गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना,
तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना
प्रदेश के स्थापना दिवस के समारोह मेंविस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने ध्वजारोहण कर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संदेश का वाचन किया। जहां एक ओर स्थानीय भाजपा विधायक नीता पटेरिया आंत्रण पत्र में अतिथि के रूप में नाम छपने के बाद भी कार्यक्रम में अनुपस्थित रहीं वहीं दूसरी ओर आमंत्रण पत्र में नाम ना रहने के बाद भी महाकौशल विकास प्राधिकरण के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष नरेश दिवाकर की कार्यक्रम में उपस्थिति राजनैतिक हल्कों में चर्चित रही। भाजपा के 23 मंड़लों में से अधिकांश के चुनाव निर्विरोध संपन्न हो गये हैं। वैसे तो बताया यह जा रहा है कि ये सारे चुनाव आम सहमति से हुये हैं लेकिन आम सहमति कैसे बनी? या कैसे बनायी गयी? इसके किस्से भी कम रोचक नहीं हैं। गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना, तम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना”की तर्ज पर भी पूरा खेल हुआ जिला पंचायत के युवा,जुझारू और लोकप्रिय अध्यक्ष मोहन चंदेल के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव का। वैसे तो यह रामगोपाल जैसवाल और कांग्रेस की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर की अगुवायी में लाया गया था लेकिन सियासी हल्कों में यह चर्चा भी थी कि इसके पीछे जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का ही आर्शीवाद था।

भाजपा में बलात आम सहमति बनी निर्विरोध निर्वाचन-इन दिनों जिले में भाजपा के संगठनात्मक चुनाव हो रहें हैं। जिले के 23 मंड़लों में से अधिकांश के चुनाव निर्विरोध संपन्न हो गये हैं। वैसे तो बताया यह जा रहा है कि ये सारे चुनाव आम सहमति से हुये हैं लेकिन आम सहमति कैसे बनी? या कैसे बनायी गयी? इसके किस्से भी कम रोचक नहीं हैं। अधिकांश मंड़लों में हालात यह थे कि एक से अधिक कई कार्यकर्त्ता अध्यक्ष बनने की तैयारी में काफी दिनों से लगे हुये थे। लेकिन बताया जा रहा है कि मिशन 2013 और 2014 को ध्यान में रखते हुये भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने यह यत कर लिया था कि किसी भी हालत में वोटिंग ना करायी जाये। आमतौर पर यह भी तय कर लिया गया था कि क्षेत्रीय विधायकों और जिले के वरिष्ठ नेताओं की पंसद के अनुसार ही चुनाव करायें जायें। इस लिहाज से जिले में तीनों भाजपा विधायक नीता पटेरिया,कमल मर्सकोले और शशि ठाकुर के अलावा जिला भापा अध्यक्ष सुजीत जैन,मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन की पसंद नापसंद ही निर्णायक रही हैं। चुनाव अधिकारियों द्वारा आम सहमति बनाने की कोशिश की जाती थी और उसके बाद भी यदि कोई अड़ जाता था तो उसे बता दिया जाता था कि फला व्यक्ति के लिये ऊपर से निर्देश हैं। इस तरह सीधे नहीं तो बलात आम सहमति बना कर जिसे बनाना रहता था उसे बना दिया गया और इसे निर्विरोध निर्वाचन का जामा पहना दिया गया हैं। इस तरह चुनाव भले ही शांतिपूर्ण तरीके से निपट गयें हों लेकिन अंदर ही अंदर पार्टी के निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्त्ताओं के अंदर असंतोष व्याप्त हैं। कॉर बेस कही जाने वाली भाजपा में ऐसे चुनाव इस बात का प्रमाण माने जा रहें हैं कि भाजपा भी अब उसी राजरोग से ग्रस्त हों गयी हैं जिसकी आलोचना करके वो सबसे अलग दिखने का दावा किया करती थी।
अविश्वास प्रस्ताव के नाटकीय अंत का राज क्या?-”गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना, तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना”की तर्ज पर भी पूरा खेल हुआ जिला पंचायत के युवा,जुझारू और लोकप्रिय अध्यक्ष मोहन चंदेल के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव का। पिछले एक पखवाड़े से जिले के राजनैतिक हल्कों में इसे लेंकर खासी गहमा गहमी थी। वैसे तो यह प्रस्ताव अध्यक्ष पद का चुनाव भाजपा के बैनर तले लड़ने वाले रामगोपाल जैसवाल और कांग्रेस की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर की अगुवायी में लाया गया था लेकिन सियासी हल्कों में यह चर्चा भी थी कि इसके पीछे जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का ही आर्शीवाद था। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले और उससे बचने वाले मोहन चंदेल दोनों ही पक्षों के सदस्य लगातार हरवंश सिंह के संपर्क में बने हुये थे। इंकाई हल्कों में यह भी चर्चा है मोहन चंदेल ने केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से अपनी निकटता बढ़ा ली थी और इसी के चलते अंत में कमलनाथ के कहने पर अनिच्छा से सही लेकिन संचालन के सारे सूत्र हरवंश सिंह कोे अपने हाथ में लेना पड़ा। लेकिन अविश्वास का वातावरण इतना गहरा चुका था कि कोई किसी पर विश्वास करने को ही राजी नहीं था। इसीलिये यह रणनीति बनायी गयी कि कोई भी सदस्य बैठक में जाये ही नहीं। यह निर्णय लेने के पीछे भी कुछ कारण थे। पहला तो यह कि मोहन पर लगाये गये गंभीर आरोपों पर कोई बहस नहीं हो पायेगी और शेष कार्यकाल वे अपने ऊपर लगे आरोपों के साये में ही पूरा करेंगें। दूसरा यह कि प्रस्ताव भले ही निरस्त हो जाये लेकिन यह संदेश भी जायेगा कि अध्यक्ष के पास बचने के लिये आवश्यक पांच वोट भी थे तभी तो बैठक का बहिष्कार किया गया। प्रस्ताव को गिर गया लेकिन सियासी हल्कों में यह भी चर्चा हैं प्रदेश में पंचायती राज्य के जनक के रूप में दिग्गी राजा के साथ साथ तत्कालीन पंचायत मंत्री हरवंश सिंह भी अपने आप को मानते हैं और एक अच्छा पंचायत राज्य अधिनियम बनाने का श्रेय भी लेते हैं। लेकिन उन्होंने अपने ही गृह जिले में उसी अधिनियम के प्रावधानों का ऐसा घिनौना मजाक उड़ाया है कि उसकी कोई मिसाल ही नहीं हैं। ”मुसाफिर”
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