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23.2.08

क्या शादीशुदा मर्दों में विशेष आकर्षण होता है?

आज ही खबर आई है कि रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा का विवाह होने वाला है। हालांकि इस खबर पर कोई आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अजूबा नहीं है, और यह उनका व्यक्तिगत मामला है। पहले भी भारतीय हीरोईनें “समय आने पर” अपना घर बसाती रही हैं। लेकिन इस बनने वाली जोड़ी में एक बात है, जो कि चर्चा और जिक्र के काबिल है, वह है आदित्य चोपड़ा का शादीशुदा होना। वे अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं और रानी मुखर्जी से शादी करेंगे।

शादीशुदा, तलाकशुदा, दुहाजू या बल्कि तिहाजू पुरुष से शादी करने का हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में रिवाज रहा है। ज्यादा पीछे न जायें तो हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र से उनकी पत्नी जीवित रहते और तलाक न देने के बावजूद रोमांस किया और शादी भी की। हेमामालिनी का मामला ज्यादा अलग इसलिये भी है कि उस वक्त धर्मेन्द्र दो बच्चों के पिता भी थे। रेखा और अमिताभ के किस्से तो सभी को मालूम ही हैं, अमिताभ भी उस वक्त शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे, लेकिन फ़िर भी रेखा उन पर मर मिटी थीं और लगभग हाथ-पाँव धोकर उनके पीछे पड़ी थीं। यदि “कुली” फ़िल्म की दुर्घटना न हुई होती, जया भादुड़ी ने अमिताभ की सेवा करके उन्हें मौत के मुँह से खीच न लिया होता तो शायद अमिताभ भी रेखा के पति बन सकते थे। सारिका ने भी कमल हासन से उनके शादीशुदा रहते विवाह किया, उसके बाद सुना है कि उनमें भी तलाक हो गया है और कमल हासन को तीसरी औरत मिल गई है (शायद हीरोइन ही है)। हालांकि दक्षिण में दूसरी शादी का रिवाज सा है, और इसे “विशेष” निगाह से देखा भी नहीं जाता, लेकिन उत्तर भारत में इसे गत दशक तक “खुसुर-पुसुर” निगाहों से देखा जाता था। बीते दस वर्षों में, जबसे समाज में “खुलापन” बढ़ा है, यह संख्या तेजी से बढ़ी है, और चूँकि ये हीरोईने लड़कियों की “आइकॉन” होती हैं, इसलिये फ़िल्मों से बाहर के समाज में भी यह रिवाज पसरता जा रहा है।

हाल के वर्षों में यह ट्रेण्ड कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है, पिछली पीढ़ी की हीरोइनों से शुरु करें तो सबसे पहले श्रीदेवी ने शादीशुदा और बच्चेदार बोनी कपूर से शादी की, फ़िर करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, ॠचा शर्मा, मान्यता (आमिर खान की दूसरी बीवी हीरोइन नहीं हैं, लेकिन आमिर खुद दुहाजू ही हैं, फ़िरोज खान ने भी बुढ़ौती में एक जवान लड़की से शादी की थी) आदि भी उनकी ही राह चलीं। ताजा मामला आदित्य और रानी मुखर्जी का है, लेकिन उससे पहले करीना और सैफ़ का जिक्र करना भी आवश्यक है, खबरें हैं कि उनमें जोरों का रोमांस चल रहा है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के “अफ़वाह रिवाज” पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वाकई में शादी न हो जाये, फ़िर भी यदि करीना-सैफ़ की शादी हुई तो यह शाहिद कपूर के साथ अन्याय तो होगा ही, सैफ़ जैसे अधेड़ और “तिहाजू” से करीना कैसे फ़ँस गई, यह भी शोध का विषय होगा।

बहरहाल, लेख का उद्देश्य इन हीरोइनों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि शादी उनका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन प्रश्न उठते हैं कि आखिर इन शादीशुदा मर्दों में ऐसा क्या आकर्षण होता है कि हीरोईनें अपने हम-उम्र लड़कों का साथ छोड़कर इनके साथ शादी रचा लेती हैं?
1) क्या यह दैहिक आकर्षण है? (यदि ऐसा है तो मर्दों की दाद देनी होगी)
2) इसमें रुपये-पैसे का रोल और एक सुरक्षित भविष्य की कामना दबी होती है? (लेकिन वे खुद भी काफ़ी पैसे वाली होती हैं)
3) क्या वाकई ये हीरोइनें अपने-आपको इतनी असुरक्षित समझती हैं कि वे दूसरी औरत का घर उजाड़ने में कोई कोताही नहीं बरततीं? (उन्हें यह डर भी नहीं होता कि कल कोई और लड़की उसे बेदखल कर देगी?)
4) क्या वे “अनुभव” को प्राथमिकता देती हैं? (लेकिन यदि पुरुष को जीवन का अनुभव होता तो पहला तलाक ही क्यों होता?)
5) क्या आधुनिक समझे जाने वाली उस सोसायटी में भी मर्दों का राज ही चलता है? (चोखेर बालियाँ ध्यान दें…)
6) क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या है?
आखिर क्या बात है… ?

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

वो पतिता फिर भाग गई.....!!! पार्ट-2

मेरठ की वो लड़की। बेहद सुंदर। जीभर के जिसे देख ले, उसे प्यार हो जाये। परिवार की सबसे बड़ी लड़की। हायर मिडिल क्लास की लड़की। शहरी परिवेश के परिवार की लड़की। स्मार्ट और अक्लमंद लड़की।

स्कूल आते जाते एक नौजवान से उसे प्यार हो गया। नौजवान भी कोई खास नहीं। टपोरी टाइप। वो भी यंग स्मार्ट और फौलादी बदन वाला। दिन के वक्त का ज्यादातर हिस्सा सड़क पर बाल संवारते, बाइक भगाते बिताता था। वह अपने कौशल और स्किल से उस लड़की पर डोले डालने लगा। लड़की को अच्छा लगता था। कभी गुस्साने का दिखावा करती तो कभी मुस्करा कर आगे बढ़ जाती। बकौल कवि हरिप्रकाश उपाध्याय की कविता के शब्दों में कहें तो सबसे सतही मुंबइया फिल्मों ने प्रेम करने के जो तरीके सिखाये, इन दोनों नौजवान दिलों ने उनसे सबक लेकर प्रेम करना सीख लिया।

और एक दिन.............!!!!

लड़की उस लड़के संग भाग गई।

मचा हल्ला। कोहराम। जितने मुंह उतनी बातें। प्रेम में दुनियादारी घुस गई। पकड़ो, मारो, हिंदु, मुस्लिम, आईएसआई, धर्म परिवर्तन, शादीशुदा....। मतलब आप लोग समझ गए होंगे। लड़का मुसलमान था। शादीशुदा था। आईएसआई का एजेंट था। ये मैं नहीं कह रहा हूं, लड़की के परिजनों ने जिन हिंदुवादी नेताओं को पकड़ा उन लोगों ने सड़क पर उतरकर ये सारी बातें माइक से कहीं।

और एक दिन लड़की पकड़ ली गई।

ज्यादा दूर नहीं भागे थे वो। यहीं गाजियाबाद में एक फ्लैट लेकर रह रहे थे। लड़की को मां की याद आई, फोन किया। परिजनों ने उसे पुचकारा। सब कुछ स्वीकारने और बढ़िया से शादी करने का लालच दिया। लड़के फंस गई, उसने अपना एड्रेस बता दिया। घर वाले हिंदुवादी नेताओं और पुलिस के साथ आए और लड़की को उठा ले गए। लड़के को खूब मारा पीटा और उसे छोड़ दिया।

मेरठ में यह मुद्दा सिर्फ प्रेम विवाह और भागने के कारण नहीं बल्कि हिंदू बनाम मुस्लिम के मुद्दे के कारण खूब चर्चित हुआ। हिंदू व मुस्लिम नेताओं के मैदान में आ जाने से मामला ला एंड आर्डर तक जाता दिखा।

दैनिक जागरण के सिटी चीफ के बतौर मैंने खुद उस लड़की से बात करने की ठानी और उसके दिल की राय प्रकाशित करने का निर्णय लिया। एक संपर्क द्वारा उस लड़की के घर पहुंचे जहां वह लगभग कैद में रखी गई थी। मैंने सबसे विनती की कि मुझे अकेले में बात करने दिया जाए। और उस लड़की से बातें करने के बाद मेरा माथा भन्ना गया। सिर्फ वह बेहद खूबसूरत ही नहीं थी बल्कि बेहद बौद्धिक और समझदार भी थी। उसने जो बातें कहीं उसे मैंने एज इट इज छाप दिया।

उसके जो कहा, उसका लब्बोलुवाब ये था...

मुझे पहले से पता था कि वो शादीशुदा है लेकिन अब वो तलाक दे चुका है। जो आदमी तलाकनामा मुझे दिखा चुका है और उसे मेरे ही साथ रहना है तो फिर क्या दिक्कत है।

वो बेहद शरीफ लड़का है। उसे लोग फर्जी तौर पर आईएसआई का एजेंट बता रहे हैं। मैं उसके साथ रहना चाहती हूं क्योंकि वो मुझे अच्छा लगता है। मुझे नहीं चाहिए ये सुख। मैं उसके साथ गरीबी में जी लूंगी।

ये देखिए तस्वीरें, जो छिपाकर ले आई हूं। हम लोगों ने बाकायदा निकाह किया है और निकाह मैंने अपनी मर्जी से किया है।

ये देखिए तस्वीरें जिसमें उनके घर के सारे लोग हैं और कितने प्यार से मुझे घर में ले जाया गया। रखा गया। पार्टी हुई। वहां के जो छोटे बच्चे हैं वो मुझे इतने प्यारे लगते हैं, कि मैं उन्हें याद करके रोती हूं। हम लोगों को उनका घर छोड़कर इसलिए गाजियाबाद जाना पड़ा क्योंकि पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार कर लेती।

मैं तो मां की ममता में पकड़ ली गई। इन्होंने (मां ने) मेरे साथ धोखा किया है। ये समझा रही हैं कि मुस्लिम से शादी करने से नाक कट गई। मैं कहती हूं कि क्या सुनील दत्त ने नरगिस से शादी करके अपने खानदान की नाक कटा ली। मुझे समझ में नहीं आता, इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद लोग इतनी घटिया बातों को क्यों जीते रहते हैं।


-----उस कम उम्र की लड़की (मेरे खयाल से ग्रेजुएशन सेकेंड इयर में थी वो) के इतने मेच्योर व शानदार विजन को देखकर मैं दंग रह गया। उसने मेरी राय इस बारे में जानने की कोशिश की तो मैंने कहा कि तुमने सौ फीसदी ठीक किया है। अगर तुम उसके साथ खुश हो और तुम्हें उस पर भरोसा है तो बाकी किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए।

मैंने उसकी कही हुई सारी बातें उसकी तीन तस्वीरों के साथ दैनिक जागरण पहले पन्ने पर बाटम में प्रकाशित किया। और मामला फिर गरम हो गया।

पूरे मेरठ में एक बात का जमकर प्रचार किया जाता है कि मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को सायास तरीके से फंसाते हैं और शादी कर लेते हैं। ऐसे वो अपने मजहब के विस्तार व हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मकसद से करते हैं। पर मैं ये बात नहीं मानता। पहली बात तो हम ये क्यों मान लेते हैं कि हिंदू लड़कियां गाय बकरी हैं जिनके पास कोई दिमाग नहीं है और वो जो फैसला ले रही हैं उसमें उनका दिमाग नहीं बल्कि मुस्लिम लड़कों का हिप्पोनेटिज्म काम आता है। अरे भाई, लड़कियां दिमाग रखती हैं। उन्हें अपने फैसले लेने दो। ये तो तुम्हारे अपने धर्म और संस्कार की दिक्कत है ना कि वो लड़कियां तुम्हारे वर्षों के रटाये जिलाये संस्कारों को प्रेम के धागे के चलते झटके में तोड़ डालती हैं। इसका मतलब तु्म्हारे संस्कारों व सिखाये विचारों में दम नहीं है, तुम्हारी ट्रेनिंग में कमजोरी है।

खैर, बहस भटक रही है। वापस लौटता हूं मुद्दे पर।

इंटरव्यू छपने के बाद उस लड़की पर पहरा और बढ़ा दिया गया और किसी भी मीडिया से मिलने पर एकदम से पाबंदी लगा दी गई क्योंकि उसके खुले विचारों को मैंने हू ब हू जागरण में प्रकाशित कर दिया था। कहां उसकी मां ये मानकर चल रही थीं कि उनके पक्ष में सब छपेगा, और कहां इंटरव्यू ने लड़की के पक्ष को मजबूत कर दिया।

वो लड़की हिंदूवादियो और परिजनों के लिए विलेन बन चुकी थी। उधर लड़के ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि मेरी पत्नी को जबरन ले गये हैं वो लोग। खैर, लड़की को रोज दर्जन भर लोग समझाने पहुंचने लगे उसके घर। शुरू में तो वो चीखती चिल्लाती उनसे बहस करती रही, जबान लड़ाती रही। लेकिन समझानों वालों की बेहिसाब संख्या देखकर वो मौन हो गई। वो केवल सामने बोलते लोगों को निहारती और शांत रहती।

धीरे धीरे ये मामला शांत हो रहा था। लोग लगभग इस प्रकरण को भूलने लगे थे। वो लड़की गंदी लड़की, खराब लड़की, पतित लड़की घोषित की जा चुकी थी। न सिर्फ परिवार द्वारा समाज द्वारा बल्कि पूरे शहर के हिंदुओं द्वारा।

उस लड़की के चेहरे की रौनक गायब हो चुकी थी। हां, मुझे याद आया। उसकी मां अध्यापिका थीं। उन्होंने बेटी को खुले माहौल में पाला था और कभी किसी चीज के लिए बंदिश नहीं लगाई। अब उन्हें अपने किए पर पछतावा हो रहा था। वो ये नहीं सोच पा रही थी कि चलो बेटी ने गलत ही सही, फैसला ले लिया है तो उसका साथ दें। समझाया बुझाया फिर भी नहीं मान रही है तो उसे उसकी मन की करने दो। बहुत बिगड़ेगा तो क्या बिगड़ेगा। वो मुस्लिम युवक उसे छोड़ देगा, जैसी की आशंका परिजनों द्वारा जताई जा रही थी। तो इससे क्या होगा? क्या किसी के छोड़ने से किसी की ज़िंदगी खत्म हो जाती है। मैं तो मानता हूं कि मुश्किलें और चुनौतियां हमेशा आदमी की भलाई के लिए ही आती हैं। ज्यादातर महान लोगों ने जीवन के हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना किया और उससे जीतकर या हारकर, उससे सबक लेकर और आगे बढ़ गए। हो सकता है, वो लड़की खुद अपने जीवन के अऩुभवों से जो सबक लेती उससे वो समझ पाती कि उसने जो निर्णय लिया है वो सही या गलत है।

बात फिर भटक रही है। मैं कह रहा था कि समय बीतने के साथ माहौल लगभग शांत हो चुका था।

और एक दिन फिर खबर आई। वो लड़की उस लड़के के साथ फिर भाग गई।

हुआ यूं कि समय बीतने के साथ लड़की ने थोड़ा नाटक किया। उसने मां के सामने झुकने का नाटक किया। बाहर निकलने की थोड़ी थोड़ी आजादी उसे मिलने लगी। उसे भागते न देखकर उसे थोड़ी और आजादी दे दी गई। नौंचदी मेले में घूमने के लिए भी कह दिया गया। उसके साथ कोई घर का हमेशा होता था। मेले में वो भाई के साथ गई और जाने कब भाई को महसूस हुआ कि उसकी बहन उसके साथ नहीं है। खूब ढूंढा तलाशा गया पर वो नहीं मिली। बाद में मालूम चला, दोनों फिर भाग गये। इस बार बेहद दूर चले गए।

उसके बाद क्या हुआ, मुझे कोई खबर नहीं मिली। पर मैं उस लड़की के चेहरे को आज भी नहीं भूल पाता हूं।

सच्ची कहूं तो मैं उसे अंदर ही अंदर प्यार करने लगा था। वो लड़की पतित घोषित कर दी गई थी, समाज के द्वारा, शहर के द्वारा, परिवार के द्वारा। उस लड़की का नाम दूसरे घरों की लड़कियों के सामने इसलिए लिया जाता था ताकि बताया जा सके कि पतित, गंदी, बुरी लड़कियां होती कैसी हैं और वो कितना नुकसान कर देती हैं, अपना, खानदान का और समाज का। उन दिनों मेरठ के बाकी घरों की लड़कियों को उनकी माएं उस जैसी कभी न बनने की नसीहत देती थीं। मुझे खुद याद है कि मेरे मोहल्ले पांडवनगर में कई घरों की माएं अपनी बच्चियों से हंसते हुए बतियाती थीं और उस बेशरम लड़की के किस्से पढ़कर, सुनाकर ईश्वर से अनुरोध करती थीं कि हे ईश्वर ऐसी पतित लड़कियां किसी मां-पिता को न देना।

मैं उस लड़की का नाम भूल चुका हूं। मेरे मेरठ के साथी अगर इसे पढ़ रहे हों तो जरूर बतायें उसका नाम, कमेंट के रूप में लिखकर। पर उस पतिता प्यारी गुड़िया को मैं आज भी दिल से प्यार करता हूं। उसके लिए दुवा करता हूं कि वो जहां रहे, सुखी रहे।

जय भड़ास
यशवंत

22.2.08

हम हिजड़ों की तो सुनो

आप सब लोगों को मेरा प्रणाम ,मेरा नाम मनीषा है और मैं डॉक्टर रूपेश की दोस्त हूं । लोग हमें हिजड़ा कहते हैं लेकिन डॉक्टर भाई कहते हैं कि हम लैंगिक विकलांग हैं । उन्होंने बताया कि आपके ब्लाग पर आदमी - औरत की बात लेकर बहस हो रही है अगर डॉक्टर रूपेश भाई की अरह हम लोग भी आप सब भड़ासियों की नजर में इंसान हैं तो जरा हिम्मत करके हमारी चर्चा करिए । डॉक्टर भाई ने हम लोग को कम्प्यूटर सिखाया ,हिन्दी लिखना और टाइप करना सिखाया और मदद किया कि ब्लाग क्या होता है ये बताया अभी आप लोग से रिक्वेस्ट है कि हमारी बात को भड़ास के द्वारा लोगों तक पहुंचाइये । हमारा ब्लाग है
adhasach.blogspot.com
हम चार पांच लोग जैसे सोना ,भूमिका ,शबनम मौसी ,डॉक्टर भाई मिल कर लिखेंगे आज पहली बार हिजड़ों की समस्याओं के बारे में जैसे हमें डाईविंग लाईसेंस से लेकर राशन कार्ड तक नहीं मिल पाता आसानी से क्योंकि हम न तो स्त्री हैं न पुरूष और आप लोग हैं कि फालतू बातों पर बहस कर रहे हैं ।
यशवंत भाई को आशीर्वाद
जै भड़ास

इस पतित औरत को सलाम....पार्ट वन

आगरा में बस से ज्यों उतरा, आटो पकड़ने कि लए आगे बढ़ा। चौराहे पर आटो स्टैंड। दूसरी ओर पुलिस चौकी। आटो में बैठा ही था कि एकदम से शोर मचा। पीछे मुड़ा तो एक 35-40 की उम्र की गरीब सी, साड़ी पहने महिला अपने चप्पलों से एक 30 वर्ष के युवक की पिटाई कर रही थी। एकदम से हल्ला हुआ कि फलाना पिट रहा है। सभी आटो ड्राइवर दौड़े, उसे बचाने को। उधर से पुलिस वाले भी चल पड़े। देखते ही मजमा इकट्ठा हो गया। मालूम हुआ मामला छेड़खानी का है। महिला गरियाये जा रही थी। वो युवक बचाव में पीछे खिसक रहा था। उसके मुंह पर चप्पलें गिरती जा रहीं थीं। आटो वाले महिला को मिलकर गरियाने लगे और उसके चप्पलों की चंगुल से अपने साथी को बचाने लगे। पुलिस वाले खरामा खरामा आ रहे थो सो तब तक ढेर सारी चप्पलें उस युवक रूपी आटो ड्राइवर पर गिर चुकी थीं। पुलिस ने उसे पकड़ कर अपने कब्जे में लिया। महिला बोले जा रही थी। छेड़ रहा था। पीछे से उंगली की। एक बार तो चुप रही। फिर ये दूसरी बार आकर उंगली कर रहा था। समझता है कि वेश्या हूं। अकेले हूं तो इसका मतलब हुआ वेश्या हूं। अपने मां को जाकर उंगली कर। हरामजाते, कुत्ते, कमीने, सुअर की औलाद....।

आटो वालों में रोष व्याप्त था। मैंने अपने ड्राइवर को घुड़की लगाई....अबे चल, यहीं झगड़ा सुलझाता रहेगा। अपना ड्राइवर आया और गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी के साथ आटो वाले का भी मुंह चल रहा था.....साली, धंधा करती है। कई दिनों से इसी चौराहे पे दिखती है। देखने पे मुस्करा भी देती है। इसने आज भाई को फंसा दिया।

मैं चुपचाप उसकी बात सुनता रहा। वह आगे बोला, एक झटके में मेरी शक्ल देखने के बाद सामने सड़क पर निगाह केंद्रित करते हुए....बताओ भाई साहब आप, शरीफ घर की औरत किसी को मारने की हिम्मत कर सकती है। ये साली खुद ही बेइज्जत औरत है। शरीफ महिला तो यह कहने में संकोच करेगी कि उसके साथ क्या हुआ। वह तो चुपचाप चली जायेगी। लेकिन ये जो धंधे वाली होती हैं ना, ये किसी को भी फंसा देती हैं।

बिना चेहरे पर कोई भाव लाये उसकी बात सुनता रहा, सोचता रहा। मेरे बगल में बैठे पुरुष सहयात्री आटो चालक की हां में हां मिलाते हुए बोले...बेचारा अच्छा खासा पिट गया। देखो, वो पीट रही थी तो वो चुपचाप पिट रहा था, कुछ नहीं बोला।

मैंने भी वाणी को शब्द दिया....असल में उस साले को यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि छेड़ने के बाद इस तरह उसे चप्पल खाने पड़ेंगे। और जब चप्पल गिरने लगे तो एकदम से उसे अवाक होना पड़ा, अपनी इज्जत जाती दिखी तो उसे चुपचाप रहने में ही भलाई समझ में आई होगी।

आटो ड्राइवर फिर बोल उठा....भाई साहब, आप जानते नहीं हैं। यहां धंधेवालियों की पूरी बस्ती है। वे सब ऐसे ही घूमती रहती हैं। आप बताओ, उसकी शक्ल और उसकी आवाज से आप उसे शरीफ घर की मान रहे थे।

मैंने जवाब दिया...भाई, वो जो तुम्हारा दोस्त था, वो भी शरीफ नहीं दिख रहा था। क्या तुम लोगों की यूनियन का अध्यक्ष था क्या?

उसने कहा...नहीं अध्यक्ष तो नहीं, लेकिन दबंग लड़का है। ड्राइवरों की हर दिक्कत में साथ रहता है।

आटो ड्राइवर की बात से समझ में आ गया कि वो आटो ड्राइवर जो पिट रहा था, चौराहे के आटो ड्राइवरों का रहनुमा टाइप का था, इसलिए वो बिना आटो चलाए, सिर्फ आटो स्टैंड की उगाही से अच्छा खासा पैसा बना लेता था और जिस फिल्मी स्टाइल में गोविंदा मार्का कपड़े व चेहरे की स्टाइल बना रखी थी, उसमें उसके अंदर एक ठीकठाक डान दिख रहा था। पुलिस वाले भी उसे जिस कूल तरीके से ले गये, उससे लगा कि उनका भी चहेता होगा क्योंकि चौराहे कि पुलिस चौकी है, सो ट्रकों से वसूली में और दारू मुर्गा की व्यवस्था में ये साथ देता होगा।

मैंने ये सच्ची घटना आगरा के कई पत्रकार मित्रों के साथ शेयर की और उस औरत के हिम्मत की दाद दी, जिस वहां चौराहे पर खड़े बहुतायत ड्राइवरों व यात्रियों ने बुरी औरत, पतित औरत घोषित कर दिया था। मैं और मेरी सोच अल्पमत में लेकिन इस पतित औरत ने जो साहस का काम किया, उससे ढेर सारी शरीफ औरतों को सबक मिलेगा। जैसा कि मेरे आटो का ड्राइवर कह रहा था, शरीफ औरतें छेड़खानी होने के बाद भी नहीं बोलतीं, ये साली तो बिना कुछ हुए चिल्ला रही थी।

मायने ये है...पहली बात तो वो औरत धंधेवाली होगी, ये मैं नहीं मानता क्योंकि हर सक्रिय लड़की के साथ मर्द कई आरोप व रहस्य मढ़ देते हैं, दूसरी बात अगर वो धंधे वाली होगी भी तो उसने जो साहस किया, सिर्फ यही साहस उन तमाम शरीफजादियों के चेहरे पर तमाचा हैं जो सिर्फ कला कला के लिए में विश्वास करती हैं और बातें बघारती हैं। मैं इस पतित औरत को इन शरीफ औरतों से महान का दर्जा देता हूं जो छिड़ने के बाद भी चुपचाप शर्म से गाल लाल किये चली जाती हैं। तीसरी बात अगर ये औरतें, जो धंधा करती हैं या नहीं करती हैं, खुलकर अपने साहस के साथ आगे आती हैं और मर्दों से भरे चौराहे पर खड़े एक लफंगे को जूतियाती है तो उसने संदेश दे दिया है, हे प्रगतिशीलों, हे वाचालों, हे गाल बजाने वालों, देखो....हम जो करते हैं ना, अपनी मर्जी से करते हैं। धंधा करते भी हैं तो अपनी मर्जी से, चप्पल मारते भी हैं तो अपनी मर्जी से.....। तुम साले, अपनी दुनिया में नियम कानून व मुक्ति के मैराथन की दौड़ की तैयारियों में लगे रहो.....।

इस महिला को मैंने उस समय भी मन ही मन सलाम किया था। सोचा था, लिखूंगा पर लिख नहीं पाया। लेकिन अब जब कुछ लोग झंडाबरदार होकर महिलाओं को कथित मसीहा बनकर उभरी हैं और बहस को अपने हिसाब से चलाने पर आमादा हैं, उन्हें मैं उदाहरणों के जरिए समझाने की कोशिश करूंगा कि जिस पतनशीलता की बात कर रहा हूं वो क्या है भड़ासी भोंपू का राग क्या है।

जय चोखेरबालियां, जय भड़ास
यशवंत सिंह

ब्रह्मा को चुनौती




मौत पर विजय भले ही आज तक कोइ नही पा पाया हो, मगर उम्र की एक सदी जी चुकी केसरी ढेवी ने ब्रह्मा को चुनौती दे दी है। केसरी ढेवी सपेरे जाति से है। केसरी साप काटने से मरे इन्सानो को जिन्ढा कर लेती है। ऐसे ही एक सैकडा से अधिक नदी मे बहाई गयी लाशो को निकाल कर जिन्ढा कर चुकी है। उसके कुनबे मे कितने ही उसे माँ कह्ते है और कितने ही दादी। मगर ये सभी उसका अपना खून नही है। केसरी के मुताबिक ज्यादातर लोग अपने बच्चो को पह्चानने के बाद ले गये मगर कुछ ख़ुद नही गये। उसके मुताबिक़ साप का जहर ढिमाग मे चङने के बाढ इन्सान की याददास्त चली जाती है. कितने ही करोरपति की सन्ताने है जो घर नही लौटे और दादी के लिये भीख मागते है।

क्या लिखू


मै धर्म देखू या कर्म देखू

रिश्ता देखू या कर्यव्य देखु

गर डूब रही हो जिंदगी की नैया

तो माँ देखु या बीबी देखू।

एक भविष्य है जिसने वर्तमान दिखाया

एक वर्तमान है जो भविष्य दिखाये।

समाज को देखू या अपनी बेवसी देखू

उंचे महल देखू या फुटपाथ पर सोती जिंदगी देखु

वसंत की मस्ती की हिलोरों को कम करती जेब देखू
बीबी बच्चो की अपनी तरफ आशा से उठती निगाहें देंखु

या बेटी के दहेज की लिए कोई जुगाड़ देखू

अव ये खुदा तू ही बता में देखु तो क्या देखू


अजीत कुमार मिश्रा

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ऐसा होने लग्गा रे बाप्पा.. जय जय हो भड़ास

राष्ट्रिय सहारा चैनल पर एक कन्या अवतरित होकर चालू है कुछ इस तरह..प्राप्त सूचनानुसार आज सुदूरवर्ती लखनपुर प्रखंड कार्यालय में इंदिरा आवास के लाभार्थिओं ने अपनी मांग पुरी करने के लिए अजीबोगरीब तरीका अख्तियार कर लिया है। लाभार्थिओं ने प्रखंड कार्यालय के तोरण द्वार सजाय हैं ...फूलों से लाड दी गयी हैं ब्लोक की कुर्सिआं ..टेबुल पर नेम पेलेट पर लिख दिया है''चुटिया प्रखंड विनाश पदाधिकारी'' ..भौन्सरी ,रंडी के भडुआ स्साले..दल्ला ...हमको हमरा घर दो..नही तो ठेल के निकालेंगे॥ तुम चोट्टों की चुत्पुजाई करेंगे हम सब मिल के''जैसे-जैसे रंग-बिरंगे बैनरों से अटी पडी हैं दीवारें... जिस मुख्य द्वार पर खड़ी होकर मैं आपको यह समाचार पहुंचा रही हुं थिक यहीं पर लाकर बाँध दी गयी है बीस पच्चीस भैंसे,पारा,पारी,लेडू,बछेडू...जनता पूरे आक्रामक मूड में तो लीजिये हम सीधे आपको ले चलते हैं पीड़ित जनता के पास..तो...हाँ..आप..फलना..बताएँ..ये ऐसे इधर से..वो सामने कैमरा की तरफ़...हाँ अब बोलिए..की क्या कर रहे हैं आप लोग...क्या इस विरोध से मिल जाएगा आपका हक़?
''इ हक़ का होत है रे बेबी....वर्गाही .हमका बाढ़ पीड़ित का हमरा घर चाही..और कछु नही../दौड़ा-दौड़ा कर गांड गरम कर दिया है इ भौन्सरी..आज पेपर पर दसखत करता हुं..कल करता हुं..इ देख न आब तोर पर्बब्बा करेगा ...त इ गाय गोरु ला के बाँध देली हा ...सरकार के दुआरी...बाढ़ आइल..घर बह गेल..फसल बरबाद॥ त कहाँ जाईं...त आ गिनी इधर... अब देखत हैं ..की कैसे नही देगा तोएं हमरा घास-भुस्सा-घर-छत-पलंग-कंडोम तोरी महतारी के...''
तो ये तेवर हैं यहाँ के आम जनता के॥ अब देखना है क्रांति का यह भीदु स्टाइल कब पाटा है अपना मंजिल..मैं हुं फलानी..चिलानी के साथ॥ मोहतरमा का तिपिर-तिपिर अभी बंद भी नही हुआ था की छोटका ने चैनल बदला...जी ये है सबसे तेज ..आपका..अपना चैनल आज तक..और मैं हुं फलना..त्रेयों....धिन..धिनक..धिन...आन...अन्न...ओऊ...ओऊ...आ.... अब सुनिए प्रादेशिक समाचार॥ सूचना मिली है की बशी पंचायत के विस्थापितों ने अपनी मांग मनवाने के लिए अजीब किस्म का कार्यक्रम चालू कर दिया है। सरे पुरूष,महिलाएंसड़क किनारे हाथ में पर्चा लिए आने-वाले ..जाने वाले ..हर राह गीरों को बाँट रहे हैं,स्तासन पर ट्रेन की खिदकिओं में हाथ घुसा-घुसा कर दे रहे हैं सफ़ेद से पन्ने पर जिस पर लिखे हैं कुछ पवित्र गालिआं ...तो हमारे संवाददाता जो जो अभी बाशी में हैं के पास लिए चलते हैं हम आपको...तो फलाना क्या है इस्थिति उधर...हाँ ऐसा है चिलाना की भिन्न भिन्न,घिन्न घिन्न, देशी,विदेशी हर रकम किस्मों की गालिओं से यहाँ की दावारें भरी पडी हैं..हर हाथ में सफ़ेद पन्ने पर कुछ दिख रही है मुझे...जिनके शब्दों को कहने में शर्म आती है मुझे... । शर्म...स्स्सला..शर्म आबत हैं तोरा....हे रे..कैमरा छीन...एकरा लाज लगे छू...बत्बाई छिअऊ तोरा सार ..शरम... । हेल्लो...हेल्लो..ये आपकी आवाज नही आ रही है ...हल्लो..तो दर्शकों तकनिकी खराबी के कारण उनकी आवाज हम तक नही पहुँच पा रही है..जैसे ही उनसे हमारा सम्पर्क स्थापित होता है ..हम फ़िर मुखातिब होते हैं आपसे ....त्रेयाँ....धकर..धकर...धूम...बकर...बकर बम...
''उई..सार..इ चुतर पर कट लकौ रे....''नेधिया सहारा लगाओ न...तनी ''मेरी उत्साहित आवाज..मेरी क्रांति हित॥
''एंह पड़नी भाई.... ससुर तिल्लक में एगो फिलिप्स रेडियो ने देल काउ...अ खोज रहा है सहारा...मिले मियाँ के मांड न खोजे मियाँ ताड़ी ...चल उठ फरीच भेली।''
''आणि...भोर भेली ....त राते हम कहाँ रहिई...?
शायद सपना देख रहा था मैं ...लेकिन ऐसे सपने..नही..ऐसे सपने तो सच्चे होते हैं...कुछ सच्चाई होती है इन सपनों में...अवचेतन पर अंकित सपने..बिल्कुल सच्चे खरे सपने॥
भोर हुआ झारा फिरने जाना है...फुल्ही लोटा में बाबा गए हैं,पितारिया में हमको जाना है...गांड धोना है..मुंह धोना है..पड़ोसी कोलगेट से धोता है...हम अक्छा फमिली नेचर पर देपेंद हैं...करची से साफ करेगा अप्पन अपना तीथ...नहाना है..जांघिया पहन के नहाना है...नही रे..तीत जायेगा त कैसे पेन्हेगा...खाना है...कैसा खाना..कौन खाना..राते ओस में जड़ना ठिठुर गया....त सुबह में कैसे होई हे बेरेक फास्ट.... टोस्ट......संदाबिच...बतर..फिश..डिश..टांग क्र्गर ..देश्क्ला मुर्गा ....खस्सी के कलेजी....फलना के मर्जादी के सीन ..एक दम सामने॥ ......भूखे जाना है...साईकिल से जाना है... भारा बचाना है...इंटर नेट पर जाना है...दो घंटा ....चालीस रुपैया..दो सिंघारा...पाँच रुपैया.....तीन रुपैया जिलेबी....दस-बीस खुदरा ...सौ ग्राम जीरा...सौ ग्राम आदी.....कुल ...एक सौ रुपैया गे माई....लाबे न गे जल्दी...चार बजे तक ...सांझ तक ऐबु...लह्सुनिया ऐतु गोबर उठावा लिहें..... ३० कोस दूर है बेगुसराय ....अभ्भी जन है...''हे हो भैया...पिछ्ला टायर बैथल छू... फूस... हवा भरवाना है..हाथ से भरवाना है... एक रुपैया खुदरा देना है...बायाँ-दायाँ-ऊपर-नीची...रेज्की गायब... कक्का खुदरा ने छो ...खीच खीच करना है...एन एच पर साइकिल चलाना है....अपनी साइकिल...होंडा सलमान खान...ओपेरा शाहरुख़ .....कृजर अमिताभ...नैनो जिन्दाबाद...आ रहा है अपना समय...आ ही गया...टाटा की जय....पन्द्रह किलोमीटर....ये पच्चीस....लो तीस....दद्दा की बिल्लो रानी मैं आगया...फुदकी मैना...कम्पयूटर...सर्भर...ब्रौड़ बंद...रेल्टेल... दोनों फेल...आता है...जाता है...लिंक फेल है..हाँ आपलोग..सीरिअस कहे नही होते...इ देखिये..हमरा गन्ह्की भाग रहा है.... आप जल्दी भेजिए मिस्त्री को....हाँ मनीष जी...आइये..बैठिये...बैठाइये..चाय..चुक्का....वो अतलांतिक में तार कट गया है...याहू खुलता है तो गुगल गायब ...रेडिफ चल रहा है../तृण...तृण मोबाइल..बम लौरा..हथौरा...हाँ..जोड़ लिया..यहीं से..दिक्कत था...आइये ..इस सिस्टम पर बैठिये...बिजली गुल...जेर्नेतर के हैंडिल खोज...तेल खत्म....पेट्रोल पम्प...छुरा के खोज.... डिब्बा निकाल... हैं..हैं...थोरा इन्तेजार कीजिये....एक घंटा...सवा घंटा... तेल आई...इंटरनेट....होम पेज .....डब्लू.डब्लू..डब्लू.भड़ास.डॉट ....इंटर....पेज कैन नोट बे दिस्पेलेद...घडी...मेरीघरी...तीन बज गया....चार बजे माल जाल भोक्रेगा...घर जाना है....मन नही है...वो दद्दा दिल्ली से क्या भेजा होगा...दोक्टार साहेब का कमेन्ट....वो घर जाना है....तीन बीस रे बाप....अपना साइकिल ...अपना नैनो....वाही एन एच ....वाही आएर....फ़िर कल आना है...भड़ास पर जाना है...दुनिया में छाना है...कुछ कर के दिखाना ही
जय भड़ास
जय यशवंत
मनीष राज बेगुसराय

प्रेम और मस्ती:भड़ास और यशवंत वाया ओशो

प्रेम बनाम भड़ास
'तुम मिले हो क्या मुझे साथी सफर में
राह से कुछ मोह जैसा हो गया है
एक सूना पंथ की जो मन को ड्सें था
रह में गिर कर कहीं वो खो गया है
शोक को उत्सव बनाया बस तुम्ही ने
उम्र भर एहसान भूलूंगा नही मैं
मस्ती बनाम यशवंत
''न लगे जाम पर हाथ ये ,शर्त है
मयकदे को जो जाय वो कम्जर्फ़ है
मुझे तोहमत न दो मैं शराबी नही
तुम नजर से पिलाओ तो मैं क्या करूँ ''
इश्क और इमान में तक्रिफ है
मगर मेरा तो दोनों में इमान है
खुदा को मनाने तो मैं सजदे करूँ
मगर सनम रूठ जाय तो मैं क्या करूँ....''
जय भडास
जय यशवंत
मनीष राज बेगुसराय

सृजनगाथा : प्रसंगवश

कितना उचित है उपजाऊ भूमि पर उद्योग लगाना - तनवीर जाफ़री

यह आलेख अपने चार भाइयों के साथ सृजन गाथा में मौजूद है ।

इस आलेख पर मेरी टिप्पणी है:-"इसी लिए लोग बंजर ज़मीन को भी नही छोड़ते "

तनवीर जी की पोस्ट हटाई सृजनगाथा ने

रचनात्मक संस्कारों का अनुसमर्थन
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क्या साहित्य विफल है ? - अरुण प्रकाश

इलेक्टॉनिक दुनिया में पुस्तकों की नियति - मनोज कुमार श्रीवास्तव

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फैसला सुरक्षित है - प्रतिभा सक्सेना

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गुणरहित नाम कितना निरर्थक होता है - होपर

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तकनीकः प्रशांत रथ
आज जय प्रकाश मानस जी का आभार करना ही होगा जो तनवीर जाफरी की पोस्ट वेब से हटा दीं...!!
अशेष आभार
http://www.srijangatha.com/

21.2.08

गालियां नहीं भड़ास हैं यह

भड़ास पर गालियों की चर्चा के दौरान मुझे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बिताये गये स्नातक की पढ़ाई के तीन साल याद आते हैं. एक तो मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी ऊपर से ठेठ लट्ठमार भाषा में बात करने का आदी. साथ ही उस जमाने में बीएचयू के कला संकाय को रंडुआ फैकल्टी (खुलेआम) कहा जाता था, (आज के बारे में नहीं जानता). हां तो मैं बता रहा था कि मैं भी उसी रंडुआ फैकल्टी का एक छात्र था. यह तो बताना भूल ही गया कि रंडुआ फैकल्टी इसलिए कहा जाता था कि स्नातक स्तर में कला संकाय में कोई छात्रा नहीं होती. एक-आध विभाग को छोड़ दें, तो किसी भी विभाग में कला संकाय में लड़कियों का दाखिला नहीं होता. केवल लगभग दो हजार लड़के ही होते हैं. हां, तो उस रंडुआ फैकल्टी में पढ़ते हुए आते-जाते किसी भी लड़की को भौजी (शादीशुदा हो अविवाहित) कह देना आम बात थी. यही नहीं रहता भी था बिड़ला छात्रावास. अब यशवंत भाई से पूछ लीजिएगा कि बिड़ला छात्रावास की पूरे बीएचयू ही नहीं पूरे बनारस में क्या छवि है. एक ऐसा हास्टल जिसमें रंडुआ फैकल्टी में पढ़नेवाले सभी रंडुए रहते थे. यही नहीं उनमें से कई हमेशा फ्रस्ट्रेट रहते थे कि उनकी कोई महिला मित्र नहीं है. ऐसे छात्र भला जुबान से सब कुछ कह और कर लेने से सिवा और क्या कर सकते थे. हॉस्टल के बगल से कोई छात्रा गुजरी नहीं कि शुरू हो गयी पैलगी... भौजी पांवलागूं, भौजी प्रणाम, भैया का का हाल है. और सब ठीक है न. कुछ ऐसे ही. हुआ कुछ यूं कि मेरे कुछ साथियों ने संगीत के डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया और कुछ ही दिनों में उन्हें गर्लफ्रैंड भी मिल गयीं. ऐसी ही कुछ महिला मित्रों के साथ हॉस्टल के कई मित्र एक दिन बैठे थे. सभी अपनी-अपनी आवाज वायस रिकाडॆर में भर रहे थे. संयोग से मैं भी पहुंच गया. उनमें एक लड़की ऐसी थी, जो मुझे देख कर ही चिढ़ती थी या यूं कहें कि मेरी भाषा से चिढ़ती थी. (यशंवत जी भले ही संत कहें)बातचीत के दौरान गालियों की फुलझड़ियां छूटती थीं मेरे मुंह से. भला ऐसे में कौन लड़की मुंह लगाती. पर वह मुझे मुंह भी लगाती थी और जम कर बहस भी. बस उसकी एक ही शिकायत थी कि मुझे लड़कियों की कद्र करनी नहीं आती. मैं उन्हें सम्मान देना नहीं जानता. या मैं उन्हें भी अपने बराबर मानता हूं (वह हमेशा कहती थी कि तुम लड़कियों को अपने जैसा क्यों समझते हो). यहां बताता चलूं कि मैं शारीरिक बनावट के बजाय और किसी चीज में लड़कियों को किसी पुरुष से कम नहीं मानता और हर विषय पर उनसे खुल कर बात करता हूं. शायद कुछ ऐसा ही हम लोग भड़ास पर भी कर रहे हैं. मैंने पहले भी कहा था कि लोगों की नाराजगी जायज हो सकती है. वे अपनी भड़ास निकालें. या न झेल पायें, तो हमें मैला की तरह दरकिनार कर दें. कह दें ये वे मछलियां हैं, जो तालाब को गंदा करती हैं. पर मेरा एक सवाल भी है कि क्या केवल जुबान गंदी होने से कायनात में प्रलय आ जायेगी. अगर आ जाये, तो बेहतर ही है, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. जब दो तरह की बातें करनेवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता है, तो हमें क्यों पड़े.मेरी बीएचयू वाली मित्र की तरह एक तरफ तो लड़कियों ( अपवादों को छोड़ कर)को बराबरी का दर्जा भी चाहिए और साथ ही में अबला या शालीन या लड़की या महिला या सभ्य या पता नहीं क्या-क्या होने का मुखौटा भी. यह ऐसा मुखौटा है, जिसके कारण लड़कियों को सीट और तथाकथित बौद्धिक लोगों को साहित्यिक कार्यक्रमों में आगे की सीट नसीब होती है. हमें यह सब नहीं चाहिए भाई. हम समाज सुधारक नहीं हैं. हमने समाज को सुधारने का ठेका नहीं लिया है.अरे जब हम अपने आप को आज तक नहीं सुधार पाये, तो समाज को क्या खाक सुधार पायेंगे. अब सवाल उठता है कि क्या है स्त्री मुक्ति? क्या तथाकथित सभ्यता के मुखौटे के पीछे छिपी बैठी हाड़-मांस की मूर्ति जिसे समाज की जंजीरों ने जकड़ या यूं कहें कि जिसने खुद को समाज की जंजीरों के पीछे सुरक्षित कर रहा है, को इसी तरह मुक्ति मिलेगी. नहीं, वर्जनाओं को तोड़ना होगा. मैं यह नहीं कहता है कि वे भी गरियाना शुरू कर दें. ऐसा कुछ भी नहीं है. गाली की वकालत मैं नहीं करता, लेकिन कम से कम हम पर वही बंदिशों न थोपी जायें, जिनके पीछे आधी दुनिया अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही, जिससे छुटकारा पाने की वह कोशिश कर रही है. नियम, सिद्धांत, तर्क, दर्शन और पता नहीं कितने बहानों के पीछे क्यों जा खड़ी होती है हमारी आबादी, प्रश्न यह है? प्रश्न यह भी है कि इन जंजीरों को अपने लिए बोझ, पुरुष मानसिकता और पता नहीं क्या-क्या बताने वाली आधी आबादी इनको उतार क्यों नहीं फेंकती. किस बात का डर है उसे? मुझे लगता है किसी बात का नहीं. उदाहरण हमारे सामने ही है. इसलिए स्त्री मुक्ति उनके खुद के हाथ में है. बराबरी का दर्जा मांगने से नहीं मिलेगा, मुक्ति मांगने से नहीं मिलेगी छीननी पड़ेगी. हमारी गालियों और भड़ास से किसी को डरने की जरूरत नहीं. मेरी मां के शब्दों में कह सकते हैं कि हम क्षणिक बुद्धि के लोग हैं यानी कि जो मन में आया बक दिया. बस यही सच्चाई है हमारी बातों के पीछे, जहां तक मुझे लगता है. अन्यथा मंच बहुत से हैं लिखने के. १२ घंटे अखबार के लिए कंप्यूटर में सिर खपाने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं बचती कि हम कुछ और करें, फिर भी करते हैं, लिखते हैं. मन की भड़ास निकालते हैं, जिसके लिए यह मंच हैं. तरीका सबका अपना-अपना है. कोई गरिया कर निकालता है, तो कोई किसी और तरीके से. और जो लोग हमें सभ्य होने या गालियों से तौबा बरतने को कहते हैं, वह उनकी भड़ास ही तो है. इसलिए हम बुरा नहीं मानते. न ही सफाई देने की कोशिश करते हैं, बल्कि भड़ास के बदले एक और भड़ास निकलती है और रहेगी.बाकी फिरजय भड़ास

गालियां नहीं भड़ास हैं यह

भड़ास पर गालियों की चर्चा के दौरान मुझे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बिताये गये स्नातक की पढ़ाई के तीन साल याद आते हैं. एक तो मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी ऊपर से ठेठ लट्ठमार भाषा में बात करने का आदी. साथ ही उस जमाने में बीएचयू के कला संकाय को रंडुआ फैकल्टी (खुलेआम) कहा जाता था, (आज के बारे में नहीं जानता). हां तो मैं बता रहा था कि मैं भी उसी रंडुआ फैकल्टी का एक छात्र था. यह तो बताना भूल ही गया कि रंडुआ फैकल्टी इसलिए कहा जाता था कि स्नातक स्तर में कला संकाय में कोई छात्रा नहीं होती. एक-आध विभाग को छोड़ दें, तो किसी भी विभाग में कला संकाय में लड़कियों का दाखिला नहीं होता. केवल लगभग दो हजार लड़के ही होते हैं. हां, तो उस रंडुआ फैकल्टी में पढ़ते हुए आते-जाते किसी भी लड़की को भौजी (शादीशुदा हो अविवाहित) कह देना आम बात थी. यही नहीं रहता भी था बिड़ला छात्रावास. अब यशवंत भाई से पूछ लीजिएगा कि बिड़ला छात्रावास की पूरे बीएचयू ही नहीं पूरे बनारस में क्या छवि है. एक ऐसा हास्टल जिसमें रंडुआ फैकल्टी में पढ़नेवाले सभी रंडुए रहते थे. यही नहीं उनमें से कई हमेशा फ्रस्ट्रेट रहते थे कि उनकी कोई महिला मित्र नहीं है. ऐसे छात्र भला जुबान से सब कुछ कह और कर लेने से सिवा और क्या कर सकते थे. हॉस्टल के बगल से कोई छात्रा गुजरी नहीं कि शुरू हो गयी पैलगी... भौजी पांवलागूं, भौजी प्रणाम, भैया का का हाल है. और सब ठीक है न. कुछ ऐसे ही. हुआ कुछ यूं कि मेरे कुछ साथियों ने संगीत के डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया और कुछ ही दिनों में उन्हें गर्लफ्रैंड भी मिल गयीं. ऐसी ही कुछ महिला मित्रों के साथ हॉस्टल के कई मित्र एक दिन बैठे थे. सभी अपनी-अपनी आवाज वायस रिकाडॆर में भर रहे थे. संयोग से मैं भी पहुंच गया. उनमें एक लड़की ऐसी थी, जो मुझे देख कर ही चिढ़ती थी या यूं कहें कि मेरी भाषा से चिढ़ती थी. (यशंवत जी भले ही संत कहें)बातचीत के दौरान गालियों की फुलझड़ियां छूटती थीं मेरे मुंह से. भला ऐसे में कौन लड़की मुंह लगाती. पर वह मुझे मुंह भी लगाती थी और जम कर बहस भी. बस उसकी एक ही शिकायत थी कि मुझे लड़कियों की कद्र करनी नहीं आती. मैं उन्हें सम्मान देना नहीं जानता. या मैं उन्हें भी अपने बराबर मानता हूं (वह हमेशा कहती थी कि तुम लड़कियों को अपने जैसा क्यों समझते हो). यहां बताता चलूं कि मैं शारीरिक बनावट के बजाय और किसी चीज में लड़कियों को किसी पुरुष से कम नहीं मानता और हर विषय पर उनसे खुल कर बात करता हूं. शायद कुछ ऐसा ही हम लोग भड़ास पर भी कर रहे हैं. मैंने पहले भी कहा था कि लोगों की नाराजगी जायज हो सकती है. वे अपनी भड़ास निकालें. या न झेल पायें, तो हमें मैला की तरह दरकिनार कर दें. कह दें ये वे मछलियां हैं, जो तालाब को गंदा करती हैं. पर मेरा एक सवाल भी है कि क्या केवल जुबान गंदी होने से कायनात में प्रलय आ जायेगी. अगर आ जाये, तो बेहतर ही है, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. जब दो तरह की बातें करनेवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता है, तो हमें क्यों पड़े.मेरी बीएचयू वाली मित्र की तरह एक तरफ तो लड़कियों ( अपवादों को छोड़ कर)को बराबरी का दर्जा भी चाहिए और साथ ही में अबला या शालीन या लड़की या महिला या सभ्य या पता नहीं क्या-क्या होने का मुखौटा भी. यह ऐसा मुखौटा है, जिसके कारण लड़कियों को सीट और तथाकथित बौद्धिक लोगों को साहित्यिक कार्यक्रमों में आगे की सीट नसीब होती है. हमें यह सब नहीं चाहिए भाई. हम समाज सुधारक नहीं हैं. हमने समाज को सुधारने का ठेका नहीं लिया है.अरे जब हम अपने आप को आज तक नहीं सुधार पाये, तो समाज को क्या खाक सुधार पायेंगे. अब सवाल उठता है कि क्या है स्त्री मुक्ति? क्या तथाकथित सभ्यता के मुखौटे के पीछे छिपी बैठी हाड़-मांस की मूर्ति जिसे समाज की जंजीरों ने जकड़ या यूं कहें कि जिसने खुद को समाज की जंजीरों के पीछे सुरक्षित कर रहा है, को इसी तरह मुक्ति मिलेगी. नहीं, वर्जनाओं को तोड़ना होगा. मैं यह नहीं कहता है कि वे भी गरियाना शुरू कर दें. ऐसा कुछ भी नहीं है. गाली की वकालत मैं नहीं करता, लेकिन कम से कम हम पर वही बंदिशों न थोपी जायें, जिनके पीछे आधी दुनिया अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही, जिससे छुटकारा पाने की वह कोशिश कर रही है. नियम, सिद्धांत, तर्क, दर्शन और पता नहीं कितने बहानों के पीछे क्यों जा खड़ी होती है हमारी आबादी, प्रश्न यह है? प्रश्न यह भी है कि इन जंजीरों को अपने लिए बोझ, पुरुष मानसिकता और पता नहीं क्या-क्या बताने वाली आधी आबादी इनको उतार क्यों नहीं फेंकती. किस बात का डर है उसे? मुझे लगता है किसी बात का नहीं. उदाहरण हमारे सामने ही है. इसलिए स्त्री मुक्ति उनके खुद के हाथ में है. बराबरी का दर्जा मांगने से नहीं मिलेगा, मुक्ति मांगने से नहीं मिलेगी छीननी पड़ेगी. हमारी गालियों और भड़ास से किसी को डरने की जरूरत नहीं. मेरी मां के शब्दों में कह सकते हैं कि हम क्षणिक बुद्धि के लोग हैं यानी कि जो मन में आया बक दिया. बस यही सच्चाई है हमारी बातों के पीछे, जहां तक मुझे लगता है. अन्यथा मंच बहुत से हैं लिखने के. १२ घंटे अखबार के लिए कंप्यूटर में सिर खपाने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं बचती कि हम कुछ और करें, फिर भी करते हैं, लिखते हैं. मन की भड़ास निकालते हैं, जिसके लिए यह मंच हैं. तरीका सबका अपना-अपना है. कोई गरिया कर निकालता है, तो कोई किसी और तरीके से. और जो लोग हमें सभ्य होने या गालियों से तौबा बरतने को कहते हैं, वह उनकी भड़ास ही तो है. इसलिए हम बुरा नहीं मानते. न ही सफाई देने की कोशिश करते हैं, बल्कि भड़ास के बदले एक और भड़ास निकलती है और रहेगी.बाकी फिरजय भड़ास

भड़ास और गालियाँ पर मेरी दो टिप्पणियों पर गौर फरमाएं

टिप्पणी एक

गाली न देना भला
लेना तो कोई चाहता ही नहीं
न देंगे आप तो ही लाभ
बिना गालियों के भी तो
कर सकते हैं प्रलाप
आलाप विलाप
सता सकते हैं संताप
बुझ सकते हैं
दिमाग के ताप
फिर क्यों गाली
जो हैं गन्दी नाली
उसे सूंघ सूंघ कर
भाषा गन्दी कर डाली
डाली होती है अच्छी
फूलों की हो या पेड़ की
डाली पर क्यों उगे गाली
चलो गाली वाली डाली
तोड़ डालें यशवंत भाई आप
कुछ गलत हो गया हो
तो कर दें माफ
पर मत करें गालियों में बात.

टिप्पणी दो

डाक्टर साहब,
आप तो इलाज करने वाले हैं, भगवान के समरूप.
यह तो मैं भी जानता हूं कि मेरे कहने से कुछ नहीं होने जाने वाला.
मैं कुछ करूंगा भी नहीं, इतना तो है आपको विश्वास भी.
मुझे भी है विश्वास कि आप सुधार कर नहीं पढ़ेंगे, पर उम्मीद है कायम कि जो सुधरना चाहते हैं, वे सुधर ही जाते हैं, वैसे इसके अपवाद भी हैं बहुत. इसके ही क्यों, अपवाद तो सभी के होते हैं. आप न तो सुधरें, न सुधार कर ही पढ़ें, हमने सारे जमाने का ठेका थोड़ी ले रखा है, न ही इच्छा रखते हैं.
आप कह भी चुके हैं कि हम क्या कर लेंगे, हमने स्वीकार भी लिया है कि हम कुछ नहीं करेंगे और करना भी नहीं चाह्ते हैं.
रही बात तानाशाही की तो मुझे तो किसी भी कोण से यशवंत भाई न तो ताना देने वाले ही लगते हैं, और जो ताना नहीं देगा उसकी फितरत में तानाशाही तो होगी ही नहीं.
आप न जाने क्यों उन्हें हिटलर बताना चाह रहे हैं.हमें तो वे जन जन के चहेते, हर जन के चहेते नज़र आ रहे हैं,उनकी दिनोंदिन बढ़्ती लोकप्रियता तो यही जतला रही है. आप ही बतलायें कि क्या वे आपके चहेते नहीं हैं या आप उनके चहेते नहीं हैं. हम भी उनके चहेते हैं, वे भी हमारे चहेते हैं, इसलिये हम भी चहक रहे हैं, पर क्या आपको लगता है कि बहक रहे हैं.
हरे प्रकाश उपाध्याय जी का कहना भी सही है कि नियम नहीं बन सकता, मैं भी कहता हूं नियम नही बनना चाहिये क्योंकि नियम में है यम चिपका. और चिपकाना चिपकना पिचकना नहीं कभी भी अच्छा.
हम फिर भी कहेंगे कि गाली नहीं बन सकती कभी अच्छा रस्ता. न बनें इतना सस्ता. शेयर की तरह चढ़ें, पर गिरें मत शेयर की तरह. रहें शेर की तरहा, जैसे रहते हैं यशवंत प्रहा (भाई).

भड़सी कैसे बहस मे आ गए , भागो , भगाओ

यह एक भयानक बात है कि कुछ लोगों बुद्धि-जीवी होने का चोगा ओढ़ रखा । वे महान लोग ( औरत भी ) हैं । बहुत सभ्य। वे बहुत गम्भीर बहस करते हैं । हम उनकी बहस को समझने लगें तो उन्हें दिक्कत होने लगती है । तुम जाहिल गवार लोग कैसे समझ पाओगे , हमारी बात । वे बहस खाते हैं , पीते हैं और बहस करते -करते सो जाते हैं । वे बाकि कुछ नही करते । एक भी गंदी या अश्लील बात नही करते । सफेद , साफ सुन्दर कपडे पहनते हैं । हीरे -जवाहरात खाते हैं । ऐ सी मी रहते हैं । वे हगते मुततेनही , सम्भोग नही करते गुस्सा नही करते , एक शब्द अपशब्द नही बोलते । उनकी संताने भी ह्गती मुतती नही । ये तो भड़सियों ने गंध फैला रखी है नही तो ये लोग शब्दकोशों से भी ऐसे शब्द चुन-चुन कर निकल फेंके । यशवंत भाई बौधिकों को इलाके मी जाकर आप बहस करें , आप तो गंदे भादासी हैं , बुरे और बदतमीज हैं । वे महान हैं , भड़सियों कि क्या औकात कि उनकी बहस मी हस्तक्षेप करें । दरअसल बहस करना उन्हें आता है ,उनका यह कम है -आप जल्दी बदलाव के चक्कर मे है जबकि वे देर तक बहस ईंजोय करना चाहते हैं (चाहित हैं )। बात बुझा करो भड़सियों .....

जे भड़ास

दे द कड़ुआ तेल कि होरिया गईली हे भौजी...

उंगली किए हैं अपने महादेव,गुरु घंटाल औघड़ महाराज परम प्रिय महागुरु दादा भाई की चोट्टा बक चुद्दी करता है,अपोजिट टाइम पर इन्ट्री मारता है ,टेम है फागुन का और तू ''महा मृतुन्जय'' जप रहा है तो ये सोंटा भीडू लोग अप्पन से बर्दाश्त नही हुआ तो फिऊ अंगरेजी,थोरी ठेठी,लार्ज हिन्दी मगर फूल टाईट भडासी भाषा में एक चुस्त होली आइटम डालने आ गया इधर... इन्टरेस्ट लागेगा तो अगली होली में ट्राई मारना



अब होली आई त छौरा-छापारी के त आ गइनी भोज रे....भाई॥ साल भर टुकुर टुकुर....लुबुर लुबुर अलगनी पर भौजी के रंगलका कच्छा हिबते-हिबते ......मिजाएज एकदम टुन्न। .....एबरी होली आबे दे न रे छिलाटुआ ...कदीमा के लत्ती पर .......कद्दू के लत्ती पर फनिहे.... ''होरी आई रे कन्हाई भौजी तरसे बुला द दिल्ली से साई रे भाई......''

तो तीन दिन पहले से फगुनिया झोंका पूरे ताव पर था, मन्दिर वाली परती में होलिका दहन की तैयारी पूरे परवान पर थी........ ''एबरी सौंसे करारी में सबसे उन्चगर जड़ना सैन्तिहे रे छौरा...'' दहन के लिए जड़ना खोजने ,गाँव की हर गलिओं में,हर घर में सूप पीट कर घूमता हमारा वह उमर .........सच्ची आई कान्त फोरगेट कमिंग होली एभ्री इअर। होलिका दहन कथा समाप्त।
रंग रंगाए सप्तावार्नाम मादक छोरी की परमप्रिय होरी ग्रन्थ के अश्थं अध्याय का प्रसंग प्रारम्भ..... बोलो छोरी की होरी की जय ,गोरी की बल्जोरी की जय,डोरी की जोरी की जय,अंत सर्वांत डिग दिगंत अपुन भीरू लोगों की जय....

तो अखा नाईट से ही प्लान चालू हो गया था ,''धबुआ,मोहना,लाछ्ना सब साथे सुतिहे .... भोर कादो बनाबाई के छाई॥'' अब फूल नाईट नींद खल्लास ....
''कखनी होत्तई भोर हो रामा करबी हमें खोदाई ......कादो लपेस्वु रह्गीरावा के अरो देवाई पोताई
कखनी होत्तई गे फरीच सिनुरिया करबू हमें.......''
आई .......फरीच आईला मामू / बता न किसे किधर से कितना डालू .........लपेसू ......फचाक..... फुच्च... /आरे ...छ्हौरा ......कादो देलें .....तोरा नानी के... /हे बाबा एन्ना न बोला ......आरो देबो.... हे ले..... फचाक..... । बुध्धा फाएर .......तोरा दादी के रे लह्सुनिया के बेटा.... इत्ते मजाल...रुक आए गेलीओओ पोता...
छोरा -छार्पण फरार ........बुधा धोती के भीतर कोई मेक्रोमें टैप अन्दर की बात है नही डाला थो .......तो दिख गयी भीतर ........कुछ ....फिच्च से निकल गयी हंसी .....छोरन छापारी के मोर्निंग आएतम .....मूड फेरेश होलु.....हे रे बुढ़वा लेल्काऊ टेब ........चल भाग हिआं से......
अब आ गईनी इ मोहल्ला ।/ हे रे देखहि ना...उनने ....रे....उनने ....नई सुझ्लाऊ .......रे अन्हरा ....ओन्ने ...देखहि गबरुआ के कनियाँ रे... हमें त भौजी-भौजी कही छिई ....सच्ची रे...... त ..भांज लगाओ न ,तनी छुईओ के उपाय लगाओ न रे बोत्ला.....
''रुक लगवाए छिअऊ भांज...खाली बर्दाश में रहिहें...
''गबरू भैया....अहो दद्दा परनाम ....
''हाँ..हाँ परनाम ..आओ रे धबुआ .....इ भोर से होरी चालू कर देले ......अभी सौंसे दिन त रखले बारू....
''न भैया ...हम..बाल बुत्रुक बस ..आ गईनी ...उ माई भेज्ले बारन ,कहलस की भौजी से तनी कडुआ तेल मंगले आ...त आ गईनी॥
विस्फोट... प्रलय॥ आंधी..ज्वार बाजरा॥ ....ग़दर...ब्लास्ट...बमाक...धमक॥ भडास टाईप गालीगिरी चालू
'''रे..बाप..कडुआ तेल..रे॥ जुआअनखास्सा, बेल्लाज्जा..कुपातर..रविया के बेटा।'' अन्दर से बौखलाई आई एक दाईं टाईप ..लम्की भौजी .... अन्दाईजेस्ट सीचुएसन॥ ओप्पोजित पोजिसन..मामू..अपुन कन्फिउज्द ..ये क्या है कडुआ तेल में ..जे इ भ्हौजी इतनी बिदक गयी...अप्पन बायाँ दायाँ हिब्बा ..दस-बारह जनों की भीड़...बाप रे...कौने फेरा में लाए देले रे धबुआ... होरी के तेम में पिछु में गोरी ...रे.....
''आहो जगदीश....इ रविया के बेटा ...नान्र भेर के छोरा ...बेल्लाज्जा...एकरा...हे..रे तोरे ...कहलिअऊ रे....अप्पन मै-बहिन से जो न मांग न कडुआ तेल..... एकरा पाया में सिक्कर लगाओ...एककर बाप के बोलाओ....दस मिनट गया नही की प्यारा पप्पा हाजिर... अब त आगे से पलाई...पाछे से गंथाई॥ उई...माँ इ माई किधर से आई... फ़िर धार-मार=लात-घुस्सा.....थाप्पर..मुक्का ..पप्पा हो आब न... आब न गे मै ...

भीरू लोग ..अब तू ही बता न ..कैसा दल रहा .....अपन रविया के बेटा अ धबुआ के होरी... वो स्स्साला ...रंग छुडाने के वास्ते कडुआ तेल माँगा... तो तू ही समझ कर...मेरे को बता न...काहे को गान्र में बांस किया मेरे कु?कहे को होरी की मोरी में गोरी की डोरी ने खोलने दिया मेरे कु...

अप्पन अब फान जाएगा ...गोरी पर...सातों रंग डाइरेक्ट देगा...मगर नान्र पकड़ता हुं मामू .....आज के बाद कभ्भी भी ....होरी में तो और नही...कभी नही मंगिंगा ''कडुआ तेल''

तो दोस्तों, आप भी होरी में अपनी भौजी से कडुआ तेल मांग कर देखिएगा... और उसके बाद महसूस किए गए पलों लिख भेजिएगा..हम तुरंत लेंगे अपने गुरु घंटाल से राय और यूं ही बताते रहेंगे होली के शानदार टिप्स...फ़िर मिलेंगे...इसी ..कमरे में...थिक इसी टाइम...टैब तक तेल महाईए ....भौजी पताइए...

जय भड़ास

जय यशवंत

मनीष राज,बेगुसराय

मनीषा जी, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...उर्फ रसमलाई बनाम दिवालियापन

मनीषा पांडेय ने अपनी पोस्ट में मेरी बातों, विचारों, इरादों को जिस तरह कनसीव किया है, और जो कलम तोड़ कर लिखा है, उसका एक एक कर जवाब देना चाहूंगा....यशवंत
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आपने कहा---
हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा।

मेरा कहना है...
दरअसल मठाधीशों का हमेशा इरादा रहता है कि बहसें उनके मुताबिक, हिसाब से चलें और उनके तरीके को ही लोग स्वीकार कर वाह वाह, शानदार, वेरी गुड कहें...जैसा कि हो रहा है....। बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.....। अगर बात निकली है तो उसके हर लेयर, पर पेंच, हर एंगिल को समझा बूझा जाएगा और लोग उसे अपने अपने तरीके से बूझेंगे। इसे रोकने की मंशा रखना, नियंत्रित करने के बारे में सोचना, इससे खफा होने एक व्यक्तिवादी और आत्मकेंद्रित सोच का परिचायक है।


आपने कहा---
पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ

मेरा कहना है...
सच्ची बात तो यही है जो मैंने कहा था, आप भड़ास निकाल रही हैं। इस भड़ास के मायने कतई भड़ास ब्लाग या भड़ास बैंड नहीं बल्कि दिल की बात कह देना है, जो आप शिद्दत से महसूस करती हैं। इस देश में जिस तरह से 99 फीसदी लोग बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बघार कर फिर अपने रोजी रोटी और कमाने खाने में जुट जाते हैं, अपने धंधे को बेहतर करने में लग जाते हैं और समाज को व अवाम को अपने हाल पर छोड़ देती हैं, अगर वही करने का इरादा है तो कोई बात नहीं। ब्लागिंग में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो अपने ब्लाग पर क्रांति की अलख जगाए हुए हैं और उसके बाद बेहद निजी किस्म के शीशे के घरों में बेटा बिटिया माई बाप बियाह खाना पैसा धंधा सुख दुख....आदि किस्म की निजी चीजों को प्राथमिकता में रखे हुए हैं। वहां से बाहर निकलते ही फिर सिद्धांत बघारने लगते हैं। आप वैसा हैं या नहीं, आप जानें लेकिन यह जरूर है आप अच्छा खासा भोंपू बजा लेती हैं, रीमिक्स वाला।


आपने कहा---
यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं।
मेरा कहना है...
इसका जवाब उपर दे दिया है। लड़कियां भड़ास नहीं निकालेंगी तो देवी व दुर्गा बनी रहेंगी। आप भी बनी रहिए। आपको अच्छा अच्छा गुडी गुडी कहने वाले ढेर सारे लोग हैं। भगवान ने बुद्धि और कलम दे दी है, चाहे जिसकी बखिया उघेड़िये। आप लिखते रहिए अंतरराष्ट्रीय महिला विशेषज्ञों के नाम लेकर उद्धरण देते हुए महान नारीवादी आंदोलनों के दर्शन और आंसू बहाते रहिए महिलाओं की दशा-दिशा पर। लेकिन जो कुछ झेला है, बूझा है, महसूसा है...उसे कहने का साहस नहीं होगा, भड़ास निकालने की ताकत नहीं होगी तो ढेर सारे आडंबरियों से बाहर आप भी नहीं होंगी।

आपने कहा---
यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत।

मेरा कहना है...
चलिए माना न आपने कि आप के चलते लड़कियां जो आज बेहतर हालत में हैं, नहीं हैं बल्कि इसके पीछे बाजार है। और यही बाजार लड़कियों को और पतित करेगा, और अच्छी हालत में ले जायेगा। और तरक्की करने देगा। आप लोग खामखा गाल बजाती रहेंगी, शरीफ, नेक और ईमानदार बनने के लिए।


आपने कहा---
कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मेरा कहना है...
जी, हम जानते हैं भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम। आज हम हिंदीवाले जो अंग्रेजी के दबाव में, हिंदी मीडिया की सामंती गठन, ऐंठन के दबाव में जिस विकृति को जी रहे थे, उसे निकाल कर, उसे उगल कर सहज महसूस करते हैं। भड़ास कोई बैंय या भोंपू नहीं मेडिकल साइंस की एक विधा है जिसे डा. रूपेश और मुनव्वर सुल्ताना बेहतर जानते हैं। कभी अपनी नौकरी, अपने ब्लाग और अपनी दुनिया से बाहर वक्त मिले तो भड़ास को कायदे से पढ़िए और समझिए। लेकिन जो लोग अपने को काबिल और झंडाबरदार मान चुके हैं दरअसल उन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आता। और आपने जो बात कही है कि पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई ....तो मैं ये कह सकता हूं कि आपके इस बौद्धिक दिवालियेपन के लिए भगवान आपको माफ करे। आप को खुद नहीं पता आप क्या लिख रही हैं, क्या कह रही हैं।

आपने कहा---
मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं।
मेरा कहना है...
केवल कहते रहिए। सिद्धांत दर्शन गढ़ते रहिए। अगर इसी सबसे क्रांति या उत्थान या तरक्की संभव थी तो अब तक रोज तरक्की व क्रांति होती।

आपने कहा---
सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती।

मेरा कहना है...
ऐसी ही लड़कियां गढेंगी लड़कियों के लिए एक अलग सा भड़ासी बैंड। आप देखते रहिएगा। भड़ासी बैंड गढ़ने के लिए साहस चाहिए, समाज के खिलाफ जाने कि हिम्मत चाहिए, आलोचनाओं को झेलने का बूता चाहिए। मास्टर की तरह गूढ़ बातें करने कहने से वो रामरतन की बिटिया कुछ नहीं समझेगी, शून्य में टुकुर टुकुर ताकती रहेगी। उसे साफ साफ समझाने वाली जरूर आएगी। लेकिन ये आप जैसियों से संभव नहीं है।

आपने कहा---
यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

मेरा कहना है...
भइया हम बुरे लोग हैं, मैंने पहले ही कहा था, फिर कह रहा हूं। और आप जैसों को ये लगता है कि हमारे सुझवा रसातल में ले जाएंगे तो ये शायद आपकी समझदारी की कमी है या फिर भड़ासियों की कमजोरी है जो आपको समझा न पाए। थोड़ा वक्त निकालिए और फिर पढ़िए गुनिए भड़ास को व भड़ासी दर्शन को।
ये तो होना ही था, आपकी पतनशील स्वीकारोक्तियां कहीं आपके खिलाफ न चली जाएं सो आपके फेस सेविंग करनी ही थी। आखिर आप भी लड़की हो और इसी समाज में आपको रहना है। बहस को गोलमोल और बौद्धिक बना देने की यह रणनीति कोई नई नहीं है। हमेशा ऐसा होता है कि जब कम पढ़े लिखे लोग फील्ड में जाकर चीजों को एक ठीक ठीक दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं तो कुछ बौद्धिक आकर उन्हें उसके हजार पेंच समझातें हैं और सारे आंदोलन को कनफ्यूज कर देते हैं। आपका कनफ्यूजन भले ही शाब्दिक आवरण में धारधार और साफ साफ लग रहा हो लेकिन आपसे कह दिया जाए कि आप स्त्री मुक्ति के लिए चार चरणों की वास्तविक स्ट्रेटजी डिफाइन करिये तो आपके पास या तो वक्त नहीं होगा या फिर आप फिर बौद्धिक प्रलाप करने लगेंगी। आपने जो सुविधायें हासिल कर ली हैं, उसे मेंटेन रखते हुए नारी मुक्ति की कल्पनाएं और कथाएं कहते रहिए, देखते हैं, उससे कितना भला होता है स्त्रियों का।
जिस दिन लड़कियों तक, स्त्रियों तक अपने लिए स्पेस पाने का संदेश पहुंच गया न तो उस दिन से आपके रोके नहीं रुकेगा उनका पतन। अभी जो पतन है सीमित मात्रा में। संदेस पहुंचने के बाद कुछ उसी तरह लड़कियां बुरी बनेंगी, पतित होंगी जिस तरह गांधी जी का संदेश पहुंचने के बाद भारत के जन जन में हुआ था। लोग अंग्रेजों के फौज पाटे से डरना भूल गए और खुलकर सामने आ गए....हां, हमें आजादी चाहिए।

आपने कहा---
आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है।

मेरा कहना है...
टापू तो आप बनाए हुए हैं, अपने तक सीमित। खुद के इर्द गिर्द बहस चलाने की रणनीति बनाकर। हम तो विस्तार अपार वाले लोग हैं। मान लो, अगर आप और हम टापू भी हैं तो इन टापूओं को क्रांति के प्रतीक टापू बनाने होंगे, इनके फैलाव बढ़ाने होंगे। इन्हें बाकी जगहों पर संदेस भेजने होंगे कि आओ, तुम भी इस जैसे टापूओं के निर्माण में जुट जाओ।
बिलकुल मुंह बिराना चाहिये इन टापूओं पर खड़े होकर। बिलकुल दिखाना चाहिए मुक्ति के पेड़ को। ताकि संदेश आम अवाम तक पहुंचे। वो इस मुक्ति को, इस सुख को, इस आजादी को जी सकने की कम से कम लालसा तो पैदा हो।
रही बात मेरी अकल पर तरस करने को तो फिर वही कहूंगा, आपका बौद्धिक दिवालियापन दरअसल आपकी आंख पर पट्टी बांधे हुए है जो आपक आपकी सोच से बाहर आने से रोके हुए है। आपके अंदर भी एक क्रांति की जरूरत है तभी यह अहन्मयता जाएगी और आप सहज व सरल हो पाएंगी। ऐसे दंभी व्यक्तित्व को अपने सिवाय सारी दुनिया मूरख और खराब दिखती है। हां में हां मिलाओ तो खुश, कुछ अलग से सोच कर कह दो तो आग लग गई। दरअसल ये दिक्कत आपकी नहीं, आप जिस ढांचे की हिंदी मीडिया व समाज से निकल कर आगे बढ़ी हैं, उसकी दी हुई ट्रेनिंग है। इससे मुक्त होना ही शिवत्व है, समझदारी हैं। तभी आप अपने समुदाय, लिंग की अगुवा और नेता बन पाएंगी। मैं ये दावे से कह सकता हूं कि दूसरों की अकल पर तरस खाने वाली मनीषा की किसी से नहीं पट सकती क्योंकि ये जो भयंकर वाला इगो है वो जानलेवा है। प्लीज, भड़ास के डाक्टर रुपेश श्रीवास्तव से संपर्क कीजिए आप जिन्होंने ऐसे ढेरों मरीजों को सहज व सरल बनाया है।


आपने कहा---
लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

मेरा कहना है...
हमने कभी नहीं कहा कि भइया मनीषा आओ, भड़ासी बन जाओ। हमने हमेशा भड़ास से लड़कियों और महिलाओं की ज्यादा उपस्थिति पर ऐतराज जताया है। यकीन न हो तो भड़ास को पढ़ लेना। दरअसल स्त्री को देखकर पुरुष में लार टपकाने की जो आदत है ना, भड़ासी उससे मुक्त हैं। ये ग्रंथि उनमें जरूर हो सकती है जो आपकी हर अदा पर वाह वाह करते होंगे। हम तो जो सोचते समझते हैं, सच्चा, खरा, सोने की तरह उसे उगल देते हैं। ये आप पर है कि आप इस उगलन को कितना स्वीकार्य कर पाती हैं। भड़ास आपके बगैर मजे में हैं और हमारा कोरस बहुत बढ़िया अंदाज में जन जन तक पहुंच रहा है।

उम्मीद है, आपको सारे सवालों के जवाब मिल गए होंगे। कुछ बाकी हों तो बताइएगा।

जय भड़ास, जय चोखेरबालियां
यशवंत सिंह

एलन पीज ने समझाया था...

ऑस्‍ट्रेलिया के चिंतक एलन पीज ने बीस सालों से अधिक समय तक शोध किया और सिद्ध कर दिया कि आदमी और औरत के सोचने का तरीका बिल्‍कुल अलग होता है। हमारे भडास गुरू यशंवत जब सब्‍जी मंडी में घूमते बैल की तरह कमसिन चोखेरबाली में घुसे और वहां सजी तरकारियों को बुरी तरह झकझोर दिया।
इस प्रकरण में यशवंतजी अपनी जगह सही थे और चोखेरबालियां भी अपनी जगह सही है। अपनी पोस्‍ट देने से पहले एक बार यशवंतजी स्‍वप्‍नदर्शी का ब्‍लॉग देख लेते तो उन्‍हें पता चल जाता कि महिलाओं की सोच कैसे गति करती है। जब चोखेरबाली में पतन पर लिखा गया तो उससे जुडी महिलाओं ने पतन और उसके स्‍वरूप को बखूबी समझ लिया लेकिन पुरुष मानसिकता में यह बात घुस नहीं सकती। उसके मूल्‍य अलग हैं। उनके अनुसार कमर में बल डालकर उरोज झुका देने के साथ पतन की शुरूआत हो जाती है लेकिन महिलाओं के लिए उनके उरोज भी पेट और हाथों की तरह होते हैं। अगर सामाजिक मर्यादाएं न हो तो महिलाएं भी हम पुरुषों की तरह गर्मियों में टॉपलैस घूस सकती हैं। इसलिए नहीं कि वे मादक होती है बल्कि इसलिए कि उन्‍हें भी गर्मी उतनी ही लगती है जिनती हमें।
इस तरह मैं कह सकता हूं कि चोखेरबालियों का प्रतिरोध भी अपनी जगह सही है। जब यशवंतजी को पता नहीं था कि पतन का अर्थ क्‍या है तो मूल्‍य रहित पतनता की सलाह देना भी ठीक नहीं। जहां तक भडास की बात है मैं यही कहूंगा कि भडास को भी बहुत बडा कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनने के बाद तय करना होगा कि क्‍या और कैसे व्‍यक्‍त हो।
भडास के मूल्‍यों और मर्यादाओं पर बहस फिर कभी...

एलन पीज ने समझाया था...

ऑस्‍ट्रेलिया के चिंतक एलन पीज ने बीस सालों से अधिक समय तक शोध किया और सिद्ध कर दिया कि आदमी और औरत के सोचने का तरीका बिल्‍कुल अलग होता है। हमारे भडास गुरू यशंवत जब सब्‍जी मंडी में घूमते बैल की तरह कमसिन चोखेरबालीम में घुसे और वहां सजी तरकारियों को बुरी तरह झकझोर दिया।
इस प्रकरण में यशवंतजी अपनी जगह सही थे और चोखेरबालियां भी अपनी जगह सही है। अपनी पोस्‍ट देने से पहले एक बार यशवंतजी स्‍वप्‍नदर्शी का ब्‍लॉग देख लेते तो उन्‍हें पता चल जाता कि महिलाओं की सोच कैसे गति करती है। जब चोखेरबाली में पतन पर लिखा गया तो उससे जुडी महिलाओं ने पतन और उसके स्‍वरूप को बखूबी समझ लिया लेकिन पुरुष मानसिकता में यह बात घुस नहीं सकती। उसके मूल्‍य अलग हैं। उनके अनुसार कमर में बल डालकर उरोज झुका देने के साथ पतन की शुरूआत हो जाती है लेकिन महिलाओं के लिए उनके उरोज भी पेट और हाथों की तरह होते हैं। अगर सामाजिक मर्यादाएं न हो तो महिलाएं भी हम पुरुषों की तरह गर्मियों में टॉपलैस घूस सकती हैं। इसलिए नहीं कि वे मादक होती है बल्कि इसलिए कि उन्‍हें भी गर्मी उतनी ही लगती है जिनती हमें।
इस तरह मैं कह सकता हूं कि चोखेरबालियों का प्रतिरोध भी अपनी जगह सही है। जब यशवंतजी को पता नहीं था कि पतन का अर्थ क्‍या है तो मूल्‍य रहित पतनता की सलाह देना भी ठीक नहीं। जहां तक भडास की बात है मैं यही कहूंगा कि भडास को भी बहुत बडा कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनने के बाद तय करना होगा कि क्‍या और कैसे व्‍यक्‍त हो।
भडास के मूल्‍यों और मर्यादाओं पर बहस फिर कभी...

चोखेरबाली में भड़ासी आ गए तो मुझे अब सोचना होगा...!!!

((स्त्रियों के चर्चित ब्लाग चोखेरबाली का सदस्य बनने का न्योता मिला तो तुरंत जाकर ज्वाइन कर लिया। बुरे लोगों पर कौन भरोसा करता है, लेकिन चोखेरबाली ने किया तो लगा, चलो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बुरे लोगों को इस लायक मानते हैं कि वे कथित अच्छे लोगों से ज्यादा बेहतर हैं। खैर, चोखेरबाली पहुंचा तो वहां अपने स्वभाव अनुरूप एक पोस्ट भी दे मारा। और जहां जायें डाढ़ो रानी वहां लाये ओला पानी के अंदाज में मेरे लिखे पर कुछ लोगों को एतराज हो गया। ये कहां से चले आये म्लेच्छ कहीं के, भड़ासी कहीं के। भगाओ इन्हें। अगर ये रहेंगे तो हम न रहेंगे.....आदि आदि। तो भइया, अब हम का कहें, आज के जुग में सच सच बोल दो तो चुभ जाती है। एक ने हुवां किया तो नीचे कई लोग हुवां हुवां करने लगे, कुछ लोग आंचल में मुंह छुपाए कहने लगे कि जिधर उड़ेगा ये आंचल, उधर की राह हम भी चल पड़ेंगे .....खैर, यहां मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि भड़ासियों को पता चल सके कि भड़ासानंद आजकल कहां कहां मुंह मार रहे हैं। तो लीजिए चोखेरबाली पर जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसमें आए कमेंट को बूझिए....जय भड़ास, यशवंत))


Wednesday, February 20, 2008
सिर्फ और सिर्फ पतन, कोई मूल्य वूल्य की शर्त न थोपो
यशवंत सिंह
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मनीषा ने जो लिखा, मैं पतित होना चाहती हूं, दरअसल ये एक जोरदार शुरुआत भर है। उन्होंने साहस बंधाया है। खुल जाओ। डरो नहीं। सहमो नहीं। जिन सुखों के साथ जी रही हो और जिनके खोने का ग़म है दरअसल वो कोई सुख नहीं और ये कोई गम नहीं। आप मुश्किलें झेलो पर मस्ती के साथ, मनमर्जी के साथ। इसके बाद वाली पोस्ट में पतनशीलता को एक मूल्य बनाकर और इसे प्रगतिशीलता के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। यह गलत है।

दरअसल, ऐसी ऐतिहासिक गल्तियां करने वाले लोग बाद में हाशिए पर पाए जाते हैं। कैसी प्रगतिशीलता, क्यों प्रगतिशीलता? क्या महिलाओं ने ठेका ले रखा है कि वो एक बड़े मूल्य, उदात्त मूल्य, गंभीर बदलाव को लाने का। इनके लिए पतित होने का क्या मतलब? ये जो शर्तें लगा दी हैं, इससे तो डर जाएगी लड़की। कहा गया है ना...जीना हो गर शर्तों पे तो जीना हमसे ना होगा.....। तो पतित होना दरअसल अपने आप में एक क्रांति है। अपने आप में एक प्रगतिशीलता है। अब प्रगतिशीलता के नाम पर इसमें मूल्य न घुसेड़ो। कि लड़ाई निजी स्पेस की न रह जाए, रिएक्शन भर न रह जाए, चीप किस्म की चीजें हासिल करने तक न रह जाए, रात में घूमने तक न रह जाए, बेडरूम को कंट्रोल करने तक न रह जाए....वगैरह वगैरह....। मेरे खयाल से, जैसा कि मैंने मनीषा के ब्लाग पर लिखे अपने लंबे कमेंट में कहा भी है कि इन स्त्रियों को अभी खुलने दो, इन्हें चीप होने दो, इन्हें रिएक्ट करने दो, इन्हें साहस बटोरने दो.....। अगर अभी से इफ बट किंतु परंतु होने लगा तो गये काम से।

मेरे कुछ सुझाव हैं, जिस पर अगर आप अमल कर सकती हैं तो ये महान काम होगा.......

1- हर महिला ब्लागर अपने पतन का एलान करे और पतन के लक्षणों की शिनाख्त कराए, जैसा मनीषा ने साहस के साथ लिखा। अरे भइया, लड़कियों को क्यों नहीं टांग फैला के बैठना चाहिए। लड़कियों को क्यों नहीं पुरुषों की तरह ब्लंट, लंठ होना चाहिए....। ये जो सो काल्ड साफ्टनेस, कमनीयता, हूर परी वाली कामनाएं हैं ये सब स्त्री को देवी बनाकर रखने के लिए हैं ताकि उसे एक आम मानव माना ही न जाए। तो आम अपने को एक आम सामान्य बनाओ, खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं।

2- सबने अपने जीवन में प्रेम करते हैं, कई बार प्रेम का इजाहर नहीं हो पाता। कई बार इजहार तो हो जाता है पर साथ नहीं जी पाते....ढेरों शेड्स हैं। लेकिन कोई लड़की अपनी प्रेम कहानी बताने से डरती है क्योंकि उसे अपने पति, प्रेमी के नाराज हो जाने का डर रहता है। अमां यार, नाराज होने दो इन्हें.....। ये जायेंगे साले तो कई और आयेंगे। साथ वो रहेगा जो सब जानने के बाद भी सहज रहेगा। तो जीते जी अपनी प्रेमकहानियों को शब्द दो। भले नाम वाम बदल दो।

3- कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो।

4- महिलाओं लड़कियों का एक ई मेल डाटाबेस बनाइए और उन्हें रोजाना इस बात के लिए प्रमोट करिए कि वो खुलें। चोखेरबाली पर जो चल रहा है, उसे मेल के रूप में उन्हें भेजा जाए।

5- छात्राओं को विशेष तौर पर इस ब्लाग से जोड़ा जाए क्योंकि नई पीढ़ी हमेशा क्रांतिकारी होती है और उसे अपने अनुरूप ढालने में ज्यादा मुश्किल नहीं होतीं। उन्हें चोखेरबाली में लिखने का पूरा मौका दिया जाए।

6- एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह, ताकि आप लोग गंभीरता व मूल्यों के आवरण में जिन चीजों को कहने में हिचक रही हैं, जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने से डर रही हैं, वो सब शुरू हो जाए।

जय चोखेरबालियां
यशवंत
Posted by यशवंत सिंह yashwant singh at 6:40 PM
Labels: पतनशील लड्कियाँ


6 comments
Mired Mirage said...
बढ़िया सुझाव हैं । मैं तो आपका सुझाव पढ़ने से पहले ही कंचन सिंह चौहान जी के स्त्री बनाम पुरुष पर अपनी भड़ास टिप्पणी के रूप में लिख आई हूँ ।
घुघूती बासूती
February 20, 2008 7:17 PM

रचना said...
"खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं। "
क्यो हम वैसा लिखे जैसा भड़ासी लिखते ?? कोई खास वजह भी बताये की ऐसा भड़ास पर क्या हुआ हैं जो किसी के लिये भी प्रेरणा का सूत्र हैं ? क्या उपलब्धि हैं भड़ास की , क्या किया हैं भड़ास ने ? एक सामुहिक ब्लॉग हैं भड़ास जहाँ आप जो चाहे लिख सकते हैं , भड़ास के पुनर्जनम से पहले जो पोस्ट आया करती उसमे गाली , नारी शरीर संरचना और बहुत कुछ होता था जिसका कोई महत्व ही नहीं हैं
नहीं मुझे तो नहीं चाहीये ऐसी पतन शीलता ।
" कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो। "
क्यो क्या ऐसा करने से कोई क्रांती आ जायेगी ?? क्या इससे समाज मे फैली रुदीवादी परम्पराये खत्म हो जाएगी ?
"एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह "
कब तक स्त्री को ये सुनना है , ऐसा करो इसकी तरह रहो , हमारी तरह बनके देखो !!!! चोखेर बाली का मतलब और मकसद क्या अब हमे किसी और से समझना होगा ?? क्या हम इतने भी परिपक्व नहीं है की सोच सके हमे क्या करना हैं ?? कमाल हैं एक और सीख !!
मेरे पास तो कोई ऐसा वाकया या संस्मरण नहीं हैं जिनका जिक्र कर के मै अपनी पतन शीलता का झंडा फेहरा सकूं पर ऐसे बहुत से संस्मरण हैं जहाँ मैने समाज से हर वह अधिकार लिया जो किसी पुरूष को मिलता , अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी जीने का । मुझे अगर शराब और सिगरेट की जरुरत महसूस होगी तो मै इसलिये लूगी की मुझे उसकी जरुरत हैं इसलिये नहीं की यशवंत लेते हैं । मुझे बराबरी पुरूष से नहीं करनी है क्योंकी मै तो जनम से पुरूष के बराबर ही हूँ । और मुझे ये सिद्ध भी नहीं करना है , मुझे केवल उज्र हैं की समाज स्थापित उस रुढ़ीवादी सोच से जहाँ स्त्री को उसकी शरीर की संरचना की वजह से बार बार अपमानित होना पड़ता है और मै अपनी हर सम्भव कोशिश करती हूँ कि इस के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखूं । मानसिक परतंत्रता से ग्रसित है स्त्री वर्ग और बदलना जरुरी है उस सोच का
February 20, 2008 9:33 PM

swapandarshi said...
अगर भडासी, इस म्लोग मे लिखने लगे, और तय करने लगे कि क्या लिखना होगा. टो मुझे इस ब्लोग की सदस्य्ता को लेकर सोचना होगा
February 20, 2008 10:08 PM

Pramod Singh said...
भइया, इस टिल्‍ली-बिल्‍ली उद्यीपन में मैं, बतौर एक ब्‍लॉगर और इस सामाजिक स्‍पेस को शेयर करते हुए- रचना व स्‍वप्‍नदर्शी की प्रतिक्रियाओं के साथ हूं. यही अच्‍छा है कि सब अपना सबक स्‍वयं लें.. बस इस बात से ज़रा ताज्‍जुब होता है कि नतीजों तक पहुंचने की ऐसी हड़बड़ क्‍यों मची हुई है? मानो किसी सलाने जलसे में ईनाम बंटनेवाला है कि यह सही और यह गलत!.. बिना नाटकीयता के अलग-अलग पर्सपेक्टिव नहीं बनाते रखे जा सकते?
February 20, 2008 11:34 PM

ओमप्रकाश तिवारी said...
रचना व स्‍वप्‍नदर्शी ne sahi kaha
February 21, 2008 12:49 AM

(चोखेरबाली से साभार)

इसलिए पतित होने दो ताकि वह अपने लिए स्पेस गढ़ सके

((आजकल भड़ास के अलावा मैं कुछ दूसरों ब्लागों पर टिप्पणियां कर रहा हूं और पोस्ट लिख रहा हूं। मनीषा पांडेय का ब्लाग है बेदखल की डायरी। इस ब्लाग पर मनीषा जो लिखती हैं, उसे मैं बड़े चाव के पढ़ता हूं। उनके लिखने का अंदाज बिलकुल भड़ासियों जैसा होता है। बिलकुल साफ साफ मन की बात, सोच, इरादे लिख देती हैं। तो मनीषा ने अपने इसी अंदाज, साहस या दुस्साहस के क्रम में एक पोस्ट चोखेरबाली पर लिख मारी...हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं। इस पोस्ट को काफी पढ़ा गया। उसके बाद उन्होंने लिखा..क्या पतनशीलता कोई मूल्य है? मैंने इसी पर टिप्पणी की है, जो इस तरह है....यशवंत))

यशवंत सिंह yashwant singh said...
सारी भाई मनीषा, गलत नाम लिखने के लिए। देखो, नाम तक याद नहीं है, बस लिखने की तुम्हारी स्टाइल व कंटेंट व याद है।

आपकी तारीफ करने के क्रम में मैं अपनी एक असहमति का जिक्र नहीं कर पाया था, वो अब कर रहा हूं।

आपका उपसंहार सैद्धांतिक तौर पर अच्छा है, लिखा अच्छे से है, पर व्यावहारिक नहीं है। पतित होने के लिए जिस बड़े विजन, बड़े फलक, बड़े संदर्भों की शर्त लगा दी है वो उचित नहीं है।

भइया, लड़की को मुक्त होने दो। उस ढेर सारी चीजें न समझाओ, न बुझाओ और न रटाओ। उसे बस क से कबूतर पढाओ। माने अपनी मर्जी से जीने की बात सिखाओ। आत्मनिर्भर होने को कहो। दिल की बात को सरेआम, खुलेआम रखने का साहस दो।

मनमर्जी करेगी तो जाहिर सी बात है कि गलत भी करेगी, सही भी करेगी। दिल की बात कहेगी तो अच्छी बात भी कहेगी, बुरी बात कहेगी। पर ये क्या कि स्त्री पतित हो लेकिन विचारधारा का चश्मा लेकर, नैतिकता का आवरण ओढ़कर, महिलावादी विजन लपेटकर.....।

इस लड़की को अभी सिर्फ इसलिए पतित होने दो कि वह इससे अपने लिए स्‍पेस पा सकती है, वह इससे चीप किस्‍म की ही सही, निजी आजादी पा सकती है।

समूची मानवता, उदात्तता, रचनात्मकता...ये सब तब होंगी जब वह अपने निजी स्पेस की जंग को जीत ले। रिएक्ट करने में सफल हो जाए। इतने महान लक्ष्य अभी से देंगी तो वैसे ही महानता के बोझ से दबी स्त्री फिर और महान हो जाएगी और पतित होने से रह जाएगी।

मैं तो कहूंगा इस पतनशीलता को किसी मूल्य से न जोड़ो। इसे मूल्यहीन पतनशीलता कहना पड़े तो खुल के कहो। चीजें क्रमिक तरीके से विकसित होती हैं। अभी रिएक्ट कर लेने दों, स्पेस ले लेने दो, चीप किस्म के सुख जी लेने दो....अपने आप इससे मन उबेगा और फिर अंदरखाने बड़े सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। लेकिन अगर पतन होने के लिए पहले ही ढेर सारे मूल्य वगैरह बना दिए तो फिर सब टांय टांय फिस्स.....

एक बढ़ियावाली बहस शुरू करने के लिए आपको बधाई।
जय भड़ास
यशवंत
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श्रद्धांजलि... रउरा सासन के ना बड़ुए जवाब भाईजी

(यह पोस्ट डा. मांधाता सिंह द्वारा प्रेषित पोस्ट के बीच में अजीब तरीके से अटकी पड़ी थी, उसे वहां से निकाल कर अलग से डाल रहा हूं ताकि यह ध्यान में आने से रह न जाए....यशवंत)


विजेंद्र अनिल के भोजपुरी गीत

जनवरी 1945 को बक्सर जिले के बगेन में जन्मे कथाकार, कवि विजेंद्र अनिल का इसी माह तीन तारीख को देहांत हो गया। 1968 से 70 तक उन्होंने अपने गांव से ही प्रगति पत्रिका भी प्रकाशित की थी। आजीवन भाकपा माले से जुडे रहे विजेंद्र अनिल ने बदलते समय में भी अपने सरोकार नहीं बदले थे। गोरख पांडे के बाद अपनी तरह से मेहनतकश ग्रामीण किसान जनता के दुख-दर्द को उन्होंने अपने गीतों में स्वर दिया। विजेंद्र अनिल को समूचे रिजेक्ट समुदाय की तरफ से श्रद्धांजलि. यहाँ प्रस्तुत है भोजपुरी मे लिखी उनकी चर्चित कविता....

जरि गइल ख्‍वाब भाई जी

रउरा सासन के ना बड़ुए जवाब भाईजी,
रउरा कुरूसी से झरेला गुलाब भाई जी
रउरा भोंभा लेके सगरे आवाज करींला,
हमरा मुंहवा पर डलले बानी जाब भाई जी
हमरा झोपड़ी में मटियों के तेल नइखे,
रउरा कोठिया में बरे मेहताब भाई जी
हमरा सतुआ मोहाल, नइखे कफन के ठेकान,
रउआ चाभीं रोज मुरूगा-कवाब भाई जी
रउरा छंवड़ा त पढ़ेला बेलाइत जाइ के
हमरा छंवड़ा के मिले ना किताब भाई जी
रउरा बुढिया के गालवा प क्रीम लागेला,
हमरा नयकी के जरि गइल ख्‍वाब भाई जी
रउरा कनखी पर थाना अउर जेहल नाचेला,
हमरा मुअला प होला ना हिसाब भाई जी
चाहे दंगा करवाईं, चाहे गोली चलवाईं,
देसभक्‍तवा के मिलल बा खिताब भाई जी
ई ह कइसन लोकशाही, लड़े जनता से सिपाही,
केहू मरे, केहू ढारेला सराब भाई जी
अब ना सहब अत्‍याचार, बनी हमरो सरकार,
नाहीं सहब अब राउर कवनो दाब भाई जी
चाहे हथकड़ी लगाईं, चाहे गोली से उड़ाईं
हम त पढ़ब अब ललकी किताब भाई जी
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ब्लॉग की दुनिया पर 'दस्तक'







दैनिक भास्कर ने अपने साप्ताहिक साहित्यक पेज 'दस्तक' (21 फरवरी) के केन्द्र में ब्लॉग जगत को फोकस किया है। इस में एक तरफ़ जहाँ कोंफी हाउस के पतन के बाद विमर्श के लिये ब्लोगिंग को एक बेहतर मंच बताया गया हैं वहीं आरकुट का विकल्प भी। आईटी क्षेत्र के मशहूर तकनीकी सलाहकार रवि रतलामी के आतिथ्य संपादन में प्रकाशित इस खास पेज का मुख्य आलेख लंदन में कार्यरत मीडियाकर्मी अनामदास ने 'ब्लोगिंग ने बनाए दोस्त' शीर्षक से लिखा है । इस आलेख में सामजिक -सांस्कृतिक और वैचारिक गत्विधियों के अकाल से जूझ रहे हिन्दी समाज के लिए ब्लोग्स को मानसून का दर्जा दिया गया है। आलेख में अप्रत्यक्ष रूप से 'भड़ास' और 'मोहल्ला' का जिक्र भी किया गया है वहीं प्रभा साक्षी डॉट कॉम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच, देवाशीष, रवीश कुमार, अनिल रघुराज, समीर लाल, अभय तिवारी और ब्लागवाणी के संचालक मैथिली गुप्त के वैचारिक आलेख और टिप्पणियां हैं साथ ही रवि शंकर श्रीवास्तव का ब्लॉग बनाने को लेकर उपयोगी आलेख। 'व्यावसायिक ब्लोगिंग' शीर्षक से लिखे बालेन्दु दाधीच के आलेख में ब्लोगिंग को पत्रकारिता के समान धन कमाने का जरिया भी बताया गया है। जबकि अभय तिवारी ने अपनी टिपण्णी में ब्लोगिंग को एक बीमारी करार दिया है। जब कि रवीश कुमार ने ब्लोगिंग को साहित्य के भविष्य के साथ जोड़कर देखा है । पेज में ब्लोगिंग के इतिहास पर नज़र डालते हुए बताया गया है की आज लगभग हिन्दी के 3 हज़ार , अंग्रेजी के 3.5 करोड़ ब्लॉग सक्रिय हैं जिस में 37 फीसदी जापानी भाषा तथा 36 फीसदी अंग्रेजी भाषा के ब्लॉग हैं
-आशेन्द्र सिंह singh.ashendra@gmail.com

आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है।

भड़ासी भाइयों साहित्य अकादमी की मारने के लिए एक ऐसे साहित्यकार को ठेका दिया गया है जो सबसे मुखर हिंदी विरोधी रहा है। एक समय इसने बाकायदा एलान किया था कि हिंदी बोलने वालों को खदेड़ दिया जाना चाहिए। राज ठाकरे या सुनीलगंगोपाध्याय जैसे साम्प्रदायिक मानसिकता वाले लोगों को यह तरजीह क्यों दी जा रही है? यह सवाल बड़ा है। मेरे मित्र पलाश विश्वास ने इन्हीं सवालों को उठाते हुए अपने विचार मुझे मेल किए हैं। जो मैं ज्यों का त्यों आपको परोस रहा हूं। इसे विस्तार से http://nandigramunited.blogspot.com/ पर भी पढ़ सकते हैं।
फिलहाल यहां पढ़ें---------
आपका भड़ासी भाई--डा. मान्धाता सिंह


• आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है।
बंगाली ब्रह्मण मार्क्सवादी राष्ट्रीटता के शीर्ष आइकन सुनील गंगोपाध्याय अब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बन गये हैं।

आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है। सुनील गंगोपाध्याय अब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बन गये हैं। बैसे भी बंगाली ब्रह्मण मार्क्सवादी राष्ट्रीटता के शीर्ष आइकन हैं सुनील। पिछली दफा महाश्वेता देवी को पटखनी देकर संघ परिवार के उम्मीदवार गोपीचंद नारंग को जिताने में उन्होंने गुलजार, कमलेश्वर, गिरिराज किशोर जैसों के साथ गठजोड़ किया था। एवज में वे अकादमी के उपाध्यक्ष बन गये। तबसे योजनाबद्ध ढंग से नारंग को पलीता लगाते हुए वे अपने हक में समीकरण साधते रहे। नारंग खद गद छोड़ने के मूड में कतई नहीं थे। पर वे उखड़ने की हालत में आ गये तो मजबूरन उन्होंने गांगुली को आगे कर दिया। मुकाबले में थे वासुदेवन नायर। जिन्होंने पिछली दफा महाश्वेता दी के हक में नाम वापस ले लिया था। उनके चुनाव संचालक बने के सच्चिदानंदन। पर महाश्वेता खेमा नारंग को रोकने के बाद गांगुली को नायर पर तरजीह दी। आखिर सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय के बाद सुनील साहित्य अकादमी पर काबिज दूसरे महारथी है। यह करिश्मा तो सांसद और प्रबल कांग्रेसी, नेहरु के प्रिय ताराशंकर बंदोपाध्याय तक नहीं कर पाए। महाश्वेता दी बांग्ला ब्राह्मण राष्ट्रीयता के अश्वमेध घोड़े का लगाम थामकर कैसे युद्धघोषणा करते। उनके सिपाहसलार राजेंद्र यादव, केदारनाथ सिंह, कमलाप्रसाद, कृपाशंकर चौबे और दूसरे तमाम रथी महारथी देखते रह गये। सुनील की योजना पूरी हो गयी।

कोलकाता पुस्तक मेले को मैदान लौटाने की मुहिम छेड़कर बंगाल में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी मरीचझांपी नंदीग्राम नरसंहारों का पाप धोने की पहल करने के फिराक में सुनील को पहले ही मैदान में उतार चुकी है। नंदीग्राम सिंगुर हरिपुर परमाणु परियोजना रीटेल चेन राशन विद्रोह चाय बागानों में मृत्यु जुलूस आदि मुद्दो पर खामोश सुनील, सौमित्र चटर्जी, सुबोध सरकार मल्लिका सेनगुप्त वगैरह हाईकोर्ट के रोक के बावजूद बुद्धदेव और मेयर विकास रंजनन के साथ कोलकाता की बागी सिविल सोसाइटी को बंगसंस्कृति की दुहाई देकर सत्तापक्ष मे लामबंद करने में जुट गये। प्रकाशन और पुस्तकों पर एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश में आनंदबाजार प्रकाशन सरकारी मुहिम के खिलाफ बतर्ज डब्लू डब्लू एफ सक्रियहो गया अपने तेरह लाखी अखबार और स्टार आनंद के जरिये तो ऐसा विभ्रम फैला जैसे की बांग्ला भाषा और राष्रीयता के जीवन मरण का संकट खड़ा हो गया हो। नवनीता देव सेन आहिस्ते से मुख्यमंत्री के बगल में बैठ गयी।

तसलिमा नसरीन के निर्वासन की पृष्ठभूमि में द्विखंडित पर प्रतिबंध का प्रकरण आता है। उस वक्त सुनील और उनके साथी प्रतिबंध की वकालत कर रहे थे। सुनील बांग्ला न बोलनेवालों के खिलाफ भाषा पुलिस बनाने की पेश कश करते रहे हैं। हिंदीभाषियों को चुटिया पकड़कर बंगाल बाहर करने की बी हुंकार उन्होंने भरी थी। तसलिमा साहित्य को प्रतिबंधित करने की मांग करने वाले सुनील ही बाकायदा देश पत्रिका के संपादक की हैसियत से आनंद पुरस्कार दिलवाकर तसलिमा को आइकन बनाने में सबसे आगे थे। पर आनंद प्रकाशन से नाता तोड़ लेने वाली तसलिमा को सबक सिखाने में सबसे आगे थे सुनील। मजे की बात तो .ह है कि तसलिमा पर मुसलमानों की भावनाओं को छेस पहुंचाने का आरोप लगाने वाले सुनील ने सरस्वती की प्तिमा के व७वृतांत के साथ चुंबन प्रकरण को अपनी आत्मकथा का आकर्षण बनाने में कोई हिचक नहीं दिखायी। मां काली को संधाल मागी और दलितो को अस्पृश्य लिखना तो उनकी कृतियों का वैशिष्ट्य हैं ही।

हमारे हिन्दी समाज के दि्ग्गज सख्त नाराज हुआ करते थे कभी सुनील से। पर उनकी औकात क्या कि माकपाई यवस्था और बंगाली ब्राह्मणवादी ववर्चस्व के विरुद्ध आवाज बुलन्द करें। माड़वाड़ी समाज ने दशकों से कोलकाता में अपना स्वतंत्र वजूद बनाया हुआ है। अस्पताल, मंदिर, शिक्षा प्रतिष्ठान सार्वजनिक सेवाओं में पूरी आत्मनिर्भरता के साथ। बाकी हिन्दी समाज यहां हमेशा दोयम दर्जे का है। साहित्यकार भी हिंदी के प्रतिष्ठित हैं तो मारवाड़ी। प्रभा खेतान, प्रतिभा अग्रवाल, अलका सरावगी, मधु कांकरिया, गीतेश शर्मा। पर मारवाड़ी समाज की यह किलबंदी अब बिखर गयी है। कोलकाता के अजर्थ व्यवस्था और व्यवसाय में अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए सत्तारूढ़ दल व मोर्चे से गठबंधन की मजबूरी। माकपाई औद्यौगीकरण, शहरीकरण, निजीकरण, विनिवेश, थोक कारोबार और विदेशी पूंजीनिवेश की बहती गंगा में हाथ धोने के फेर में माड़वाड़ी समाज का पारम्पारिक ताना बाना भी बिखर गया है। मारवाड़ी समर्थन से कोलकाता पश्चिम जैसे लोकसभा सीट समेत पूरे कोलकाता को ममता बनर्जी के प्रभाव क्षेत्र से बेदखल करके वाममोर्चा ने ग्रामीण विकास, भूमि सुधार और मार्क्सवादी विचारधारा को तिलांजलि देकर मूलनिवासयों के चौतरफा सर्वनाश के लिए नंदी ग्राम सिंगुर जैसे कार्यक्रमो को अंजाम देने लगा है। अब सारी सेवाएं कारपोरेटों के हवाले। बुद्ददेव कीसिंजर जोड़ी है। सलेम टाटा जिंदल अंबानी की बहारें हैं। ऐसे मे टूटपूंजिएं मारवाड़ियों की क्या बिसात? बड़ा बाजार में एक के बाद एक अग्निकांड के जरिए मारवाड़ियों को बंगाल की अर्थ व्यवस्था और समाज से बेदखल किया जाने लगा है। तो दूसरी ओर, जूट उद्योग, कपड़ा कारोबार और चायबागानों को श्मशान में तब्दील करके बाकायदा हिंदी भाषियों के पेट का टने मे लगे हैं वामपंथी। कोयला खानों में वैध अवैध खनन में मारे जाते हैं हिंदी भाषी।करीब ५६ हजार कल कारखानों को बंद करके हिंदी भाषी मजूरों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया गया है। भिखारी पासवान का अता पता नहीं चला। पर हिंदी साहित्यकार माकपाई समर्थन में प्रेमचंद तक को शहरीकरण और औद्योीकरण के प्रवक्ता बतौर पेश करने से बाज नहीं आये। नंदीग्राम सिंगुर के खिलाफ बाकी देश में हिंदीभाषी मुखर ैं, पर बंगाल में कोई नहीं बोलता। बहुत लिखने बोलने वाली प्रभा खेतान अलका सरावगी तक खामोश। सभी हिंदी साहित्यकार जलेस प्रलेस के जरिए माकपा के हक में गिरोहबंद। सड़क पर उतरी सिविल सोसाइटी में एक अकेले अशोक सेसरिया के अलावा कोई उल्लेखनीय चेहरा नहीं दिखा।

यह तो है हिंदी समाज कोलकाता का। सुनील की मुहिम का क्या खाकर विरोध करता? महाश्वेता देवी जब साहित्य अकादमी के चुनाव मे खड़ी हो गयी तो कोलका ता पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन में सारे हिंदी लिक्खाड़ जमा हो गये। सुनील गंगोपाध्याय ने ऐलान किया कि उनके बारे में अफवाहें उड़ायी जाती रही हैं और वे हिंदीभाषियों के खिलाफ कतई नहीं हैं। सब धन्य धन्य हो गये।

इसी पुस्तक मेले में एक प्रवासी अमेरिकी बंगालियों के प्त्रिका विमोचन समारोह में बाकायदा मंच पर जाकर मैंने सुनील से सवाल किया कि क्या वे महाश्वेता दी को समर्थन देंगे? कृपा शंकर चौबे भी इस मौके पर हाजिर थे। सुनील ने कोई जवाब नहीं दिये। दि्ल्ली में हमारे मित्र गण सुनील की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। हमें सारी खबर मिल रही थी। पर संदीपन को साहित्य अकाममी दिलवाने में मदद करने वाले शंखो घोष और महाश्वेता देवी को सुनील पर पूरा यकीन था। मैंने दीदी को जब वाकया बताया तो वे भरोसे के सा बोली सुनील, प्रतिभा राय और इंदिरा गोस्वामी हमारे साथ हैं। इतिहास गवाह है कि तीनों ने विश्वासघात किया। तब मैं भााबंधन के संपादकीय में था। पर नवारुण दा वहां भी देशवालों को छापने लगे। मूलनिवासियों और शरणार्थियों की समस्या से दीदी ने पल्ला झाड़ लिया।

कल अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। सुनील की भाषा शहीद स्मारक समिति हिंदी वर्चस्व के खिलाफ बोलियों के हक हकूक क लेकर माकपा और वाममोर्चा की पूरी ताकत के साथ राज्यभर में कार्यक्रम और मुहिम चलायेगी।

नंदीग्राम और सिंगुर मामले में जिन दो टीवी चैनलों तारा टीवी और कोलकाता टीवी को सच का पर्दाफाश करने का स्रेय जाता है, वे भी आज सुनील गंगोपाध्याय की उपलब्धियों का बयान करने से नहीं अघा रही थी। पुस्तक मेले को लेकर जिस आनंद बाजार प्रकाशन से सुनील का युद्ध आज भी जारी है, वह भी सुनील की एस जीत का जश्न मना रहा है। माकपाई चैनलों और अखबारों का क्या कहें। हिंदी और अंग्रेजी के पत्रकार, संपादक तो अलिमुद्दीन स्ट्टीट की इजाजत के बगैर पादते भी नहीं।
जय हो सुनील महाराज की।

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बंगला के प्रख्यात साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय को बुधवार को साहित्य अकादमी का अध्यक्ष चुन लिया गया जबकि पंजाबी के साहित्यकार एस एस नूर निर्विरोध उपाध्यक्ष चुने गए। साहित्य अकादमी के यहाँ हुए चुनाव में गंगोपाध्याय को 45 मत मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वन्द्वी एवं निवर्तमान अध्यक्ष वासुदेवन नायर को 40 मत मिले। एक अन्य प्रत्याशी सत्यदेव शास्त्री को मात्र सात वोट मिले।
जनरल कौंसिल की एक घंटे से अधिक समय तक चली बैठक में नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव किया गया। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल अगले पांच साल के लिए होगा यानि ये दोनों 2012 तक अपने पद पर रहेंगे। सुनील गंगोपाध्याय वर्तमान अध्यक्ष गोपीचंद नारंग का स्थान लेंगे और अभी तक उपाध्यक्ष रहे सुनील गंगोपाध्याय का स्थान एस एस नूर लेंगे। पंजाबी के साहित्यकार एस एस नूर के विरोध में बंगला साहित्यकार इंद्रनाथ चौधरी का नाम था, लेकिन अंतिम समय में उनके नाम वापस ले लेने के कारण नूर को निर्विरोध उपाध्यक्ष चुन लिया गया। गौरतलब है कि साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष पद को पं. जवाहर लाल नेहरू और उपाध्यक्ष पद को डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने सुशोभित किया था।

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प्रभाष जोशी ने जनसत्ता मे अच्छा सवाल उठाया कि आखिर वाम के राज मे यह नौबत क्यों आयी कि नंदीग्राम के किसान-मजदूर जब केमिकल हब के लिए प्रस्तावित ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करने निकले तो डेढ़ हजार माकपा कैडर उस इलाके से भागने को मजबूर हो गए? कांग्रेस या भाजपा शासित किसी प्रदेश मे तो ऐसा नही होता कि किसी प्रस्तावित परियोजना से उजड़ने वालों का विरोध सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं को उस इलाके से बेदखल ही कर दे? जवाब माकपा कैडर के उन तौर-तरीकों मे है जो वे पूरे पश्चिम बंगाल मे अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनाते रहे हैं. किसी भी नाम पर आप लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाइश ख़त्म करेंगे तो नतीजा वही होगा हिंसात्मक विरोध मे इजाफा.

बहरहाल, नंदीग्राम मुद्दे पर संसदीय बहस ने आम लोगों को जैसे चौराहे पर ला खडा किया है. लेफ्ट फ्रंट की सरकार मे शामिल अन्य दलों ने माकपा को दोषी बताते हुए अपना हाथ झाड़ लिया है, हालांकि सरकार मे वे आज भी शामिल हैं. शायद सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत वाम दलों की सरकार पर लागू नही होता. वाम मोर्चे से बाहर माकपा की सबसे तीखी आलोचना भाजपा के नेता कर रहे हैं. मगर न केवल वाम नेता बल्कि कांग्रेस का भी यही मत है की उन्हें आलोचना करने का हक़ नही क्योंकि उनके गुजरात मे गोधरा के बाद जो कुछ हुआ था वह सारी दुनिया देख चुकी है. बात सही है.


--पलाश विश्वास

20.2.08

तनवीर जाफरी ने बताया कि सृजनगाथा को नही भेजा आलेख


मेरी भास्कर में छप चुकी रचना का तनवीर जाफरी के नाम से प्रकाशन का मुद्दा अब एक नये मोड़ पे आता लग रहा है तनवीर जाफरी को मैंने फोन न० 01712535628 पर 10:12 बजे फोन किया ।
तनवीर साहब ने बताया कि :- सृजनगाथा को उन्होने "जीवन की बंजर भूमि में" आलेख नहीं भेजा । आपके व्यंग्य को मेरे नाम से छपवाने की गलती सृजनगाथा की ही है ।साहित्य के पुरोधा बने रहने के लिए , साहित्यिक दूकान चलाने के लिए जो चुरकटी जारी है उसपे लगाम कब लगेगी मेरी समझ से परे है । "
भाइयो , अब मुआमला तनवीर और जयप्रकाश "मानस " के बीच का हों गया है । यदि पकड़ गए तो अपना-अपना गिरेबान बचाते नज़र आ रहे हैं । मैंने तो पहले ही कहां था कि "यदि कोई तकनीकी गलती हों तो बस सुधार दीजिए "
समयचक्र भी सक्रिय हों गया , श्री राम ठाकुर दादा ये वाले =>दादा वहाँ न जाइए जहाँ मिलै न चाय....! भी सक्रिय हुए । कुछ सक्रिय हों रहे हैं कुछ लोगों ने मुझे डंडा उठाने फिर ".........." देने की सलाह दे रहे हैं......जैसे मेरे प्रिय डाक्टर डा. रूपेश श्रीवास्तव - आयुषवेद
तो भाइयो तीनों तरफ है आग बराबर लगी हुयी ।
इनका भी तो आभारी ही हूँ चक्करघिन्नी said...
साहित्य अकादमी से जुड़ा हुआ व्यक्ति इस तरह रचना की चोरी करे समझ से परे है। मेरा सुझाव है कि आप पत्रिका के सम्पादक से चर्चा करने के उपरांत इन पर अवश्य ही कानूनी कायर्वाही करें। हम आपके साथ हैं।

रवीन्द्र रंजन , इन सबके अलावा महा भडासी यशवंत जी जिन्होंने लगातार साथ दिया
अब आप मेरे पॉड कास्ट पे सुनिए http://girishbillore.mypodcast.com/2008/02/JEEVAN_KEE_BANJAR_BHOOMI-82997.html<= को क्लिक करिये "मेरी आवाज़ सुनो भाई "
कल जबलपुर के अखबारों की कतरनें शायद पोस्ट कर दूं ।
मामला मेरा ज़रूर है किन्तु राजेश पाठक टाइप के लोगों ने इसे यदि व्यक्तिगत मानके चुप चाप सह लेने की जो सलाह दी उसे मैं :-"......'के अलावा क्या कहूं ?"

भड़ास और गालियाँ

भड़ास पर गालियों को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू हो गयी है. भड़ास पर गालियां लिखी जायें या नहीं इस पर जम कर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. हम अपनी भड़ास गालियों के माध्यम से निकालें या नहीं यह भले ही बहस का मुद्दा बने, पर आम जीवन में यह बिल्कुल भी अस्वीकायॆ नहीं है. यहां मैं किसी साहित्यकार या रचनाकार का उदाहरण नहीं, बल्कि खुद एक चुटकुला या यूं कहें की लोकोक्ति के बारे में लिखना चाहूंगा, जो मेरे गृह जनपद गोंडा की शान बन गयी है. इसके पहले बताते चलें कि बनारस की तरह गोंडा में भी गालियों के बिना बात करना संभव ही नहीं है. मान लीजिए कोई अच्छा काम करता है, तो कहा जाता हैः वाह सार, बड़ा नीक काम किहिस हो. और अगर कुछ गड़बड़ हो गयी, तब तो ... कुछ इस अंदाज में प्रतिक्रियाएं मिलेंगी, मारो सारवा के.. बेटी...बड़ा ...है इत्यादि. हां तो बात कर रहा था लोकोक्ति की. हुआ कुछ यूं की एक बार एक सज्जन ट्रेन में यात्रा कर रहे थे. सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन से बात शुरू हुई तो पता चला कि वह गोंडा के हैं. उन्होंने कहा, भाई साहब सुना है गोंडा के लोग बिना गाली दिये बात ही नहीं कर पाते हैं. इस पर सामने वाले सज्जन का जवाब था, कौन भोंसड़ी वाला मादर... कहता है? अब बताइये जो चीज हमारे दैनिक जीवन में बस गयी हो उससे कैसे बचा जाये. हालांकि लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं. और सही भी है, एक सभ्य समाज के लिए. पर हम इससे बच पायेंगे इसमें संदेह है. बिना गाली के भड़ास, तब तो भड़ास रह ही नहीं जाती. सक्षम हुए तो सामने, नहीं तो पीठ पीछे गरियायेंगे जरूर. हालांकि मेरी इस पोस्ट का कतई यह मतलब नहीं है कि मैं पूजा जी या नीलिमा जी या किसी और की खिलाफत कर रहा हूं. ऐसा भी नहीं है कि मैं उनकी नाराजगी के डर से ऐसा कह रहा हूं. पर...यह जो पर, लेकिन, किंतु, परंतु...इत्यादि शब्द हैं, न यह बहुत कुछ कह और समझा जाते हैं. आगे जय भड़ास

इन पलों को शिद्दत से महसूस करता हुं मैं.. .

रुपेश जी के सक्रिय ब्लॉग लेखन से कहीं ज्यादा उनके सेवा भाव ,करुना को बाँटती उनके आँचल के छाँव तले पीड़ित भारत चंगा हो रहा है, ऐसा सुना, काफी खुशी हुई । समय ,समाज,परिस्थिति को यही चाहिए भी। हजारों,लाखों,करोरों मतलब हर घर में रुपेश जी जैसी मनोवृति पनप जाए तो समझो सड़ी सभ्यता का एक हिस्सा ख़ुद-ब-ख़ुद गुनगुनाने लगेगा।
रुपेश भाई ने एक जगह लिखा था की''क्या हुई जो सांझ निगल गयी''शब्द में इतने आदर,सम्मान,आमंत्रण और आशीर्वाद के छंद मिले की उन्हें पंक्तिबद्ध करने से ख़ुद को रोक नही सका और आज की शाम कुछ इस रूप में हाजिर हुं.आपकी बौधिक जुगाली का एक मात्र अंश बनने का आकांक्षी .......मनीष राज


डॉक्टर साहब, सांझ ने नही झूठ के आवरण में लिपटे सच और परिवेश के आदरणीय कठोड़,बर्बर,रूढ़,तथा कथित आडम्बरों की जीवंत प्रतिमाओं ने निगला है हम जैसे अंकुरित हो रहे नवंकुरों की कोमल पत्तीओं को अपने जड़ सिध्हंतो एवं बोझिल परम्पराओं के साथ मिलकर कुचला है हमे। आपके द्वारा निर्मित किए गए समाज,परिवेश और उनमें रहनेवाली उपेक्षित प्रजाति को शिद्दत से महसूस करते हैं हम,उनके दर्द,उनकी बेचैनी,उनका उत्साह,उनकी उद्दंडता ,उनकी हँसी,उनका रुदन,उनकी आशाएं ,उनकी निराशाएं,सबों की इन अनुभुतीओं से रोज साक्षात्कार होती है हमारी।



उनके जीए गए पलों की तासीर इतनी गहरी है की उनको उपेक्षित करने की कल्पना से सिहर उठती है आत्मा हमारी॥ कोर्पोरेट वर्ल्ड और एल्लो कल्चर को नंगा होते देखता हुं यहाँ जब ''मनुष्य'' की इस उपेक्षित प्रजाति की वेवाशी के करीब होता हुं,उनके नंगे बदन और भूख से बिलबिलाते याचना के स्वर में अपनी मज्बुरिओं के स्वर मिलाकर मुठिआं भींच कर रह जाता हुं । जब देखता हुं की ये उपेक्षित माँ परसौती गृह से निकले बच्चे को चावल का मांड पिलाकर पोषण देती है तो सारे कम्प्लान और होर्लिक्स की एड लाइनों की चमक फीकी दिखती है मुझे॥



झाड़ झंकड़ के धुएं को अपने कलेजे में भर कर हांफती माओं,चाचिओं को देख कर आपके देश का सेंसेक्स हांफता नजर आता है मुझे । मुझे पीपल के पेड़ के नीचे बैठे असहाय,वक्त के गुलाम बने ताश की पत्तीओं की उलट फेर में अपना भविष्य तलाशते युवाओं को देख कर ''रोजगार परक सरकार देने का वादा'' करने वाले नीति-नियंताओं के दोहरे चरित्र पर शक और जकड कर अपनी नींव मजबूत करता दिखता है मुझे॥



मुझे रोज आत्महत्या कर रहे किसान की जवान बेतीओं के मर्मस्पर्शी उदगार और उसके परिवार में बचे रह गए अबोधों की आंखों की गहराई में कुछ चुभते प्रश्न कलेजा चीर कर रख देते हैं जब देखता हुं गाँव का कोई दबंग हमारे घर से अपने बकरी के लिए घास धुन्धने गयी जवान बहनों को फानका बहियार में बाजार कर दबंगई ,मर्दानगी का नंगा नाच दिखाता है॥



आठ वर्ष के बच्चे को निम्मक,मिर्चाई के साथ तेरह रोतिआं गिलते देखता हुं तो पिज्जा,बर्गर के स्वाद पानी से फीके दिखते हैं मुझे। हगने,मुटने वाला पेंदी लगा लोटे जिसे अभी गली का कुत्ता मुंह लगा कर गया है में पूरे संतोख के साथ पानी पीनेवाले अपनों को देखता हुं तो एक्वागार्ड और हेमा मालिनी मुंह चिधाती नजर आती है मुझे॥



मैं देखता हुं रोज आपकी आतिश बाजिआं , आँखे फाड़ कर आपको देख रही इस उपेक्षित आबादी में से एक बहन का परिवार बस जाएगा आपकी बीयर की बोतलों के चियर्स से गिरने वाले श्वेत फेनों के पैसों से....


मैं रैली में पधारे नेताओं के चक चक सफ़ेद कुर्तों और आश्वाशन भरी बातों और धुल उडाती ,लैंड करती हवाई जहाज के घिर्निओं को नही,मेरी निगाहें हैली पेड पर चुना छिड़क रहे घुठो काका की मज्बुरिओं पर टिकती है और कह जाती है आपका खोखला सच......



मेरी आंखें हाजत में बंद रामेसरा को देखती हैं जिसकी माँ अभी भी कान में कडुआ तेल देकर गुज्जू निकालने का प्यार बरसा रही है,धोरी में तेल देकर पोश रही अपनी औलादों को जो भूख से लड़ते-लड़ते सहकर के दुकान में सत्तू चुराताआया पकड़ा गया ,अभी हाजत में माँ के सपनों को पुरा करने का अथक प्रयास कर रहे हैं हजारों हमारे जैसे उपेक्षित,वेवश युवा....

मैं रोज देखता हुं ,भुगतता हुं ,पलायन करते वेवाशों की टोली को,जो अपनों की पेट भरने आप सभी ,सुसंस्क्रितों ,धनवानों के चौखट पर मुडी बजारते हैं लेकिन हमे देश्ला कुत्ता समझ कर खदेड़ दिया जाता है और फ़िर हम आ जाते हैं वही जहाँ से चले थे अपनी भूख मिटाने .....अपनी प्यास बुझाने


मैं रोज गुजरता हुं आडम्बरों,अन्ध्विस्स्श्वासों और तुम्हारे पत्थर जैसी इरादों की तंग गलिओं से ,मैं रात के एक बजे तक ''जागो-जागो महादेव '' करती चीखती चिल्लाती आत्माओं की चीख को महसूस करता हुं तो सडकों की अतिक्रमण कर रही मंदिरों के सामने से गुजर रही आत्माओं को सिर झुकाते,,कुछ माँगते...कुछ फरियाद करते....अनवरत


मैंने भुगता है हर कदम पर दंश झेली है पीडा .....रोज भुगतता हुं,रोज झेलता हुं इन दर्द के ह्रदय विदारक क्षण को अभी भी जी कर आया हुं.....इस की बोर्ड पर थिरकती मेरी उंगलियाँ प्रत्यक्ष गवाह हैं मेरी तल्ख़ सच्चाईओं की की इन्ही हाथों से गोबर उठाकर, परा पारी को सानी पानी लगा कर ,इन्ही हाथों से आये हैं आप बुधिजीविओं ,विद्वानों की दुनिया में वक़्त के बेरहम कपाल पर अपनी उत्कट जीजीविषा और अभिलाषाओं की मुहर लगाने...
हम इन उपेक्षितों,अपनों की वेव्शी में शामिल हो जाते हैं ,उनके साथ हंस लेते हैं,उनके साथ गा लेते हैं,उनके साथ रो लेते हैं,लेकिन जब कभी अकेले होते हैं तो छलछला जाते हैं हम अपनी मज़बूरी के आगोश में जकड़े ''उपेक्षित''

हम आपकी गगनचुम्बी इमारतों में बन रही योजनाओं का हिस्सा नही बन्ना चाहते हैं,और न ही चाहते हैं की आप भद्र आस के बीच हास्य का पात्र बनाना या क्रंदन हृदय्वेधि चीख से आपकी सोई आत्माओं के दरवाजे को खुलवाना......
हमे चाहिए भी नही आपका संबल ,क्योंकि हमने अब अपना रास्ता खुद चुन लिया है ....वर्षों के अथक अनवरत परिश्रम और मंथन के बाद सृष्टि-सागर में मेरी तरह उपेक्षित पडी ''गाली'' का साथ मिल गया है हमें॥ हम महात्मा की संतानें हैं,बुधः की भूमि के उपज हैं ..अहिंसा से आपका ध्यान खीचेंगे अपनी तरफ....हमे गोलिओं का शोर पसंद नही..हमने देखा है हजारों मरती आत्माएं,अव्यक्त अभिव्यक्तीओं को इन गोलिओं के शोर में दबते देखा है हमने....
विद्वानों,जरा सुनो स्वतंत्रता का अतिक्रमण उछ्रिन्न्ख्लता है तो अहिंसा की हद गाली ही हो सकती है। आप बुध्हिजिवी ही तय करें ''गोली और गाली'' क्या हो उचित इस व्यवस्था से त्राण पाने के लिए ?

निश्चित ही संधिस्थल साबित होगी हमारी गाली तो बस इसी नजरिये से दीजिये न विमर्श को आधार ...प्रश्न बनाइये न '''गोली और गालीक्या हो विकल्प ? और जिस दिन गाली हमारी सामुहिक आवाज बन जायेगी विधान सभाओं क्या संसद की छाती पर चढ़कर,ताल थोक करअपने हक़ हुकुक को लेंगे हम कमीने,जलील,काहिल,उपेक्षित,हरामी,कुत्ते,भौन्सरी,जूठन,भादासी.....

हाँ ,हम उपेक्षित आबादी भादासी हैं

जे भडास जे यशवंत
मनीष राज बेगुसराय