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25.10.08

अप्रेरक प्रसंगः दास न रहे उदास

भ्रष्टाचार की मूर्ति दास जी नित्यकर्म के बाद जैसे ही चिलमन से बाहर आये चमचे दहाड़ मारते उनकी तरफ दौड़ पड़े। दास जी ने तनिक प्यार से पूछा, भैये चमचों क्या परेशानी है। दो-तीन-चार नम्बर के काम के धनी चमचे ने मुंह खोला, महाराज महंगाई मार रही है। दास जी ने चुटकी ली, काहे, दीवाली की मिठाई नहीं देने का इरादा है। कहां महंगाई है। सुबह से कुल्ला तक नहीं किया हूं और दो दर्जन से ज्यादा भक्त मिठाई दे गये हैं। एक-एक भक्त ने कितना खर्च किया मालूम है, कम से कम पच्चीस-तीस हजार। अरे भाई कोई हमारे लिए कपड़े लाया तो कोई अपनी चाची को खुश कर गया। तुम इतना महंगाई-महंगाई गिड़गिड़ा रहे हो, अभी चार ठौ ठेके नहीं दिलाये तुम्हें।

घर में पैसा नहीं तो ठेके वापस कर दो।लगता है तुम विपक्ष से जा मिले हो। कोई काम-बाम नहीं अफवाहें फैला रहे हो।एक दूसरे चमचे ने हिम्मत जुटाई। बोला महाराज आपके लिए महंगाई नहीं है लेकिन अफसरों को भी हमई से दीवाली शुभ करनी है। ठेके मिलने के बाद सामान महंगा हो गया। रेत में रेत मिलाने की भी गुंजाइश नहीं बची है। सीमेंट का कट्टा दिखा कर काम चल रहा है। दास जी ने कहा, चमचे इसमें परेशान होने की कोई बात नहीं है। सरकार किसकी, हमारी। जांच कौन करेगा हम। किसने कहा तुमसे काम करो। ठेका लो और कमीशन भेंट करो। तुम्हारी दीवाली में रौनक रहे और हमारे बच्चे टापते रहें, यह नाही होगा ना।दास जी ने मुस्कराते हुए समाधान बताना शुरू किया तो चमचे उनके चारों ओर चुपचाप बैठ गये। दास ने भ्रष्ट वचन देना शुरू किया तो सन्नाटा पसर गया।

दास जी ने गंभीर मुद्रा में कहा जिस तरह सूरज पूरब से निकलता है यह सत्य है उसी तरह तुम हमारी दीवाली मनवाओगे यह सत्य है। महंगाई बढ़ी कोई बात नहीं, सामान और कम डालो। और मुसीबत आये तो काम ही मत करो। हम हैं न झेलने को। तुम तो बस नोट छापो और हमें दो।दीवाली साल में एक बार इसलिये आती है जिससे लोग अपने सुख (गिफ्ट) दूसरों को बांट सकें। मिठाई के नाम पर लीगल रिश्वत ले सकें। भगवान ने हमें सरकारी बनाया है। जो सरकारी होता है उसकी दीपावली तुम जैसे चमचे ही मनवाते हैं। भविष्य में ध्यान रखना हर अधिकारी को उसकी औकात के हिसाब से संतृप्त जरूर करना। तुम जैसे चमचों का जन्म ही हम जैसे लोगों के लिये हुआ है। यह कहकर दास जी कमरे में प्रवेश कर गये और चमचे उनकी दीपावली की तैयारी की वाह-वाह करते हुए उठ कर चले गये।

पंकुल

क्या लाये पापा इस बार

दीवाली तो आ गई पापा, क्या लाये इस बार

बच्चा बोला देखकर, सुबह सुबह अखबार

सुबह सुबह अखबार, कि पापा कपड़े नए दिलवा दो

मम्मी को एक साड़ी औ बहना को शूट सिलवा दो

और अपने लिए तो पापा, जो जी में आए लेना

पर घर का कोना कोना दीपों से रोशन करना

पापा ने सुन बात , कहा बेटे , क्या बतलाएं

डूब गई पूंजी शेयर में, कैसे दीप जलाएं

बेटा बोला, बुरा न मानो, तो एक बात बताएं

पैसे के लालच में पड़कर, क्यूँ पीछे पछ्ताएं

दादाजी भी तो कहते थे लालच बुरी बला है

शेयर नहीं सगा किसी का, इसने तुम्हे छला है

कोई बात नही पापाजी, यह लो शीतल पेय

बीती ताहि बिसरी देय, आगे कि सुधि लेय

चिराग-चमन चंडालिया
mahanagarindia.blogspot.com

बन सकते हो तो राज ठाकरे बनो

जब कोई बच्चा होता है तो उसे उसके परिवार वाले बड़े आदर्शों वाली कहानियाँ सुनते हैं और उसे वैसा आचरण करने के लिए और उसके जैसे बनने के लिए कहते हैं. पर मैंने जब से राज की दादागिरी मुंबई में देखी है तबसे मन कर रहा था कुछ लिखूं और आज मौका मिला तो लिख रहा हूँ. मैं आप सबसे कहना चाहता हूँ की अगर आप कुछ बनना चाहते हैं तो राज ठाकरें बनो. राज एक ऐसा नाम है जो कुछ भी कर सकता है. वो जेल के बाहर घूमने वाला गुंडा है. पर पुलिस उसके सामने कुछ भी नही किसी को वो मर सकता है किसी कोई पीट सकता है कुछ भी किसी कोई कह सकता है कानून और अदालत उसके सामने कोई मायने नही रखते. अब आप ही सोचिये अगर हम सब राज ठाकरे जैसा बन जायें तो देश से पुलिस और कानून की ज़रूरत ख़त्म हो जायेगी. क्यूंकि सरकार तो राज कोई चैलेन्ज कर नही सकती तो उसे कम से कम हम एक गुंडा संप्रदाय का प्रतिन्धित्व करने के कारन चैलेन्ज तो कर पाएंगे. भाई जिस बन्दे में इतनी ताकत है ऐसा बन कर हम भी देश का नाम रोशन करें. इसके बाद फिर हम राज ठाकरे से पंगा भी ले पाएंगे. तो भाइयों मैं आप सबसे अनुरोध करता हूँ की सामने आयें और नही ज्यादा तो एक राज ठाकरे बनकर दिखाएँ क्यूंकि ऐसा करने से ही आप इस देश के शसक्त नागरिक कहलावोगे. तो आवो आज हम सकल्प लें की इंडिया के हर प्रदेश और शहर पर अपनी क्षेत्रीय भाषावों का राग गाकर अपना बर्चस्व कायम करें. जय राज ठाकरे का नारा लगावोए और देश में सैकडों राज बनावो

भड़ास फ़ैन क्लब/एग्जास्ट फैन क्लब/कूलर क्लब/ए.सी. क्लब में मैं कहां रहूंगी?

भड़ासी बाईयों और भाईयों, जब किसी साम्राज्य का विस्तार हो जाता है तो उसमें फटाव आने लगता है और अलग-अलग विचार धाराएं पैदा होने लगती हैं। ठीक वैसा ही भड़ास के साथ हो रहा है। पहले यहां सब भड़ासी मात्र हुआ करते थे अब इनमें भी श्रेणियां बनने लगी हैं। कुछ सक्रिय, कुछ निष्क्रिय, कुछ अक्रिय लेकिन भड़ासी तो सभी हैं क्योंकि जो कभी एकाध बार गलती से इधर मुंह मार लिये होंगे। अब भड़ास में फ़ैन क्लब बना है यानि कि जो फैन हैं वही भड़ासी हैं बाकी सब जो हैं नाम के भड़ासी हैं लेकिन उनकी सदस्यता अक्रियता या निष्क्रियता के आधार पर समाप्त करी तो गिनती के मुश्किल से पचास ही बचें शायद। मैं एक भविष्यवाणी कर रही हूं कि आने वाले समय में इस क्लब में कई विभाजन हो जाएंगे जैसे कि अभी कुछ लोग फैन हैं उनमें से जो ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "एग्जास्ट फैन" कहा जाएगा, जो इनकी अपेक्षा अधिक सक्रिय होंगे उन्हें "कूलर" और जो कूलरॊं से ज्यादा सक्रिय होंगे उन्हें "ए.सी" की श्रेणी में रखा जाएगा।

हैपी धनतेरस


ScrapU

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया


प्रकाश चंडालिया

इंसानों की मंडी...

हर शहर हर कस्बे में हर रोज बिकते हैं हजारों लाखों लोग. हम में से हर व्यक्ति ने इन्हें सिर्फ बिकते हुए नहीं देखा बल्कि खुद खरीदा भी है. बकायेदा रोज सुबह हर शहर में लगती है इंसानों की मंडी. जी हाँ आपने सही समझा मैं बात कर रहा हूँ रोज सुबह बिकने वाले दिहाडी मजदूरों की. अब तो दो दिनों बाद दिवाली भी है. इनका दो दिनों तक लगातार बिकना जरूरी भी है. न बिके तो दिवाली कैसे मनेगी. वैसे भी बच्चों को दिवाली के दिन चीनी मिठाई और मिटटी के एक-दो खिलौनों के अलावा कुछ दे भी नहीं पाते ये बिकाऊ लोग. इनकी सब से ज्यादा चिंता नेताओं और सरकार को ही होती है. पांच साल में एक बार इलाके का नेता दर्शन भी दे देता है. पेट के नाम पर वोट भी ले जाता है. मगर औद्योगिक क्रांति है न साहब तो बेचारा नेता भी इनके भूख को भूलकर लखटकिया कार योजना में इन्ही के छाती पर गोली चलवा देता है. ये कहते हैं "माई-बाप बात तो पेट की हुई थी लखटकिया की तरफदारी आप क्यों कर रहे हैं?" सरकार कहती है "चुप मूरख तुझे पता नहीं तरक्की करनी है अपने राज्य की. इसी में तेरा भी भला है." मूरख कहता है"लेकिन साहब जमीन कैसे दे दें इसे तो मेरे पुरखों ने अपने लहू से सींचा है". साहब फिर बिफरता है "जाहिल, औद्योगिक क्रांति वाला क्रन्तिकारी उद्योगपति तुझे काम भी तो देगा" जाहिल गिड़गिडाता है "हुजूर जमीन दे कर तो मैं वैसे भी बेकार हो जाऊंगा फिर काम छीन कर कौन सा काम दे रहे हो आप? नहीं हुजूर मैं अपनी जमीन नहीं दूंगा" हुजूर अपने चेलों को हुक्म देते हैं साम दाम के बाद अब दंड का सहारा लो. चेले अपनी बंदूकों का मुहँ खोल देते हैं. पिछले चुनाव में फूल बरसाने वाले अब गोली बरसाने लगते हैं. जमीन पर औद्योगिक क्रांति वाले क्रन्तिकारी का कब्जा हो जाता है. कभी कभी विपक्ष जिद पर अमादा हो जाता है और नहीं भी हो पाता. मगर इंसानों की मंडी हर सुबह गुलजार हो उठती है. क्यों कि इस बार विपक्ष, पक्ष बन गया है. उसे भी औद्योगिक क्रांति लानी है. फिर अमेरिका वाले पापा को भी तो जवाब देना है कि उसके यहाँ निवेश पूरी तरह सुरक्षित है. सो जमीनें तो हथिया ही ली जाती हैं. मगर इन बिकाऊ लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बना रहता है. वोट देने का धर्म ये पूरा करते रहते हैं. कोई औद्योगिक क्रांति वाले साहब से ये नहीं पूछता कि आपने पिछली बार कब वोट दिया था आपको याद भी है? पेट की लड़ाई लखटकिया के सपनों को नहीं हरा पाती. क्यूँकि लखटकिया के पास पुलिस हैं, गुंडे हैं, लेफ्ट है राइट है. इनके पास तो बस वोट है जिसका प्रयोग ये करते ही हैं मगर लखटकिया इन्ही के बनाये हुए नुमाईन्दों को खरीद ही लेती है. यही हस्र होता है जब भूख अपनी औकात भूल कर लखटकिया से टकरा जाती है. कोई ये न पूछे कि हम पत्रकार कभी कुछ क्यों नहीं कर पाते. सब जानते हैं हमारे लाला को भी औद्योगिक क्रांति का प्रचार प्रसार विज्ञापन लेकर करना है आखिर वो भी तो इसी तरह का क्रन्तिकारी है.

अच्छा हुआ …

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अच्छा हुआ
अच्छा हुआ … जो पिटे....
बिहार जाने वाली या बिहार से गुज़र के जो ट्रेन जाने वाली थी सब को रद्द कर दिया गया....। स्टेशन में भीड़, लोग बेहाल परेशान, कहां जायें, कैसे पहुचें कुछ पता नहीं .... रमेश को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ट्रेनें क्यों नहीं चल रही ... उसने झुंझलाते हुये पुछा क्या हुआ ट्रेनों को क्यों नही चलाया जा रहा ....किसी ने बताया अरे भई वहां आंदोलन चल रहा है ट्रक जाम हैं सड़कों पर लोग है सब तरफ अफरातफरी है ...दुकाने जलाई जा रही है सरकारी संपत्ति का नुकसान किया जा रहा है ... बहुत ज़बरदस्त आंदोलन है .....25 तारीख़ को पूरा बिहार बंद होगा ...
रमेश ने पुछा क्यों भई क्यों ... लोगो ने कहा अरे तुम कहा से आये हो, देश में कितना कुछ हो गया और तुम कहते हो क्यों ... राज .... राज ठाकरे के लोगों ने महाराष्ट्र में परीक्षा देने गये, बिहार के छात्रों को मार-मार कर भागया, बहुत पीटा ...उसी के विरोध में ये सब हो रहा है ...
रमेश के लिये ये सब नया था ... उसने कहा, पर अगर ये सब मुंबई में हुआ, वहां के लोगो ने किया तो उसका विरोध बिहार में प्रदर्शन कर के अपने ही लोगो की दुकाने जला के ..अपने ही प्रदेश का नुकसान करके कैसा आंदोलन, कैसा बदला ... लोग नाराज़ हो गए, बोले अरे तुम समझे नहीं ...ऐसे ही नेताओं की नींद टूटेगी ...कितनी उम्मीद से इतने सारे अलग अलग पार्टियों के बाशिंदों को संसद भेजा है हमने ...उनका कोई फर्ज़ है या नहीं ... बहस गंभीर होती जा रही थी ,,,, पर हर बार नींद तोड़ने के लिये अपना नुकसान करना कहां की समझदारी ... अगर आंदोलन करना है और हिम्मत है , तो क्यों नहीं महाराष्ट्र चले जाते हैं.. ट्रेनों में भर कर, वहां करे आंदोलन, अपने ही राज्य में करने का क्या फायदा ...और इनके मारे पूरा देश क्यों परेशान हो । राज ने किया उसे जेल हुई उसके कार्यकर्ता पकड़े गये .. सब ने निंदा की पर ये जो कर रहे हैं ये कौन सी समझदारी है ... मैं यही कहूगां, पिट के भी नहीं सुधरे बिहारी ... लोग भड़क गये पर दिल्ली था इसलिये रमेश बच कर निकल गया ... पर आंदोलन का मकसद वो समझ नहीं पाया ...
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24.10.08

गज़लों जैसा कुछ-कुछ ......"गाफिल "

एक बात बताता हूँ तू जरा ध्यान से सुन ,
मैंने बनाई प्यारी-सी खुदा की इक धून !!
जिन्दगी को जीने में कुछ एहतराम बरत,
तू इसे इक मुफलिस के स्वेटर-सा बून !!
जो तुझे मिला है मिला वो मुझे क्यूँ नहीं,
शायद मुझमे नही थे उसे पाने के वो गुण !!
इक राह जा रही है हर वक्त खुदा की और,
मैं चुनता जाता हूँ हर वक्त उसी की धूल !!
ये जो टूटे हुए कुछ ख्वाब बिखरे हुए हैं ,
मैं इधर चुनता हूँ "गाफिल",तू उधर चुन !!

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दरख्त की है प्यारे प्यास है कितनी ,
रहती है उसमे शायद चिडिया जितनी !!
समंदर अक्सर ही सोचा करता है कि ,
तैरती हैं आख़िर उसमें मछलियाँ कितनी !!
किसी पल को भी चैन से नहीं बैठता ,
आदमी की आख़िर हाय जरूरते कितनी !!
खुदा से तू अब कुछ और तो मत माँग ,
पहले से ही हैं उसकी तुझपे नेमतें कितनी !!
खुशियाँ जितनी भी उन्हें सर पर धर ,
क्यूँ सोचता है हर शै,तू इतनी कि उतनी!!
अपना वक्त आने तो दे अमां "गाफिल",
खुशियाँ भर-भर मिलेंगी तुझे भी उतनी !!

बियावान गाँव


करियर banaane की धुन कहा ले आई। गाँव से कसबे और फ़िर कसबे के मेट्रो शहर में आ गये। खबरों की दुनिया में ese उलझे की वक्त कब निकल गया पता ही नही चला। हाल ही में बहुत दिनों बाद खबरों की दुनिया से दो दिन की छुट्टी मिली। सहसा ही मन अपने पुश्तेनी गाँव जाने को लालायित हुआ। एक अरसा बीत गया था वहां जाए। सो दोपहर की गाड़ी से दिन ढलने से पहले ही पहुँच गया। जिला झाँसी के कसबे बबीना से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर बसा है मेरा गाँव धमकन। चारो तरफ़ से सेनिक छावनियों से घिरा। छोटा सा गाँव। मेरा अपना। सभी के पैर लागकर आँगन में चारपाई पर बैठा दादी, चची, ताई से बतिया ही रहा था, तभी पड़ोसी का लड़का आया और पूछने लगा- चाचा आ गए क्या ,,? माँ ने पुछवाया है। पिताजी अभी तक नही आए हैं। चाची ने नाही कर दी अभी नही आए है। मैं पूछा कहा गए है ? दादी ने बताया जाने गाँव के लड़कन को का हो गाऊ है। सारा सारा दिन घर से बाहर रहत हैं। सुबह से निकलते है और देर रात तक आते हैं या फ़िर आते ही नही हैं। सबरे दिना ओरतें अकेली रहत हैं। घर का काम देखे या गोबर पानी करें। अब लड़कावारे करें भी तो का ? खेतीबाड़ी रही नही। अकेले दूध के सहारे कहा तक गुजर बसर होय। लड़कावारे पड़ गए जाने कौन सी सोहबत में।
मैं मौन मूर्ति बना सा कुछ सुन व देख रहा था। आवाज का दर्द और चेहरे की तकलीफ। और जेहन में अपने गाँव व बचपन की यादें छाने लगी। जो आज भी मेरे मन में अमिठ हैं। कितना सुकून रहता था हमारे गाँव में। हमारे खेत घर के पिछ्बादे ही दूर तक फैले थे। सारे गाँव में खेती- बाधी होती। सुबह से शाम तक बैलो के गले की घंटिया सुने देती। दूर दूर तक हरियाली पसरी रहती। कुओं पर रहत चलते। खेतो को पानी दिया जाता। मुझे अच्छे से याद है जब दादा, चाचा, पिताजी खेतो में काम करते। दादी रोटियाँ लेकर लाती और हम सब खेत की मेड पर खड़े विशाल पीपल की ठंडी छाँव में बेठे कर भोजन करते। पीपल पर झूला झूलते कब दिन से शाम हो जाती मुझे पता ही नही चलता। यह कहानी हमारे परिवार की नही सरे गाँव की थी। कुओं पर पन्हारियों की बतियाँ, सास बहु की छीटाकशी, दोपहर बाड़े में कंडे पथाते, सुबहशाम गायों को दोहना, जेसे जन्नत इसी का नाम हो। हर घर के आगन से गोबर व मिट्टी की सोंधी सुगंध उठकर सारे गाँव को एक आनोखी महक से सराबोर कर देती थी।
पर सरकार के एक फैसले से यह सारा गाँव उजड़ गया है। न खेती रही न कुए और न ही सौहाद्र का माहौल। करीब १७ साल पहले सरकार ने सेनिक छावनियों के बीच होने के कारन गाँव को विस्थापित करने का निर्णय लिया। खेती के बदले मुआवजा दिया पर घर, मकान का मुआवजा आज तक नसीब नही है। एस कारन बाशिंदे गाँव छोड़कर भी नही जा सकते और खेती भी नही कर सकते। सारा गाँव उजड़ा हुआ है। बंजरता चहु और पसरी दिखाई देती है। कुछ लोगों ने मुआवजे के पैसे से शहर में घर ले लिया। गाँव छोड़ कर चले गए। और खेती विहीन हो गए। आधा गाँव विस्थापित हो चुका है। आधे में लोग रह रहे हैं। छोड हुए घर खंडहर और भूतावा हो गए हैं। वीरान निर्जन सा लगने लगा है गाँव।
गाँव में कोई धंधा नही। युवक बेरोजगार और फालतू हैं। सो पड़ गए बुरी सोहबत में। गाँव के अधिकाँश लड़के अपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त हैं। कोपी चोरी करता है तो koi शराब बेचता है। तो कोई कुछ और काम करता है। न घर की फिक्र न बच्चो की सुध। सिर्फ़ पैसे लाकर दे जाते हैं। समझ नही आता सरकार जहा गाँव के शहरी पलायन से दुखी है। गाँव बसाना चाहती है। इसे में एक हस्ते खेलते गाँव को बियाबान कर देना कहा तक ठीक है। सरकार पैसा दे सकती है। पर वह सपने, वह प्रेम, वह परिवेश, वह सुगंध, वह सौहाद्र, नही लौटा सकती है। सोचता हूँ तो दिल दहल जाता है के पीपल का पेड़ काटकर पानी की विशाल टंकी बनेगी। गायों का मंडप गिराकर सीमेंट के कमरे खड़े होगे। धूल भरी पगडण्डी की जगह पक्की सड़क निकलेगी। प्राकृतिक सौन्दर्य कृतिम बनकर रह जाएगा।

सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन


एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।

इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।

बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।

भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''

लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।

बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।

कोई ठाकरे को समझाता क्यूँ नही...........

बचपन में जब हम कोई गलती करते थे तो गाँव का कोई भी बुजुर्ग बड़े अधिकार से हमे डांट देता था फ़िर अब क्या हुआ जो इस ठाकरे के बड़बोलेपन पर सब खामोश क्यों है...आख़िर कौन समझाए गा राज को? क्या ये विश्पुरुष यूँ ही जहर उगलता रहेगा?क्या ये इसी तरह देश को तोड़ने पर उतारू rअहेगा...अरे देश के बूढे लोगो समझाओ इसे...अरेबुधिजिवियो कहाँ हो तुम???रोको इसे......इस देश को जोड़ने में सरदार पटेल को कितने साल लगे थे और ये आदमी देश तोड़ने में लगा है..... परिहार....बीकानेर...

सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन

Written by B4M Reporter
Friday, 24 October 2008 01:30

एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।

इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।

बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।

भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''

लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।

बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।

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अगर आप भी कोई ब्लाग या वेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तो aloktomar@hotmail.com पर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है।
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((इस पोस्ट को कापी करके आप अपने-अपने ब्लागों-वेबसाइटों पर प्रकाशित करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह संदेश पहुंचाया जा सके और वेब माध्यम के जरिए सुशील कुमार की लड़ाई को विस्तार दिया जा सके।))
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सदानंद शाही की कविता

काला हांडी: कुछ सवाल

क्या आपको मालूम है
हमारे देश के भूगोल में
काला हांडी क्यों है?

काला हांडी भूख है
कि अकाल
या कि हमारे देश के लोकतंत्र पर
सवाल?

काला हांडी को काला हांडी किसने बनाया?
अंग्रेजों ने! जमींदारों ने!
कि नेताओं ने?

ईश्वर है तो काला हांडी क्यों है?
कैसे रहते हैं ईश्वर और काला हांडी
साथ-साथ?

ईश्वर न तो गाईड है, न टैक्सी वाला
न पत्रकार न जमींदार
न नेता, न अफसर
फिर काला हांडी को काला हांडी बनाए
रखना
उसकी मजबूरी क्यों है?

क्या उसे वोट चाहिए?
क्या उसे नोट चाहिए?

ठाकरे चटनी बनाने की विधि

राजनीति की चाशनी में हिंसा का ज़हर मिलाये।
फिर वेबकूफों के समूह को मिलाकर थोड़ा थोड़ा हिलाए।
जो बच जाए उसे ठोक -ठाक ठाकरे से मिलाकर धुप में सुखाएं ।
दंगा, कतल, मारपीट सब एक थाली में सजाएँ।
ऊपर से थोड़ा महारास्ट्र सरकार को मिलाएं।
फिर चटखारे लगाकर ठाकरे की चटनी खाए।

( पत्रकार मित्र धीरेन्द्र पांडे की प्रस्तुति )

भूतनाथ

जीवन क्या है...चरता-फिरता एक खिलौना !!
""चीजें अपनी गति से चलती ही रहती है ...कोई आता है ...कोई जाता है ....कोई हैरान है ...कोई परेशां है.....कोई प्रतीक्षारत है...कोई भिक्षारत है...कोई कर्मरत है....कोई युद्दरत....कोई क्या कर रहा है ...कोई क्या....जिन्दगी चलती रही है ...जिन्दगी चलती ही रहेगी....कोई आयेगा...कोई जाएगा....!!!!""............जिन्दगी के मायने क्या हैं ....जिन्दगी की चाहत क्या है ....??""ये जिन्दगी....ये जिन्दगी.....ये जिन्दगी आज जो तुम्हारी ...बदन की छोटी- बड़ी नसों में मचल रही है...तुम्हारे पैरों से चल रही है .....ये जिन्दगी .....ये जिन्दगी ...तुम्हारी आवाज में गले से निकल रही है ....तुम्हारे लफ्जों में ढल रही है.....ये जिन्दगी....ये जिन्दगी...बदलते जिस्मों...बदलती शक्लों में चलता-फिरता ये इक शरारा ......जो इस घड़ी नाम है तुम्हारा ......इसी से सारी चहल-पहल है...इसी से रोशन है हर नज़ारा...... सितारे तोड़ो ...या सर झुकाओ...कलम उठाओ या .......तुम्हारी आंखों की रौशनी तक है खेल सारा...ये खेल होगा नहीं दुबाराये खेल होगा नहीं दुबारा ......ये खेल होगा नहीं दुबारा......ये खेल होगा नहीं दुबारा.......!!""ना जाने कब किसके ये शब्द पढ़े ...सुने थे ....मगर अब जिन्दगी की अमानत बन गए हैं ये शब्द ...अपने आप में इक दास्ताँ बन गए हैं ये शब्द ...!!पैदा होने के बाद जीना ही हमारी तयशुदा नियति है ...ये बात अलग है कि हम इसको किस तरह जीते हैं ..!!लड़-लड़ कर मर जाते हैं...या अपने आप को किसी ख़ास लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न कर देते हैं.....अपने स्वार्थों की पूर्ति में अपना जीवन होम कर देते हैं या अपने जीवन को ही इक वेदी बना लेते हैं.... चला तो किसी भी तरह से जा सकता है ...मगर ऐसे पथ बना जाना जो अनुकरणीय हों ... जो सबके लिए श्रद्धेय हों ....जो अंततः जीवन के समीचीन आदर्शो की गहराई को फ़िर-फ़िर से आंदोलित कर जाएँ ....जीना तो ऐसे भी है ..और वैसे भी ....और जीना कैसे है ....सिर्फ़ यही तो तय करना है हमको !!!!

लोक मंगल ब्लॉग का शुभारम्भ

सभी भडासी बांधवों को सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि हम कुछ ब्लॉगर बंधुओं ने साहित्य एवं कला पर आधारित एक ब्लॉग लोक मंगल के नाम से प्रारंभ किया है।साहित्य एवं कला में रूचि रखने वाले सभी बंधुओं से अनुरोध कि इसमे अपना रचनात्मक सहयोग दे कर इस ब्लॉग को पठनीय बनाएं।
विशेष जानकारी हेतु मकबूल से मो-९८१८१७६२७७ पर संपर्क करें।
मकबूल

निरीह बाल

निरीह बाल
अकस्मात्गोरी-सी पूंजीवादी पिछच्ल टांगों मैं दमन के बावजूद उग आया कहीं से वह नन्हा -शैतान काला बाल और हतप्रभ वह आत्ममुग्धा ले हाथ में गंडासे-कुल्हाड़ी -आरे चीरती है अपनी सुवेसल टांग और जड़ तक पहुँच विश्वजयी मुस्कान लिए खींचकर उस हठी बाल को पटकती है खून से सनी सतह पर और अवतरित हो समाजों में दिखलाती है अपनी जख्मी टांग को जिसे घूरते है पुरूष और भाग्यवान ही चूमता है अंततः भर जाता है उसका मुंह खून से निरीह बाल के

लगे रहो राज भाई

राज भाई, यों ही लगे रहना। किसी से डरने की जरूरत नहीं। आखिर किसकी मजाल जो तुम्हारी बिना बाल की मूंछ टेड़ी कर सके। राजेश खन्ना का गाना नहीं सुना, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। छोड़ो बेकार की बातों में, बीत न जाए रैना। तुम तो पुरानी कहावत के सहारे ही जीना। यानि सुनो सबकी और करो मनकी। अरे भाया तुम्हें कौन महाराष्ट्र के बाहर राजनीति करनी है। जितनी सीटें मिलेंगी, महाराष्ट्र में ही मिलेंगी। कुछ नहीं तो कम से कम दस-पांच हजार वोट तो बढ़ेंगे ही। ये चिन्ता उन्हें करने दो जो राष्ट्रीय दुकान चला रहे हैं। तुम्हारी ठेठ महाराष्ट्री दुकान है वही माल बेचो जो बिके। अब गंजों के शहर में कोई कंघे तो बेचेगा नहीं। राज भाई, अभी तक तो बाहर के आदमियों को मार-मार कर निकाला है। अब सबसे पहले बाहर की भैंसों को लात मारकर निकाल देना। सभी भैंसों का डीएनए टेस्ट करा लेना। किसी के दादा-परदादा भी यूपी., बिहार के निकल आयें तो डंडे सहित बाहर का रास्ता दिखा देना। अपने ब्लड का भी एक बार टेस्ट तो करा ही डालना। पता नहीं कब रेस्ट आफ इंडिया की गाय-भैंस का दूध पी लिया हो। जाने-अनजाने किसी टाफी, चाकलेट में ही बाहर का दूध अंदर चला गया हो। बड़ी दिक्कत हो जाएगी। एक काम और जरूर करना, जितनी भी परचून की दुकान हैं उनमें रके सामान को भी चेक कर लेना। बाहर का बना हो तो आग लगा डालना। अरे कम से कम यूपी और बिहार की दाल, आटा, चावल, मेवा, मिश्री मत खाना। भैया कन्हैया जी को भी मत याद करना, वह भी बेचारे यूपी के ही थे। अपने घर की छत, दीवार और ईंटों को खुदवाकर एक बार जरूर देख लेना। कहीं उसमें यूपी, बिहारी या बिलासपुरी मजदूर के पसीने की दुर्गन्ध तो नहीं आ रही। अपने चेलों का भी डीएनए जरूर करा लेना, कहीं उनके मां-बाप तो उत्तर प्रदेश, बिहार के नहीं थे। तुम्हें कमस है पूरे महाराष्ट्र में बाहर की कोई निशानी मत छोड़ना। कभी उस ट्रेन में मत बैठना जो इधर से होकर जाती हो। इतना तो देख ही लेना, कहीं उसका ड्राइवर तो बिहारी नहीं है। प्लेन में बैठो तो आस-पास बिहारी को देखते ही ऊपर से कूद जाना। अबकी जब क्रिकेट टीम का कोई खिलाड़ी रन बनाये तो ताली बजाने से पहले उसका प्रदेश जरूर पता कर लेना। तुम्हें कसम है, राज भाई। भूल से अगर इधर की मिट्टी भी मिल जाए तो उसे इधर ही भिजवा देना। कोई बात नहीं, अगर कुछ दिन जेल में भी रहना पड़े तो कोई बात नहीं, ये सब लोग तो तुम्हारी तरक्की से जलने वाले हैं। बेस्ट आफ लक। जिन्दगी भर एक दड़बे में ही रहना। पंकुल

23.10.08

आज से मैं भी भडासी

सबसे पहले तो मेरी तरफ़ से सभी भडासीयो को प्रणाम...

पाँच-छह दिन पहले ही एक लिंक के जरिये इस महाब्लोग तक पंहुचा हूँ सोचा ख़ुद को थोड़ा आजमाया जाए.. देखते है कितनी भडास निकल पाती है.. आदत नही है ना ...

सच कहूं तो मुझे हिन्दी मैं लिखने में थोडी परेशानी हो रही है पर लगता है की धीरे धीरे सीख जाऊंगा.. अब क्या करें भइया .. इंग्लिश की हर तरफ़ जय जय कार है और हो भी क्यूँ ना .. जरूरी भाषा तो है ही.. जो इंग्लिश अटक अटक के बोले उसका मजाक उडाया जाता है और जो हिन्दी अटक अटक के बोले उसको हाईफाई समझा जाता है .. ऐसा ही है बस.. क्या करें

क्षमा चाहता हूँ...अभी समय का थोड़ा अभाव है इसलिए अपनी भडास को इधर ही रोक देता हूँ.. फिर से मिलते है जल्द ही..

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साहिल

हां ......कल.... बात करती हूं।

क्यों ऐसा क्यों ....

जेट ने अपने सारे कर्मचारी वापस ले लिये । ये ब्रेकिंग न्यूज़ दे कर रूही ने ज़रूर 1900 लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी थी पर उसका मन बहुत दुखी था । ये पूरी दुनिया को मालूम है कि देश आर्थिक मंदी की चपेट में है और कुछ सेक्टरों में लोगो का भविष्य अंधकार में है लेकिन ये हम कैसे और किस को बताये कि दुनिया को दुनिया भर की ख़बर देने वाले लोगों के हालात कैसे हैं । सब को हमारे चेहरे पर मुस्कान दिखती है, तन पर महंगे और डिज़ाइनर वियर । पूरे संसार में क्या क्या हो रहा है, पल में, लोगों तक पहुंचाने वाले...., नेता, अभिनेता ,मंत्री संत्री सबका पसीना छुड़ा देने वालों को भला क्या परेशानी ......
जल्दी जल्दी स्टुडियो से मेकप रूम के लिये रूही चल दी । रास्ते में सिनियर एडिटर राहुल भी मिले कहा बहुत अच्छा संभाला आपने .... रूही ने उन्हे एक औपचारिकता भरी मुस्कुराहट दी और आगे बढ गयी पहले ये छोटी छोटी तारीफ उसे बहुत अच्छी लगती थी उसे एक अजीब सी खुशी मिलती थी जिससे उसका दिल खिल उठता था .. पर अब वो तारीफ करने वाले की भी हैसीयत को समझ चुकी है ...

मेकपरूम पहुचते ही उसने कपड़े बदले और प्रोडक्शन में फोन कर दिया कि घर जाने के लिये गाड़ी चाहिये और वहा से आवाज़ आई मैडम अभी गाड़ी नहीं है बस रूही का पारा चढ़ गया । क्या समझा है आपने, क्या हम गधों की तरह यूं ही मरते रहें .. बेवकूफ बना रखा है जब बस में नहीं था चैनल चलाना ...तो क्यों खोला न जाने क्या क्या ... रूही शुरू हुई तो बस शुरू ही हो गयी..... उधर से आवाज़ आई एसा है हम भी काम कर रहें और जो है उसी में हमें करना है आपको जिससे कहना कहे दे पर अभी गाड़ी नहीं है ।

किस को क्या कहना .... पता है कंपनी का मामला है कौन बोले, सब को अपनी नौकरी प्यारी है । तनख्वाह चाहिये... मालिक के बारे में बुरा कहना वो भी नौकरी करते हुये किस की हिम्मत होती है ।पत्रकार तो बाहर होते है आफिस में सब नौकर ही होते है सब का घर होता है, बीवी होती है, बच्चों की फीस होती है, मां-बाप का इलाज होता है घर और कार की ईएमआई होती है। दूसरों को इतने दबाव से निकालने वाला खुद कितने दबाव में रहता है ये तो वो खुद ही जानता है ।

खैर रूही को गाड़ी मिल गयी .. रात को दिल्ली की सड़के बड़ी बड़ी इमारतें और ठण्डी-ठण्डी हवा ... पर भविष्य की चिंता और अपने को कोसते हुये कि क्यो पहली नौकरी छोड़ी, कम पैसे थे पर मिलते तो थे । इन ठेकेदारों ,नेताओ, बिल्डरों को तो अपनी दुकान चलानी है जिसमें फायदा हो.... फायदा नही तो दुकान बंद.. किस से कहूं और क्या ... रूही ये सोच ही रही थी तभी ड्राईवर रशीद बोला , मैडम हमारा सिर्फ 2,850 रू का तनख्वाह का चैक है पिलीज़ पास करवा देंगी .. बात सुनते ही रूही कि आंखों से आसू निकल आये पर पत्रकार थी दुनिया के सामने अपने को कमज़ोर नहीं दिखाना है संभलते हुये बोली.... हां ......कल.... बात करती हूं।

गासिप अड्डा में खबर पर सुशील के घर पुलिस पहुंची

राजनीति से लेकर धर्म-अध्यात्म और मीडिया से जुड़ी सत्य और कहीं न प्रकाशित होने वाली घटनाओं को विश्लेषणात्मक अंदाज में अपनी वेबसाइट गासिप अड्डा डाट काम पर पब्लिश करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुशील कुमार सिंह पुलिस के शिकंजे में आते दिख रहे हैं। बताया जा रहा है कि गासिप अड्डा डाट काम के मीडिया गासिप कालम में दैनिक हिंदुस्तान, लखनऊ से जुड़ी एक खबर प्रकाशित करने पर उनके खिलाफ लखनऊ में मुकदमा दर्ज करा दिया गया है। मीडिया से जुड़े लोगों द्वारा मुकदमा दर्ज कराने पर पुलिस ने आनन-फानन में एक टीम सुशील कुमार सिंह के दिल्ली स्थित उनके आवास पर भेज दिया। भड़ास4मीडिया प्रतिनिधि ने सुशील कुमार सिंह से मोबाइल पर संपर्क किया और उनसे पूरे मामले की जानकारी ली। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस उनके घर के बाहर खड़ी है।

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दुनिया का सबसे बड़ा हिंदी ब्लाग भड़ास अपने संपूर्ण 500 सदस्यों और हजारों पाठकों की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार सुशील कुमार सिंह के पक्ष में खड़े होने की घोषणा करता है। आप सभी भड़ासियों, ब्लागरों और पाठकों से अपील है कि सुशील कुमार सिंह की कलम को रोकने की कोशिश करने वाले मीडिया के कुछ मठाधीशों के इशारे पर कराई गई पुलिस की इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई की निंदा करें और अपने अपने ब्लागों पर विरोध दर्ज कराएं। पूरी खबर आप भड़ास4मीडिया डाट काम पर पढ़ सकते हैं। उपरोक्त Read More आप्शन पर क्लिक करके भी आप भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित इस खबर को पढ़ सकते हैं।
जय भड़ास
यशवंत

भड़ास: असली रावण कौन ????

भड़ास: असली रावण कौन ????

किसका विरोध?

किसका विरोध?
सुबह जब अखबार देखा तो पाया की पूरा बिहार बंदी और आगजनी की चपेट में है। मुख्यमंत्री की मार्मिक अपील के बावजूद लोगों का आक्रोश कम नही हो रहा। यह स्वाभाविक भी है। मगर इस नकचढ़ी गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ अपने राज्य को ही आग में झोंक देना कहाँ की समझदारी है !!! आम रेल यात्रिओं और नागरिकों को बंधक बना देने की यह प्रवृत्ति क्या 'उन्ही महानुभाव' से प्रभावित नहीं है जिनका ये विरोध (!) कर रहे हैं ? ऐसा कर न सिर्फ़ वे देश के संसाधनों का नुक्सान कर रहे हैं बल्कि यह बिहार की छवि को और भी धुंधला ही बनाएगी।
रेल मंत्रालय को भी चाहिए की वो अपनी पूर्व चेतावनी को ध्यान में रखते हुए मुंबई को परीक्षा केन्द्र न बनाये और आंदोलनकारी भी अपना विरोध संविधानिक ढंग से रखें। वैसे भी देश में न्यायपालिका के दरवाजे आम आदमी के लिए बंद नही हुए हैं।

डा.रूपेश श्रीवास्तव की मौत ..... हत्या या आत्महत्या?

जो जन्मा है वो मरेगा ही लेकिन कैसे मरेगा और कब मरेगा ये भला कौन जानता है,हां पैदा कैसे होगा ये तमाम लोग जानते हैं। एक थे डा.रूपेश श्रीवास्तव,अक्सर कहानियां सुनाते थे। जिनमें से कुछ कहानियां आपकी नजर हैं....
पहली कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत विद्वान था। एक दिन वह मर गया।
दूसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत बलवान था। एक दिन वह मर गया।
तीसरी कहानी : - एक आदमी था। वह बहुत धनवान था। एक दिन वह मर गया।
इन कहानियों से हट कर एक और कहानी थी जो खुद उनकी आत्मकथा वो सुनाते थे कि एक आदमी था, एक दिन वह मर गया। पिछले कुछ समय से डा.रूपेश श्रीवास्तव इस पन्ने से गायब थे जबकि कुछ लोगों ने उन्हें याद भी करा (कु.मंजुराज ठाकुर और रजनीश के.झा) लेकिन एक न एक दिन सब भुला दिये जाते हैं तो लोग उन्हें भी बस भूलने की प्रक्रिया में हैं जल्द ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। डा.रूपेश श्रीवास्तव भी मर गये और वो अपनी आत्मकथा हमारे लिये छोड़ गये शायद खुद को संत कबीर समझने के मुग़ालते में जिये इसीलिये ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया.....। चलिये मर तो गये लेकिन अब तक ये नहीं पता चल पाया कि उनकी मौत हुई कैसे? ये हत्या है या आत्महत्या? इतनी जल्दी तो मरने वालों में से लगते नहीं थे। आपको शायद पता न हो उन्होंने भड़ास से खूब प्रसिद्धि और पैसा कमा लिया था तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी भयंकर उपलब्धि के चलते उन्हें सफलता की खुशी सहन न हुई हो और हास्य अटैक आकर मर गये हों? ऐसा भी संभव है कि जैसे कुत्ते को घी हज़म नही होता वैसे ही डा.रूपेश श्रीवास्तव को शोहरत न पची हो और पगला गये हों और इसी पागलपन में किसी गाड़ी-साड़ी के नीचे आकर मर गये हों? उनके बारे में मुझे एक रहस्य जो आज उनकी मौत के बाद खोल रहा हूं वह ये है कि वे आखिरी सांस तक हिंदू बने रहे इसलिये नहीं कि मुसलमान या क्रिस्तान बनने में कोई दिक्कत रही हो पर उनके अनुसार ये सम्प्रदाय पुनर्जन्म की सोच नहीं मानते इसलिये डा.रूपेश श्रीवास्तव जीवन भर दुविधा में रहे कि अगर पुनर्जन्म की व्यवस्था न हुई तो प्रेतयोनि तो होती होगी। बेचारे इसी धर्मसंकट में झूलते मर गये। कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें न समझ पाने वालों ने उन्हें प्रसिद्धि और पैसे का ज़हर दे दिया जिससे कि उनकी मौत हो गयी। बस ईश्वर से एक ही प्रार्थना है कि उन्हें कभी शान्ति न मिले।

विघटनकारी राजनीति ; दिशा और दशा.

आज के इस दौर में जहाँ राजनीति के आसमान में विघटनकारी धूमकेतु उछल-कूद कर रहे हों, ये ज़रूरी हो जाता है कि देश के बुद्धिजीवी गंभीरता से विचार करें कि आख़िर इसका इलाज क्या है। इसी ज्वलंत विषय पर चिंतन करने के लिए प० रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के तत्वावधान में एक विचार-गोष्ठी का आयोजन शनिवार दि० २५.१०.२००८ को सायं ७.०० बजे गोविन्दपुरम,गाजियाबाद में किया जाएगा जिसमे प० सुरेश नीरव,मृगेंद्र मकबूल,भगवान् सिंह हंस, रजनीकांत राजू,अरविन्द पथिक,रमाकांत पूनम तथा पी० एन० सिंह अपने विचार व्यक्त करेंगे।
मकबूल

चाँद की दुनिया में है पहला कदम !!

भारत ने भी अपनी ख़ुद की ताकत से चाँद पर अपने कदम बढ़ा दिए,अगले कुछ ही दिनों में "हम"चाँद पर होंगे !!.....हम कौन ? हम याने भारत !!भारत याने हमारा देश !!हमारा देश माने ....वह जगह जहाँ कि हम रहते हैं....जहाँ की मिटटी का उपजा अन्न हम खाते हैं....जहाँ का दिया हम पहनते हैं.... और संजोग से जिसकी किसी भी उपलब्धि पर हमें एक ख़ास किस्म का गर्व बोध होता है...जिसके खिलाड़ियों के किसी खेल के मैदान में जीतने पर हम खुशियों से उत्त्फुल्ल होने लगते हैं......भारत सिर्फ़ एक शब्द ही नहीं हमारी भावना है.... कुछ क्षेत्रों में पाई सफलताओं का जब हम जश्न मनाते हैं...क्या वो हमने ख़ुद ने अर्जित की होती हैं ??यहाँ तक दूर दिगंत में भी कोई भारतीय मूल का व्यक्ति कोई सफलता प्राप्त करता है...तो हमारे देश के अखबार नाचने-गाने लगते हैं...हालाँकि कोई सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले उसके पूर्वज सुदूर किसी देश में जाकर बसे होंगे....और अब उनका भारत से नाता कभी-कभार आ जाने वाली यादों से ज्यादा कुछ नहीं .....!!
यह सब क्या है ? जाहिर है कि हम जहाँ रहते हैं....उस देश का नाम हमारे लिए सिर्फ़ एक शब्द भर नहीं होता...बल्कि हमारे दिल की अथाह गहराईयाँ उससे जाकर जुड़ जाती हैं.... जैसे हमारे बच्चे की किसी सफलता पर हम स्वयं इतराते हैं ...वैसे भारत की किसी भी सफलता पे हम दिवाली मनाते हैं ....!!
यह सफलता भारत के चंद सपूतों ने अपने कठिनतम कठोर संघर्षों ...कठिनतम कठोर कर्मों ...अदम्य जिजीविषा...अपने भीतर आगे जाने की भीषण आग से झुलाल्स्ते हुए पायी होती है.....मगर उनकी सफलता हमारी सफलता बन जाती है क्यूँ.... हमारे भीतर इससे क्या घटता है....इस प्रश्न का उत्तर ही भारत के प्रति हमारे प्रेम का परिचायक है !!
..................................मगर यह किस किस्म का हमारा प्रेम है...जहाँ हम एक तरफ़ तो अपने किसी भी मिशन की सफलता के लिए हजारों-लाखों प्रयत्न करते हैं...अथक श्रम करते हैं..... मगर भारत की बदहाल हालत को उसके हाल पर ही छोड़ देते हैं....याकि भारत को सवारने का जिम्मा हमने बेहद गन्दी कौम (जिसके लिए कोई भी गली मुझे कमतर जान पड़ती है ) को दे रखा है....निजी क्षेत्र में जो लोग भयंकर कर्म में तल्लीन है ...वहीं सार्वजनिक क्षेत्र में ....भयंकर लालच..लिप्सा...भ्रष्ट...और तमाम अनैतिक कामों में लिप्त....!!देश के कतिपय अच्छे लोग बहरत को जो गौरव प्रदान करते हैं....चंद घटिया लोग उस गौरव को उससे भी ज्यादा मिटटी में मिला देते हैं....ऐसे लोगों के साथ क्या करना चाहिए ...?यह सवाल आज का सबसे बड़ा सवाल है !!
हमारे चंद्र मिशन की सफलता हमारे चालीस वर्षो पहले अन्तरिक्ष में घुसपैठ करने की करने की कहानी है....क्या हमारे राजनेता...हमारे नौकरशाह इससे कुछ सबक ले सकते है....और वास्तव में भारत को उल्लेखनीय...रचनात्मक...सबल..देश भक्ति से परिपूर्ण...अंततः उल्लेखनीय नेतृत्व दे सकते हैं !!??

22.10.08

ओ दिल्ली वालों, महाराष्ट्र वालों, असम वालों...

अरे दिल्ली वालों ...महाराष्ट्र वालों...असम वालों....आओ...आओ...!!
ऐसा करो ओ महाराष्ट्र वालों..तुम बिहारियों को मारों....!!
ओ दिल्लीवालों तुम किसी और को चुन लो....!!
ओ पंजाब वालों...तुम तो बड़े ही हट्टे-कट्टे हो..!!
तुम क्यूँ चुप बैठे रहोगे भाई...;
तुम भी यु.पी वालों को पीटो ना ...!!
अरे भइया ..तुम तो नाराज हो गए हरियाणा वालों....;
तुम दिल्ली वालों को ही कूट डालो...;
कैसे तुम्हारी छाती पर चढ़े बैठे हैं वर्षों से !!
ओ दक्षिणी वालों .....
तुम वां दूर-दूर से क्या ताक़ रहे हो...
तुम कश्मीर वालों के साथ ही....
दो-दो हाथ कर डालों ना !!
ओ बंगाल वालों अब तुम्हारी बारी है !
तुम तो झारखंड को ही खा जाओ....;
जैसे छीन लिया है तुमसे गुजरात ने ...
तुम्हारे मुहँ की ओर बढ़ता हुआ निवाला !!
ओ अरुणाचल वालों...
तुम क्या मूर्खों की तरह खड़े हो सालों ?
तुम मेघालय वालों की ही माँ.."...."दो !!

ओ भारत माता ......
कितनी शक्ति है तुम्हारे बेटों में!!??
देखो ना किस वीरता से लड़तें हैं....
ये अपने सगे बहनों....भाईयों से ॥!!
ये तो हंसकर मर मिटेंगे किसी भी दुश्मन से !!
मगर इनको ये तो बतलाओ कि....
किसी और से तो ये तब ना लडेंगे...
जब ये आपस में...
लड़कर मर-मिटने से बच रहेंगे.....!!

ओ भारतमाता शक्ति तो अपार है तुम्हारे बेटों में॥
पर ये नहीं जानते कभी भी कि .....
उसे खर्च कहाँ किया जाए ....
फुर्सत में बैठे तेरे बन्दे...
कहीं भी जाकर धमाचौकडी मचा आते हैं....
नहीं सोचते कभी परिणामों की....
सोचते हैं तो सिर्फ़ वोटों की...!!
हे भारतमाता !!
ये तेरा क्या उद्दार करेंगे ??
ये कपटी तो तेरे सामने ही
तेरी अस्मिता का बलात्कार करेंगे !!
ये तुझको अभी-अभी भाड़ में झोंक डालेंगे !!
तू ऐसा कर ...
अभी की अभी तू कूद जा किसी गहरे कुँए में....
या देखती रह कि कैसे करती हैं ...
तेरी ही संताने....तेरी योनि पर प्रहार ......!!??

Impact: नई दुनिया..एक शर्मनाक पत्रकारिता

Impact: नई दुनिया..एक शर्मनाक पत्रकारिता

शर्म करो ठाकरे...?????

ठाकरे जी की बातों से तो ऐसे लग रहा है की जैसे हम फ़िर १९४७ के भारत की और जा रहे है...अब सब अपने प्रदेश और भाषा की बात करेंगे?देश कहीं पीछे छूट गया है...प्रदेश हावी हो रहें है.अरे भाई देश बचेगा तो ही तुम बचोगे...वरना फ़िर वाही घुलामी आने वाली है...लेकिन क्या करें?नेता लोग तो देश तोड़ने पर तुले है...अरे शर्म करो.ठाकरे जी आज कोई सरदार पटेल नहीं आने वाला है....क्यूंकि उससे भी तुम लोग गुजराती या कुछ और कह दोगे....ना जाने इस देश का क्या होगा?सारे नेता,अभिनेता और भुधिजिवी खामोश क्यूँ है?क्या सोच रहे है वो? इन घटनाओं की.......पुनरावर्ती................पूरे देश में होने लगी तो क्या ठाकरे..मुंबई में सुरक्षित रह पायेंगे.......अब बहुत हो गया ठाकरे जी एक बनो नेक बनो....रजनीश परिहार...बीकानेर...

वह बूढ़ा

वह बूढ़ा
उस कडाके के ठार में उपरनी से टांट ढांपे डूबा सरापा गर्द में वह जर्जर बूढ़ा जो रोशनपुरा की खड़ी चढाई पर सरोसामान से लदा ठेला खींचतें-खींचतें मन्झियार चढ़ाव आ खड़ा हुआ और टस से मस नहीं हुआ जिसके सलवटी लिलार से ढलकता है पसीना और कभी भी वह रपट सकता है जिसके एक और राह से सटी झुग्गियों में से अपना सा नाता समझ सब उसे दुबीचा से देखतें हैं मगर वह अनुभवी अपने में तल्लीन ताजरिब से खड़ा परिस्थिती को तौलता हैं और तर होती बरोनियों के सूखने की जोह में ढांस को बजब्र रोकता है दूबदू जिसके दुतरफा धिन्गाई से धापती देसी देसावरी गाड़ियों के पल्लड़ और पार्श्व में स्थित जुगादरी हनुमंत बुतकदा मुस्लमान होकर भी चुपके निहुरता है और किसी अज्ञात पुरचक से ऐंठी पिराती फिल्लियों पर जोर लगा धूजते पैरों को पुनः थामता है वह अपने इस जीवन से निरवार होना चाहता है की तभी अकस्मात सम्मुख उसके बाट जोहती परित्यक्ता बिटिया और ठण्ड में ठिरता नंग धढंग धेवता दिखता है उन्हे देख उसास कर वह पुनश्च जीवन से गस जाता है और अपने मैं ही कर संलाप सरिया कर सकत अपनी जीवन को ठेले पर लादे चल पड़ता है स्मृति मैं उसके दशकों पूर्व मरी माँ का उष्ण स्नेह स्पर्श और फीकी अरहर दाल में मिर्चा का धुंगार तिरता है

माँ

माँ
जाड़े की रात्री मैं ठिठुरती - कांपती सूखे पत्र - सी हिलती , उकडूं बैठ निहारती छप्पर को , कहाँ से आती ये हवा सोचती ;पर न दिखा सामने पटविहीन पट जहाँ से प्रवेश करती बेधड़क , निर्लज्ज हवा विशाल अट्टालिकाओं के प्रशस्त उष्ण प्रकोष्ठों से पिटी दिखा रही , दादागिरी मेरी माँ की पीठ खुली मगर कान तक ढकी साड़ी ,बेलबूट की जगह ,छपे असंख्य छिद्र जिसमे अंत तक दुर्बल काय मेरी माँ पर प्रसारित - प्रशस्त बाहुपाश उसके , प्रगाढ़उष्णता से भरी करती स्वागत नित्यलौटा जब मैं विकल ; समीप रखी शाल उड़ा मुझे प्यार से कांपती उठती वह सुघड़ परोसती खाना मुझे एक रोटी व कुछ दाने दाल के ;फिरती हाथ पुचकारती कहती "ले बेटा बची आज एक ही रोटी खा गई में निठल्ली पूरी पाँच बेठी बेठी " अन्तिम निगल ग्रास शोण का माँ के हित तनिक भी तो न कर सका ;लाख योनियोपरांत देह मिली तो क्या जीवन बीते अभावों में प्रारब्ध के विराम तक धिक्कार है मुझ पर इन बाहुओं के बल पर देख माँ को कोने मैं जो लेटी थी जो बरफ की शिला सी ठंडी धरा पर , साड़ी को कफ़न सा लपेट करवटें बदलती ; ओह ! माँ तू मर क्यों नहीं जाती ?क्यों भुगत रही पीड़ा , किस प्रत्याशा से दांव लगाय बैठी मुझ निरुत्साही पर ; सहसा चोंक पड़ा मैं इस निज कुत्सित विचार से अंतरात्मा ने भी धिक्कारा , सोच माँ कीअविधमानता छलक उठे नयनों से अश्रु समस्त देह के अवयव थर - थर काँप उठे इस निज कुत्सित विचार से आया मैं बाहर उठे बोझिल कदम ध्वांत मैं विलोक फलक पर टिमटिमा रहा तारा वाही एक मात्र कर रहा था जो अकेला ही तम् परिहार ,मानो कह रहा हो मुझसे माँ के विश्वास पर धर विश्वास तू होगा प्रत्यस्त गमन इस अन्धकार का का एक दिवस आएगा हँसता हुआ नव विभात ,खिलखिलाती रश्मियों का होगा सतत् पर्यास " हाँ ठीक ही समझा मैं इस दूरागत विचार को माँ के ललाट को चूम कर उड़ा उसे शाँल जुट गया मैं सुखद भविष्य की कल्पना को साकार करने

फिर भी सबको जीना है !!

Tuesday, October 21, 2008

फिर भी सबको जीना है !!

मैंने जो जिन्दगी को देखा है...जब सपने तार-तार हो जाते हैं...जब आंखों को अंधेरे के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता....जब तन और मन सबसे आदमी घायल हो जाता है...जब कहीं से कोई आसरा नहीं होता....जब एक भी शब्द कहने को नहीं होता.....जब कुछ भी ऐसा नहीं होता जिसके आसरे पर हम जी सकें...तब भी समूचा -सा रोना नहीं होता..... मतलब आशा की कोई एक किरण की आशा कहीं-न-कहीं मन के किसी कोने में छिपी ही होती है....वही हमको एकदम से टूटने से बचाती है....वही हमें चिंदी-चिंदी होने से बचाती है !!
सपने जब एकदम से मर जाते हैं...या जब उन्हें मरा हुआ मान लिया जाता है...तब भी उनकी राख से नए सपने पैदा हो जाते हैं...और वो सपने तो पिछले सपनों से भी ज्यादा पुरजोश ...पुरनूर ...पुरसकून ...पुरहंसी ...पुरखुशी ....होते हैं !!इसलिए तो सब पागल नहीं होते....और ग़मों से एकदम से मर भी नहीं जाते......!! जिन्दगी का मकसद आदमी को हराना या उसे मात देना थोड़ा ही ना है....जिन्दगी को क्या इन फालतू बातों को सोचने का वक्त भी है ??.....नहीं जिन्दगी का मकसद आदमी को उसके पूरे यौवन के साथ....उसकी पूरी खुशी के साथ.....उसके पूरे जज्बातों के साथ....उसकी सारी संवेदना के साथ...उसको पूरी शक्ति के साथ...और उसको,उसकी पूरी तल्लीनता के साथ उसे ना सिर्फ़ जीने देना है,बल्कि उसके जीने में उसकी मदद भी करनी है......!!
दरअसल जिंदगी किसी को नहीं हराती ..... हम ही हार जाते हैं......दरअसल जिन्दगी किसी को मात नहीं देती....हम ही आपा खो बैठते है....ग़लत चालें चलते हैं...और मात खा जाते हैं.....और क्या......बाकी इश्क...प्यार.....धोखा.....दुःख....सुख...मरना....जीना .......लगा हुआ है....लगा ही रहेगा.....हम तो बस एक दूसरे के काम आ सकें ...यही बहुत है...क्यूँ सच है ना ....!! अगर किसी ने ग़लत किया है...या कर रहा है...ये उपरवाला जाने वही न्याय करे.....मगर ये तो निजी जीवन की बातें हैं.....समाज के सन्दर्भों में तो हमें सबके हित के लिए लड़ना ही होगा......कहा है..."आदमी ,आदमी को क्या देगा.....जो भी देगा वही खुदा देगा....और क्या कहूँ.....बस....!!!

बधाई हो बधाई ! चँद्रयान की सफलता पर इसरो को , वैज्ञानिकों को और देश को , .....

बधाई हो बधाई ! चँद्रयान की सफलता पर इसरो को , वैज्ञानिकों को और देश को , .....

जिंदगी `प्योर झंड´ है भाई...

कई दिनों से सोच रहा हूं- पुराने जमाने में ऋषि-मुनि आखिर क्या पीते-खाते थे, जिंदगी सुहानी धूप सी नजर आती थी। बिल्कुल मस्त-मौला। न खाने की न पहनने की टेंशन। पर अपनी? हैडिंग पढ़ चुके होंगे- जिंदगी `प्योर झंड´ है भाई...! कैसे? अरे भई इस सोच-विचार में अपनी जिंदगी को झंड ना करें और चुपचाप मेरा दुखड़ा सुनते रहें। पहला स्पष्टीकरण तो यह देना चाहता हूं कि आप लोग जिस `झंड´ शब्द को अश्लील मान रहे हैं, वह कदापि नहीं है। इस शब्द के बारे में टुच्चे विचार मन में कभी आना ही नहीं चाहिए। झंड तो ऐसा परोपराकारी है, जो बिना किसी मतलब और स्वार्थ के अपने-आप पनपता है। आपने देखा होगा- रेल की पटरियों के आसपास, खेतों में जरूरी पौधों के आस-पास (जहां कोई झांकता भी नहीं), विशाल बरगद के नीचे कहीं नजर बचाकर छिपता -फिरता। नहीं देखे बड़े-बड़े या छोटे-छोटे झाड़-झंखड़, जो बिना स्वार्थ पनपते हैं और उसी राह पर केवल बकरियों का पेट भरकर अथवा मकडि़यों को आश्रय देकर अपना जीवन गुजार देते हैं, उन्हें ही हम लोग देसी भाषा में `झंड´ बोलते हैं। जिससे इन्हें प्रशंसा मिल सकती है (मनुष्य), उसके ये झंड बिल्कुल भी काम नहीं आते और जो ना गुण ना अहसान जताएंगे, उनके लिए ये वहीं खड़े मुस्कुराते रहते हैं। अपनी जिंदगी भी अक्सर झंड ही हो गई। या कहें झंड से ज्यादा ही हो गई है। इधर बीवी परेशान, उधर बॉस। इधर मकान मालिक, तो उधर मकान का जमादार तक। सुबह दूध देने आने वाले से लेकर, शाम को टिफिन देने आने वाला तक परेशान। कहता है- आपके कारण मेरी जिंदगी झंड हो रही है। भाई मैंने कब कहा- मुझे दूध या टिफिन दो, नहीं जचता, तो बंद कर दो।

हां तो बात रात के एक बजे से शुरू करते हैं। रात की ड्यूटी है। काम से फारिक होकर रात साढ़े बारह के लगभग क्रिकेट खेलते हैं। यहां सभी प्लेयरों ने पहली बॉल में ही आउट करके और बॉलिंग में लास्ट ओवर देकर जिंदगी झंड कर रखी है। तो फील्डिंग कर-कर के गोडे (घुटने) दुखने लग जाते हैं। सुबह के पांच बजे तक नींद नहीं आती, जिंदगी यहां भी झंड। अब नींद नहीं आ रही तो कुछ तो करूंगा (गलत ना समझें)। केवल पुस्तक पढ़ता हूं, आचार्य चतुरसेन की। पहली बार खरीदी इन भाईसाहब की किताब। इन्होंने भी जिंदगी वो ही करदी, जो इतनी देर से बताता आ रहा हूं। कैसे? भाई पुस्तक का नाम है `वयं रक्षाम:´। पढ़कर देखना मालूम चल जाएगा। नारद को भुक्कड़, विष्णु को परस्त्रीगामी, इन्द्र को दुराचारी, और जाने किन-किन के अवैध संबंध बता रखे हैं। चतुरसेन जी ने तो मेरे साथ-साथ नारद, विष्णु और सभी ऋषि-मुनियों-देवताओं की जिंदगी भी झंड कर दी। चलो यहां पांच बज जाते हैं और मुझे नींद आ जाती है। कुछ सुकून मिलता है। पर रात को जो स्वप्न दिखाई देते हैं, सुबह उठकर मालूम चलता है कि उन्होंने रात को फिर मेरी जिंदगी झंड कर दी।

सुबह सवा नौ के करीब गेट खट-खट होता है। करीब पन्द्रह मिनट के बाद जब मैं दरवाजा खोलता हूं, तो दूध वाला कहता है- `तेरे कारण मेरी जिंदगी झंड हो गई है। सारे मौहल्ले वाले उठ जाते हैं पर तू, जाने क्या खाके सोता है।´ मैं चुपचाप आधी नींद में ही लोटे में दूध ले लेता हूं और फिर वही मुंह पर चद्दर लपेटकर सो जाता हूं। पौने दस बजे फिर गेट खट-खट होता है। मैं पूछता हूं- `कौन है?´ गुस्से में और जोर से खट-खट होता है। मैं लोटा लेकर फिर बाहर जाता हूं और गेट खोलता हूं, तो टिफिन वाला कहता है- `तेरे कारण मेरी बीवी मुझ पर शक करती है। कहती है दो मिनट का रास्ता है, बीस मिनट कहां मस्ती करते हो। काम की कोई सुध नहीं है। जिंदगी झंड कर दी तूने।´ मैं एक हाथ में टिफिन पकड़ लेता हूं, तो साथ वाला पड़ोसी जो इस झिक झिक का मजा ले रहा होता है, वो भी ताना मार ही देता है- `अरे भाई दूध तो पहले ही ले लिया, लोटा तो अंदर रख ही देता।´ अब दुबारा सोने का प्रयास करता हूं तो बीवी का फोन आता है- `गुड-मोर्निंग डार्लिंग। (पिछली पोस्ट में बता चुका हूँ बीवी और बच्चा दोनों गंगानगर हैं।) अपने बेटे से बात करोगे?´ मैंने मुंह पर लपेटी चद्दर में से केवल एक कान ही बाहर निकाल रखा होता है- `अभी नहीं। बस पांच मिनट और सो ले लेने दो। दस मिनट में दुबारा फोन करता हूं।´ कहकर सोने का पूरा प्रयास करता हूँ। नींद तो उड़ ही चुकी होती है। आखिर ऐसे ही लेटा-लेटा साढ़े दस बजे उठता हूं। नहा-धोकर तैयार होता हूं। इतने में बीवी का दुबारा फोन आता है- `क्योंजी दस मिनट हुए नहीं क्या?´ `अरे भूल गया था डार्लिंग´- मैं दयनीय भाव से कहता हूं (मैं जितने लोगों से डरता हूं उनमें एक मेरी बीवी भी है)। `आपका बेटा खेलता-खेलता सो गया। मैं बीच में केवल आधे घंटे फ्री थी। अब काम कर रही हूं। और बाद में जब टाइम मिले तो फोन कर लेना, नहीं तो मत करना।´- बिना कुछ सुने-पूछे मोबाइल कट जाता है। बीवी के बारे में नहीं बोल सकता कि उसने मेरी जिंदगी झंड कर दी। बोल दिया तो मैं जानता हूं कि जिंदगी अभी तो केवल झंड ही है, बाद में क्या-क्या होगी- या तो खुदा या फिर मेरी बीवी ही जानती है।

मेरा दोपहर का समय किस तरह कटता है, नहीं बताना चाहता, नहीं तो जाने आप क्या-क्या सोचेंगे। शाम को छह बजे ऑफिस जाना होता है, उससे पहले मैं बहुत सारे `सु´ और `दुष्´ कर्म कर चुका होता हूं। घर ऐसे ही मौहल्ले में है ना भाई। मेरा कसूर थोड़े ही है। कभी किसी कॉलेज गर्ल का सामूहिक एक्स-रे (सभी मित्रों द्वारा सम्पूर्ण अंगों को निहारना) करके `दुष्´ और किसी कॉलेज बॉय को बाइक पर लिफ्ट देकर `सु´ कर्म करता रहता हूं। कभी इंटरनेट पर `सविता भाभी´ की वेबसाइट पढ़कर `दुष्´ और इंटरनेट पर ही `सम्पूर्ण रामायण` वेबसाइट से सुंदरकांड का पाठ कर `सु` कर्म भी करता रहता हूं। इसी प्रकार लगभग पांच-सवा पांच बज जाते हैं। अब पुन: नहा-धोकर ऑफिस जाने की तैयारी करता हूं, तो एक बार फिर गेट पर जोर से खट-ख्ट की आवाज आती है। फटाफट पैंट-शर्ट पहनकर, हाथ में ताला लेकर गेट खोलता हूं तो सामने वही बिना दांत वाले अंकल जी। अरे मेरे मकान मालिक। मुंह लपलपाते हुए कहते हैं- `बेटा तूने तो मेरी जिंदगी झंड कर रखी है। कब तक टंकी भरता रहूं। ठंडे मौसम में भी तीन बार नहाता है। पानी का बिल देता है सिर्फ पचास रुपए। ऊपर से धौंस और की मैं कौनसा ज्यादा पानी यूज करता हूं।´ इनकी बिना कुछ सुने मैं कमरे को ताला लगाकर चल देता हूं। ऑफिस में मेरे बॉस- राइट पौने छह बजे फोन करते हैं- संदीप कितनी देर में आ रहा है? मैं कहता हूं `भाईसाहब अभी तो पन्द्रह मिनट मेरी ही तरफ बकाया हैं।´ बेचारे उनकी भी तो जिंदगी झंड है, किस-किस ने कर रखी है, यह बात ना बताते हुए आगे कहानी जारी रखता हूं।

साढ़े छह के लगभग मैं फिर अपनी बीवी को फोन करता हूं। `मिल गया टाइम?´ तीखा प्रश्न सुनकर प्यार से समझाता हूं बीवी को- `टाइम बिजी चल रहा है। वक्त बदलने वाला है। बहुत जल्दी किस्मत चमकेगी। तुम फिक्र मत करो। फिर जिंदगी झक्कास हो जाएगी।´ अचानक मोबाइल पर `टूं-टूं´ की आवाज आती है। मैं मोबाइल देखता हूं तो कोई न्यू कॉल भी नहीं। बीवी से बात जारी रहती है। एक-डेढ़ मिनट बाद फिर `टूं-टूं´ की आवाज आती है। देखूं तो बैटरी में मात्र एक सैल बचा है। `डार्लिंग। बैटरी नहीं है। चार्ज करके फोन करूंगा। प्लीज।´ मैडम को समझाता हूं। `देखो- आईंदा मुझसे बात करनी हो, तो बैटरी पूरी चार्ज करके बात किया करो। सुबह नींद आती है। दोपहर में बिजी हो। शाम को बैटरी नहीं है और रात को तुम्हारे चतुरसेन ने मेरी जिंदगी झंड कर रखी है। ´ आखिर मेरा मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। इस मोबाइल ने भी कर रखी है मेरी जिंदगी वही, अब तो बताते हुए भी शर्म आती है।

जिस काम के लिए ऑफिस आया था, उसकी घड़ी आ गई। रात के साढ़े आठ बज गए। अरे खाना खाने का समय। टिफिन वाला अपने समयानुसार आठ बजे ही टिफिन दे गया। सभी बंधु-बांधव अपने अपने टिफिन लेने चले जाते हैं और पीछे-पीछे मैं भी। टेबल पर टिफिन खोलते ही क्या खुशबू आती है, बता नहीं सकता। सब्जी में एक ज्यादा पका हुआ प्याज (बिल्कुल काला हो चुका होता है) तैर रहा होता है। पहले-पहले वही रोटी के टुकड़े के साथ आता है। अगर मुंह के पिछले वाले इलाके में आंखें होती तो शायद ना दिखता पर अब तो दिखना जायज ही था, वो प्याज का टुकड़ा ना होकर एक बेचारे कॉकरोच का बेबी था, छोटा सा। बेचारा मर गया था। उस पर इतनी दया आती है कि खाना ही नहीं भाता। उस टिफिन को वहीं छोड़कर दूसरे मित्रों का खाना खाकर पेट भरता हूं। इस कारण मेरे मित्रों की जिंदगी भी मैंने झंड कर रखी है, बेचारे बोलते ही नहीं, बाकी नजरें तो ऐसी गिराते हैं, कि कोई बेशरम ना हो तो वहीं हार्टअटैक हो जाए। वैसे मेरे टिफिन में पहले भी कई प्रकार के जानवर निकल चुके हैं, मसलन- बड़ा कॉकरेच, चींटा, सलाद में सुंडी और बेचारी चींटियां तो आए दिन मिलती ही रहती है। बहुत बार टिफिन वाले को शिकायत की, पर कार्रवाई नहीं होने पर चलो दिन गुजार रहा हूं।

यहां मेरे साथ एक समस्या हमेशा रहती है। छह बजे ऑफिस टाइम है। छह से साढ़े आठ बजे तक जो काम आता है वो मैं वेटिंग लिस्ट में डाल देता हूं। मतलब बिना खाए काम नहीं होता। जोर से भूख लगी होती है। भाई सुबह केवल दो परांठे ही तो खाए थे। अब साढ़े आठ बजे खाना खाकर आता हूं तो दूसरी समस्या आगे आ जाती है- खाने के बाद काम करने का मन नहीं करता। जैसे तैसे आखिर काम जाने कैसे हो ही जाता है। फिर वही साढ़े बारह बज जाते हैं और फिर वही क्रिकेट। फिर वही गोडों का दर्द और फिर वही चतुरसेन। फिर वही बीवी का फोन और दूध-टिफिन वाले की खटपट। फिर वही इंटरनेट, कॉलेज गर्ल। फिर वही सविता भाभी और वही सम्पूर्ण रामायण का सुंदरकांड। जिंदगी बराबर वोही `प्योर झंड´। लगातार दिन-ब-दिन। एक पल नहीं बदलता। कैसे कहूं कि जिंदगी झंड नहीं है और वो भी बिल्कुल `प्योर´। http://dard-a-dard.blogspot.com/

21.10.08

होश में आओ ठाकरे

राज तुमने गुंडागर्दी की हद पार कर दी है। ऐसा लगता है तुम्हे उत्तर भारतीय की प्रतिभा सताने लगी है। अरे ठाकरे प्रतिभा का ज़बाब प्रतिभा से दो ना... अगर हम भी तुम्हारी तरह मारपीट पर उत्तारु हो जाए तो तुम्हे दफ़न के लिए दो गज ज़मीं भी ना मिले। पर हम तुम्हारी तरह कायर नही हैं। जिन्ना ने पाकिस्तान को बांटा और तुम हमारे हिंदुस्तान को बाँटने की साजिश करते हो, वो भी सिर्फ़ चंद वोटो के लिए। हिम्मत है तो गरीब मराठी किसान जो भूखे मर रहे है, आत्महत्या करने को मजबूर हैं, उनकी मदद करो... तुम्हे काफी वोट मिलेंगे ।
चंद गुंडों को साथ मिलकर पार्टी बना लेने से कोई नेता नहीं बन जाता... नेता बनने के लिए मर्द बनो इंसान बनो... देश को बाँटने की साजिश बंद करो।

थम गई पवन की साँस

नाम -पवन
पेशा - विद्यार्थी
पता -नूरसराय, नालंदा , बिहार।
दोष-अपने अच्छे भविष्य की चाहत में रेलवे भर्ती की परीक्षा देने मुंबई गया
सज़ा - मौत
ज़रा सोचिए ,क्या पवन ने उतना बड़ा गुनाह किया था जिसकी सज़ा उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

फिर बुलाती है राहें

तन्हाई की चुभन

रातो में सताती है

जाने कौन है वो जो

दबे पाव चली आती है

क्या जनता हूँ में उसे

या बस मेरा एक खवाब है

जाने क्या है उसमे

की हर पल वो मेरे पास है

दिन रत भटकता हुआ

जाने में किधर चल पड़ा

उसकी तलाश में ख़ुद को दूदने लगा

सोचा मेलूँगा तो कुछ पूचुगा उससे

पर जब मेला तो

होसे ही गवा गया

अब उससे बिचादने का गम

मुघे हर पल सताने लगा

जाने क्यों हर पल रातो में वो मुगे

वह रुक रुक कर रुलाने लगा

प्यार और इंतजार की इस हद को तोड़कर

अब मुगे जाने कौन सा रास्ता है जो फिर बुलाने लगा

फिर बुलाने लगा फिर बुलाने लगा !

यह गलत है .. और गलत है

राज ठाकरे ! हम आहत हैं ..
हिंदी ..मराठी ..के नाम पर यह कैसी विकृत मानसिकता का परिचय दे रहे हैं आप ..
यह गलत है .. और गलत है !

चलते चलते रस्ते में कई दोस्त नए मिल जाते हैं
कई जन्मों के ज्यूँ साथी हों ,यु हँसते व् बतियाते हैं !!
चुपके -चुपके महफ़िल में वो हमको देखा करते हैं
पर बात हमारी आती है तो लब से लब सिल जाते हैं !!

हिज्र के मौसम में अक्सर दिल को गहराई मिलती है
इस मौसम में अक्सर कुछ गम के गुल खिल जाते हैं !!


अजब-सी तमाशा-सी दुनिया है,गरीबों का सहारा कोई नहीं
सड़कों पे देख के लौंडों को माथे पे बल पड़ जाते हैं !!
किसी से कोई राम-राम नहीं,कहीं कोई भी दुआ-सलाम नहीं
कौन स्कूलों में पढ़ते हैं और काहे को पढ़कर आते हैं !!


सब अपनी खातिर जिन्दा हैं,फ़िर गैर से क्यूँ तो रुसवा हैं
जब सब अपना धंधा करते हैं ,औरों से क्यूँ घबराते हैं !!
सब अपनी-अपनी मौज करो यारों,सब गम अपने हमें दे दो
हम तो गाफिल सबको खिलाकर बचा-खुचा फ़िर ख़ुद खाते हैं !!


कौन है हम दोनों में सबसे गहरा और सबसे बड़ा,इस बात पर
हम अक्सर साहिल पर आकर इस समंदर से ही भिड जाते हैं !!
इश्क से ज्यादा इन दिनों गैर एतबार की बात कोई भी नहीं
जन्म-जन्म की क़समें खाकर ये इसी जन्म में मुकर जातें हैं !!


कज़ा से गहरी और मुकम्मल कोई चीज़ नहीं कायनात में नहीं
अबे रूक जा ओ यमराज के बच्चे,मियाँ "गाफिल" भी आते हैं!!

20.10.08

भोत ही चालू लुगाई है...

आज शेव करवाने गया था। जाहिर सी बात है नाई की दुकान पर। नाई अभी शेविंग क्रीम लगा ही रहा था कि एक दुबला सा आदमी दुकान पर आया। काउंटर के पीछे की दीवार पर लगे शीशे में चेहरे को कभी ऊपर से तो कभी नीचे से कई बार देखा। बाल लगभग पचासेक ही थे, पर कंघा तो फिरा ही लिया। अब नाई और इस व्यक्ति में आपस में बातचीत शुरू हुई। नाई मेरी शेव भी कर रहा था और साथ ही रोमांच के साथ उससे बात कर रहा था। मैं मात्र वहां दर्शक की भांति उपस्थित था। उस व्यक्ति को कोई फर्क नहीं, वहां मेरे अलावा यदि चार अन्य भी होते। इसलिए उसने अपनी कहानी जारी रखी। उन दोनों के बीच हुआ संवाद मैं शब्दश: लिख रहा हूं। इनकी बातचीत में लगभग हर वाक्य में ही मां-बहन की गालियों का प्रयोग हुआ था, केवल उसी का संपादन मैंने किया है। नाई का नाम सुरेन्द्र है और दूसरे व्यक्ति का मुझे मालूम नहीं-

`अरे क्या हाल-चाल हैं´- सुरेन्द्र ने उस्तरे में ब्लेड डालते हुए पूछा।
`अपने तो वैसे ही हैं, जैसे कल थे।´
`मतलब´
`आ गई वो। दिमाग खराब कर रखा है। मेरा तो बोलने का भी मन नहीं करता। दिल ना टूट जाए, इसलिए ही बोलता हूं। थोड़ा सा हंसके दिखा देता हूं बस। भोत ही चालू लुगाई है...´
`कब आई´ थोड़ी देर कोई जवाब न पाकर सुरेन्द्र शेविंग क्रीम लगाने लगा। अचानक उसे लगा कि उस व्यक्ति ने शायद उसकी तरफ देखा है, तो हाथ रोककर सुरेन्द्र ने कहा- `क्या´
`कल बहुत हाथ-पांव पड़ी। बोली मुझे मत छोड़ो। मेरा जमाने में कौन है। ना बाप ना भाई।´
`फिर तुम क्या बोले।´
`मेरा पूरा सोना चाहिए। बोलना क्या था।´
`कितना था´
उस व्यक्ति ने मालूम नहीं क्या बोला, मुझे भी नहीं सुनाई दिया।
`कितना´ सुरेन्द्र ने फिर पूछा।
`पांच तोले´
`बड़ी गंदी औरत है यार। घर का सोना दूसरे को दे आई।´
`एक महिने पहले चांदी की पायजेब भी गुम हुई है।´
`गुम-गाम ना हुई भैया। दे आई होगी अपने यार को।´
`जिसने सोना नहीं छोड़ा। वो चांदी क्या घंटा छोड़ेगी।´

अभी तक मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बात किसकी चल रही है। लेकिन फिर भी इस स्टोरी में इंट्रेस्ट तो आ रहा था।

`कल गाना बजा रही थी- मुझे नींद ना आए मुझे चैन ना आए। बाद में बजाया- माधुरी दीक्षित का- धक-धक करने लगा। कभी बजाती है- मेरी किस्मत में तू नहीं शायद। और कभी- बहुत प्यार करते हैं...´ सारे गाने लय में गाकर सुनाए उस व्यक्ति ने।
`क्या बात है। लुगाई तो भाईसाहब भोत ही चालू है।´ सुरेन्द्र ने जोर लगाया।
`गई थी अग्रवाल क्लिनिक। डॉक्टर ने बताया बताते- तेरे में तो कोई दिक्कत नहीं। पति में ही कमजोरी है।´
`हां, पति में तो होनी ही है।´
`हां-हां, नामर्द जो है, उसका पति।´
`और कौन-कौन नामर्द है?´ सुरेन्द्र ने पूछा।
`वो पूरे मौहल्ले को जानती है, कौन मर्द है और कौन नामर्द।´
`मैं भी देख रहा हूं एक छोरी।´
`तेरी घरवाली को भी पता है क्या।´
`उसका क्या, वो मेरा सोना ला दे, फिर देखूंगा।´ अब मुझे पता चला कि यह सारी कहानी वो अपनी पत्नी के बारे में सुना रहा है।
`कौन है?´ सुरेन्द्र ने छोरी के बारे में पूछा।
`नीचे रहती है ना। अरे बो ही जो उस दिन लड़ रही थी सब्जी वाले से। तुम्हारी दुकान के सामने।´
`मैं ना जानूं भैया। कौन-कौन लड़े सब्जी वाले से।´
`अबके दिखाऊंगा।´
इतने में ही तीन लड़के दुकान में घुस गए। उन तीनों के शोर-शराबे में उस दूसरे व्यक्ति की बात लगभग दब सी गई। वो चुपचाप उठकर बाहर चला गया। उसे ना तो नाई सुरेन्द्र ने ही थोड़ी देर बैठने का कहा। मेरी शेव लगभग पूरी हो ही चुकी थी।

मैंने उठते ही पूछा-`कौन था कलाकार।´
`थोड़ा-भोत टाइमपास कर देता है।´ सुरेन्द्र ने मुस्कुराते हुए कहा। http://dard-a-dard.blogspot.com/

मुम्बई ककर...फेर नहिं पूछिअह...

हेलो मिथिला 

         महाराष्ट्र मे रेलवे के परीक्षा देबय लेल गेल उत्तर भारतीय छात्र सभ पर जमि कs कहर बरपाएल गेल अछि. विद्यार्थी सभ घेर-घेर कs मारल गेलाह... बेरहमी सं पिटलाह. ई पिटाई कोनो दोष... गुंडागर्दी... छेड़खानी... तस्करी... बम फोड़य के लेल नहीं कएल गेल. ई पिटाई उत्तर भारतीय होय के कारण कएल गेल. उत्तर भारतीय मे अहां पंजाब... हरियाणा... दिल्ली... हिमाचल ई सभ नहिं मानिऔ. ई सभ भैया थोड़े छथिन्ह. भैया लोक त छथिन्ह यूपी बिहारी. मराठी लोक उत्तर भारतीय मे यूपी-बिहारी लोक के गिनय छथिन्ह. अहां कहबय बिना दोषे विद्यार्थी सभक के दौड़ा-दौड़ा कs पिटलक. अहां के ई दोष नहिं बुझायअ जे बिना ठाकरे जी... चाहे ओ राज ठाकरे होताह आ हिनकर चचा बाल ठाकरे.... के अनुमति के अहां महाराष्ट्र मे घुसि रहल छी... कि विद्यार्थी सभ के ई पता नहिं छलन्हि जे मुम्बई ठाकरे के बाप के छै ? अगर पता छलन्हि त बिना हुनकर अनुमति के ओहि ठाम जनाय नीक गप्प नहिं न ? लागय अ ई सोचि कs गेलहु जे लालू जी रेल मंत्री छथिन्ह त किछ नहिं होएत... त बुझबा मे आबि गेल नहिं ?

अरे बाबू ई राजनीति छै...लालू जी ऊपर- झापर जे कहथिन्ह जे राज मेंटल अछि. देश तोड़य के बात कs रहल अछि. ओकरा गिरफ्तार करबाक चाही. भीतर सं अगर ओ ई बात के गंभीरता सं लेने रहतथिन्ह त प्रधानमंत्री... केंद्रीय गृहमंत्री सं तुरंत राज के खिलाफ कार्रवाई नहिं त इस्तीफा के धमकी द देने रहतिएथिन्ह. ई पहिल बेर नहिं भेल अछि. एहि सं किछ दिन पहिनहु बिहारी... यूपी के लोक सभ पिटाएल छलाह... सामान सभ छिन मारि-पिट कs लोक के भगा देल गेल छल... कि भेल? राज ठाकरे अखनो दहाड़ि रहल अछि. कि कांग्रेस के सरकार राज के खिलाफ किछ कएलक? सिर्फ देखाबय लेल हिरासत मे लेलक... राति भेल नहिं के घर चलि गेलाह हीरो के माफिक जुलूस लsक जेना विश्व विजय कs आएल होताह. राज आओर मजबूत भs गेलाह... राज के बढाबय मे आखिर हाथ ककर अछि... कि अहां के लगैत अछि जे अगर कांग्रेस नहिं चाहय त राज के ससरीओ चलि सकैत अछि. ओ त शिवसेना के कमजोर करय लेल कांग्रेस राज के राजनीति खेल रहल अछि. मुदा एहि मे पिसा रहल अछि यूपी बिहार के बेकसूर लोक. मुदा कि अहां के लागय अ जेना मराठी मानुस के नाम पर बिहारी...यूपी के विद्यार्थी सभ के पिटल गेल... ओकर बाद राज के समर्थन मे नारा लगाबैत जुलूस निकालय गेल... ओहिना कि यूपी-बिहार के नेता सभ एकजुटता देखा सकय छथिन्ह. कखनो नहिं. डीएमके के सांसद सभ के देखिऔ...श्रीलंका मे तमिल मुद्दा पर सभ इस्तीफा द देलखिन्ह अ. कि बिहार- यूपी के सांसद मंत्री ई क s सकय छथिन्ह ?
बड़का...बड़का गप्प हांकय वाला लालू जी... रघुवंश जी... शकील अहमद जी... अली अशरफ फातमी जी... रामविलास पासवान जी... मीरा कुमार जी... जयप्रकाश जी कि मनमोहन सिंह जी सं जाs क देशमुख जी के शिकायत करथिन्ह जे महाराष्ट्र मे अहांक कांग्रेस सरकार अछि आ किछ नहिं क रहल अछि. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल जी के त गप्पे छोड़ु हुनका सं नीक रहत जे ई सभ श्रीप्रकाश जायसवाल सं मिलि लेथिन्ह. भ सकय अ ओ राज ठाकरे के किछ खरी खोटी सुनाओ सकय छथिन्ह. मुदा पाटिल जी सं त किछ उम्मीदे नहिं करु. कहबो करय छथिन्ह हुनका ऊपर सोनिया जी के हाथ छनि. देश अहि मे घंसल जा रहल अछि .

अगर अहां ई सोचय छी जे देश के नागरिक के कतहुं आबय जाय के... नौकरी करय के अधिकार छै त भूलि जाउ... पाटिल जी जैसन केंद्रीय गृहमंत्री के रहैत... महाराष्ट्र मे देशमुख जैसन कांग्रेस के सरकार रहैत अहां ई अधिकार के सोचनाय भूलि जाउ. केंद्र मे कांग्रेस के समर्थन देय वाला लालू जी...पासवानजी... रघुवंश जी... किछ नहिं कs पएताह. कुर्सी के चिंता छनि. दु चारि टा लोक त सभतर पिटाएत रहैत छै त कि ओकरा लेल... राज ठाकरे के खिलाफ कार्रवाई के लेल... राज ठाकरे के गिरफ्तार करय लेल कोनो इस्तीफा थोड़हे देल जाय छै. दु चारि दिन चलत फेर मामला ठंडाह जाएत. अगर सभ बिहारी...यूपी के नेता सभ जाक प्रधानमंत्री सं एकर शिकायत कएने रहतथिन्ह त कि राज ठाकरे आई फेर ई कहय के स्थिति मे रहय वाला छलाह कि हुनकर ई अभियान जारी रहतन्हि. त बाऊ नेता सभ के चक्कर मे जोश मे आ पिटा नहिं जाउ... गाम घर मे रहुं... अधिकार ...कर्तव्य केर बात पाटिलजी... देशमुख जी के रहैत त भूलि जाउ. ओना लोक त आब आस-पास के बाजारों डरैत- डरैत निकलैत अछि जे हिनकर राज ने नहिं जाने कतय कि भs जाए. सावधानी हटल दुर्घटना घटल. खुद सावधान रहुं... केंद्र मे अपन बिहारी मंत्री नेता पर भरोस नहिं राखु.

आभार:-  हेलो मिथिला

ठाकरे को फांसी दो

सभ्य समाज में किसी को खुलेआम फांसी दिए जाने की वकालत नही की जा सकती। लेकिन जहाँ सभ्यता की सीमा टूटे , तो उसकी वज़ह को जड़ से मिटाना जरुरी होता है। महारास्ट्र में यही हो रहा है। महारास्ट्र नवनिर्माण सेना के गठन के बाद से ही राज ठाकरे अपने क्रियाकलापों से मानवता को शर्मसार करते आ रहे हैं । कभी उनके निशाने पर मुंबई में रोजाना ऑटो टैक्सी चलाकर गुज़रवसर करने वाले उत्तर भारतीय आ जाते हैं, तो कभी हिन्दी बोलने पर राज की गुंडा सेना के लोग किसी की भी पिटाई कर देते हैं। और तो और लोक आस्था के पर्व छट करने वाले बिहारिओं को देख लेने की धमकी देते हैं।
पर, अब तो हद हो गई रोजगार की तलाश में रेलवे की परीक्षा देने गए वेरोजगार छात्रों की पिटाई राज के गुंडों ने कर दी।घर से दूर एक उम्मीद के साथ बाहर गए छात्रों के दिल पर क्या बीती होगी , ये राज जैसा स्वार्थी शख्स नही समझ सकता । उसे सिर्फ़ राजनीति से मतलब है। भले ही उसकी राजनीति देश को बांटती हो।
मेरी नज़र में ऐसे किसी भी शख्स को खुलेआम फांसी दे देनी चाहिये जो अपने स्वार्थ के लिए देश को बाँटने की साजिश करे।

ईश्वर को समझने में

देवताओं ने पहले ईश्वर को ढूंढा
या ईश्वर ने देवताओं को
आदमी की समझ में यह कभी नहीं आया
या दोनों ने मिलकर आदमी को ढूंढा
आदमी यह भी पता नहीं लगा पाया
और ईश्वर को ढूंढने में लगा रहा।

देवताओं को आदमी की जरूरत ज्यादा है
या ईश्वर को या फिर दोनों को
आदमी के लिए यह परीक्षण पाप बराबर रहा
और उसने अपनी जरूरत बना लिए देवता और ईश्वर।

नाती-पोतों ने आदमी को खूब समझाया
खूब तर्क दिए पर सिरफिरा आदमी ढूंढता रहा ईश्वर
और पीढ़ियां होती चली गयीं अभिशप्त।

तिराहे-चौराहे मुस्कराता हुआ
खड़ा मिलता है ईश्वर
आदमी रोते हुओं की पहचान
करने में होता रहता है खुश
हमेशा से ईश्वर गले लगा रहा है
हंसते हुए आदमी को और
रोते हुए उसके दरबार के बाहर
जाने कब से खड़े हैं लाइन में।

पंक्तिबद्ध लोग लामबंद होना चाहते हैं
पम्फलेट बंटवाना चाहते हैं-
ईश्वर को समझने में गलती मत करिए
ईश्वर को जरूरत है आदमी की, पर हंसते हुए आदमी की

पुरखों ने कैसी गलतियां की हैं
ईश्वर को समझने में।।
पवन निशान्त
http://yameradarrlautega.blogspot.com

Read this carefully

You’ve probably heard people saying things like ……

Money doesn’t grow on trees

We can’t afford it

We are poor but we are happy

Money is not everything

You must have money to make money

Money is the root of all evil

Rich people are unhappy

If you are rich, you can’t be spiritual

These are poverty beliefs.

If your conscious and subconscious mind accept these beliefs, they will become the magnets that hold you from having the kind of wealth you desire while repelling you away from money.Your belief creates your reality. If you have poor money beliefs, you will attract to yourself the kind of job, business, people and events that reflect these beliefs.

The ‘best’ part is you have attracted so many evidences of poor money beliefs into your life that you are convinced by your circumstances and your experiences that these poor money beliefs are correct! subconscious mind for wealth

When someone tells you that it’s easy to make money, you choose to regard this statement as a fantasy or a scam instead of a new belief for you.

Another reason for lack of money is due to poor self beliefs. You need to belief that you deserve to have a lot of money. This is how you can use your subconscious mind for wealth. subconscious mind for wealth

While you can be a magnet to money by having prosperous beliefs about money, it is possible that when the money is ready to come to you, you on the other hand, are not ready to accept it.

I’ve seen people who are very good in certain area of work, such as web design or photography, but they have never thought of converting their hobbies into a source of income for them. They feel that it is something simple and they shouldn’t charge people for their services. subconscious mind for wealth

I’ve also seen many people who write very good ebooks and distribute them free over the net. Unless you have other intentions, you shouldn’t give your ebooks for free. After all, you have spent time and effort on the ebooks and you deserve to be paid!

Dr. Joseph Murphy, the author of The Power Of Your Subconscious Mind, said that Wealth is ultimately nothing more than a subconscious conviction on the part of the individual. He is absolutely right!

As long as subconsciously you believe in financial abundance and you believe that you deserve to be paid more for less, money will come to you in avalanches.

Let me clarify what I mean. subconscious mind for wealth

1. When I say “you deserve to be paid more for less”, I’m not saying that you can get money for nothing. If you really do that, such money will not be with you for long. The proper way to get more money is to create more values for other people and exchange these values for money. These values can be tangible or intangible.

2. When I say “money will come to you in avalanches”, please understand that money may come to you in different forms. It may not be in the form of a pay check. Therefore, do not restrict the way money come into your life.

Here are some positive money beliefs that you can affirm to your subconscious mind for wealth.

Everyday I'm growing richer

I love money. Money loves me.

Making money is fast and easy.

I enjoy the process of making money.

I am born to be rich.

I spend and give away my money wisely and

money flows back to me multiplied.

I provide tremendous values to the society.

In return, I get back tremendous wealth.

When money starts flowing into your life, remember to keep circulating it back into the society. Money is like your blood, it must be circulated in order to keep yourself financially healthy.