


कैसा हो हमारा प्रधान मंत्री ?
चुनावी बिगुल अपने पूरे शबाब पर बज रहा है,और अब इस लोकतांत्रिक बाजे के साथ सजने लगी है चुनावी बारात,हर नेता अपने अपने ढंग से जनता को आकर्षित करने का काम कर रहा है,और इसी आकर्षण की होड़ में ये नेता उड़ा रहें हैं आचार संहिता की धज्जियां ,चुनाव के दौरान आचार संहिता जैसा कानून लगाया गया है,लेकिन राजनीतिक पार्टियों के लिए इस शब्द का कोई विशेष अर्थ नहीं है.इस मंदी के दैर में भी कुछ लोग नोट बांट रहें हैं, तो कुछ लोग किसी विशेष वर्ग के खिलाफ नफरत का जहर उगल रहें
हैं।
जो हो देश वो भेष बना प्यारे
चले जैसे भी काम चला प्यारे
की तर्ज पर,ठाकरे बंधु,वरुण गांधी, गोविंदा, और अब राबड़ी देवी के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन का मामला दर्ज हुआ है,यानि इन सबके कृत्यों ने एक सवाल खड़ा कर दिया है कि हमारे देश का प्रधानमंत्री कैसा हो? भाजपा कांग्रेस की खामियां निकाल रही है तो कांग्रेस भाजपा के पुराने कुकर्मों को ज़िंदा कर रही है, कहीं पर गोधरा कांड और कंधार अपहरण गिनाया जा रहा है,तो कहीं मुंबई हमले के जख्मों को कुरेदा जा रहा है।कुल मिलाकर हर पार्टी दूसरे की बुराइयां बताकर खुद को अच्छा साबित करने की जद्दोजहद में जुटा है,कहीं भी किसी भी पार्टी का कोई नेता अपनी रैली में विपक्ष को गलत न बताए और अपने चुनावी लालीपाप का प्रचार न करे ऐसा संभव ही नहीं है,लेकिन हम लोगों के सामने एक जटिल सवाल हिलोरे मार रहा है कि हमारा प्रधानमंत्री कैसा हो।हम चाहते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री आतंकी हमला कि निंदा करने की बजाय,आतंकियों से देश बचाने की बात करे,हम चाहते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री देश में हुए दंगों को गिनाने के बजाए,देश में दंगें न हों ऐसी ब्यवस्था करे,हम चाहते हैं कि हमारा प्रधानमंत्री जिस लोकतंत्र का ताज पहनने के लिए तैयार है,उसी लोकतंत्र के नियम कानून का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हो कटिबद्ध हो।देश से मात्र 12 किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तान में फिदाइन हमले हो रहें हैं,लेकिन एक भी पार्टी ने प्रचार के दौरान ये आशंका नहीं जताई की वो मौत के सौदागर भारत की सीमा मे भी प्रवेश कर सकते हैं.आखिर उन्हें रोकने के उपाय कहां तक कारगर हैं?किस नेता ने अपनी पार्टी प्रचार के दौरान ये विश्वास दिलाया कि 26 नंवबर जैसा खूनी मंज़र दोबारा नहीं होगा?हमारा देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा है और हमारे ही देश के अरबों रुपए स्विस बैंक में पड़े हैं,आखिर वो रुपया भारत कब आएगा और कौन लाएगा?
बड़ी खिन्नता होती है ये कहते हुए कि यहां जनतंत्र है लेकिन वास्तविकता में यहां जन तो हैं लेकिन तंत्र टूटा फूटा कहीं अपनी मलहम पट्टी करा रहा है,इतना कुछ जानने के बाद भी हम अपने आप को लाचार पाते हैं क्यों कि हमारे पथ प्रदर्शक वो लोग हैं जिन्होने अपने दामन में दागों के बाज़ार लगा रखे हैं,और हमारी मजबूरी बन गई है अपने मताधिकार को आंखों पर काली पट्टी बांधकर बेसहारा छोड़ देने की.....सिर्फ मजबूरी...
6.4.09
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