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27.12.08

दिव्य संतों के बारे में पढ़ना- लिखना क्या गलत है?


विनय बिहारी सिंह

कुछ भड़ासी मित्रों ने लिखा है कि क्या संत, महात्मा वगैरह की बातें ही होंगी भड़ास पर? मेरे दोस्तों क्या इतनी भी सहनशीलता हम सब में नहीं है। क्या धर्म, साधु- महात्मा, जीसस या नामदेव जी का नाम आते ही आपा खो देना और गुस्से में लिखना एक मात्र विकल्प है? मित्रों, सारे दिन हम जम कर काम करते हैं, लेकिन रात को थक कर अपने घर आते हैं और खाना खा कर सो जाते हैं। सोना अपराध नहीं है। नींद शरीर को नई ऊर्जा देती है। ठीक इसी तरह हमारे संत यूं ही नहीं पैदा हुए। उनका बहुत बड़ा योगदान है। वे हमें अपने अंदर झांक कर देखने की प्रेरणा देते हैं। हम अपने अंदर न झांक कर बाहर- बाहर ही झांकते हैं और दिन रात हलचल में रहते हैं। आप अपनी भड़ास निकालते रहिए। लेकिन दुनिया की बाकी हलचलें भी होने दीजिए। भड़ास पर धार्मिक विषयों पर लिखना कोई धंधा नहीं है। यह भी एक विचार अभिव्यक्ति है, जिसे आप भड़ास नाम दे सकते हैं। इसमें कोई बुराई तो नहीं भाई। मैं जो कुछ लिखता हूं, उसमें प्रेम और सौहार्द ही होता है। किसी संत ने क्या कहा। उसकी सार्थकता क्या है, यह कहने की इच्छा भी अपराध है? आप जो बहस करना चाहते हैं, करते रहिए। रोकता कौन है? महापुरुषों के बारे में अगर पढ़ना पसंद नहीं तो मेरे भाई, अन्य चीजें पढिए। कोई बात नहीं। पर कोई लिख रहा है तो उसके लिखने पर भी आरोप? कि क्यों यह सब धर्म- वर्म लिखा जा रहा है भड़ास पर? धर्म, अध्यात्म और जीवन या मृत्यु से अछूते हैं क्या हम सब? हम आए कहां से हैं और मृत्यु के बाद जाएंगे कहां? जरा ठहर कर सोचना भी गुनाह है मेरे मित्रों? क्या हम तनिक सहनशील नहीं बन सकते? आप सबको नए साल की अग्रिम बधाई।

4 comments:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

विनय सर जी मैं चुपचाप आपको निजी तौर पर अपनी बात बता रहा हूं कि आपके लेखों का मैं संकलन कर रहा हूं पर उन्हें भड़ास शैली में मत लिखियेगा। सब अपने चश्मे से दुनिया देखते हैं आप लिखते रहिये लोग आपको प्रेम से पढ़ते हैं।

यशवंत सिंह yashwant singh said...

मुंडे मुंडे मर्तिभिन्ना। विनय जी, जिन लोगों को ये उम्मीद है कि भड़ास पर बिना वजह एक दूसरे की मां बहिन करना जारी रहना चाहिए, उन्हें थोड़ी निराशा हो रही है क्योंकि ये तमाशाई लोग हैं जो बड़े मुद्दों पर जाने, उसके लिए जीने की बजाय दूसरों के झगड़ में अपने लिए मनोरंजन खोजते हैं। मैंने अभी गुरुदत्त जी की पोस्ट पर टिप्पणी लिखी है, उसी को यहां डाल रहा हूं, मेरे खयाल से ये पर्याप्त होगा मेरा स्पष्टीकरण।


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गुरुदत्त जी, आपने लिखा
-जैसे दारू के अड्डे पर जाकर भजन
-यह अंधो की बस्ती है, क्यों आइना बेचते हो
..इस पर मेरा कहना है...
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दोस्त, भजन दारू के अड्डे वाले ही गाते हैं क्योंकि दारू पीने वाला दुनिया के सबसे ईमानदार लोगों में से होते हैं, ऐसा मेरा मानना है। वे अपना नार्को टेस्ट खुद करते हैं, जो कुछ दिल में होता है बक बक कर देते हैं, जुबां पर भजन, गीत, गाना और पैरों में नृत्य, मस्ती और ठुनक होती है। जो बड़े संत हुए हैं वे दरअसल बिना पिए ही इस सहजता, नृत्य, भजन को पा जाते हैं लेकिन अगर दुनियादार पीकर भजन गाता है तो उसे भी संत माना जाना चाहिए। शायद, संतई की ओर बढ़ने की सीढ़ी है दारू का अड्डा।

रही अंधों की बस्ती वाली बात तो ये देखने वाले के नजरिए पर डिपेंड करता है। एक संत के लिए दुनिया माया मोह में लिपटी हुई अंधों की नगरी है और एक दुनियादार के लिए कोई संत फालतू किस्म का आदमी है। पर इन दोनों के बीच की भी एक प्रजाति होती है जो दुनियादार होते हुए भी संत होती है और संत होते हुए भी दुनियादार होती है। ऐसे संतों को फालोअर भले न मिलें, ऐसे संत चेहरा भले न रंगें और गेरुआ भले न पहनें लेकिन ये दिल से असल संत होते हैं। आज के जमाने में असल संतों को जान पाना ही सबसे बड़ी मुश्किल है क्योंकि असल संत कभी नहीं कहता कि वो संत है। वो तो अपनी मस्ती में जीता चला जाता है, अपने आंतरिक ऊर्जा के अनुरूप आगे बढ़ता चला जाता है। दुनिया कभी उसे बुरा कहती है तो कभी अच्छा लेकिन वो दुनिया के कहे की कभी परवाह नहीं करता। शायद ऐसी ही स्थितियों में इसा मसीह को सलीब पर लटका दिया गया और कई संतों पर ईंट-पत्थर मारे गए क्योंकि उन्होंने दुनियादारी के नियमों के तहत चलने की बजाय अपने दिल के कहे पर चले और जिए। ये कांट्राडिक्शन समाज कभी पचा नहीं पाता।

गुरुदत्त जी, मेरे खयाल से विनय बिहारी जी जो कुछ लिखते हैं उसे अगर पूरा पढ़ें तो आप निष्कर्ष निकालेंगे कि दरअसल जो संत हैं वो बिलकुल हमारे आप जैसे मनुष्य की ही तरह रहे लेकिन वो कभी दुनियादारी की गणित में नहीं पड़े। मनुष्यता के मूल संवेदना को जीते चले गए और एक समय बाद दुनिया ने उन्हें संत कहना शुरू कर दिया।

मैं आपको गलत नहीं कह रहा और न ही आपकी बातों को काट रहा हूं। सिर्फ आपने जो कुछ लिखा है, उसके अंतरविरोध को खुद समझने की कोशिश कर रहा हूं।

आभार के साथ
यशवंत

vinay bihari singh said...

मित्रों,
नमस्कार
आपकी टिप्पणियां अच्छी लगीं। आपका आभार। ठीक है, मैं भड़ास पर लिखता रहूंगा।
नए साल की शुभकामनाएं स्वीकार करें। बहुत- बहुत धन्यवाद मित्रों।
आपका - विनय बिहारी सिंह

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

विनय जी,
जय जय भड़ास,
आपके सुवचन से भडासी सुधरें और नए साल में भड़ास उन्नति करे की प्रार्थना के साथ
फ़िर से जय जय भड़ास