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5.2.08

भड़ास परम्परा का नया संवाहक -"समाधान..the solutions

मित्रो वैसे तो मैं भी भडासी हूँ आप सभी को पढता ज्यादा हूँ लिखता कम हूँ लेकिन आपकी वैचारिक भड़ास का आनंद खूब लेता हूँ ब्लॉग जगत पर आप सभी की उन्मुक्त भड़ासगोई से आपको निश्चित रूप से रहत मिलती होगी ऐसा मेरा विश्वास है..अभी तक आप व्यवस्था की विसंगति पर अपनी भड़ास निकालते आए हैं ..आज मैंने एक नया प्रयास आरंभ किया कांसेप्ट भड़ास की ही है लेकिन कंटेंट बिल्कुल अलग है ...आज मैंने अपने नए ब्लॉग "समाधान" का शुभारम्भ किया है. समाधान आपकी संवेदना ,पीड़ा और मन की भड़ास का मंच है..मन की किसी भी पीड़ा को आप यंहा अभिव्यक्त कर सकते है..आपके अनुभव से हमे मंथन का अवसर मिलेगा और आपको उडेल कर राहत..सो आपको आज से समाधान रूपी शिशु समर्पित कर रहा हूँ इस आशा के साथ की यह भी एक दिन भड़ास की तरह बुजुर्गवार बनेगा ...
आपका अपना
डॉ.अजीत
www.drajeet.blogspot.com

तमाम चेहरे मेरे........

तमाम चेहरे मेरे देखे होंगे तुमने मगर।
ये चेहरा खास है इस बात का ख्याल रखना।

चलते-चलते थक न जाओ जिंदगी कि धूप में।
इसलिए चन्द टुकड़े छाँव के भी संभाल रखना।

हर मोड़ पर ये लोग तुमसे करेंगे सवालात।
उन जवाबों के साथ तुम भी कुछ सवाल रखना।

ये हकीकत है तुम भी इससे वाकिफ हो।
कल तक जिसपे नाज था आज उसी पे मलाल रखना।

तुमको देखता हूँ तो खुश हो जाती है तबियत मेरी।
ये हुनर आम नही, बचा कर अपना ये जमाल रखना।

तमाम चेहरे मेरे देखे होंगे तुमने मगर।
ये चेहरा खास है इस बात का............

अबरार अहमद, दैनिक भास्कर, लुधियाना

आ , अब घर लॉट चले !

टीवी पर बिहारियों को पीटाते देख थोडा सुकून हुआ ! लेकिन थोडा और हंगामा होना चाहिऐ था ! जम के ! दहशत का माहौल भी खड़ा होना चाहिऐ ! "अपना घर" बर्बाद हो रहा है और चले हैं दूसरों के घर को सजाने के लिए ! "दूसरा" हमेशा से ही दूसरा ही होता है !
ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है ! उदाहरण के तौर पर - हम लोग करीब १०० साल से मुजफ्फरपुर शहर मे बसे हैं ! दादा-परदादा की जमींदारी थी ! घर - परिवार के लोग मुजफ्फरपुर से ही पढे लिखे हैं ! लेकिन आज तक "तिरहुत" वाले महीन लोग हमलोगों को अपना नही सके ! आज भी हम सभी "छपराहिया " ( छपरा जिला का रहने वाला ) ही कहलाते हैं ! हम भी अडे हैं - अपनी भाषा "भोजपुरी" ही बोलते हैं !
अगर आप - गाँव के रहने वाले हैं तो देखा ही होगा की किस कदर बाहर से आ कर बसे हुए लोगों को तंग किया जाता है ! खासकर " तड़का" वाले केस मे ! जहाँ " दामाद" को अपने ससुराल मे सम्पति मिलता है ! लोग अपने भागिना - नाती को अपना लेते हैं लेकिन "दामाद" को हमेशा से ही पराया समझा जाता है !
बहुत साल पहले - मैंने अपने गृह जिला "गोपालगंज" मे एक स्कूल मालिक के यहाँ गया ! वह केरल राज्य के रहने वाले थे ! उनका स्कूल काफी पैसा कम रह था ! पर स्कूल मालिक का जीवन शैली काफी निम्न था ! मैंने मजाक मजाक मे ही कुछ पूछ दिया - उन्होने जबाब दिया की - वह केरल मे एक माकन बना रहे हैं और फिर अपने माकन का फोटो दिखाया - फोटो देख कर मुझे ऐसा लगा की वह केरल मे कई करोड़ का मकान बना रहे हैं !
"बाबा" आये हुए थे - कह रहे थे की "खेत" मे काम करने को नही मिलता है - सभी के सभी "पंजाब" "दिल्ली" और गुजरात" चले जाते हैं ! पटना के एक तकनिकी कॉलेज के मालिक ने कहा - कोई पढ़ने वाला नही मिलाता है ! बिहार सरकार के एक उच्च पधाधिकारी से मेरी बात हो रही थी - बता रहे थे की पटना के सड़क पर आपको एक भी युवा नही मिलेगा ! या तो २० बरस से कम उमर वाले या फिर ४५ से ज्यादा वाले !
चलो "बिहारियों" - घर चलो ! जब हम सभी दूसरों का घर स्वर्ग बना सकते हैं तो फिर अपना क्यों नही ?
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
http://daalaan.blogspot.com/

"कोई नहीं है हीरो इनमें"

"कोई नहीं है हीरो इनमें"

***राजीव तनेजा***

गर मिल जाए सत्ता इन्हें
तोड डालें सारे नियम
रच डाले नित नए प्रपंच
तोडें कुर्सी खींचे मंच

ना पंचायत को पंच मिलेगा
ना शातिर को अब महादंड
मिलकर लूटेंगे खुलकर खाएंगे
मचाएंगे हल्ला और हुडदंग

कोई नहीं है हीरो इनमें
रहे तीनों हमेशा विलेन
अपने नेता उनके गुण्डे
और उनकी पुलिस

गढा मिल कर तीनों ने
ऐसा अजब-गज़ब त्रिकोण
फैला चहूँ ओर भर्ष्टाचार
आंतक हुआ कण-कण

पेट हैँ इनके बडे- बडे
खाल सख्त गैंडे सी मोटी
समझा है देश को अपना
जायदाद हुई ये बपौती

खुल कर वो खेलेंगे
सहमे सहमे हम झेलेंगे
वो झूठी आस जगाएंगे
हमें तिगनी नाच नचाएंगे

गद्दी के हकदार हैँ वो
लूटे खसोटे हमेशा जो
पुलिस नेता कैसे हों
गुण्डे मवाली जैसे हों

हाँ!....ऐसे हों ऐसे हों


***राजीव तनेजा***

4.2.08

"थमा दो गर मुझे सत्ता"

"थमा दो गर मुझे सत्ता"

***राजीव तनेजा***

"ओफ्फो!...पता नहीं कब अकल आएगी तुम्हें?'

"चलते वक्त देख तो लिया करो कि पैर कहाँ पड रहे हैँ और नज़र कहाँ घूम रही है।" बीवी चिल्लाई

"कुछ तो शर्म करो ...दिखाई नहीं देता कि तुम्हारी बच्ची की उम्र की है।"

"किसी को तो बक्श दिया करो कम से कम"...

"तुम्हें तो बस लडकी दिखनी चाहिए..भले ही जैसी भी हो आडी-तिरछी... टेढी-मेढी....कोई भी चलेगी।"....

"क्यों!...हैँ ना?"

"लडकी दिखी नहीं कि बस चल दिए सीधा नाक की सीध में मुँह उठा के"

"उसने मुस्कुरा के क्या देख लिया...हो गए झटाक से शैंटी फ्लैट".. .

"पहले नज़र फिसला करती थी जनाब की ...अब तो खुद ही फिसलने लगे हैँ"

"माशा अल्लाह...क्या तरक्की की जा रही है"

"आ गए मज़े?"....

"गिर पडे ना धडाम।"

"अब उसी को बुला लेना ये गोबर से लिप-पुते जूते साफ करने"बीवी बोले पे बोले चली जा रही थी


"अब क्या मैँ बोलता हूँ इन गाय-भैंसो को कि यूं रास्ते में गोबर करती फिरें?"मुझे ताव आ गया

"अच्छी भली डेयरियाँ बसा कर दी हैँ सरकार ने,अपना आराम से दुहो और लोड कर ले आओ दूध शहर में"...

"लेकिन नहीं!..लोगों को कीडा जो काटता है कि 'प्योर' माल होना चाहिए।"


"माँ दा सिर्र मिलता है प्योर"


"पता कितना पानी पहले से मौजूद रहता है इन दूधियों के डोल्लू में"

"पब्लिक को तो बस थन से धार निकलती दिखाई देनी चाहिए"

"डाईरैक्ट फ्राम दा सोर्स"

"भले ही सुबह शाम इंजैक्शन ठुकवा ठुकवा के भैंस बेचारी का पिछवाडा सूजा पडा हो"

"इन्हें कोई फर्क नहीं पडता"


"पता नहीं अपनी मेनका कहाँ गायब हो जाती है ऐसे वक्त?"


"शायद उसे भी डाईरैक्ट फ्राम दा सोर्स की आदत पडी हो"बीवी उसकी भद्द पीटती हुई बोली

"इनसान भी ना!...पैसे के लालच में कितना अन्धा हो गया है"....


"पता नहीं क्या-क्या 'स्टेरायड' मिलाते हैँ चारे में दूध बढाने के वास्ते"

"कोई शराफत नाम की चीज़ ही नहीं बची है दुनिया में"

"दूध तो बच्चों ने पीना होता है...उनके भविष्य के साथ तो खिलवाड ना करें कम से कम"बीवी तमक के बोली


"बस तुम्हें कोई टॉपिक मिलना चाहिए..हो जाती हो शुरू"

"अब!..गाय भैंस को क्या पता कि कहाँ गोबर करना है और कहाँ नहीं"

"उन्हें बस हूक उठी और उन्होंने पूंछ उठा देनी है"


"तुम गाय भैंस का रोना रो रहे हो...सामने देखो दिवार कैसी सनी पडी है"बीवी इशारा करती हुई बोली


"साले न दिन देखते हैँ ना रात देखते हैँ" ...

"जहाँ खाली दिवार देखी....बेशर्मों की तरह पैंट की ज़िप पे हाथ गया"मैँने हाँ में हाँ मिलाई


"कोई कंट्रोल-शंट्रोल भी होता है कि नहीं?"बीवी खुन्दक भरे स्वर में बोली


"लाख लिखवा दो कि यहाँ मूतना मना है लेकिन साले वहीं खडे होकर धार मारेंगे"मैँ भी शुरू हो गया


"औरत-मर्द में कोई फर्क ही नहीं करते...ना देखते हैँ कि कौन गुज़र रहा है पास से और कौन नहीं "

"शर्म-वर्म तो बेच खाई है सबने "मुँह बनाते हुए बीवी बोली


"सालों ने पूरे देश को खुले शौचालय में तब्दील कर रखा है।"

"किसी और देश में कर के दिखाएँ ऐसा तो पता चले"मैँ भी भडकता हुआ बोला


"काट के ना रख देगा वहाँ का कानून" बीवी हँसते हुए बोली

"बिना डण्डे के कोई नहीं सुधरता है"...


"इन्हें बस डंडॆ का डर दिखे...तभी सीधे होंगे साले"मेरा पारा भी लाल हो चला था


"तुम भी कौन सा कम हो?...तुम भी तो कई बार.....


"अरे!...तब तो मेरी तबियत ठीक नहीं थी"मैँ झेंपता हुआ बोला

"एक आध दिन की बात हो तो अलग बात है"

"यहाँ तो सालों ने रोज़ की आदत बना रखी है"


"ऊपर से ज़बान पे गालियाँ ऐसी छाई रहती हैँ लोगों के कि बस पूछो मत"

"छोटी मोटी गाली देना तो शान के खिलाफ समझते हैँ लोग"बीवी का गुस्सा बढता ही जा रहा था


" माँ-बहन की गाली तो आजकल प्रशादे में प्रसाद स्वरूप देने लगे हैँ लोग"मैँ हँसता हुआ बोला


"रहने दो...तुम भी कुछ कम नहीं हो"बीवी ताना मारते हुए बोली


"तुम तो हर चीज़ में मुझे ही घसीट लिया करो"...

"क्या मैँ कहता फिरता हूँ लोगों से कि यूँ सडक पे कूडा-करकत फैंकते फिरो?"...

"या फिर थूक-थूक के पूरी दिल्ली को यूँ थूकदान बना डालो?"अपने ऊपर आरोप लगता देख मेरा भडकना जायज़ था


"क्या मैँ कहता फिरता हूँ इन पैसों के लालची गुटखा खैनी वालों से कि बच्चे-बच्चे को चस्का लगवा नशेडी बनवा दो?"

"मेरा बस चले तो सब सालो को जेल की चक्की पीसने पे मजबूर कर दूँ"


"दूसरों पे कीचड उछालना कितना आसान है?"....

"तुम्हारे हाथ में 'पावर' हो तो तुम ही क्या उखाड लोगे?"


"मैँ!...?"


"हाँ तुम?"बीवी माखौल उडाते हुए बोली


"अरे!...मैँ तो दो दिन में...

हाँ!..दो दिन में सुधार के रख दूँ दिल्ली को"

"एक बार मुझे सत्ता थमा के तो देखो...उम्मीदों पे खरा न उतरूँ तो कहना"...

"यूँ!...चुटकी में......

हाँ!..चुटकी में दिल्ली का चौखटा ठीक ना कर दूँ तो मेरा भी नाम राजीव नहीं"...


"ये!...ये साले?"...

इन्हें तो मैँ एक ही दिन में सिखा दूँ कि दिल्ली में कैसे रहा जाता है"...

"कैसे सडकों पे चला जाता है"...

"कैसे सडकों पे थूका जाता है"...

"कैसे कचरा फैला दिल वालों की दिल्ली का बेडागर्क किया जाता है।"मैँ बोलता चला गया


"कैसे सरे आम कानूनों की धज्जियाँ उडाई जाती हैं।"

"कैसे खुलेआम सिग्रेट-बीडी के कश लगा सबकी नाक में दम किया जाता है"मैँ आखरी कश लगा सिगार पैर से मसलते हुए बोला


"सालों को नाम के लिए भी ट्रैफिक सैंस नहीं है"...

"ना पैदल चलने की अकल है...ना गाडी-घोडा दौडाने की"...

"बस मुँह उठाते हैँ और चल देते हैँ सीधा नाक की सीध में"...

"भले ही कोई पीछे सौ-सौ गाली बकता फिरे...इन्हें कोई मतलब नहीं"...

"कोई सरोकार नहीं कि पीछे कोई इनकी गाडी के नीचे आते-आते बचा"


"या!...ये खुद ही किसी गाडी से कुचले जाते अभी"बीवी ने बात पूरी की

"ऊपर से ये पैदल चलने वाले...

उफ!...तौबा...

पता नहीं कौन सी दुनिया में खोए रहते हैँ?"

"ये तो ग्यारह नम्बर की बस पे सवार होते हैँ...यानी कि पैदल चलते हैं"


"और!..गलती तो हमेशा बडी गाडी की ही मानी जाती है"मैँ व्यंग्यपूर्वक चिढता हुआ बोला...


"उल्टा!..मुआवज़ा और ले मरते हैं साले"बीवी का पारा भी हाई हो चला था


"अरे!...हाथ में सत्ता आ जाए एक बार...इन्हें तो दिल्ली का रुख करना तक भुलवा दूँ"


"हुह!...थोथा चना...बाजे घना....


"क्या?"...


"क्या कर लोगे तुम?"बीवी मानों मुझे जोश दिलाने पे तुली थी


"मेरा बस चले तो सबसे पहले इन फाईनैंस कम्पनियों को ही ताला लगवा दूँ"...

"ना बन्दा देखते हैं..ना बन्दे की जात" ..

"बस फाईल बनवाओ और ले जाओ"

"साले!...पाँच-पाँच हज़ार में 'स्पलैंडर' बाँटते फिरते हैँ कि...ले बेटा!....मौज कर"...

"बाकि देता रहियो किश्तों में"....

"क्या कहा?....नही दे पाएगा?"...

"फिक्र नॉट वरी करी"...

"चिंता ना कर".....

"हमने गुण्डे-पहलवान...

ऊप्स!...सॉरी रिकवरी ऐजेंट पाले हुए हैँ इसी खातिर"...


"पता भी है कुछ?...

अब तो नया स्यापा खडा होने वाला है"बीवी बोल पडी


"वो क्या?".....


"इस टाटा के बच्चे की 'नैनो' ने तो और नाक में दम कर देना है"...


"वो कैसे? ...इतना अच्छा काम कर रहा है अगला"

"दुनिया की सबसे सस्ती कार"...


"वोही तो!......"बीवी के चेहरे पे असमंजस का भाव था

"जिसे देखो....वही 'नैनो' पे सवार दिखाई देगा"...


"फिर बुरा क्या है इसमें?"


"भला क्या फर्क रह जाएगा अमीर और गरीब में?"बीवी अपनी मँहगी साडी का पल्लू ठीक करते हुए बोली

"दोनों एक ही गाडी में घूमते नज़र आएंगे....कोई स्टेटस-व्टेटस भी होता है कि नहीं?"


"काम वाली बाईयां तक घरों में काम करने गाडी में आया करेंगी"मैँ मुस्कुराता हुआ बोला...


"नए बहाने मिल जाएंगे उन्हे काम चोरी के...कभी टायर पैंचर तो कभी ट्रैफिक जाम"बीवी बुरा सा मुँह बनाते हुए बोली


"ऊपर से पुलिस का चालान हो गया तो समझो माई की दो दिन की छुट्टी"मैँने मन ही मन सोचा


"अभी तो हर किसी को नया-नया चाव चढ रहा है ना 'नैनो' का" ...

पता तब चलेगा बच्चू!...जब पार्किंग की समस्या सर चढ के बोलेगी"बीवी मानों भविष्य की तरफ ताकती हुई बोली


"अभी से बुरे हाल हैँ आगे रखने तक को जगह तक ना मिलेगी"

"इस मामले में ये जापान वाले सही हैँ...पूरी दुनिया को गाडियों पे सवार कर दिया और खुद घूमते हैँ बाई-साईकिल पे"....

तुर्रा ये कि सेहत ठीक रहती है...साले!...कंजूस कहीं के"मैँ बीच में ही बोल पडा


"सुना है!...वहाँ बन्दे को गाडी तब मिलती है जब वो पक्का सबूत दे देता है कि इसे रखेगा कहाँ पर"बीवी के चेहरे प्रश्नवाचक चिन्ह मंडरा रहा था


"और नहीं तो क्या. .."मैँ उसकी जिज्ञासा शांत करता हुआ बोला


"अभी नौकरियों में 'रिज़र्वेशन' माँगा जा रहा है...

आने वाले समय में 'पार्किंग' का भी कोटा फिक्स करने की 'डिमांड' उठने लगें तो कोई ताज्जुब नहीं"बीवी बोली


"ताजुब्ब नहीं कि कल को कोई जेबों में हाथ डाले मज़े से यूँ ही टहलता-टहलता 'शो-रूम' जा पहुँचे और...

जेब से दो तीन बण्डल मेज़ पे धरता हुई बोले"दो 'नैनो' देना....'डीलक्स' वाली"


"साले जय शनि देव.. जय बजरंग बली....का हुँकारा लगाते बिखारी तक 'नैनो' में भीख माँगते नज़र आएँगे"आने वाले समय का मंज़र मेरी आँखो के आगे नाचने लगा

"कल को नज़र बट्टू के नाम पर दफ्तर-दुकानों पे नींबू मिर्च टांगने वाले भी 'नैनो' पे आने लग जाएँ तो कोई अजब की बात न होगी।"


"बस!..थोडा सा स्टाईल बदल जाएगा उनका...गले में सोने की चेन...माथे पे गॉगल...

धन्धे का नाम मौडीफाई करके 'लैमन चिली' हो जाएगा"बीवी मज़ाक में बोली

"मुझे तो अपने पप्पू की चिंता हो रही है"बीवी परेशान हो बोली


"वो क्यों?"मेरे चेहरे पे सवाल था


"कल को वो भी खिलौनों से आज़िज़ आ नैनो की ही डिमांड ना करने लगें"मेरी तरफ देख बीवी बोली


"कोई बडी बात नहीं"मैँने जवाब दिया

"कहीं बच्चों के लिए सस्ते पैट्रोल की डिमांड भी ना उठने लगे"


"उफ!...क्या ये 'नैनो' का पंगा ले के बैठ गए?...जब आएगी तब की तब देखी जाएगी"

"तुम तो बात कर रहे थे दिल्ली सुधारने की"...

"क्या हुआ उसका?"...

"बस!...बातों बातों में ही हवा कर दी बात"


"अरे!...हवा कहाँ?...पहले मौका मिले तो सही"...

"सिखा दूंगा इन्हें कि कैसे थूका जाता है खुलेआम"...

"वहीं थूके हुए को चटवा ना दिया तो मेरा भी नाम राजीव नहीं"......

"अपने घरों में....दफ्तरों में थूक के देखो...तब पता चलेगा"...

"खुद से ही घिन्न ना आ जाए तो कहना"


"बता दूंगा इन ठेकेदारों को कि कैसे लूटा जाता है सरकारी माल"...

"हथकडियां ना लगवा दी तो कहना"

"डंडा चलेगा जब मेरा तो बडे बडे सीधे हो जाएंगे"


"किस किस को सुधारोगे तुम?....सारा ढाँचा ही बिगडा पडा है दिल्ली का"

"अब!..इन रिक्शाओं को ही लो...रोज़ तो जब्त करते फिरते हैँ 'एम सी डी' वाले"...

मगर अगले दिन फिर सडक पे नाचते नज़र आते हैँ"रिक्शेवालों की मनमानी से त्रस्त आम भारतीय नारी की आवाज़ थी ये

"सुना है!...पूरा मॉफिया होता है इस गोरखधन्धे के पीछे"

"रजिस्ट्रेशन के नाम पे एक-एक पर्ची पे बीस-बीस रिक्शे रजिस्टर करवा रखे हैँ सालों ने"


"अरे!...लाखों का खेल है ये ....एक एक के पास हज़ार-हज़ार रिक्शे हैँ"

"बीस रुपए फी रिक्शे के हिसाब से लगा ले अपने आप हिसाब कि कितने का गेम बजता होगा हर रोज़"

"लेकिन!...जो हो गया सो हो गया...

सारी 'मॉफिया गिरी' धरी की रह जाएगी जब मेरा कटर चलेगा"


"कटर चलेगा?"बीवी चौंकती हुई बोली

"हाँ!...'कटर'....

'कटर' चलवा दूंगा...इन अवैध रिक्शाओं पर"...

"ये नहीं कि जब्त कर गोदाम में फिकवा दूँ सडने के लिए ताकि कुछ ले-दे के सडको पर फिर से उछल-कूद मचाते फिरें?"

"एक ही बार में टंटा खतम कर दूंगा इनका"...

"ना रहेगा बाँस और ना ही बजने दूंगा इनकी बाँसुरी"

"काट के इतने टुकडे करवा दूंगा कि कबाडी भी दो रुपए किलो से ऊपर का भाव ना लगाए"


"वो सब तो ठीक है लेकिन......इन पैदल चलने वालों का क्या करोगे?"

"कैसे सिखाओगे इन्हें तमीज़ से चलना?"

"इनका क्या है बस मुँह उठाते हैँ और चल देते हैँ सीधा नाक की सीध में"


"लठैत पहलवानों की भर्ती करूँगा इन साले सडक पार करने वालों के लिए"...

"इधर गलत तरीके से सडक पार की...उधर लट्ठ बरसा...

दे दनादन....सडाक....सडाक"

"पट्ठों को हथकडी लगवा वहीं 'रेलिंग' से ही बँधवा ना दिया तो मेरा नाम भी राजीव नहीं"

"फोटो अलग से खिंचवाउंगा ऐसे नमूनों के कि जान ले पूरा इंडिया...मान ले पूरा इंडिया"


"पूरा इंडिया?"प्रश्न फिर बीवी के चेहरे पे था


"हाँ!...पूरा इंडिया कि देख लो...जान लो... क्या हष्र होने जा रहा है अब बद्द-दिमागों का"


"इस सब से फायदा?"....

"बहुत!...पडेगी एक को..लगेगी सबको...सभी सीधे हो जाएंगे"...

"बहुत देख लिया आराम से समझा समझा के"


"हम्म!...लातों के भूत बातों से भला कब माने हैँ जो अब मानेंगे?"


"बिलकुल!...यही इलाज है इनका"

"डंडा सर पे हो तो बडे बडे सीधे हो जाते हैँ"...

"यहाँ ना डर है और ना ही कानून की परवाह है किसी को"


"सही है बाहरले देशों का कानून...इधर जुर्म किया और उधर पुलिस सज़ा को तत्पर"

"यहाँ!.....यहाँ साला जुर्म आज करो...सज़ा का कोई पता नहीं...कब मिले...मिले ना मिले..कोई गारैंटी नहीं"

"सालों तक लंबे केस चलते हैं....किसी को सज़ा होते देखा है?"...

"नहीं ना?....


"इसी से तो बेडागर्क हुए जा रहा है पूरे हिन्दोस्तां का"...

"आम जनता भी तो इन्हें नेताओं से सबक लेती है"...

"देखती है कि जब इनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा तो अपना क्या बिगडेगा"बीवी भी मेरे रंग में रंग चुकी थी


"मुझे तो अरब देशों का कानून बहुत पसन्द है जी"...

"जैसा जुर्म...वैसी सज़ा....चोरों के हाथ काट दिए जाते हैं" बीवी की आवाज़ में आवेग था

"नशे के सौदागरों को पूरी ज़िन्दगी जेलों में सडने के लिए छोड दिया जाता है और ब्लातकारियों के..."मैँने बात अधूरी छोड दी


"पता नहीं क्या मिलता है लोगों को अच्छी खासी चल रही लाईफ को बिगाड के"...


"किसकी बात कर रही हो?"अब प्रश्न मेरे चेहरे पे आसीन था


"बेडागर्क कर के रख दिया है इन मसाज पार्लरों ने"मेरी बात सुने बिना ही बीवी बोलती चली गई

"दिन पर दिन उगते भी तो कुकुर मुत्तों की तरह गली-गली जा रहे हैँ "...

"कोई गली...कोई मोहल्ला तक अछूता नहीं है इनसे"

"पता नहीं कहाँ से ये फिरंगी कल्चर इंडिया का बेडागर्क करने पे तुला है"

"पता नहीं क्या आग लगी है आज के नौजवानों को"बीवी का आवेश बडता ही जा रहा था



"पार्लर की आड में सारे उल्टे काम" मुझे अपने बैंकाक के दिन याद आ गए


"खुल के क्यों नहीं कहते कि रंडीखाना बना रखा है"...


"मेरे हाथ में पावर आ जाए तो पुलिस का पहरा ना बिठवा दूँ इन मसाज पार्लरों पर तो कहना"

"एक एक की ऐसी ठुकाई करवाउंगा की आने वाली सात नस्लें तक जान जाएँगी कि 'मसाज' कैसे करवाई जाती है"


"मेरा बस चले तो सबसे पहले ये सब लेटेस्ट मोबाईल बन्द करवाउंगी"

"बडे गन्दे-गन्दे 'एम.एम.एस' बनाने का चलन चल निकला है आजकल"


"हर बन्दा मोबाईल में कुछ ना कुछ पुट्ठा सामान लिए फिरता है"मैँने बात पूरी की


"जिसे देखो चोरी से किसी ना किसी लडकी की छुप के उसकी मर्ज़ी के बिना फोटो खींच रहा होता है"


"सही है..." मैँने सहमति जता दी


"तुम कौन सा कम हो...तुम ने भी तो उस दिन"बीवी आँखे तरेर मुझसे बोली....


"वो?....वो तो बस!...ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक में"मैँ झेंपता हुआ बोला....


"बस ऐसे ही!...सभी मज़ाक मज़ाक में खींच लिया करते हैँ"....


"ये तो सोचो कि कोई इसी तरह तुम्हारी भी माँ-बहन या बीवी एक कर रहा होगा"बीवी भडकते हुए बोली

"ये साले!...सभी मर्द एक से होते हैँ"

"लडकी देखी नहीं कि लार टपकने लगती है....काबू में नहीं रख पाते अपने जज़्बात"


"अरे!...तुम भी किनकी बात ले के बैठ गई?"

"अगर सामने से थोडी बहुत लिफ्ट मिलती है तभी हम मर्दों की हिम्मत होती है...

वर्ना हमारे जैसा दब्बू पूरे जहाँ में कोई नहीं मिलेगा "मैँ बिगडी बात सम्भालता हुआ बोला

"तुम भी ना उल्टे-सीधे टॉपिक बीच में घुसेड के असली बात ही गोल कर देती हो"

"बात हो रही थी दिल्ली सुधारने की"...

"तो सुनो!...सब साले कामचोर बाबुओं को सस्पैंड कर बता दूंगा कि कैसे बिना ड्यूटी पे आए हाज़री लगवाई जाती है"


"वो तो ठीक है पर इन नेताओं का क्या करोगे?"

"जीना हराम कर रखा है इन्होंने आम पब्लिक का...इन्हें तो बस पैसे वाले ही नज़र आते हैँ"


"इनकी तो मैँ...."बिना बोले मैँने बात अधूरी छोड दी

"जेल की रोटी खाने और चक्की पीसने पे मजबूर ना कर दिया तो कहना"

"सब सीख जाएंगे वहीं पे कि...

"कैसे बड़ी बड़ी मॉलों को लाईसैंस दे आम छोटे दुकानदार से जीने का लाईसैंस ही छीन लिया जाता है?"

"कैसे बडे-बडे लाल हरे नीले फ्रैश स्टोरों को कोठियों में खोलने की इज़ाज़त दे आम आदमी की रोज़ी-रोटी पे लात मारी जाती है"...

"सिखा दूंगा इन्हें कि कैसे पिछले दरवाज़े से मज़दूर वर्ग का सर्वेसर्वा होने पर भी नंदी को ग्राम में भेजा जाता है"...

"सिखा दूंगा कि कैसे गिने चुने निशानों का डिमालिशन कर पूरी पैसे वाली जमात को बचाया जाता है"

"सिखा दूंगा कि कैसे अपने धूल फाँकते उजाड बंजर खेतों पे सरकारी पैसे से हॉट बज़ार या सुभाष चन्द्र बोस स्मारक बनवा अपनी तिजोरियां भरी जाती हैँ"

"कैसे सरकारी गोपनीय दस्तावेजों का नाजायज़ इस्तेमाल कर आने वाले समय में एक्वायर होने वाली ज़मीन गरीब किसानों से कौडियों के दाम ले

बाद में लाखों करोडों नहीं बल्कि अरबों कमाए जाते हैं"


"कैसे अपने नेम फेम की खातिर मैट्रो का रूट तब्दील करवाया जाता है"बीवी भी पिल पडी


"कैसे सौ के ऊपर सीधा पाँच सौ का टैक्स लगा ट्रैफिक चॉलान की फीस को बढाया जाता है"...

"कैसे सरकारी जमीन पे रातों रात झुग्गी बस्तियँ बसवा अपना वोट बैंक मज़बूत किया जाता है"...


"कैसे उन्हें नई जगह बसाने की आड में हज़ारों लाखों जाली पर्चियाँ अपने लोगों में पैसे ले ले बाँटी जाती हैँ"

"कैसे सरकारी ड्रा में मलाईदार प्लॉट अपनों के नाम किए जाते हैँ"बीवी का गुस्सा कम होने को ही नहीं था


"कैसे पैसे ले ले कुक्करमुत्ते की भांति उगने वाली जाली फ्राड कंपनियो को राज्य में काम करने की छूट दी जाती है"

"कैसे प्राईवेट बिजली कम्पनी को नए तेज़ भागते मीटर लगाने की छूट देकर करोडों के वारे-न्यारे किए जाते हैँ"

"कैसे ऑटो टैक्सी के इलैक्ट्रानिक मीटरों के जरिए पब्लिक की जेब से पैसा खींचा जा सकता है"बिना रुके मैँ भी बोलता रहा


"इतना सब कुछ हो रहा है लेकिन पब्लिक कुछ कहती ही नहीं है"


"अरे!...ये फुद्दू पब्लिक है...ये कुछ नहीं जानती है"

" हमारे यहाँ डर नहीं है ना किसी को कानून और समाज का"

"मौका मिले सही हर बंदा कानून तोडने से गुरेज़ नहीं करता"

"मज़ा आता है ...शेखी दिखाई देती है इसमें...भीड में सबसे अलग...सबसे जुदा होने की चाहत होती होगी शायद इस सब की वजह"


"अब ये ट्रैफिक पुलिस वालों का आलम तो देखो...हर एंटरी के नाम पे जहाँ पचास का पत्ता झटकते थे टैम्पो वालों से...

सरकारी चॉलान बढने से इन्होंने भी अपना रेट बढा दिया है...

ऊपर से सीनाजोरी देखो इनकी...कहते हैँ कि हम यहाँ क्या मुफ्त में.......

"मेरा बस चले तो इन साले सभी रिश्वतखोरों के 'एम.एम.एस' बनवा के इनके दूध धुले चेहरों का 'लाईव टैलीकास्ट' करवा दूँ"


"साले!...खुदा समझते हैँ अपने आप को"....

"जिसे देखो!....वही दिल्ली की कब्र खोदने पे उतारू है"

"अब इन ब्लू लाईन वालो को ही लो...बन्दे की जान की कोई कीमत ही नहीं है इनकी नज़र में....जब चाहे रौंद डालते हैँ"


"इन साले!...ब्लू लाईन वालो की तो मैँ...."

"सुना है!...सब की सब बडे नेताओ की हैँ इसिलिए लाख इनके खिलाफ आवाज़ें उठने के बावजूद भी रौंदे चली जा रही हैँ पब्लिक को"

"मेरे हाथ में ताकत आ जाए बस एक बार...

सब के परमिट कैंसल करवा के दिल्ली से बाहर फिंकवा दूंगा कि चलो अब...यू.पी....बिहार"

"अरे!...तब तो बहुत दिक्कत हो जाएगी"....

"इतनी भीड...इतनी पब्लिक"....

"बाप रे!....


"होती रहे मेरी बला से....

कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी ज़रूरी होता है"

"इतना भी नहीं जानती?"

"तुम तो निरी बुद्धू हो...

अरे!..एक ही झटके में नहीं साफ होगा पत्ता इन 'ब्लू लाईनों' का बल्कि सिलसिलेवार ढंग से कुछ ही महीनों में सबकी बत्ती गुल कर दूंगा दिल्ली से"


"तब तक पब्लिक क्या घर बैठी रहेगी?"....

"अरी बेवाकूफ!....'कार्पोरेट सिस्टम' लागू करूगा मुम्बई के माफिक"...

"एक ही कम्पनी की दो दो हज़ार बसें होंगी कम से कम"....

"पब्लिक भी खुश...कम्पनी भी खुश और...लगे हाथों हम भी खुश"

"अब कौन हर बस से अलग अलग मंथली इकट्ठी करता फिरे?"

"हमें तो बस एक मुश्त रकम मिल जाए पूरे साल भर की तो ही जा के चैन पडे"...

"ये छुट्टी रकम का होना ना होना बेकार ही है...कब आती है कब जाती है कुछ पता ही नहीं चलता"...

"अपना!.. एक बार में ही पूरे मिल जाए तो कहीं ढंग से ठिकाने भी लगें"

"छोटे-मोटे बण्डल तो वैसे ही 'बीयर बार' बालाओं को ही खुश करने में साफ हो जाएंगे"मेरे चेहरे पे वासना चमक उठी थी


ये क्या कि...खेत का खेत जुता...फसल की फसल कटी और.....अनाज कब चूहे ले गए पता भी ना चला"


"मैँ दिखाउंगा पूरी दिल्ली को कि कैसे खेला जाता है खेल...

"कैसे सबकी नज़रें बचा लाखों करोडों के वारे-न्यारे किए जाते हैं"मेरी आँखों की शैतानी चमक सारी कहानी खुद ब्याँ कर रही थी

"कैसे हर छोटी-बडी ठेकेदारी में अपना हिस्सा फिट किया जाता है"


"सही कह रहे हो"बीवी की आँखों में भी लालच का परचम लहरा चुका था


"कैसे पुलिस और ट्रैफिक की कमाई में अपनी गोटी फिट की जाती है"...

"कैसे नौकरी जाने के साथ-साथ जेल जाने का डर दिखा बे-ईमान अफसरों से अपनी मंथली सैट की जाती है"...

"कैसे हर फैक्ट्री वाले की बैलैंस शीट के हिसाब से अपना परसैंट तय किया जाता है"...


"बातें तो तुम सारी एकदम एकूरेट कर रहे हो लेकिन.... ये साली!...सत्ता हाथ आएगी कैसे?"

"इसके लिए तो बहुत नोटों की ज़रूरत पडेगी और वो तो हैँ नहीं ना अपने पास"

"ज़्यादा उडो मत...बडी पावर पावर की बातें किए जा रहे हो...

यहाँ रिलायंस की पावर खरीदने लायक पैसे भी नहीं हैँ"बीवी बैंक की पासबुक देख निराश होते हुए बोली


"बस यही तो एक कमी रह गई....

बाकी सारा 'मास्टर प्लान' तो मुँह ज़बानी रटा पडा है हम दोनों को"मेरी आवाज़ में हताशा का पुट था

"काश!...कहीं से पैसा आ जाए इलैक्शन लडने के लिए"मैँ ठण्डी आह भरता हुआ बोला...

"बस पैसा आ जाए किसी तरह ...बाकि सब दावपेच पता है कि...

"कैसे लडा जाता है चुनाव?"...

"कैसे झटके जाते हैँ विरोधी खेमे के वोट?"...

"कैसे दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाई जाती है?"


"अरे!...बैंक से याद आया...अपने गुप्ता जी तो बैंक में ही हैँ ना"...

"पता करो!..कोई लोन-शोन का ही जुगाड बन जाए शायद"...

"आजकल तो धडाधड बाँट रहे हैँ ये बैंक वाले लोन"...

"रोज़ ही तो लोन ले लो... लोन ले कह कर सिर खा रही होती हैँ फोन पे"

"दुनिया भर की तो छम्मक छल्लो भर्ती कर रखी हैँ इन्होंने इसी खातिर"....

"एक मिनट रुको....कह मैँ अपने मोबाईल की फोन बुक खंगालने में जुट गया"

"अभी परसों ही तो फोन आया था 'रूबी' का"...

अरे वही!...बैंक वाली...और कौन?"


***राजीव तनेजा***

यशवंत जी की हरिद्वार यात्रा....कुछ यादें - कुछ बातें

गुरुदेव,

आज योगी जी के विवाह के उपरांत जो पोस्ट मैरिज़ डिप्रेशन (मतलब उत्सव के बाद का खालीपन ) से मन भर गया है बस कुछ गत दिनों की मधुर यादें हैं जिनमे एक उपलब्धि समान है आपसे मुलाकात ये मन के स्वाभाविक उदगार है जैसा महसूस कर रहा हूँ वैसा ही लिख भी रहा हूँ... आपके व्यक्तित्व को शब्दों में बयां करना मेरी कवि मेधा से परे की बात है लेकिन आपसे मिलकर मुझे लगा की अभी इस दुनिया में अपनी शर्तो पर जिया जा सकता है ..अपनापन तो ऐसा मिला की लगा ही नहीं की हम दो अलग विधा के लोग मिल रहे हैं..सच कहूँ तो आपने मेरे अंदर के सोए हुए देहाती और भदेस मन को तंद्रा से जगा दिया है .....अब शायद ज्यादा आनंद आएगा कुलीन वर्ग की अभिनय से भरी दुनिया में उन पर खुद को थोपना वो भी अपनी शर्तो पर...आप भले ही दिल्ली की व्यस्त जिंदगी में हमे भूल गए होंगे लेकिन आप अभी भी यहाँ गंगा तट पर कुछ वीरान और तथाकथित बुधिजिवियो की महफिलो का "मिसरा" बन रहे है और सूत्रधार की भूमिका अपनी हैं...रमन जी भी आपके बारे में पूछ रहे थे आपका आलाप उनको भी पसंद आया..कुल मिला कर आपसे मिलकर ऐसा लगा की हमारी ये मुलाकात अब जीवनपर्यंत चलने वाली है ..खूब जमेगा रंग जब मिल बैठेंगे..हम और भाई यशवंत...अभी इतना ही शेष फिर..

आपका

*जबलपुर मे आज भी पुराने संस्कार जीवित है - श्री नामवर सिह प्रख्यात साहित्यकार हिन्दी समालोचना के पुरोधा *

*जबलपुर मे आज भी पुराने संस्कार जीवित है - श्री नामवर सिह प्रख्यात साहित्यकार हिन्दी समालोचना के पुरोधा *
विगत दिनों जबलपुर शहर मे प्रख्यात साहित्यकार हिन्दी समालोचना के पुरोधा श्री नामवर सिह जी एक दिन के प्रवास पर आये उन्होंने हिन्दी साहित्य अखबार और अन्य विषयों पर सभी से खुलकर बात की | उन्होंने कहा जबलपुर शहर बहुत ही अच्छा है अगर भारतीय संस्कृति की बात की जावे तो वह जबलपुर जैसे शहरों मे रचती-बसती है | शहर मकानों और पार्को से नही बनता है शहर बनता है वहां के रहने वालो से | उन्होंने कहा कि जबलपुर आकर उन्हें फ़िर से ताजगी मिली है | जबलपुर मे आज भी पुराने संस्कार जीवित है उनकी जबलपुर से बहुत सी यादे जुड़ी है जबलपुर जैसे शहर ही संस्कृति और इतिहास को अपने मे संजोये साहित्यक विचारधारा को जीवित रखने महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश तो पत्रकारों की पाठशाला है जहाँ कई नामी पत्रकारों ने जन्म लिया है | वे छात्र जीवन से कविता लेखन से जुड़े है फ़िर कहा कि जवानी मे आदमी दो ही काम करता है एक प्यार करता है और दूसरा काम कविता लिखता है | आज की पत्रकारिता पर दवाब बहुत है पहले अखबार साहित्यकारों का केन्द्र हुआ करते थे आज वे अपने ऊपर के दवाब से परेशान है फ़िर भी एक अच्छी बात है कि साहित्य को सप्ताह मे एक दिन करीब एक या आधे पन्ने की जगह तो मिल जाती है पर अखबारी भाषा का क्षरण हो चुका है अब तो अखबार विज्ञापनों ग्लैमर से पटे रहते है | अब अखबारों मे संपादक नही है अब इन्हे इनके मालिक चलाते है | अखबारों मे सबसे जरुरी है स्थानीयता का होना यह पत्रकारिता की जान है | साहित्य ने स्थानीयता बनाये रखी है | अखबारों मे जिस तरह की होड़ चल रही है उसे उन्होंने कुत्ते बिल्ली की दौड़ बताया है | आज की साहित्यक स्थिति को देखकर उन्हें बड़ी खुशी है और कहते है कि आज के साहित्य की हर विधा मे युवा रचनाकारों की श्रंखला है जो काफी अच्छा काम कर रही है | सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी के बाद अब महिला रचनाकारों की तादाद बढ़ गई है | हिन्दी भाषा किसी से कम नही है और हिन्दी का उत्तरोतर विकास हो रहा है और हिन्दी भाषा की पठनीयता बढ़ रही है | दूसरे भाषा के लेखक भी अपनी रचना का अनुबाद हिन्दी भाषा मे चाहते है और वे जानते है कि इसके बिना विश्व साहित्य का वे हिस्सा नही बन पाएंगे | हिन्दी भाषा ने भी अब अपना दायित्व समझ लिए है | हिन्दी का बाजार बहुत बड़ा है और विश्व मे हिन्दी भाषा की मांग बढ़ी है जो हिन्दी के लिए शुभ संकेत है |

आओ कमीनो,मुझे मारो....

मैं अपने आप को परसों से रोके हुए था कि इस विषय पर कुछ भी बोलने से रोके हुए था पर आज मैं एक न्यूज चैनल पर देख रहा हूं कि राज ठाकरे और उसके गीदड़ों के बारे में कुछ न बोलूं क्योकि इलैक्ट्रोनिक मीडिया तो बस दो मिनट की एक क्लिप को दिन भर दिखा कर जब तक कुछ बवाल नहीं करवा देते । चैनल दिखा रहा है कि मुम्बई में उत्तर भारतीयों में दहशत का माहौल है लेकिन मैं आज दादर से जिस लोकल में सफ़र कर रहा था तो फ़र्स्ट क्लास से जुड़े एक डिब्बे में करीब आठ-दस लोग मिल कर एक हिन्दी भाषी फल विक्रेता को पीट रहे थे और नारे लगा रहे थे,"राज ठाकरे जिन्दाबाद ,लालू की मां की....,भइया लोगों मुम्बई छोड़ो वगैरह वगैरह..."। मैंने देखा कि इन फ़टैल लोगों ने मुंह पर रुमाल बांध रखे थे । जैसे ही गाड़ी स्टेशन पर खड़ी हुई तो मैं उन गीदड़ों की तरफ गरियाते हुए दौड़ा कि आओ सालों मुझे मारो मैं भी हिन्दी बोलने वाला हूं और स्टेशन पर खड़े एक रेलवे पुलिस वाले का डंडा छीन कर घुमाना शुरू कर दिया तो मेरा ऐसा रौद्र रूप देख कर यकीन मानिए कि न तो उस पुलिस वाले की हिम्मत हुई कि मुझसे डंडा वापिस मांगे और न ही वे गीदड़ पलटे साले इतने डरपोक हैं कि दस होकर भी भाग गये । मैने एक बार फिर देख लिया कि देश को तोड़ने वाली ताकतों के सामने अगर हम सीना तान कर खड़े हो जाएं तो वे भाग खड़े होते हैं । आप सबको याद होगा कि इससे पहले बिलकुल यही कार्ड शिवसेना ने भी चला था और अब तीन दिन से राज्य सरकार चुप्पी साधे बैठी थी ताकि जनता तक खाज ठाकरे का संदेश चला जाए और शिवसेना का परप्रान्तवादी कार्ड छिन जाए साफ समझ में आता है कि यह कांग्रेस और मनसे ने मिल कर चाल चली है । बस विद्वेष फैल गया ,कुछ दिन में यकीन करिए कि जैसे शिवसेना की उत्तर भारतीय ब्रान्च है वैसे ही लोग देखेंगे कि मनसे की भी उत्तर भारतीय ब्रान्च है और लोग फिर सब भूल कर प्यार से रहने लगेंगे तथा महाराष्ट्र को एक नया मराठी नेता मिल जाएगा जो वक्त-बेवक्त चुनाव के समय ये कार्ड चलता रहेगा । मैंने स्टेशन पर खड़े होकर चिल्ला-चिल्ला कर कहा था कि मेरा संदेश उस सुअर तक पहुंचा दो कि अगर एक बाप की औलाद है वो साला तो मुझसे आकर दो-दो हाथ करे सीधे लड़े, कमजोर गरीबों को क्यों सता रहा है ,मैं यहीं इंतजार कर रहा हूं । पुलिस वालों ने मुझे एक घंटे तक वहां रहने के बाद हाथ-पैर जोड़ कर भेज दिया । बस क्रोध का अभिनय ही काफ़ी है इन लोगों के लिये ,मेरे गुरुदेव ने कहा कि अगर क्रोध नहीं करना हो तो क्रोध का अभिनय करो और यदि समग्र अभिनय रहा तो फलदायी रहेगा । शांत रहना आवश्यक है और हर हाल में सही निर्णय करना आवश्यक है...........
कुछ समझे भाई लोग
जय भड़ास

.......... तेरी तो

कौन रोकेगा हमें और किसकी मजाल।
हम यूपी-बिहार नही, हैं अपनी माओं के लाल।

हम अपने बाप-दादाओं के दम पर नहीं भोंकते।
राज करते हैं हम खुद ठोक कर ताल।

तेरी किस्मत ठीक है कि तू अपने बिल में है।
वर्ना साले नचा-नचा के मारते और कर देते गाल लाल।

कभी अईयो यूपी-बिहार मा तो दिखा देंगे।
तुम जैसे लोगो को किस तरह करते हैं halal।

abrar ahmad

वक्त संभलने का...


ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
सँभल भ़ी जा कि अभी वक़्त है सँभलने का

ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हम
मगर किसे है सलीक़ा ज़मीं पे चलने का

फिरे हैं रातों को आवारा हम, तो देखा है
गली-गली में समाँ चाँद के निकलने का

हमें तो इतना पता है कि जब तलक हम हैं
रिवाज-ए-चाक गिरेबाँ नहीं बदलने का

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राज़ भाई, ई राज हरदम ना रही !

कल टीवी पर समाचार देख रह था। एक टैक्सी वाले को राज ठाकरे के समर्थक बेतहाशा पीटे जा रहे थे। टैक्सी ड्राईवर भले ही बिहारी या यूपी का रह हो पर मुझे पूरा विश्वास है कि टैक्सी जरूर किसी मराठी की रही होगी। आख़िर राज किसको भगाना चाहतें हैं? मन तो यही किया कि जूता निकालूँ और जुतियाना शुरूं करूं । ऐसे लोंगो की एक ही दवा है। लात के भूत बातों से नही मानते। सब जानतें हैं की ये अपने आप को प्रचारित करने की साजिश है। टी आर पी रेटिंग में मुम्बई का एक बड़ा हिसा है। वे जानतें हैं कि उनके किसी भी कुकर्म को मीडिया में खूब जगह मिलेगी। तो लो भैया , पिल पड़े लाठी डंडा लेकर। समझ में नही आता कि इन लोंगो ने क्या पढा लिखा है। "ऊपर वाला इनकी गलती का घड़ा जल्दी भरे।"आमीन

आख़िर क्या बोलेगी चम्बल ?


चम्बल है तो बीहड़ है! हत्या, खून,प्रतिशोध, अपहरण, बीहड़ यह सब तो बोलते रहे हैं हम भी बोलेंगे लेकिन नए मायने में अन्तरकथायों के साथ! चम्बल में अमर हैं डाकू और मर रहे हैं घड़ियाल और गर्भ में बेटियाँ इस पर भी चम्बल बोलेगी! भिंड की सकरी गली में रहने वाले ऐ. असफल का उपन्यास "नमो अरिहंता" को मिल गया है बागेश्वरी अवार्ड और शायर राजेश मधुकर ठेले पर चाय बेचेंते हुए कह रहे हैं उम्दा शायरी! नेता बंदूक के लाईसेन्स मांग रहे हैं और गाँव वाले केरोसिन! भदोरिया राजायों का सतखंधा किला (अटेर) पिकनिक स्पॉट बनेगा तो पृथ्वी राज चौहान द्वारा स्थापित भिंड वन्खंदेस्वर मन्दिर पर पाँच सौ वर्षो से जल रही है अखंड ज्योति! गेंहू की वालियां .. सरसों के फूल...... पाँच नदियों के बीच बसी इस अनोखी दुनिया में ना पानी है........ न बिजली है....न रेल है.......... फिर भी मूंछ पर ताब देकर कहते हैं.............


जाके बैरी जीवित घूमे
ताके जीवन को धिक्कार


.

..... राम जाने.......... चम्बल और क्या... क्या बोलेगी समय समय पर बटन दबाकर ख़ुद ही पड़ते जाइए !



देव श्रीमाली संवाददाता, (NDTV India)

आख़िर क्या बोलेगी चम्बल ?

चम्बल है तो बीहड़ है! हत्या, खून,प्रतिशोध, अपहरण, बीहड़ यह सब तो बोलते रहे हैं हम भी बोलेंगे लेकिन नए मायने में अन्तरकथायों के साथ! चम्बल में अमर हैं डाकू और मर रहे हैं घड़ियाल और गर्भ में बेटियाँ इस पर भी चम्बल बोलेगी! भिंड की सकरी गली में रहने वाले ऐ. असफल का उपन्यास "नमो अरिहंता" को मिल गया है बागेश्वरी अवार्ड और शायर राजेश मधुकर ठेले पर चाय बेचेंते हुए कह रहे हैं उम्दा शायरी! नेता बंदूक के लाईसेन्स मांग रहे हैं और गाँव वाले केरोसिन! भदोरिया राजायों का सतखंधा किला (अटेर) पिकनिक स्पॉट बनेगा तो पृथ्वी राज चौहान द्वारा स्थापित भिंड वन्खंदेस्वर मन्दिर पर पाँच सौ वर्षो से जल रही है अखंड ज्योति! गेंहू की वालियां .. सरसों के फूल...... पाँच नदियों के बीच बसी इस अनोखी दुनिया में ना पानी है........ न बिजली है....न रेल है.......... फिर भी मूंछ पर ताब देकर कहते हैं.............
जाके बैरी जीवित घूमे
ताके जीवन को धिक्कार

...... राम जाने.......... चम्बल और क्या... क्या बोलेगी समय समय पर बटन दबाकर ख़ुद ही पड़ते जाइए !

देव श्रीमाली संवाददाता, (NDTV India)

मैंने भुगता है दंगों को, समझती हूं पीड़ा

आज मुंबई में मनसे के लोगों ने जो उठापटक करी उसका दुष्परिणाम ये हो सकता है कि जवाबी कार्यवाही हो और शहर सुलगने लगे । मैने मुंबई में ९२-९३ में हुए जातीय दंगों को भुगता है इसलिये इस पीड़ा को समझती हूं कि तकलीफ़ सबसे ज्यादा गरीब तबके को होती है जो वोट देकर सरकार बनाता है । ये तबका बेचारा पीने के पानी से लेकर रिहायशी परेशानियों से जूझता रहता है और हुक्मरान उन्हें लेमनजूस जैसी सुविधाएं देकर उलझाए रहते हैं । तालीम का प्रचार प्रसार जरूरी है ताकि लोग सही नेताओं को जान सकें । जब पढ़ेंगे नही तो ऐसे ही जाति धर्म क्षेत्र के नाम पर नेता आवाम को लड़ाते रहेंगे । मैं टीचर हूं तो इस बात को आप सबसे कह सकती हूं कि शिक्षा ही एकमात्र उपाय है तमाम मसलों का ।

राज ठाकरे को "मीडिया" की मदद

आज जो भी बवाल मुम्बई मे हो रहा है - उसमे राज ठाकरे से ज्यादा मीडिया की भूमिका है !

"दलाली" की हद कर दी आप सभी ने! दरअसल इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे अत्यंत ही घटिया और कमज़ोर मानसिकता वाले लोगों का जमावडा हो गया है! ऊपर से नेताओं के लगे पैसा का दबाब, कचरा को पेश किया जा रहा है! उलुल-जलूल खबरों को महतव्पूर्ण बना देना और पूरे देश को उसमे झोंक देना - यह गलत ही नही अपराध है !

राज ठाकरे का बयां इतना महताव्पूर्ण नही था जिसको इस कदर दिखाया जाये ! वह बिल्कुल ही एक छोटी सभा मे कुछ उलुल जुलूल बक रह था ! मीडिया ने इतना महाताव्पूर्ण बना दिया की - टीवी पर दिखने के चक्कर मे बेचारे "पूर्वांचल" के लोग अब पीट रहे हैं !

देश को पूरी तरह "दलालों" के हाथ मे हम सभी ने दे दिया है ! आज तक यह दलाल समाज की आबरू को बेच रहे थे - अब यह खुद की आबरू की दाम लगायेंगे ! "पैसा-पैसा" के इस खेल मे हम सभी इतने व्यस्त हो चुके हैं की हमे यह नही पता चल रहा है की हम आने वाले पीढी के लिए कैसा समाज बना रहे हैं !

सैफ और करीना की खबर - देश की प्रगति की खबर से ज्यादा "important" बन जाती है !
आप सभी से मेरा निवेदन है की आपको जहाँ भी इस तरह के " इलेक्ट्रोनिक जर्नलिस्ट " मिले , मेरे तरफ से इनको समझायें ! विनम्र निवेदन करें !

मुझे जया बच्चन का बयां ज्यादा पसंद आया की - राज ठाकरे कौन है ? बात ख़त्म !
खैर, राज ठाकरे कौन हैं यह सबको पता है! इनके असली पिता कौन हैं, यह भी सबको पता है!

रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
http://daalaan.blogspot.com

Jab Girati Gaaz Garibon Par......

Jab girati gaaz gareebo par
Tab neta jan muskaate hai
Aswashan dene paidal chal kar
Khud darwaaje hai
Ye nahi ki kuchh na de
Kuchh to deke jaate hai
Par saade kagaz ke panno par
Pura budget banaate hai
Janata bhee jai jai karati hai
Samajh na paati chaal ko
Unake pyare shavdo se
Sah jaati unaki dhal ko
Ye rajniti ka fanda hai
Pyare shavdo se karate mar
Aansoo puri ponch dete hai
Par kheech lete hai pakki khaal
Vote maangane jab aate hai
Hans hans ke batiyaate hai
Poonch lete hai haal ko
Chamcho se chupake kahate hai
Samajh lena ab chaal ko


http://harsimransethi.blogspot.com


बड़ाबाजार की आग, मारवाड़ी और पत्रकार


बड़ाबाजार में आग लगी तो अखबारों के पन्नों पर कोलकाता के मारवाड़ी व्यवसायी समाज के कोलकाता में व्यवसाय शुरू करने से लेकर सुरक्षा की दृष्टि से बड़ाबाजार के सारे कच्चे-चिट्ठे छपने लगे। सरकार ने भी हर मदद का आश्वासन दिया तो कुछ व्यवसायियों ने मदद की जगह कर्ज की अपील की। इसके पीछे उनकी मंशा व वह आत्मविश्वास दिखा जिसकी बदौलत इस समाज ने खुद को सिर्फ कोलकाता नहीं बल्कि पूरे पूर्वी भारत में स्थापित कर लिया है। लेकिन कोलकाता के इस मारवाड़ी समाज की क्या व्यथा है ? और किन भ्रांतियों के आलोक में लोग इन्हें जानते हैं, यह भी कई लोगों की कौतूहल का विषय बना। आज आग में स्वाहा हो चुके तोड़े जा रहे नंदराम मार्केट का एक हिस्सा टूटने से एक मजदूर जख्मी हुआ । मलबा हटाया जा रहा है और उसी के साथ बड़ाबाजार प्रकरण पर लिखा जाना भी बदस्तूर जारी है। भूलभुलैया गलियों के बीच व्यस्त और संपन्न बड़ाबाजार पर मारवाड़ियों का प्रतिनिधित्व करने वाली कोलकाता की प्रमुख पत्रिका समाज विकास के हवाले से आग से लेकर मारवाड़ियों की पहचान तक पर एक लेख शंभू चौधरी ने लिखा है। यह हिंदीभाषा ग्रुप के मेल के माध्यम से मुझे भी मिला है। इसके लेखक ( -शम्भु चौधरी, पता: एफ.डी:- 453, सल्टलेक सिटी,कोलकाता-700106) ने मारवाड़ियों की प्रमुख पत्रिका समाज विकास के मेल से भेजा है। ब्लाग पर इसे इस आशय से डाल रहा हूं ताकि आप भी इनकी नजर से बड़ाबाजार और मारवाड़ियों को देख सकें। हालांकि बड़ाबाजार में आग को व्यंग्य करार दिया है मगर बात काबिलेगौर और रोचक है। आखिरी पैरे में पत्रकारों पर भी इन्होंने गंभीर टिप्पणी की है। देखिए---


व्यंग्य :बड़ाबाजार में आग तो रोज लगती है!

वाममोर्चा सरकार एक तरफ 30 वर्षों की अपनी सफलता का जश्न मना रही थी,
दूसरी तरफ दमकल कर्मी खतरे की घंटी बजाना बन्द कर रैली के पीछे-पीछे
सरकते जा रहे थे, और बड़ाबाजार धू-धू कर जलता रहा। संवेदनशील विचारधारा
के धनी मुख्यमंत्री माननीय श्री बुद्धदेव बाबू की ज़ुबान राज्य के 100 से
कम कट्टरपंथियों के आगे लडखड़ा गयी। परन्तु बिग्रेड मैदान में खूब जमकर
बोले राज्य की तरक्की के लिये उद्योगपतियों की सराहना की और कहा कि राज्य
में उद्योग लगाने के लिये कई देशी-विदेशी प्रस्ताव सरकार के पास आयें
हैं, उन्होंने माना कि बाम विचारधारा और प्रगति एक साथ नहीं चल सकती, तीस
साल बाद बामपंथियों को यह बात समक्ष में आयी, यही एक अच्छी बात है,
सर्वहारा वर्ग के मसिहा होने का ढींढोरा पिटने वली वाममोर्चा की सरकार,
किसानों की हत्याकर, उद्योग बैठायेगें यह बात गले नहीं उतरती, मुक्षे
क्या किसी भी वाम विचारधारा को नजदिक से जानने वाले को भी नहीं उतरेगी।
किसानों की उपजाऊ जमीन को गैरकानूनी तरिके से अधिकृत कर उद्योगपतियों को
औने-पौने दाम में बैच देना, नंदीग्राम के खेतिहर मजदूरों को मौत के घाट
सुला देना, कोई इनसे सीखे। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की जुबान पर
नपे-तुले शब्द थे, राज्य की प्रगति बस ! दूसरी तरफ एक कोस की दूरी
बड़ाबाजार में व्यापारियों का सबकुछ जलकर खाक हो रहा था, सारा का सारा
प्रशासन इस बात के लिये लगा था कि, मुख्यमंत्री महोदय को धूआं न लग जाये।
राज्य के वित्तमंत्री श्री असीमदास गुप्ता को छोड़कर सभी मंत्री
मकरसंक्रांति की ठण्ड में अपने-अपने घरों में वातानुकुलित शयनकक्ष का
आनन्द उठा रहे थे। वेतुके शब्दों की राजनीति करने वाले श्री विमान बोस
जिस तरह तस्लीमा के लिये अपनी जीभ हिला सकते थे, थोड़ा बहुत बड़ाबाजार
के व्यापारियों के प्रति भी हिला पाते तो कुछ सुकून मिलता, लेकिन
बामपंथी स्वभाव ने इनके हमदर्दी भरे शब्दों को भी जात और धर्म में वांट
रखा है, समाज के अन्दर असभ्यता फैलाने वाले एक शिक्षक जिसने अपनी एक
छात्रा को बहला-फुसला कर निकाह कर प्रेम का जामा पहनाया, जिसे राज्य के
स्पीकर हालीम साहेब ने राजस्थान की याद दिलाते हुये इस अपराध को नई
पीढ़ी का परिवर्तन बताया, राज्य के मुख्यमंत्री एक आम घटना पर उसके घर
जाकर सहानुभुति बटोर आये, शायद इसलिये कि मामला एक धर्मविशेष से जुड़ा
था, वाम विचारधारा को मानने वाले मेरे जैसे अनेक स्वतंत्र लोगों को तब
घोर आश्चर्य हुआ, जब 30 वर्षों से जो दल आम के फल को खट्टा बता कर , जी
भर कर कोसते रहे, आज उसी फल के गुण बताते नहीं थकते। हर मंत्री यहां तक
एक जमाने में पाँच पैसे भाड़े में वृद्धी को लेकर शहर की कई ट्रामों को
आग के हवाले कर देने वाले माननीय ज्योति बसु भी इस बात से सहमत नजर आये,
पूरे बंगाल के कल-कारखाने जब नरकंकाल बन चुके तब जाकर इनको, इस बात का
ख्याल आया कि इन नरकंकालों में अब भी थोड़ी जान बची है, जिससे राज्य का
विकास संभव है।
बड़ाबाजार आग की लपटें देशभर में फैल चुकी थी, परन्तु 100 गज की दूरी पर
खड़े राइटर्स भवन की लाल दीवारें इतनी शख्त विचारों की बनी है कि उस भवन
में बैठे मंत्री के चेम्बर तक नहीं पहूंच पाई। नगरनिगम के कर्मी और
कोलकाता के मेयर श्री विकास रंजन भट्टाचार्य बाबू और इनके प्यादे यह
बताने में लगे थे कि बड़ाबाजार की सारी इमारते गैरकानूनी है, कहने का
अर्थ यह था कि बंगाल में सिर्फ बड़ाबाजार में ही गैरकानूनी निर्माण होता
है, आग बुझे इस बात की चिन्ता किसी भी निगमकर्मी को नहीं थी, सारा का
सारा कॉरपोरेशन इस बात को लेकर परेशान था, कि यदि कोई कानूनी रूप से सही
भवन को आग लग जायेगी तो उसे भी गैरकानूनी कैसे साबित किया जाय सके।
राज्य में राजस्थान का एक तीन सदस्यी मंत्रियों का एक दल घटनास्थल का
निरक्षण करने राजस्थान से पहुंच गया, राज्य के दमकल मंत्री से मिलने उनके
कार्यलय भी गये, परन्तु राज्य के दमकल मंत्री श्री प्रतिम चटर्जी आग
बुझाने में इतने व्यस्थ थे कि इनके पास मिलने का भी वक्त नहीं था, भला हो
भी क्यों, विचारधारा का भी तो सवाल था, सांप्रदायिक लोगों से मिलकर अपनी
छवी को खराब करनी थी क्या? राजस्थान सरकार को सोचना चाहिये कि वह इसकी
दुश्मन नम्बर एक है, पहले ही तस्लीमा को लेकर राजस्थान ने आग में घी का
काम किया, उनका एक नुमांइदा जो समाज को किस तरह से नीचा करे की दौड़ में
लगा है, जिसके चलते पहले ही बंगाल के समाचार पत्रों ने जी भरकर गाली दे
डाली, राजस्थान के मंत्री आने से आग कितनी बुझी यह तो वक्त ही बतायेगा,
हां बामपंथियों के दिल में आग जरूर लग गय़ी। अब भला सच ही तो है, दमकल
मंत्री क्या केवल यही इंतजार करता रहेगा कि कब और कहां आग लगे, और भी तो
उनके पास बहुत सारे काम हैं, आपलोग खामांखा हो हल्ला करते रहिये।
बड़ाबाजार में आग लग गयी तो क्या हुआ, तपसीया, या न्यूमार्केट में तो आग
नहीं लगी है, जो बाममोर्चा के चिन्ता कारण बनती। बड़ाबाजार में तो यूँ ही
रोजना आग लगती रह्ती है, कभी प्याज के दाम में , तो कभी अनाज के दाम में,
दमकल मंत्री है, कोई खाद्यमंत्री तो है नहीं, जो बार-बार आप आग लगाते
रहिये और ये आकर बुझाते रहे। मछली य चमड़ा बाजार होती तो फिर भी सोचने की
बात थी, त्रिपाल पट्टी, कपड़ा बाजार था। आग तो लगना ही था। यह तो एहशान
है कि वे आग बुझाने आ गये, वर्ना आप क्या कर लेते।

उधार की जिन्दगी

आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न मारवाड़ी समाज के साथ जुड़ सा गया है। - क्या वह
उधार की जिन्दगी जी रहा है, या किसी के एहशान के टूकड़ों पर पल रहा है?
या फिर किसी हमदर्दी और दया का पात्र तो नहीं? मारवाड़ी समाज का प्रवासीय
इतिहास के तीन सौ वर्षों के पन्ने अभी तक बिखरे पड़े हैं। न तो समाज के
अतीत को असकी चिंता थी, नही वर्तमान को इसकी फिक्र। घड़ी की टिक-टीक ने
इस सन्नाटे में अचानक हलचल पैदा कर दी है। - विभिन्न प्रन्तों में हो रहे
जातिवाद, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता की आड़ में मारवाड़ी समाज के घ्रों को
जलाना एवं लूट लेना । साथ ही, राजनैतिक दलों का मौन रहना, मुगलों के
इतिहास को नए सिरे से दोहराते हुए स्थानीय आततायियों के रूप में
मौकापरस्त लोग एसी हरकतों से कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

'जडूला' या 'गठजोड़


यह प्रश्न आज के परिप्रेक्ष्य में हमारे मानस-पटल पर उभर कर सामने आता है
कि अपने मूल स्थान से हमने जन्म-जन्मान्तर का नाता तोड़-सा लिये। पहले तो
समाज के लोग साल में एक दफा ही सही 'देस' जाया करते थे। अब तो
बच्चों को पता ही नहीं कि उनके पूर्वज किस स्थान के थे। एक समय था जब
'जडूला' या 'गठजोड़ की जात' देस जाकर ही दिया जाता था, समाज में कई ऎसे
उदाहरण हैं, जिसमें बाप-बेटा और पोता, तीनों का 'जडूला' और 'गठजोड़ की
जात' एक साथ ही 'देस' जाकर दी । यहाँ यह कहना जरूरी नहीं कि हमारा अपने
मूल स्थाना से कितना गहरा संबंध रहा और कितना फासला है। इन दिनों
'जडूला' तो स्थानीय प्रचलन एवं मान्यताओं से जूड़ती जा रही है। जो जिस
प्रदेश में या देश में है, वे उस प्रदेश या देश के अनुकुल अपनी-अपनी अलग
प्रथा बनाते जा रहे हैं, आने वाली पीढ़ी का अपने मूल प्रदेश से कितना
मानसिक लगाव रह जायेगा, इस पर संदेह है। वैसे भी एक स्थति और भी है,
वर्तमान को ही देखें - 'मारवाड़ी कहने को तो अपने आपको रास्थानी मानते
हैं,परन्तु राजस्थान के लोग इसे मान्यता नहीं देते। यदि कोई प्रवासी
राजस्थानी वहाँ जाकर पढ़ना चाहे तो उसे राजस्थानी नहीं माना जाता।
क्योंकि उसका मूल प्रान्त राजस्थान नहीं है। यह कैसी व्यवस्था ? असम ,
बंगा़ल, उडिसा जैसे अहिन्दी भाषी प्रान्त इनको प्रवासी मानते हैं, और
राजस्थान इनको अपने प्रदेश का नहीं मानता। असम में असमिया मूल के छात्र
को और राजस्थान में राजस्थान मूल के छात्रों को ही दाखिला मिलेगा तो यह
कौम कहाँ जाय?

प्रान्तीय भाषा


मुड़िया में मात्रा की कमी के चलते हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य प्रन्तीय
भाषाओं ने इस प्रवासी समाज के अन्दर अपना प्रमुख स्थान ग्रहन कर लिया ।
कई प्रवासी मारवाड़ी परिवार ऎसे हैं जिनको सिर्फ बंगला, असमिया, तमील, या
उड़िया भाषा ही लिखाना, बोलना और पढ़ना आता है, कई परिवार में तो
राजस्थानी की बात तो बहुत दूर उनको हिन्दी भी ठीक से बोलना-पढ़ना नहीं
आता, लिखने की कल्पना ही व्यर्थ है।

पर्व-त्यौहार

बिहार में 'छठ पूजा' की बहुअत बड़ी मान्यता है,ठीक वैसे ही बंगाल मैं
'दुर्गा पूजा', 'काली पूजा', असम में 'बिहू उत्सव', महाराष्ट्र में 'गणेश-
महोत्सव, उड़ीसा में 'जगन्नाथ जी की रथयात्रा', दक्षिण भारत में 'ओणम-
पोंगल', राजस्थान में होली-दिवाली, गुजरात में डांडीया-गरबा, पंजाब में
'वैशाखी उत्सव' आदि पर्व व त्योहरों की विषेश मान्यता है, असके साथ ही
हिन्दू धर्म के अनुसार कई त्योहार मनाये जाते हैं जिसमें राजस्थान में
विषेशकर के राखी, गणगोर की विषेश मान्यता है, गणगोर तो राजस्थान व
हरियाणावासियो का अनुठा त्योहार माना जाता है। जैसे-जैसे मारवड़ी समाज के
लोग इन प्रान्तों में बसते गये, ये लोग अपने पर्व के साथ-साथ स्थानीय
मान्यताओं के पर्व व त्योहारों को अपनाते चले गये। बिहार के मारवाड़ी तो
छठ पूजा ठीक उसी तरह मानाने लगे, जैसे बिहार के स्थानीय समाज मानाते हैं
यहाँ यह बताना जरूरी है कि जो मारवाड़ी परिवार कालान्तर बिहार से उठकर
किसी अन्य प्रदेश में बस गये, वे आज भी छठ पूजा के समय ठीक वैसे ही बिहार
जाते हैं जैसे बिहार के मूलवासी इस पर्व को मनाने जाते हैं। अब विवशता यह
है कि राजस्थान के बिहार के मारवाड़ी को बिहारी, असम के मारवाड़ियों को
असमिया, बंगाल व उड़ीसा के मारावाड़ियों को बिहारी, बंगाली, असमिया, या
उड़िया समझते हैं, एवं स्थानीय भाषायी लोग मारवाड़ियों को राजस्थानी
मानते हैं। विडम्बना यह है,कि मारवाड़ी कहने को तो रजस्थानी है, परन्तु
राजस्थान के लोग इसे राजस्थानी नहीं मानते।

लोगों का भ्रम:


आम तौर पर लोगों को यह भ्रम है कि मारवाड़ी समाज एक धनी-सम्पन्न समाज है,
परन्तु सच्चाई इस भ्रम से कोसों दूर है। यह कहना तो संभव नहीं कि
मारवाड़ी समाज में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हाँ ! धनी
वर्ग का प्रतिशत इतर समाज के अनुपात में नहीं के बराबर माना जा सकता है।
उद्योग-व्यवसाय तो सभी समाज में कम-अधिक है। प्रवासी राजस्थानी, जिसे
हम देश के अन्य भागों में मारवाड़ी कह कर सम्बोधित करते हैं या जानते
हैं, अधिकतर छोटे-छोटे दुकानदार या फिर दलाली के व्यापार से जुड़े हुए
हैं, समाज के सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार तो नौकरी-पेशा से जुड़े हुए
हैं, शेष बचे बीस प्रतिशत का आधा भा़ग ही संपन्न माना जा सकता है, बचे दस
प्रतिशत भी मध्यम श्रेणी के ही माने जायेगें। कितने परिवार को तो दो जून
का खाना भी ठीक से नसीब नहीं होता, बच्चे किसी तरह से संस्थाओं के सहयोग
से पढ़-लिख पाते हैं। कोलकाता के बड़ाबाजार का आंकलन करने से पता चलता है
कि किस तरह एक छोटे से कमरे में पूरा परिवार अपना गुजर-बसर कर रहा है।
इस समाज की एक खासियत यह है कि यह कर्मजीव समाज है, मांग के खाने की जगह
कमा कर खाना ज्याद पसंद करता है, समाज के बीच साफ-सुथरा रहना अपना
कर्तव्य समझता है, और कमाई का एक हिस्सा दान-पूण्य में खर्च करना अपना
धर्म। शायद इसलिए भी हो सकता है इस समाज को धनी समाज माना जाता हो, या
फिर विड़ला-बांगड़ की छाप इस समाज पर लग चुकी हो। ऎसा सोचना कि यह समाज
धनी समाज है, किसी भी रूप में उचित नहीं है। आम समाज की तरह ही यह समाज
भी है, जिसमें सभी तबके के लोग हैं , पान की दुकान, चाय की दुकान, नाई ,
जमादार, गुरूजी(शिक्षक), पण्डित जी (ब्राह्मण), मिसरानी ( ब्राह्मण की
पत्नी), दरवान, ड्राईवर, महाराज ( खाना बनाने वाले), मुनीम (खाता-बही
लिखने वाला) ये सभी मारवाड़ी समाज में होते हैं इनकी आय भारतीय मुद्रा के
अनुसार आज भी दो - तीन हजार रूपये प्रतिमाह (कुछ कम-वेसी) के आस-पास ही
आंकी जा सकती है। यह बात सही है कि समाज में सम्पन्न लोग के आडम्बर से
गरीब वर्ग हमेशा से शिकार होता आया है, यह बात इस समाज पर भी लागू होती
है।

आडम्बर:


मारवाड़ी समाज के एक वर्ग को संपन्न समाज माना जाता है, इनके कल-कारखाने,
करोबार, उद्योग, या व्यवसाय में आय की कोई सीमा नहीं होती, ये लो़ग जहाँ
एक तरफ समाज के सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते पाये जाते
हैं वहीं दूसरी तरफ अपने बच्चों की शादी-विवाह, जन्मदिन का जश्न मनाने
में, या सालगिरह के नाम पर आडम्बर को भी मात देने में लग जाते हैं, उस
समय पता नही इतना धन कहाँ से एकाएक इनके पास आ जाता है, जिसे पानी की तरह
बहाने में इनको आनन्द आता है, अब कोलकाता में तो बहार से आकर शादी करना
एक फैशन सा बनते जा रहा है, बड़े-बड़े पण्डाल, लाखों के फूल-पत्ती, लाखों
की सजावट, मंहगे-मंहगे निमंत्रण कार्ड, देखकर कोई भी आदमी दंग रह जायेगा।
सबसे बड़ा हास्यास्पद तब लगता है, जब कोई समाज की सभाओं में इन आडम्बरों
के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें तो करता है, जब खुद का समय आता है तो यही
व्यक्ति सबसे ज्यादा अडम्बर करते पाया जाता है। एक-दो अपवादों को छोड़
दिया जाय तो अधिकांशतः लोग समाज के भीतर गन्दगी फैलाने में लगे हैं। इनका
इतना पतन हो चुका है कि इनको किसी का भय भी नहीं लगता। समाज के कुछ दलाल
किस्म के हिन्दी के पत्रकार भी इनका साथ देते नजर आते हैं। चुंकि उनका
अखबार उनके पैसे से चलता है इसलिये भी ये लाचार रहतें हैं, दबी जुबान
थोड़ा बोल देते हैं परन्तु खुलकर लिखने का साहस नहीं करते। इन पत्रकारों
की मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि, कोई भी इनको पैसे से खरिद सकता है,
भाई ! पेट ही तो है, जो मानता नहीं। अखबार इनलोगों से चलता है, इनका घर
इनकी दया पर चलता है, तो कलम का क्या दोष वह तो इनके दिमाग से नहीं इनके
हाथ से चलती है।
इन पत्रकारों के पास न तो कलम होती है, न ही हाथ य लुल्ले पत्रकार होते
हें , इनके पास सिर्फ कगज छापने की एक लोहे की मशीन भर होती है, बस ,
भगवान ही इनका मालिक होता है, दिमाग भी इतना ही दिया कि ये बस मजे से खा
सकते हैं। इनका समाज में किसी भी प्रकार का सामाजिक दायित्व नहीं के
बराबर है।

3.2.08

इतने भुलक्कड़ हैं

हम लोग इतने भुलक्कड़ हैं कि बड़ी -बड़ी बाते सहज ही भूल जाते हैं ,कुछ थोड़ा सा टोचन देना जरूरी मानता है । साली चिढ़ सी होने लगती है इस बात से कि क्या भगवान ने भुलक्कड़पन की मिट्टी से ही बनाया है या कुछ और भी मिलाया था । मैंने एड्स वाला मामला बताया तो किसी ने उस पर पादा तक नहीं लोगों को लगता है कि राज या खाज ठाकरे का हगना बताना जरूरी है । अरे भाई लोग जस्टिस आनंद सिंह की बात करो ताकि दबाव बन सके कि कुछ सुनवाई हो सके । यार दिमाग घूमा हुआ है इस लिए ज्यादा लिखने का मन नहीं हो रहा ।
जय भड़ास

ठंड के दिनों मे नानी का चूल्हा बहुत याद आता है

ठंड के दिनों मे नानी का चूल्हा बहुत याद आता है
पहले घर घर मे चूल्हा जलाये जाते थे उस समय गैस के चूले नही थी |उस समय लकडी से चूल्हे मे आग जलाई जाती थी | जब हम लोग सपरिवार ठंड के दिनों मे नाना-नानी के घर जाते थे तो उनके यहाँ करीब ५० सदस्य थे और उन सभी का खाना एक ही छत के नीचे बनता था | घर मे एक विशाल चूल्हा था उस चूल्हे को जलाने के लकडी का उपयोग किया जाता था | ठंड के दिनों मे मेरे नाना के घर के सभी सदस्य और हम लोग सुबह होते ही चाय पीने के बहाने चूल्हे को घेर कर बैठ जाते थे और आग तापते थे | आग तापना उस समय बड़ा सुखद अच्छा लगता था | ठंड के दिनों मे हम सभी मिल जुलकर सुबह और शाम चूल्हे के सामने जा बैठते थे और उस चूल्हे के सामने बैठकर खाना खाते थे और आग तापते जाते थे बीच-बीच मे मेरी नानीजी एक-दो कहानी भी हम सभी को सुना देती थी बड़ा अच्छा लगता था | अब जब जब ठंड आती है तो उस समय का चूल्हा और आग सेकना याद आ जाता है | अब बदलते समय के साथ-साथ लकडी के चूल्हे बंद हो गए है और घर-घर मे गैस के चूल्हे जलाये जाते है | अब तो लकडी की भारी किल्लत है आग तापना तो दूर लकडी के दर्शन करना भी दुर्लभ है | इस भारी ठंड मे गैस पर खाना बनाने वाला ख़ुद आग ताप नही सकता है तो परिवारजनों के भारी ठंड मे आग तापने की बात करना बेकार है | मेरी समझ से आग तापे बिना ठंड भी तो नही जाती है कुल मिलाकर लकडी से जलाये जाने वाले परम्परागत ठंड के दिनों मे बहुउपयोगी थे आग तापने के साथ साथ खाना बनाने के काम भी आता था | ठंड के समय मे उस ज़माने के लकडी से जलाये जाने वाले परम्परागत चूल्हे को मेरी पीढी के लोग भुला नही सकते है |

*अपने ज्ञान को परखे आनलाइन*

*अपने ज्ञान को परखे आनलाइन*
अगर आपका बच्चा पढ़ाई लिखाई मे कमजोर है और आप उसके भविष्य को लेकर चिंतित है तो आपकी यह चिंता इंटरनेट दूर कर सकता है | अपने ज्ञान की परीक्षा के लिए अब बच्चो को प्री एग्जाम का इंतजार नही करना पड़ेगा क्योकि अब इसका हल "आनलाइन" मौजूद है | असल मे इंटरनेट पर कई ऐसी बेबसाइड है जिनके माध्यम से आप अपने बच्चो का नाँलेज का परीक्षण कर सकते है कि आपका बच्चा कितने गहरे पानी मे है | इन बेबसाइड मे नर्सरी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट लेबल तक के सारे टेस्ट पेपर उपलब्ध है | आनलाइन असेसमेंट के द्वारा आप अपना ख़ुद का आईक्यू लेवल भी चेक कर सकते है और ख़ुद की कमजोरियो को जान सकते है | वेवसाइड मे टेस्ट के १५ से २० मिनिट के बाद रिजल्ट आपके सामने आ जाता है | दरअसल जब आप इस टेस्ट से गुजरेंगे तो इसमे आपको वीक प्वाइंट भी बताये जावेंगे | इसके द्वारा अभिभावक अपने बच्चो के कमजोर पहलुओ पर वर्क कर सकते है और उसे मजबूत भी कर सकते है जिससे आपका बच्चा परीक्षा मे अच्छे परिणाम ला सके | आजकल बच्चो का फेवरेट कम्प्यूटर गेम होते है और उन्हें इंटरनेट के गेम बहुत पसंद आते है लेकिन सेल्फ असेसमेंट वेवसाइड से अब बच्चो की आदत मे खासा परिवर्तन आ रहा है अब इसके माध्यम से बच्चे जादा से जादा समय ख़ुद को परखने मे लगे रहते है | एक बच्चा पढ़ाई लिखाई मे कमजोर था जबसे उसके किसी दोस्त ने उसे बताया की इंटरनेट मे कुछ ऐसा है कि तुम अपने ज्ञान को ख़ुद परख सकते हो | आजकल वह बच्चा अपने ज्ञान को ख़ुद परखता रहता है आजकल वह बहुत होशियार हो गया है |
नेट पर उपलब्ध सभी वेवसाइड स्टैण्डर्ड हो यह जरुरी नही है फ़िर भी आनलाइन असेसमेंट से पहले यह तय कर ले कि वेवसाइड मे दिए गए टेस्ट पैटर्न बेहद सरल है या बेहद कठिन तो नही है | जानकारी के लिए कुछ आनलाइन वेवसाइड के नाम निम्नानुसार है --
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भड़ासुक सवाल और भड़ासी गुरू के साप्ताहिक ज़वाब


१॰ बनारस से अनिता पूछती हैं कि आप अभिषेक बच्चन होते तो क्या करते?

भड़ासी गुरूः अपना अभिनय सुधारता और ऐश के साथ ऐश करता॰


२॰ जमशेदपुर से मंगीरामः पैसों के पेड़ होते तो क्या होता?

भड़ासी गुरूः खाद डालने के बड़े पैसे लगते॰ डॉलर, रूपयों, रूबल और पौंड इत्यादि की अलग-अलग कलम लगानी पड़ती॰


३॰ नोयडा से नीरूः गुस्सा नाक पर हो तो क्या करना चाहिए?

भड़ासी गुरूः नाक से मुँह में लाकर थूक देना चाहिए फिर भी बात ना बने तो नाक ही काट देनी चाहिए।


४॰ चेन्नई से चिंतारामः पति-पत्नी में लड़ाई क्यों होती है?

भड़ासी गुरूः कहते हैं कि प्यार और युध्द में सब जायज होता है, वो प्यार के लिए लड़ते हैं और लड़ाई के लिए प्यार करते हैं॰


५॰ मुम्बई से पियांक शर्माः समन्दर में पानी की जगह शराब होती तो?

भड़ासी गुरूः बेवड़े मैखानों में न लोटकर कहीं बीच पर लोटते और हरिवंश राय बच्चन जी को लिखना पड़ता- राह पकड़ तू समंदर की चलाचल, पा जायेगा मधुशाला॰


६॰ कोलकाता से कामिनी मुखर्जीः सबसे प्यारे दोस्त अगर धोखा दे दें तो?

भड़ासी गुरूः खुद से पूछना चाहिए कि सबसे प्यारा दोस्त, सच्चा दोस्त था भी कि नहीं?


७॰ दिल्ली से दिलरुबा चौबेः जिन्दगी में सबसे बेशकीमती चीज क्या है?

भड़ासी गुरूः चरित्र, शान्ति और किडनी।


८॰ गाजीपुर से डॉन जुआन फकीरः जार्ज बुश और मुशर्रफ में क्या सम्बन्ध है?

भड़ासी गुरूः वही जो एक बाप और बेटे में होता है॰ वही जो एक बॉस और चमचे में होता है॰


९॰ पाकिस्तान से सलाहुद्दीनः आप पाकिस्तान क्यों नहीं आना चाहेंगे?

भड़ासी गुरूः अपने से कैसे सोच लिया कि नहीं आंएगे? नीलोफर बख्तियार से मेरी बात चल रही है अभी आता हूँ॰


१०॰ जम्मू से शोभना डडवालः मनमोहन जी सबके चहेते कैसे हैं?

भड़ासी गुरूः अपनी आज्ञाकारिता के चलते॰

कमाल तुम्हें यकीन है।

सुर्ख सुर्ख भूख है,स्याह स्याह जिंदगी,
आजा़द हो चुका मुल्क,कमाल तुम्हें यकीन है।
उम्मीद औ खेत सूख चुके,पानी सिर्फ आँखों मैं है,
बदलेगी फिजा़ गरीब की,कमाल तुम्हें यकीन है।
खानें को रोटी नहीं,रहनें को कोई घर नहीं,
नींद अच्छी आयेगी,कमाल तुम्हें यकीन है।
भूख की बज्म़ में मौत की शमाँ जल रही,
रोशन फिर भी हालात है,कमाल तुम्हें यकीन है।
मुल्क चमन बन चुका,पर फूल सारे झड चुके
खिजा़ खुशनुमाँ सी है,,कमाल तुम्हें यकीन है।
नौजवाँ बेकार हैं,तंगहाली त्यौहार है,
खुश हर शख्स यहाँ, कमाल तुम्हें यकीन है।
फुटपाथों को देख लो,भारत वहीं पल रहा,
घर में तेरे छत नहीं, कमाल तुम्हें यकीन है।

Harsimran Sethi, Sandhya Samachar


Media Khabar Yun Chaapta Hai
Jaise shikaari Dana Daalta Hai

Thode Se Daano se Vo Rah Banata Hai
Jaha Chahta Hai Waha Shikaar Lata Hai

Khabron Ko Tod Kar Roz Baechta Hai
Media Ke Uppar Ab Kaun Bolta Hai...

Media Ne Sabko Hairaan Kar Diya Hai
Naari Ke Vastron Ko Neelaam Ker Diya Hai....

203 हो गए...चीयर्स !!!

भड़ास की दुकान तो चल निकली है। भड़ासियों ने मुंह खोलना शुरू कर दिया है। नए नए लोग भड़ासी बन रहे हैं। रोजाना पांच से दस पोस्टें भड़ासी लिख रहे हैं। आनलाइन माध्यम में हिंदी की जय जय के इस दौर में हिंदी वाले साथियों ने आत्मविश्वास का एक नया मुहावरा सीखा है। अंग्रेजी नहीं आती तो नहीं आती, बला से। हिंदी आती है तो यह काफी है। आप दुनिया से हिंदी के जरिये जुड़े रह सकते हैं। मित्रों से हिंदी में चैट कर सकते हैं। अपने दिल की बात हिंदी में कह सकते हैं। अपने आफिस का काम हिंदी में कर सकते हैं। हालांकि आफिस वाले मामले में अभी थोड़ी दिक्कत है क्योंकि ढेर सारे आफिसों में लार्ड मैकाले की संतानें अब भी अंग्रेजी में ही सब कुछ करने को कहती हैं लेकिन अगर हिंदी वाले अपने साथी इसी तरह आत्मविश्वास से हिंदी की जय जय करते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं कि लार्ड मैकाले की संतानें अल्पमत में पड़ जाएंगी और फिर उनकी अंग्रेजी को आफिसों से खदेड़ दिया जाएगा। बस, थोड़ा इंतजार करिए। ये जो ब्लागरों की फौज तैयार हो रही है, हिंदी की, वो इन सब काले अंग्रेजों की ऐसी-तैसी करने ही वाली है और कर भी रही है।

भड़ास से रोज नए साथी जुड़ रहे हैं और अब सबका नाम याद रख पाना मेरे लिए कठिन हो रहा है। इसलिए नए साथियों से क्षमा मांगते हुए कहना चाहूंगा कि कोई आपकी पोस्ट पर कमेंट करे या न करे, आप अपनी बात लिखना जारी रखो। और हां, हो सके तो खुद का भी एक ब्लाग बना लो। भड़ास तो कम्युनिटी ब्लाग है जहां अब 203 सदस्य हो चुके हैं। यहां आप जो लिखेंगे वो पूरी दुनिया पढ़ेगी, पूरा देश पढ़ेगा। आपकी बात सब तक पहुंचेगी। पर जब आप अपना ब्लाग बनाते हैं तो न सिर्फ अपने व्यक्तित्व व आइडेंटिटी को एक आनलाइन शक्ल देते हैं बल्कि आनलाइन माध्यम में अपना एक कोना भी रखते हैं। जरूरी नहीं कि ब्लाग बना लें तो रोज ही लिखें, लेकिन महीने पंद्रह दिन में अपने ब्लाग पर भी लिखें। इससे आगे चलकर आपको कई तरह के फायदे मिल सकते हैं। ब्लाग बनाएं तो यूं ही न बनाएं, उसका एक मतलब भी हो। उसके साथ एक दूर दृष्टि भी जुड़ी हो। ऐसे फील्ड पर ब्लाग बनायें जो अब तक न बना हो। मसलन आप कूड़ा बीनने वाले बच्चों के उपर एक ब्लाग बना सकते हैं और उन के बारे में जहां जो कुछ छप रहा हो, उसे अपने ब्लाग पर डाल सकते हैं। मतलब, आप का ब्लाग किसी एक फील्ड का विशेषज्ञ ब्लाग हो तो इससे भविष्य में न सिर्फ आपको एक पहचान मिलेगी बल्कि व्यावसायिक फायदा भी मिल सकता है।

मैं तो सिर्फ यह बताने के लिए लिख रहा था कि भड़ासियों की संख्या आज 203 हो गई, पर इतना सारा लेक्चर झाड़ डाला। चलिए, अगर लेक्चर काम का लगा तो टैंकू, न लगा तो सारी....
जय भड़ास
यशवंत

उनकी आस्था का फूल कबकी झर गया होगा...अवनींद्र कमल-अंतिम भाग

शहर की तंग बस्ती से काफिला गर गया होगा
किसी मुफलिस का बच्चा फिर कुचल कर मर गया होगा

किसे फुरसत है, उसके हाल पर अफसोस करने की
जो मजदूरी के बदले मार खाकर घर गया होगा

हुई है मौत उसकी छटपटाकर भूख से लेकिन
तुम्हें लगता है कोई कत्ल आकर कर गया होगा

गंगा में नहाकर कार से वो लौट आया है
कभी ये सोच मत लेना कि सचमुच तर गया होगा

जो करजे में ही डूबे हैं, वो क्या डुबकी लगायेंगे
उनकी आस्था का फूल कबका झर गया होगा

वसूली के लिए जब रात में छापा पड़ा होगा
पुलिस को देखकर के गांव सारा डर गया होगा


-अवनींद्र कमल


और अंत में...

शहर की सनसनी में खो गई है याद गांव की
नन्हों को सुनाये लोरियां अब कौन माओं की

मुझे लगता है गंगा शर्म से खुद डूब जाएगी...अवनींद्र कमल-पार्ट वन

बनारस उन दिनों धर्म की वजह से कम, सांप्रदायिक तनाव और मारामारी के लिए ज्यादा जाना जाता था जब अवनींद्र कमल बनारस में अध्ययन के लिए गए हुए थे। एक बेहद सामान्य परिवार का नौजवान हिंदी साहित्य के लिए कुछ करने की मंशा लेकर पढ़ाई-लिखाई करता रहा, साथ ही बनारस की संवेदना को भी पकड़ने की कोशिश में लगा रहा। उसे जो समझ में आया, उसे लिपिबद्ध किया। तब दुबला-पतला अवनींद्र कमल मंचीय कविताई में उभरता हुआ सितारा था और उसने इसी कर्म में अपना जीवन लगाने की ठानी थी। पर होता वो कब है जो सोचा होता है, होता वो है जो कभी न सोचा।

मंचीय कविता में कुछ ही दिनों की मेहनत के बाद नाम कमाने से चमका यह सितारा रोजी-रोटी और घर-गृहस्थी चलाने के लिए इस कदर गंभीर संकट में पड़ा कि उसे दो हजार रुपये की नौकरी पर पत्रकारिता में ट्रेनी का करियर शुरू किया। अमर उजाला के बाद अब दैनिक जागरण में उप संपादक हैं, पश्चिमी यूपी के एक जिले बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ हैं। जब उन्हें अपने गांव, माटी, मंचीय कविताई आदि की याद आती है तो रुवांसा होकर कमल बोलते हैं--ज़िंदगी साली लौंड़े लग गई, घर-गृहस्थी चलाने में।

अपने पुराने दिनों की सीडी देखकर कमल खुद को तसल्ली देते हैं, एक दुबला पतला नौजवान बड़े बड़े दिग्गज मंचीय कवियों के बीच माइक संभाल कर लगातार गाये-बोले जा रहा है और पब्लिक ताली पीट रही है। उन दिनों का दुबला-पतला नौजवान अब भरे गाल और शरीर वाला हो चुका है, कुछ ठीकठाक घर-गृहस्थी और नौकरी चलने की वजह से और कुछ दारूबाजी के कारण।

यहां अवनींद्र द्वारा लिखित कुछ कविताएं डालना चाहूंगा जिन्हें मैं शुरू से बेहद पसंद करता रहा हूं। फोन पर अवनींद्र ने ये लाइनें नोट कराईं, हालांकि सच ये भी है कि इधर पिछले पांच छह सालों में अवनींद्र ने कुछ नहीं लिखा है। आप कह सकते हैं कि एक प्रतिभा ने दुनियादारी के चक्करर में असमय दम तोड़ दिया। हममें से ज्यादातर का यही हाल है, करना कुछ चाहते थे, कर कुछ रहे हैं....चलिए, कमल बाबू को पढ़ते हैं...

जय भड़ास, यशवंत

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उन दिनों का बनारस

अजी देखो बनारस शहर की ये तंग गलियां हैं
यहां गंगा के पानी में कई प्यासी मछलियां हैं

न अब सुबहे बनारस है, न अब वह मौज मस्ती है
जहां पर देखिये अब देखिये फिरकापरस्ती है

कि हत्या और बलवा इस नगर की शान है भाई
यहां पूजा गृहों में बिक रहा इमान है भाई

यहां पंडों की किलकारी से मंदिर गूंज जाते हैं
सुना है इस शहर में देवता भी घूस खाते हैं

दबी इतिहास के खंडहर में कबिरा की कहानी है
वो खाली पेट जो सोई हुई है नौकरानी है

यहां तुलसी की चौपाई की हत्या रोज होती है
स्वयं सीताओं को ही रावणों की ही खोज होती है

गूंगे पेट की शहनाई चारों ओर बजती है
पुजारी की तपस्या से अब लैला उपजती है

खड़ी इतरा रही जो ये गगनचुंबी हवेली है
इसी के सामने फैली कई खाली हथेली है

कि तन की नग्नता से सभ्यता भी उब जाएगी
मुझे लगता है गंगा शर्म से खुद डूब जाएगी

2.2.08

हर फासला तेरा

हर फासला तेरा हमे दूर होने का एहसास करता रहा।
पर हम भी कम नही थे एक मुसाफिर कि तरह चलते रहे।

किस बात से खफा थे वो हमसे इस बात को तो छोडिये।
कभी एहसास तक न होने दिया, हमेशा खुश होकर मिलते रहे।

कितने सपने संजो लिए हमने देखते-देखते।
वो महज रेत का घरौंदा था, जिसे हम आशियाना समझते रहे।

किसको सुनाये अपनी नासमझी का किस्सा अबरार।
मंजिल साथ खड़ी थी और हम रास्ता तलाशते रहे।

अबरार अहमद, दैनिक भास्कर, लुधियाना

विज़न २०२०

यह मेरी कविता आप सब भविष्य दृष्टाओ के सपनो को और विशेष तौर पर पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम साहब को समर्पित है !
जय भड़ास !


हरी नीली
लाल पीली
बड़ी बड़ी
तेज़ रफ़्तार भागती मोटरें
और उनके बीच पिसताघिसटता
आम आदमी

हरे भरे हरियाले पेडों
के नीचे बिखरी
हरी काली सफ़ेद लाल
पन्नियाँ
और उनको बीनता
बचपन

सड़क किनारे चाय
का ठेला लगाती
वही बुढ़िया
और
चाय लाता
वही छोटू

बडे बडे
डिपार्टमेंटल स्टोरों
में पाकेट में सीलबंद
बिकता किसान
भूख से
खुदकुशी करता

पांच सितारा अस्पताल
का उद्घाटन करते प्रधानमंत्री
की तस्वीर को घूरती
सरकारी अस्पताल में
बिना इलाज मरे नवजात की लाश

इन सबके बीच
इन सबसे बेखबर
विकास के दावों की होर्डिंग्स
निहारता मैं
और मन में दृढ करता चलता यह विश्वास
कि हां २०२० में
हम विकसित हो ही जाएँगे
दिल को
बहलाने को ग़ालिब ....................

एक बार फिर
जय भड़ास !!

परवेज़ सर को शुभकामनाऐं

आप सभी को जानकर खुशी होगी कि हमारे प्रिय सर परवेज़ सागर जी को नेशनल मीड़िया एक्सिलेंस अवार्ड के लिये नामित किया गया है। यह अवार्ड़ समारोह सात फरवरी को दिल्ली के फिक्की ऑड़ीटोरियम मे मीड़िया फेडेरेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा है। इस समारोह मे देशभर के जाने-माने पत्रकारों और टीवी पत्रकारों को उनकी ख़बरों के लिये सम्मानित किया जायेगा। गौरतलब है कि वर्ष 2007 मे श्री सागर को "आज तक" पर ज़हरीली सब्ज़ियों का खुलासा करने के लिये ईएम बेस्ट रिर्पोटर ऑफ दी ईयर अवार्ड़-2007 से सम्मानित किया जा चुका है। इस ख़बर ने राजधानी समेत पूरे देश मे लोगों को बेची जा रही ज़हरीली सब्ज़ियों का पर्दाफाश किया गया था। परवेज़ सर को रंगकर्मी परिवार और भड़ासियों की ओर से ढेरों शुभकामनाऐं। हम सभी उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।

लो तो हम आ गए

भड़ासियों की तरफ से लगातार मीरा को लिखने को कहा जा रहा हैं। मीरा को तो आप लोग जानते ही हैं। हम तो मनमौजी और आवारा हैं जब जी चाहा कुछ गा गुनगुना लिया। जब जी चाहा कोई कविता लिख दी।आप लोगों की तरह गालियों में तो पीएचडी हैं नहीं कि जब मन किया उसकी तेरे बाप की और तेरे भाई की कर दी।पर इन दिनों ब्लाग्स को देख पढ़ कर कुछ मजा नहीं ाता इसलिए लिखने का मन भी नहीं करता। कुछ दिल्ली की सर्दी भी ऐसी है कि यहां तो घर और काम संभालना ही मुश्किल हो जाता है फिर इतनी ठडं में कौन कंप्यूटर पर माथा मारे। उससे तो बैठ कर बतिया लिया जाए तो क्या बुरा है। इसलिए ब्लागरों की जगह आजकल अपने रियल दुनिया की मित्रों और कलिग्स से ज्यादा बतियाती हूं।


भडासियों की बढ़ती संख्या

यशवंत जी को बधाई । भड़ासियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आशा है कि बहुत जल्दी ही ये सबसे बड़ा कम्यूनिटी ब्लाग बन जाएगा। हिन्दी का तो पहले से ही भड़ास सबसे बड़ा कम्यूनिटी ब्लाग है। हमारे जैसे कुछ लोग शौकिया पढ़ते लिखते इससे ऐसे ही जुड़ते रहेंगे। शायद मेरा यह ब्लाग प्रकाशित होने तक ये 200 के आसापास होंगे तो हम तो यही कहेंगे लगे रहो भड़ासियों


अपने दिल की कहिए...


बसंत की दस्तक ने एक बार फिर से तन , मन और उपवन में आग लगा दी है। वसुन्धरा के श्रृंगार ने मन में अलसाए प्रेम को फिर से चैतन्य कर दिया है। मै भी छलांग लगाने को तैयार हूँ।

'खुसरो दरिया प्रेम का , उल्टी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार,
मेरे इस माद्दे को और बल मिल जाता है जब फ़िराक साहब की बात मान लेता हूँ -
'कोई समझे तो एक बात कहूं
इश्क तौफ़ीक है गुनाह नहीं,
विज्ञान , साहित्य और शास्त्रों के उदाहरणों और तर्कों के बावज़ूद भी ये गुनाह कर डाला । विज्ञान ने कहाँ ये तो हारमोन...वगैरह के कारण होता ही है . साहित्य ने उम्र , रूप और जात -पात , धर्म के सारे बंधन ख़त्म कर दिए. शास्त्रों ने कहाँ प्रेम ही सत्य है इस लिए ईश्वर से प्रेम करो... ! बावज़ूद इन सब के मुझ में ये तौफ़ीक थी की मैंने इश्क किया। अंत में दुनिया - दारी ने एक पाठ पढ़ाया
' ये सम ही सो कीजिए

ब्याह बैर और प्रीत,

इस पाठ में फ़ैल हो गया। और बशीर बद्र साहब की बात मान बैठा -

ये मोहब्बतों की कहानियां भी बड़ी अजीबो- ग़रीब हैं
तुझे मेरा प्यार नहीं मिला, मुझे उसका प्यार नहीं मिला

हालांकि बकौल निदा साहब ये टीस तो है -
'दुःख तो मुझ को भी हुआ, मिला न तेरा साथ

शायद तुझ में भी न हो, तेरी जैसी बात'
अगर आप के अन्दर भी है कोई ऐसा ही दर्द, अहसास या आग, किसी खूबसूरत लम्हे की याद... अनुभूति। तो मेरे इस यज्ञ में आहुति देने के लिये आप भी प्रेम सहित आमंत्रित हैं . अगर आमंत्रण से परहेज हो तो अनियंत्रित हो कर भी इस सागर में गोता लगा सकते हैं. अपनीबात... पर होगी इस माह प्रेम की बात. अपने दिल की कहिए कैसे भी...

सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल...सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता का अंतिम भाग

(मुझे अब तक की सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता जो लगी, उसका पहला पार्ट कल आप लोगों ने पढ़ा होगा, हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने शीर्षक से। जिन लोगों ने नहीं पढ़ा हो, उपरोक्त शीर्षक को क्लिक कर पढ़ लें, फिर आज दूसरा और अंतिम पार्ट पढ़ें, जो नीचे दे रहा हूं। कवि का नाम है, हरेप्रकाश उपाध्याय। मैं इनसे मिला नहीं हूं, इनके बारे में कोई खास जानकारी नहीं रखता पर इन इस एक कविता को पढ़कर मैं इनका फैन हो गया। भई वाह, क्या लिखा है। उन शुद्धतावादियों, परंपरावादियों, यथास्थितिवादियों, पोंगापंथियों....को इस कविता को जरूर पढ़ना चाहिए और सोचना चाहिए कि उनके इस सिस्टम में सहज चीजें सहज तरीकें से क्यों नहीं मिल पातीं। अगर कोई भी भड़ासी साथी हरेप्रकाश उपाध्याय जी के बारे में कुछ जानता हो तो वो जरूर जानकारी दे। इतना बता दूं कि ये कविता इससे पहले कई मैग्जीनों में भी प्रकाशित हो चुकी है...जय भड़ास, यशवंत)


सच ने नहीं, झूठ ने दिया संबल
जब थक गए पांव
झूठ बोलकर हमने मांगी मदद जो मिली
झूठे कहलाए बाद में
झूठ ने किया पहले काम आसान
आत्महत्या से बचाया हमें उन छोरियों के प्रेम ने
जो बुरी मानी गईं अक्सर
हमारे समाज ने बदचलन कहा जिन्हें
बुरी स्त्रियों और सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने
सिखाया करना प्रेम
बुरे गुरुओं ने सिखाया
लिखना सच्चे प्रेम पत्र
दो कौड़ी के लेमनचूस के लालच में
पड़ जाने वाले लौंडों ने
पहुंचाया उन प्रेम-पत्रों को
सही मुकाम तक

जब परेशानी, अभाव, भागमभाग
और बदबूदार पसीने ने घेरा हमें
छोड़ दिया गोरी चमड़ी वाली उन
खुशबूदार प्रेमिकाओं ने साथ

बुरी औरतों ने थामा ऐसे वक्त में हाथ
हमें अराजक और कुंठित होने से बचाया
हमारी कामनाओं को किया तृप्त

बुरी शराब ने साथ दिया बुरे दिनों में
उबारा हमें घोर अवसादों से
स्वाभिमान और हिम्मत की शमा जलाई
हमारे भीतर के अंधेरों में
दो कौड़ी की बीड़ियों को फूंकते हुए
चढ़े हम पहाड़ जैसे जीवन की ऊंचाई
गंदे नालों और नदियों का पानी का आया वक्त पर
बोतलों में बंद महंगे मिनरल वाटर नहीं
भूख से तड़पते लोगों के काम आए
बुरे भोजन

कूड़े पर सड़ते फल और सब्जियां
सबसे सस्ते गाजर और टमाटर
हमारे एकाकीपन को दूर किया
बैठे-ठाले लोगों ने
गपोड़ियों ने बचाया संवाद और हास्य
निरंतर आत्मकेंद्रित और नीरस होती दुनिया में
और जल्दी ही भुला देने के इस दौर में
मुझे मेरी बुराइयों को लेकर ही
शिद्दत से याद करते हैं
उस कसबे के लोग
जहां से भागकर आया हूं
दिल्ली !


--हरेप्रकाश उपाध्याय

(यह कविता का दूसार व अंतिम पार्ट है। इससे पहले की कविता पढ़ने के लिए क्लिक करें....हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने)

कृपया इसे न पढें

यशवंत भैया को पाय लागू
जब पहली बार भड़ास के बारे मी सुना था तो बड़ी उत्सुकता हुई थी इसे जानने की कि ये आख़िर है क्या बला ? के दिन तक सोचता रहा कि क्या लिखूं? कुछ समझ नही आता था कि लोग बाग़ इतना लिखते हैं तो उसमे मेरी बिसात क्या है? अंत में इस नतीजे पर पहुँचा कि आखिर भड़ास तो है भड़ास निकलने का माध्यम , तो क्यों न जो मन में है उसे ही लिख डाला जाये? सो लिख डाला है .अब जो है सो आपके सामने है.

अमिताभ को भी नहीं छोड़ा ठाकरे ने

मुंबई। मुंबई में उत्‍तर भारतीयों पर हमले लगातार जारी हैं। इस बार चपेट में खुद महानायक अमिताभ बच्‍चन आ गए हैं। कुछ दिन पहले ही मुंबई में छठ पूजा मनाने पर ऐतराज जताने वाले राज ठाकरे ने अब अमिताभ बच्चन को भी नहीं छोड़ा और उन पर जम कर आग उगली है। राज ठाकरे का मानना है कि वो अपने चाचा बाल ठाकरे के पग चिंहों पर चलकर ही महाराष्‍ट्र की राजनीति में कोई मुकाम हासिल कर सकते हैं।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्‍यक्ष और बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे का कहना है कि अमिताभ रहते तो मुंबई में हैं लेकिन विकास की चिंता उन्हें उत्तर प्रदेश की ज्यादा है। ठाकरे ने एक सभा में अमिताभ पर प्रहार करते हुए कहा कि अमिताभ बच्चन को उत्तर प्रदेश के गांव दिखाई देते हैं , वहां की समस्याएं दिखाई देती हैं , लेकिन मुंबई के बारे में वह कुछ नहीं सोचते। राज ठाकरे ने कहा कि अमिताभ क्षेत्रीय फिल्में करने के लिए वह मराठी नहीं भोजपुरी फिल्में चुनते हैं। राज ने अमिताभ से अपनी तुलना करते हुए कहा कि जब इतने बड़े सुपरस्टार अपने राज्य के बारे में सोच सकते हैं, तो वो क्‍यों नहीं अपने राज्य के बारे सोच सकते।

मेरा स्वागत लिखा देख कर अच्छा लगा

भाईयों मऐ अपने अन्दर बहोत कुछ दबाए हूं लेकिन उसी वज़ह से लगता था बी.पी. बढ़ा रहता था ;डा०रूपेश जी का मोबाइल नम्बर भड़ास पर मिल गया तो उन्होने मुझे कोई दवा नहीं दी बल्कि लिखने की सलाह दी और हिन्दी लिखना बताया ,अब आप लोगों और यशवंत भाईसाहब का सहयोग चाहिये आज पहली बार लिख रही हूं गलती हो तो समझ कर पढ़ लीजिये । मैंने डा०रूपेश की सलाह मानी है और सच बताऊं तो डर तो लग रहा है पर कुछ नया और अच्छा लग रहा है ,सब हल्का-हल्का सा है ,आप सबको लाख लाख बार शुक्रिया ।

मेरा स्वागत लिखा देख कर अच्छा लगा

भाईयों मऐ अपने अन्दर बहोत कुछ दबाए हूं लेकिन उसी वज़ह से लगता था बी.पी. बढ़ा रहता था ;डा०रूपेश जी का मोबाइल नम्बर भड़ास पर मिल गया तो उन्होने मुझे कोई दवा नहीं दी बल्कि लिखने की सलाह दी और हिन्दी लिखना बताया ,अब आप लोगों और यशवंत भाईसाहब का सहयोग चाहिये आज पहली बार लिख रही हूं गलती हो तो समझ कर पढ़ लीजिये । मैंने डा०रूपेश की सलाह मानी है और सच बताऊं तो डर तो लग रहा है पर कुछ नया और अच्छा लग रहा है ,सब हल्का-हल्का सा है ,आप सबको लाख लाख बार शुक्रिया ।

क्रिकेट भी बन गया है व्यापार

खेल में हार भी नहीं होती हार
खेल में जीत नहीं होती प्यार

मिलती किसे सदा खेल में हार
खेले जाओ सदा यही करो वार

हारने पर भी गले में डलवायें हार
हारना भी है एक अनोखा उपहार

खेलो खेल भावना से करो प्यार
हारो और हारो भारत के सरदार

गिरो तुम भी डरो मत मेरे यार
क्रिकेट भी बन गया है व्यापार

गिरो तुम भी थमो मत लाचार
जैसे गिर रहा रोज़ शेयर बाज़ार

मेरे ब्‍लॉग पर कुछ खास है

सैकडो साल पहले अरस्‍तू ने एक बार कहा कि कोई नहीं जानता कि बच्‍चों को अच्‍छा कैसे बनाया जाए।


अमीर कैसे बनोगे, संतुष्‍ट कैसे होवोगे, शांत कैसे होवोगे, क्‍या पैसे के पीछे भागते रहोगे, लम्‍बी छुट्टियां कब मनाओगे, अपने मन का काम कब करोगे

आखिरी सवाल ज्‍यादा चुभोने वाला है इस जिन्‍दगी में मन का काम क्‍या होता है जो काम है वही करना पडेगा यही नियति है जिन्‍दगी ने इसी ओर धक्‍का मारा है तो इसी ओर जाएंगे...
देखें
www.imjoshig.blogspot.com

1.2.08

दोहे


ब्लागिंग को ऐसो नशा हों गए लबरा मौन !
ब्लॉगर बीवी से कहें हम आपके कौन ....?

मिली पुरानी प्रेमिका दो बच्चों के साथ
मामा कह परिचय मिला,मन हों गया उदास ।

कबिरा चुगली चाकरी चलती संगै-साथ
चुगली बिन ये चाकरी ,ज्यों बिन घी का भात ।
अफसर करे न चाकरी ,बाबू करे न काम
पेपर आगे तब चलै जब पहुंचे पूरे दाम .
कहत मुकुल संसार में भाँती-भाँती के लोग
कछु तो पिटबे जोग हैं कछु अब्हई पिटबे जोग .

हमें नपुंसक होने से बचाया, बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने

(हरिद्वार प्रवास में दिल्ली के एक कवि की एक ऐसी कविता पढ़ने को मिली, जिसे कहने को मन हो रहा है कि ये अब तक की सर्वश्रेष्ठ भड़ासी कविता है, जिसे हम सब महसूस कर सकते हैं, समझ सकते हैं, जीते रहते हैं, अगल-बगल होते हुए, घटित होते हुए, फलित होते हुए देखते हैं....शायद घोर कलयुग का असर है पर ये सच है, बुरे लोगों ने किस तरह जिंदगी को जीना सिखाया है क्योंकि बुरे लोगों की बनाई दुनिया और बुरे लोगों द्वारा चलाई जा रही दुनिया और बुरे लोगों के लिए चल रही दुनिया है ये...सो आइये इसे बाचें, पढ़ें, गुनें, सुनें, महसूसें और कोसें भी कि ऐसे वक्त में क्यों जी रहे हैं जहां बुरी सीख से ज़िंदगी जीने का मतलब सीख पाते हैं और इसी के सहारे कुछ अच्छा कर पाते हैं क्योंकि दुनिया सहज, सरल और सरस नहीं है। कहने को बहुत कुछ गद्द में कहा जा सकता है लेकिन दिल्ली के इस कवि ने अपनी लंबी कविता में जो कुछ कहा है उसे गद्द में कतई नहीं कहा जा सकता है, इस कवि का नाम मैं अगली पोस्ट में खोलूंगा, उससे पहले चाहूंगा कि लंबी कविता के इस पहले पार्ट को आप लोग ध्यान से पढ़ें और अपनी राय दें....जय भड़ास, यशवंत)

कृपया बुरा न मानें
इसे बुरे समय का प्रभाव तो कतई नहीं
दरअसल यह शाश्वत हकीकत है
कि काम नहीं आई
बुरे वक्त में अच्छाइयां

ईमानदारी की बात यह कि बुरी चीजें
बुरे लोग, बुरी बातें और बुरे दोस्तों ने बचाई जान अक्सर
उंगली थामकर उठाया साहस दिया
अच्छी चीजों और अच्छे लोगों और अच्छे रास्तों ने
बुरे समय में
अक्सर साथ छोड़ दिया
बचपन से ही
काम आती रहीं बुराइयां

बुरी माओं ने पिलाया हमें अपना दूध
थोड़ा बहुत अपने बच्चों से चुराकर
बुरे मर्दों ने खरीदी हमारे लिए अच्छी कमीजें
मेले हाटों के लिए दिया जेब खर्च

गली के हरामजादे कहे गए वे छोकरे
जिन्होंने बात-बात पर गाली-गलौज
और मारपीट से ही किया हमारा स्वागत
उन्होंने भगाया हमारे भीतर का लिजलिजापन
और किया बाहर से दृढ़

हमें नपुंसक होने से बचाया
बददिमाग और बुरे माने गये साथियों ने
हमें सिखाया लड़ना और अड़ना

बुरे लोगों ने पढ़ाया
ज़िंदगी का व्यावहारिक पाठ
जो हर चक्रव्यूह में आया काम हमारे
हमारी परेशानियों ने
किया संगठित हमें


(जारी)

ब्‍लागर्स मीट यानी ब्‍लागर-संगम यानी बैठक-ए-चिट्ठाकार

प्‍यारे ब्‍‍लॉगर मित्रों और प्‍यारे भांजे-भांजियों,
मैंने हरिद्वार में ब्‍लागर्स मीट का प्रस्‍ताव क्‍या रखा, धड़ाधड़ उत्‍साहजनक संदेसे आने लगे हैं, फोनाफानी शुरू हो गई है। ''सांध्‍य मंस्‍ती'' अखबार के ए‍काध पत्रकार को छोड़ दें तो अधिकांश लोग हरिद्वार में ही ब्‍लागर-संगम यानी बैठक-ए-चिट्ठाकार चाहते हैं। हम भी उत्‍साहित हैं और कल सुबह यशवंत भड़ासी के साथ चाय पीते हुए प्रोग्राम फायनल कर देने के मूड में हैं। आपके कुछ सुझाव हों तो जल्‍दी बता दें। ये संगम कब हो और कितने दिन का हो। बातचीत के मुददे क्‍या हों। हरिद्वार आकर आप क्‍या कुछ करना चाहेंगे यह देखते हुए कि यह सारा इलाका मद्य और मांसनिषिद्ध है। Blogger's Meet will be without Madira & Meat क्‍या समझे ?


आपके सुझावों की इन्‍तज़ार में,


कंस नही, मारीच नहीं, शकुनी नहीं,

पर मामा तो है--

डॉ. कमलकांत बुधकर

Harsimran Sethi, Sandhya Samachar

ख़ुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है
रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है

इक कहानी ख़त्म करके वो बहुत है मुतमइन
भूल बैठा है कि आगे इक कहानी और है

बोरिए पर बैठिए, कु्ल्हड़ में पानी पीजिए
हम क़लन्दर हैं हमारी मेज़बानी और है

जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मैं
एक बीमारी ये मुझमें ख़ानदानी और है

Harsimran Sethi, Sandhya Samachar

ख़ुश्क दरियाओं में हल्की सी रवानी और है
रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है

इक कहानी ख़त्म करके वो बहुत है मुतमइन
भूल बैठा है कि आगे इक कहानी और है

बोरिए पर बैठिए, कु्ल्हड़ में पानी पीजिए
हम क़लन्दर हैं हमारी मेज़बानी और है

जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूँ मैं
एक बीमारी ये मुझमें ख़ानदानी और है

सोचा न था

वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
जिंदगी बड़ा बेतरतीब जिया करते थे।
इसे संभल-संभल के भी जीना पड़ जायेगा सोचा न था।
जिससे मिलते थे उसे अपना मान लेते थे।
कोई इस तरह पीठ में छुरा भोंक जायेगा सोचा न था।
वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
बड़ा नाज था मुझे उसकी वफ़ा पर।
वो इस तरह बीच रस्ते छोड जायेगा सोचा न था।
कहते हैं की वक्त हर जख्म भर ही देता है।
लेकिन वक्त येसा जख्म भी दे जायेगा सोचा न था।
वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
अबरार अहमद, दैनिक भास्कर, लुधियाना

सोचा न था

वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
जिंदगी को बड़ा बेतरतीब जिया करते थे।
इसे संभल-संभल के भी जीना पड़ जाएगा सोचा न था।
जिससे मिलते थे उसे अपना समझ लेते थे।
कोई यैसे पीठ में छुरा घोंप जाएगा सोचा न था।
वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
बड़ा नाज था हमे उसकी वफ़ा पर।
वो इस तरह बीच रस्ते छोड़ जाएगा सोचा न था।
कहते हैं कि हर जख्म वक्त भर ही देता है।
वक्त खुद येसा जख्म दे जाएगा सोचा न था।
वक्त इस मोड़ तक ले आएगा सोचा न था।
एक दिन अपनों से ही सामना हो जाएगा सोचा न था।
अबरार अहमद, दैनिक भास्कर, लुधियाना

बचो भाई लोग नेताईन एड्स टैस्ट लांई.....

आज तो हद हो गयी है पैसे के लालच ने लोगों को ऐसा अंधा कर रखा है कि वे ये भी नहीं देखते कि वो जो कुछ भी आज के लाभ के लिये कर रहे हैं वह उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिये कितना हानिकारक होगा । मेरा दिमाग नहीं फिर गया है कि मैं ये सब लिख रहा हूं बल्कि हमारी प्यारी महाराष्ट्र सरकार की आंखे पता नहीं क्यों चौंधिआई पड़ी हैं कि उसने स्वास्थ्य मन्त्री विमल मूंदड़ा की अध्यक्षता में बुधवार को हुई २५ सदस्यों की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि राज्य में एड्स की रोकथाम के लिये शादी से पहले एड्स का टेस्ट अनिवार्य कर दिया जाए । इससे पता है कि किसका भला होने वाला है बस उन कंपनियों का जो इन टेस्ट-किट्स का निर्माण करती हैं । आज से कुछ समय पहले से ही मुझे पूर्वाभास था कि ये साले अंदर ही अंदर क्या खिचड़ी पका रहे हैं और अब ये सफल हो गये और एक हम हैं जो सिर धुनने के अलावा कुछ नहीं कर सकते लेकिन एक उपाय है कि इन लोगों के नाम से यमराज को अगरबत्ती लगाओ कि हे प्रभु इन्हें या तो सदबुद्धि दे या तो उठा ले अब तो साले हर दिन अपनी सुविधा से कानून बना लेते हैं और आम जनता पर लाद कर उसे आम की तरह चूसते हैं । अब एक बार फिर से ढेर सारे एन.जी.ओ. इन्ही सालों के चाचा-मामा के नाम से बनाएंगे और एड्स जागरूकता कार्यक्रम के नाम पर करोड़ों रुपया डकार जाएंगे । कहते हैं कि विधान परिषद ने इस पर विचार करने के लिये एक कमेटी गठित करी है और इस कमेटी ने तय किया है कि ड्राफ़्ट बनाने के लिये आम लोगों की सलाह ली जाएगी ;आम आदमी के सुझाव मांगे जाएंगे । राज्य में परिसंवादों के द्वारा जनता को जागरूक बनाया जाएगा ,विवाह के पूर्व एच.आई.वी. टैस्ट कराने के कानून को किस तरह से प्रभावी ढंग से लागू करा जाए इसके लिये विशेष जानकरों की राय ली जाएगी । मत्री मूंदड़ा ने कहा है कि यदि कानून अंतिम रूप में आ जाता है तो इसे प्रभावी रूप से दूरदराज गांवों तक लागू करना ,एच.आई.वी. टैस्ट की लम्बी प्रक्रिया और एच.आई.वी. टैस्ट का शुल्क ,इससे जुड़े जाली प्रमाण पत्र और एड्स का विंडो पीरियड प्रमुख दिक्कतें हैं । एड्स का अलीसा ,रैपिड और सिंपल सहित तीन तरह के टैस्ट होता हैं अब इसका शुल्क कितना रखा जाए इसके लिए एड्स के नाम पर जिन्दा रहने वाले ढेर सारे एन.जी.ओ. दौड़ पड़ेंगे कि कितनी सरकारी मदद मिलेगी और कितनी विदेशी कि दिखाने के लिये कम से कम मूल्य रखा जा सके । राज्य में अभी ६७८ टेस्टिंग सेंटर हैं । ये यह भी कहते हैं कि विंडो पीरियड यानि पूरी तरह से पता लगने में लगा समय ३-४ माह तक का होता है और यदि इस बीच कोई प्रमाणपत्र ले लेता है तो उस पर नजर कैसे रखी जाएगी तो इसके लिये भी एन.जी.ओ. बन जाएंगे । आप लोग यह भी जान लीजिए कि यह कानून आंध्र प्रदेश और गोवा में भी विचाराधीन है ।
आदरणीय मित्रों मैं कम्प्यूटर तकनीक का जानकार नहीं हूं इस लिये आप सबकी सेवा में अपना शोध प्रबंध नहीं प्रेषित कर पा रहा हूं यह प्रबंध मैने LEAP OFFICE 2000 के DV-TTYogesh फ़ोन्ट में लिखा है ,हो सकता कि आप सब लोग सोच रहे होंगे कि मैं ससुरा अचानक ये समझदारी की बातें कहां से करने लगा लेकिन भाई लोग ,अपनी सुलग रएली है तो अईसा इच होता है जब नीचे से धुंआ आने लगता है तो भेजा अक्कल की मचमच करने लगता है । भिड़ू लोग, अपना थोड़ा फार हेल्प नईं करा तो नेता लोग साले भेंडी के सबको खोली से पक्कड़-पक्कड़ के ले जाएंगे और बलजबरी से एड्स का टैस्ट करेंगे उनके फ़ायदे के वास्ते.......................
जय भड़ास

जंग जारी है

जंग जारी है
ज़िंदगी से
सुबह उठने के साथ
रात को सोने के तक
और शायद सपने में भी
जंग इस बात की है
कि हम खुद को इंसान समझे
या फिर उत्पाद
हमारे अन्दर
जो भावनाएँ हैं
वो सिर्फ उबाल लें
और बह जाएँ
बहुत हो तो कविता कि शक्ल लें
और कागज़ पर छप जाएँ
इससे ज्यादा भावनाओं की कोई कीमत नही
क्यूंकि कीमत तो बाज़ार तय करता है
और बाज़ार में हमारी भावनाओं की कोई कीमत नही
बाज़ार भावना को अपने हिसाब से
बनाता है बढाता है
या फिर मिटाता है
जंग जारी है
कि चाय ठेलों पर लेते हुए चुस्कियाँ
लडातें रहें गप्पें
करते हुए राजनीति पर चर्चा
कोस लें अपनी सरकार
गालियाँ बक सकें
तो बक लें बुश को
और फिर नहो दूर ऊब
तो छेड़ें कोई नया शिगूफा
बात कर सकें तो कर लें
अपने सपनों की
भर सकें तो भर लें
जीवन में प्यार का रंग
कि जंग लड़ते हुए
जी सकें कुछ और पल
इससे पहले
कि जब हम भी उत्पाद हो जाएँ

purnendu
c voter

राज ठाकरे और मोहम्मद अली जिन्ना

अभी ११ जनवरी को मैं मुम्बई में था टाइम्स नाउ के एक साक्षात्कार के लिए ! मैं जहा जहा भी गया मुझे हिन्दी भाषी लोग मिले जो ज़्यादातर उत्तर प्रदेश या फिर बिहार से थे; छोटे बडे हर तरह के काम करते हुए। सच को अगर जुबान से फिसलने दिया जाए तो इनके बिना मुम्बई चल ही नही सकता। फिर भारत का संविधान एकल नागरिकता की बात करता है। तो सवाल है कि राज ठाकरे इस तरह कि चू .......पे वाली बातें क्यों करते हैं ?
दरअसल इसी बात की चर्चा आवश्यक है ....... और यहाँ से मैं जोडूगा जिन्ना को !

पाकिस्तान के कायदे आज़म यानी कि फादर ऑफ़ नेशन मोहम्मद अली जिन्ना साहब भी कुछ इसी तरह के कारणों के चलते कट्टरपंथ की ओर झुके और अलग मुस्लिम मुल्क की माँग कर ली ....... जबकि उनका निकाह एक पारसी स्त्री से हुआ और इस्लाम में मनाही के बावजूद वो शराब और सिगरेट दोनो के शौकीन थे। तो ज़ाहिर है कहीं न कहीं अपनी राजनैतिक मज्ब्बोरियो के चलते उन्हें उग्र कट्टरपंथ को अपनाना पड़ा। वही राज ठाकरे कर रहे हैं, उनका दुःख मैं समझ सकता हूँ।

पर बड़ी झल्लाने वाली बात यह है कि राज ठाकरे जो देश के सपूत बनते हैं क्या नही जानते कि देश का कानून क्या कहता है ? क्या उन्हें लगता है कि मुम्बई या महाराष्ट्र एक अलग देश है ? क्या वे सोचते हैं कि देश के अन्य राज्यों में मराठी भाषी नही रहते ? मुम्बई आज जिस फिल्म उद्योग की वजह से मशहूर है उसमे काम करने वाले क्या सब मराठिभाशी हैं ? सबसे बढ़कर कि क्या हिन्दी भाषी महाराष्ट्र में वोट डालने के अधिकार से वंचित हैं ?

मैं नही जानता कि राज ठाकरे ने जो कुछ बका क्या सोच कर कहा पर वे सोचें और यह सोचें कि देश के अन्य राज्यों में भी महाराष्ट्र के लोग मराठी लोग रहते हैं अगर वह के निवासी भी बदले में उनसे इसी तरह का व्यवहार शुरू कर दें कि उनके त्यौहार और उनकी बोली नही चलेगी........... तो ? और फिर किसी की भाषा और रीतियों पर आक्षेप करने वाले राज ठाकरे होते कौन हैं ? उनकी तो ........................

सबसे बड़ी बात मैं नही जानता कि राज ठाकरे कितना पढे लिखे हैं, पढे लिखे भी हैं या नहीं पर राजनीति में हैं तो उन्हें भारत के संविधान के बारे में मालुम होना ही चाहिऐ ! इसलिए जिस तरह की बात उन्होने कही है उन पर मुकदमा दायर अगर हो सकता है तो होना चाहिऐ क्यूंकि संविधान का अपमान बर्दाश्त नही होना चाहिऐ। और फिर एक और बड़ा सवाल.......

जब पत्रकारों पर इस तरह की बातों पर मुकदमा दायर कर दिया जाता है तो नेताओ सालो पर क्यों नही ???

खैर अभी इतनी ही भडास थी बाक़ी फिर कभी !!!

जय भड़ास !

मैं भडासी मयंक सक्सेना
www.taazahavaa.blogspot.com

हम २०-२० के भी सिकंदर नहीं हैं

सुबह-सुबह अमरदीप के मोबाइल पर इंचार्ज का फ़ोन। गुस्सा आया, पर नवीन भाई साहब का फ़ोन देख दोनों कि नींद खुल गयी। समझ में आ गया कि कोई न कोई गलती है या खबर मिसिंग हो गयी है। उन्होने बताया कि भाई खबर मिस कर दी। जवाब में कुछ समझ नहीं आया। फिर क्या था, पुरा दिन खराब हो गया। रही-सही कसर साले टीम इंडिया वालों ने निकाल दी। सोचा था कि मैच देख कर सब भूल जायेंगे। एडिटोरिअल के सभी साथी मैच देखने के लिए २ बजे ही ऑफिस पहन गए। जब तक ऑफिस पहुंचे तब तक सहवाग, गंभीर, उथप्पा, कार्तिक आउट हो चुके थे। ऑफिस में पहुँचने के बाद मेरा कहना था कि अब मेरे आने के बाद कोई विकेट नहीं झरेगा। लेकिन साला दिन ही खराब था। पेल्म्पेल सब आउट गए। कैमरा वाला भी बार-बार खिलाड़ियों कि तरफ मोड़ दे रहा था। साले बेसरम हस रहे थे। उन्हें देख सभी खिसिया रहे थे. न्यूनतम स्कोर ७३ को तो क्रॉस कर दिए, पर एक रन बाद ही ७४ पर आउट हो गए। फिर क्या था। ऑफिस खाली हो गया। दूसरी पारी देखने के लिए कुछ लोग ही बचे थे। दूसरी पारी होना क्या था, दस या नौ विकेट से हारना ही था, सो नौ विकेट से हार गए। आस्ट्रेलिया से पिछला २०-२० जितने के बाद मैंने ही हेडिंग लगाई थी कि हम हैं २०-२० के सिकंदर, पर आज का मैच देखने के बाद लगा कि हम २०-२० के सिकंदर नहीं हैं।

भगवान राज ठाकरे को राह दिखलाएं

राज ठाकरे को लगता है कि जब तक वो अपने ताऊ बाल ठाकरे के पग चिन्‍हों पर नहीं चलेंगे तब तक महाराष्‍ट्र की मराठी जनता उन्‍हें स्‍वीकार नहीं करेगी। तभी तो महाराष्‍ट्र नव निर्माण सेना के अध्‍यक्ष राज ठाकरे उत्‍तर भारत के प्रमुख पर्व छठ पूजा का मजाक उड़ाते हैं और यहां तक कह डालते हैं कि यह क्‍या नया झमेला है, यदि उन्‍हें (बिहार और उप्र के लोगों को) यहां रहना है तो मराठी त्‍योहारों पर ध्‍यान दें। राज ठाकरे इन दिनों मा‍नसिक बीमारी से जूझ रहें हैं। भगवान गणेश उन्‍हें सही राह दिखाते। महाराष्‍ट्र की मराठी जनता का एक बड़ा हिस्‍सा उत्‍तर भारतीयों को एक बोझ समझता है। राज ठाकरे उसी हिस्‍से के प्रतिनिधी हैं।

Sabhi Bhadasiyon Ko Pranam

Mera naam Harsimran Sethi Hai...Aur main Sandhya Samachar Mein Reporter Hoon..Sabhi ki Bhadas Dekhkar ab mere pass koi topic hi nahi raha... par i am sure main bahut hi jaldi apni bhadas aapke saamne pesh karunga

गिलौरी खाया करो गुलफ़ाम,ज़बान काबू में रहती है॥

(अभी हाल ही एक वेबसाईट पर पढा़ कि आईसीसी के अपील कमिश्नर ने सुनवाई के बाद हरभजन सिंह को हाफ मैच फीस के जुर्माने की सजा को कम बताया और कहा कि अगर मुझे हरभजन के पुराने मामलों की जानकारी होती तो वह हरभजन को कड़ी सजा सुनाते)
अब इस भोसडी वाले से कोई पूछे कि पहले तो साले कंगारुओं ने तिल का ताड़ बनाया,
बिला वजह सालो ने अपने देश के मीडिया के नाजायज़ सपोर्ट से आई सी सी पर
प्रेशर डलवाया। जब बवाल होने पर भारत के लौट कर आने की आशंका उठी तो
सालों के चूतड़ चौड़े हो गये और सज़ा की बात पर हल्के हो गये। अब जब तुमने
हाफ़ मैच फ़ीस का जुर्माना कर ही दिया है, तो फ़िर ऐसा क्या हो गया कि अचानक
ही हरभजन के पास्ट और प्रेसेन्ट की चिन्ता में लग गये।अगर बंदर
सायमण्ड्स हरभजन और ब्रेट ली के बीच हुए पंगे में ना पड़ता तो फ़िर ये
बखेड़ा क्यों खड़ा होता।यदि आस्ट्रेलिया अपने गिरेबान में झांक कर देखे तो उस
से ज़्यादा चूतिया,और अतरंगी हरकतें करनेवाली टीम पूरे विश्च में कोई नही है।
ये तो भारत का इतिहास है कि हम लोग शांति का पाठ पढाते भी हैं और
खुद भी उसका अनुसरण करते हैं। बिना वजह किसी बात पर बखेड़ा नही करते।
इसी लिये ज़्यादा फ़ैण्टम ना बनिये।
भारतीयों के दिमाग पर किसी दिन चण्डी चढ़ गई, तो पूरी दुनिया की मां
बहन एक कर के रख देंगे।
शांत पृवृत्ति को हमारी कमज़ोरी ना समझें। और जो भी कहें सोच समझ कर कहें।

धन्यवाद...
अंकित माथुर...

एक बार फिर...

सुखद आश्‍चर्य
बहुत दिन हुए भडास को देखे आज अन्‍जाने में फिर से हाथ लग गया पहले इसमें शामिल हुआ ही था कि यशवंत जी आराम करने लगे। अब फिर से और ज्‍यादा जोश में दिखाई दिया है।
कुछ बदलाव हुए हैं लेकिन इसका बना रहना सुखद अहसास है। भडासियों की दुनिया के लोगों आप लोगों को राजस्‍थान के धोरों के बीच बसे शहर बीकानेर से सिद्धार्थ जोशी का सलाम है।
भडास की गतिविधयों ने मुझे शुरू तो कर दिया लेकिन मंच गायब हो गया था इस कारण मैंने खुद के दो नए ब्‍लॉग शुरू कर दिए हैं। उम्‍मीद है आप लोगों को पसंद आएंगे।
राजस्‍थान पत्रिका में बिजनेस रिपोर्टिंग के अलावा निजी तौर पर शौकिया ज्‍योतिषी भी हूं।
दिमाग में खुजली आती है तो यर्थाथ ज्‍योतिष और दर्शन पर लिखने की कोशिश करता हूं। इन्‍हें आप लोग
यहां
और यहां देख पाएंगे।
मैं अपनी खुशी बयान नहीं कर पा रहा हूं
यशवंत जी को बधाई और धन्‍यवाद
सिद्धार्थ जोशी