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27.10.08

बेटियों ने दी पिता को मुखाग्नि

बेटी को भार व aभिशाप मानने वाले दम्पत्तियों की अब अपनी धारणा बदल लेनी चाहिए। पूर्वी उत्तर प्रदेश की जमीं पर दबे पावं ही सही नई सामाजिक क्रांति जन्म ले रही हें। बेटियाँ जहाँ विभिन्न छेत्रों में आगे आकर कुल का नम रोशन कर रहीं हें। वहीं वे पितृसत्तात्मक समाज की पतानोंमुख मान्यताओं को खारिज भी कर रहीं हें। मंगलवार को अपने पिता के शव को मुखाग्नि दी। इस इलाके में यह कोई पहली घटना नहीं हैं। इसके पूर्व लगभग एक दर्जन मामलों में बेटियों ने मान्यतायों में बेटों के नम आरछित अन्तिम संस्कार के शास्त्रीय विधान को संपन्न किया। बेटियों की इस पहल की हर तरफ सराहना हो रही हैं। उनके इस कदम ने समाज को यह संदेश दिया हैं कि बेटियाँ किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं हैं। मिली जानकारी के अनुसार इन बेटियों के पिता रामलखन यादव रेलवे में डीजल रेल इंजन चालक थे। उनहोंने दो शादियाँ कि थीं। पहली पुत्री से उन्हें चार पुत्रियाँ हुयीं जो जगदीशपुर सहजनवां में उनके पुस्तैनी माकन में रहतीं हें। बेटों के आस में उन्होंनेदूसरी शादी कि। इस पत्नी से भी पॉँच पुत्रियाँ ही हुयीं। दूसरी पत्नी इनके साथ बिछिया स्थित माकन पर रहती थी। श्री यादव पिछले तिन सल् से बीमार चल थे। १६ दिन पहले उनकी हालत बहुत ख़राब हो गई और रेलवे हास्पीटल में भरती कराया गया। मंगलवार को उन्होंने अन्तिम साँस ली। उनके पास उनकी दूसरी पत्नी व् उसकी पॉँच बेटियाँ ही उपस्थित थीं। पिता कि मृत्यु के बाद बेटियाँ शव को घर ले गयीं। शव को अर्थी पर सजाया और कन्धा दिया। शव को राजघाट ले गयीं। शास्त्रीय विधान से अन्तिम क्रिया संपन्न की। सबसे छोटी उर्मिला ने मुखाग्नि दी।

1 comment:

prakash chandalia said...

Samaj ki ankhe kholne wali report ke liye aapko bhi naman karta hun bandhu. Bachhiyon ne to jo karya kiya hai, vah pranamya hai. Samaj ko sochna chahiye is par gahrai se.
prakash chandalia
kolkata