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16.5.11

आदर्श स्थापित कर रही आदर्श घोटाले की जाँच-ब्रज की दुनिया

 

adarsh

मित्रों,वर्षों पहले की घटना है.वर्ष १९८७ में बिहार के तत्कालीन शिक्षा राज्यमंत्री स्व.अनुग्रह नारायण सिंह मेरे स्कूल राजकीय मध्य विद्यालय,बासुदेवपुर चंदेल में पधारे थे.कुछ फूले से,कुछ भूले से.कुर्सी की गर्मी सर-माथे पर चढ़कर बोल रही थी.मंत्री जी बार-बार एक ही शब्द का रट्टा लगा रहे थे.यह शब्द उनके दिलो-दिमाग पर छाया हुआ लगता तो नहीं था लेकिन मुंह से फिर भी बार-बार निकल रहा था.प्रत्येक पंक्ति में कम-से-कम एक बार और किसी-किसी पंक्ति में उससे भी ज्यादा मर्तबा.मंत्रीजी फरमा रहे थे कि हमें विद्यालय को आदर्श विद्यालय बनाना है और समाज को आदर्श नागरिक देकर आदर्श स्थापित करना है.मैं दर्शकों के बीच बैठा सोंच रहा था कि आखिर आदर्श होता क्या है?कर्मों की दृष्टि से भी पवित्रता बरतना या फिर खुद तो निषिद्ध कर्मों में संलिप्त रहना और दूसरों को आदर्श स्थापित करने की शिक्षा देना.           मित्रों,फिर आया १९९० का साल.लालू जी बिहार को आदर्श प्रदेश बनाने के वादे के साथ सत्तासीन हुए.उनके और उनकी अनपढ़ पत्नी के शासन में बिहार आदर्श प्रदेश तो नहीं बन सका लेकिन अनगिनत घोटालों का गवाह जरूर बना.चारा,अलकतरा,मेधा आदि जितने मंत्रालय उतने घोटाले.फिर मैंने सोंचा कि शायद राजनीतिज्ञों द्वारा आदर्श प्रदेशों का निर्माण ऐसे ही किया जाता है.
               मित्रों,लालू जी की पार्टी में एक नेता हुआ करते हैं श्री रघुवंश प्रसाद सिंह जो मेरे मामा लगते हैं.उनका गाँव मेरे ननिहाल जगन्नाथपुर के बगल में है,एक ही पंचायत में भी.मामा जी अपने गंवई अंदाज के लिए सर्वत्र जाने जाते हैं.उन्होंने गांवों को आदर्श बनाने की ठानी,केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री जो थे.फिर बड़ी संख्या में गांवों को आदर्श-ग्राम का पुरस्कार दिया जाने लगा.मेरे मन में उत्कंठा जगी देखूं तो आदर्श गाँव होते कैसे हैं?कई गांवों में घूमा,कोई बदलाव नजर नहीं आया;जो कुछ भी आदर्श था सब सिर्फ कागजात पर था.
             मित्रों,मेरे मन को फिर भी एक कमी खटक रही थी.अब तक व्यक्तियों,प्रदेशों और गांवों को तो आदर्श बनाया जा चुका था लेकिन घोटालों को आदर्श नहीं बनाया जा सका था.नामानुसार भारत के एकमात्र महान राज्य महाराष्ट्र के परम भ्रष्ट राजनेताओं,महाराष्ट्र सरकार के अति उर्वर मस्तिष्क वाले अधिकारियों और भारतीय सेना के सबसे ज्यादा देशभक्त कई-कई वीरता पुरस्कारों से सम्मानित अवकाशप्राप्त अफसरों की कृपा से यह भी बहुत ही जल्दी संभव हो गया.अचानक एक घोटाला सामने आया और देखते-ही-देखते सारे समाचार माध्यमों में छा गया;नाम था आदर्श सोसाईटी घोटाला.नाम से भी और काम से भी आदर्श.इन भाई लोगों ने देशभक्ति से सराबोर होकर निर्णय लिया था कि कारगिल के शहीदों के परिवारवालों के लिए मुम्बई के सबसे पॉश इलाके में एक शहरी सोसाईटी बनाई जाए,बहुमंजिली और गगनचुम्बी.जमीन सेना की,स्थान पर्यावरणीय और सामरिक तौर पर अतिसंवेदनशील.चूंकि मामले में अतिविशिष्ट लोगों की खासी अभिरूचि थी इसलिए फाइलें बुलेट ट्रेन की रफ़्तार में चलीं और टेबल-टेबल पर विभिन्न नियमों-उपनियमों की अवहेलना करती हुई चली.काम शुरू भी हुआ और ख़त्म भी.जब १५-१५ करोड़ रूपये बाजार मूल्य के फ्लैटों वाली सोसाईटी में लोग रहने को आने लगे तब पता चला कि ईमारत में से कारगिल के शहीदों के किसी परिवारवाले को तो कोई आवासीय इकाई मिली ही नहीं.महाभोज में जो कुछ भी मिला,भ्रष्ट नेता,सिविल अफसर और फौजी अधिकारियों के रिश्तेदारों को.
                  मित्रों,आनन-फानन में केंद्र और राज्य में ब्लैक मेंस बर्डेन संभाल रही कांग्रेस पार्टी ने अपनी छवि की क्षतिपूर्ति का काम शुरू कर दिया.मुख्यमंत्री को बदल दिया गया और जोर-शोर से सरकारी भोंपुओं द्वारा घोषणा की और करवाई जाने लगी कि इस आदर्श घोटाले की जाँच पूरी तरह आदर्श तरीके से करवाई जाएगी.फिर शुरू हुई आदर्श तरीके से जाँच.बारी-बारी से घोटाले की फाइलें विभिन्न सम्बद्ध विभागों से गायब होने लगीं.न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.जब फाइलें ही नहीं मिलेंगी तो सजा कैसे होगी और किसको होगी?ऊपर से केंद्र सरकार का कुत्ता यानि सी.बी.आई.अपनी आदर्श मजबूरी का रोना रही है.इस सरकार में मजबूर होना ही सबसे बड़ा आदर्श जो है,प्राप्य जो है.
                 मित्रों,आप अब तक समझ ही गए होंगे कि आदर्श सोसाईटी घोटाले की आदर्श जाँच का क्या आदर्श परिणाम निकलने वाला है.अंत में किसी भी आरोपी को सजा नहीं होगी और सभी लोग किसी आदर्श न्यायाधीश द्वारा आदर्श सुनवाई के बाद आदर्श तरीके से बाइज्ज़त बरी कर दिए जाएँगे.लालू राज में बिहार सरकार के सचिवालयों में बराबर शार्ट सर्किट हो जाने से आग लग जाया करती थी और शार्ट सर्किट भी होने के लिए उन्हीं विभागों को चुनती थी जिनमें घोटाला हुआ करता था.महाराष्ट्र में इस समय बिना आग लगाए घोटाले की फाइलों का निबटान किया जा रहा है.उस समय जहाँ लालू का सामना (सख्त ईमानदार)सी.बी.आई.के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यू.एन.विश्वास (जो इस बार पश्चिम बंगाल से विधायक बन गए हैं)से था जबकि आदर्श घोटालेबाजों के सामने केंद्र के अति आज्ञाकारी सी.बी.आई. अधिकारी हैं.इसलिए आग लगाने की कोई जरुरत ही नहीं.घोटाले की जाँच की कहानी,संवाद,संगीत और क्लाईमेक्स सबकुछ केंद्र सरकार द्वारा पूर्व निर्धारित है;इसलिए तो मेरे भीतर का कवि कहता है कि भाया जो होना है सो होगा रोता है क्या;आगे-आगे देखो होता है क्या?अभी भी बहुत से क्षेत्र आदर्श स्थापित किए जाने के इंतजार में लाइन लगाए खड़े हैं.देखिए उन उपेक्षित क्षेत्रों पर हमारे नीति-नियंताओं की कृपादृष्टि कब तक पड़ती है.

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