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8.5.08

किस काबिल हूं मैं

आज दोपहर में (हमारे लिये सुबह) घर से आफिस के लिए आ रहा था. रास्ते में एक जगह पर देखा कि एक अद्धॆविक्षिप्त सा युवक एक पूरी तरह से नग्न अधेड़ महिला (शायद उसकी मां रही होगी) को फुटपाथ से गोद में उठाने की कोशिश कर रहा था. कुछ सोच पाता इससे पहले नजर घड़ी पर पड़ गयी. दो बज कर बीस मिनट हो रहे थे और आफिस पहुंचने का टाइम दो बजे का है. काडॆ जो पंच करना होता है. बस उनके लिए कुछ करने की कौन कहे, सरपट आफिस के लिए भाग लिया. बस तभी से आत्मग्लानि से भरा हूं. आखिर वे भी तो इंसान थे. क्यों नहीं मैं उनके लिए कुछ कर पाया. भले ही वह महिला पागल रही हो, क्या मैं उसके लिए एक धोती नहीं खरीद सकता है, जबकि पान मसाला पर दिनभर में कम से कम तीस रुपये खचॆ होते हैं. यही सोच रहा हूं और दिल में रो रहा हूं. आखिर में लौटा और उसी स्थान पर गया, पर वे दोनों नहीं मिले. क्या करूं?????????????????????????

7 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

विशाल भाई अगर अब तक ग्लानिबोध जीवित है तो ईश्वर अगली बार अपने इस तरह के दरिद्रनारायण रूप की सेवा का मौका जल्द ही देंगे तब मत चूकियेगा...

Ankit Mathur said...

शुक्ला जी, आपने जिस अनुभव के बारे में लिखा है
इस स्थिती से कई लोग गुज़रते हैं और शायद ९९
प्रतिशत व्यक्ति वो ही करते हैं जो कि शायद आपने किया, मै आपके द्वारा लिये गये निर्णय को को उचित या अनुचित नही ठहरा सकता पर बस ये ही कह सकता हूं कि आप आत्मग्लानि के शिकार ना हों। आजकल की इस भागदौड़ से भरी ज़िन्दगी में हम लोग अक्सर मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ कर अपने अपने लक्ष्य की ओर बढ जाते हैं।
ये एक बेहद अच्छी बात है कि आपके अंदर का
इंसान जागा हुआ है। और उसमे समाज और मानवता के प्रति संवेदना बची है नही तो यहां तो लाखों करोडो लोग ऐसी स्थिती में नाक भों सिकोड़ कर आगे बढ जाते हैं।
जय भडास...

भागीरथ said...

शुक्‍ला जी, जिन्‍दगी में अक्‍सर ऐसा होता है कि हम अपने में इतने लिप्‍त हो जातें है कि दूसरों की तकलीफों से हमें दर्द तो होता है लेकिन हमारे पास इतना समय नहीं होता की उसकी वो तकलीफें दूर कर सकें। हमारे दिल को उनकी तडप का एहसास तो होता लेकिन उनकी समस्‍या को दूर करने के संसाधन और समय नहीं होता। अपने आपको आत्‍मग्‍लानि से बचाएं। ईश्‍वर आपको शीघ्र ही ऐसे लोगों की मदद करने का मौका देगा। कम से कम आपको एहसास तो है वर्ना यहां तो लोगों संवेदनाएं एकदम मर चुकी हैं। निराश न हों।

KAMLABHANDARI said...

vishalji ab pachtaye hoth kya jab chidiya chug gai khet. par aapko apne kiye par sarmindagi hai isshse ye pata chalta hai ki aainda kabhi esha hua to app turant madad ko aage bahandege.waishe sarminda hone ki koi jarurat nahi hai jo hota hai acche ke liye hi hota hai kyuki agar aap unki madad kar bhi dete to shyad dukhi logo ke baare me itna nahi soch paate , unke dukh ko ush tarha mahsus nahi kar paate jese ab kar paa rahe hai.mujhe pura yakin hai ki ab aapke saamne kitne bhi dukhi log jinhe kisi ki madad ka intjaar hai kyu na aaye aapke haat turant bina der lagaye madad ko aage badehange.

यशवंत सिंह yashwant singh said...

विशाल भाई, इमोशन वाले बंदे हैं आप। हमेशा से रहे हैं। मैं आपको कानपुर आईनेक्स्ट से जानता हूं। तभी तो कहता हूं कि विशाल अपना संत है। असली साधु है। केवल गेरुवा नहीं पहना है, टीका नहीं लगाया है। दुनियादार के वेष में आत्मा से संत है। और आजकल के जो गेरुवाधारी और टीकाधारी हैं वे ससुरे तो कहीं से संत नहीं है, वे एक्टर और ठग हैं। असली संत तो कभी सबके सामने नहीं आता। वो चुपचाप करता रहता है, रोता रहता है, जीता रहता है....

आप दुबारा उस स्थान पर गए, ये क्या कम है भाई। ये बताता है कि आप सच्चे इंसान हैं। आप इंसान के वेष में भगवान हैं। जी, कलयुग में भगवान ऐसे ही होते हैं। वो जो टीवी पर दिखते हैं और वो जो किताबों में पढ़े जाते हैं, वो भगवान जाने थे भी या नहीं, मुझे नहीं मालूम क्योंकि मुझे तो इस जन्म में वैसे कोई दिखे नहीं। तो जो दिख रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं भगवान मानूं।

आप अपनी भावनाओं को यूं ही मनुष्यता के लिए लगाए रहिए, हम सब आपसे प्रेरणा लेते रहेंगे।

शुक्रिया साथी, ये पोस्ट डालने के लिए...
यशवंत

Anonymous said...

विशाल भाई,
आपने सच मच में सोचने को मजबूर कर दिया है. आप किस काबिल हो ये तो आपने साबित किया है ही बहुतो मेरे जैसे पर प्रश्नचिंह भी लगाया है. गुरु आपके विशाल ह्रदय को मेरा नमन.

जय जय भडास

VARUN ROY said...

आपका पोस्ट ही साबित करता है कि अगली बार आप ऐसा मौका हरगिज नहीं चूकेंगे. आप बिल्कुल मेरे बड़े भाई जैसे हैं . हाँ वो ऐसा कोई मौका नहीं चूकते और इस वजह से कई बार उनकी नौकरी जाते-जाते बची.
वरुण राय