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22.11.12

सही हो तो डर किस बात का...


संसद के शीतकालीन सत्र में एफडीआई पर सरकार के फैसले को लेकर घमासान मचा है। शीतकालीन सत्र के गर्म आगाज़ ने एहसास करा दिया है कि मानसून सत्र की कहानी एक बार फिर से दोहराने की पूरी पटकथा तैयार हो गई है। एफडीआई को लेकर हो हल्ला मचा है। सरकार कहती है कि एफडीआई पर फैसला देशहित में जनता की भलाई के लिए लिया गया है...जबकि विपक्ष कह रहा है कि सरकार ने विदेशी ताकतों के दबाव में इस फैसले को लिया है और इससे खुदरा व्यापारी सड़क पर आ जाएंगे। सरकार के इस फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी अविश्वास प्रस्ताव लाती हैं(जो जरूरी सदस्यों के समर्थन न होने पर नामंजूर हो गया) तो मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा नियम 184 के तहत चर्चा और वोटिंग कराने की मांग करती है...लेकिन सरकार धारा 193 के तहत बहस के लिए तैयार है...जिसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं है...यानि की सरकार वोटिंग से बचना चाहती है। बड़ा सवाल ये उठता है कि अगर सरकार कह रही है कि एफडीआई पर फैसला देशहित में है तो सरकार क्यों नियम 184 के तहत चर्चा पर राजी नहीं है...? और अगर भाजपा को लगता है कि सरकार के फैसले गलत हैं और उसके आरोपों में दम है तो क्यों भाजपा धारा 193 के तहत बहस से पीछे हट रही है...? ये साफ जाहिर करता है की सत्तापक्ष को जहां सत्ता के जाने का डर सता रहा है तो मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के नेताओं में भी कहीं न कहीं कॉन्फिडेंस की कमी है। एफडीआई का विरोध कर रहे विपक्ष का एकजुट न होना भी कहीं न कहीं ये सवाल खड़ा करता है कि क्या विपक्ष को वाकई में जनता के हित की देशहित की चिंता है और वे इसलिए एफडीआई पर सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं...या फिर आने वाले आण चुनाव के लिहाज से अपने अपने राजनीति फायदे देख रहे हैं। ऐसे वक्त में जब समूचा विपक्ष एफडीआई पर सरकार के फैसले के खिलाफ है तो क्या मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते भारतीय जनता पार्टी की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए दूसरे विपक्षी दलों को एकजुट कर सदन में सरकार को घेरने के लिए सामूहिक रणनीति बनाए...लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भाजपा शायद अपने दम पर सरकार को घेरने की फिराक में लगी है...और शायद ये नहीं चाहती कि इसका क्रेडिट किसी और दल को भी मिले...शायद यही वजह है कि भाजपा ने ममता के अविश्वास प्रस्ताव से किनारा करते हुए नियम 184 के तहत चर्चा और वोटिंग की मांग कर अलग रास्ता चुना। अब भाजपा इसके पीछे भले ही सदन में ऐसे लोगों को बेनकाब करने की बात कह रही हो...जो सरकार के साथ होने का दम तो भरते हैं...लेकिन कहीं न कहीं सरकार के फैसलों पर आंखे तरेरते हैं...लेकिन भाजपा का ये तर्क फिलहाल तो गले नहीं उतरता। बहरहाल शीतकालीन सत्र का पहला दिन जिस तरह विपक्ष के हंगामे की गर्मी में झुलसता हुआ दिखाई दिया...उससे तो यहीं लग रहा है कि शीतकालीन सत्र में आगे की राह सरकार के लिए आसान तो बिल्कुल नहीं है।
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