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29.10.08

जुआ: एक सामाजिक बुराई और मान्यता

बचपन से सुनता आ रहा हूं कि जुआ और शराब बुरी बला है। इससे घर बर्बाद होते हैं. आबाद होने की बात तो कहीं सुनने को मिलती ही नहीं. चाहे बात महाभारत काल की हो अथवा आधुनिक युग की हो. इससे बर्बाद होने की कहानी ही सुनने को मिली है. सारा समाज भी जानता-बूझता है, फ़िर भी इसे अपनाता है. जुए को समाज ने एक सामाजिक बुराई के रूप में प्रतिपादित किया गया है और साथ ही साथ कई मौको पर इसे खेलने की मान्यता भी दे दी है. ऎसा क्यूं? मेरी समझ में तो बिलकुल भी नहीं आता. अभी देखिए दीवाली पर कितनों के घर इसी जुए के कारण अंधेरे में रहे. लक्ष्मी लाने के चक्कर में जो थोड़ी बहुत पूंजी थी वह भी गंवा दी. दीवाली में जुआ खेलने की मान्यता प्रदान की गई है. इसलिए दीवाली की रात कई घरों, मोहल्लों, गलियों में लोगों को मैंने जुआ खेलते पाया. अब तो बकायदा क्लबों में बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी बड़े शान ओ शौकत जुआ खेलते हुए पाए जाते हैं. सब जानते-बूझते लोग इस बुराई को अपनाने पर तुले हुए हैं. उनसे बात करने पर कहीं से भी उन्हें आत्मग्लानि का अनुभव नहीं होता. और तो और बिडम्वना देखिए आप उनको इस बुराई से बचने की सलाह देंगे तो वे आपको इस बुराई में शामिल होने का दबाव बनाएंगे.ऎसे लोगों को सलाह देना- राम-राम

2 comments:

Musaddas said...

diwali par jua khelne ki koi maanyata kisi bhi parkar ke hindu garanth ya ved mai nahi di gai hai .yeh to kuchh bewkuf logo dawara challai gai galat parampara hai.

Musaddas said...

diwali par jua khelne ki koi maanyata kisi bhi parkar ke hindu garanth ya ved mai nahi di gai hai .yeh to kuchh bewkuf logo dawara challai gai galat parampara hai.