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20.2.08

भड़ास और गालियाँ

भड़ास पर गालियों को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू हो गयी है. भड़ास पर गालियां लिखी जायें या नहीं इस पर जम कर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. हम अपनी भड़ास गालियों के माध्यम से निकालें या नहीं यह भले ही बहस का मुद्दा बने, पर आम जीवन में यह बिल्कुल भी अस्वीकायॆ नहीं है. यहां मैं किसी साहित्यकार या रचनाकार का उदाहरण नहीं, बल्कि खुद एक चुटकुला या यूं कहें की लोकोक्ति के बारे में लिखना चाहूंगा, जो मेरे गृह जनपद गोंडा की शान बन गयी है. इसके पहले बताते चलें कि बनारस की तरह गोंडा में भी गालियों के बिना बात करना संभव ही नहीं है. मान लीजिए कोई अच्छा काम करता है, तो कहा जाता हैः वाह सार, बड़ा नीक काम किहिस हो. और अगर कुछ गड़बड़ हो गयी, तब तो ... कुछ इस अंदाज में प्रतिक्रियाएं मिलेंगी, मारो सारवा के.. बेटी...बड़ा ...है इत्यादि. हां तो बात कर रहा था लोकोक्ति की. हुआ कुछ यूं की एक बार एक सज्जन ट्रेन में यात्रा कर रहे थे. सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन से बात शुरू हुई तो पता चला कि वह गोंडा के हैं. उन्होंने कहा, भाई साहब सुना है गोंडा के लोग बिना गाली दिये बात ही नहीं कर पाते हैं. इस पर सामने वाले सज्जन का जवाब था, कौन भोंसड़ी वाला मादर... कहता है? अब बताइये जो चीज हमारे दैनिक जीवन में बस गयी हो उससे कैसे बचा जाये. हालांकि लोगों के अपने-अपने विचार हो सकते हैं. और सही भी है, एक सभ्य समाज के लिए. पर हम इससे बच पायेंगे इसमें संदेह है. बिना गाली के भड़ास, तब तो भड़ास रह ही नहीं जाती. सक्षम हुए तो सामने, नहीं तो पीठ पीछे गरियायेंगे जरूर. हालांकि मेरी इस पोस्ट का कतई यह मतलब नहीं है कि मैं पूजा जी या नीलिमा जी या किसी और की खिलाफत कर रहा हूं. ऐसा भी नहीं है कि मैं उनकी नाराजगी के डर से ऐसा कह रहा हूं. पर...यह जो पर, लेकिन, किंतु, परंतु...इत्यादि शब्द हैं, न यह बहुत कुछ कह और समझा जाते हैं. आगे जय भड़ास

11 comments:

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...
This comment has been removed by the author.
रवीन्द्र रंजन said...

मेरा विचार है कि गालियों का प्रयोग नहीं होना चाहिये। लेकिन ब्लाग यशवंत जी का है जो वह चाहेंगे वही होगा। हमारी सुनेगा भी कौन।

अविनाश वाचस्पति said...

गाली न देना भला
लेना तो कोई चाहता ही नहीं
न देंगे आप तो ही लाभ
बिना गालियों के भी तो
कर सकते हैं प्रलाप
आलाप विलाप
सता सकते हैं संताप
बुझ सकते हैं
दिमाग के ताप
गिर क्यों गाली
जो हैं गन्दी नाली
उसे सूंघ सूंघ कर
भाषा गन्दी कर डाली
डाली होती है अच्छी
फूलों की हो या पेड़ की
डाली पर क्यों उगे गाली
चलो गाली वाली डाली
तोड़ डालें यशवंत भाई आप
कुछ गलत हो गया हो
तो कर दें माफ
पर मत करें गालियों में बात.

अविनाश वाचस्पति said...

एक पंक्ति सुधार कर पढ़ें

फिर क्यों गाली

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

अविनाश भाई,हम तो वही पढ़ेंगे जो पहले लिखा है नही पढ़ते सुधार कर जाओ क्या करोगे आप ?
ही ही ही...
भाई लोग यशवंत भाई का ब्लाग है और वो ठहरे तानाशाह ,ज्यादा भंकस करा तो पता पड़ा कि भड़ास डिलीट कर दिया कि अब दोलो सालों । इस लिए ज्यादा मचमच नही करने का,गपचुप काम करने का ....
जय जय भड़ास

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

are ab kitna bahas khinchoge bhai log, gali jaroori hai aur nhi bhi, sbka ek avsr hota hai, koi niym nhi bn skta

अविनाश वाचस्पति said...

डाक्टर साहब,
आप तो इलाज करने वाले हैं, भगवान के समरूप.
यह तो मैं भी जानता हूं कि मेरे कहने से कुछ नहीं होने जाने वाला.
मैं कुछ करूंगा भी नहीं, इतना तो है आपको विश्वास भी.
मुझे भी है विश्वास कि आप सुधार कर नहीं पढ़ेंगे, पर उम्मीद है कायम कि जो सुधरना चाहते हैं, वे सुधर ही जाते हैं, वैसे इसके अपवाद भी हैं बहुत. इसके ही क्यों, अपवाद तो सभी के होते हैं. आप न तो सुधरें, न सुधार कर ही पढ़ें, हमने सारे जमाने का ठेका थोड़ी ले रखा है, न ही इच्छा रखते हैं.
आप कह भी चुके हैं कि हम क्या कर लेंगे, हमने स्वीकार भी लिया है कि हम कुछ नहीं करेंगे और करना भी नहीं चाह्ते हैं.
रही बात तानाशाही की तो मुझे तो किसी भी कोण से यशवंत भाई न तो ताना देने वाले ही लगते हैं, और जो ताना नहीं देगा उसकी फितरत में तानाशाही तो होगी ही नहीं.
आप न जाने क्यों उन्हें हिटलर बताना चाह रहे हैं.हमें तो वे जन जन के चहेते, हर जन के चहेते नज़र आ रहे हैं,उनकी दिनोंदिन बढ़्ती लोकप्रियता तो यही जतला रही है. आप ही बतलायें कि क्या वे आपके चहेते नहीं हैं या आप उनके चहेते नहीं हैं. हम भी उनके चहेते हैं, वे भी हमारे चहेते हैं, इसलिये हम भी चहक रहे हैं, पर क्या आपको लगता है कि बहक रहे हैं.
हरे प्रकाश उपाध्याय जी का कहना भी सही है कि नियम नहीं बन सकता, मैं भी कहता हूं नियम नही बनना चाहिये क्योंकि नियम में है यम चिपका. और चिपकाना चिपकना पिचकना नहीं कभी भी अच्छा.
हम फिर भी कहेंगे कि गाली नहीं बन सकती कभी अच्छा रस्ता. न बनें इतना सस्ता. शेयर की तरह चढ़ें, पर गिरें मत शेयर की तरह. रहे शेर की तरहा, जैसे रहते हैं यशवंत प्रहा (भाई).

Praveen said...

गालियों में नहीं है बुराई
जब तक दे रही हैं दिखाई
पर नहीं दे रही हैं सुनाई
सुनाई दे सिर्फ भाई भाई

shirish said...

kabhi hota hai pachtava ke
mai gali bhi de nahi sakta
kabhi hota hai dukhi ke
mai asabhya bhasha sun nahi sakta

Anonymous said...

kabhi hota hai pachtava ke
mai gali bhi de nahi sakta
kabhi hota hai dukhi ke
mai asabhya bhasha sun nahi sakta

Anonymous said...

kahi lagta hai agar gali na hoti to...
kabhi lagata hai us vakt gali di hoti to....
ghus ghut ke jinese gali acchi hoti hai...
dimag ka falooda par jaban sacchi hoti hai....
par aajse na dunga kise gali...
par rasteme kabhi milna mat sawali....