Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

23.1.08

बाहुबलियों का विध्वंसकारी रूप!!

देश के लोकतंत्र की बागडोर जब सत्तालोलुप एवं विध्वंसक प्रवृत्तियों के स्वामी बाहुबलियों के हाथ में हो तो जनता का लहू बहना निश्चित है।
हमलावर: बघरा विधानसभा सीट से विधायक पंकज मलिक के समर्थक (तथाकथित)
स्थान : मुज़फ़्फ़रनगर और जडौदा नारा रेलवे स्टेशन के बीच।
निशाने पर: 372 हरिद्वार दिल्ली पैसेन्जर ट्रेन मे सवार आम यात्री तथा ड्राईवर।
मुद्दा : राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना पर बहस: विधायक- डीडीओ से मारपीट।

आज दोपहर करीब 2 बजे 372 हरिद्वार दिल्ली पैसेन्जर सवारी गाडी पर
विधायक समर्थकों द्वारा जम कर पथराव किया गया।
हमलावर साथ ही साथ विधायक के समर्थन में नारे भी लगा रहे थे।
हमले में करीब 3 यात्रीओं के सिर फ़ूट गये और 7-8 यात्री पत्थर लगने से घायल हो गये।
ड्राईवर केबिन पर भी हमला किया गया गया जिसके चलते ड्राईवर केबिन के
शीशे चकनाचूर हो गये, खुद ड्राईवर अपने हाथ पर पत्थर लगने से घायल हो गया।
घटना के बाद गाडी़ करीब १ घंटा लेट चली, मेरठ पहुंचते पहुंचते ड्राईवर की
हालत बिगडने के कारण दूसरे ड्राईवर को बुलवाकर ट्रेन आगे भेजनी पडी।
एक ओर जहां रेल यातायात बाधित हुआ वहीं दूसरी ओर आम यात्रियों के चेहरों
पर खौफ़ नज़र आ रहा था। एक के बाद एक धडधडाकर खिडकियां बंद होती चलीं गईं,
माओं ने अपने बच्चों को अपने सीने से सटा लिया।
बडी मुश्किल से मै अपने आप को इन दंगईयों के पथराव से बचा पाया।
रेल, बस एवं पब्लिक यातायात के अन्य साधन अराजक तत्वो के
लिये एक आसान सा साफ़्ट टार्गेट बन चुके हैं।
इन साधनों को जब चाहे तब कोई ना पार्टी समर्थक फ़ूंक देते हैं, पत्थर बाज़ी करते हैं।
आप ही सोचें वोट देते समय जनता का (हमारा) विवेक
और अक्ल कहां घास चरने चली जाती है। बाद में हम सभी पछताते हैं।
समझ नही आता, इस प्रकार के विरोध, या प्रदर्शन न्यायपालिका की दृष्टि में किस
प्रकार से देखे जा सकते हैं या देखे जाते होंगे?
क्यों नही इन असामाजिक तत्वों को चिह्नित कर, उन पर कार्यवाही की जाती?
अपने विरोध को दर्ज कराने के और भी न्यायसंगत तरीके हैं,
क्यों लोग देश की व्यवस्था को बिगाडने पर आमादा हो जाते हैं?
उम्मीद है, कि चुनाव आयोग कुछ ठोस कदम उठायें जिससे कि
आपराधिक पॄष्ठ्भूमि वाले व्यक्तियों का राजनीति में प्रवेश रोका जा सके।
धन्यवाद...
अंकित माथुर...

२० लाख का suchna kaa अधिकार.........खुलासा


सूचना के अधिकार महज एक दिखावा ....... अब बहुत हुआ ....इस अधिकार का उपयोग kya आपने कभी किया है ...क्या है अधिकार ? अपनी राय हमें दे क्या है २ लाख और सूचना के अधिकार का सच ......मेरा बिल आया है २ लाख क्या यही था सूचना का अधिकार...... जल्द लौट रहे है --सूचना के अधिकार महज एक दिखावा ....... 20

22.1.08

ठेल-पेल के पढ़ाने वाले ब्लागरों से बचाइए...फुलझरियां--पार्ट वन

ब्लागिंग करते हुए दरअसल हम लोग एक पूरी दुनिया को जीते हैं। उसमें ढेर सारे अनुभव, खट्टे-मीठे, प्यारे-न्यारे होते हैं। मेरे कुछ निजी अनुभव भी हैं। लेकिन इस दुनिया में निजी क्या है, कुछ नहीं। अगर निजता इतनी ही पसंद होती तो भड़ास क्यों निकालता। दरअसल भड़ास तो निजता का ही सार्वजनिक प्रदर्शन होता है। तो ब्लागिंग की फुलझरियों का पहला पार्ट पेश करते हुए मुझे अपार हर्ष महसूस हो रहा है.....। कृपया कोई बुरा न माने। होली बस अब आगे ही है। पढ़ें और मजा लें....
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इन दिनों कुछ ज्यादा ही प्रमोशनल मेल आने लगे हैं। और तो और, अपने कुछ ब्लागर साथियों ने गजब ढा रखा है। पोस्ट लिखी नहीं कि तुरंत प्रमोशन में जुट गये। जीमेल स्टेटस मैसेज पर हेडिंग व लिंक दे मारा। उसके बाद एक मेल बनाया जिसमें अपने ब्लाग व उस पोस्ट का लिंक डाला और एक बड़े ग्रुप को सेंड कर दिया। उसके बाद कई लोगों को मोबाइल से एसएमएस भी कर दिया। बाप रे....धांय धांय फायरिंग। और जिनको ये गोलियां लग रही होंगी, उनका क्या हाल होगा, इस पर बिना विचारे वो फायरिंग में लगे हैं।

ऐसी ब्लाग प्रमोशनल मेल में न उपर लिखा है न नीचे, सिर्फ बीच में पोस्ट का लिंक।
अब लीजिये, साहब। इन्होंने तो पेल दिया, अब आप सब कामधाम छोड़कर इसे क्लिक करिये और पढ़िए।
पहले तो दो चार लोग ऐसा करते थे, अब देख रहा हूं कि ये संख्या आधा दर्जन तक पहुंच गई है। अपने ब्लाग को प्रमोशन देने, हिट बढ़ाने व लोकप्रिय बनाने के लिए अपने ब्लागर भाई लोग जी-जान से जुटे हैं पर वे भी तो ध्यान रखें कि ऐसे प्रमोशनल मेल किसी ब्लागर को न भेजें, वो तो इसे देखते ही जलभुन जाता है, भुनभुनाता है... मुवां मेरा तो पढ़ता नहीं, अपना पढ़ाने के लिए पेले रहता है।

एक दिन तो गजब हो गया। एक सज्जन जिनसे मैंने कभी चैट नहीं किया, कभी मेल पर बातचीत नहीं हई, कभी मिले नहीं लेकिन वो एक सीनियर ब्लागर हैं, एक अच्छा और चर्चित ब्लाग चलाते हैं, ने एक दिन चैट की खिड़की से मेरे घर के आगे दरवाजे पर अपने ब्लाग की नई पोस्ट की हेडिंग के बाद उसका लिंक चेंप दिया। पीली रोशनी लुपलुपाने लगी, चैट वाली।

मैं भौचक..मन ही मन बुलबुलाया... न दुआ न सलाम। बस सीधे बता दिया काम। स्वार्थी कहीं के। लिंक डाला और चलते बने, ये भी नहीं कहा कि यशवंत जी, पढ़ लीजिेयेगा। समझ क्या रखा है अपने आप को और मुझे। खुद को साहब और अपन को चेला समझ रखा है। बड़े आए.....। इस बार तो छोड़ देता हूं, पहली बार है, आगे से ऐसा किया तो खबर लूंगा।

और वो दिन भी आ गया जब उन्होंने आगे भी ऐसा कर दिया, ज्यादा दिन बाद नहीं बल्कि अगले ही दिन। उन्होंने अपनी नई पोस्ट का यूआरएल बजरिये चैट के दरवाजे मेरे आगे चेंप दिया, साइड में चैट की पीली रोशनी लुकलुकाते हुए मुझे चिढ़ाने लगी, जैसे लगा कि वो ब्लागर महोदय पीली रोशनी के रूप में वेश बदलकर आए हों और अपना लिंक देते हुए आंख मिचकाते हुए मुंह चिढ़ा रहें हों.....

मुझसे रहा न गया, मैंने तुरंत लिखा... who r u and what is this?

थोड़ी देर बाद चैट वाली पीली रोशनी फिर लुकलुकाई- नमस्कार, मैं फलां... आपने पहचाना नहीं, आपके ब्लाग पर एक बार कमेंट लिखा था।

खुद के मुंह पर पड़ रही पीली रोशनी को मैंने हरी में तब्दील कर दिया और उनकी ओर जवाबी पीली रोशनी पेल दी......

ओह, सारी, दरअसल आपका नाम अगड़म बगड़म सा आ रहा था, इसलिए पहचान नहीं पाया।

उधर से पीली रोशनी संदेश लाई...कोई बात नहीं

मैं जलभुन गया....क्यों नहीं कोई बात है। आप ब्लाग क्या लिख रहे हैं, दूसरों को उंगली करने में लगे हैं। भइया, लिखा तो ठीक अब उसे दूसरे के कंप्यूटर में हाथ डालकर उंगली करते हुए बताने की क्या जरूरत कि लो पढ़ो, ये लिखा है। इतने महान लेखक होते तो दिनभर आपके ब्लाग को खोले न बैठा होता। मैं आपके ब्लाग से पोस्ट को ईमेल के रूप में सब्सक्राइब न कर लेता। ....भई, छोड़ंगू नहीं आपको, रुकिए, पीली रोशनी फेंकता हूं...

मैंने लिखा...आप अपनी पोस्ट ठेल के, पेल के पढ़वाते हैं, है ना?

पीली रोशनी इस बार कुछ यूं उस तरफ गई कि वो भी पीले पड़ गए, कोई जवाब नहीं। मैं थोड़ा ज्यादा सक्रिय हो गया, इससे पहले कि पीली रोशनी उधर से आए, मेरे को चिढ़ाए, उस तरफ इतनी पीली रोशनी फेंक दो कि पहले तो वो बेहोश हो जाएं, दूसरे होश में भी आएं तो उन्हें मेरी ओर पीली रोशनी फेंकने का होश न रहे।

मैंने दनादन टाइप करना और इंटर मारना जारी रखा...आजकल ढेर सारे लोग ईमेल से अपने ब्लाग पढ़वाने में लगे हुए हैं। लेकिन उन लोगों को ये समझना चाहिए कि अगले आदमी भी ब्लाग लेखक हैं, वो अपना लिखें, पढ़ें, पढ़ाएं या इन इमेलियों का पढ़ें। ब्लागिंग वैसे ही समय खाता है, ये इमेलिये ब्लागर तो जान खाये हैं।

लगा, मेरी भड़ास निकल गई और उस तरफ पीली रोशनी ने अब तक काम कर भी दिया होगा। और वाकई, उधर से मेरी ओर कोई पीली रोशनी चैट के दरवाजे से नहीं आई। और वाकई, उन साथी ने उसके बाद आज तक उंगली करके पढ़ाने की, पेल-ठेल के पढ़ाने की जहमत नहीं उठाई। धन्यवादी साथी।

(पार्ट टू में कुछ और फुलझरियां होंगी....इंतजार करिये)
जय भड़ास
यशवंत

एक i-candy यह भी

मेरठ से फ़िलहाल एक ही बच्चा अख़बार नीकल रहा है .मेरा मानना है की यह अख़बार बच्चा है या बचकाना
पर है खासा खुराफाती .इस ठंड भरे मौसम में आँखों के लीये आइसक्रीम लेकर नमूदार होता है .सौन्दयँ की आइसक्रीम बेचने वालों का मानना है की i-candy अख़बार बेचने के लीये जरूरी है ।
मेरा सुझाव है की जब तक ठंड का प्रकोप जारी है इसे i-candy के स्थान पर टी या काफी फॉर
आई कहना शुरू कर दें .भाई लोगों आपका क्या कहना इस बारे में ?

चजई - गहराई इतनी कि गहराई भी शर्मा गई


बाजार बेजार होकर करता रहा हुआं हुआं
सोमवार को बाजार हुआ सब कुंआ कुंआ

सेंसेक्स भारत का हो गया है धुंआ धुंआ
गिरा है रिलायंस भी कहता फिरे कलमुंहा

सोम को शेयर तांडव मचा गया हाहाकार
सब चिल्लाते रहे निकला नहीं चीत्कार

शेर कोई रहा नहीं गीदड़ सब शेर हुए
गीदड़ भी बचे नहीं वे भी अब ढेर हुए

नंदीरा भी नहीं बचा मंदी की चपेट से
धूल सारी चाट गया चढ़ा शेयर बाजार

खट्टा लगने लगा बना रहा है चटपटा
औंधे मुंह पसर गया अब रहा सटपटा

गहराई इतनी कि गहराई भी शर्मा गई
जोर से गिरा था धड़ाम आवाज आ गई

सोमवार को बज गया बाजार का बाजा रे
आने वाला भूचाल कहीं नजर नहीं आया रे

दिल्ली मे अश्लील पार्टिया .........खुलासा

क्या आपने दिल्ली की वो पार्टिया देखी है जहा पर लड़कियों के बीच एक लड़का अपने जिस्म के नुमाईश करता है .....जी हां ब्लोगों की दुनिया मे पहली बार दिल्ली का सच .....वो सच जो बेहद शर्मनाक है दिल्ली यानी बिंदास सबसे तेज़ .....इतनी तेज़ की मर्द और औरत ,परिवार ,बहन , सारे रिश्ते ना सिर्फ बदबू दार लगते है बल्कि ....??
दिल्ली ..दिल्ली बोले तो पूरे हिन्दुस्तान के परिभाषा अब बदल गई है ....कुछ दिन पहले एक सज्जन से मुलाक़ात हो गई ....दिल से बेहद खुश ..कारण पूछा ..........तो पता चला कि वो स्थरीपर पार्टी के लोग है ..हम आगे बडे इससे पहले आप बता दीजिए क्या आप ने bhee यह नाम पहली बार सुना है ?
ये पार्टिया ना तो आप और मेरे जैसे लोगो के लिए है और ना ही ही है उन लोगो के लिए जो अपनी सभ्यता को सीने से लगाए हुए है
इन पार्टियों मे लड़किया शराब और जिस्म का उपभोग करते है वो जब तक करती जब तक उनका स्त्रीपर यानी वो आदमी जो उनके लिया बुलाया गया है ....बुलाने का खर्चा कम से कम २५ हजार रूपए .... इसके लिए आपके पास होना चाहिए सिर्फ और सिर्फ एक शानदार जिस्म .
.जिसकी नुमाईश और प्यासों को ख़त्म करने की शक्ति आपके अन्दर होनी आवश्यक है ............
पार्टी की शुरुआत रात के तकरीबन १२-२ के आस
रात के तकरीबन २ बजे के आस पास नशे में धुत एक जबरदस्त ब्लू फिल्म का सीन ....और सामने तकरीबन ६०-७० महिलाये और साथ मे मौजूद सिर्फ एक लड़का
मजबूत कद -काठी वाला लड़का --- लेकिन शक्ल मानो कुछ होने वाला हो ? तभी सभी लड़किया एक के बाद उस लड़के पर टूट पड़ती है
आख़िर क्या है ये पार्टी ? क्या है इनका सच ?
सभी लड़किया कुछ देर बाद अपने कपडे उतार कर फेकने लगी और फिर हुआ एक नए खेल की शुरुआत ....लड़का बेहोशी के आलम मे था .... पार्टी रात भर इसी कदर चलती रही ...अमीरों की यह पार्टी आपको केसी लगी
आप हमें जरुर बताए .............क्योंकि दिल्ली मे बड़ी आग है ........

गोविन्द -गोविन्द कर उठे,मार लिया मैदान

आपने गुरु अशोक चक्रधर जी के ब्लोग पर एक कविता गोविंदा प्रकरण पर देख मेरे अन्दर का कवि भी जाग पर। मैंने भी उनकी तुकबंदी पर कुछ पंक्तियाँ लिख दी।... विनीत

गोविन्द -गोविन्द कर उठे,मार लिया मैदान
टीवी की टीआरपी में,सांसद हुये बेजान।
सांसद हुये बेजान,रजत शर्मा से की बात
दी अपनी सफ़ाई,सोचा मैंने दे दी मात।
गुरू चक्रधर,चेले ने मिलायी तुकबन्द
सही तो वाह्-वाह्,नहीं तो झापड देना रसीद।

21.1.08

अबे, सुन बे, ओ लड़कियां, दीदी जी, हरामी साले को

तुमको सुनता हूं
पढ़ता हूं
तो अट्टाहस करता हूं
तरस खाता हूं तुम पर
हम मर्द हरामी के,
कितना समझदार हो गए हैं
सोचते हैं रोज, हर रोज
हरामीपने के तोड़
और तुम हो कि
बस, वही जीती रहती हो
अपनी खोल में
सती सावित्री से लेकर
नीलिमा, घुघूती, मनीषा
प्रेमिका, दोस्त, पत्नी
बीवी, भाभी, बहन...
जो भी हो तुम लोग
लेकिन बहुत पर्सनल
होती हैं तुम्हारी बातें
सरेआम होते हुए भी
जीती रहती हो अपने
दर्द, और अपनी दुनिया में
कितना गैप है तुममें और हममें
मेरी जान ताकि
तुम लोग भी खुल के
निकाल सको अपनी भड़ास
अपने किसी भड़ासी मंच पर
बिना रोये, बिना बताये
साफ साफ,सहज, सरल, तरीके से
कि कहती कि हां, मैं....
तुम कुत्तों में से
किसी एक के साथ भी
रहने के कायल नहीं
क्योंकि तुम हो जो
लड़ते समझते हो
ना जाने किन मुद्दे
विषयों, हरामजदगियों
सूअरपनों, कुत्तेपनों को
और हम लोग हैं
जो हमेशा कहते
बोलते आते हैं कि
हम लोग जो हैं
सो हैं, समझो
पर.....
पता नहीं तुम लोग
और हम लोग में
इतना गैप है कि
अगर कभी पाटने की कोशिश करो
तो खुद मैं चिल्ला उठूंगा
क्या कर रही हो तुम सब
चुप, बंद, बस करो....

शायद....
इस गैप को पाटने
न पाटने के बीच
के बीच की जन्मी है ये खाई
क्योंकि तुम छायावादी लोग हो
और जो होती हो क्रांतिकारी तो
तुम औरत होने के काबिल
नहीं कही जाती

बावजूद इसके कहना चाहूंगा
कि बनाओ सब औरतें
एक कामन ब्लाग
अनाम नाम से
और गाओ
अपनी मस्त धुन
बिना मस्त कमेंट पाने
और चाहने की इच्छा के बगैर
ताकि ढेर सानी अनाम लड़कियां
जी सकें कई जनरेशन से आगे
ये मानते हुए
कि वे हो गई हैं
बराबर इन कुत्तों के
जिनके अगल बगल उन्हें
उठना बैठना जीना खाना पड़ता है
.......
.......
........
......


((शायद मैं अपनी बात कह नहीं पा रहा हूं, माफ करें औरतें, और गरियायें मर्द....सालों कि परवाह न करना....जय भड़ास.....यशवंत))

"कुत्ते अब पीछे से काटतें हैं....!"

"आज मैंने देखा एक अफसर का कुत्ता उसी जैसा हों गया साला...... साला काटता भी है तो पीछे से हरामी गुप्ता का कुत्ता जो ठहरा ...!"
भाई....सार्वजनिक जगह पे इस तरह बात मत करो..दुबे .....?
क्यों न करूं तुम् को सुनना नहीं हों कान में रुई डाल लो पर मुझको अपनी बात कह लेने दो ।
उस दिल जले की बात को मैं अन सुना सा कर रहा था । किन्तु सुन भी रहा था वो एक अज़नवी को अपनी भड़ास सुना रहा था .....इस तरह....
"भैये ...मेरा अधिकारी है न साला इतना नीच है कि ..पीछे से ज़हर उगलता है हरामी काट भी लेता है "
"अच्छा...?"
साले ने वर्मा जी की नौकरी चाट ली और उसके घर निकल पडा मातम पुरसी करने
वर्मा जी कौन ...?
मेरे ऑफिस मे डिप्टी-मेनेजर थे । इस कमीने गुप्ता ने उसे बेईमान प्रूफ़ किया और निकलवा दिया । वो तो वर्मा जी एम्.बी.ए. हैं कहीं भी चिपक जाएंगे पर इसका कमीनपना देखो । इसके बाद दुबे ने गिन के 100 गालियाँ दे डालीं गुप्ता को । दुबे, गुप्ता, वर्मा, वगैरा हर ऑफिसों में उपलब्ध करैक्टर है ......दुबे सीनियर क्लर्क और मैं [जो शुक्ला हों सकता हूँ ]कालूराम दरबान को डाग-बाईट के बाद लगने वाला इंजेक्शन लगवाने आए थे ।दरबान को बोंस के कुत्ते ने काट लिया था । वो भी पीछे से ....!
अफसर को गरियाने दुबे जी ने जिस तरह कुत्ते के बदले चरित्र को आधार बनाया मुझे लगा पोस्ट कर ही देना चाहिए ।
Dr.Rupesh Shrivastava जी मेरी इस पोस्ट को दिल पे ले बैठे ..... भाई मैं तो कुत्तों में पनपती बुरी आदतों से दु:खी हूँ ..... कुत्ता मेरे लिए अति महत्वपूर्ण है । अब सुबह से शाम तक मुझे कुत्तों में आदमीयत के अतिक्रमण की पीडा का शूल चुभता है। मेरा दरद न जाने कोय....?
डाक्टर रूपेश भाई साहब ने अपने अंतस में एक कटखने कुत्ते के होने की बात कह कर मुझे भावनात्मक रूप से ब्लेक-मेल कर गए... सो
"हे.....सौनकादी मुनियों .......मुझसे कल भगवान ने पूछा कि मांग मुकुल क्या मांगता है.....
मैंने अगले जन्म में मुझे वही बनाना जो " Dr.Rupesh Shrivastava के अंतस में है .....
प्रभू कह गए मुझसे ....तथास्तु ........!

"ढीठ शिरोमणि"

कल मुंबई में पांचवीं स्टैन्डर्ड चार्टर्ड मैराथन दौड़ हुई ,३३००० लोगों ने हिस्सा लिया । भारत का सबसे बड़ा खेल इवेन्ट बनाने के लिये खूब धन खर्च किया गया । हममें से बहुत सारे मुम्बईकरों को मुम्बईकर होने का गर्व है । लेकिन मैं ठहरा पनौती प्रसाद तो हमेशा गन्दी जगह ही नजरें जाती हैं । मुंबई में है एशिया का सबसे बड़ा वेश्या बाजार कमाठीपुरा, एशिया का सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी, एशिया का सबसे बड़ा पशु कत्लखाना देवनार ; मैंने पढ़ा था कि जिस जगह पर यह "स्लाटर हाऊस" है उस क्षेत्र का नाम था गोवंदे और हाट का नाम था देवनगर ;समय ने दोनो को बदल दिया गोवंदे हो गया गोवंडी और देवनगर हो गया देवनार । मैराथन का मार्ग इन जगहों से अलग रखा गया कि कहीं लोग रुक कर इनके बारे में न सोचने लगें । देश को तो मनोरंजन की जो अफ़ीम लगी है उसकी पिन्नक में यह सब दिखता नहीं और मुझे दिखता है तो खब्ती मान लिया जाता है । लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ता अगर ढिठाई के लिये कोई पुरुस्कार हो तो मेरा नाम भेज कर देखो और अगर न होता हो तो यार आप लोग ही "ढीठ शिरोमणि" या "ढीठ रत्न" से नवाज़ दो । जय भड़ास...........

अंतर्मन की कांव-कांव

"मीडिया से संपादकीय नैतिकता की उम्मीद नहीं करनी चाहिये" । यथार्थ का आज दिखने वाला चेहरा ऐसा ही है लेकिन पत्रकारिता के प्राण बसते हैं नीतिगत जीवन मूल्यों में । यह आभासी सत्य उन लोगों को अपने प्रभाव में ले सकता है जो कोई रोजगार विकल्प न होने की मजबूरी में इस "राम-रोज़गार" में आ गये होंगे । अगर सत्यतः पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो उसे हर हाल में नैतिक होना ही पडे़गा वरना न्यायपालिका ,कार्यपालिका और विधायिका अनैतिक हो जाएं तो पत्रकारों को क्या हक है छिद्रान्वेषण कर दोष निकाल कर उछल-कूद करने का ? क्रांति शब्द इतना डरावना नहीं है कि सुनते ही ’खली-वली’ होने लगे । रचनात्मक परिवर्तन ही मेरी पत्रकारिता का लक्ष्य है । जहां एक ओर ९९% मुम्बई का मीडिया मैराथन के कवरेज के लिये दौड़ रहा है वहीं मैं महासनीचर ठहरा ,गया ही नहीं । मैं समाज की मुख्य धारा से कटे हुए लोगों से बातें करता रहा ,मनीषा से मिला और उनकी पीड़ा को समझा (मनीषा लैंगिक विकलांग हैं लोग इन्हें यक्ष ,गन्धर्व ,किन्नर ,वानर न जाने क्या-क्या कहते हैं पर इन्सान सा नहीं मानते ) । हम और हमारे जैसे लोग तो परिवर्तन के लिये संघर्ष करेंगे चाहे कुछ भी कीमत चुकानी पड़े । बहुत लिखा जा सकता है लेकिन जैसे जैसे कलम आगे जायेगी उबाल बाहर आएगा और फिर बात विवाद के रूप में आ जायेगी । सभी भड़ासी बन्धुओं से एक हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि जिन पत्र-पत्रिकाओं ने देश में पत्रकारिता को जना है यदि उनकी प्रतियां मिलें तो जरूर पढि़ये तथा तब की और आज की परिस्थितियों में तुलना करियेगा । मेरी नजरों में तो रतौंधी और दिनौंधी दोनो है शायद इसीलिये कुछ बदलाव नहीं दिखता । वे पत्र-पत्रिकाएं हैं -
उदन्त मार्तन्ड ,बंगदूत ,प्रजामित्र , सामदन्त मार्तन्ड ,समाचार सुधावर्षण ,भारत मित्र ,उचितवक्ता ,सारसुधानिधि ,बिहार बन्धु , हिन्दी बंगवासी ,मतवाला ,न्रसिंह ,वैश्योपकारक ,देवनागर ,हरिश्चंद्र पत्रिका , हिन्दू , हिन्दी केसरी ,हिन्दू पंच वगैरह-वगैरह । याद रखिए कि इनमें रणभेरी ,चण्डिका ,डंका , क्रांतिघोष जैसे नाम नहीं लिखे हैं ।
फिर बताइए कि अगर मैं ऐसा हूं तो इसमें मेरा क्या दोष है । फिर कहूंगा जो मेरे गुरूदेव कहते हैं पत्रकार के लिये "पतनात त्रायते इति पत्रकारः" ।

भड़ास और भास्‍कर

19 जनवरी को दैनिक भास्‍कर के दिल्‍ली संस्‍करण में भड़ास की चर्चा देखकर मन खुश हो गया। मैंने तो पढ़ लिया अब आप पढ़कर खुश होएं। पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

आशीष महर्षि, मुंबई

आज कुछ नहीं लिखूंगा

सोच रहा हूँ आज कुछ न लिखुं, क्योंकि जब कुछ लिखने की सोचता हूँ तो क्या लिखूं, क्यों लिखुं, कब लिखूं, कहां लिखू ,कौन पढ़ेगा, कौन आगे बढ़ेगा जैसे सवाल दिमाग में आकर पहले ही से खराब दिमाग को और खराब कर देते हैं इसलिए आज कुछ नहीं लिखूंगा। आज कुछ नहीं लिख कर ही अपनी भड़ास निकालुंगा।वैसे भी भड़ास तो कोई न कोई कहीं न कहीं,कभी न कभी, किसी न किसी पर निकालता ही रहता है और भड़ास निकाल कर भड़ासी बनता है आज कुछ न लिखकर किसी भड़ासीकी निकाली हुई भड़ास को ही अपनी भड़ास मान लुंगा। यदि किसी भड़ासी का भड़ास पर कापीराइट हो तो कृपया पहले ही बता दे क्योंकि जिस तरह से कुछ नही लिखूंगा उसी तरह से कुछ रायल्टी भी नहीं दूंगा क्यों अरे भाई मेरी मर्जी। यदि मांगी तो फिर भड़ास निकालूगा पर दूंगा नहीं नही आज कुछ लिखूगां। हां यदि कोई अपने कमेंट देना चाहता हो तो ले लूंगा । ले सब लूंगा चाहे गाली ही क्यो न हो वैसेभी हमारे कुछ भड़ासी साथी गाली बहुत अच्छी देते है। सोच रहा हूँ एक गाली नाम से क्यों न एक नया ब्लाग ही शुरु किया जाये । बैसे आज कुछ लिखने का मन नहीं है । भड़ासी भाई माफ करें।
जय भड़ास
अजीत

मांसाहीरी ध्यान दे

कृपया इसको जरुर देखे

क्या आप भी दलाल है ??




सभी भड़ास परिवार को अपने आशीष का नमस्कार ..........नया आया हूँ इसीलिए गलतियों होना लाजिमी है 21 वी शताब्दी यानी अपना हिंदुस्तान वो हिंदुस्तान जो रुकना नही जानता ...जो जानता है सिर्फ और सिर्फ भागना .....उसकी रफ़्तार इतनी तेज़ कि मानो अपना भी पीछे छुट जाये ..सवाल उठता है कौन सा हिन्दुस्तान गाँधी वाला या फिर शाहाबुदीन वाला .......अम्बानी वाला या फिर पश्चिम बंगाल वाला जहा पर रोटी आज भी नाराज है सिर्फ एक तबके से ..यह वो तबका है जिनकी संख्या सबसे ज्यादा है .......खैर यह दिमाग भी पगला हे .....बार -बार भूल जाता है की पत्थर अब नही बोलते ...........जी हां जनाब एक वक़्त था जब हर बोलता था बल्कि उस दौर मे हर कोइ चीख रहा था ....पुरा हिन्दुस्तान इतनी तेज़ चीखा की अंग्रेजो ने जाते जाते कह दिया हार गए हम /वो दौर था जब पत्रकारों की परीक्षा थी वो दौर फिर आ गया है अपने लिए ....क्योंकि आज हमारे दुश्मन हम खुद है .....एक नज़ारा अपने हिन्दुस्तान के नए पेशे का ...

.दलाली..............................................................................जी हां जबाब ...दलाली देश....के चौथे स्तंभ की .......पत्रकारिता का हर वो नुमाईन्दा जो कहता है मज़बूरी है दोस्त ...रोटी तो खानी है ...एक हिन्दुस्तानी होने के नाते देश कि त्रासदी को समझे ... पश्चिम बंगाल मे महिलाओं के साथ सरेआम बलात्कार और फिर हत्या...... विदर्भ मे ज़हर खाते किसानों के परिवार ....... क्या यही है अपना हिन्दुस्तान ?????? आख़िर कहाँ है गाँधी का भारत ??सवाल यही उठता है कि आखिर किस गली जा रहे है हम ??
ने भी नही सोचा था सब कुछ बिकेगा इस देश मे ---अगर आप अब भी समझ नही पा रहे तो चिंता मत कीजिए ---

मैं आप को दलाल नही कहूंगा ---आप तो पत्रकार है -पत्रकारिता करते है देश के लिए --- ---
ये शब्दों की दुर्गन्ध उन लोगो के किये है जो बोलते है हम पत्रकार तो है पर समाजसेवक नही ....सोचो जनाब आप कौन है ? अपने दिल से पूछना ना की दिमाग से ? क्योंकि उसने धक्-धक् करना बंद कर दिया है ---

आप अपनी राय हमें जरुर दे-

20.1.08

कुत्ते आसमान में उडेंगे

कुत्ते आसमान में उडेंगे
इंसान सिर्फ पैदल चलेंगे
उनके भौंकने की भौंक
अब ज़मीन पर सुनाई
देगी नहीं,
ध्वनि पर्दूशण
न दिखाई देगा
न सुनाई

अब आसमान में
कुत्ते हवाई ज़हाज़
के पीछे दौडेंगे
चेनल वाले उनके
फोटू खींचेंगे

टी वी पर कुत्ते
नेताओं की जगह
ज़ोर लगाकर भौंकेंगे.

युंग ब्लड

मीडिया की दुनिया में एक जुमला खूब सुना-सुनाया जा रहा है .जब भी किसी अख़बार में भर्ती शुरू होती है तो यही
कहा जाता है की हमे तो यंग ब्लड ही भर्ती करने हैं .भाई, यह मालिक लोग और संपादक रक्त पीने वाले dracula
हो गए हैं क्या ?

गर्व से कहो, नहीं जानते हिन्दी

संघनक का मतलब है सनग्लास, व्ऑय फ्रैंड, कैलकुलेटर या फिर फैक्स मशीन और दूरभाष यंत्र का मतलब होता है स्पीड पोस्ट, लेटर य़ा फिर ब्लैकबोर्ड।
हिन्दी का ज्ञान बढाने के लिए चैनल [ v] पर एक प्रोग्राम आता है- वीआईक्यू। वीजे लोगों से किसी हिन्दी शब्द का मतलब पूछता है जैसे लौहपथगामिनी और जिसमें ज्यादातर लोग सुनकर ठहाके लगाते हैं, लड़कियां व्हॉट बोलती है, मुंह बनाती है या फिर उपर जैसा लिखा है, उस तरह कुछ भी बोल जाती है। लड़के भी ऐसा ही करते हैं। इस तीन से चार मिनट के कार्यक्रम में आपको अंदाजा लग जाएगा कि चैनल किसी भी तरह से लोगों का हिन्दी के प्रति ज्ञान नहीं बढ़ा रहा या बढ़ाना चाह रहा है बल्कि हिन्दी के नाम पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है जिसे कि हिन्दी बोलने वाले भी लोग इस्तेमाल नहीं करते। अब आप ही बताइए न, हममें से कितने लोग सिगरेट को धूम्रदंडिका बोलते हैं।
किसी के नहीं बताने पर वीजे उसका अर्थ बताता है।अच्छा हिन्दी का मतलब नहीं जानने पर किसी को संकोच, शर्म या फिर उदासी नहीं आती कि वे भारत में रहकर हिन्दी नहीं जानते। इसे वे स्टेटस के तौर पर लेते हैं कि उन्हें हिन्दी नहीं आती। यू नो आई मीन बोलकर उनका काम चल जाएगा। तंगी के दिनों में मैंने कॉन्वेंट के कई स्टूडेंट को हिन्दी की ट्यूशन दी है। पहले ही दिन उसकी मां या फिर खुद वो बड़े ही गर्व से बताता कि हिन्दी में थोड़ वीक है लेकिन बाकी के पेपर में तो....जीनियस। मतलब ऐसे समझाए जाते कि बाकी पेपर में जीनियस होने या फिर कुछ कर गुजरने के लिए हिन्दी में वीक होना जरुरी है।मिडिल क्लास या फिर लोअर मिडिल क्लास में जाइए और आप पूछें कि आपका लड़का किस क्लास में है तो पहले बताएंगें, इंगलिस मीडियम में है और फिर क्लास। मैं कोई एमपी सरकार का आदमी नहीं हूं कि हिन्दी, संस्कृत और साथ में सरस्वती वंदना आप पर लाद दूं लेकिन इस मानसिकता को बढ़ावा देना कि अगर आप हिन्दी नहीं जानते तो आप हाई सोसाइटी से विलांग करते हैं और इससे आपके मिडिल क्लास में होने की सारी विडम्बनाएं खत्म हो जाएगी, सरासर गलत है। आप बोलिए न अंग्रेजी, कौन मना कर रहा है, मत बोलिए हिन्दी। लेकिन हिन्दी ज्ञान के नाम पर आप हिन्दी की ही लेने पर क्यों तुले हैं। आपकी औकात है तो फिर वीटीवी या फिर एमटीवी को अंग्रेजी में चला क्यों नहीं लेते। अपने को शहरी और इलिट बताने के लिए ये जरुरी है क्या कि आप हिन्दी के टिपिकल शब्द खोज कर लाएं जो कि प्रैक्टिस में भी नहीं है और इमेज बनाएं कि ऐसी होती है हिन्दी, हार्ड, कोई समझ ही नहीं पाएगा आपकी बात और फिर कोड़े बरसाने शुरु कर दें। ये तरीका ठीक नहीं है। आप हिन्दी भाषा के प्रसार के लिए कुछ कर नहीं कर सकते तो रहम करके उसकी गलत छवि बनाने का खेल न करें।

भइया की विदाई

विनोद शुक्ला। लखनऊ। दैनिक जागरण। हिंदी पत्रकारिता। जी हां, बात कर रहे हैं लखनऊ दैनिक जागरण के सर्वेसर्वा रहे विनोद भइया की। प्यार से लोग भइया कहते हैं। एक दोस्त ने सूचना दी कि उन्होंने सक्रिय मीडिया जीवन से विदाई ले ली है। ऐसा बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी वजह से। अब जीवन के उत्तरार्ध में नई पारी शुरू करेंगे।

पहले पहल तो विश्वास नहीं हुआ। कहीं, यह खबर भी उसी तरह की अफवाहों की तरह तो नहीं जिसमें पत्रकारिता के तमाम बड़े लोगों को लेकर गाहे बगाहे बातें बनाई या फैलाई जाती हैं। बाद में एक और वरिष्ठ साथी से कनफर्म किया तो उन्होंने कहां कि हां, ये बात सच है। एक सादगी भरे समारोह में उनके चाहने वालों और उनसे जुड़े लोगों ने उन्हें भावभीनी विदाई दी।

मैं एकदम से खुद के उस दौर में पहुंच गया जब मैं लखनऊ में पहुंचा था, नौकरी करने। बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स पूरा ही किया था तब। अनिल यादव जी ने अपने यहां रहने, खाने और जीने का मौका दिया था। तब कई अखबारों में फ्री लांस लिखने के साथ साथ नाटक वगैरह भी किया करता। बाद में जब नौकरीर करने का इरादा किया तो कहीं बात बनती नहीं दिखी। तब अपने बड़े भाई और गार्जियन सरीखे अनेहस शाश्वत ने रुपये दिये, ताकि दूसरे शहरों में अखबारों के दफ्तरों में जाकर ट्रेनी की नौकरी खोज सकूं। पर हर जगह निराशा हाथ लगी। फिर लखनऊ लौट आया।

बाद में गिरीश मिश्रा जी की वजह से दैनिक जागरण, लखनऊ में 1500 रुपये की ट्रेनी की नौकरी मिली। वहां लगभग आठ महीने रहा लेकिन उतने ही दिनों में अखबार के अंदर के काम का जानकार बन गया। खबर बनाने, अनुवाद करने, पेज लगवाने से लेकर एडीशन निकालने तक। गिरीश मिश्रा जी, वंदना दीदी, विष्णु त्रिपाठी, प्रदीप मिश्रा, हेमंत तिवारी....लंबी लिस्ट है, जिनसे उन दिनों कामकाज करना सीखा।

उन्हीं आठ दस महीनों में विनोद भइया के व्यक्तित्व व उनकी उपलब्धियों से रूबरू हुआ। किस तरह लखनऊ में दैनिक जागरण को शून्य से शिखर पर पहुंचाया और एक ऐसा ट्रेंड व स्टाइल बनाया जिसे दूसरे अखबार फालो करने के लिए बाध्य होते। लखनऊ और आसपास के जिलों में कई दशकों तक नंबर वन पोजीशन बनाए दैनिक जागरण की सफलता का श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को जाता है तो वो हैं विनोद भइया। दबंग व प्रभावशाली व्यक्तित्तव, उतने ही मानवीय, रीयलिस्टिक, तीखी समझबूझ वाले, विजुलाइजर.....। ढेरों बातें कहीं की जा सकती हैं उनके बारे में। मैनेजमेंट का गुण कोई उनसे सीखे, पत्रकारिता की समझ कोई उनसे सीखे, प्रोडक्ट को बेचना और नंबर वन बनाना कोई उनसे सीखे, आम आदमी की संवेदना और स्टाइल को कोई उनसे समझे, न्यूज की परिभाषा कोई उनसे सुने.....।

जब मैं आईनेक्स्ट कानपुर में था तो उनसे दोबारा मिलना जुलना हुआ। बिलकुल साफ विजन व फंडे वाले। कहीं कोई कनफ्यूजन नहीं। संपादकीय, प्रसार, मार्केटिंग, बिजनेस.....हर विभाग पर अद्भुत पकड़। नेतृत्व क्षमता ऐसी कि वो आफिस में हो या न हों, सब कुछ उन्हें पता चलता रहता था।

सत्ता से जब टकराये तो उसे झुका के माना। जो चीज चाहा, उसे हासिल किया। जब गुस्साये तो ऐसे कि सामने वाला जितना बड़ा हो, उसे उखाड़ने में लग जाते। जब कृपालु हुवे तो ऐसे कि तुरंत सड़क से शिखर तक पहुंचा दिया.....।

हर आदमी में कमी होती है, उनमें भी है। पर वो कमियां उनकी सफलताओं के शतांश भी नहीं। जब कोई ऊंचाई पर जाता है तो उसके प्रशंसक भी होते हैं और आलोचक भी।

आज जब उनकी विदाई की सूचना मिली तो मुझे लगा, कि उनको जरूर भड़ास की तरफ से नई पारी के लिए शुभकामनाएं दे देनी चाहिए।

आप भड़ासियों में से कई लोग ऐसे होंगे जिन्होंने विनोद भइया से सीखा होगा, उनके नेतृत्व में काम किया होगा, उनकी बदौलत पत्रकारिता में आगे बढ़े होंगे। मैं चाहूंगा कि विनोद भइया से जुड़े अपने संस्मरण भड़ास पर जरूर डालें ताकि उस व्यक्तित्व की उपलब्धियों को पूरी दुनिया के सामने लाया जा सके।

जय भड़ास
यशवंत

डाक्टर साहब, भड़ास वाकई क्रांति का मंच नहीं है

अपने बेहद सक्रिय भड़ासी साथी हैं डा. रुपेश श्रीवास्तव जी। क्रांतिकारी, बेबाक और बेलौस। बिलकुल अपन लोग माफिक हैं। धांय धांय कमेंटियाते हैं। बराबर पोस्टें पढ़ते रहते हैं। जहां अच्छा लगा, तो कमेंट में अच्छा लिख दिया, जहां बुरा लगा तो कमेंट में बुरा लिख दिया। मैं इन्हें बेहद पसंद करता हूं, इसलिए कि वे वाकई मन से भड़ासी हैं। जो कुछ है उगल दो, लल्लो-चप्पो नहीं करना। यह अंदाज़ ही तो भड़ास का है।

पर डाक्टर साहब ने भड़ास से बहुत ज्यादा उम्मीदें पाल ली हैं। उम्मीदें उन्हीं से पाली जाती हैं जो उस लायक होते हैं, सो डाक्टर साहब का उम्मीद पालना गलत नहीं है पर मैं चाहता हूं कि कुछ सच्चाइयों का बयान डाक्टर साहब के सामने कर दूं, भड़ास के पैदा होने, उसके मरने और फिर पैदा होकर छा जाने के बारे में। और थोड़ी सी बातें इसके भविष्य की दशा-दिशा के बारे में भई।

लेकिन उससे पहले मैं डा. रुपेश जी के कुछ कमेंट यहां पढ़ाना चाहूंगा, जिससे भड़ास के बारे में उनकी चाहत, उनकी उम्मीद, उनकी त्वरा का पता चलता है..
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मैंने एक पोस्ट लिखी, जल में रहकर मगर से बैर, उसमें मैंने कहा था कि चूंकि हम सब हिंदी मीडियाकर्मी किसी न किसी मीडिया हाउस में काम करते हैं इसलिए हमें भड़ास पर लिखते वक्त मीडिया हाउसों को सीधे निशाने पर लेने से बचना चाहिए ताकि किसी साथी की रोजी रोटी न प्रभावित हो, जो वहां काम कर रहा है और भड़ास से जुड़ा हुआ है। दूसरा, अखबारों में दिखने वाली छोटी मोटी गलतियों को भी नजरअंदाज करना चाहिए, उसे भड़ास पर नहीं डालना चाहिए ताकि जिस साथी से यह गलती हुई हो उसके लिए नौकरी से हाथ धोने जैसी स्थिति न आ जाए क्योंकि गलतियां इंसान ही करता है, कंप्यूटर नहीं। और अगर आप काम करेंगे तो गलतियां होंगी ही, गलतियां सिर्फ उनसे नहीं होती, जा काम नहीं करते। तीसरी बात लिखी थी कि भड़ास क्रांति का मंच नहीं है, यह सिर्फ भड़ास निकालने के लिए है ताकि हम दिल और दिमाग से स्वस्थ, कुंठामुक्त रहें। इस पर तीन प्रतिक्रियाएं आईं, दो मेरी बातों के पक्ष में, तीसरी डाक्टर साहब की जिन्हें लगता है कि क्रांति का मंच बनना चाहिए भड़ास को। तीनों टिप्पणियां पढ़िए..

Gulshan khatter said...

यशवन्त जी आप ने सही सोचा इन्सान गलतीया करता रहता हे! ओर इस का यह भी मतलब नही की किसी की थोडी सी गलती को बडाचडा कर उस को नीचा दिखाया जाये! एसा कोई भी मोका ना दे की कोई भी एरागेरा भडास मच पर उगली करे ओर कहे की अपनी टीरपी के लिये भडास एसा लिखता हे
Friday, January 18, 2008 9:45:00 PM


Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,मैं हठधर्मी कदापि नहीं हूं किन्तु सच तो यह है कि पत्रकारिता पूंजीवाद के प्रभाव में जिस प्रकार सकपकायी सी दिखती है क्या आप उसे नकार सकते हैं ? जब २३ अगस्त १९२३ को पहली बार मेरे एक पत्रकार पूर्वज स्व.मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला",बाबू शिवपूजन सहाय और प्रेस मालिक महादेव प्रसाद जी ने एक पत्र निकाला जिसका नाम "मतवाला" था तब भी यही परिस्थितियां थीं इसीलिये मुंशी जी ’भूतनाथ तेल’ की कंपनी मे मैनेजरी करते थे ,वे जानते थे कि कब खाने के लाले पड़ जायेंगे नहीं पता । आपकी तबियत कुछ नरम है क्या जो ऐसा लिख रहे हैं ,ऐसा मत करिये वरना भड़ास का नाम फटास हो जाएगा। जिसमें दम होगा वह जुड़ेगा वरना निकल लेगा और क्रांति क्यों न होगी ? जो अपनी कमियां नहीं देख सकते उनकी भड़ास तो भौं-भौं ही होगी ।
Friday, January 18, 2008 9:54:00 PM


laa, hamau aa gaylee... said...
yashwant sir, jai badhaas. main aapse sahmat hoon.akhbaar to galtiyoun ka saahitya hi kaha jata hai, aur galti to insaan se hi hoti hai. jo koi mahanubhav ne bhadhaas per galti bataakar galti ki hai kya unke sansthaan me galti nahi hoti. mera anurodh hai bhadhaas per sirf bhadaas nikale galti nahi.
Sunday, January 20, 2008 2:07:00 AM


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मैंने एक पोस्ट लिखी हां, अगर पत्रकारिता करने का यही अंजाम है तो मैं मरना चाहता हूं-शीलेश त्रिपाठी, इस पर डाक्टर साहब बेहद उत्साहित नजर आये और उन्होंने कुछ यूं अपनी बात रखी...

Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आज फ़िर आपकी तबियत ठीक हो गयी है जो आपने शीलेश की पीड़ा को बताना शुरू किया वरना दो दिन तो आप बीमार हो गये थे और पानी में रह कर मगर से बैर ना करने की सलाह देने लगे थे । भड़ास के पीछे आपकी क्रांतिधर्मी सोच ही है जो हमारे जैसे लोगों को भड़ास से जोड़े हुए है वरना ये कोई उगालदान नहीं है कि आया और उल्टी करके चल दिया । हम सब राष्ट्र के प्रति रचनात्मक सोच ही तो रखते हैं और अगर यह किसी को बुरा लगेगा तो उसकी किसे परवाह है फ़ाकाकशी में जी लेंगे पर ऐसे लोगों के आगे सिर न झुकाएंगे । जस्टिस सिंह को भी मत भूलिए वह मामला तो न्यायपालिका का है इस लिहाज से अधिक संवेदनशील है ।
जय भड़ास...........


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इससे पहले एक पोस्ट लिखी थी, शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एकजुट हैं, इस पर डाक्टर साहब ने कुछ यूं खुशी जाहिर की.....

Dr.Rupesh Shrivastava said...
दादा,आपका गुस्सा ही पत्रकारिता की ऊर्जा है । ठीक ऐसी ही घटना देश की न्याय प्रणाली से जूझते हुए जस्टिस आनंद सिंह की है । आपके पत्रकारिता के तेवर आद्य पत्रकार स्व. पराड़कर जी की याद दिलाते हैं । मैं हर हाल में आपके संग हूं ,शीलेश का मोबाइल नंबर भड़ास पर दे दीजिएगा ताकि सब मिल कर इन हरामियों की औकात उन्हें याद दिला सकें ।


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मेरी एक अन्य पोस्ट, टीवी न्यूज चैनल की पायल, अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद और लखनऊ के पत्रकार शीलेश, इस पोस्ट पर डा. रुपेश भाई ने प्रोत्साहन देने वाली ये टिप्पणी दी...

Dr.Rupesh Shrivastava said...
आदरणीय दादा,आपको किन शब्दों में धन्यवाद करूं समझ नही आ रहा ;आपने जस्टिस आनंद सिंह की फोन करके खबर ली तो अब लग रहा है कि आशा की किरण नहीं बल्कि साक्षात तेजस्वी मार्तन्ड भगवान मार्ग दिखाने प्रकाश लेकर आ गए हैं । न्याय पालिका , कार्य पालिका और विधायिका को अब पत्रकारिता सही रास्ता दिखाएगी और न चलने पर कान खींच कर बाध्य भी करेगी । मैं अनुग्रहीत हूं आपके इस अनौपचारिक प्रेम से , प्रणाम स्वीकारिए .....................


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मैं यह साफ कर दूं कि तारीफ मुझे भी अच्छी लगती है, और खासकर कोई आदमी जिनुइन तारीफ करे तो और भी ज्यादा। डाक्टर साहब के शब्दों में सहजता, सरलता और सच्चाई है। उनके प्रोत्साहन का मैं आभारी हूं। पर यहां मैं इन टिप्पणियों को इसलिए उद्धृत कर रहा हूं ताकि इससे पता चल सके कि डाक्टर साहब समेत कई सारे भड़ासी साथी भड़ास से क्रांति के मंच के रूप में जो उम्मीद लगाये हैं, उस पर बहस की जा सके।

उपरोक्त टिप्पणियों पर अब मेरी टिप्पणी....

डाक्टर रुपेश जी, आपकी बातों का मैं सम्मान करता हूं और कद्र करता हूं। लेकिन मुझे लगता है कि इस दौर में जब बाजार चीजें निर्धारित करने की भूमिका में है, और हर प्रोडक्ट की तरह मीडिया हाउस भी ज्यादा लाभ कमाने के लिए प्रसार और टीआरपी पर जोर दे रहे हैं, उनसे किसी सामाजिक बदलाव की कल्पना करना बेमानी है। इसी तरह जब प्रोडक्ट और मीडया हाउस का लक्ष्य तय है तो वहां जो साथी काम करते हैं, उनकी भी दिशा वही होगी। उन्हें अपने मीडिया हाउस के लक्ष्य के साथ खुद को एकाकार करके काम करना होता है, सो वो पत्रकारिता मिशन के तहत करने की मंशा की बजाय एक नौकरी करने और उसमें बेहतर परफारमेंस देकर ज्यादा पैसा और बड़ा पद पाने की इच्छा रखते हैं। और ये इच्छा रखना पाप नहीं क्योंकि हम सब आम लोगों की तरह ही हैं, कोई देवता या भगवान या क्रांतिकारी विजन से लक्ष्य हार्डकोर कार्यकर्ता नहीं। हर मां बाप की तरह हमारे मां पिता ने भी सपना देखा है कि हम बड़े पद पर जाएं, ज्यादा पैसा कमाएं, बच्चों की अच्छी शिक्षा दिलाएं, सो अगर इसके लिए हम नौकरी करते रहना चाहते हैं, और नौकरी करते रहने के लिए जो फंडे अपनाये जाते हैं, उसे अपनाते हैं, तो गलत क्या है।

तीसरी बात, आजादी के दिनों में जिन पत्रकारों ने अपने व्यक्तित्व और कलम के जरिये आजादी व सच्चाई के पक्ष में चेतना पैदा की, अखबारों को क्रांति का हथियार बनाया, वो लोग उस दौर की डिमांड के तहत कर रहे थे। वे दरअसल सच्चे अर्थों में आजादी के सिपाही थे, क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपना हथियार कलम को बनाया। और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार बंदूक को बनाया, और भी क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपना हथियार अहिंसा और आंदोलन को बनाया। ऐसे में उन दिनों के मीडिया हाउस, जो कि हाउस बने भी नहीं थे, शुरुआत भर थे, का लक्ष्य पैसा कमाना नहीं बल्कि आजादी दिलाना था। आजादी के बाद इन अखबारों, घरानों ने अपने लोकप्रिय व प्रभावकारी पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करते हुए खुद को काफी बड़ा संस्थान बना लिया और बाद में देश में बदलाव की बयार में बहते हुए खुद को धीर धीरे बाजार के अनुकूल बदलने लगे। अब जो मीडिया हाउस हैं, उनका लक्ष्य प्रसार और टीआरपी में नंबर वन बनना है ताकि इसके जरिये वे रेवेन्यू और बिजनेस में भी नंबर वन बन सकें।

मैंने भड़ास पर ही पिछले दिनों एक लेख लिखा था, आज के दौर में मीडिया से संपादकीय नैतिकता की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, इस लेख को क्लिक कर जरूर पढ़ियेगा, आपको यह लगेगा कि दरअसल आज की मीडिया से हम लोगों ने जो अपेक्षाएं पाली हैं, वो वास्तविकता की धरातल पर नहीं बल्कि भावनात्मक जरूरत के लिहाज से है, और यह गलत भी नहीं है। पर दूसरे पक्ष की हकीकत को भी समझना चाहिए वरना हम लोग दीवार में सिर टकराते रहेंगे।

एक बात और, भड़ास की जो शुरुआत की गई थी, वो इसकी पंचलाइन से जाहिर है कि गले में अटकी बात उगलने के लिए ही की गई थी ताकि मन हल्का हो सके। और वो दिशा आज भी प्रमुख दिशा है। चूंकि भड़ास प्रमुख तौर पर हिंदीमीडियाकर्मियों
का मंच है तो जाहिर सी बात है कि हम लोगों कि ज्यादातर भड़ास मीडिया और सिस्टम और मानवता से जुड़ी होती है।

तीसरी बात, हम लोग जो कुछ पहल कर रहे हैं, वो चाहे न्यायाधीश अंगद सिंह का मामला हो या पत्रकार शीलेश त्रिपाठी का, इसके पीछे सिर्फ इतना भर है कि चूंकि हम लोग एक बेहतर मनुष्य भी बने रहना चाहते हैं, संवेदनशील प्राणी हैं, मीडिया से जुड़े हैं सो इतना फर्ज अगर नौकरी करते निभा लिया जाय जिससे किसी परेशान व्यक्ति की मदद हो जाये तो इसे करने में कोई दिक्कत नहीं है। हम भड़ास मंच के जरिये ऐसे सामाजिक और मानवीय काम करते रहेंगे लेकिन इससे यह अंदाजा लगाना कि भड़ास एक क्रांतिकारी मंच या संगठन है, गलत होगा। यह उम्मीद करना कि भविष्य में पूंजीवाद, मीडिया हाउसेज, सत्ता आदि की खामियों को उजागर करते हुए उनसे निपटने की मुहिम शुरू की जायेगी, सरासर नाउम्मीद करने वाला है। चूंकि हम इस सिस्टम के पार्ट भी हैं, उनके लिए उनके लक्ष्य के हिसाब से काम भी करते हैं सो इनके खिलाफ जाने का सवाल ही नहीं उठता। दिलीप मंडल जी के शब्दों में कहें तो लाला के पैसे से क्रांति नहीं होती। क्रांति के लिए आपको अपने संसाधन बनाने पड़ते हैं, जनता के बीच में जाना पड़ता है, चौबीसों घंटे समाज और देश के लिए निकालना पड़ता है।

भड़ास क्रांति का मंच नहीं बनेगा तो ऐसा भी नहीं कि इस देश में क्रांति नहीं होगी। पारंपरिक मीडिया को आइना दिखाने के लिए और उसकी कमियों से मुक्त होकर न्यू मीडिया भी आ गया है जिसमें ब्लागिंग भी एक पार्ट है। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी ढेर सारी क्रांतिकारी पार्टियां, लोग, एनजीओ, संगठन आदि जनता के बीच सक्रिय हैं जो उन्हें बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मतलब, क्रांति करनी है तो फिर क्रांति के वास्तविक मंचों की शिनाख्त की जानी चाहिए। अवास्तविक मंच से उम्मीद करने से ऊर्जा और समय ही नष्ट होगा। मैं निजी तौर पर उपरोक्त क्रांतिकारी मंचों, संगठनों, पार्टियों, न्यू मीडिया प्लेटफार्मों का कभी कम तो कभी ज्यादा, कभी सक्रिय तो कभी निष्क्रिय समर्थन देता रहता हूं। और यह कार्य ढेर सारे मेरे आप जैसे लोग कर रहे हैं।

भड़ास को उगालदान मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, भड़ास को फंटास मानने या संडास मानने में भी कोई दिक्कत नहीं, भड़ास को बकवास मानने में भी मुझे कोई दिक्कत नहीं। हम भड़ासी औघड़ लोग हैं, सूफी लोग हैं, बिंदास लोग हैं जो अपनी आलोचनाओं को अपना आभूषण मानते हैं। क्योंकि जो साहस कहकर सच बोलता है उसे हमेशा से तमाम तरह की उपाधियों से विभूषित किया जाता है। कहीं भी कुछ उगलेंगे तो दूसरों को अरुचिकर लगेगा ही और वे अपनी प्रतिक्रिया किसी न किसी रूप में व्यक्त करेंगे।

तो साथी रुपेश जी, ये जो बहस है, वो हमारे आपके बीच की नहीं बल्कि एक ट्रेंड पर बहस है जिसे एक तरफ आप तो दूसरी तरफ मैं प्रकट कर रहा हूं। आपके साथ ढेर सारे साथी आप जैसे विचार वाले होंगे और मेरे साथ ढेर सारे साथी मेरे विचार वाले होंगे। और इसका मतलब यह भी नहीं होता कि अगर मेरे साथ ज्यादा साथी हुए तो मैं जीता हुआ मानूं या आपके साथ ढेर सारे साथी हों तो आप जीता हुआ मानें।

भड़ास की खासियत यही है कि यहां शंकर जी की बारात है। मुंडे मुंडे मर्तिभिन्ना। हर विचारधारा, संपद्राय, पेशे, उम्र, सोच के लोग यहां हैं, इसलिए किसी पर किसी को अपनी सोच थोपनी नहीं चाहिए। मैं भी अपनी सोच नहीं थोप रहा। मैं केवल भड़ास की हकीकत को बयान करने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि हम सभी पौने दो सौ भड़ासियों का भड़ास को लेकर विजन क्लियर रहे।

भड़ास क्या है, इस बारे में भड़ास में ही बाईं तरह के हिस्से में, भड़ास क्या है शीर्षक से ठीकठाक साइज में इंट्रोडक्शन लिखा है, उसका एक अंश यहां दे रहा हूं, इसमें भड़ास के मकसद का साफ साफ व्याख्यायित किया गया है। यह एक तरह से भड़ास के दशा-दिशा के लिए बेसिक गाइडलाइन की तरह है---

हम सहज, सरल और बिंदास लोग हैं जो जिंदगी को पूरी गंभीरता के साथ-साथ पूरी सहजता व मस्ती के साथ जीते हैं। हर तरह की वैचारिक, भाषाई व जातीय-धार्मिक भेदभावों को भुलाकर हम सब सिर्फ हिंदीवाले हैं, दिलवाले हैं और हमेशा हिंदी का झंडा ऊंचा करेंगे। ज़िंदगी के किसी मोड़ पर या किसी क्षण में भड़ास आपके काम आ जाए, आपका मनोबल बढ़ाए, आपके एहसास को सब तक पहुंचा पाए, यही इसका मकसद है।


डाक्टर साहब, आपसे भले नहीं मिला हूं पर दूर से ही, आपके विचार व तेज देखकर मैं आपका प्रशंसक बन गया हूं, आप जैसे लोग अगर इस देश में हैं तो हम जैसे लोग जरूर अच्छे काम के लिए प्रेरित होते रहेंगे। उम्मीद है कि मेरे और आपके बहाने जो बातें हुई हैं उससे ढेर सारे लोग इस बहस को आगे बढ़ाने के लिए सोचेंगे और अपनी सोच से हमें आपको अवगत करायेंगे।

जय भड़ास
यशवंत

दैनिक भाष्कर में भड़ास----अच्छे-अच्छे सूरमाओं के लिए खतरे की घंटी

...इस ब्लाग का मूल मंत्र है अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिये, मन हल्का हो जायेगा। इसके बैनर पर यही वाक्य लिखा हुआ है। हालांकि महज इसी बात के लिए शुरू किया गया यह ब्लाग कहने को तो फिलहाल हास्य-व्यंग्य के किसी भी ब्लाग की तरह नजर आता है लेकिन आगे चलकर यह अच्छे-अच्छे सूरमाओं के लिए भी खतरे की घंटी साबित हो सकता है क्योंकि भड़ास की सूली पर कब-कौन लटका हुआ पाया जाएगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। इसके अलावा मीडिया की दुनिया में कौन कहां चला गया है, ये खबरें भी इस ब्लाग पर काफी बहुतायत से हैं। फलां शख्स, फलां अखबार, या फलां चैनल से फलां अखबार या चैनल में ठीकठाक पैकेज पर पहुंच गया है। यानी कि अगर आपको मीडिया की दुनिया पर नजर रखनी है, तो आपके लिए ये ब्लाग है।

बहरहाल अगर आप किसी मुद्दे पर किसी से नाराज हैं या आप काफी सोचते हैं तो खुद को जैसे चाहें जाहिर करने का मंच यही है। शायद यही वजह है कि भड़ासियों ने अब अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। रोज कई नए लोग लिख रहे हैं। कुछ लोग नियमित रूप से लिखने लगे हैं। ये अच्छी बात है क्योंकि दरअसल जब लिखते हैं तो न सिर्फ लिखते हैं बल्कि बहुत कुछ नया सीखते हैं, अपने एकाकी व्यक्तित्व को एक्सपोजर देते हैं, खुद की भड़ास से दुनिया को रूबरू कराते हैं। कहिए, आप भी बनना चाहते हैं भड़ासी?

(दैनिक भाष्कर अखबार के राष्ट्रीय संस्करण में दिनांक 19 जनवरी 2008 को पेज नंबर नौ पर प्रकाशित स्तंभ ब्लाग(उ)वाच का एक अंश)


भई, अपन लोग का भड़ास तो छा गया जी। दैनिक भाष्कर के ब्लाग(उ)वाच कालम में रवींद्र दुबे ने अबकी भड़ास का अच्छा खासा विश्लेषण किया है। उन्होंने डा. मांधाता सिंह द्वारा भड़ास पर प्रेषित एक पोस्ट गांव को गांव ही रहने दो यारों के कंटेंट को उद्धृत करते हुए अपने कालम की शुरुआत की है। हेडिंग दी है, एकाकी व्यक्तित्व को एक्सपोजर की चाहत। पहले दो बड़े पैरे में डा. मांधाता सिंह की भड़ास में प्रकाशित पोस्ट में कही गई बातों, बहस, तथ्यों का जिक्र किया गया है। अगले दो पैरों में भड़ास के बारे में बताया गया है, जिसे मैंने उपर हू-ब-हू उद्धृत किया है।

पूरा पढ़ने के लिए आप 19 जनवरी के दैनिक भाष्कर का राष्ट्रीय संस्करण देखें जो दिल्ली से प्रकाशित होता है। मुझे ई-पेपर पर यह दिखा लेकिन उसे डाउनलोड करने के लिए लागिन मांगा जा रहा था सो टाइम न होने की वजह से मैं उस झमेले में नहीं पड़ा।

अगर कोई साथी ई-पेपर से डाउनलोड कर भड़ास पर उस हिस्से को पोस्ट कर दें तो पूरा लेख सभी साथी लोग पढ़ सकेंगे। और हां, इस लेख के प्रकाशित होने के बारे में सबसे पहले भड़ासी साथी रामकृष्ण जी ने मुझे एसएमएस से सूचना दी। भाई रामकृष्ण जी, आपको ढेर सारा धन्यवाद। और, रवींद्र दुबे जी, आपको खांची-छिट्टा भर धन्यवाद, जो आपने भड़ास को इस लायक पाया कि अपने कालम में जगह दिया।

डा. मांधाता सिंह को उस पोस्ट को पढ़ने के लिए, जिसकी वजह से भड़ास की चर्चा कालम में की गई, यहां क्लिक करें...गांव को गांव ही रहने दो यारों

जय भड़ास
यशवंत

"कोई नहीं है हीरो इनमें"

"कोई नहीं है हीरो इनमें"

***राजीव तनेजा***

गर मिल जाए सत्ता इन्हें
तोड डालें सारे नियम
रच डाले नित नए प्रपंच
तोडें कुर्सी खींचे मंच

ना पंचायत को पंच मिलेगा
ना शातिर को अब महादंड
मिलकर लूटेंगे खुलकर खाएंगे
मचाएंगे हल्ला और हुडदंग

कोई नहीं है हीरो इनमें
रहे तीनों हमेशा विलेन
अपने नेता उनके गुण्डे
और उनकी पुलिस

गढा मिल कर तीनों ने
ऐसा अजब-गज़ब त्रिकोण
फैला चहूँ ओर भर्ष्टाचार
आंतक हुआ कण-कण

पेट हैँ इनके बडे- बडे
खाल सख्त गैंडे सी मोटी
समझा है देश को अपना
जायदाद हुई ये बपौती

खुल कर वो खेलेंगे
सहमे सहमे हम झेलेंगे
वो झूठी आस जगाएंगे
हमें तिगनी नाच नचाएंगे

गद्दी के हकदार हैँ वो
लूटे खसोटे हमेशा जो
पुलिस नेता कैसे हों
गुण्डे मवाली जैसे हों

हाँ!....ऐसे हों ऐसे हों


***राजीव तनेजा***

खून से सना हुआ एक सच ........एक पत्रकार की आत्मकथा


खून से सना हुआ एक सच ........एक पत्रकार की आत्मकथा

एक पत्रकार की वो अनसुनी कहानी जिसमे मोजूद है -----सिर्फ दर्द ...................सोचिये अगर ये पत्रकार एक की बजाए हजारो हो तो ??
कैसे टूटते है सपने ......khudh apane माँ बाप के ........न्यूज़ चेनलो के सबसे घिनोनी दास्ताँ .......एक साल मे आठ हजार पत्रकार ----नौकरिया सिर्फ और सिर्फ सिफारिश वालो को ?----क्या है ये सच ?जानने के लिए जरुर देखे ------ये केसी पत्रकारिता -----आशीष
क्या आप चाहते है की मैं ये ब्लोग लिखु .
अपनी राय मुझ तक प्रेषित करे मैं आप का आभारी रहूंगा

क्या है भारत में दंगो का महत्व ?



कुछ सवाल जो अधूरे रहे जाते या फिर अधूरे छोड़ दिए जाते है ?
आओ ब्लोगों की परिभाषा को महान बनाए
कुछ सवाल जो अधूरे रहे जाते या फिर अधूरे छोड़ दिए जाते है ?
आओ ब्लोगों की परिभाषा को महान बनाए ---आख़िर क्या है कारण इन दंगो का ......गोधरा .१९८४ के दंगे आदि ऐसे उदाहरण है जो भारत को कलंकित करते ....आख़िर क्या है माजरा ---इन दंगो का...... कोंन है इन सबके पीछे ......आख़िर क्यों टूट गयी गाँधी की लाठी .........असंम , पश्चिम बंगाल मे आज भे भुखमरी है .....किसान परिवार सहित ज़हर खा रह्वे है ......शर्म कब तक तक करेंगे हम .............हमे यह पता है की पूरे हिन्दुस्तान मे अपना ये ब्लोग ऐसा ब्लोग हैं जिसमे पत्रकारिता के आदर्श मौजूद है .......क्यो ना इक शुरुआत करें अपनी उस भावना को जगाने कि जो भगत सिंह के साथ ही ख़त्म हो गई थी .....................हमे जताना हे उन सभी लेखकों को जिनके जेहन मे या यू कहे जिनके शैली में अब बू आती हे ...............क्या आप हे तैयार तो आये हमारे साथ -------ashish

19.1.08

आभास, थैंक्यू तेरे को....प्लीज, आप लोग जरूर प्रोत्साहित करें



mujhe is baat kaa ahasaas bhee naheen huaa ki POLIO GRAST BACHCHON KEE MADAD bhee be asar rahee jab tak abhas voi me tha anubandha ke mutaabik bandhan tha ab koi sahaaraa naheen hai hai is elbam ke lie.... jee haan ye hasra hai meree pavitr bhavana kaa . "BAAWARE-FAQEERAA" SE KISEE KO BHEE VYAAPARIK LAABH NAHEEN HAI AT: MERE LIE KOI SAH YOGEE NAHEE HAI .
YADI KOI MEREE MADAD KARANA CHAHE TO SWAAGAT YOGY


मुझे इस बात का अहसास भी नहीं हुआ की पोलियो ग्रस्त बच्चों की मदद की अपील भी बेअसर रहेगी जब तक आभास voi मे था अनुबंध के मुताबिक बन्धन था अब कोई सहारा नहीं है इस एलबम के लिए .... जी हाँ ये हश्र है मेरी पवित्र भावना का . "बावरे -फकीरा " से किसी को भी व्यापारिक लाभ नहीं है अत: कोई सहयोगी नही है। यदि कोई मेरी मदद करना चाहे तो स्वागत योग्य


कृपया इस तस्वीर को जरूर क्लिक करें, और आप अपने स्तर से प्रोत्साहित करें, इस नेक काम के लिए।
धन्यवाद, शुक्रिया

हां, अगर पत्रकारिता करने का यही अंजाम है तो मैं मरना चाहता हूं- शीलेश त्रिपाठी



लखनऊ के पत्रकार शीलेश ने राष्ट्रपति से 26 जनवरी के दिन जान देने की जो अनुमति मांगी है, वह कहीं से अनुचित नहीं। उनकी जगह हम-आप होते तो शायद यही करते, या फिर इसके उलट, जिसे कानून गैरकानूनी मानता है।

शीलेश में कमियां हो सकती हैं, वो हमारे आप में भी है। पर उन अफसरों और ब्यूरोक्रेटों की कमियों से तो शतांश कम है, जो मौका मिलने पर अपना ईमान और कानून तो क्या, प्रदेश और देश को ही बेच दें। और बेचा है। जितने बड़े घोटाले और घपले पता चलते हैं, पकड़े जाते हैं, छापे पड़ते हैं, उसमें कौन फंसता है। यही, हमारे लोकतंत्र के कथित आंख-नाक-कान, जो फाइलों और नोटों के अंबार पर गांड़ मोटा करके बैठे हुए हैं। ये टाई-कोट वाले आधुनिक गोरे सत्ता बदलने के साथ किस तरह रंग बदलते हैं और किस तरह हर रीढ़ वाले को खऱीदते हैं, या न बिकने पर कानून के जंजाल में फंसा देते हैं, ये किस्से अब सबको पता है।

अगर गड़बड़ी की पोल खोलते हुए कोई रिपोर्ट कोई पत्रकार या संपादक छाप देता है, और वो पत्रकार व संपादक किसी बड़े मीडिया हाउस का नौकर होने की बजाय खुद द्वारा निकाली गई मैग्जीन का हो, तो क्या सत्ताधारियों के आगे कत्थक करने वाले इन वरिष्ठ ब्यूरोक्रेटों को यह छूट मिल जाती है कि वो उनके खिलाफ लिखने वाले पत्रकार शीलेश, उनके बच्चों, उनकी पत्नी का जीना हराम कर दें, हर क्षण गुंडागर्दी करें, हर वक्त आतंकित रखें, अपहरण करने की साजिश करें, घर से उठाकर ले जाएं और इनकाउंटर करने की धमकी देकर झुकने को कहें, डराने धमकाने के बाद सत्ता के आगे गिड़गिड़ाकर माफी मांगने को कहे, हर पल साये की तरह पीछे करें, गली सड़क चौराहे कहीं भी अभद्रता शुरू कर दे.....उफ्फ...पर यह सच है, बकौल शीलेश।

सत्ता किसी को किस तरह प्रताड़ित या परेशान कर सकता है, इसका अंदाजा पत्रकार शीलेश से बात करके होता है।

दद्दा अनिल सिन्हा ने लखनऊ और कानपुर शहरों में शीलेश प्रकरण की गहराई से छानबीन कराई और शीलेश का मोबाइल नंबर भी पता किया। सारी सूचनाएं मुझे दीं। मैंने शीलेश से उनके मोबाइल नंबर पर आज देर तक बात की। उन्होंने जो हालत बयां किया, उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शीलेश से हुई बातचीत के कुछ अंश यहां दे रहा हूं।

आप पढ़ें और मैं चाहूंगा कि इस पोस्ट के अंत में दिये गये मोबाइल नंबर पर, जो शीलेश का है, फोन कर उन्हें खुद की तरफ से व भड़ास की तरफ से संबल प्रदान करें। साथ में अगर आप शीलेश के लिए कुछ कर सकते हैं, तो बतायें। मैंने शीलेश से दिल्ली आने और मिलने का अनुरोध किया ताकि कुछ करा जा सके।

शीलेश ने जो बताया...

... जीना मुश्किल हो गया है भाई साहब। एक महीने पहले कुछ लोग रात में एकाएक घर आए और मुझे उठा ले गए। पूरी रात घुमाते रहे, गाड़ी में बिठाकर, इस शहर, उस शहर। धमकाते रहे। कहते रहे- तुम्हारा इनकाउंटर करने का आदेश है पर हम दया बरत रहे हैं, तुम चलो पैर पकड़ लो। माफी मांग लो। हाईकोर्ट से याचिका वापस ले लो। माफ कर देंगे वो तुम्हें। तुम जाने हो कि नहीं कि वे कितने बड़े लोग हैं। हम लोगों से कह दिया गया है कि पहले समझाओ, न माने तो निपटा दो।....


शीलेश ने बताया कि एक बड़ी गड़बड़ी का जब खुलासा अपनी मैग्जीन में उन्होंने किया तो इन सीनियर अफसरों की आंख की किरकिरी बन गया। मैंने इस घोटाले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मेरे रिपोर्टर ने उस घोटाले से संबंधित ढेर सारे तथ्य और आंकड़ें सीबीआई को सुपुर्द किए। क्या यह सब निहित स्वार्थ के तहत किया? यह सब लाभ कमाने के लिए नहीं, पत्रकारिता के तेवर के तहत किया। पर मुझे नहीं पता था कि पत्रकारिता के तेवर ढीले करने के लिए ये अफसर सत्ता के दुलारे बनते ही इस तरह कहर बरपाएंगे। वो गड़बड़ी के खुलासे का मामला ही अब मेरे लिए बवाल-ए-जान बना हुआ है। सत्ता इन अफसरों के हाथ में है और मैं निरीह स्थिति में गुहार लगाता जान के लिए और परिवार के लिए मारा मारा फिर रहा हूं।

....अब तो घर भी नहीं जाता क्योंकि जब भी वो लोग मुझे देख लेते हैं, मेरे पीछे लग जाते हैं। और मेरे कारण मेरे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि वो लोग मेरे बच्चों से गाली गलौज और अभद्रता करते हैं। सिविल वर्दी में कई दरोगा मेरे फिराक में घर के आसपास रहते हैं। जब उनसे पूछो कि कार्ड कहां है तुम्हारे पास तो वो बदतमीजी और गुंडागर्दी पर उतारू हो जाते हैं। अब तो मैं बच बच के यहां वहां रह रहा हूं ताकि घरवाले तो कम से कम शांति से रह सकें। मेरे कारण मेरे बच्चों और पत्नी तक से बदतमीजी से पेश आया जा रहा है। मैं अपना दिन रात यहां वहां भटककर गुजारता हूं। ....


जब मैंने कुछ सवाल पूछे तो शीलेश ने बेहद परेशान और तल्ख लहजे में कहा कि कौन कहता है कि मैं मैग्जीन आर्थिक लाभ के लिये निकालता था? मैग्जीन में मैंने ढेरों घोटाले प्रकाशित किये। वन विभाग के सर्वोच्च अफसरों से लेकर प्रदेश के सीनियर मोस्ट ब्यूरोक्रेटों को घोटालों-मनमर्जियों पर तथ्यपरक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसी के चलते ये सीनियर अफसरों का बेहद प्रभावशाली गुट जो आज मायावती सरकार की आंखों का तारा है और मायावती सरकार के एक प्रमुख सलाहकार नेता का प्यारा है, अपनी पूरी ताकत मुझे डराने और उखाड़ने में लगाये है। उन्हें डर है कि अगर उनके घोटाले घपले हाईकोर्ट के जरिये उजागर हो गये तो उनका करियर बर्बाद हो सकता है और सरकार पर भी आंच आ सकती है, इसलिए वो लोग हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं। उनके इशारे पर गु़ंडे पुलिसवाले सब वो वो चीजें कह कर रहे हैं, जिसे बयान नहीं कर सकता।

....भाई साहब, भड़ास में मेरी तरफ से यह संदेश प्रकाशित करियेगा कि पत्रकार साथियों, जो जो शीलेश के साथ हुआ है, अगर वो तुम सभी के साथ होता तो अब तक शायद आत्महत्या कर लेते। मैं तो फिर भी जी रहा हूं और इस सत्ता से लड़ने की ताकत बटोर रहा हूं। लेकिन कभी कभी जो जलालत की ज़िंदगी जी रहा हूं और जिस तरह से हर चीज मेरे खिलाफ होती नजर आ रही है, उसमें मर जाने का मन करता है। इसीलिए मैंने राष्ट्रपति महोदय से 26 जनवरी को जान देने की अनुमति मांगी है ताकि पत्रकार संपादक बनने से सत्ता द्वारा दिये जाने वाले दुख को न सह पाने की कहानी पूरी पत्रकार बिरादरी को पता चले और कोई आगे से किसी अफसर के खिलाफ पोल खोलने वाली रिपोर्ट न लिख सके। ....


शीलेश का मोबाइल नंबर है- 09335246749 और इस नंबर पर जब शीलेश से बात हो रही थी तो मैंने उनसे ढेरों सवाल किये, मामले के बारे में जाना। उन सारी बातों को यहां दे पाना मुमकिन नहीं हो रहा है। लेकिन मैं सभी साथियों से अपेक्षा करूंगा कि वो वक्त निकालकर शीलेश से बात करें और उन्हें अपना समर्थन और भड़ास का समर्थन प्रदान करें। शीलेश की अंतिम बात को यहां कोट करते हुए मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगा..

...वे लोग जानबूझकर लखनऊ के इस मामले को कानपुर कोर्ट ले गए, बाद में धांधली करके हाईकोर्ट के एक आदेश को मेरे वकील तक पहुंचने ही नहीं दिया। ढेरों ऐसी चीजें हो रही हैं जिसको देखते हुए समझ नहीं पा रहा कि आखिर ये लोग क्या मुझे पागल करके छोड़ेंगे, या आत्महत्या करने देने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अगर ऐसा ही है तो मुझे पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लेना चाहिए क्योंकि मैं जब अपने परिवार को सुरक्षा नहीं दे और दिला सकता और वे भय में जीने को मजबूर हैं तो फिर इस नरक को भोगने से अच्छा है खुशी खुशी जान दे दिया जाये।

उन लोगों का मैं दिल से आभारी हूं, जो मेरा दर्द समझ पा रहे हैं, मेरी दिक्कतें को महसूस कर पा रहे हैं। ढेर सारे मित्र ऐसे हैं जो इस आड़े वक्त में अपना मुंह फेरे हुए हैं। बस, आप लोगों से गुजारिश है कि आप लोग इस मामले को अपने अपने स्तर से उठाएं ताकि मुझे खत्म करने की मंशा पाले लोगों को मेरे मरने के बाद भी तो यह एहसास हो सके कि एक पत्रकार संपादक चाहें मरे या जिये, उसकी लिखी बात, उसकी कही बात, कभी नहीं मरती। सोचता हूं, यार इतना क्यों परेशान कर रहे हो, मार दो गोली, कर दो खत्म काम। इससे ज्यादा आखिर तुम क्या कर लोगे।....(इतना कहकर शीलेश रुवांसे हो जाते हैं)


दोस्तों, मैं शीलेश की स्थिति के बारे में उनके मुंह से यह सब जानकर सदमे की स्थिति में हूं।

सच में, आप कैसे आनंदित रह सकते हैं, सहज हो सकते हैं, भड़ास निकाल सकते हैं, जब घर और गांव में आग लगी हुई हो। पड़ोस से चीखें आ रही हों तो आप कैसे ठहाके लगा सकते हैं। सामने कई आत्माएं बिलख रही हों तो कैसे आह्लादित हो सकते हैं। पर क्या कहा जाए, इसी लोकतांत्रिक उलटबांसी में जीने के आदी हो गए हैं।

सब कुछ जानते-सुनते हुए भी अपनी आत्मा को मारकर जीने, बकचोदी करने, दांत चियारने, इंटीलेजेंट साबित करने, सबसे अलग साबित करने, धनी और शहरी दिखाने, बड़ा आदमी बनने, सीनियर कहे जाने, पैसा और पद बढ़वाने के चक्कर में पूरी ऊर्जा झोंके पड़े हैं। आने वाली पीढ़ी को भी यही सिखा रहे हैं- प्रैक्टिकल बन, बाजार को समझ, सीरियस और मेच्योर बन, आदर्शवाद छोड़...आदि आदि। अबे साले, सही बात ते ये है कि असल में तू बर्बाद है, फिर बाकी सबको क्यों बर्बाद कर रहा है। भाई, तू अपनी मरा, दूसरों को उनका जीवन जीने के लिए छोड़ दे। वो मुश्किलें बुला रहा है तो दरअसल वो जीवन जीने के लिए नए दरवाजे खोल रहे हैं। तू तो बंधी बंधाई लीक पर चलने को पैदा हुआ है। केवल बकचोदी करने के लिए।

और यही सब करते हुए, हिप्पोक्रेटों की मंडली अपने आरामगाह में खरामा खरामा जी खा हग मूत रही है।

शीलेश प्रकरण हम हिंदी मीडियाकर्मियों के लिए एक चुनौती है।

अपील
मैं सभी ब्लागरों और दोस्तों से अपील करूंगा कि वो शीलेश की तस्वीर यहां से उठाएं, शीलेश के मोबाइल नंबर, जो उपर लिखा है, पर बात करें और अपने-अपने ब्लाग पर पोस्ट डालें, ताकि शीलेश प्रकरण की ब्लागिंग के जरिये पूरी दुनिया में गूंज हो सके। यह हम मीडियाकर्मी ब्लागरों की परीक्षा है। शायद हम अपनी ब्लागिंग की ताकत का एहसास करा सकें। और जो भी साथी इसे पढ़े वो अपने स्तर पर जो हो सके, शीलेश की मदद करने को आगे आए और इस बारे में कोई प्रगति दिखे तो उसे पोस्ट करे। क्योंकि, हमारे आपके थोड़े कष्ट आने वाली पीढ़ियों के लिए राह आसान कर सकती है।


इसे यूं भी कह सकते हैं......

कुछ आप भी करें,
थोड़ा हम भी बढ़ें,
साथी,
बन जायेगी टीम,
बढ़ जाएगा हौसला,
वो जो अकेल लड़ रहे हैं
सत्ता और सभ्यता से जंग
उन्हें लगने ना देंगे
कि उस धुर अंधेरे में
जब वो रोशनी मांग रहे थे
तभी, अंधेरे के दैत्यों ने
चुपचाप लेकिन सरेआम
उनकी आंखें छीन लेने को
बढ़ा दिए थे दैत्याकार पंजे
और हम सब अपनी आंखें
बचाने को अंधेरे में भी
चेहरे को हाथ से ढके बैठे थे
पर रोशनी तो चाहिए साथी
ताकि हमारे नन्हें जान सकें
आसमान, पहाड़, संगीत
हंसी, रोशनी, प्रेम, खुशी
आजादी, आह्लाद और आंखें
जैसे शब्दों के होने के अर्थ


जय भड़ास
यशवंत

((पत्रकार शीलेश त्रिपाठी के बारे में इससे पहले दो पोस्टें भड़ास पर प्रकाशित हो चुकी हैं, बैकग्राउंड जानने के लिए इन हेडिंग पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं.... पत्रकार ने मांगी राष्ट्रपति से मौत और शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एक जुट हैं))

नेताओं ने माना “बास्टर्ड”(हरामी) हैं, खिलाड़ियों ने कहा “विजेता” हैं?

जैसा कि हमेशा होता आया है, नेता संकट खड़े करते है, देश का अपमान करवाते हैं, लेकिन जनता अपने संघर्षों से देश को सही राह पर लाने और उसका गौरव वापस पाने की जद्दोजहद में जुटी रहती है, ठीक उसी प्रकार पर्थ में भारतीय टीम ने सब कुछ भुलाकर जोरदार संघर्ष किया और ऑस्ट्रेलिया को नाकों चने चबवा कर जीत हासिल की। तारीफ़ करना होगी अनिल कुंबले के नेतृत्व की और युवाओं के जोश की जिसने यह अभूतपूर्व कामयाबी हासिल की। पता नहीं हमारे नेता इस नई सदी के जोश और आत्मविश्वास से भरे भारतीय युवा की ताकत को क्यों नहीं पहचानते और जब-तब देश को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं।

“बास्टर्ड” शब्द का अर्थ शब्दकोष के अनुसार “अवैध संतान” या “हरामी” होता है। सिडनी टेस्ट के बाद में जो “तात्कालिक” राष्ट्रवाद बासी कढ़ी की तरह पैदा हुआ था, उसका झाग अब बैठ गया है, और हम वापस अपने “गाँधीवाद” और “पूंजीवाद” की ओर लौट आये हैं। ऐसा हमेशा ही होता है, हमारा “राष्ट्रवाद” क्षणिक होता है, या तो मीडिया द्वारा पैदा किया गया नकली राष्ट्रवाद (जैसा कि ताजमहल वोटिंग के मामले में हुआ था) या फ़िर कारगिल युद्ध के समय चन्दा माँगने जैसा… पाठक सोच रहे होंगे कि इस बात का “बास्टर्ड” शब्द से क्या लेना-देना? दरअसल सिडनी टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी ब्रेड हॉग ने गांगुली, कुम्बले और धोनी को “बास्टर्ड्स” कहा था, और हरभजन ने तथाकथित रूप से सायमंड्स को “मंकी” कहा था। दोनों टीमों ने इस मामले में एक दूसरे की शिकायत की थी। हरभजन का मामला आईसीसी की धाराओं के मुताबिक 3.3 स्तर का और हॉग के अपशब्द 3.0 स्तर के माने गये। नियमों के अनुसार दोनों खिलाड़ियों को सजा के तौर पर कम से कम तीन टेस्ट से बाहर किया जा सकता है। ऐसे में विश्व के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड के रीढ़विहीन रवैये और शर्मनाक समर्पण के कारण आज की स्थिति यह है कि कुंबले ने अज्ञात(??) दबाव के कारण ब्रेड हॉग पर लगाये गये आरोपों को न सिर्फ़ वापस ले लिया बल्कि उन्हें “माफ़”(?) भी कर दिया है, बेईमान और अक्खड़ रिकी पोंटिंग ने सिर्फ़ शाब्दिक तौर पर कहा कि “उनसे सिडनी में एक-दो गलतियाँ हुई हैं…”, गिलक्रिस्ट ने भी खुलेआम कहा कि “ऐसा खेल” तो हमारी संस्कृति है और हम इसे जारी रखेंगे, अम्पायरों को भी मीडिया के दबाव के कारण सिर्फ़ आगामी दो मैचों से हटाया गया, लेकिन सबसे मुख्य बात यानी हरभजन पर नस्लभेदी टिप्पणी वाले मामले में ऑस्ट्रेलिया ने अपने आरोप वापस नहीं लिये, यानी हरभजन मामले की सुनवाई होगी और हो सकता है कि उन्हें कुछ सजा भी हो जाये।

“एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने…” की जो गाँधीवादी घुट्टी हमारे खून में रच-बस गई है, उसने कई मौकों पर देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किया है। नेताओं को देश की “ताकत” का अन्दाजा तो है, लेकिन उस ताकत का उपयोग वे अपने निजी स्वार्थ पूरे करने में लगाते हैं, देश के स्वाभिमान की बजाय।
आजादी के समय पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने हों, 1962 में चीन से पीठ में छुरा खाना हो, एहसानफ़रामोश बांग्लादेश का जब-तब आँखें दिखाना हो या कंधार-कारगिल में मुशर्रफ़ का षडयंत्र हो…… “एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने…” की जो गाँधीवादी घुट्टी हमारे खून में रच-बस गई है, उसने कई मौकों पर देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किया है। लेकिन इक्कीसवीं सदी में भी हमारे नेता यह बात समझने को तैयार नहीं हैं कि देश की पचास प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या “युवा” है, जो अपने हुनर और शिक्षा के बल पर समूचे विश्व में डंका बजा रहे हैं, जबकि “कब्र में पैर लटकाये” हुए चन्द नेता अपने स्वार्थ की खातिर देश को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। अब वे 1974 के दिन नहीं रहे जब इंग्लैंड दौरे पर एक क्रिकेटर सुधीर नाईक पर एक जोड़ी मोजे चुराने का आरोप लगाया गया था, और हमारे “अंग्रेजों के मानसिक गुलाम” क्रिकेट बोर्ड ने आरोप को मान भी लिया और उस बेचारे को देश लौटने का आदेश दे दिया था… अब 2007 का समय है लेकिन नेता आज भी नहीं बदले। इन्हें देश की “ताकत” का अन्दाजा तो है, लेकिन उस ताकत का उपयोग वे अपने निजी स्वार्थ पूरे करने में लगाते हैं, देश के स्वाभिमान की बजाय।

सिडनी के इस मामले में कई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पेंच भी जुड़ गये थे। बीसीसीआई की सनातन राजनीति में गहरे धँसे डालमिया ने तत्काल पवार पर मामले को ढील देने का आरोप जड़ दिया, दूसरी तरफ़ लालू हुँकार भरते रहे कि “यदि मैं बीसीसीआई अध्यक्ष होता तो अब तक टीम वापस बुला लेता…” (क्योंकि उन्हें अगला अध्यक्ष बनना है और अपने बेटे को भारत की टीम में लाना है)। अब पवार अपने विरोधियों की बात कैसे मानते, भले ही मुद्दा राष्ट्रप्रेम से जुड़ा हो। उन्होंने नया “गणित” लगाया और भारत सरकार पर दबाव बनाया कि यदि इस मुद्दे को ज्यादा तूल दिया गया तो दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं जिससे कि हमें ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम मिलने में दिक्कत होगी। बात में “वजन” था, विदेश सचिव स्तर का प्रतिनिधिमंडल ऑस्ट्रेलिया में यूरेनियम की भीख माँगने पहुँचा हुआ ही था। बस फ़िर क्या था… कुंबले को बुलाकर दबाव बनाया गया कि ब्रेड हॉग के खिलाफ़ मामला वापस ले लो, बात को यहीं रफ़ा-दफ़ा करो (दूसरे अर्थों में, मान लो कि हम “बास्टर्ड” हैं)। जबकि असल में पवार साहब को अपनी आईसीसी की कुर्सी खतरे में दिखाई दे रही थी। ये और बात है कि इतना सब करने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने यूरेनियम के नाम पर हमें “ठेंगा” दिखा ही दिया है। रही बात बकनर के कारण वेस्टईंडीज के नाराज होने की, तो भविष्य में उसे एक “बड़ा टुकड़ा” देकर राजी कर लिया जायेगा। अब निश्चित ही अन्दर ही अन्दर हरभजन पर दबाव बनाया जा रहा होगा कि मामले की सुनवाई हो जाने दो, मैच रेफ़री (मांडवाली करने गये बिचौलिये) रंजन मदुगले को “सेट” कर लिया जायेगा कि तीन की बजाय सिर्फ़ एक टेस्ट का ही प्रतिबन्ध लगाया जायेगा, जिसे हरभजन सिंह और हमारी क्रिकेट टीम सहर्ष स्वीकार कर लेगी, नेता लोग कुछ “गाँधीवादी” बयान (“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले” या फ़िर “खेल भावना के सम्मान” टाईप का) देंगे। भारतीय जनता (और मीडिया भी) जिसकी याददाश्त बहुत कमजोर होती है, इसे वक्त के साथ भुला देंगे, और फ़िर से हमारे खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका में गालियाँ खाने को तैयार… (सम्बन्धित लेख “शरद पवार जी अब तो मर्दानगी दिखाओ…)

इस सारे मामले में “पैसे” ने भी अपना खासा रोल निभाया है, दौरा निरस्त कर टीम के वापस लौटने की सूरत में भारत पर आठ करोड़ (क्या यह BCCI के लिये बड़ी रकम है?) का जुर्माना हो जाता, आगामी वन-डे ट्राई-सीरिज पर भी खतरा मंडराने लगता, जिससे प्रति खिलाड़ी कम से कम पाँच करोड़ तथा बोर्ड को कम से कम 400 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ सकता था… ऐसे में आसान रास्ता यही था कि राष्ट्रवाद को भाड़ में झोंको, “बास्टर्ड” सुनकर भी मुस्करा दो, यहाँ तक कि अपने आपको “नस्लभेदी” भी मान लो… खैर, ऑस्ट्रेलिया की घटना के कारण भारत में हुए मीडिया प्रायोजित “देशभक्ति” नाटक का फ़िलहाल अन्त हो गया लगता है। जैसा कि भारत में हरेक मुद्दे का अन्त होता है मतलब शर्मनाक, खुद को महाशक्ति कहने वाले देश के पिलपिले साबित होने जैसा, ठीक वैसा ही अंत (फ़िलहाल) इस मामले का हुआ है। साथ ही कुछ बातें भी साफ़ हो गई हैं… जैसे –

(1) किसी भारतीय को “बास्टर्ड” (हरामी) कहा जा सकता है, लेकिन अंग्रेज को “मंकी” (बन्दर) नहीं कहा जा सकता…
(2) आठ करोड़ का जुर्माना ज्यादा बड़ा है देश की टीम के स्वाभिमान से…
(3) यूरेनियम की भीख माँगना ज्यादा जरूरी है, राष्ट्र के सम्मान की रक्षा की बजाय…
(4) भले ही हम “नस्लवादी” साबित कर दिये जायें, लेकिन “माफ़” करने की महान गाँधीवादी परम्परा नहीं टूटनी चाहिये…


लेकिन भारतीय युवाओं ने साबित कर दिया है कि जैसे हम “मुँहजोर” हो गये हैं वैसे ही मैदान में भी दमखम दिखा सकते हैं, बशर्ते कि देश और बीसीसीआई का नेतृत्व उनका खुलकर साथ दे, और गाली के बदले गाली, गोली के बदले गोली (प्रतिभा ताई सुन रही हैं ना… अफ़जल वाली फ़ाईल अभी भी आपकी टेबल पर पड़ी है) वाली नीति अपनाये…

और अब अन्त में एक गुप्त बात… असल में हरभजन ने सायमंड्स को “माँ की……” कहा था, लेकिन दर्शकों के शोर में सायमंड्स ने उसे “मंकी……” सुन लिया, इसलिये आईसीसी से अनुरोध है कि इसे भाषा सम्बन्धी समस्या माना जाये, न कि नस्लभेदी प्रकरण…
- सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

भरोसा नहीं होता हम जीत गए..

आखिर फिर एक ऐसा दिन आ ही गया, जिसके मैंने अपने जीवन में घटने की उम्मीद भी नहीं की थी। भारत ने ऑस्ट्रेलिया का विजयी रथ उसके ही अभेद्य दुर्ग पर्थ में रोक ही दिया। अति सामान्य करार दिए गए भारतीय तेज गेंदबाजांे की तिकड़ी ने महाबली विश्व चैंपियन के धुरंधर गेंदबाजों से बेहतर प्रदर्शन किया। विश्व क्रिकेट में बबुआ गंेदबाज ईशांत शर्मा ने कुछ ही समय पहले तक हर मैच की हर पारी में शतक ठोंकने का संकल्प से ले चुके रिकी पोंटिंग की नाक में दम कर दिया। सभी गेंदबाजों ने दोनों पारी में इस तरह गेंदबाजी की मानों अपने-अपने शिकार छांट रखे हों।

पोंटिंग,जैकस, हस्सी, साइमंड्स और रॉजर्स दोनों पारियों में एक ही गेंदबाज का शिकार बने। हां सहवाग ने दूसरी पारी में आरपी के कुछ शिकारों को बांट लिया। अगर मैच विजेता गेंदबाज पैदा करना कोई पैमाना है तो भारत ने पिछले चार सालों में सबसे अधिक मैच विजेता गंेदबाज पैदा किए।

2003-04 में अगरकर ने एडिलेड में टेस्ट जिताया तो इसके बाद पाकिस्तान में इरफान-बालाजी भारत की पाकिस्तान की भूमि में पहली जीत के शिल्पकार बने। फिर श्रीसंथ ने दक्षिण अफ्रीका में एक टेस्ट मैच अपने ही दम पर जिताया तो आरपी-जहीर ने इंग्लैंड में भारत को टेस्ट सिरीज में विजय दिलाई। इस बार यह काम ईशांत-इरफान-आरपी की तिकड़ी ने कर दिखाया। हां इन सभी अवसरों में एक गेंदबाज लगातार शामिल रहा। वह है जेंबो ठीक समझे भारतीय टीम के कप्तान अनिल कुंबले।

अगर विदेशों में मैच जीतना कोई कसौटी है। तो ऑस्ट्रेलिया के बाद भारत की ही एक ऐसी टीम रही जिसने पिछले चार-पांच सालों में वेस्टइंडीज-इर्ंग्लैंड-बांग्लादेश और पाकिस्तान 2003-04 को उनके ही घर पर हराया तो दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों में एक-एक टेस्ट मैच जीता। बधाई हिंदुस्तान बधाई।

EXCLUSIVE..भगत सिंह तो पैदा हो लेकिन पडोसी के घर पे..

रात के बारह बज रहे है .......मेरा मन शांत नही है ...,शायद मैं बहुत ज्यादा हताश हू ......चिंताओं के लकीरे अचानक और गहरी होने लगी है आप/">आप ,मैं और मेरा हिंदुस्तान ------कल ब्लोग लिखा ............ना सिर्फ देश बल्कि पूरे विश्व का नामी -गिरामी चैनल ------सबसे तेज़ हां यही था उसका नाम ...कुछ इसी तरीके का .....तो मैंने ब्लोग लिखा ....बहुत दिनों बाद लिखने का मन किया शायद कुछ देखा था मैंने ----की जनता को पागल किस आधार पर बनाया जाता है --बिना सोचे समझे न्यूज़ कैसे ब्रेक की जाती है ----पायल की घटना को आत्मसम्मान से जोड़ना हो या फिर पत्रकारिता पे हमला सब कुछ चला उस दिन -----
अगले दिन पता चला सब कुछ नकली था ,,,सब कुछ ,,,,जी हा ? जनाब नकली पत्रकारिता
मैंने सब कुछ लिखा --आपके ब्लोग्स पर -सोचा यह तो कुछ होगा -उम्मीद कर raha था की लोगो को ख़ुशी होगी -----मीडिया जगत मे apnaa ब्लोग्स का नाम सुपर था ....सोचा बुदीजीवी वर्ग पड़ेगा ......लेकिन कभी ना सोची थी की आलोचना करने वाले इतने ज्यादा होंगे ---उन लोगो के तर्क तो सुनिए-----हमारा मकसद क्रांति नही है ........बैर मत करो .....भोपाल से फोन आया -सोच कर करो
निष्कर्ष क्या निकला -- सोचा अब निष्कर्ष निकालू लेकिन तब तक आँखे बहुत गीली हो चुकी थी -शायद hatashaa badh चुकी थी - -सच कहा था जनसत्ता मे एक सज्ज्जन ने पत्रकारिता हिन्दुस्तान मे किसी हालत मे नही -----जो हालत जनसत्ता की है वो तुम्हारी हो जायेगी ---ध्यान रखना हर किसी के पास विवेक गोइयंका जितना पैसा नही होता जो पत्रकारिता के लिए खर्च कर सके ........................


भारत रत्न के लिए किसी पत्रकार का नाम क्यों नही ?

क्या पत्रकारिता जगत इस पर शांत रहेगा ?


कुछ ब्लोगरो ने लिखा कि हमारा मकसद क्रांति करना नही बल्कि अपनी भावनाओ को बताना है शायद वो पीक पत्रकारिता मे विश्वास रखते है NDTV ने तो कस्बा ,मोहल्ला पर रोक लगा दी है यह उन लोगो की jeet hai जो किसी ना किसी रूप मे ब्लोगों कि राह रुकावट उत्पन्न करते है .....अगर इन ब्लोगों पर रोक लगी तो हमारा भी वही हाल होगा जो प्रिंट का हो रहा है ......मैं उन्ही लोगो से ये सवाल करता हू कि क्या अपनी vichaardhara को जनता तक samppreshit करना गलत है ......chaatukaaritaa ब्लोगों पर भी होती ये 1st time पता चला .................क्यों ब्लोगरो ? क्या मैं theek हू ........
क्या राजनीति और चाटुकारिता इस देश मे इस कदर हावी है कि ब्लोग्स भी इससे अलग नही रह गई ............क्यों ना आगे आये hum ?






जरा याद करो उन पत्रकारों को जो चले गए सिर्फ खबरों के लिए ?हम सबका
एक सलाम उन सबके नांम ..................उनकी शहादत के नाम
आख़िर क्यों नही है हमारी बिरादरी भारत रत्न की लिस्ट में ?
क्या आप के पास है इन सवालो के जवाब .........................तो दीजिये अपनी जवाब

हंगामा खड़ा करना मकसद नही मेरा .............


आज के खुलासे के बाद मेरे पास ढेरों फीडबैक आये .............अधिकतर लोगो के फोन आये

कुछ ने कहा की मीडिया में रहकर बैर ना पालो
क्या यही है पत्रकारिता ??

18.1.08

ए गणपत, चल दारू ला ....उर्फ नशे से मुक्ति

फिल्मवाले भाई भी कैसा कैसा गाना बनाते हैं। अब इसी को लीजिये। ए गणपत,चल दारू ला, कुछ सोडा वोडा दे न यार....। साला, गाना ऐसा की सुनकर ही पीने को मन कर जाय। और पी लें तो सुबह उठन को जी न करे। शाम को पी लेने से सुबह को मन में होने वाला ढेर सारा खांची भर पछतावा अलग से, क्यों पी लिया, क्यों डिग गया, क्यों निभा नहीं पा रहा, शरीर की बिलकुल चिंता नहीं, ज़िंदगी को डुबो दी है शराब में, घर परिवार की चिंता नहीं, करियर से खिलवाड़ कर रहे हो, कब सुधरोगे, रोज तो सोचते हो लेकिन शाम को अनिर्णय की स्थिति भी मयखाने पर पहुंचा कर निर्णय करा देती है...आदि आदि जैसे आंतरिक पछतावे।

सोचता हूं, ये जो मन में होने वाली ग्लानि और अंदर ही अंदर होने वाला पछतावा है, यही हमारी ताकत है। अगर ये नहीं है तो समझिए मर गए हैं। फिर तो हर चीज यांत्रिक तरीके से कर और जी रहे हैं। हर चीज पर ढेर सारी बातें सवाल व संवेदना पैदा होती है, सकारात्मक-नकारात्मक मंथन चलता रहता है, यही तो जान है। यही तो पहचान है। यही तो ताकत है।

खैर, ये सब लिखते हुए मैं सुकून महसूस कर रहा हूं क्योंकि दरअसल आज ए गणपत, चल दारू ला सुनकर भी मयखाने के पास जाकर नहीं रुका। सीधे घर आया। मटर और चूड़ा को भूनकर नाश्ता बनाया। फिर कई तरह की सब्जियां काटकर मिक्सवेज बनाया। बच्चों के साथ बातें की, होमवर्क कराया, फिर जब वो मोहल्ले में एक बच्चे के यहां बर्थडे में पार्टिशिपेट करने गये तो मैं लैपटपियाने लगा।

मजेदार तो यह कि हर नशे से बड़े नशा अब भड़ास का बन चुका है। इस नशे में जादू सा है। लगता है जैसे एक बड़ा सा अपना परिवार है जिसमें हर वक्त हलचल सी रहती है और इस हलचल को हर पल जानने की इच्छा रहती है। लेकिन भड़ास से उबरने की सायास कोशिश भी करने लगा हूं। कहीं ऐसा न हो कि दारू का नशा छूटा है तो एक नया नशा भड़ास का पकड़ लिया जाये। जीवन में हर नशे को जीना और उससे उबरकर आगे बढ़ना ही मजा है। वरना अगर किसी में डूब गये, किसी के लती बन गये तो फिर तो पक्के नशेड़ी बन गए और समझो छुट्टी हो गई। टाइप्ड नहीं होना चाहिए। जीवन में, करियर में, अनुभवों, संगत में, सोच में, संगीत में, प्रयोग में, खाने में, पीने में....किसी में भी।

चलिये, बाद में कुछ और भड़ास निकालेंगे, लेकिन आप भी तो कुछ बोलिए, लिखिए। या सिर्फ पाठक, दर्शक बने रहने का इरादा है। इस दौर में जब तकनालजी और नेट का हथियार आपके हाथ में, तो दर्शक की बजाय सर्जक बनिए और निकालिये भड़ास।

जय भड़ास
यशवंत

जल में रहकर मगर से बैर?

इन दिनों भड़ास पर ढेर सारी ऐसी पोस्ट आ रही हैं, जिसमें खुलेआम मीडिया हाउसों का नाम लेकर उनकी कमियों को गिनाया दिखाया जा रहा है। मैं खुद संशय में हूं कि क्या इस तरह की पोस्ट भड़ास पर आनी चाहिए? दरअसल, भड़ास हिंदी मीडियाकर्मियों का सबसे बड़ा और सबसे मशहूर मंच है। सभी हिंदी मीडियाकर्मी किसी न किसी मीडिया हाउस की मैग्जीन, अखबार, टैबलायड या चैनल में काम कर रहे हैं। ऐसे में क्या यह उचित होगा कि हम उन मीडिया हाउसों को सीधे टारगेट बनायें? अगर कोई बेहद बड़ी बात हो तो समझ में भी आता है लेकिन अगर किसी अखबार में डेटलाइन गलत छप जाए, प्रिंटलाइन गलत प्रकाशित हो जाये, फोटो कैप्शन कुछ और व फोटो कुछ और छप जाए, खबर रिपीट हो जाए, झूठी खबर चल जाए....तो इन सबको मुद्दा बनाना चाहिए?

मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पर मैं अपने हिंदी मीडियाकर्मी साथियों के लिए दिक्कत नहीं पैदा करना चाहता। जितने भी मीडिया घराने हैं, उनसे संबद्ध पत्रकार भड़ास से जुड़े हुए हैं। कल को कोई खास मीडिया घराना अपने पत्रकारों पर इस बात के लिए परेशान करने लगे कि वो भड़ास से जुड़े हुए हैं और भड़ास में उस मीडिया हाउस की कमियां उजागर की जाती हैं, तो दिक्कत उन पत्रकार बंधु के लिए पैदा हो जायेगी।

दूसरे, जहां तक मेरा एक्सपीरियेंस है, आप अखबार या टीवी में काम करते समय लाख सावधानी बरतिये, चूक हो ही जाती है और चूक होना मानवीय स्वभाव का हिस्सा है। अगर आप मनुष्य हैं और काम कर रहे हैं तो सौ में एक फीसदी गलती रह ही जाती है। इसलिए इन कमियों को बड़ा मुद्दा बनाया जाना उस संबंधित मीडियाकर्मी के कैरियर से खिलवाड़ करने जैसा हो जायेगा।

तीसरे, भड़ास का जो मंच है, वो दूसरों की कमियां उजागर करने की बजाय अपने मन और दिल में झांकने के लिए है। अपने व्यक्तित्व की गांठें खोलने के लिए है। हम दूसरों में तो हजार कमियां निकाल सकते हैं, पर क्या खुद की कमियों को सबके सामने लाने की हिम्मत कर पाते हैं। भड़ास ऐसे ही साहसी लोगों के लिए है जो छोटी मोटी कमियों व दूसरों की गलतियों पर ध्यान देने की बजाय अपनी सच्चाई, कुंठा, अनुभव, संस्मरण, कविता, कहानी, विश्लेषण को सबके सामने लाते हैं।

तो बंधुओं, जल में रहकर मगर से बैर करने की आदत न डालिये। भड़ास को दूसरों की छोटी-मोटी गलतियों को उजागर करने का मंच न बनाइए। यह भड़ास है और भड़ास निकालिये। भड़ास से क्रांति की भी अपेक्षा न करिये। अगर हम बाजार के इस दौर में बाजार की शर्तों के साथ जी खा रह हैं तो हम आमूल-चूल बदलाव नहीं कर सकते, यह तय मानिए। हां, हम संगठित रहकर अपने अनुकूल माहौल बना सकते हैं। अपनी बात हर जगह पहुंचा सकते हैं।

मैं इस मुद्दे पर अभी साफ साफ तय नहीं कर पाया हूं। आप लोग अपने विचार दें तो बहस थोड़ी आगे बढ़े।

जय भड़ास
यशवंत सिंह

हमेशा जवान रहने और अल्झीमार को पास न फटकने देने के दस फंडे



अपने एक आनलाइन और आरकुटी मित्र हैं डा. राहुल टंडन। मुंबई वाले। वे रोजना कुछ मजेदार, रोचक, सीखने-समझने लायक मेल भेजते हैं। उनका पूरा एक ग्रुप है, जिसे मेल भेजते हैं। उसमें सौभाग्य से मैं भी हूं। कल जो मेल भेजा था, वो काफी प्रेरणादायी है, जिसे आप सभी लोगों को पढ़ना और इसका पालन करना चाहिए। उन्होंने मेल के अंत में लिखा कि इस ज्ञानवर्द्धक मेल को कम से कम आठ लोगों को सेंड करिये, तो मैंने सोचा कि भड़ास पर डाल दिया जाये ताकि आठ की बजाय आठ सौ लोग इसे देख-पढ़ लें।

अल्झीमार रोग के बारे में सभी जानते हैं, ब्लैक फिल्म में अमिताभ को यही रोग है, जिसमें स्मृतिलोप का शिकार होने लगता है आदमी। यह रोग ज्यादा उम्र में होने लगता है। इस मेल में यही बताया गया है कि ज्यादा उम्र होने की मानसिकता को दिमाग में लाना ही नहीं चाहिए और हर दम आदमी को सकारात्मक व सुखदायी कामों में संलग्न होना चाहिए। साथ ही लगातार सीखते रहना चाहिए, दिमाग पर जोर देते रहना चाहिए, जिससे की फालतू के टेंशन दिमाग में न आएँ। खैर, ऐसा तो संभव ही नहीं कि आदमी टेंशन में न आए, लेकिन यह जरूर है कि हम नीचे लिखे सलाहों को अमल में लाकर अपनी उम्र तो बढ़ा ही सकते हैं, खुद को सदा जवान रख सकते हैं, अल्झीमार जैसे रोग को भी कभी पास नहीं फटकने दे सकते हैं।

डा. राहुल टंडन की मेल काफी लंबी थी, जिसमें उम्र को लेकर एक पूरा लंबा विश्लेषण है जो काफी रोचक है। पर मैं वो हिस्सा डाल रहा हूं जिसे अमल में लाने से आप हम फायदे में रह सकते हैं.....


HOW TO STAY YOUNG

1. Throw out nonessential numbers. This includes age, weight and height. Let the doctors worry about them. That is why you pay "them."

2. Keep only cheerful friends. The grouches pull you down.

3. Keep learning. Learn more about the computer, crafts, gardening, whatever. Never let the brain idle. "An idle mind is the devil's workshop." And the devil's name is Alzheimer's.

4. Enjoy the simple things.

5. Laugh often, long and loud. Laugh until you gasp for breath.

6. The tears happen. Endure, grieve, and move on. The only person, who is with us our entire life, is ourselves. Be ALIVE while you are alive.

7. Surround yourself with what you love , whether it's family, pets, keepsakes, music, plants, hobbies, whatever. Your home is your refuge.

8. Cherish your health: If it is good, preserve it. If it is unstable, improve it. If it is beyond what you can improve, get help.

9. Don't take guilt trips. Take a trip to the mall, even to the next county; to a foreign country but NOT to where the guilt is.

10. Tell the people you love that you love them, at every opportunity.


AND ALWAYS REMEMBER :

Life is not measured by the number of breaths we take,but by the moments that take our breath away.

लाखों की आस लाखटाकिया कार.

भारत की जनता को टाटा मोटर्स कम्पनी ने नए साल का तोहफा देते हुए गुरुवार १० जनवरी को दिल्ली में लखतकिया कार नैनो को लोगों के दर्शनार्थ प्रस्तुत किया.इस अवसर पर टाटा समूह के मुखिया रतन टाटा ने कहा की यह पीपुल्स CAR है और इससे लाखों करोड़ों लोगों के सपने जुड़े हुए हैं....
नैनो दुनिया की पहली सस्ती कार है जो आम लोगों की पहुँच में होगी.इस CAR के आते ही तथाकथित पर्यावरणविद लोगों को चिंता सताने लगी है. जैसे इसके पहले दुनिया की सारी कारें एनवायरनमेंट फ्रैन्दली थीं,
ये कार सेफ नही है.....ट्रैफिक में प्रॉब्लम करेगी, ये करेगी, वो करेगी.........
साथियों, क्या ऐसा नही लगता की आम लोगों के साथ एक पूरा षडयंत्र रचा जा रहा है इसके बहाने. जब भी गरीब के मजे लेने की बात आती है बुर्जुआ वर्ग में खलबली मच जाती है. नैनो के आने के पहले कौन सी कारों की कमी थी जो आज ये पर्यावरण के लिए हानिकारक हो गयी.अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को यही कार पाटेगी. यकीनन नैनो कार सर्वहारा के लिए आधुनिक क्रांति का माध्यम बनेगी.

phir चार line

यशवंत भाई। हिंदी में लिखने की सलाह देने के लिए बधाई। राष्ट्रभाषा में पहली चार लाइनें भड़ास को समपिर्त हैं। और साथियों की थोड़ी दाद मिले तो बात बन जाए। तो लीजिए हाजिर हैं भड़ास पर ही चार है या लाइनें। आस है, विश्वास है, सायास है, अनायास हैटीम का सद्प्रयास फिर कयास हैसीनियर कह सकते हैं फ्रस्टेटेड लोगों की बकवास है पर मीडियाकमिर्यों के मन की बातों का वास्तविक मंच भड़ास है।

;ej नेफ्व फ्ह्ज

/म्ब्क्स्ल एर, फुक्सोर क्स्क्स फ्न्क्व्स कर मनु ओस्व्स कस फंस योएर>

आज बहुत खुश हूँ में ?

सभी लिखने वालो को मेरा नमस्कार .......................
अभी यशवंत जी का फ़ोन आया ....
फीड बेक यानी प्रति पुष्टि से मेरी आंखो में नमी आ गई शायद जागते हुए हिन्दुस्तान को देख पाने का सुख इस का कारण है ....आखिरकार मेरी कल्पना सच हुई .................सवाल यही उठता है की आख़िर इन ब्लोगों की परिभाषा बदल क्यों रही है .....एक चैनल में प्रतिबंधित ब्लोगों से आख़िर क्या होगा? सच तो यह है कि वो लोग इन ब्लोगों की ताकत को जान चुके है ,,,,,लेकिन उनकी यह कोशिश हम सफल नही होने देंगे .......... ढेर सारे तेवरदार ब्लागों की पत्रकारिता को मेरा सलाम भड़ास, मोहल्ला, कस्बा...लंबी लिस्ट है। सफल पत्रकारिता की सफलता को मेरा सलाम। फोन नम्बर हटाने का मकसद मेरा डरना कतई नही है ...सिर्फ गुरू जी है जो मुझे ब्लोग्स तक लेकर आये, उनका आदेश है जो वास्तव मे अच्छा था....................उम्र में बहुत छोटा हू पर आप सभी से एक अनुरोध्कर्ता हू की एक चैनल में प्रतिबंधित ब्लोगों पर अपनी राय दे। अब हमको पहल करनी है।

टीवी न्यूज चैनल की पायल, अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद और लखनऊ के पत्रकार शीलेश

ये तीन घटनाक्रम हैं। तीनों बेहद गंभीर। क्या करा जाये? क्या किया जा सकता है? उम्मीदें तो लोग बहुत पालते हैं लेकिन पहल कोई नहीं करता। बकचोदी तो बहुत सारे लोग करते हैं, लेकिन जब कर दिखाने का दौर आता है तो सब अपने अपने आरामदायक खोल में छिपे रहते हैं, कोई आगे आकर मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता। पर हम अपने खोल में रहकर भी कुछ चीजें कर सकते हैं। और, वही मैंने आज किया। भड़ास में इन तीनों मुद्दों को देखने के बाद मैंने तो पहले अपने कर्तव्य के बारे में चिंतन किया, फिर जुट गया। फिलहाल सब फोन पर और मौखिक है, लेकिन इससे एक नींव सी बनती दिख रही है, बशर्ते बाकी साथी भी थोड़ा थोड़ा कर्तव्य निभा दें।

मैंने ये तीन काम किये--

पहला काम--
एक टीवी न्यूज चैनल की रिपोर्टर पायल सिंह के सड़क हादसे में घायल होने को उस मीडिया हाउस ने अगर पत्रकारिता पर हमला बना दिया, तो यह बेहद शर्मनाक और निंदनीय है। इस सच्चाई को बयान करने वाले भड़ासी आशीष जैन को ढेर सारी बधाइयां, जो उन्होंने साहस के साथ इस बात को सबके सामने उजागर किया। आशीष की बहादुरी तो देखिए कि उन्होंने ये बातें कहते हुए अपनी मेल आईडी और मोबाइल नंबर भी भड़ास पर डाल दिया है। है किसी माइ के लाल में यह गूदा? पत्रकारिता में बड़े बड़े चारण भाट टाइप के लोग सिद्धांत इसलिए बघारते हैं क्योंकि उनके मुंह में बवासीर का मर्ज होता है और जय जय इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें तेल लगाते हुए गांड़ मराते हुए आगे बढ़ना होता है।

आशीष जैसी नई उम्र की पौध विश्वास बंधाती है कि इस बेहद गंधियाये, गोबरियाये और हगियाये हुए माहौल में भी सच को पूरे सच के साथ कहने वाले लोग हैं। भई, अपन तो इस लौंडे को दिल से सलाम कहते हैं, साथ में निवेदन की अपने को संभालकर रखना मेरी जान, बड़े कीमती हो।

मैंने आशीष को उनके मोबाइल नंबर पर फोन कर बधाई दिया, और संपर्क में रहने अनुरोध किया, भविष्य में किसी दिक्कत या मुसीबत में हर क्षण उपलब्ध होने का भरोसा दिया। साथ ही, थोड़ी नसीहत भी कि जोश के साथ होश बनाए रखना और सच कहने के साथ सच के पक्ष में तथ्य जुटाए रखना भी जरूरी है ताकि कल को किसी स्थिति में अपने सच्चाई के पक्ष में सुबूत भी दिखा सकें।


दूसरा काम--

अलीगढ़ के न्यायाधीश अंगद सिंह को जो त्रासदी झेलनी पड़ रही है, उसे उजागर करते हुए डा. रुपेश जी ने जो कुछ लिखा, वह सराहनीय है। उन्होंने अपनी पोस्ट में एक मोबाइल नंबर भी दिया है, जो अंगद सिंह जी के सबसे छोटे भाई का है। इस नंबर पर एसएमएस कर उनकी मुहिम में साथ होने का अनुरोध किया है। डाक्टर साहेब के आदेशों का पालन करते हुए मैंने एसएमएस करने के बजाय सीधे फोन किया और मैंने जज साहब के छोटे भइया से कहा कि दिल्ली आवें, तो जरूर बतायें। हम लोग आपके साथ हैं। पूरा भड़ास आपके न्याय के युद्ध में आपका हिस्सा बना रहेगा। उन्होंने दिल से शुक्रिया अदा किया और लगातार संपर्क में रहने की बात कही।

तीसरा काम

लखनऊ के पत्रकार शीलेश की जो दास्तां भड़ास पर उजागर हुई है, उसके बाद आगे की कार्रवाई के लिए मैं मैंने अपने कानपुर आईनेक्स्ट के दद्दा और सीनियर मीडिया मैन अनिल सिन्हा जी से बात की। उनसे अनुरोध किया कि जिस तरह उन्होंने कानपुर में आईनेक्स्ट के पत्रकार पर हमले के दौरान पूरे भड़ास को तथ्यों और घटनाओं से अवगत कराया, उसी तरह इस मामले में थोड़ी सी पहल करें और शीलेश के प्रकरण के तथ्य जुटाकर भड़ास पर प्रेषित करें ताकि हम आगे की कार्रवाई कर सकें।

शीलेश का अगर मोबाइल नंबर मिल जाए, वो अफसर जो उड्डयन विभाग में सर्वोच्च पद पर तैनात है, उसका नाम और मोबाइल नंबर आदि मिल सके तो फिर हम लोग कुछ समुचित कार्रवाई की दिशा में बढ़ सकें।

दादू अनिल सिन्हा जी ने वादा किया कि वे आज आफिस पहुंचते ही इस मामले को देखेंगे।


अंत में...डा. मांधाता सिंह से अनुरोध करूंगा कि वो भी अपने संपर्कों संबंधों के जरिये इस मामले के तथ्यों का पता करें। लखनऊ के भड़ासी साथियों और अन्य संवेदनशील बंधुओं से अनुरोध है कि वो शीलेश के मामले के लैटेस्ट अपडेट्स से हमें अवगत करायें। वे खुद पहल करते हुए शीलेश से संपर्क साधें। ताजा डेवलपमेंट क्या है, प्रशासन ने क्या स्टैंड लिया है, बाकी पत्रकार बंधु क्या कर रहे हैं, इस सब के बारे में बतायें।

फिलहाल इतना ही,
जय भड़ास
यशवंत

बड़ी खबर

अब तक की सबसे बडी खबर यही है की पायल सिंह वाली खबर चलाने वाले टीवी न्यूज चैनल के सभी लोगो को ये बता दिया गया है की पायल सिंह वाली न्यूज़ को ना चलाए।

गलती का पता तो चला ।

आखिरकार हमारा मकसद पूरा हो ही गया।

आप अपनी राय दें।

फिलहाल तो हार गया झूठ फैलाने वाला न्यूज चैनल।

सभी ब्लोगरो को मुबारकबाद।

शर्मसार हुआ मीडिया

क्या आप जानते है पायल सिंह, जो एक टीवी न्यूज चैनल की पत्रकार हैं, को मारने की घटना पूरी तरह से गलत है।
जब यह बात उस टीवी न्यूज चैनल को पता चली तो सभी लोगो को यह संदेश दिया गया कि पत्रकारिता पर हमला हुआ है / खैर लोगो को बेवकूफ बनाना उनका परम धर्म है जो वो करते रहते है..... आप से trp लेना उनका काम है और वो लोग अच्छी तरीके से ये काम कर रह्वे है -दुर्भाग्य देखिए। खबर बिल्कुल पक्की है वो सिर्फ एक एक्सीडेंट था ..टीवी न्यूज चैनल वाले पायल सिंह से नाराज है क्योंकि पायल इस मुद्दे पर शांत है।

क्या आप मेरी राय से एतेफाक रखते है......यह मेरी बात को भी साबित करता है ........और भी है खबरे पढ़ते रहे हिन्दी ब्लोग्स। में कोई भड़ास नही निकाल रहा बल्कि गणेश शंकर विधार्थी और प्रभाष सिंह में फर्क बता रहा हूं। अपनी राय मुझे दे।

जस्टिस आनंद सिंह

आज जो लिख रहा हूं वो मात्र भड़ास नहीं पीड़ा भी है । मेरे हाथ दिनांक ०४/०६/२००४ का "राष्ट्रीय सहारा"(दिल्ली) का एक पेज लगा तो पढ़ कर बहुत कुछ %)(*(॓%ऽ‍ **??\\// मन और मुंह से निकला । आप भी जरा इस समाचार पर नजर डालिए .......
न्याय देने वाले न्यायाधीश को भी नहीं मिला न्याय
राकेश नाथ
नई दिल्ली , ३ जून
------------------------
सभी को न्याय देने वाले न्यायाधीश को न्याय न मिले , यह जानकर तो किसी को भी हैरत होगि ,लेकिन यह सच है कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ कोर्ट के न्यायाधीश आनंद सिंह को न्याय पाने के लिये दर-दर भटकना पड़ा । इतना ही नहीं वे न्याय पाने के लिये उच्च न्यायालय , न्याय एवं विधि मंत्रालय से लेकर राष्ट्रपति तक इसकी गुहार कर चुके हैं , लेकिन इन्हें न्याय नहीं मिला । अपने देश की न्याय प्रणाली से स्वयं असंतुष्ट व दुखी हो कर भूख हड़ताल शुरू कर दी । देश की न्याय प्रणाली से श्री सिंह का भरोसा उस दिन उठ गया जब उन्होंने न्यायोचित कार्य किया और कोर्ट ने भी उनका साथ नहीं दिया । यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी न्याय देने के बजाय अपना दरवाजा बंद कर दिया । वर्ष १९९३ में सविल जज आनंद सिंह अलीगढ़ में नियुक्त थे । एक दिन उनके घर पर बरना थाना का थानाध्यक्ष एक व्यक्ति का रिमांड लेने पहुंचा लेकिन थानाध्यक्ष कोर्ट नहीं पहुंचा और सीधे मुख्य न्याय अधिकारी हरीश चंद्र अरोड़ा से आरोपित व्यक्ति के लिये दो बार
रिमांड ले लिया । तीसरी बार रिमांड लेने के लिये वह श्री सिंह की कोर्ट जा पहुंचा ,जहां पुलिस ने अपनी हिरासत में रखे गये आरोपित के बयान पर रिमांड मांगा लेकिन श्री सिंह ने रिमांड देने को कानून के विरुद्ध ठहराते हुए अभियोजन पक्ष(पुलिस) को ३४० का कारण बताओ नोटिस दे दिया । श्री सिंह के इस फ़ैसले से उनके जीवन में परेशानियों का सिलसिला शुरू हो गया .......................
खबर तो लम्बी है इसलिए मैने इस बात की पड़ताल खुद करने का फ़ैसला करा तो जान कर दिमाग की \\=//**॒॓॑ हो गयी । आप सब भी नतीजा जान लीजिये कि जस्टिस आनंद अब तक उसी पीड़ा से जूझ रहें हैं और उनका परिवार यानि भाई ,पिता वगैरह भी इतना कष्ट झेल चुके हैं कि उनके इरादे चट्टानी हो चले हैं और संविधान पर अटूट विश्वास रख कर लड़ाई जारी रखे हैं ।
अब देखना यह है कि आप सब भड़ासी मिलकर क्या करते हैं जो इस देश के न्याय प्रणाली में बैठे लोगों को कानून का पालन करने के लिये बाध्य कर पाए या फिर बस विधवाओं की तरह छाती पीट कर रह जाएंगे । मैं आप सबको उनके जुझारू भाईयों में से एक का मोबाइल नंबर लिख रहा हूं ,आप बस उन्हें एक SMS कर दीजिए कि हम बस भंकस करने वाले नहीं हैं (यार आप लोग यकीन करो कि मैंने पैसे नहीं लिये हैं जैसा कि पत्रकारों पर लोग सामान्य तौर पर सन्देह करते हैं) 09892836613

17.1.08

शीलेश की ज़िंदगी के लिए हम सब एकजुट हैं

लखनऊ के शीलेश के बारे में जो खबर भड़ास पर आई है, दरअसल वो नई नहीं है। जिन हालात में हम हिंदी पत्रकार जी रहे हैं, उनमें तनिक भी रिस्क लेने वाले की हालत यही होती है। डा. मांधाता सिंह ने शीलेश के बारे में जो खबर दी है, उसे पढ़कर पहले पहल तो सदमा लगा लेकिन बाद में एहसास हुआ कि क्या हम हिंदी मीडिया वाले इतने मर चुके हैं कि किसी हरामजादे, कुत्ते, सूअर टाइप के अफसर से निपटने में पूरी तरह अक्षम हो गए हैं। इन भ्रष्ट अफसरों के बारे में कौन नहीं जानता, पहले पहल तो ये चाहते हैं कि पत्रकार ही भ्रष्ट हो जाए, बाद में जब मालूम होता है कि पत्रकार भ्रष्ट नहीं होना चाहता तो उसे वह दरकिनार करना शुरू करते हैं, जब पत्रकार उसके खिलाफ कुछ तथ्यपरक लिखता है तो उसे वह भुगत लेने की धमकी देता है और कई बार कर भी दिखाता है। लगता है, इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है, पर सच्चाई जानने की हम प्रतीक्षा करेंगे। पत्रकारिता के सिद्धांतों में एक यह भी है कि दोनों पक्षों की सुनी जाय। लखनऊ और कानपुर के मित्रों से अनुरोध है कि अगर वो शीलेश का मोबाइल नंबर मुझे उपलब्ध करा दें, तो महती कृपा होगी।

शीलेश के मामले में अगर डा. मांधाता सिंह की सूचना पर भरोसा करें तो शीलेश उड्डयन विभाग के किसी अफसर से त्रस्त होकर आत्महत्या करना चाहते हैं। पहले पहल तो हम शीलेश से अनुरोध करेंगे कि वो न्याय के लिए अकेले जंग लड़ने की बजाय अपने पत्रकार दोस्तों-साथियों को इकट्ठा करें। भड़ास उनके संग है। दिल्ली आएं और हम सब मिलकर कुछ कर गुजरा जाए। दोस्तों-साथियों-शुभचिंतकों को एकजुट किया जाये। कई तरीके हैं न्याय पाने के। अगर न्याय नहीं मिल रहा तो पहले खुद क्यों मरे, उसे निपटा दिया जाये, परेशान किया जाये, खबरदार किया जाये, जिससे दिक्कत है। बाद में जो होगा देखा जायेगा।

भड़ास में ही एक साथी ने डर नामक एक पोस्ट में इस लोकतंत्र की जो हालत बयां की है, उसे पढ़कर मैं सचमुच सिहर गया। मैंने वहां कमेट भी लिखा। कई बार ब्लागिंग करते हुए लगता है कि दरअसल अकेले-अकेले जीने से हम समझदार और ईमानदार और संवेदनशील लोग जो कुछ खो रहे हैं, शायद वे सब एक मंच पर आकर हासिल कर सकने की सोच सकते हैं।

मेरा हिंदी मीडिया के सभी पत्रकार मित्रों के अनुरोध है कि वे इस मामले पर संजीदगी दिखाएं। खासकर लखनऊ वाले पत्रकार साथियों से यह कहना चाहूंगा कि वे शीलेश को लेकर दिल्ली आ सकें तो हम यहां उनके साथ एक नई रणनीति बनाकर न्याय पाने की जंग छेड़ेंगे। भड़ास इस मुहिम में साथ है। बस, देर केवल इस बात की है कि जब तक इस लोकतंत्र के पायों को हिलाया न जाये, न्याय नहीं मिल सकता। भड़ास के लिए शीलेश की ज़िंदगी एक चुनौती है। हमें इस भाई और साथी को बचाना होगा।

लखनऊ कानपुर के अपने सभी साथियों दोस्तों से अनुरोध करूंगा कि वे इस मामले की अद्यतन रिपोर्ट भड़ास में प्रेषित करें। आगे की समुचित कार्रवाई जल्द की जायेगी।

जय भड़ास
जय शीलेश

यशवंत

पत्रकार ने माँगी राष्ट्रपति से मौत !


उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक पत्रकार ने सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग के आला अफसरों से त्रस्त होकर राष्ट्रपति से आगामी 26 जनवरी, 2008 तक परिवार सहित इच्छामृत्यु की अनुमति माँगी है, ताकि गणतंत्र दिवस के पवित्र दिन वह सुकून के साथ सपरिवार अपनी जान दे सके। मनोरमा कंपाउंड, सिंधुनगर (लखनऊ) निवासी पत्रकार शीलेश त्रिपाठी ने महामहिम राष्ट्रपति को गत 28 दिसंबर को पत्र लिखकर बताया है कि उसने वर्ष 2003 में राज्य के नागरिक उड्डयन विभाग में कथित देशद्रोह और भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ पत्रिका 'प्रेडीकेट मीडिया' में अभिलेखीय साक्ष्य सहित समाचार प्रकाशित किया था, जिसके बाद विभाग के आला अधिकारियों ने संगठित होकर अपने प्रभाव व धन-बल के बल पर शासन, प्रशासन एवं अन्य अधिकारियों से साँठगाँठ कर पत्रकार एवं उसके परिवार के लोगों का उत्पीड़न शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है कि राजकीय उड्डयन विभाग का यह अधिकारी अब सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान है।

त्रिपाठी ने अपने पत्र में लिखा है कि सरकार के उच्चाधिकारियों ने पुलिस एवं माफियाओं से भी उसे परेशान कराना शुरू किया और गलत तरीके से उसके ऊपर कानपुर जिले में मुकदमे दर्ज कराकर एकपक्षीय कार्रवाई कराते हुए मानवाधिकारों का हनन कर पुलिस के माध्यम से वह लोग प्रताड़ित करा रहे हैं। इन्हीं अधिकारियों के इशारे पर पिछले दिनों उसे पकड़वाकर जेल भिजवाया गया। अब इस पत्रकार का कहना है कि अब उसको सपरिवार जान से खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।

राष्ट्रपति को भेजे पत्र में त्रिपाठी ने लिखा है कि वह न्याय पाने की आशा में लखनऊ, कानपुर की जिला अदालतों एवं उच्च न्यायालय की इलाहाबाद एवं लखनऊ खंडपीठ में भी गया किन्तु उसे न्याय नहीं मिला।

त्रिपाठी का कहना है कि जबसे उसने राज्य के नागरिक उड्डयन विभाग से संबंधित समाचार छापा एवं विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जाँच हेतु सीबीआई को प्रमाण सहित अभिलेख प्रेषित किए तभी से उसके एवं परिवार के लोगों का लगातार पुलिस, माफियाओं, शासन, प्रशासन के अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न कराया जा रहा है। शीलेश ने आशंका व्यक्त की है कि यह लोग किसी भी क्षण किसी घटना या दुर्घटना की आड़ लेकर उसे एवं उसके परिवार के लोगों की हत्या अवश्य करा देंगे।

शीलेश ने पत्र में लिखा है कि वह एवं उसका परिवार तड़प-तड़पकर मरना नही चाहता। उसने न्यायहित में राष्ट्रपति से अपील की है कि वह दया करते हुए उसे एवं उसके परिवार के लोगों को ससम्मान सुकून से प्राण त्यागने हेतु इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान करने की कृपा करें।

त्रिपाठी ने लिखा है कि वह एक देशभक्त तथा भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य के संविधान एवं न्यायपालिका में पूर्ण आस्था और श्रद्धा रखने वाला नागरिक एवं पत्रकार है। उसके परिवार के लोग आत्महत्या करने का विधिविरुद्ध आपराधिक कृत्य नहीं करना चाहते, इसलिए उसे एवं उसके परिवार के लोगों को 26 जनवरी तक दया करते हुए विधिसम्मत तरीके से इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए।शीलेश त्रिपाठी ने यह भी लिखा कि वह और उसके परिवार के लोग 26 जनवरी के पवित्र दिवस को सुकून के साथ सपरिवार प्राणोत्सर्ग को तैयार हैं।
( लखनऊ से अरविन्द शुक्ला, गुरूवार, 17 जनवरी 2008. वेबदुनिया ने इस खबर को छापी है। )