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22.10.08

जिंदगी `प्योर झंड´ है भाई...

कई दिनों से सोच रहा हूं- पुराने जमाने में ऋषि-मुनि आखिर क्या पीते-खाते थे, जिंदगी सुहानी धूप सी नजर आती थी। बिल्कुल मस्त-मौला। न खाने की न पहनने की टेंशन। पर अपनी? हैडिंग पढ़ चुके होंगे- जिंदगी `प्योर झंड´ है भाई...! कैसे? अरे भई इस सोच-विचार में अपनी जिंदगी को झंड ना करें और चुपचाप मेरा दुखड़ा सुनते रहें। पहला स्पष्टीकरण तो यह देना चाहता हूं कि आप लोग जिस `झंड´ शब्द को अश्लील मान रहे हैं, वह कदापि नहीं है। इस शब्द के बारे में टुच्चे विचार मन में कभी आना ही नहीं चाहिए। झंड तो ऐसा परोपराकारी है, जो बिना किसी मतलब और स्वार्थ के अपने-आप पनपता है। आपने देखा होगा- रेल की पटरियों के आसपास, खेतों में जरूरी पौधों के आस-पास (जहां कोई झांकता भी नहीं), विशाल बरगद के नीचे कहीं नजर बचाकर छिपता -फिरता। नहीं देखे बड़े-बड़े या छोटे-छोटे झाड़-झंखड़, जो बिना स्वार्थ पनपते हैं और उसी राह पर केवल बकरियों का पेट भरकर अथवा मकडि़यों को आश्रय देकर अपना जीवन गुजार देते हैं, उन्हें ही हम लोग देसी भाषा में `झंड´ बोलते हैं। जिससे इन्हें प्रशंसा मिल सकती है (मनुष्य), उसके ये झंड बिल्कुल भी काम नहीं आते और जो ना गुण ना अहसान जताएंगे, उनके लिए ये वहीं खड़े मुस्कुराते रहते हैं। अपनी जिंदगी भी अक्सर झंड ही हो गई। या कहें झंड से ज्यादा ही हो गई है। इधर बीवी परेशान, उधर बॉस। इधर मकान मालिक, तो उधर मकान का जमादार तक। सुबह दूध देने आने वाले से लेकर, शाम को टिफिन देने आने वाला तक परेशान। कहता है- आपके कारण मेरी जिंदगी झंड हो रही है। भाई मैंने कब कहा- मुझे दूध या टिफिन दो, नहीं जचता, तो बंद कर दो।

हां तो बात रात के एक बजे से शुरू करते हैं। रात की ड्यूटी है। काम से फारिक होकर रात साढ़े बारह के लगभग क्रिकेट खेलते हैं। यहां सभी प्लेयरों ने पहली बॉल में ही आउट करके और बॉलिंग में लास्ट ओवर देकर जिंदगी झंड कर रखी है। तो फील्डिंग कर-कर के गोडे (घुटने) दुखने लग जाते हैं। सुबह के पांच बजे तक नींद नहीं आती, जिंदगी यहां भी झंड। अब नींद नहीं आ रही तो कुछ तो करूंगा (गलत ना समझें)। केवल पुस्तक पढ़ता हूं, आचार्य चतुरसेन की। पहली बार खरीदी इन भाईसाहब की किताब। इन्होंने भी जिंदगी वो ही करदी, जो इतनी देर से बताता आ रहा हूं। कैसे? भाई पुस्तक का नाम है `वयं रक्षाम:´। पढ़कर देखना मालूम चल जाएगा। नारद को भुक्कड़, विष्णु को परस्त्रीगामी, इन्द्र को दुराचारी, और जाने किन-किन के अवैध संबंध बता रखे हैं। चतुरसेन जी ने तो मेरे साथ-साथ नारद, विष्णु और सभी ऋषि-मुनियों-देवताओं की जिंदगी भी झंड कर दी। चलो यहां पांच बज जाते हैं और मुझे नींद आ जाती है। कुछ सुकून मिलता है। पर रात को जो स्वप्न दिखाई देते हैं, सुबह उठकर मालूम चलता है कि उन्होंने रात को फिर मेरी जिंदगी झंड कर दी।

सुबह सवा नौ के करीब गेट खट-खट होता है। करीब पन्द्रह मिनट के बाद जब मैं दरवाजा खोलता हूं, तो दूध वाला कहता है- `तेरे कारण मेरी जिंदगी झंड हो गई है। सारे मौहल्ले वाले उठ जाते हैं पर तू, जाने क्या खाके सोता है।´ मैं चुपचाप आधी नींद में ही लोटे में दूध ले लेता हूं और फिर वही मुंह पर चद्दर लपेटकर सो जाता हूं। पौने दस बजे फिर गेट खट-खट होता है। मैं पूछता हूं- `कौन है?´ गुस्से में और जोर से खट-खट होता है। मैं लोटा लेकर फिर बाहर जाता हूं और गेट खोलता हूं, तो टिफिन वाला कहता है- `तेरे कारण मेरी बीवी मुझ पर शक करती है। कहती है दो मिनट का रास्ता है, बीस मिनट कहां मस्ती करते हो। काम की कोई सुध नहीं है। जिंदगी झंड कर दी तूने।´ मैं एक हाथ में टिफिन पकड़ लेता हूं, तो साथ वाला पड़ोसी जो इस झिक झिक का मजा ले रहा होता है, वो भी ताना मार ही देता है- `अरे भाई दूध तो पहले ही ले लिया, लोटा तो अंदर रख ही देता।´ अब दुबारा सोने का प्रयास करता हूं तो बीवी का फोन आता है- `गुड-मोर्निंग डार्लिंग। (पिछली पोस्ट में बता चुका हूँ बीवी और बच्चा दोनों गंगानगर हैं।) अपने बेटे से बात करोगे?´ मैंने मुंह पर लपेटी चद्दर में से केवल एक कान ही बाहर निकाल रखा होता है- `अभी नहीं। बस पांच मिनट और सो ले लेने दो। दस मिनट में दुबारा फोन करता हूं।´ कहकर सोने का पूरा प्रयास करता हूँ। नींद तो उड़ ही चुकी होती है। आखिर ऐसे ही लेटा-लेटा साढ़े दस बजे उठता हूं। नहा-धोकर तैयार होता हूं। इतने में बीवी का दुबारा फोन आता है- `क्योंजी दस मिनट हुए नहीं क्या?´ `अरे भूल गया था डार्लिंग´- मैं दयनीय भाव से कहता हूं (मैं जितने लोगों से डरता हूं उनमें एक मेरी बीवी भी है)। `आपका बेटा खेलता-खेलता सो गया। मैं बीच में केवल आधे घंटे फ्री थी। अब काम कर रही हूं। और बाद में जब टाइम मिले तो फोन कर लेना, नहीं तो मत करना।´- बिना कुछ सुने-पूछे मोबाइल कट जाता है। बीवी के बारे में नहीं बोल सकता कि उसने मेरी जिंदगी झंड कर दी। बोल दिया तो मैं जानता हूं कि जिंदगी अभी तो केवल झंड ही है, बाद में क्या-क्या होगी- या तो खुदा या फिर मेरी बीवी ही जानती है।

मेरा दोपहर का समय किस तरह कटता है, नहीं बताना चाहता, नहीं तो जाने आप क्या-क्या सोचेंगे। शाम को छह बजे ऑफिस जाना होता है, उससे पहले मैं बहुत सारे `सु´ और `दुष्´ कर्म कर चुका होता हूं। घर ऐसे ही मौहल्ले में है ना भाई। मेरा कसूर थोड़े ही है। कभी किसी कॉलेज गर्ल का सामूहिक एक्स-रे (सभी मित्रों द्वारा सम्पूर्ण अंगों को निहारना) करके `दुष्´ और किसी कॉलेज बॉय को बाइक पर लिफ्ट देकर `सु´ कर्म करता रहता हूं। कभी इंटरनेट पर `सविता भाभी´ की वेबसाइट पढ़कर `दुष्´ और इंटरनेट पर ही `सम्पूर्ण रामायण` वेबसाइट से सुंदरकांड का पाठ कर `सु` कर्म भी करता रहता हूं। इसी प्रकार लगभग पांच-सवा पांच बज जाते हैं। अब पुन: नहा-धोकर ऑफिस जाने की तैयारी करता हूं, तो एक बार फिर गेट पर जोर से खट-ख्ट की आवाज आती है। फटाफट पैंट-शर्ट पहनकर, हाथ में ताला लेकर गेट खोलता हूं तो सामने वही बिना दांत वाले अंकल जी। अरे मेरे मकान मालिक। मुंह लपलपाते हुए कहते हैं- `बेटा तूने तो मेरी जिंदगी झंड कर रखी है। कब तक टंकी भरता रहूं। ठंडे मौसम में भी तीन बार नहाता है। पानी का बिल देता है सिर्फ पचास रुपए। ऊपर से धौंस और की मैं कौनसा ज्यादा पानी यूज करता हूं।´ इनकी बिना कुछ सुने मैं कमरे को ताला लगाकर चल देता हूं। ऑफिस में मेरे बॉस- राइट पौने छह बजे फोन करते हैं- संदीप कितनी देर में आ रहा है? मैं कहता हूं `भाईसाहब अभी तो पन्द्रह मिनट मेरी ही तरफ बकाया हैं।´ बेचारे उनकी भी तो जिंदगी झंड है, किस-किस ने कर रखी है, यह बात ना बताते हुए आगे कहानी जारी रखता हूं।

साढ़े छह के लगभग मैं फिर अपनी बीवी को फोन करता हूं। `मिल गया टाइम?´ तीखा प्रश्न सुनकर प्यार से समझाता हूं बीवी को- `टाइम बिजी चल रहा है। वक्त बदलने वाला है। बहुत जल्दी किस्मत चमकेगी। तुम फिक्र मत करो। फिर जिंदगी झक्कास हो जाएगी।´ अचानक मोबाइल पर `टूं-टूं´ की आवाज आती है। मैं मोबाइल देखता हूं तो कोई न्यू कॉल भी नहीं। बीवी से बात जारी रहती है। एक-डेढ़ मिनट बाद फिर `टूं-टूं´ की आवाज आती है। देखूं तो बैटरी में मात्र एक सैल बचा है। `डार्लिंग। बैटरी नहीं है। चार्ज करके फोन करूंगा। प्लीज।´ मैडम को समझाता हूं। `देखो- आईंदा मुझसे बात करनी हो, तो बैटरी पूरी चार्ज करके बात किया करो। सुबह नींद आती है। दोपहर में बिजी हो। शाम को बैटरी नहीं है और रात को तुम्हारे चतुरसेन ने मेरी जिंदगी झंड कर रखी है। ´ आखिर मेरा मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। इस मोबाइल ने भी कर रखी है मेरी जिंदगी वही, अब तो बताते हुए भी शर्म आती है।

जिस काम के लिए ऑफिस आया था, उसकी घड़ी आ गई। रात के साढ़े आठ बज गए। अरे खाना खाने का समय। टिफिन वाला अपने समयानुसार आठ बजे ही टिफिन दे गया। सभी बंधु-बांधव अपने अपने टिफिन लेने चले जाते हैं और पीछे-पीछे मैं भी। टेबल पर टिफिन खोलते ही क्या खुशबू आती है, बता नहीं सकता। सब्जी में एक ज्यादा पका हुआ प्याज (बिल्कुल काला हो चुका होता है) तैर रहा होता है। पहले-पहले वही रोटी के टुकड़े के साथ आता है। अगर मुंह के पिछले वाले इलाके में आंखें होती तो शायद ना दिखता पर अब तो दिखना जायज ही था, वो प्याज का टुकड़ा ना होकर एक बेचारे कॉकरोच का बेबी था, छोटा सा। बेचारा मर गया था। उस पर इतनी दया आती है कि खाना ही नहीं भाता। उस टिफिन को वहीं छोड़कर दूसरे मित्रों का खाना खाकर पेट भरता हूं। इस कारण मेरे मित्रों की जिंदगी भी मैंने झंड कर रखी है, बेचारे बोलते ही नहीं, बाकी नजरें तो ऐसी गिराते हैं, कि कोई बेशरम ना हो तो वहीं हार्टअटैक हो जाए। वैसे मेरे टिफिन में पहले भी कई प्रकार के जानवर निकल चुके हैं, मसलन- बड़ा कॉकरेच, चींटा, सलाद में सुंडी और बेचारी चींटियां तो आए दिन मिलती ही रहती है। बहुत बार टिफिन वाले को शिकायत की, पर कार्रवाई नहीं होने पर चलो दिन गुजार रहा हूं।

यहां मेरे साथ एक समस्या हमेशा रहती है। छह बजे ऑफिस टाइम है। छह से साढ़े आठ बजे तक जो काम आता है वो मैं वेटिंग लिस्ट में डाल देता हूं। मतलब बिना खाए काम नहीं होता। जोर से भूख लगी होती है। भाई सुबह केवल दो परांठे ही तो खाए थे। अब साढ़े आठ बजे खाना खाकर आता हूं तो दूसरी समस्या आगे आ जाती है- खाने के बाद काम करने का मन नहीं करता। जैसे तैसे आखिर काम जाने कैसे हो ही जाता है। फिर वही साढ़े बारह बज जाते हैं और फिर वही क्रिकेट। फिर वही गोडों का दर्द और फिर वही चतुरसेन। फिर वही बीवी का फोन और दूध-टिफिन वाले की खटपट। फिर वही इंटरनेट, कॉलेज गर्ल। फिर वही सविता भाभी और वही सम्पूर्ण रामायण का सुंदरकांड। जिंदगी बराबर वोही `प्योर झंड´। लगातार दिन-ब-दिन। एक पल नहीं बदलता। कैसे कहूं कि जिंदगी झंड नहीं है और वो भी बिल्कुल `प्योर´। http://dard-a-dard.blogspot.com/

3 comments:

DHAROHAR said...

Achi prastuti rahi. Aas-paas sabhi ki jindagi ki kahani aisi hi hai. Pure .....

Amitraghat said...

भाईजान आप तो अन्तर्यामी लगते हैं सब की आप बीती है
भाई झंड शब्द की महिमा का बखान खूब किया
अगर आप झंड शब्द नहीं डालते आप के इस लेख पर आप को निश्चय ही ०
कमेंट्स प्राप्त होते चाहे कंटेंट कितना बढ़िया क्यों न होता

Bandmru said...

kya baat hai bandhu.........