकर अपने को एलआईजी से एमआईजी में और फिर एमआईजी से एचआईजी क्लास में ले आते हैं। आखिर में आता है इलीट क्लास, जहां पहुंचने के लिए इन प्रोफेशनलों और बुद्धिजीवियों में होड़ मची रहती हैं। ये अपनी करनी को देश और समाज से इस कदर जोड़े रहते हैं जैसे जोंक खुद को खून चूसने के लिए शरीर के मांस के साथ चिपकाये रहता है। अगर कोई इन्हें यहां से छुड़ाना चाहे तो ये मर जाते हैं, देश के लिए कुर्बानी का वास्ता देकर पर सच्चे अर्थों में ये दरअसल दूसरों को बरगलाये बिना और दूसरों पर निर्भर हुए बिना जी ही नहीं सकते इसलिए अकेले कर दिए जाने पर इनकी खुद ब खुद मौत हो जाती है। मेरी बातें अमूर्त लग सकती हैं पर अगर शुद्ध हिंदी में कहें तो इन भोसड़ीवालों के चलते अपने हिंदी समाज की ये दशा है कि जो हाशिए पर हैं, वे हाशिए पर ही बैठे रहने को अभिशप्त हैं, जो मुख्यधारा में हैं, वो मुख्यधारा के सहयोग से इतने आगे बढ़ जाते हैं कि बाकी समाज इनके लौंड़े पर आ जाता है। और इस काम में बड़ी व बखूबी भूमिका निभाते हैं बुद्धिजीवी व प्रोफेशनल। अगर ये बात भड़ासियों को समझ में नहीं आई तो फिर कभी विस्तार से समझाऊंगा लेकिन एक सलाह जरूर देना चाहूंगा कि प्रोफेशनल व बुद्धिजीवी लोगों से बच के रहना। ये बड़े नखरे करते हैं। ये काम आएंगे तो काम आने के नाम पर आपकी गांड़ मार लेंगे, ये कभी काम न आने की बात नहीं कर सकते क्योंकि ये इतने बड़े झूठे होते हैं कि किसी काम लायक न होने पर भी काम के होने का इतना बड़ा ढोंग रचते हैं कि आप हमेशा इनके चक्कर में पगलाये रहोगे।
चलिए, फिर कभी विस्तार से बतियायेंगे। अगर आपका कोई तर्जुबा हो तो जरूर शेयर करिएगा।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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Labels: प्रोफेशनल, बुद्धिजीवी, भड़ास, यशवंत, राय, विमर्श, सलाह
6.2.08
दिल को छू गयी कविता
हरेप्रकाश उपाध्याय जी, बहुत दिनों बाद कोई कविता इतनी प्यारी लगी कि दिल से कहने को मन हो रहा है कि वाकई, आपने जो लिखा है वो सौ फीसदी सच है। बुरे लोग ही हमेशा काम आए। आपको मेरी तरफ से ढेर सारी बधाइयां। भड़ास तो धन्यवाद, जो इतनी शानदार कविता यहां लगा रखी है, ये वाकई सर्वश्रेष्ठ कविता है।
विनोद सिंह
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कुमार विनोद
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एक उत्तर-भारतीय की भावनाएं
ये तो मालूम था हमको
जो अब कह ही दिया तूने
तो आया सुकूं दिल को
शराफत के उन सारे कहकहों में
शोर था इतना
मेरी आवाज़ ही पहचान में
न आ रही मुझको
बिखेरे क्यों कोई अब
प्यार की खुशबू फिज़ाओं में
बढ़ाओं आग नफ़रत की
स्वप्रेम तिवारी
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swaprem tiwari
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जबलपुर शहर और भाई समीर लाल जी से एक यादगार मुलाकात

जबलपुर शहर और भाई समीर लाल जी से एक यादगार मुलाकात
श्री समीर लाल जी हिन्दी ब्लॉग जगत के जाने माने हस्ताक्षर है जो अपने विचारो और भावनाओ से ब्लॉग जगत मे धूम मचा देते है और नव ब्लागरो के प्रेरणा श्रोत है और हमेशा अपनी अभिव्यक्ति/टिपण्णी से हमेशा नव ब्लागरो को प्रोत्साहित करते रहते है उनके वगैर ब्लॉग जगत सूना-सूना सा लगता है | समीर जी की पोस्ट कुंठा से ग्रंथि तक के बाद हम सभी पाठको को करीब ३ माह तक उनकी रचनाये पढ़ने को नही मिली थी और हम सभी को लग रहा था कि आखिर क्या कारण है भाई समीर जी लिख क्यो नही रहे है | एक दिन आरकुट मे मुझे समीर जी का एक संदेश मिला कि मैं जल्द से जल्द जबलपुर आ रहा हूँ तो मेरे मन मे उनसे मिलने की असीम इच्छा जाग्रत होने लगी | एक दिन मुझसे रहा न गया तो मैंने मोबाइल पर उनसे सम्पर्क स्थापित किया तो उन्होंने जानकारी दी कि वे अभी मुम्बई मे है | फ़िर नेट से जानकारी जानकारी मिलती रहती थी कि समीर जी मुम्बई मे ब्लॉगर मीट मे उपस्थित थे तो कभी पता चलता कि आप मध्यप्रदेश के सीहोर मे कवि सम्मेलन मे रहे फ़िर गंतव्य की ओर रवाना हो गए है परन्तु उनके निश्चित स्थान का मैं कभी भी पता नही कर सका | ऐसा लगने लगा था कि भाई समीर जी भारत भ्रमण के दौरान छापामार तरीके से अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रहे है और अलोप रहकर ब्लॉगर मीट ओर कवि सम्मेलनों मे अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे है | दिनाक २८ जनवरी को भाई समीर जी का फोन आया कि मैं जबलपुर आ गया हूँ और काफी दिनों तक इस शहर मे रहूंगा तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और एक पोस्ट मैंने दे दी कि भाई समीर लाल जी जबलपुर मे है फ़िर क्या था वैसे ही सभी लगातार उनकी तीन माहो से खोज कर रहे थे आखिर समीर जी है कहाँ ? भाई काकेश जी ने कहा कि भाई समीर जी का हम भी स्वागत करते है | ममता जी ने कहा कि अब तो आगमन की पूरी रिपोर्ट की प्रतीक्षा रहेगी । ज्ञान दत्त जी पाण्डेय जी ने कहा…
अच्छा, उड़न तश्तरी का लैण्डिंग प्लेटफार्म है जबलपुर मे बड़ा फार्वर्ड शहर है जी समीर जी के क्या मिजाज हैं? संजय तिवारी जी ने कहा… समीर लाल जी से कहिए थोड़ा लिखें भी. ब्लाग दुनिया से इतनी दूरी क्यों बना रखी है? संजीत त्रिपाठी जी ने कहा… हाय! अब जाकर जान में जान आई,यह पढ़ने से मैनें तो पूरी तैयारी कर ली थी अखबारों में यह इश्तेहार देने की कि "फलां-फलां जैसी दिखने वाली फलां फलां मेक की उड़नतश्तरी एक लंबे समय से गायब है, बताने वाले को ईनाम दिया जाएगा, कृपया आवारा बंजारा के पते पर सूचित करें ;
अविनाश वाचस्पति जी ने कहा…
उड़नतश्तरी उड़ रही लगातार
बिना किये पोस्टों पर विचार
क्यों हो रहा है यह अनाचार
कर रहे सब ब्लागर्स विचार्
अजित वडनेरकर ने कहा… अरे ये पोस्ट आज अचानक क्यों लिखी जा रही है भई। समीर जी तो जबलपुर से ही भोपाल आए थे और भोपाल होते हुए ही जबलपुर गए थे । मेरी मुलाकात करीब एक महिने पहले हुई थी । अलबत्ता घुमक्कड़ी खूब कर रहे हैं । और कुछ अच्छी अच्छी योजनाएं बनाने में लगे हैं । हर्षवर्धन ने कहा…समीरभाई का सादर अभिनंदन है । लेकिन, ये कुंठा से ग्रंथी के आगे भी मामला बढ़ाइए। ये अच्छी बात नहीं है | रविवार की सुबह मैंने आप सभी की भावनाओ से भाई समीर जी को अवगत कराया और उनसे निवेदन भी किया की आप अपनी पोस्ट कुंठा से ग्रंथी के आगे भी मामला बढ़ाइए। शाम को उनकी वापिसी हुई लोटा के शोध के साथ पढ़कर बड़ा ही आनंद आया | अचानक कल रात्रि मे फ़िर से उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात हो गई और थोडी बहुत चर्चा हुई चूकि समीर जी शहर मे पारिवारिक कारणों से अति व्यस्त है और इसीलिए जादा मुलाकात नही हो सकी है परन्तु उन्होंने पुनः मिलने का वादा किया है | समीर भाई के बारे मे मैंने जैसा सुना था वे उससे एक कदम आगे है | स्वस्थ है बड़े मिलनसार,हंसमुख स्वभाव के है और उनका व्यक्तित्व मृदुभाषी सरल स्वभाव का है और हमेशा सभी को नियमित लेखन हेतु प्रोत्साहित करते है इसीलिए वे सबके चहेते बन गए है |
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समय चक्र
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भड़ास का एक और मालिक
भड़ास के वृहदाकार को देखते हुए अब इसके एक के बजाय दो मालिक हो गए हैं। पहला तो भइया मैं खुद ही हूं। अभी जहां भड़ास खड़ा है, वहां तक लाने की पूरी जिम्मेदारी मैंने निभाई है। अब आगे इसकी रफ्तार, गति और दशा-दिशा को तय करने का अधिकार एक और कंधों पर आन पड़ा है। और वे हैं, मुंबई के डा. रुपेश श्रीवास्तव।
जी, डा. रुपेश श्रीवास्तव की भड़ास पर सक्रियता, उनकी भड़ासी प्रतिबद्धता, उनके तेवर, उनकी सोच, उनके व्यक्तित्व को देखते हुए यह निर्णय मैंने खुद किया है। उम्मीद है, सभी भड़ासी साथी डा. रुपेश को इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए बधाई देंगे और उनसे उम्मीद भी करेंगे कि वो भड़ास को असल भड़ासी मंच में तब्दील करने और इसकी सदस्य संख्या को लगातार बढ़ाते रहने, सभी को लिखने देने, बोलने देने का अवसर प्रदान करेंगे।
सभी ब्लागर बंधुओं, सभी पाठकों, सभी दोस्तों, सभी दुश्मनों को यह बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि आज के दौर में जब हर आदमी अपने बगल के आदमी पर भी शक करने लगता है, अपने घर परिवार और दोस्त मित्र पर भी विश्वास नहीं रखता, भड़ास में मैंने बिलकुल नई परंपरा शुरू करते हुए ऐसे साथियों पर भरोसा किया जिनसे मैं कभी मिला भी नहीं हूं। डा. रुपेश को मैं जानता नहीं। उन्हें बस उतना जानता हूं जितना पिछले एक दो हफ्तों में चार पांच मर्तबे फोन पर बात हुई होगी, बाकी उन्हें मैंने भड़ास पर उनके लिखने, उनके कमेंटियाने, उनके टर्राने, उनके हिनहिनाने से ही जाना है।
डा. रुपेश आयुर्वेद के डाक्टर हैं। प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं। अविवाहित हैं। समासेवा को रोग है। झुग्गी झोपड़ियों और अनाथों को सेवा देते रहना उनकी ज़िंद व शगल है। जय श्री राम का अभिवदान करते हैं, मुझे उनके भाजपाई होने का शक है पर उम्मीद करता हूं कि वो किसी वाद की बजाय भड़ासवाद को फैलायेंगे, जिसमें सारे वाद निहित हैं। सबसे बड़ी बात की हम भड़ासी मनुष्यता पर विश्वास करते हैं, सहजता और सरलता को जीते हैं, सो डाग्डर साहब जय श्री राम भले अभिवादन में करते रहें, भड़ास के मंच पर उन्हें तो जय भड़ास ही कहना होगा।
खैर, सीरियस बात को भी मजे मजे में कहना और इसमें भी मसखरी खोज लेना हम भड़ासियों का शगल है सो मैंने उनका परिचय कराते हुए थोड़ी जो चिकोटी काटी है, उम्मीद है डाग्डर साहब माफ करेंगे।
डाग्डर साहब, आपको अपनी जीमेल आईडी का पासवर्ड बांटने की बीमारी है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि जो दवा मैंने आपको दी है, उससे यह रोग आपको अब पकड़ेगा नहीं। अब आप भड़ास डिलीट कर सकते हैं, भड़ास को बढ़ा सकते हैं, भड़ास को संवार सकते हैं, भड़ास को बिगाड़ सकते हैं, भड़ास को सुपरहिट करा सकते हैं.....सारी कुंजी आपके हाथ में दे दी है। आपको भड़ास के एडमिन का अधिकार दे दिया है। उम्मीद है, आप पंच परमेश्वर की कुर्सी पर बैठने के बाद सबको न्याय देंगे। मैं भड़ास चलाते चलाते थक चुका हूं, सो थोड़ा ब्लागिंग से आराम चाहता हूं। आप इसे चलायें, आगे बढ़ायें, मेरा आर्शीवाद आपके साथ है।
आप किसी हालत में अपना पासवर्ड की सज्जन या किसी मेल के जरिये मांग गये पासवर्ड संबंधी स्पैम मेल को न देंगे, ये गारंटी करेंगे। बाकी जो ईश्वर की लीला...हम सब तो निमित्त मात्र हैं।
जय भड़ास
यशवंत
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यशवंत सिंह yashwant singh
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झांको अपनी गिरेहबान में......
आज मेरा मन बेचैन था कि यार, ये क्या मेरे मुल्क को समस्याओं का घुन लगा पड़ा है कौन सा कीटनाशक डालूं कि सारे कीड़े मर जाएं और देश की बगिया में फिर से प्रगति के फूल खिलें और पूरे विश्व में सुगन्ध फैल जाए हमारे देश की । कभी लग रहा था कि बंदूक से सर्जरी करना उचित है कभी लग रहा था कि प्रेम का संदेश फैलाना चाहिए ताकि भाईचारा बढे लेकिन जब भाई ही भाई को चारा बना कर खाए जा रहा हो तो क्या प्रेम का संदेश लोगों की समझ में आएगा ? यही उधेड़-बुन में उलझा पेपर वेट घुमाता बैठा था कि मेरी नव-भड़ासिन मरीज़ा आयी अपना रक्तदाब में सुधार बताने ,उनके हाथ में उर्दू का एक दैनिक अख़बार था । अक्षर-अक्षर जोड़ कर मैं भी उर्दू पढ़ लेता हूं । वे अपना अख़बार मेरे पास ही छोड़ गयीं और बताया कि जबसे भड़ास से जुड़ाव हुआ है तो ऐसा लग रहा है कि मैं एक तितली हूं जो अब तक इल्ली की मानिंद ककून में बंद थी और अब आपकी सलाह से ककून फट गया है और लग रहा है कि नए पंखो को खूब फैला कर हर्फ़ दर हर्फ़,सफ़ा दर सफ़ा उड़ूं .......
मैने उस अख़बार में जो कविता देखी वह किन्ही आलोक भट्टाचार्य जी की लिखी है जो आज के माहौल में औषधीय प्रभाव दिखाती है जबकि हर ओर लोगों को बांटने का काम हमारे राजनेता करे जा रहे हैं । यह कविता हमें टुच्ची,ओछी और क्षुद्र सोच से ऊपर ले जा कर अपने गिरहबान में झांकने को बाध्य करती है । तर्जुमा करने में थोड़ा समय लग गया लेकिन लीजिए आप भी पढ़िए और चाहें तो आलोक भट्टाचार्य जी को खुद के भीतर झांकने की सलाह देने पर जी भर कर कोसिए या फिर सराहिए ;भाई ,हमें तो दिल को छूने वाली रचना लगी तो आप को भी बिना झेलवाए कैसे रह सकता हूं ,लीजिए झेल जाइए दिल मजबूत करके......
बर्बरियत की तारीख पर
सिर्फ़ उनका ही नहीं हमारा भी हक़ है
मंदिर तोड़ने का गुनाह सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं हमें भी हासिल है
हमने भी तोड़े हैं मंदिर जैनियों के,बौद्धों के
और खड़े कर दिए हैं अपने राम-हनुमान
वो धर्म राज्य के कयाम के लिये जेहाद
सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं हमने भी किये हैं
काफ़िरों की गर्दने काटने का सेहरा हमारे सिर भी बंधता है
हमारा ही था वो पोशीदा मित्र शुंग,ब्राह्मण राज के कयाम के लिये जिसने
हजारों बेगुनाह बौद्धों के लहू से काली मिट्टी को कर दिया था भगवा
इक्तेदार के लिए अपनों का खून बहाना सिर्फ़ उनकी ही नहीं
हमारी भी खासियत है
हमारे अशोक ने भी गद्दी हथियाने के लिये अपने ही
निन्यानबे भाइयों का कत्ल कर दिया था
तशद्दुद की म्याऊं बोलने से पहले उसने कितने चूहे हज़म किए
ये तारीख से पूछो
चार शादियों का ऐश सिर्फ़ उन्हीं को नसीब नहीं
हमारे भी श्री राम के पिता राजा दशरथ की थीं तीन बीवियां
और क्रष्ण की थीं सोलह हज़ार एक सौ आठ
और तो और हमारी द्रोपदी पांच शौहर रख लेती थी
पांचो हारे हुए जुआरी और ऐसे बहादुर कि
अजलास में नंगी होने से उसे बचा न पाए
उनका अहमद अगर सरला को भगा ले जाता है
तो उसे तहरीक मिली होगी
हमारे ही प्रथ्वीराज चौहान से जो संयोगिता को उठा ले गया था
करीम लाला और हाजी मस्तान और युसुफ़ पटेल
मिलकर जितनी नही कर पाए
उससे ज्यादा गुंडागर्दी कर गया
अकेला हमारा लाड़ला संजय गांधी
उनके गुंडे तो खेलते रहे छोटी-छोटी गलियों में,चौबारों में
इनके गुरगे विराजमान हो गए इक्तेदार के गलियारों में
देहली दरबारों में
दाउद इब्राहिम जितनी स्मगलिंग करने के बाद
मुल्क छोड़ने पर मजबूर हुआ
उससे कहीं बड़ा घोटाला घर बैठे कर गया
हमारा हर्षद मेहता
उनके अगर थे समदान खान,पीरज़ादा
तो हमारे भी हैं अमर नाइक,अरूण गवली और भाई ठाकुर
वो बाहर से आए समरकंद,बुखारा और काकेसस की पहाड़ियों से
कहते हैं ईरान से आए हैं हम
तभी तो आर्यन कहलाते हैं
जहां से भी आए हम
यहां हमने जिनके घरों पर कब्ज़ा जमाया
उन्हें बेघर करके खदेड़ दिया श्रीलंका,जावा,सुमात्रा,सूरीनाम
सच है कि हर ऐतबार से बड़े हैं हम
उनकी तारीख है सिर्फ़ चौदह सौ साल पुरानी
हमें हजारों सालों के सफ़हात काले करने का फ़ख्र हासिल है
सच है जितना फ़ख्र कर सकते हैं हम
उतना वह चाहे तो भले दुनिया भर में कर लें
यहां नहीं,यहां तो हम ही रहें ;
होंगे वे भी कभी अव्वल शहरी,इस मुल्क के तो आज दोयम हैं
लेकिन जो दोयम होता है ऐसा तो नहीं कि वह होता ही नहीं
वह भी होता है सो वह भी है
दोयम होने की तकलीफ़ उन्हे इसलिए झेलनी पड़ रही है
कि उन्होंने गद्दारी करी है
जिन्ना की सारी फौज़ जब उस तरफ दौड़ी
तब रह गए ये गद्दार इस ओर
इस तरफ मुल्क को तकसीम क्यों किया था
हमारे देशभक्त गांधी ने ,नेहरू ने,उनके जिन्ना ने
उन्होंने न गांधी को सुना न नेहरू को और न जिन्ना को सुना
गद्दारों ने इस तरह रहना चुना
उस गद्दारी की सजा वे झेल रहे हैं लातें खाकर जानें देकर
जाते नहीं उस तरफ कहते हैं कि इनकी चालीस पुश्तें दफन हैं
इस ज़मीन में,अब तो यही हमारी ज़मीन है
यहीं हमारी यादें है यही माजी यही दौरे हाजिर यही मुस्तकबिल
वेदों ने बारह सालों को एक युग कहा है
वे यहां हैं एक हज़ार सालों से,कितने कितने कितने युग?
यहीं पैदा हुए हैं यहीं मरे हैं
गुलाब सींचे हैं यहां ग़ज़ले कहीं
जितनी हमने सही उतनी उन्होंने भी सही
जितना हमने किया उन्होंने भी किया
हमने बनाए अगर अजंता ,एलोरा ,कोणार्क
तो उन्होंने भी बनाए ताज़ महल ,कुतुब मीनार ,चार मीनार
हमने दिये कालीदास ,बाणभट्ट ,रविन्द्रनाथ
तो उन्होंने दिये खुसरो ,ग़ालिब ,फ़िराक़
हमने दिये जयदेव ,कुमार गंधर्व ,भीमसेन जोशी ,हंसराज
तो उन्होंने भी दिये बड़े ग़ुलाम अली ,बिसमिल्ला खान ,डागर बिरादरांन
हमने दिये सहगल ,हेमंत ,मन्ना ,लता
तो उन्होंने दिये रफ़ी ,नूरजहां ,नौशाद
हमने दिये रविन्द्रनाथ ,नन्दलाल ,बसरोमी वर्मा ,अम्रता शेरगिल
तो उन्होंने दिये हुसैन ,आराह ,रज़ा
सच है कि साड़ियां हमारे बनारस की हैं
लेकिन तार बुने हैं उन्होंने
मुरादाबाद हमारे ही मुल्क का है
इसके बर्तन भी हमारे लेकिन उन पर निकाली नक्काशी
उन्हीं की उंगलियों का कमाल है
फ़िरोज़ाबाद की कांच की चूड़ियां हमारी मांओ-बहनों की कलाईयों में खनकती हैं
लेकिन बनती हैं उन्हीं की भट्टियों में
ग़ज़ल गाते होंगे हमारे जगजीत सिंह
ग़ज़ल आई उन्हीं के साथ अरब से ,फ़ारस से
और जहां तक मुल्क की आज़ादी की बात हो या शहादत की तो
हमारे पास तात्या ,लक्ष्मी ,मंगल पांडे ,गांधी ,नेहरू ,सुभाष ,भगत सिंह व
चन्द्रशेखर ,रामप्रसाद के साथ खड़े हैं उनके भी ज़फ़र ,टीपू ,बेग़म हज़रत महल ,
अबुल क़लाम ,अशफ़ाक ,अब्दुल हमीद
यह उनकी खूबी न सही चालाकी ही सही
क्या करोगे इसका कि हमारे खून में मिल गया है उनका लहू
हमारी हवा में घुल गयी है उनकी सांसे
और हमारी ज़मीन में धंस गयी हैं उनकी हड्डियां
हमारी मिट्टी के ढेले बन गये है उनके गोश्त के लोथड़े
उनकी दरगाह में पछाड़ें खातीं हैं हमारी मन्नतें
हमारी होलियों ,दीवालियों में शामिल रहतीं हैं
उनके भी बच्चों की किलकारियां
इसके बावजूद भी हो सकते हैं हम अलग ?
जैसे पांव से होता है पांव अलग.........
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डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava)
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सिंगुर, नंदीग्राम और अब दिनहाटा
सिंगुर, नंदीग्राम और अब दिनहाटा के कारण फिर अशांत हो गया बंगाल। राशन व्यवस्था में गड़बड़ी और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के तहत गड़बड़ी के विरोध में दिनहाटा में आज फारवर्ड ब्लाक के कार्यकर्ताओं ने एसडाओ दफ्तर में तोड़फोड़ की और पुलिस की दो जीपें फूंक दी। अनियंत्रित हो रही भीड़ पर पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमें चार लोग मारे गए। फारवर्ड ब्लाक के बंगाल के सचिव अशोक घोष का कहना है कि उनके पांच कार्यकर्ता मोरे गए हैं। उनका यह भीआरोप है कि पुलिस ने इतनी निर्दयता से फायरिंग की कि मारे गए लोगों को पहचानना भी मुश्किल हो गया। इस घटना ने वाममोर्चा के घटक दल को इतना क्षुब्ध कर दिया कि उसे २४ घंटे का बंगाल बंद अपनी ही सरकार और सहयोगी दल माकपा व पुलिस के खिलाफ बुलाना पड़ा। जिसका तृणमूल, कांग्रेस व एसयूसीआई समेत कई विरोधी दलों ने समर्थन किया है।
वाममोर्चा के ३१ साल के शासन में ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब घटक दल को ही अपनी सरकार के खिलाफ खड़ा होना पड़ रहा है। यह दरार भी सिर्फ एक साल के भीतर पैदा हुआ है। जिसमें गलती माकपा की ही ज्यादा मानते है घटक दल। इनमें सेज के लिए किसानों की जमीन का सिंगुर, नंदीग्राम में अधिग्रहण पर सख्ती का एकतरफा फैसला, रिजवानूर की हत्या में पुलिस की संदिग्ध भमिका, तसलीमा को बंगाल से खदेड़ने व कट्टरपंथियों के आगे झुकने, नंदीग्राम में पुलिस को नरसंहार की छूट और फिर बाद में अपने कैडरों को खुलेआम हिसा की छूट देकर नंदीग्राम में तथाकथित पुनर्दखल जैसे माकपा के नीति-नियामक विमान बोस व उनके सलाहकारों व मंत्रियों समेत मुख्यमंत्री बुद्धदेव के घटक दलों को अंधेरे में रखकर लिए गए इकतरफा फैसले ने घटक दलों इतना अविश्वास पैदी किया कि नसिर्फ घटक दल बल्कि माकपा में आस्था रखने वाले बुद्धिजीवियों से भी माकपा की दूरी बढ़ गई।
मार्च २००७ में नंदीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जाने का विरोध कर रहे भूमि उच्छेद समिति के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने फायरिंग की। पुलिस के बल पर स्थिति को नियंत्रित करने का नतीजा यह हुआ कि पुलिस उसी जनता के खिलाफ हिसक हो गई जिसकी रक्षा के लिए तैनात की जाती है। यह पुलिस नहीं उस शासन और सरकार की गलती होती है जो अपने राजनीतिक हित के लिए पुलिस को अपना लठैत बना देती है। और नतीजा यह कि नंदीग्राम में महिलाओं के साथ खुलेआम बलात्कार हुआ और विरोध कर रहे लोग पुलिस की गोली के शिकार हुए। दुबारा पुलिस की आड़ में नंदीग्राम में सीधे माकपा कैडरों ने उत्पात मचाया। इसे पुनर्दखल का नाम दिया गया। यह इतनी बड़ी सरकारी गंडागर्दी थी कि उच्छेद समिति के लोगों को इलाका छोड़कर भागना पड़ा।सीआरपीएफ बुलानी पड़ी। हाईकोर्ट कोलकाता की कड़ी टिप्पणी के बाद बुध्देव सरकार को पुनर्वास का इंतजाम करना पड़ रहा है। जानबूझकर इस इलाके में पुलिस की भमिका संदिग्ध माने जाने के बावजूद सीआरपीएफ को देर से उतारे जाने की राजनीति की गई। संसद में यह मामला गूंजा। यानी पूरे एक साल भी नहीं बीते और बंगाल लगातार अशात होता रहा और घटक दलों में यह अविश्वास पैदा होता रह का माकपा उनकी अहमियत को मानती हा नहीं है।
अब उसी वाममोर्चा के घटक दल फारवर्ड ब्लाक ने पंचायत चुनाव वाममोर्चा से अलग अकेले लड़ने का फैसला किया। वाममोर्चा में रहकर ही अकेले पंचायत चुनाव के इस फेसले ने माकपा को थोड़ा विचलित भी कर दिया है। इसकी वजह यह है कि गांवों में वाममोर्चा की गहरी पकड़ है और इन्हीं ग्रामीण वोटों की बदौलत माकपा घटक दलों में सबसे मजबूत हैं। पंचायतों पर नियंत्रण रखकर ही बंगाल की सत्ता हासिल हो सकती है यह वाममोर्चा का मूल मंत्र है। अब इसी मूलमंत्र को फारवर्ड ब्लाक ने परे रखकर माकपा को उसकी औकात बताने की ठान ली है। इस बंद का इसी अर्थ में दूरगामी असर भी पड़ने वाला है। इस आलोक में अगर बंगाल बंद देहात इलाकों में सफल हो जाता है तो समझ लीजिए माकपा की खतरे की घंटी बज गई। और वाममोर्चा के भीतर रहकर फारवर्ड ब्लाक माकपा के लिए चुनौती बन जाएगा। देखिए बंगाल बंद क्या गुल खिलाता है ?
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Dr Mandhata Singh
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"अलख निरंजन"
"अलख निरंजन"...
***राजीव तनेजा***
"अलख निरंजन"...
"बोल. ..बम....बम चिक बम"....
"अलख निरंजन....टूट जाएं तेरे सारे बंधन"कह बाबा ने हुँकारा लगाया और इधर-उधर देखने के बाद मेरे साथ वाली खाली सीट पर आ कर बैठ गया"
"पूरी ट्रेन तो खाली पडी है लेकिन नहीं......सबको इसी डिब्बे में आ के मरना है"बाबा के फटेहाल कपड़ों को देखते हुए मैँ बड़बड़ाया
"सालों को!... मेरे पास ही खाली सीट नज़र आती है"...
"कहीं और नहीं बैठ सकता था क्या?"मैँ परे हटता हुआ मन ही मन बोला
"कहाँ जा रहे हो बच्चा?" मेरी तरफ देखते हुए पूछा
"पानीपत..."मेरा अनमना सा संक्षिप्त जवाब था
"डॆली पैसैंजर हो?"
"जी!.."मेरा बात करने का मन नहीं हो रहा था
"जानता जो था कि सब साले!..एक नम्बर के ढोंगी...पाखंडी हैँ"सो!..दूसरी तरह मुँह करके खिडकी से बाहर ताकने लगा
"काम क्या करते हो?"
"रैडीमेड दरवाज़े खिडकियों का काम है"ना चाहते हुए भी मैँने जवाब दिया
"कहाँ इस कबाड के धन्धे में फँसा बैठा है वत्स...?"...
"तेरा चेहरा तो कोई और ही कहानी कह रहा है"मेरी दुखती रग पे हाथ रखने की कोशिश थी ये .....
"तेरे माथे की लकीरें बता रही हैँ कि राज योग लिखा है तेरे भाग्य में"...
"राज करेगा तू!..राज"
"राज करेगा तू!..राज"वाली बात सुन आस-पास बैठे यात्रियों का ध्यान भी बाबा की तरफ हो लिया"
"मैँ मन ही मन हँसा कि सही ड्रामा है पब्लिक को फुद्दू बनाने का"...
"किसी एक को लपेट लो....बाकि अपने आप खिंचे चले आएंगे"
"यहाँ साले!...खाने कमाने को नहीं है और ये राज योग बता रहा है"...
"हुह!..."
"वही पुराने घिसे-पिटे डॉयलाग...कोई नई बात बताओ बाबा!..."मैँ बोला
"पता नहीं कब आएगा ये राजा वाला योग?"मैँ मन ही मन बुदबुदाया
"अपना हाथ तो दिखाओ ज़रा".....
"ये!...ये नहीं...दाँया वाला"
"मैँने भी पता नहीं क्या सोच हाथ आगे बढा दिया"
"तेरे हाथ की रेखाएं बता रही हैँ कि तेरी आयु बडी लंबी है".....
"पूरे!...पूरे सौ साल जिएगा"
"ये तो मालुम है मुझे...
सभी कहते हैँ कि शैतान का नाम लो और हाज़िर"मेरा जवाब था
"हुह!...यहाँ साला मन करता है कि अभी ट्रेन से कूद पडूँ और...ये मुझे लम्बी उम्र का झुनझुना थमाने की जुगत में है"मैँ मन में विचरता हुआ बोला
मेरे चेहरे पे आते-जाते भावों को देख बाबा बोला"परेशान ना हो बच्चा!...जहाँ इतना सब्र किया है वहाँ दो-चार साल और ठण्ड रख"...
"राम जी भली करेंगे"
"चिंता ना कर...तेरा अच्छा समय आने वाला है"
"सही झुनझुना थमा रहे हो बाबा"...
"यहाँ खाने-कमाने को लाले पडे हैँ और आप हो कि दो चार साल बाद का लॉलीपाप थमा रहे हो कि....
ना रुकते बने और ना ही चूसते बने" मुझसे रुका ना गया
"यहाँ चिंता इतनी है कि सीधे चिता की तैयारी चल रही है"...
"प्यासा प्यास से ना मर जाए कहीं इसलिए मुँह में पानी आने का जुगाड बना दिया कि बेटा!..इंतज़ार कर"
"अभी तक अच्छा समय आने का इंतज़ार ही तो कर रहा हूँ और क्या कर रहा हूँ?"मैँ बुदबुदाया
"ना जाने कब आएगा अच्छा समय"मैँने उदास मन से सोचा
"आज ये बाबा कह रहा है कि दो-चार साल इंतज़ार कर...
कल को कोई दूसरा बाबा भी यही डायलाग मार देगा"मैँ बड़बड़ा उठा
"फिर दो-चार साल और सही"
"बस यूँ ही कटते-कटते कट जाएगी ज़िन्दगी"मैँ अन्दर ही अन्दर ठण्डी आह भरता हुआ बोला
मेरी देखादेखी और लोग भी हाथ दिखाने को जुट गए कि "बाबा!.. मेरा देखो....बाबा!..पहले मेरा देखो"....
"देख बाबा देख!...जी भर के देख...आँखे फाड़ फाड के देख"
"सभी को लॉलीपाप चाहिए....थमा दे"...
"तुम्हारे बाप का क्या जाता है"मैँ मुँह फेर आहिस्ता से हँसता हुआ बोला
"शश्श!....टी.टी आ रहा है"जिलानी साहब पर नज़र पड़ते ही मैँने कहा ....
"टी.टी का नाम सुनते ही मजमा लगाई भीड़ कब छंट गई पता भी न चला"
"जिलानी साहब अपने दल बल के साथ आ पहुँचे थे"....
"टिकट?.....टिकट दिखाइए"
"मैँ...?"मेरे साथ बैठा बन्दा सकपका गया
हाँ!...तुम...तुम्हीं से बात कर रहा हूँ"
"सर!...एम.एस.टी".....
"सुपर चढा है?"
"जी!..जी सर".....
"दिखाओ".....
"एक मिनट!...एक मिनट सर"...
"लीजिए सर"....
"हम्म!...यहाँ साईन कौन करेगा?"
"निकालो तीन सौ बीस"....
"सर!..गल्ती से रह गया साईन करना"...
"अभी कर देता हूँ"...
"पहले तीन सौ बीस निकालो!...बाद में करते रहना साईन-शाईन"
"प्लीज़ सर!...इस बार छोड दीजिए...प्लीज़"...
"आईन्दा ध्यान रहेगा"
"देख लो!...इस बार तो छोडॆ देता हूँ"...
"अगली बार अगर सुपर चढा नहीं मिला तो पूरे तीन सौ बीस तैयार रखना"
"जी सर!..."
"बहुत दिन हो गए तुमसे भी इंट्रोडक्शन किए हुए"मेरी तरफ ताकते हुए जिलानी साहब बोले
"जी....जी सर"
"वो!.. मेरे उस काम का क्या हुआ?"जिलानी साहब पलट कर पीछे आते अनुराग से बोले
"जी वो...कैंटीन बन्द थी ना सर छब्बीस जनवरी के चक्कर में"...
"एक...एक दो दिन में ला दूंगा सर"
"ध्यान रखना अपने आप...मेरी आदत नहीं है बार-बार टोकने की"
"जी!....जी सर"
"आपका टिकट?"जिलानी साहब 'मलंग बाबा' की तरफ मुखातिब होते हुए बोले...
कोई जवाब नहीं....
"आपसे पूछ रहा हूँ जनाब!...टिकट दिखाइए"
"हम?..हम बाबा हैँ"..
"फिर?"...
"क्या करूँ?"जिलानी साहब ने तलखी भरे स्वर में कहा
"हम इस मोह-माया के बन्धनों से आज़ाद हैँ...बच्चा...."
"अच्छा?"...जिलानी साहब भी तुक मिलाते हुए बोले...
"ये बेफाल्तू की बातें छोड़ो...सीधे-सीधे टिकट दिखाओ"
"मैँने कहा ना टिकट दिखाइए"जिलानी साहब तेज़ आवाज़ में बोले
"किस से?...किस से टिकट माँग रहे हो बच्चा...?"
"आपसे"...
"जानते नहीं!...हम कौन हैँ?"
"आप जो कोई भी हैँ...मुझे मतलब नहीं ...बस आप!..टिकट दिखाएं"
"फाल्तू बात नहीं"...
"अगर है तो दिखाते क्यों नहीं?"मैँ भी भडक उठा
"नहीं है तो तीन सौ बीस रुपए निकालें"जिलानी साहब रसीद बुक संभालते हुए बोले...
"हाँ टिकट!...टिकट तो नहीं है हमारे पास"...
"कभी लेने की ज़रूरत ही नहीं समझी होगी ना?"मैँ बोल पडा
"किसी ने कभी रोका ही नहीं हमें कभी"...
"आज तो रोक लिया ना?"टी.टी गरम होता हुआ बोला
"आप सीधी तरह से पैसे निकालें....इतना वक्त नहीं है मेरे पास कि हर किसी ऐरे-गैरे के मत्थे लगता फिरूँ"
"वक्त तो बच्चा!..सचमुच तेरे पास नहीं है"बाबा जिलानी साहब के माथे को गौर से देखते हुए शांत स्वर में बोले
"शनि तेरे सर पर मंडरा रहा है...राहू केतु पे सवार चला आ रहा है"...
"जल्दी से उपाय कर ले!..वर्ना पछताएगा"
"जो होगा देखा जाएगा...आप बस जल्दी से पैसे निकालो...मुझे पूरी गाड़ी चैक करनी है"जिलानी साहब की आवाज़ सख्त हो चली थी....
"टी.टी साहब अड़ के खडे हो गए कि इस बाबा से पैसे वसूल कर के ही रहेंगे"
"बहस खतम होने का नाम ही नहीं ले रही थी"
"ना बाबा मानने को तैयार ना जिलानी साहब झुकने को तैयार"
"और आग लगाने को तो मैँ काफी था ही"...
"मज़ा जो आता था इस सब में"
"तमाशा देखने वालों की भीड़ बढती ही जा रही थी"
"एक टिकट में दो-दो मज़े जो मिल रहे थे"...
"सफर का सफर और ....एंटरटेनमैंन्ट की एंटरटेंनमैंन्ट"
"बहस चल ही रही थी कि सोनीपत आ पहुँचा"...
"अगर आप पैसे नहीं देंगे तो मुझे जबरन आपको यहीं उतारना होगा"जिलानी साहब गुस्से से बोले
"तू! ....तू उतारेगा मुझे?"....
"जी!...
जी हाँ!... मैँ उतारुंगा आपको"जिलानी साहब अपनी बैल्ट कसते हुए दृढ आवाज़ में बोले
"सब!...सब हिसाब देना पडेगा तुझे"...
आज तूने मलंग बाबा का अपमान किया है"बाबा की नशेड़ी आँखे गुस्से से लाल हो चुकी थी...
"चला जा चुपचाप यहाँ से...वर्ना घोर अनर्थ हो जाएगा"
"तूने ईश्वर का अपमान किया है..."
"मुझसे टिकट माँगता है ....तेरी औकात ही क्या है?"बाबा गुस्से से थर थर काँपते हुए बोले
"तेरे जैसे छत्तीस मेरे आगे-पीछे घूमते हैँ...हर हमेशा"बाबा आस-पास इकट्ठे हुए मजमें को देखते हुए बोले
"मुझे गुस्सा ना दिला...कहे देता हूँ...वर्ना पछ्ताएगा"
"टिकट और मुझसे?"...
"ये!...ये तू ठीक नहीं कर रहा है"...
"मेरा काम है आप जैसे मुफ्तखोरों को पकड़ना और...मैँ अच्छी तरह से जानता हूँ कि मैँ अपनी ड्यूटी ठीक से बजा रहा हूँ" जिलानी साहब गुस्से से चिल्लाए
"अब देख तमाशा....देख!..कैसे मैँ तुझे श्राप देता हूँ...फिर ना कहना कि बाबा ने पहले चेताया नहीं" कह बाबा ने आवेशित हो अपने झोले में हाथ डाला और....
"जय काली कलकत्ते वाली" का जाप करते हुए पता नहीं क्या मंतर पढा और मुट्ठी को जिलानी साहब के चेहरे पे फूंक दिया
"कुछ राख सी उडी और अपने टी.टी साहब का मुँह धूल से अटा पडा था"
"उतारो साले इस!..पाखंडी बाबा को..."उनका गुस्सा भड़क उठा
"हमको उतार सके ये तुझ में दम नहीं ...तू हमारे से है...हम तुम से नहीं"बाबा गुस्से में भी शायरी करता सा नज़र आया
"तेरी इतनी औकात नहीं कि तू मुझे उतार सके"....
"अच्छा?..."जिलानी साहब उपहास सा उडाते हुए बोले
"देखता हूँ!..मुझे लिए बिना यहाँ से गाडी कैसे हिलती भी है"कहते हुए बाबा गाडी से उतरा और तेज़ी से इजन की तरफ लपका
"वो आगे आगे और मुझ समेत सारी पब्लिक पीछे पीछे"
पब्लिक को तो बस मसाला मिलना चाहिए...भले ही जैसे भी मिले"
"पूरा इंजॉय करती हैँ...सो!...मैँ भी कर रहा था"
"इंजन तक पहुँचते ही बाबा सीधा छलांग लगा ड्राईवर के केबिन में जा घुसा और झोले से वही राख मंत्र पढ फूंकना शुरू हो गया"
"ये क्या?...क्या कर रहा है बेवाकूफ?"....
"निकल बाहर. .."ड्राईवर चिल्लाया
"शश्श....चुप!...एक दम चुप..."बाबा का मंत्र पढ़ना जारी था
"तब तक बाहर भग्तजनों का रेला सा हाथ जोड खड़ा हो चुका था"
"साले!...अंधविश्वासी कहीं के"....
"कुछ नहीं होने वाला है"...
"सब टिकट न लेने से बचने का ड्रामा भर है"मैँ सबको कहता फिर रहा था लेकिन कोई मेरी सुनने को तैयार ही नहीं
"देखते ही देखते उस अधनंगे से मलंग बाबा को पता नहीं क्या सूझा कि सीधा छलांग मार कर बाहर डाईरैक्ट इंजन के सामने खड़ा हो गया
"अब देखता हूँ!...कैसे तनिक सी भी हिलती है गाडी"...
"है हिम्मत!...तो चला गाडी"वो जिलानी साहब को चैलेंज करता हुआ बोला
"तूने बाबा का प्यार देखा है!...क्रोध नहीं"गुस्से से टी.टी की तरफ देखते हुए बाबा बोला....
"ईश्वर से!....ईश्वर के बन्दों से टिकट माँगता है"....
"तुझे इस सब का हिसाब देना होगा"...
"आज ही ...यहीं!....इसी जगह"कह बाबा ने फिर वही राख इंजन की तरफ धौंकनी माफिक फूंकनी शुरू कर दी
"कोई समझाओ यार इसे!....बेमौत मारा जाएगा"टी.टी साहब भीड की तरफ मुखातिब होते हुए बोले
"सब चुप....."...कोई टी.टी की बात पे ध्यान नहीं दे रहा था
"ग्रीन सिग्नल दिखाई नहीं दे रहा क्या?"जिलानी साहब ड्राईवर पर बरसे...
"जी....."
"तो फिर चलाता क्यों नहीं?"
"जी!...ये बाबा..."ड्राईवर ने बात अधूरी छोड़ दी
"बाबा गया तेल लेन...तू गाडी चला"टी.टी की भाषा भी अभद्र हो चली थी
"चढा दे गाडी!..साले पे..."
"लिख देंगे कि आत्महत्या करने चला था"....
"आ गया अपने आप नीचे"...
"हम क्या करें?"....
"चिंता ना कर....गवाही मैँ दूंगा"
"चला गाडी!..."
"साहब!...पता नहीं क्या खराबी आ गई है.....स्टार्ट ही नहीं हो रहा इंजन"
"तो स्साले!...बन्द ही क्यों किया था?"जिलानी साहब भड़कते हुए बोले
"मैँने कहाँ बन्द किया?"...
"तो फिर क्या कोई भूत-प्रेत आकर इसे बन्द कर गया?"
"जी!......ये तो पता नहीं"...
"कई बार कोशिश कर ली लेकिन पता नहीं क्या बिमारी लग गई है साले को"ड्राईवर इंजन को लात मारता हुआ बोला....
"घूं...घूं की आवाज़ सी आती है और फिर ठुस्स...."
"अभी तक तो ठीकठाक अच्छा भला चलता आया है दिल्ली से"ड्राईवर की आवाज़ में असमंजस भरा था ...
"पता नहीं क्या चक्कर है?"
"उधर दूसरी तरफ भीड का बढते हुजूम के साथ साथ बाबा का ड्रामा बढता ही जा रहा था"
"कभी इधर भभूती फूंके.. .कभी उधर"...
"जब ग्रीन सिग्नल होने के बावजूद ट्रेन अपनी जगह से नहीं हिली तो स्टेशन मास्टर साहब दौड़ॆ-दौड़े तुरंत आ पहुँचे"...
"अरे!...चला ना इसे"....
"चलाता क्यों नहीं इसे?"...
"कब से ग्रीन सिग्नल हुआ पडा है....दिखाई नहीं दे रहा है क्या?"...
"अपनी तो तुझे चिंता है नहीं....मेरी भी नौकरी खतरे में डलवाएगा?"
"पीछे शताब्दी आ रही है....निकाल इसे फटाफट"...
"अपने बस का नहीं है....आप खुद ही कोशिश कर लो"ड्राईवर तैश में गाडी से उतरता हुआ बोला
"आखिर!..हुआ क्या है इसे?"
"पता नहीं....अपने आप इंजन बन्द हो गया"...
"देख !...कोई वायरिंग-शायरिंग ना हिल गई हो"स्टेशन मास्टर की आवाज़ नरम पड़ चुकी थी
"सब देख लिया साहब...कहीं कोई खराबी नहीं दिख रही"ड्राईवर का वही रटा रटाया सा जवाब ...
"इतने में खबर पूरे सोनीपत स्टेशन पर फैल गई और 'बाबा की जय'... 'बाबा की जय' के नारे लगाते लोग उसी प्लैटफार्म पर इकट्ठा होने शुरू हो गए"
"इस!....हाँ इस. .. बाबा ने केबिन के अन्दर आ कर कुछ फूंका और इंजन अपने आप बन्द हो गया"ड्राईवर बाबा की तरफ इशारा करता हुआ बोला...
"आखिर चक्कर क्या है?"....
"पता नहीं साहब"
"किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा है"
"सब इसी टी.टी का किया धरा है"....
"ना ये टिकट मांगता और ना ही ये लफडा होता"एक बोल पडा
"तो क्या!..अपनी ड्यूटी करना छोड़ दे?" मैँ भडक उठा
"तो अब करवा ले ना आराम से ड्यूटी"...
"हुह!..बड़ा तरफदारी करने चला है "वो चिल्लाया
"उफ!...यहाँ साली पहले से ही ट्रेन सवा दो घंटे लेट है...ऊपर से ये ड्रामा"....
"पता नहीं!...कब चण्डीगढ पहुँचेगी?"एक सरदार जी परेशान हो घड़ी देखते हुए बोले
"कोर्ट में तारीख है आज की"...
"नहीं पहुँचा टाईम पे तो समझो प्लाट गया हाथ से"वो रुआँसे हो बोले
"बड़ा पहुँचा हुआ महात्मा है"एक बोला...
"एक झटके में ही ट्रेन रोक दी....कमाल है"दूसरे ने हाँ में हाँ मिलाई
"अरे!..महात्मा नहीं ....अवतार कहो...अवतार"किसी तीसरे की आवाज़ सुनाई दी
"कोई पहुँचा हुआ फकीर मालुम होता है"एक और चहक उठा
"अगर ऐसा है...तो टिकट नहीं ले सकता था क्या?"मैँ फिर बोल पड़ा
"चुप हो जा एकदम से. .."परेशान सरदार जी मुझे गुस्से से घूरते हुए बोले
"स्साले!... इतना ठुकेगा कि ज़िन्दगी भर याद रखेगा"
"एक पंगा खत्म होने को नहीं है और तू दूसरे की तैयारी किए बैठा है"
"सबको अपने खिलाफ देख ...मन मसोस कर मुझे चुप हो जाना पड़ा"
"जब तक टी.टी मॉफी नहीं मांगेगा तब तक ये बाबा गाडी नहीं चलने देगा"एक आवाज़ सुनाई दी
"सही है...बडा अडियल बाबा है"
"अपने टी.टी साहब भी कौन सा कम हैँ?...एक बार अड़ गए सो अड़ गए"मेरा इतना कहना था कि सबकी गुस्से भरी आँखे मुझे तरेरने लगी
"एक काम करो...तुम ही मॉफी मांग लो यार"स्टेशन मास्टर टी.टी की तरफ देखते हुए बोले
"मैँ?...मैँ क्यों?...मैँ तो अपनी ड्यूटी कर रहा था"
"तू साल्ले!... अपनी ड्यूटी कर रहा है और उधर हमारी माँ-बहन एक हुई पडी है"सरदार जी अपना आपा खोते हुए बोले
"अरे यार!...देख तो लिया करो कम से कम कि किस से पंगा लेना है और किस से नहीं"...
"ये क्या कि गधे-घोडे सभी एक ही फीते से नाप दो?"स्टेशन मास्टर साहब बोले
"देख नहीं रहे कि सब कितने परेशान हो रहे हैँ?"
"आखिर!...क्या गलत किया है मैँने?"जिलानी साहब तैश में बोले...
"अरे बाबा!...कुछ गलत नहीं किया...बस खुश?"टी.टी की बात काटते हुए स्टेशन मास्टर साहब बोले...
"अब किसी भी तरह से चलता करो इस मुसीबत को"स्टेशन मास्टर की आवाज़ में मिमियाहट थी
"कैसे?"...
"जो मर्ज़ी....जैसे मर्ज़ी करो लेकिन ये गाडी यहाँ से निकल जानी चाहिए अभी के अभी"...
"वर्ना!..समझ लो अपने साथ साथ कईयों की नौकरी ले बैठोगे"स्टेशन मास्टर साहब गुस्से से बोले
"समझा कर!...
समझा कर यार!...अगले महीने रिटायर हो रहा हूँ"....
"कोई पंगा नहीं चाहिए मुझे"....
"इंक्वायरी बैठ गई तो समझो लटक गया..मेरा फण्ड ...मेरी पैंन्शन...."स्टेशन मास्टर साहब सहमे सहमे से बोले
"पता नहीं कैसे मैनैज करूँगा सब"
"बेटी के हाथ पीले करने हैँ"....
"डेट फाईनल हो चुकी है"...
"कार्ड तक बंट चुके है"...
"अपनी अड़ी के चक्कर में मेरा जलूस ना निकलवा देना....प्लीज़"एक बेटी के बाप की गिड़गिड़ाती हुई आवाज़ थी ये
"अच्छा!...आप ही बताइए...क्या करूँ मैँ?"...
"पांव पडूँ क्या उसके?"
"हाँ!...हाँ ये ठीक रहेगा"कोई बोल पड़ा
"मना लो यार!..किसी भी तरीके से"....
"बस समझ लो कि वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है"स्टेशन मास्टर साहब गिडगिडाए....
"सही कह रहे थे अपने स्टेशन मास्टर साहब...वो भी तो गधे को बाप ही बना रहे थे"...मैँ मन ही मन हँसा
"ना चाहते हुए भी जिलानी साहब को बाबा से माफी माँगनी पडी"....
"अब मुझे क्या पता था कि ऐसा होगा"...
"अब तो मैँ क्या मेरे बाप की तौबा जो आईन्दा कभी किसी साधू या मलंग के मत्थे भी लगा"जिलानी साहब खुद से ही बातें करते हुए आगे निकल गए
"मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो मैँ नाहक पंगा मोल लेता फिरूं"उनका बड़बड़ाना जारी था
"माफी मांगने से बाबा का गुस्सा शांत हो चुका था"....
"कुछ मंत्र से बुदबुदाते हुए उन्होंने अपंने थैले से निकाल फिर कुछ इंजन की तरफ फूंक दिया"
"हाँ...तो भइय्या ड्राईवर!...अब तुम खुशी से ले जा सकते हो अपना छकडा लेकिन...मुझे ले जाना नहीं भूलना".....
"हा...हा...हा....मुझ समेत सभी की हँसी छूट गई"
"ड्राईवर ने खटका दबाया और कमाल ये कि बिना कोई ना नुकुर किए इंजन एक ही झटके में स्टार्ट"
"अवाक से सबके मुँह खुले के खुले रह गए"
"हर कोई हक्का-बक्का...."
"आश्चर्य मिश्रित भाव सभी के चेहरे पे तैर रहे थे"
"बाबा की जय हो....मलंग बाबा की जय हो"इन आवाज़ों से पूरा माहौल गूंज उठा
"आँखे देख रही थी....कान सुन रहे थे लेकिन दिमाग को मानो विश्वास ही नहीं हो रहा था"....
"और होता भी कैसे?"....
"कोई विश्वास करने लायक बात हो...तब तो..."
"लेकिन आँखों देखी को कैसे झुठला दे ये राजीव?"...
"असमंजस भरी सोच में डूबा मैँ चुपचाप अपनी सीट पे आ गया"
"कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब हुआ तो कैसे हुआ"...
"सारे तर्क-वितर्क फेल होते नज़र आ रहे थे"....
"ये जादू-शादू कुछ नहीं होता है".....
"सब हाथ की सफाई....आँखों का धोखा है... जैसी बचपन में सीखी बातें मुझे बेमानी सी लगने लगी थी"
"कहीं हिप्नोटाईज़ ना कर दिया हो बाबा ने?"....
"पूरी पब्लिक को?"....
"शायद!...."....
"मैँ खुद ही सवाल पूछ रहा था और खुद ही जवाब दे रहा था"
"शायद...कोई सुपर नैचुरल पावर हो बाबा के पास".. .
"या कहीं सचमुच में कोई देवता....कोई अवतार तो नहीं है ये बाबा?"....
"इन जैसे सैंकड़ो सवाल बिना किसी वाजिब जवाब के मेरे दिमाग के भंवर में गोते लगाने लगे थे"....
"ये सारा चक्कर मुझे घन चक्कर किए जा रहा था"....
"इतनी शक्ति... इतनी पावर....एक आम इनसान में?"...
"हो ही नहीं सकता"...
"क्या आज भी इतनी ताकत...इतना दम है मंत्रोचार में?"
"कभी सोचा ना था"....
"ऐसे किस्से तो ' मानो या न मानो' सरीखे टीवी सीरियलों में ही देखे थे आज से पहले"....
"सब फ्राड है.... ..सब धोखा है"दिमाग मुझे इस सारे वाक्ये पे विश्वास करने से मना कर रहा था"....
"लेकिन अगर सब फ्राड....सब धोखा है....छलावा मात्र है तो यकीनन बाबा की दाद देनी होगी कि....
कैसे उन्होंने सबकी आँखे फाड़ती नज़रों के सामने खुली आँखों से काजल चुरा लिया"
"ज़रूर कुछ ना कुछ चमत्कार...कुछ ना कुछ कशिश तो है ही बाबा में"मन बाबा की तारीफ करने लगा था...
"मैँ हक्का-बक्का सा बाबा को ही टुकुर-टुकुर निहारे चला जा रहा था".....
"उनके चेहरे पे तेजस्वी ओज सा चमकने लगा था"
"उफ!...मैँ नादान समझ नहीं पाया उनको"....
"अनजाने में भूल से पता नहीं कैसा-कैसा मज़ाक उडाता रहा"
"अब अपने किए पे पछतावा होने लगा था मुझे"
"ये ज़बान कट के क्यों ना गिर गई उनके बारे में अपशब्द कहने से पहले?"
"बाबा...मुझ अज्ञानी...मुझ पापी को क्षमा कर दो....मॉफ कर दो"...
मैँ नास्तिक आपको पहचान नहीं पाया"कहते हुए मैँने बाबा के पांव पकड़ लिए
"आँखों से कब अविरल आसुंओ की धार बह चली ...पता भी न चला"
"मेरे चेहरे पे पश्चाताप के आँसू देख बाबा ने उठ मुझे गले से लगा लिया"
"कोई बात नहीं बच्चा".....
"बाबा की जय....बाबा की जय हो"इन आवाज़ों में मेरी आवाज़ भी शामिल हो चुकी थी"...
"क्या सोच रहा है बच्चा?"मुझे सोच में डूबा देख बाबा ने पूछ लिया
"जी!...कुछ खास नहीं...बस ऐसे ही"...
"मैँने तो सुना था कि ये जादू-शादू कुछ नहीं होता लेकिन...वो ट्रेन!....."मेरे चेहरे पे असमंजस का भाव था
"सब ईश्वर की माया है.....बच्चा"
"लेकिन बाबा!.....ऐसा कैसे हो सकता है?"मेरे चेहरे पे हैरत का भाव था
"आँखो देखी पर विश्वास नहीं है तुझे...तो अब कानों सुनी पर कैसे विश्वास करेगा बच्चा....?"
"जी!...वो तो है....लेकिन?".....
"कुछ लेकिन...वेकिन नहीं...कहा ना!..सब 'ईश्वर' की माया है"....
"बाबा मुझे अपनी शरण में ले लो...अपना दास बना लो..."कहते हुए मैँने हाथ से अपनी अँगूठी उतार बाबा के चरणों में अर्पित कर दी"....
"हमें कुछ नहीं चाहिए बच्चा..."
"बरसों पहले हम इन मोह माया के बन्धनो से मुक्त हो चुके हैँ....आज़ाद हो चुके हैँ"...
"ये तो बाबा कुछ भी नहीं...बस ऐसे ही छोटी सी तुच्छ भेंट समझ कर रख लें"...
"मुझे तो बस आपका सानिध्य...आपका आशीर्वाद चाहिए"
"मेरे लायक कोई और सेवा हो तो बताएं?"
"लगता है तुम नहीं मानोगे...जैसी तुम्हारी इच्छा...लेकिन....
इस छोटी-मोटी फुटकर सेवा से हमारा अभिप्राय पूरा नहीं होने वाला"कहते हुए उन्होंने अँगूठी उठा कुर्ते की जेब में धर ली
मेरे चेहरे पे प्रश्न सवार देख वो बोले...
"मैँ तो मलंग आदमी हूँ...अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे"...
"दो जून खाने को मिल जाए और तन ढांपने को एक जोडी कपडा बहुत है मेरे लिए"...
"फिर?..."मेरा अज्ञान अभी भी दूर नहीं हुआ था
"एक छोटी सी गौशाला बनवा रहा हूँ...यही कोई पाँच सौ गायों की"...
"साथ में आठ-दस कमरे बनवा रहा हूँ धर्मशाला के लिए...आने-जाने वालों के काम आएंगे"
"यही कोई दस लाख का खर्चा बताया है आर्कीटैक्ट ने "...
"नेक कामों के लिए पैसे की तंगी तो रहती ही है हमेशा"
"शायद इशारा था उनकी तरफ से ये"...
"बाबा!...दान-दक्षिणा की आप चिंता न करें"....
"जो बन पड़ॆगा...जितना बन पडेगा...ज़रूर मदद करूँगा...
आखिर!...गौ माता की सेवा का सवाल जो है"
"हम मदद नहीं करेंगे तो कोई बाहर से तो आने से रहा"मैँने कहा
"लेकिन बाबा...एक जिज्ञासा है"...
"बोलो वत्स..."बाबा ने सौम्य स्वर में पूछा
"एक सवाल सा मेरे मन को खाए जा रहा है बार बार"...
"मेरा कौतुहल मुझे चैन से बैठने नहीं दे रहा है कि कैसे वो ट्रेन...."मैँने बात अधूरी छोड दी"
मेरी बात सुन बाबा हौले से मुस्काते हुए बोले..."अच्छा सुन!....पानीपत जाना है ना तुझे?"....
"जी..".
"ठीक है स्टेशन आने दे....तेरी सब शंकाओ का निवारण कर दूंगा"...
"अब खुश....?"
"जी..."मैँ प्रसन्न हो बोला
"वो बेटा....मैँने तुम्हें बताया था ना ....गौशाला के लिए...."
"जी...
"आप बताएं कितने से आपका काम चल जाएगा?"...
"दान मांगा नहीं जाता बच्चा....जो तुम्हारी श्रधा हो"...
"दो हज़ार ठीक रहेगा?" मैँ जेब से पर्स निकालता हुआ बोला...
"तुम्हारी मर्ज़ी"....
"अपने आप देख लो...पुण्य का काम है"....
"ठीक है बाबा....पूरे पाँच हज़ार दिए देता हूँ"
"ये लीजिए"...
"हमें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए बच्चा...सब गौ माता की सेवा के काम आएगा"बाबा पैसे जेब के हवाले करते हुए बोले...
"मोक्ष क्या है?...नाम-दान से क्या अभिप्राय है?. .. जैसी ज्ञान-ध्यान की बातो में पता ही नहीं चला कब पानीपत आ गया"
"बाबा!...मैँ चलता हूँ....पानीपत आ गया"
"ठीक है बच्चा!...पहुँचो अपनी मंज़िल पर"बाबा मुझसे विदा लेते हुए बोले
"अपना ध्यान रखना"...
"बाबा!...बताओ ना...कैसे रोक दिया था आपने ट्रेन को?"मेरे चेहरे पे बच्चों जैसी उत्सुकता देखा बाबा मुस्कुराए
"सब ईश्वर की माया है बच्चा"....
"ये मेरा विज़िटिंग कार्ड रख लो....दर्शन देने कभी-कभार आ जाया करना हमारे आश्रम में"
"ईश्वर चन्द मेरा नाम है"...
"ध्यान रहेगा ना?"...
"जी ज़रूर..."विज़िटिंग कार्ड जेब में रखते हुए मैँ बोला....
"वैसे भी बच्चा जो कोई मुझे एक बार जान लेता है...ताउम्र नहीं भूलता है"बाबा की मुस्कान गहरी हो चली थी
"आपकी महिमा अपरम्पार है प्रभु"...
"बाबा....वो..."
"लगता है तुम जाने बिना नहीं मानोगे"...
"अच्छा...कान इधर लाओ"...
"उसके बाद उन्होंने जो कुछ भी मेरे कान में कहा"....
"वो सब सुन मैँ हक्का-बक्का सा रह गया"
"बोलने को शब्द नहीं मिल रहे थे"....
"कानों को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था"...
"यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब कैसे हो गया"
"विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई मुझे...दिनदहाडे पाँच हज़ार रुपए नकद और दहेज में मिली सोने की अँगूठी का फटका लगा चुका था"
हुआ दरअसल क्या कि जब बाबा इंजन में ड्राईवर के पास गया तो उसने चुपके से ड्राईवर को पाँच सौ का नोट देकर कहा था कि
"जब तक मैँ इशारा ना करूँ तब तक गाडी रोक कर रखनी है"...
"इतनी सिम्पल सी बात मैँ बेवाकूफ...समझ नहीं पाया"...
"खुद अपनी ही नज़रों से शर्मसार हो जब मैँ कुछ समझने लायक हुआ तो पाया कि बाबा आस-पास कहीं न था"
"अब मैँ कभी अपने खाली पर्स को देखता कभी अँगूठी विहीन अपने हाथ को"...
"सच!..वो ईश्वर चन्द का बच्चा...अपनी 'ईश्वरी माया' दिखा गया था"
"सही कह गया था वो ठग बाबा कि उसे एक बार जान लेने वाला ताउम्र उसे कभी भूल नहीं पाता है"
***राजीव तनेजा***
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राजीव तनेजा
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5.2.08
बड़े होने का धर्म
भड़ास ने अपने बड़े होने का धर्म निभाया है मित्रो ! जिसके लिए मैं आभारी हूँ भड़ास का और भड़ास गुरु यशवंत जी का भी..अगर उनका फ़ोन न आता तो अपने इस समाधान प्रकल्प की छवि ख़ुद एक समस्या की बन जाती ..हुआ यूं की थोड़े उत्साह और थोड़े अज्ञानवश समाधान को ऑनलाइन लॉन्च करते समय मैं समाधान पेर अपनी पीड़ा व्यक्त करने के साधन का जिक्र करना भूल गया...सवाल भी बड़ा वाजिब सा था की आख़िर किसको सुनाएँ अपने वेदना और कैसे ? खैर ! सही वक्त पर मामला संज्ञान मे आ गया सो उसका निवारण भी हो गया है ...अभी जब तक मैं यशवंत जी से सामुदायिक ब्लॉग बनाने और उसको चलाने के गुरुमंत्र सीखता हूँ तब तक आप समाधान पर अपने पीड़ादायक मनोभाव इस ई -मेल के पते पर भेजते रहे..
samadhan_mail@rediffmail.com
मैं प्रयास करूँगा की आपको कुछ राहत के क्षण दे सकूं...
डॉ.अजीत
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Dr.Ajit
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भड़ास और विज्ञापन
भड़ास पर गूगल एडसेंस का विज्ञापन कई बार आए और गए। दरअसल आप सब लोग जिस तरह भड़ास का मेंबर बनने और पोस्ट लिखने में दिमाग लगाते हो, उसी तरह मैं भड़ास से कमाई करने में दिमाग लगाता हूं। जब समझ में नहीं आता है तो गूगल एडसेंस को डिलीट कर देता हूं। मतलब विज्ञापन डिलीट कर देता हूं। आज गूगल की चिट्ठी आई है, भइया अपना पासवर्ड ले लो, पिन नंबर ले लो, और अपनी रकम इसके बाद ले लो। बड़ा खुश हुआ। चलो, हरेप्रकाश उपाध्याय को सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता के लिए अपनी जेब से एक हजार रुपये देने से बच जाऊंगा। सो, गूगल बाबा के आदेश मानते हुए उनके विज्ञापन लगा दिए, गूगल एकाउंट की औपचारिकता पूरी कर दी। पर अब भी लग रहा है, कई चीजें अपन की समझ से बाहर हैं। हो सकता है, जो विज्ञापन दिख रहे हों, फिर डिलीट हो जाएं। और तो और, ये भड़ास फिर डिलीट हो जाए। ये ब्लाग फिर खत्म हो जाए। जैसे अपन की ज़िंदगी, नौकरी और चूतियापे पर कोई लगाम नहीं है, उसी तरह इस ब्लाग या इस धंधे पर कैसे लगाम रखने की गारंटी कर सकता हूं। हां, मैं चाहता हूं कि ये भड़ास जो अब तक मेरा निजी चूतियापा है, सामूहिक चूतियापा बन जाए। इस बारे में जल्द ही बड़ी घोषणा करने वाला हूं। उसके पहले विचार विमर्श कर रहा हूं। तो दोस्तों, भड़ास पर हो तो ये न मान लेना कि ये भड़ास ज़िंदगी भर यूं ही दिखता रहेगा, हरामजादों और माधड़चोदों की फौज तैयार है, जो भड़ास को खत्म करने पर तुली हुई है, मुजे नष्ट करने पर आमादा है। देखते हैं, कब तक जीते हैं, मैं और भड़ास और आप सब साथी। पर ये जो दौर चला है, लगता है, वो न अब आपके वश में है, न मेरे। सो, यह काफिला बड़ा रिजल्ट देकर जाएगा। चलिए, गपोड़ी टाइप की बात करने की बजाय बात बस यूं ही खत्म कर देते हैं। लेकिन अंतिम बात के बाद, जैसे मैं गूगल एडसेंस लगाना और हटाना सीख रहा हूं, वैसे ही आप भी लगातार नया कुछ सीखो, अपना मूल काम करते हुए। इसमें कोई गलत नहीं है। जो कोई कहता है कि गलत है उसकी बाप की गाड़ फाड़। तो मैं अब भी सीख रहा हूं....
...पर ये जो कोशिश सीखने की है, हिंदी लिखने, मेंबर बनने, ब्लाग बनाने, ब्लाग चलाने, कम्युनिटी ब्लाग चलाने, विज्ञापन लगाने, विज्ञापन से कमाने....वो शायद कुछ बढ़िया ही करिश्मा दिखाएगी, ये मान कर चल रहा हूं। तो, मेरा अनुरोध है कि विज्ञापनों पे ध्यान न दीजिये, उनकी गांड़ में घुस जाइए। भड़ास को स्वालंबी बनाने की कोशिश है ताकि कम से कम भड़ास एवार्ड भड़ास की कमाई से शुरू हो सकें।
आगे के दिनों में भड़ास को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं होनी हैं। इंतजार करिए, और तब तक कहते रहिये...सूअर की औलाद, हरामजादे की जात....
कई गंदी गंदी गालियां देने को जी हो रहा है पर भड़ास में शामिल महिलाओं का ध्यान आ रहा है, सो थोड़ा संयम सीखने की कोशिश कर रहा हूं। मेरे खयाल से ये गलत है...पर कई गलती मजबूरी में की जाती है। बाकी डाग्डर साहब और पंचों की राय...
जय भड़ास...यशवंत


