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5.6.11

भगवान को नहीं मानना ही फायदे का सौदा



Ugra Nath \ इनका यही दर्शन है

अभी आज ही भरास के एक पुराने व सीनिअर सदस्य का ब्लॉग भरास में देखा तो लेखक के विचारों का कायल हो गया. आप भी हो जायेंगे . यथा :

Friday, March 25, 2011

धर्म चिकित्सा /Religiopathy


* देखिये , सबसे बड़ी फिलासफी यह है कि कैसे अपने जीवन को स्वार्थ पूर्ण ढंग से सुविधा पूर्वक जिया जाये ? इसके आगे सारी फिलासफी फीकी है , और इसी को सब जी रहे हैं , पालन कर रहे हैं | फिर अन्य दर्शन शास्त्र की ज़रुरत क्या है , यह मेरी समझ में नहीं आता |

* मैं मूर्ख तो हूँ पक्का , इसमें कोई संदेह नहीं है | मैं ईश्वर को नहीं मानता ,जबकि देख रहा हूँ कि labia majora और labiaminora की संरचना कितने करीने से की गयीहै और इसी प्रकार आँख ,कान ,नाक दांत आदि की बनावट और उनकी आश्चर्य जनक कार्य प्रणाली |

*सबको yesman [यसमैन] चाहिए , जबकि मैं वसमैन हूँ |इसलिए मेरी किसी से नहीं पटती |

















पूरा लेख परहने के लिए लिंक पर जाएँ :


मैंने उन्हें जवाब लिखा , शायद आप भी उनके क्रांतिकारी विचारों का लाभ लेना चाहे

comments:

I and god said...

आदरणीय नागरिक जी,

मै आपके भगवान नहीं के विचारों से बरा सहमत हूं.

भगवान नहीं के विचार में बरा मज़ा है,


जब भगवान ही नहीं तो पाप-पुण्य का झगरा नहीं. बस इतना ध्यान रखना है संसारी जीवों से पकरे न जाओ.

चोरी करो, डाका मारो, खून कर दो, घर में ही माँ बहनों से रंगरेलियाँ मनाओ. क्योंकि इसको रोकने के लिए ही तो इन धर्म के ठेकेदारों ने भगवान का झूठा दरलोगों के दिमाग में डाला है.


आपके ही शब्दों में : सबसे बड़ी फिलासफी यह है कि कैसे अपने जीवन को स्वार्थ पूर्ण ढंग से सुविधा पूर्वक जिया जाये ? इसके आगे सारी फिलासफी फीकी है , और इसी को सब जी रहे हैं , पालन कर रहे हैं | फिर अन्य दर्शन शास्त्र की ज़रुरत क्या है ???

काश सारी दुनिया इन धर्म के ठेकेदारों के चुंगल से निकल कर मौज करे . न पाप , न स्वर्ग न नरक. बस एक ही दर है कि जैसे हम अपने घर में ही अपनी माँ बहनों से रंगरेलियां मानाने के लिए स्वतंत्र हैं , ऐसे ही और लोग भी होंगे , पर इससे क्या फर्क परता है , पाप-पुण्य तो है ही नहीं.

आपका
अशोक गुप्ता

.ए

5 comments:

Ugra Nagrik said...

shok Gupta Ji, main bhagwan ke man ne walon ki kargujariyon se bahut vyathit hoon | Aisa nahi ki naastik jan nirmal hi honge , par jab wahi sab karna hai to dharm aur ishwar ki kya zaroorat ? ya, yun kahen ki iske liye Ishwar jaisi satta ko badnam kyon karen ? Fir mool darshan to yeh hai hi ki Manushya ka sukh sab me pramukh hai | dharm bhi isee ka vayda karte hain |
baharhal apne parha , us par comment kiya , Aapko bahut dhanya vaad.Is vishay par main apne link par "Dharm-Karm" sheershak se likhta hun | Manushya ke mansik star ka utthaan mere uddeshya me hai |Aage aap jaisa uchit samjhen |mrea Email hai - priyasampadak@gmail.com
Honestly yours'- ugra nath nagrik

Ugra Nagrik said...

maine likha tha - Manya Ashok gupta Ji |Par jane kaise kuchh ansh kat gaya ,kshama karen |

https://worldisahome.blogspot.com said...

कुछ प्रतिक्रिया मेरे ब्लॉग पर आई हैं , मैन उन्हें भी भरास परिवार से शेयर करना चाहता हूं. यथा :


Dr. shyam gupta said...
सही कहा ---प्रचीन युग में भगवान नहीं था कोई मां बहन भी नहीं कोई नीति-नियम रोक-टोक नहीं....जब अनाचार दुराचार से भयानक रोग, द्वन्द्व, अत्याचार प्रारम्भ हुए तो विग्य लोगों ने सर्वशक्तिमान भगवान व उसके डर की ईज़ाद की...बस भग्वान की यही महत्त है...अगर वे नागरिक जन पाषाण-युग में जाना चाहते हैं तो ठीक है....

June 5, 2011 8:45 AM


I and god said...
आदरणीय डा साहिब.

अच्छा हुआ अब भगवान नहीं ग्रुप में आपको देख कर.

अब इस ग्रुप में नागरिक जी , मुझे और आपको मिला कर तीन व्यक्ति हो गए.

इस ग्रुप का यही लाभ है कि इसके सदस्य अपनी माँ , बहिनों से भी रंग रेलिया मनाने के लिए स्वतंत्र हैं.

इन मस्तिओं में आपका स्वागत है .

June 5, 2011 9:22 AM

https://worldisahome.blogspot.com said...

माननीय नागरिक जी,

आप और हम और डॉ श्याम गुप्ता , भगवान नहीं, यह मनुष्य की इजाद है, समाज को डराने के लिए, इस क्लब के मेम्बर हैं.

हम लोग अपनी माँ , बहिनों से रंगरेलियां मनाने के लिए स्वतंत्र हैं.

मुझे कितना अच्छा लग रहा है. हमारे ऋषिवर चार्वाक को कोटिशः प्रणाम है .

Ugra Nagrik said...

Good hai | maine comments ko chav se parha | Hum manushya ke swatantra vivek aur vyaktitva ke paksh me himayat karte rahenge | Ab dekhna hai hum ,Ashok aur shyam gupta ji kaisa , kya-kya vyavhar karte hain ? Fir jab Hari ka hamne aavishkar kar hi liya hai ,aur hari ikchha balwan hi hai , to hum kar hi kya sakte hain ?