Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

10.8.08

IBN7 से पूंछता हूँ की ख़बर किस कीमत पर ?


हे निजी चैनल IBN7 ! ख़बर की दुनिया में ख़बर को हर कीमत में लाने का दावा करने वाले चैनल...... तुझसे तो केवल एक ही प्रश्न है मेरा ..........की बता
ख़बर किस कीमत पर ?
किस कीमत पर तू ख़बर चलाता है ,अपने चैनल में ।
बड़े बड़े दावे करने वाले ,हिंदुस्तान की कसम , मुद्दा में घंटो बहस करने वाले चैनल के कर्ता-धर्ताओं को इसका जवाब देना ही चाहिए की आख़िर क्या मजबूरी थी की संसद नोट कांड की रिकॉर्डिंग नहीं चलायी गई ,
वैसे तोIBN7 का नारा है ख़बर हर कीमत पर !
कभी चैनल को देखिये , तो मन में प्रश्न उठता है की हजारों बार इन्टरनेट के videos दिखाकर जनता को डरानेवाले , और चलते -चलते जनता पर ही ख़बर की पुष्टि की जिम्मेदारी छोड़ कर अगली ख़बर चलाने वाले इस बार खबर के लिए मानक की बात करने लगे ।
यही बात आम जन मानस को खटक रही है ।
क्या इससे चैनल की साख को धक्का नहीं लगा है ? मीडिया कई बार कठघरे में खड़ा होता रहा है । यह उसी कीअगली कड़ी ही समझ में आती है । चैनल को चाहिए था की उसे recordings का प्रसारण करके उसके बारे मेंजनता को स्वयं निष्कर्ष निकलने का मौका देना चाहिए था । आख़िर वह अब तक तो उसी जनता के प्रति ही तो प्रतिबधता की बात करता रहा है।

9.8.08

धर्मनिरपेक्षता का पाखण्ड

कितने धर्मनिरपेक्ष हैं हमारे नेता इसका अंदाजा कुछ नीचे लिखे तथ्यों से हो जाएगा :- १. आज तक जम्मू कश्मीर के लिए अलग से क़ानून बनाये जाते हैं, प्रत्येक एक्ट में लिखा होता है, पूरे भारत में लागू जम्मू कश्मीर को छोड़ कर. २-मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष रूप से उनका पर्सनल क़ानून लागू होता है बाकी बहुसंख्यकों के लिए उनके अपने धर्म से सम्बंधित कानूनों की जगह देश की सामान्य संहिता लागू होती है. ३-चुनावों में स्पष्ट देखा जा सकता है कि टिकट जाति और धर्म के अनुसार अधिक संख्या वाली बिरादरी के व्यक्ति को दिया जाता है. ५-जम्मू कश्मीर में लाखों हिन्दुओं को अपना घर-परिवार छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ा, उनकी सुधि आज तक किसी धर्मनिरपेक्व्यक्ति ने नहीं ली, केवल जबानी जमा-खर्च ही किया जाता रहा. ६-देश में हज हाउस बनने पर कहीं कोई आपत्ति नहीं होती लेकिन अमरनाथ यात्रा हेतु थोडी जमीन लीज़ पर देने पर इतना बड़ा बवाल, गोया कि विदेशियों को जमीन दे दी गई हो. ६- शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान में संशोधन किया गया. ७-जम्मू कश्मीर में दो विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई जिनका मुख्य कर्ता-धर्ता राज्य का मुख्यमंत्री होगा, लेकिन यदि गलती से मुख्यमंत्री कोई हिन्दू बन गया तो इनका प्रधान कोई मुस्लिम होगा. ८-मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति के लिए सच्चर आयोग की स्थापना की गई जैसे कि और किसी धर्म में गरीब होते ही नही. यहाँ यह लिखना उचित होगा कि मुस्लिमों में स्वरोजगार करने वालों की दर अन्य किसी भी धर्म वालों से ज्यादा है. ९-आतंकवाद विरोधी कानून बनाने को लेकर यूँ दर्शाया गया जैसे कि सारे मुस्लिमों को जेल में डाल दिया जायेगा, एक कारण यह भी गिनाया जाता है कि पोटा होने के बाद भी संसद पर हमला हुआ, लेकिन सेना के रहते भी भारत पर कई बार युद्ध थोपा गया इसलिए क्या सेना को ख़त्म कर दिया जाए?१०-मन्दिर में जाना पाखंड, साम्प्रदायिकता और मजारों पर जाना धर्मनिरपेक्षता!११.धार्मिक आधार पर आरक्षण.१२-कुतर्कों द्वारा सिमी जैसी संस्थाओं का समर्थन.शायद ये लोग इतनी मामूली समझ भी नहीं रखते कि किसी भी बच्चे को माँ-बाप चुनने का अधिकार नहीं होता, उसका वही धर्म-जाति हो जाता है जो उसके माँ-बाप का होता है, यदि इतनी सी समझ हम लोगों में आ जाए तो शायद यह जाति धर्म के झगडे स्वत: ही बंद हो जायेंगे और शायद इन की दुकाने भी।

महाराष्ट्र के मंत्रियों ने यात्राओं में उडाए करोड़ों रूपये

महाराष्ट्र के मंत्रियों के अपने कार्यकाल के प्रारंभिक तीन सालों की देशी विदेशी यात्राओं में कुल 7.44 करोड़ रूपये खर्च किए हैं। इस बिल में उनकी यात्राओं और विधानसभा का दौरा दोनों शामिल है। यह आंकडे़ राज्य सरकार के पे एंड अकाउंट ऑफिस ने एक आरटीआई आवेदन के जवाब में उपलब्ध कराए हैं। मंत्रियों का यह यात्रा बिल 1 अप्रैल 2004 से 31 मार्च 2007 तक का है। आरटीआई कार्यकर्ता चेतन कोठारी ने आरटीआई आवेदन दायर कर इस बारे में सूचनाएं मांगी थीं।
यात्राओं में खर्च करने वालों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देषमुख सबसे आगे हैं। इस अवधि में उनकी यात्राओं का बिल 63.96 लाख रूपये हैं। अपनी घरेलू यात्राओं में उन्होंने 32.45 लाख और विदेषी यात्राओं में 31.51 लाख खर्च किए हैं।
यात्रा खर्च के मामले में 64 मंत्रियों की लिस्ट में पब्लिक वक्र्स मिनिस्टर अनिल देषमुख दूसरे स्थान पर हैं। अनिल देषमुख की यात्राओं का बिल 47.86 लाख रूपये है। राज्य के टैक्टाइल मंत्री सतीष चतुर्वेदी तीसरे और डेरी विकास मंत्री अनीस अहमद चौथे स्थान पर हैं। सतीष चतुर्वेदी का यात्रा बिल ४१.४ लाख और अनीस अहमद का यात्रा बिल 38.61 लाख रूपये है। राज्य के 12 मंत्रियों का घरेलू यात्रा पर किया गया कुल खर्चा 20 से अधिक है।
मंत्रियों के इस भारी भरकम खर्चे की वजह यात्राओं में अपने सगे संबधियों को अनावष्यक रूप से लेकर जाना भी है। नेताओं का यात्राओं पर किए गए इस फिजूलखर्च का भार आखिरकार जनता को उठाना पड़ता है और यह राषि टैक्स के माध्यम से आम जनता की जेब से ही निकाली जाती है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि जनता के धन का दुरूपयोग न हो इसलिए जरूरी है कि मंत्रियों की इस मामले में जवाबदेही तय की जाए।

http://www.rtihindi.blogspot.com/ से साभार

त्रासदी की बरसी

आज ही के दिन १९४५ में जापान में नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराया था ..... उस समय को याद करें और देखें

http://cavssanchar.blogspot.com/2008/08/blog-post_06.html

जीव-जंतुओं पर तो रहम करो शर्मसार करनेवाले राजनेताओं

राजीव कुमार
देश की राजनीति में इस तरह के लोगों की भरमार है, जो राजनेता शब्द को गंदी गाली का दर्जा दिलाने पर आमादा हैं।यदि राजनीति में इस तरह के लोगों की भरमार रही तो आनेवाले दिनों में अच्छे इक्का-दुक्का लोग भी राजनीति में आना बंद कर देंगे।यह देश के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।
केंद्र की संयुक्त प्रगितशील गठबंधन(संप्रग)सरकार ने जोड़-तोड़ के जरिए संसद में विश्वास-मत हासिल कर लिया।कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जश्न मनाया।इस पर एतराज करने का कुछ नहीं था।कारण देश की राजनीति में अब इस तरह की घटनाएं आम बात हो गई है।लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के लांझी विधानसभा सीट के विधायक किशोर समरिते ने जो जश्न इस खुशी में मनाया उस पर आपत्ति स्वाभाविक है।उन्होंने इस खुशी में एक- दो नहीं कुल 317 जानवरों की बलि चढाई।इसमें 302 बकरियां और 15 भैंस शामिल हैं।समरिते समाजवादी पार्टी के हैं।समरिते के पुजारी रंजीत शर्मा का कहना है कि विधायक ने दशमहाविद्या पूजा की है।यह पूजा 26 से 30 जुलाई तक की गई।
समरिते को इसका जरा भी खेद नहीं है।वे कहते हैं कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर गुवाहाटी के नीलाचल पहाड़ पर स्थित मां कामाख्या में यह बलि चढ़ाने आए।संप्रग सरकार को बहुमत मिलने की कामना पूरी होने के कारण यह बलि चढ़ाई गई है।साथ ही यह भी कामना है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बने।
समरिते की इस बलि को लेकर असम में भारी विरोध हुआ।पीपुल्स फोर एनिमल्स की पूर्वोत्तर शाखा की अध्यक्ष संगीता गोस्वामी ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि आधुनिक समाज में पुराने क्रूर रीति रिवाजों को मानकर असहाय पशुओं का खून बहाए यह शोभा नहीं देता।संगठन ने प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र भेजकर इस तरह के पागलपन पर रोक लगाने की मांग की है।पर सत्ता के भूखे राजनेता अपनी सरकार बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं तो इस कार्य को रोकने के लिए कुछ कदम उठाएंगे यह सोचना भी बेकार है।
कामाख्या में समरिते पहले भी बलि चढ़ाते आए हैं।लेकिन इतनी विशाल संख्या में कभी नहीं चढाई गई।समरिते का रिकार्ड भी अच्छा नहीं है।मध्यप्रदेश में समरिते पर हत्या, लूट, अपहरण, धमकाने और सरकारी अधिकारियों के साथ बदसलूकी के लगभग 40 मामले दर्ज हैं।समरिते 19 मार्च 2008 को सुर्खियों में थे जब उन्होंने मध्यप्रदेश में कांग्रेस समर्थित राज्यसभा उम्मीदवार विवेक तांखा को वोट देने के एवज में कांग्रेस द्वारा दस लाख रुपए देने का आरोप लगाया था।अपनी बात के समर्थन में उन्होंने एक गेस्ट हाउस में हजार-हजार रुपयों के बंडलों को प्रदर्शित किया था।विधायक बनने के बाद समरिते ने अपने गृह जिले में एक विशाल भोज आयोजित किया।इसमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश भी मौजूद थे।इसमें भी समरिते ने 108 बकरियों की बलि चढ़ाई।
कामाख्या मंदिर में बलि की प्रथा है।पर इतनी बड़ी संख्या में बलि देते आज तक नहीं देखा गया।इस लेखक ने खुद देखा है कि जब समरिते विधायक नहीं थे तब भैसों की बलि चढ़ाने कामाख्या आते थे और यह बलि मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने के लिए होती थी।मीडियावालों को वे प्रचार के लिए बुलाते।संगठन बलि का विरोध भी करते।लेकिन इन सब के बीच समरिते का मुख्य ध्यान प्रचार पाने के लिए रहता ताकि मुलायम तक यह बात पहुंचा सके कि उनके लिए वे क्या कर रहे हैं।शायद इस कार्य में वे सफल भी हुए हैं।खुद सपा के विधायक बनने के साथ ही संप्रग के बहुमत पाने पर वे लाखों का खर्च कर इतने पशुओं की बलि जो दे पाएं हैं।समाजवादी पार्टी का इस पर मौन समर्थन है।समर्थन नहीं होता तो विरोध करती।
राजनेता बलि की इस कुप्रथा के खिलाफ होने के बजाए असहाय जीव-जंतुओं की सत्ता में रहने के लिए इस तरह बलि चढ़ाएंगे तो आम जनता को कौन समझाएगा।देश में करोड़ों लोगों को एक समय के लिए दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है।पर समरिते जैसे नेता ने बहुमत मिलने का जश्न मनाने के लिए 317 जंतुओं की हत्या कर उनके खून की होली खेली और लाखों स्वाहा किए।इससे मां कामाख्या कितनी खुश हुई यह तो कोई नहीं जानता।इस रकम से समरिते गरीबों को एक वक्त का खाना खिलाते तो निश्चय ही गरीब उन्हें बहुत दुआ देते।इसे देखा और अनुभव किया जा सकता था।
बहुत हो गया। अब समय आ गया है कि राजनीति से इस तरह के लोग दूर हों।अन्यथा देश का भला नहीं होगा।राजनीति में अब अच्छे लोगों के आने का वक्त आ गया है।यह सामने आएंगे तो जनता इन्हें वोट देकर सत्ता में पहुंचाएगी।सत्ता में इनकी अधिकता होगी तो समरिते जैसे लोग अपने आप किनारा होने या अपने को बदलने को बाध्य हो जाएंगे।देश की बेहतरी के लिए यह होना अब अति आवश्यक हो गया है।नहीं तो हमें डूबने से कोई नहीं बचा सकता।
(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)
लेखक का पता-राजीव कुमार,पोस्ट बाक्स-12,दिसपुर-781005

अमर उजाला बिजनोर के ब्यूरो चीफ अशोक मधुप ने करूणाकर के खाते में जामा करवाया १००० रूपया

अशोक कुमार मधुप अमर उजाला बिजनोर के buero चीफ ने करूणाकर के अकाउंट में शनिवार को एक हज़ार रूपये जामा करवा दिए हैं। पिछले ३५ सालों से पत्रकारिता से जुड़े मधुप जी ने भड़ास के इस मुहिम की सराहना की है। उन्होंने करूणाकर के जल्द स्वस्थ होने की कामना की है। मैं सभी भड़ास परिवार के और से उनके इस नेक काम के लिए सराहना करते हैं। धन्यवाद बोलकर हम उनके प्रयास का महत्व कम नही करना चाहते।
अमित द्विवेदी

क्या स्वास्थ्य मंत्री रामदौस समलैंगिक है?????????

जब भी देखा कि यदि कुछ ऐसा है जो कि हमारी देशज सभ्यता के विरुद्ध है या कुदरती नियमों के खिलाफ़ है तो मन करता है कि उसे रोक कर बचाने का प्रयत्न करूं नैतिकता और लोगों के स्वास्थ्य को क्योंकि मैं एक टीचर होने की जिम्मेदारी को भलीभांति समझती हूं। आज जब स्वास्थ्य मंत्री रामदौस(ये आदमी अगर अपना नाम रामदास रखता तो लोगों को इसका नाम लेने में अड़चन न होती) का बयान देखा कि जनाब चाहते हैं कि इस देश में समलैंगिक यौन संबंधों को कानूनी जामा पहना कर जायज़ बना दिया जाए। किसी बात की वकालत अचानक कोई भारतीय राजनेता करने लगे तो उसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि मंत्री महोदय को या तो इस बकवास को करने के लिए पेट भर पैसा मिला है या फिर दूसरा कारण कि हो सकता है कि रामदौस खुद निजी तौर पर या तो आदमियों से मराते होंगे या आदमियों की मारने में विशेष दिलचस्पी रखते होंगे(क्या मारना और क्या मरवाना बताया जा रहा है ये भड़ास के मंच पर स्पष्टीकरण करना बचपना होगा क्योंकि भड़ासी भी किन्ही अलग अर्थों में कई बार कुछ कमीनों की कसकर मार चुके हैं)। हरामियों की एक N.G.O. जिसका नाम है नाज़ फाउंडेशन, उसने एक पिटीशन कोर्ट में दाखिल कर रखी है कि इस देश में कानून की किताब से धारा ३७७ के उन हिस्सों को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाए जिसमें औरतों को औरतों की चाटना और चूसना, आदमियों का आदमियों से मरवाना,शरीर के हर छेद को पेलमपेल के लिये इस्तेमाल करना या कुत्तों, गदहों, धोड़ों या ऐसे ही अन्य जानवरों को आदमियों द्वारा ठोका जाना या औरतों द्वारा ठुकवाया जाना अपराध माना जाता है। आज ये सुअर और नाज़ फाउंडेशन के हरामी ये चाहते हैं और कल इनकी याचिका होगी कि मैं अपनी मां या बहन या बेटी के ठोकना चाहता हूं मेहरबानी करके कोर्ट उसे जायज़ करार कर दे ताकि हम खुलेआम ऐसा कर सकें। बजरंग दल से लेकर सिमी जैसे हिंदू और मुस्लिम उग्र विचारधारा के हिमायती चूतिये इधर-उधर बेसिर पैर की बातों पर फ़साद करते फिरते हैं तो क्या ये साले अंधे हैं कि इनकी सभ्यता और शरीयत की पिछाड़ी में मंत्री रामदौस और नाज़ फाउंडेशन कैसा कसकर बिना तेल लगाए डंडा घुसा रहे हैं? मुझे तो शक है कि इन संगठनों के नेता भी उल्टी साइकलें हैं जो खुद को पीछे से चलवाते हैं वरना क्यों इस बात पर चूं तक नहीं करते?अगर आप इन तथ्यों को और अधिक गहराई से समझना चाहें तो मनीषा दीदी के ब्लाग पर पड़ी पोस्ट कुदरत मानवजाति को नष्ट कर रही है पढ़िये। यदि नए भड़ासियों को इस बात को कहने के लिये इस्तेमाल करी गयी भदेस भाषा पर आपत्ति हो तो मुझे बताएं कि इस नीचपन का मुझ जैसी नक़ाब पहनने वाली औरत कैसे विरोध करे जब कोई साथ न दे?

8.8.08

केपी त्रिपाठी जी ने करुनाकर को दी ५०० की मदद

मेरठ के सांध्य दैनिक प्रभात के वरिष्ट उप संपादक केपी त्रिपाठी जे ने भड़ास के द्वारा करुनाकर के बारे में जानकर उसे ५०० रूपये की मदद दी है। उन्होंने कहा है की करुनाकर की मदद के लिए हम हर सम्भव प्रयास करेंगे। उन्होंने भड़ास की इस मुहिम की सराहना की।
अमित द्विवेदी

सिमी से इतना मोह यों ?

एक समाचार : सुप्रीम कोर्ट ने स्टूडेंट् स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) पर प्रतिबंध हटाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष ट्रिब्यूनल के आदेश पर रोक लगा दी।
अब आगे का खेल देखिए, अभी यह फैसला अदालत से बाहर भी नहीं आया था, हमारे राजनीतिज्ञों ने सिमी के हक में बयान तक जारी कर दिए। सपा प्रमुख मुलायम सिंह की मानें तो सिमी पर प्रतिबंध लगाने की बजाए राष्ट ्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। उनकेशब्दों में 'जब उत्तर प्रदेश में मेरी सरकार थी तो सिमी पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया।` वहीं राजनीतिज्ञों की जमात में इस विद्या के पंडित कहे जाने वाले 'ताऊ` लालू प्रसाद यादव का कहना है कि सिमी पर प्रतिबंध की जरूरत ही नहीं थी। प्रतिबंध लगाना ही है तो शिव सेना पर लगाओ, दुर्गा वाहिनी पर लगाओ।
इस संगठन का नाम (सिमी) देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर इसलिए नहीं चढ़ा कि इस संगठन ने अपने नाम के अनुरूप स्टूडेंट् स की भलाई के लिए किए गए अपने कामों से झं़डे गाढ़ दिए। बल्कि जब भी इस संगठन का नाम सुर्खियों में आया, तब-तब सिमी के साथ आतंक शब्द की गूंज साफ सुनाई दी। आज भी यह संगठन भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाली एक प्रमुख संस्था के रूप में जाना जाता है। देश में घट रही तमाम आतंकवादी घटनाआें में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बाद अगर किसी संगठन का नाम आता है तो वह सिमी ही है। जो इस्लामिक स्टूडेंट् स मूवमेंट् स केनाम पर इस देश की नौजवान पीढ़ी की रगों में दहशतगर्दी का जहर घोल रही है। इस देश का राशनकार्ड लेकर इस देश की थाली में खाकर इसी देश केनौजवानोंं को बाढ़ बनाकर इस संगठन केकार्यकर्ता देश को खोखला करने में जुटे हैं।
ऐसे में अगर हमारे राज नेताआें के बयान इस संगठन के हक में आते हैं तो दुख होता है। दुख होता है यह सोचकर कि आखिर इस देश में हो या रहा है? जनता इन नेताआें को चुनकर संसद में भेजती है। इसलिए कि वे जनहित की बात करेंगे, देशहित की बात करेंगे। लेकिन, अगर राजनीति से प्रेरित इस तरह के काम हमारे राजनेता करने लगें तो फिर अभागी जनता कहां जाए?

बीजिंग ओलम्पिक उदघाटन समारोह की सबसे ताज़ा तस्वीरों के लिए देखें मेरा नया ब्लॉग खेल दुनिया क्लिक करें www.khelduniya.blogspot.com

ब्रेकिंग न्यूज़ आज भड़ास पर, एक ईमारत गिरी चिराग दिल्ली में

भड़ास पर आजतक आप लोगों ने सिर्फ़ मन के भड़ास ही देखी है पर आज मैं एक ऐसी ख़बर से आपको रूबरू करवा रहा हूँ जिसे सुनकर आप दंग रह जायेंगे। हुआ यौन की मैं चिराग डेल्ही के बीच में से निकलकर कहीं जा रहा था। तभी देखा की एक ईमारत पूरी तरह से झुकती जा रही है। लोगों को ये बात समझ में जैसे आयी वहां का रास्ता बंद कर दिया गया। थोडी देर में वो ईमारत जिसमे करीबन ५ मंजिला थी वो रेत के महल की तरह गिर गया। ख़बरों के मुताबिक उसमे कुछ लोग फंसे हुए हैं। चिराग डेल्ही में इस तरह की रोज़ ढेरों ईमारत बन रही हैं जो आसमान चूने का प्रयास कर रही हैं। इनकी गांव वाले पुलिस वालों को पैसा खिलाकर करवा लेते हैं। अब ये देखना दिलचस्प होगा की इस घटना के बाद डेल्ही सरकार की नींद टूटती हैं या फिर नही। फिलहाल इस घटना में कितने लोग हताहत हुए हैं इसका पता नही चला है।
अमित द्विवेदी

विकास की झलक लोकप्रिय भोजपुरी गाने के साथ

बिहार और बिहारियों की बिसात ही ढोल का पोल पर बसी हुई है, समृद्ध इतिहास, क्रन्ति का जनक, क्रन्तिकारी विचारधारा का सूत्रपात करने वाले अब सिर्फ़ और सिर्फ़ गुणगान करके, अपनी सवा प्रशंसा करके अपने आपको स्थापत्य समाज में स्थापित करना चाहते हैं।

घर गया तो ढेर सारी उम्मीद और आशा के साथ, उम्मीद की किरण को हवा दी सरकार के साथ कदम से कदम मिलाती मीडिया ने और हाथ आया ये छोटा सा सिनेमा।

मेरे मधुबनी स्थित निवास से मेरा गाँव महज ५० किलोमीटर पर है मगर इस दुरी को तय करने में लगे समय पुरे पाँच घंटे। इश्वर की कृपा रही की मैं सही सलामत वापस भी आ गया। मगर मन में ढेरक सवाल की अगर बिहार के रेल में सुधर हुआ तो इसके विकास का श्रेय केन्द्र को या राज्य सरकार को, सडको के जाल के साथ राष्ट्रीय राज मार्ग का कार्य राज्य की उपलब्धी है जिस पर कार्य चल रहा है, वहीँ प्रांतीय राज मार्गों की दशा बाद से बदतर होती जा रही है, सड़क पर पत्थर की बात तो छोरिये सड़क ही नही दिखाई देती है, शुक्रगुजार वहां चालक का जो यात्रियों को गंतव्य जगह तक पहुंचाते हैं और संग ही शुक्रगुजार यहाँ के मृत जनता का भी जो ओछी राजनीति में संलिप्तता में सबसे आगे रहते हैं मगर विकास की बात पर सारे के सारे अपने अपने जेब का विकास चाहते हैं।

आप भी इस क्लिप का आनंद ले सकते हैं क्यूंकि इसमें यात्रा का साथ भोजपुरी संगीत दे रहा है जो आपको कटाई बोर नही होने देगा। और शायद ये संगीत ही है जो बिना विकास के भी भदेश का अपना मजा देता है।

जय जय भड़ास

डर को बेचने वाले

शनि, एलियंस, साईं और न जाने क्या क्या.......कुछ चैनलों ने लोगों के सही नब्ज को पकड़ लिया है. वे जानते हैं की पब्लिक को क्या चाहिए. ये पब्लिक केवल डर वाली चीजे पसंद करती है...डरो और बेचो. डरकर देखेंगे....लेकिन देखेंगे तो. पब्लिक बोरिंग चीजे देख देख कर थक चुकी है. अब इन्हे चाहिए कुछ रियल और रियल लाइफ में तो कदम कदम पर डर है. हर कोई डरा हुआ है....तो भइया अब चैनलों ने कसम खा लिया है की ये पब्लिक को डरा के कमाएंगे...लेकिन इतिहास गवाह है की कोई भी फार्मूला ज़्यादा दिनों तक नही चलता..जो अभी बिक रहा है वो ज़रूरी नही है की एक महीने बाद भी बिक ही जाए......लेकिन इस फोर्मुले को भी फ़ैल कर दिया है सबके चहेते इंडिया टीवी ने.....जब से ये चैनल आया है तब से टीवी न्यूज़ में नयी करांति आ गयी है.... दर्शकों ने ज़्यादा टीवी देखनी शुरू कर दी है...उन्हें साईं के करिश्मे खूब भा रहे हैं. उन्हें शनि देव पसंद आ रहे हैं...उन्हें सितारों की दुनिया पसंद है..ये चैनल न्यूज़ चैनल होने की ज़िम्मेदारी निभाने की खातिर एकाद बार हेड लाइंस बता देता है और इसके बाद अपने काम पर लग जाता है...मैंने कई लोगों को कहते सुना है की ये चैनल लोगों को मुर्ख बनता है....लेकिन भइया ये तो बताइए की टी आर पी में नम्बर १ कैसे है?

डर को बेचने वाले

शनि, एलियंस, साईं और न जाने क्या क्या.......कुछ चैनलों ने लोगों के सही नब्ज को पकड़ लिया है. वे जानते हैं की पब्लिक को क्या चाहिए. ये पब्लिक केवल डर वाली चीजे पसंद करती है...डरो और बेचो. डरकर देखेंगे....लेकिन देखेंगे तो. पब्लिक बोरिंग चीजे देख देख कर थक चुकी है. अब इन्हे चाहिए कुछ रियल और रियल लाइफ में तो कदम कदम पर डर है. हर कोई डरा हुआ है....तो भइया अब चैनलों ने कसम खा लिया है की ये पब्लिक को डरा के कमाएंगे...लेकिन इतिहास गवाह है की कोई भी फार्मूला ज़्यादा दिनों तक नही चलता..जो अभी बिक रहा है वो ज़रूरी नही है की एक महीने बाद भी बिक ही जाए......लेकिन इस फोर्मुले को भी फ़ैल कर दिया है सबके चहेते इंडिया टीवी ने.....जब से ये चैनल आया है तब से टीवी न्यूज़ में नयी करांति आ गयी है.... दर्शकों ने ज़्यादा टीवी देखनी शुरू कर दी है...उन्हें साईं के करिश्मे खूब भा रहे हैं. उन्हें शनि देव पसंद आ रहे हैं...उन्हें सितारों की दुनिया पसंद है..ये चैनल न्यूज़ चैनल होने की ज़िम्मेदारी निभाने की खातिर एकाद बार हेड लाइंस बता देता है और इसके बाद अपने काम पर लग जाता है...मैंने कई लोगों को कहते सुना है की ये चैनल लोगों को मुर्ख बनता है....लेकिन भइया ये तो बताइए की टी आर पी में नम्बर १ कैसे है?

खेल दुनिया ....... दुनिया खेलो की !

कई दिनों से मेरे कई साथी जो खेल पत्रकारिता में रूचि रखते हैं, एक ब्लॉग की फरमाइश कर रहे थे जो केवल खेलों को समर्पित हो। इसी फरमाइश के चलते मैंने ये निर्णय लिया कि अब एक ब्लॉग बना ही दिया जाए जो खेलों के लिए हो। अब समस्या ये थी कि ब्लॉग कब चालू किया जाए तो निर्णय हुआ कि ब्लॉग को ओलम्पिक के चालू होने के साथ ही चालू किया जाए तो तय हुआ कि ८ अगस्त को ओलम्पिक के शुरू होने के साथ ही इस ब्लॉग को भी शुरू कर दिया जाएगा। ब्लॉग का नाम है ..... खेल दुनिया और वेब पता है .khelduniya.blogspot.com
ये ब्लॉग उनके लिए है जो क्रिकेट प्रेमी हैं और उनके लिए भी जो क्रिकेट से ऊब चुके हैं ...... इस में तरह के खेलों पर हम बात करेंगे और हर उस व्यक्ति के लेख, कहानी या कविता का स्वागत है जो खेलों पर लिखता है ! सो कलम उठा लीजिये और इस ब्लॉग का सदस्य बनने के लिए हमें मेल करें cavssanchar@gmail.com पर ..... फिलहाल ओलम्पिक आज शुरू हो रहे हैं तो लीजिये ओलम्पिक का मजा खेल दुनिया के साथ ... ! खेल दुनिया पर होगा ;
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खेल अपडेट
और बहुत कुछ !

जन्म दिवस कि बधाई

आज श्री श्री १०८ महराज धिराज महा भडासी यशवंत सिंह का जन्मदिवस है। सो तमाम बंधुवर सुचना सिर्फ़ इसलिए कि आप बधाई संदेश दे सकते हैं, देखिये कहीं ट्रेन ना छुट जाए।

जय जय यसवंत

जय जय भड़ास

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते

दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस देश को भगवान भी नहीं बचा सकते। यह जान कर मुझ जैसे संविधान पर आस्था रखने वाले लोगों को धक्का लगा होगा क्योंकि लाखों वीरों की शहादतों के बाद अगर हमें आजाद देश में कुछ हासिल हुआ है तो वह है हमारा अपना निजी संविधान जिसको आधार बना कर देश को लोकतांत्रिक तरीके से चला कर सभी के अधिकारों की रक्षा करी जा सकती है। जो लोग कहते हैं कि कानून में खामियां है सत्यतः वे कानून को समझते ही नहीं और बस बकवास कर देते हैं ऐसे लोगों ने कभी संविधान को समझने की चेष्टा ही नहीं करी होती क्योंकि संविधान बनाने वाले लोग मूर्ख नहीं बल्कि देश की आत्मा और उसके घटकों जैसे सभ्यता,धर्म,नैतिकता,भाषा व क्षेत्र की विविधताएं आदि के गहरे जानकार थे लेकिन आज जो स्वरूप अमें दिखाई दे रहा है वह संविधान का सही चेहरा नहीं बल्कि उस पर कब्जा जमा चुके जुडीशियल माफ़िया का है जिसके कारण हमें और हमारे जैसे लोगों को कानून की बात से ही खीझ होने लगती है। अबकी बार यह बयान सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया है नेताओं द्वारा सरकारी आवासों पर किये गए गैरकानूनी कब्जे को लेकर करी जाने वाली कार्यवाही मे सुधार लाकर कठोरता लाने के विषय में है। कार्यपालिका और विधायिका ने मिल कर एक बार फिर माफ़िया का रूप धर लिया है और न्यायपालिका ऐसे लाचार और पंगु सा होकर यह बयानबाजी कर रही है। कुल मिला कर बात यह है कि कानून की बंदिशें सिर्फ़ कमजोर और गरीब लोगों के लिये हैं जो ताकतवर हैं उन्हें कुछ भी अपराध करने पर दोष नहीं लगता। जिन्हें रामचरितमानस की जानकारी है तो वे जानते हैं कि ये सत्य तो गोस्वामी तुलसीदास जी तभी कह गये थे .. समरथ को नहिं दोस गोसाईं....। अब राज ठाकरे हो या सिमी जैसे संगठन ये सब रामचरितमानस के इस सत्य को समझ गये हैं तभी तो पेले पड़े हैं।

पंडित दामोदर दास चतुर्वेदी सम्मान-2008

साहित्य,संस्कृति एवं हिन्दी पत्रकारिता के सेतु पुरूष पंडित दामोदर दास चतुर्वेदी के स्मृति में दिया जाने वाला साहित्य सम्मान इस वर्ष भी साहित्य,कला एवं संस्कृति से सम्बद्ध रचनाकारों को उनके जन्मदिवस ११अगस्त की सायं ६ बजे स्थानीय गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, दीनदयाल उपाधाय मार्ग, नई दिल्ली में प्रदान किए जायेगे.इस अवसर पर समकालीन पत्रकारिता,दशा और दिशा विषय पर विचार गोष्ठी भी आयोजित की जायेगी, जिसमे दूर-दर्शन के वरिष्ट निर्देशक श्री राजशेखर व्यास, आकाशवाणी के रास्ट्रीय प्रसारण की निर्देशक श्रीमती अलका पाठक, श्री राजकुमार सचान होरी, डॉक्टर भागन स्वरुप चैतन्य भाग लेगे.इस अवसर पर पंडित दामोदर दास चतुर्वेदी स्मृति काव्य संध्या का भी आयोजन किया गया है। जिसकी अध्यक्षता प्रतिष्ठित कवि पंडित सुरेश नीरव करेगे.बिस्मिल फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित इस साहित्य समारोह में राजधानी के अनेक साहित्य प्रेमी सम्मिलित होगे.इस विज्ञप्ति के माध्यम से फाउंडेशन समस्त भडासी बांधवों को समारोह हेतु आमंत्रित करता है।

मृगेंद्र मकबूल.

7.8.08

मीडिया के आदर्शों की बदलती परिभाषाएं

आज यूँ ही भड़ास पर Blogs देखते हुए नज़र जा कर ठहरी अतुल जी के ब्लॉग पर जिसका शीर्षक था "पुराना राजदीप कहीं खो गया"। और सहसा ही ज़हन कुलांचें मारता हुआ जा पहुँचा उन दिनों में जब हम अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता कर रहे थे। कुछ अलग सी ही बात थी तब। हमको लगता था की वर्तमान में तो बस पत्रकारिता ही है जो पूरे आदर्शों के साथ सत्य और समाज के लिए खड़ा होता है। पत्रकारिता के अलावा हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार व बेईमानी की बू आती थी।

हमको लगा हम इसी क्षेत्र में पूरी लगन व मेहनत से काम करेंगे और "PRESS" की सहायता से जितना मुमकिन होगा बदलाव लायेंगे। हमारे डिपार्टमेन्ट के बाहर एक बड़ा सा छायादार वृक्ष हुआ करता था। हम उसे "बोधी ट्री" कहा करते थे। न जाने कितनी ही बहसों को हमने यहाँ शुरू किया जो कभी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच पायीं। उस जगह को हम कभी नहीं भूल सकते जहाँ हमने राजदीप सारदेसाई, बरखा दत्त, प्रणॉय रॉय सरीखे पत्रकारों को अपना आदर्श बनाया।

अपने सपनों को संजोये और अपने आदर्शों के साथ हम सभी ख़बरों की नगरी में अलग-अलग संस्थानों के लिए काम करने लगे। और आज चार साल बाद जब मुड़कर अपने अनुभवों को देखते हैं तो कहीं न कहीं एक असंतुष्टि सी मन को विचलित कर देती है। जिन बातों का उल्लेख यहाँ होने जा रहा है वो हम में से लगभग सभी के लिए नई नहीं हैं, परन्तु हाँ हम सभी इन बातों के इतने आदी हो चुके हैं कि इनका होना न होना हमको प्रभावित ही नहीं करता।

दिल्ली आने के बाद हमने देखा कि किस तरह ख़बरों कि दुनिया में ख़बरों के मायने बदलते चले गए। देश व राजनीति कि उथल-पुथल से परे भी ख़बरों का एक नया रूप उभर कर आने लगा। यहाँ sting operations थे, glamour था, विवादों में घिरे celebrities थे और थी इन कथित ख़बरों को "सबसे पहले" जन साधारण तक पहुंचाने की होड़।

२४ घंटे न्यूज़ परोसने कि अंधी दौड़ में न जाने कब हम सभी शामिल होते चले गए - और बेतहाशा दौड़ने लगे। शनैःशनैः पीछे छूटने लगे पत्रकारिता के आदर्श - हम लोगों के घरों में घुसने लगे, पीछे रह गए वो ख़यालात जिनके ज़रिये हम समाज को कुछ देना चाहते थे - हम Aish-Abhi कि शादी में ही गुम हों कर रह गए यह भूलकर कि देश में और भी बहुत कुछ घट रहा होगा, हम शान्ति और सभ्यता से अपनी बात को कहना छोड़ कर तेज़ आवाज़ में चीख-चीखकर लोगों को नींद से जगाने लगे - फिर चाहें कई बार हम सोते रह गए हों जब किसी ज़रूरतमंद को इन्साफ न मिल पाया हो।

अब अगर कोई यह कहे कि मीडिया ने न जाने कितने लोगों को इन्साफ दिलाया है, तो यह कहना ग़लत नहीं है, पर हाँ यहाँ हम यह भी तो नहीं कह सकते कि बस अब हमारे दायित्व ख़त्म आगे अब कुछ वक्त तक समाज सेवा से छुट्टी। अगर हमने किसी कि मदद कि तो यह हमारा फ़र्ज़ था, हमको चाहिए कि हम और लोगों कि मदद करें। यह बातें बेहद सिद्धांतवादी प्रतीत होती हैं, पर हमने जो रास्ता चुना है वो सिद्धांतों का ही तो है, तो इसमें नया क्या है।

पर हमारे तो सिद्धांत ही बदल गए हैं। हमारे लिए राखी सावंत-मिका का निजी जीवन अहम् हो चला है, बॉलीवुड अदाकारा कश्मीर शाह के पैर में मोच आना इतनी बड़ी कहबर हो चली है कि हम उस पर घंटों तक लाइव दिखा सकते हैं। उसी प्रकार करिश्मा और ऐश्वर्या के शादी के जोड़े पर हम पूरे दिन ख़बर दिखा सकने का माद्दा रखते हैं। Reality shows के gossip, सास-बहू के टीवी shows, काला जादू और भटकती आत्माएं हमको TRP देती हैं। चैनल्स पर ज्यादा से ज्यादा वक्त हमारे गजोधर भैय्या के लिए रिज़र्व रहते हैं। अब या तो देश में कुछ हो ही नहीं रहा और देश सुप्तावस्था में चला गया है, या फिर मीडिया नींद से नहीं जाग रहा है।

हर न्यूज़ चैनल एक निश्चित राजनैतिक पार्टी से प्रभावित दीखता है। कहीं तो आप किसी पार्टी के ख़िलाफ़ लिख नहीं सकते, तो कहीं पर आप किसी अन्य नेता के समर्थन में कुछ बोल नहीं सकते - फिर चाहें आपके पास आपके कितने ही निजी अनुभव हों, कितनी ही आप-बीतियाँ हों। आपके संस्थान से ऊपर तो कुछ भी नहीं है ना? अंत में आपको अपना मन मारकर पत्रकारिता को दरकिनार कर एक वफादार कर्मचारी बनना ही पड़ता है और संस्थान के आदर्श पत्रकारिता के आदर्शों पर हावी हो कर विजयी हो जाते हैं। यही आदर्श रूप है आज के मीडिया का।

चंद ऐसे ही आदर्शों का ज़िक्र था अतुल जी के ब्लॉग में। सच ही तो है, मीडिया स्वयं ही अपनी परिभाषाएं और अपनी सीमाएं अपनी सहूलियत के मुताबिक़ सुनिश्चित करता है। समाज का दर्पण होने का दावा करने वाला मीडिया क्यूँ नहीं वो दिखता जो हो रहा है - सच तो सच, झूठ तो झूठ? एक चोरी दिखायें, और दूसरी चोरी को कह दें कि समाज में ग़लत असर जायेगा तो यह तो hypocrisy ही हुई न? आप जैसे हो वैसे हमेशा, हर जगह रहो तो लोग आपको आदर्श मानते हैं, अन्यथा वही आप पर हँसते हैं। और मीडिया पर यदि सवालिया निशान लगने लगें और लोग हम पर हंसने लगें, तो ये मीडिया के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।

आरुषि के क़त्ल में मीडिया की भूमिका हमारे लिए शर्मनाक साबित हुई। फिर हम किसे जगाने की बात करते हैं। हम समाजसे कहाँ अलग हैं और उसे कैसे सुधारेंगे? हम में से कौन इस बात से अनजान है कि मीडिया में नौकरी पाने के लिए जुगाड़ का कितना अहम् किरदार होता है? हर वर्ष न जाने कितने ही बच्चे पत्रकारिता में डिग्री और डिप्लोमा हासिल कर मैदान में कुछ कर दिखाने का जज़्बा लिए उतरते हैं, और अंततः उनमें से कई लोग काबिल होते हुए भी अपने लिए जगह नहीं बना पाते हैं। वो कभी अपनी किस्मत को कोसते हैं तो कभी अपने आपको।

मीडिया कि नियुक्तियां भी अब काफ़ी हद तक contacts पर होने लगी हैं। ऐसा हरगिज़ नहीं है कि Vacancies नहीं होतीं - Vacancies होतीं हैं और भरती भी हैं, पर आते वो हैं जिन्हें हम चाहते हैं।

अपने दिल पर हाथ रखकर हम में से कई इस बात से सहमत होंगे कि हमारे संस्थानों में एक अच्छा खासा तब्का जुगाड़ से आता है। जिसके चलते कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं जब हम अपने से काबलियत और अनुभव में कहीं पीछे किसी व्यक्ति को इंटरव्यू देने जाते हैं और वो हमको रिजेक्ट भी कर देता है। या फिर ऐसा ही कोई व्यक्ति होता है जिसे हम रिपोर्ट करते हैं। कई बार हमारे नीचे भी कोई काबिल बन्दा होता है जो हमसे संकुचाते हुए अपनी बात कहता है और हम उसे कुछ भी नहीं समझते।

यहाँ गौरतलब बात यह है कि यह परिस्थितियाँ विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पायी जाती हैं। प्रिंट में तो आप कि सफलता का पैमाना ही आपकी काबलियत होती है। आपके अनुभव और आपकी ख़बर को समझने की सलाहियत ही आपको एक सीनियर जर्नलिस्ट का खिताब देती है। पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उम्र, तजुर्बा और काबलियत आपकी तरक्की में बाधा नहीं बन सकते। किसी अच्छे चैनल में जाने के लिए रिसेप्शन पर resume देना सिर्फ़ उनके जाडों के लिए अलाव का प्रबंध करने के समान रह गया है। एक अच्छा जुगाड़, चंद e-mails, कुछ फ़ोन काल्स और फिर कुछ follow-ups आपको एक अच्छी नौकरी तो दिलवा ही सकते हैं। जुगाड़ अच्छा है, और ऊँट आपकी करवट बैठा तो अच्छा पैकेज भी मिल ही जायेगा।

अब ऐसे माहौल में नए बच्चे कैसे अपना भविष्य बनायेंगे? अमिटी और Apeejay को तो कैम्पस प्लेसमेंट मिल ही जायेगा, चैनल्स के अपने institutes के बच्चे भी कुछ कर ही गुजरेंगे? पर उनका क्या जो गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों से निकल कर इस विरासत को पूरी इमानदारी व दृढ़ निश्चय के साथ संभालना चाहते हैं?

समाज के आदर्शों की चिंता करनी है तो अपने आदर्श तो सुनिश्चित करने ही पड़ेंगे। ऐसे में अत्यन्त आवश्यक है की वरिष्ठ पत्रकारों का ऐसा संगठन हो जो हमारे ऊपर लगाम रख सकें। मीडिया के भी कुछ कानून हों, कुछ कायदे हों - जो हमको हमारी सीमाएं बताएं और हमारे आदर्शों को धूल-धूसरित होने से बचाए। क्या हम आने खोते हुए वर्चस्व को बचा सकेंगे?


आगामी स्वतंत्रता दिवस पर






1998 में विवाद,2002 में बवाल..2008 में आग!

आलिशान बिल्डिंग में लाखों रूपये कीमत के स्टेज पर कीमती चमकीले कपडों में सजकर बैठे डेरा सच्चा सोदा के बाबा गुरमीत अपने लाखों अनुयायियों को धर्म,शान्ति और अहिंसा का प्रेम पाठ न जाने ऐसे कोन से तरीके से पढाते हैं कि वे अनुयायी सड़क पर आते ही हाथों में पत्थर उठा लेते हैं, बंदूकें चलाते हैं और हर उस शख्स का खून बहा देते हैं जो भी डेरा की विचारधारा से अलग बात करता है। १९९८ से लेकर अब २००८ तक के इन १० सालों के छोटे से अरसे में डेरा सच्चा सौदा विवाद से लेकर बवाल मचाने और अब चारों और उठती आग की लपटों के लिए जिम्मेदार रहा है। इस अरसे में डेरा प्रमुख के दामन पर साध्वियों से बलात्कार के आरोप के दाग लगे हैं, पत्रकार के कत्ल का जिम्मेदार उन्हें माना गया है और सिखों की भावनाओं से खेलने के शोंक ने उन्हें सिखों का दुश्मन बना दिया...इसके बाद तो एक के बाद एक ऐसे विवाद हुए जिन्होंने हरियाणा और पंजाब ही नही बल्कि पूरे देश को झुलसा दिया। चाहे मुंबई के मुलुंड इलाके में डेरा के बाबा के बोडिगार्ड की गोली से सिख युवक की मौत का मामला हो या डेरा अनुयायियों द्वारा की जाने वाली नामचर्चा के विरोध के दौरान होने वाली हिंसा, सभी मामलों में जिम्मेदार सिख हैं या डेरा अनुयायी यह एक अलग मसला है लेकिन जो हो रहा है उसे रोकने और थामने के लिए कहीं से भी किसी भी तरह की कोई कोशिश न होना साबित करता ही की विवाद सिर्फ़ उतना ही नही है जितना नज़र आ रहा है। धर्म की आबरू और धार्मिक स्वतंत्रता के हक़ की बात के बीच कुछ ऐसी वजहें पैदा कर दी गई हैं कि मसला विवाद,बवाल से बढ़कर इतना आगे चला गया है कि खुलेआम जान लेने और देने की बात की दहाड़ मरी जाने लगी है। अगर आज इस बात का जिक्र किया जा रहा है की सिख अपने धर्म और राजनीति का घालमेल कर रहे हैं तो २००७ में पंजाब विधानसभा चुनाव में डेरा सच्चा सौदा की तरफ़ से कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने का फरमान जारी किया जाना क्या खालिस धर्म की बात थी ? रही बात सिखों की तो उनकी राजनीति धर्म के इर्द-गिर्द ही घूमती है, इससे वे ख़ुद इनकार भी नही करते पर,डेरा अपने नये किस्म के इंसान धर्म की हिमायत krte हुए जितना हिंसक हुआ है, शायद उसी की वजह से आज वो देश का सबसे विवादास्पद डेरा बन गया है। सबसे अहम् सवाल ये है की डेरा जिन अनुयायियों के बारे में अक्सर कहता है की वे लाखों लोग डेरा प्रमुख के लिए जान ले भी सकते हैं और दे भी सकते हैं तो वे हो अनुयायी डेरा प्रमुख के शान्ति-अहिंसा के पाठ को मानने को तेयार क्यों नही होते? इसका सीधा मतलब क्या ये नही निकलता की डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों द्वारा की जाने वाली हिंसक गतिविधियों को रोकने के प्रति बिल्कुल भी गंभीर नही हैं! १९९८ से लेकर अब २००८ तक के १० सालों के अरसे पर निगाह डालें तो साफ़ होता है की डेरा अनुयायियों ने हमेशा अपनी बात बुलेट के जरिये मनवाने की कोशिश की है। और जब-जब उनकी बात नही मानी गई उन्होंने उसी बुलेट को कभी पत्रकार के सीने में उतार दिया तो कभी अपने पूर्व अनुयायी की जुबान को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। १९९८ में सिरसा के बेगू गाँव में डेरे की जीप के नीचे आकर एक बालिका की मौत पर पर्दा डालने के लिए डेरा अनुयायियों ने हथियारों से लेस होकर गाँव में दहशत मचाई। इस बाबत जब सिरसा के संध्या दैनिक रामा टाइम्स ने ख़बर छापी तो डेरा अनुयायियों ने अखबार के दफ्तर में जा कर पत्रकारों को धमकाया। २००२ में डेरा की एक साध्वी ने बलात्कार का आरोप डेरा प्रमुख पर लगा कर प्रधानमंत्री को ख़त लिखा तो इस मसले पर समीक्षात्मक रिपोर्ट छपने से बोखलाए डेरा अनुयायियों ने फतेहाबाद के सांध्य दैनिक लेखा-जोखा में तोड़फोड़ कर डाली। और अब २००८ में जो सिथिति बनी है, उसके लिए सबसे ज्यादा वो व्यवस्था दोषी है जो हर बार, हर वारदात, हर विवाद और हर बवाल के बाद भी खामोश रही। डेरा अनुयायी जो चाहते हैं वो कर रहे हैं, सिखों को डेरा प्रमुख से बदला लेने के लिए तलवार लहराना वाजिब लग रहा तो वो लहरा रहे हैं...लेकिन सवाल ये है की एक तरफ़ से चलती गोलियों और दूसरी तरफ़ से लहराती तलवारों के बीच आम आदमी का लोकतंत्र कहाँ है? डेरा की भीड़ कभी अखबार के दफ्तर को तोड़ देती है तो कभी पत्रकार का सीना गोलियों से छलनी कर देती है, सिख कभी नामचर्चा रुकवाने के लिए हिंसा करते हैं तो कभी दुकानों को आग लगा देते हैं...लेकिन सवाल ये है की जो डेरा अनुयायी नही है और सिख भी नही है, उसकी जान की हिफाजत का जिम्मा किसका है? दंगों में मरने वालों के जिस्म पर कभी भी किसी ने धर्म का लेबल देखा है? बहराल, धर्म और राजनीति के इस घालमेल से उपजा विवाद कैसे थमेगा इस पर कभी तो सोचना ही होगा। कुछेक दिनों के फर्क में विवाद की भेंट चद्ती इंसानी जानों की तादाद ना बढे, इसके लिए जरूरी है की डेरा शान्ति-अहिंसा की अपने मुंह से जो हिमायत करता है उसे अमलीजामा भी पहनाये, जरा से उकसावे पर जान लेने और देने को तेयार रहने वाले अनुयायी आध्यात्म का रास्ता छोड़ कर तालिबान बनने पर क्यों आमादा हैं? यकीनन, जिस दिन डेरा गोली की भाषा में बात करना बंद कर देगा, उस दिन वो लाखों लोगों के विश्वास पर खरा भी उतरेगा और उससे ताल्लुक रखता हर विवाद भी थम जाएगा।

6.8.08

‘‘न मिल पाई स्याही अभी तक वही इतिहास का खोया रतन है।’’

अगस्त क्रांति और बिहार

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले,
वतन पर मरने वालों का कोई नाम व निशां न होगा
आज से ठीक 66 साल पहले, 9 अगस्त 1942 ‘करो या मरो’ का पहला दिन .... और बिहार कई दिन पहले ही से नये तेवर में बौराया था। 8 अगस्त की रात ही पटना में सैंकड़ों गिरफ्तार.... और सुबह में देश को ब्रिटिश साम्राज्य की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए बुलंदियों की हद तोड़ती आतुरता....... और यही जुनून अड़तालिस घंटे बाद फिरंगी राज के प्रमुख प्रतीक (पुराना सचिवालय ) पर तिरंगा लहरा देता है। सात नौजवान छात्र शहीद और फिर पूरे देश में आंदोलन की आंग.... और इसी आग ने ब्रिटिश राज्य की नीवों को हिला दी एवं आज़ादी हासिल करने के लक्ष्य में निर्णायक भूमिका अदा की।
लेकिन आज हम शहीदों भुला चुके हैं। शहीदों को भुलाने की इससे बड़ी व्यवस्थागत विडंबना और क्या होगी कि आज तक उनकी समेकित सूचि भी नहीं।
न दबाया जरे चमन इन्हें, न दिया किसी ने कफन इन्हें
किया किसने यार दफन इन्हें, बेठिकाना इनका मज़ार है।
तो आइए उन शहीदों को श्रधांजलि अर्पित करे, जिनके वीरोचित कार्यकलापों को नई पीढ़ियां जानती तक नहीं। हिंदी के महान साहित्यकार व स्वतंत्रता सेनानी रमेश चंद्र झा ने क्या खूब कहा है।
न मिल पाई जिसे स्याही अभी तक,
वहीं इतिहास का खोया रतन है।
कि जिस नाम को न जाना अब तक,
उसी गुमननाम को मेरा नमन है।

वास्तव में आज संक्रमण का दौर है। काल्पनिक नायकत्व तक से ऊबी जिंदगिया, शक्तिमान, हैरीपोटर, पोकेमोन, सुपरमैन, स्पाइडरमैन, कृष और खली की ड्रामाबाज़ी में मस्त है। हद तो यह है कि शहीदों के गांव वालों को ही अपने गांव-कस्बों के शहीदों के नाम याद नहीं, जबकि प्रदेश का ज़र्रा-ज़र्रा शहादत की दास्तान अपने दिल में समो कर रखा है।
जब अंग्रेज़ी फौजों ने राक्षसी तेवर अपनाने प्रारंभ किए। बलात्कार, बच्चों को आग में झोंकना, गांवों को फूंकना, खादी भंडारों पर कब्ज़ा, उसकी बर्बादी, कैदियों को पेशाब पिलाना...., आखिर लोग कहां तक फिरंगियों के जुल्म को सहते। यहीं से प्रारंभ हुआ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ जिसे हम अगस्त क्रांति के नाम से जानते है। अगस्त क्रांति के दौरान खास तौर पर डाकखाना व रेल निशानों पर रहें। सरकारी दफ्तर-थाने से अंग्रेज या उनके चमचे मार भगाए गए। मुज़फ्फरपुर के लोगों ने तो गोंलियों का मुकाबला लकड़ी की ढाल से किया। आरा, हाजीपुर, सीतामढ़ी व संथालपरगाना की जेल तोड़ कैदी भग चले। लोगों से डर कर मुंगेर , पुर्णिया, शाहाबाद, आरा, दरभंगा, चंपारण, भागलपुर....जिलों के 80 फीसद ग्रामीण थाने ज़िला मुख्यालयों मे आ गए। कचहरियों पर हमला, टाटा नगर में मजदूरों की हड़ताल... फिरंगियों के होश उड़ाने लगे। लेकिन लोग अब भी कहां मानने वाले थे। 11 अगस्त की सचिवालय गोलीकांड ने खास कर पटना जिले में लोगों के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया। दो दिनों बाद आई टामी ब्रिगेड जन-विद्रोह दबाने लगा। फुलवारीशरीफ में 17, विक्रमगंज में 2 व बाढ़-नौबतपुर में एक-एक व्यक्ति शहीद हुए। फतुहा में दो कनाडियन अफसर मार डाले गए।
मुंगेर जि़ले में हवाई जहाज़ से चली गोलियों ने 40 को शहीद किया। महेशखूंट, मदारपुर, सूर्यगढ़, तेघड़ा, बेगूसराय, बरिआरपुर, मानसी, खगड़िया, गोगरी... फायरिंग में 41 लोग मारे गए। मुंगेर ज़िले में 17 थानों पर हमला, सरकारी कार्यालयों पर जनता का कब्ज़ा, स्वशासन इकाईयों का गठन, तारापुर में जनता दारोगा-जमादार की बहाली... उधर बेतिया (प॰ चम्पारण ), मेंहसी, फुवांटा, पंच कोखरिया में अंग्रेजों की गोलियां तड़तड़ाती रहीं। रामावतार साह को स्टेशन बुलाकर गोली मार दी गई। शाहाबाद के 21 स्थानों पर चली गोली में दो दर्जन शहीद हुए।डुमरांव थाने पर तिरंगा फहराने की कोशिश में बारी-बारी से तीन युवक (कपिलमुनि, रामदास लुहार, गोपाल राम ) मारे गए। सासाराम में मशीनगन से जूलूस पर गोलियां चलीं। गया ज़िले में गोली से तीन व थाना कांग्रेस कमेटी के मंत्री श्याम बिहारी लाल भाला से मारे गए। अरवल के शिक्षक दुसाध्य सिंह की हत्या कर दी गई। हज़ारीबाग़ में आंदोलनकारियों को चैराहों पर नंगा कर हंटर से पीटा गया। इसी बीच हजारीबाग़ सेंट्रल जेल से जय प्रकाश नारायण-सूर्यानारायण सिंह व साथियों की फरारी ने लगी आग को और भड़का दिया। परशुराम व सियाराम दल (भागलपुर ) ने अंग्रेज़ों को तबाह कर दिया। नतीजा भागलपुर जेल में फायरिंग और सवा सौ लोगों की मौत ..... कैदियों ने एक अफसर को मार डाला। पुपरी (मुज़फ्फरपुर ) का दारोगा अर्जुन सिंह ने पांच लोगों की हत्या करा दी। मीना पुर थाने पर एक व्यक्ति की मौत से गुस्साये लोगों ने थानेदार को मार डाला। सीतामढ़ी व हाजीपुर के इलाके में भारी मारकाट हुई। कई को फांसी व आजीवन कारावास की सजा हुई। कटिहार थाने पर हमला करने जाते आठ लोग मारे गए। इसमें तेरह वर्षीय ध्रुव भी था। यहां 13 थानों पर हुए हमलों में एक थानेदार व तीन सिपाही मारे गए। बदले में पुलिस ने 11 स्थानों पर गोलियां चलाई और 35 लोगों को मार डाला।
सिवान में एक सभा पर हुए पुलिसिया हमले में तीन लोग मारे गए। भड़के लोगों ने छपरा स्टेशन पर आग लगा दी। मढौरा में सभा पर हमला करने आए पांच अंगे्रजों को लोगों ने मार डाला, दो आंदोलन कारी भी शहीद हो गए। सिवान थाना पर तिरंगा फहराने की कोशिश में बाबू फुलैना प्रसाद समेत चार लोग मारे गए। श्री प्रसाद की धर्मपत्नी श्रीमति तारावती तो पति के गोली लगने के बाद स्वंय ही तिरंगा लेकर आगे बढ़ गई। छपरा से सिवान जाने के रास्ते अंगे्रज़ों ने खेतों में काम कर रहे दो लड़कों की हत्या कर दी। मलखाचक में रामगोविंद सिंह का घर डायनामाइट से उड़ा दिया गया। जानकी मिश्र को बूट की ठोकरों से मार डाला गया। लोगों ने एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी।
हर तरफ फिरंगियों की फायरिंग...... भारी उत्पाद..... सैंकड़ों भारतीय शहीद....... फिर आंदोलनकारियों के कदम फिरंगी डिगाने में नाकाम रहें। इस तरह अंतहीन सी है दास्तान सिर्फ अनुभवजन्य! खैर सच्चिदानंद की इन पंक्तियों से हम उन शहीदों को करते हैं सलामः-

उनको स्वराज्य की, हो रंगरलियां मुबारक,
हम शोषितों को अपनी कुर्बानियां मुबारक
ओ नौ अगस्त वाले, युग-युग अमर शहीदों,
तुम को फिरंगियों की हो फांसियां मुबारक।


अफरोज़ आलम ‘साहिल’ एच ।77/14, चतुर्थ तल, शहाब मस्जिद रोडबटला हाउस, ओखला, नई दिल्ली-२५
मोबाईलः 9891322178

मेरा ब्लॉग

जय भड़ास !

मेरे प्रिय भडासी मित्रों वैसे तो मैंने जुलाई में अपनी दो पोस्ट भड़ास परडाली थी और उन पर कुछ टिप्पणियां भी प्राप्त हुई किंतु मैं अपने ब्लॉग का नाम देना भूल गया था । कृपया कर अब इसे नोट करने का श्रम करें - http://meribakwaassuno.blogspot.com/
मेरा नाम अरुण कुमार जैन हे और कर्म से सरकारी कर्मचारी हूँ । मेरे ब्लॉग से कभी कभी किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी भड़ास के रूप में अपनी बात कह लेता हूँ ।

जय भड़ास ।

5.8.08

बहुत उलटफेर हो रहा मीडिया में

दैनिक भास्कर इंदौर के डिप्टी न्यूज़ एडिटर रविकांत ओझा ने आज तक न्यूज़ चैनल ज्वाइन कर लिया है। इस नई पारी के लिए उन्हें shubhkamnayein।

बयान जारी कर दूं 'सर`

नेता जी अपनी पर्सनल कुर्सी पर बैठे संसद में नोटों की गडि् डयां उछालने के बाद हुए घाटे के बारे में सोच ही रहे थे कि इतने में सेके्रटरी ने आकार बताया। सर! फंला-फंला राज्यों में बम धमाके हो गए। बयान जारी करना चाहिए। लेकिन, नेता जी इससे भी जरूरी मसले पर मंथन करने में मशगूल थे। वे सोच रहे थे, इस बार तो तीन सिरफिरे सांसदों ने संसद में नोटों की गडि् डयां उछाल कर पूरा खेल ही खत्म कर दिया। मेरी तो 25 कराे़ड में डीलिंग लगभग तय हो चुकी थी। पर, कमबख्तों ने ऐन मौके पर खेल बिगाड़ दिया। अब पिछले साढ़े चार सालों में इमेज भी कुछ ऐसी बनी है, अगले चुनाव में पहले तो टिकट मिलेगा नहीं और अगर मिल भी गया तो जनता मुझे घास डालेगी नहीं। लगे हाथ जाते-जाते कुछ कमाई हो जाती तो अगले कुछ साल आराम से कट जाते। इतने में सेके्रटरी ने फिर नेता जी को संबोधित किया। सर आपने कुछ बताया नहीं, या करना है? नेता जी ने भी मुंह में भरे मसाले की पिचकारी टेबल के नीचे रखे पीपदान में मारी और सेके्रटरी को घूरने वाली नजरों से देखते हुए कहा। जितनी देर तुमने मेरा दिमाग खाया है, इतनी देर अगर तुम पुराना जारी किया बयान ढूंढने में लगाते तो वह अब तक अखबार के दफ्तरों में पहुंच भी जाता। या तुम्हें पता नहीं इस देश में बम फटना अब आम बात हो गई। प्रेस वाले भी बिना विज्ञप्ति पहुंचाए ऐसे मौकों पर खुद-ब-खुद ही हमारी ओर से बयान जारी कर देते हैं। फिर तुम तो कई सालों इस 'जीव` के साथ काम कर रहे हो। बेटा शियासत के बाजार में जनतंत्र, लोकतंत्र और प्रजातंत्र के बाद अब नया उत्पाद आया है 'नोटतंत्र`। मुझे इस नए विज्ञान के बारे में सोचने दो। बम-वम तो फटते रहते हैं। आज न सही कल बयान जारी कर देंगे। वैसे भी इस काम में हमारी बिरादरी के अन्य जीव बहुत तेज हैं, अब तक वे सारा काम कर चुके होंगे। उन्हें पता है कि देश में ये काम कौन लोग कर रहे हैं। वह उनको राजनैतिक भाषा में अब तक गाली भी दे चुके होंगे, आंसू भी बहा लिए होंगे, संवेदना....बगैरा-बगैरा सबकुछ कर चुके होंगे। अब तुम बम-वम की बात छाे़डो और ये सोचो आने वाले चुनाव में किस पार्टी की गोद में बैठना है। वैसे भी विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि मुझे पार्टी लाल कार्ड दिखाने जा रही है। इस बात की चिंता करो कि मैं फिर से सांसद बनकर कैसे नोटतंत्र का चिंतन करूं। इतना सुनने के बाद भी जब सेके्रटरी वहीं खड़ा रहा तो नेता जी ने सोचा बच्चे को थाे़डा और ज्ञान दे ही दिया जाए। नेता जी बोले, हम भारतीय हैं। अहिंसा परम धर्मम् । हम अमेरिका जैसा अधर्म वाला काम नहीं कर सकते। उसके यहां दो धमाके या हुए। उसने दुनिया के न शे में दो देशों का तख्ता ही पलट दिया। हम गांधी जी के देश में रहते हैं, पहले एक राज्य में बम फाे़डा अब दूसरे में कल तीसरे में...। या फर्क पड़ता है। हम सौ कराे़ड की आबादी पार कर चुके हैं। थाे़डा बहुत कम हो भी जाएं तो या हुआ। चिंता इस बात की करो कि राजनीति की इस बिसात में अब कौन सी गोटी चली जाए, ताकि मैं फिर से सांसद बन जाऊं और देशकाल के चिंतन में डूब जाऊं।

अग्रवाल व् मिश्रा पत्रकार कल्याण कोष समिति में शामिल

मध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रांतीय महासचिव विनय अग्रवाल, संभागीय महासचिव प्रवीण मिश्रा, को राज्य पत्रकार कल्याण कोष समिति का सदस्य चुना गया है। चुने गए पदाधिकारिओं का कार्यकाल दो साल होगा । पत्रकारद्वय को श्रमजीवी पत्रकार संघ ने बधाई दी । बधाई देने वालों में डॉ सुरेश सम्राट, सुरेश शर्मा, प्रदीप मन्दरे, रविन्द्र झारखरिया, रविशेखर, अरविन्द श्रीवास्तव, अनिल अरोरा, उमेश सिंघ , आदि थे।

ग्वालियर विकास समिति करेगी ४३ गोरवों का सम्मान

इस वर्ष १५ अगस्त को ३१ वे अभिनन्दन समारोह में महानगर की सामाजिक संस्था ग्वालियर विकास समिति ४३ गोरवों का सम्मान करने का निर्णय गत रात्रि जीवाजी विस्वविध्यालय के कुलपति आचार्य Ak Kapoor एवं LNIPE के कुलपति मेजर जनरल SN Mukherjee की सयुंक्त अध्यक्षता में संपन्न चयन समिति की बैठक में लिया गया । बैठक में DIG आदर्श कटियार, DIG BSF V.K Pandey, additional SP Manohar Verma, Anil Kuswah, ADM R.K Jain, Aditional Collector Vinod Sharma, Dean Dr. Sheela Sapre, वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक, सुरेश सम्राट, केन्द्र निदेशक दूरदर्शन आर बी भंडारकर , जनसंपर्क संचालक सुभाष अरोरा, मेला उपाध्यक्ष वेद प्रकाश, डॉ आभारानी टमोतिया , अखिलेंदु अरजरिया, अरुणा सैन्य, नलिनी श्रीवास्तव, डॉ ऍम ऍम श्रीवास्तव, आदि ने सर्वसम्मति से तिघरा में पानी लेन हेतु भागीरथी प्रयास के लिए जल संसाधन मंत्री अनूप मिश्रा सहित ४२ अन्य गोरवों को सम्मानित करने का निर्णय लिया। ग्वासिस के महासचिव मनमोहन घायल ने बताया बताया की शहर के चुनिन्दा लोगो को जिन्होंने शहर के विकास में बहुत योगदान दिया है । उन सभी लोगों को सम्मानित किया जाएगा । जिनमे मुख्य रूप से नईदुनिया के पत्रकार राजदेव पाण्डेय, निर्मला अरोरा, अब्दुल हामिद कादरी, डॉ संदीप कुल्श्रेष्ट्र मोहन अम्बर, आदि को सम्मानित किया जाएगा। युवा पत्रकार राजदेव पाण्डेय को स्वर्गीय कैलाश परिहार पत्रकारिता सम्मान दिया जाएगा। कार्य क्रम में Dr. AS Bhalla, डॉ दीपेन्द्र टमोटिया , धर्म कुमार, अशोक जैन, आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

इस मेल का क्या करुँ !!!!!!!!

मित्र गण,
अभी एक मेल मिला मैं आपके सामने रख रहा हूँ कृपया मार्गदर्शन करें।
FROM: "Insp. Augustine Kweku"
TO: Me
SUBJECT: From Inspector Kweku

Good day,
My name is Inspector Augustine Kweku, I am officer incharge of anti fraud unit here in Lapaz police station Accra, Ghana.My men invaded an area at abeka suspected to be fraudstars hide out and arrested some numbers of fraudstars.During a search in their apartment, we discovered your information which convinced us that you must be one of their victims. When we asked them on how they got your information and what business they have with you, they said that you are just one of their online business partner and have not comitted any money to them. But we are not convinced with that, because we know that this fraudstars never do any collecting money falsely from foreigners. So we want you to get back to us if you have by any chance sent money to these fraudstars, and also send to us some vital informations regarding any transaction you had with them. That will help us during our investigation, and we will make sure that any amount of money you sent to this group is been recovered and sent back to you.The present government set up this Anti Fraudstars Unit to wipe out all these fraudstars that have been destroying the image of this country (Ghana) before the rest of world, So this country's name can ne restored as one the good country before the world.Reply to my private email address: kweku.ghanapoliceheadquaters@gmail.com
Thanks,Insp. Augustine kvekoo

कृपया इसे पढ़ कर बताएं की डरने की कोई बात तो नही है :-P :-) वैसे भडासी डरते कहाँ है।
जय जय भड़ास

4.8.08

भड़ास यूँ ही

सभी भडासीजनों को नमस्कार,
भड़ास यूँ ही निकले तो सही लगती है,
न गोली चलती है न किसी मौत देती है,
कौन फाडेगा, किसकी फटेगी ये समय बताएगा,
हम सबको क्यों एक-दूजे की फाड़ने की लगी रहती है?
पोस्ट पढने, टिप्पणी करने पर सबको धन्यवाद क्योंकि यही कुछ और लिखने की प्रेरणा देती है.

भडासी भाइयों को namaskar

भडासी भाइयों को नमस्कार,

कुछ व्यस्तताओं के चलते काफी दिनों से भड़ास पर अपनी उपस्तिथि दर्ज नही कर पाई लेकिन जल्द ही करेंगे कई मुद्दों पर बातें। आदरणीय यशवंत जी और रुपेश जी को विशेष याद और नमस्ते।

प्रियंका कौशल

सेक्स स्टोरी यानी टी आर पी में बढोतरी

कल शाम घर पहुंचा तो बड़ा थका हुआ था खानावाना खाने के बाद सोच चलो थोड़ा सा न्यूज़ देख लेते हैं। चैनल के चक्कर में पड़ा तो कहीं ख़बर ही नही सब जगह उट पटांग कार्यक्रम चालू था आते आते एन.डी.टी.वी. । पर अटका बरखा का कार्यक्रम आनेवाला था सोचा बहुत दिन हो गए हैं देख लिया जाए। कार्यक्रम का विषय देखा तो लगा की यार ये शायद जाना पहचाना सा ही है बहस था "सेक्स वर्कर के कार्य की मान्यता पर" खाना खाते खाते देखने लगा और मानस पटल पर चलचित्र की भाँती कुछ याद आने लगी की भैये ये तो हम पहले ही देख चुके हैं।
कार्यक्रम देखता रहा और सोचता रहा की ये है हमारी पत्रकारिता, और ये है देश का बेहतरीन चैनल (ऐसा मैं नही कहता बहुत से लोग दावा करते हैं।) ख़बर ना हो तो सेक्स को पडोसना आज के पत्रकारिता का पहला मूल मंत्र सा हो गया है। मैं ये नही कहता की ये मुद्दा बहस का नही था मगर एक ही मुद्दे पर कई बार बहस समझ में आती है पर एक ही बहस को बार बार दिखाना समझ के परे लगा। ओरतों की समस्या ओरत के लिए ही नही पत्रकारों के लिए भी एक विषय रहा पुरूष की समस्या किसी ने देखी ही नही परन्तु जब विषय और तथ्य परक विषय की बात हो तो लोगों की अपेक्षा के अनुरूप सेक्स परोस दो चाहे वो अखबार हो या टी वी चैनल।
सेक्स वर्कर के नाम पर जिस तरह से इस कार्यक्रम में सिर्फ़ सेक्स को पडोसा गया समस्या को नही उसके लिए मैं बरखा को धन्यवाद दूँगा। अपने संस्थान का नंबर यानी की टी आर पी जो बढानी है सब जायज है। समस्या और समाधान से परे समाज के सबसे अछूत कहे जाने वाले कौमऔर इसी सेक्स वर्क से जुड़े समाज का एक अहम् हिस्सा मगर समाज का नही यानी की "लैंगिक विकलांग" के बारे में हमारे पत्रकार समाज को कुछ नही सूझता क्यूंकि इन से जुड़ी हुई ख़बर तो बिकाऊ हो सकती है मगर इनकी समस्या, इनका दर्द,इनका सामाजिक विस्थापन इन कुपत्रकार और कुपत्रकारिता के लिए विषय तो हो सकता है मगर बिकाऊ नही। कोई भी अखबार हो या समाचार चैनल, व्यावसायिकता के होड़ और दोड़ में सेक्स को कभी भी दरकिनार नही करता अपितु विशष आदेश के अनुसार कोई भी खबर इस से जुडी हो तो उसे प्रमुखता से जगह देना का चलन।

एक बार मैं पहले भी लानत मलानत दे चुका हूँ और एक बार फिर से ऐसी घटिया और संवेदनहीन पत्रकारिता और पत्रकार को लानत मलानत जो पत्रकारिता के मूल मंत्र से हट कर व्यवसाय करने वाले बनिए के दलाल बनते जा रहे हैं।
जय जय भड़ास

खुदा से मन्नत है मेरी.......कश्मीर दोबारा...

ये गाना मुझे बहुत हि अच्छा लगा शायद आप सभी को भी लगे आशा है


पता नही हमारे और पाकिस्तान के हुक्मरानो के दिमाग मे क्या है, पुरे ६० सालो मे पता तो नही चल पाया कि हम या वो क्या चाहते है| क्या हम चाहते है कि वर्तमान सीमा रेखा को ही अपने देश की सरहद मान ले या फिर हमे अविभाज्य काश्मीर चाहिये, हमे कुछ नही पता कि हमे क्या चाहिये और हम हर साल हजारो जानो कि कुर्बानी दे रहे है आखिर क्यो, हर साल हम अरबो रुपये सिर्फ सुरक्षा पर व्यय करते है क्या हम यही पैसे काश्मीर पर खर्च नही कर सकते, आखिर क्यो हम राष्ट्र्पति शासन से लेकर सारे के सारे प्रयोग किये आखिर हम क्यो असफल हुये, क्या हमने कभी ईसपे गौर किया शायद कभी नही, हमारे कोई भी राजनीतिक दल वोट बैँक की राजनीति से आगे सोच नही पाये, आखिर क्यो ?
अब हम पाकिस्तान के तरफ से सोचते है वे आतंकवाद कि सहायता करते है कि वे चाहते है की काश्मीर आजाद हो जाये, तो हम मानते है कि काश्मीर अगर आजाद हो जाये तो फिर उसके बाद काश्मीर कि स्थिति क्या होगी, क्या काश्मीर को पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश का दर्जा देगा शायद कभी नही, और ये एक बहुत बडा छलावा है क्योकी अभी तक सभी काश्मीरी लोग यही सोचते है की उनका अपना अलग देश होगा, और ईसी के बिना पर वे आतंकवाद का सर्थन करते है और सारे कट्टरपंथी नेता ईसी पर अपनी रोटीयाँ सेकते है|
पता नही कब हमारे हुक्मरानो और पाकिस्तानी नेताओ को समझ आयेगी, सत्ता से बाहर होते ही उन्हे सारी अच्छी बातो की याद आने लगती है पर सत्ता मे रहने पर शायद एक बार भी नही याद करते, और ईन सभी के बीच हम सब लोग पिसने को अभिशिप्त है जैसे.....

डल झील

डल झील

डल झील

3.8.08

patrakar sunil kumar gautam ka ilaj AIMS me

patna ke varishta patrakar sunil kumar gautam ka ilaj delhi ke AIMS me ho raha hai. abhi we delhi stitha Bihar Niwas kamara number 127 me thahare huye hain. subah ya der sham ko bat ki ja sakati hai. Bihar Niwas ka number hai-- o11-26119720, 26119627, 26119534, 24676961.

abhi unki stithi gambir hai.
samudayik sahayog ki apeksha hai.
madad ke swarup ke liye bhadas ke Yashvant bhai se sampark kar sakate hain.

detais purva me publice post ko pathen....

भड़ास: वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार गौतम के दुख को महसूस करिए

भड़ास का आतंक

भड़ास के भडासी अंदाज ने बड़े बड़े मीडिया हाउस की नींद उदा दी है, पत्रकारों के शोषण का केन्द्र बना ये बड़े बड़े लाला जी की दूकान का पोल पट्टी भड़ास पर आने के बाद से ही तमाम समूंह में हल चल का वातावरण सा आ गया था, अखबारनवीस के सूचनाओं का भण्डार भड़ास पर होता है जिस से पत्रकारों के सामने विभिन्न रास्ते सामने आते हैं, मगर ये अखबार चलाने वाले लालाओं के के लिए खुली चुनोती सी हो गयी है।
भड़ास का डर अख़बारों में ऐसा समां गया है की अखबार के मालिकान के साथ मालिकों के पिछलग्गू बड़े बड़े पत्रकार व सम्पादकों के आदेश पर कार्यालय से भड़ास प्रतिबंधित करा जा रहा है। पहले हिन्दुस्तान और अब अमर उजाला के पत्रकारों से भडास का अधिकार छीन लिया गया है, अब यहाँ के लोग अपने अपने कम्पूटर पर भड़ास नही देख सकते हैं।
पत्रकार और पत्रकारिता का हित और पत्रकारिता के इनदुर्योधन लाला जी से लड़ने वाला भड़ास धंधेबाजों के लिए एक खतरा सा बनता जा रहा है क्यूंकि इनकी काली कारिस्तानी भड़ास के माध्यम से सामने आ रही है।और इसी तरह आती रहेगी भले ही ये दूकान चलाने वाले लोग और इनके तेल लागोऊ पत्रकार को ये रास ना आए क्यूंकि बड़े मियां ये आपके लाला और अखबार का मोहताज नही है, अधिकार और कर्तव्य के साथ भड़ास पोल पट्टी को सामने लाता रहेगा।

जय जय भड़ास

हथौड़ा चालू

बड़े भाई

मेरा ब्लॉग हथौड़ा चालू हो बया है। गूगल ने आज ही उसका ताला खोला है।

आपका
अंशुमाली

(इस मामले को जानने के लिए पहले की पोस्ट पढ़ें...अंशुमाली का ब्लाग गूगल ने किया लाक)



बधाई हो अंशु भाई....अंत में सच की जीत होती ही है, थोड़ी देर व अंधेर से घबराने की जरूरत नहीं। यशवंत

2.8.08

किचिर-किचिर पर चक-चक


किचिर-किचिर पर लंबी चकर-चकर होगी,

किसकी फटेगी...........................खोपडी,

किसका निकलेगा.......................दम,

पता नहीं।

हम समझते रहे इसे भडास,

तो फ़िर हमारी ही फटेगी.................खोपडी,

हमारा ही निकलेगा............................दम।

(घबरा गए, कुछ और न फटेगा, कुछ और न निकलेगा)

बाप-दादाओं ने भी समझा था

इसे भडास, किचिर-किचिर,

तभी खाते रहे उनका................जूता,

ख़ुद भी और

खिलवाते रहे उनका.....................जूता,

(फ़िर घबराए...............)

हमें भी,

अब लगता है, इन आदतों से

हम भी डालेंगे..............मुसीबत में

अपनी आने वाली पीढ़ी को।

युगों-युगों से चलती आ रही

जूते खाने, पिटने और फ़िर

करने की...............किचिर-किचिर

की परम्परा को

निभाते रहेंगे।

वे डालेंगे....................मुसीबत में

हमें और हम

डलवाते रहेंगे.......................मुसीबत में

ख़ुद को

क्योंकि सत्य सामने है पर हम

दबाये बैठे हैं अपना....................हौसला

और कहते हैं

किचिर-किचिर युगों से चालू है.

क्या आप छोटा चेतन को जानते हैं...

बहुत पहले एक फ़िल्म आई थी, नाम था छोटा चेतन, बच्चे, बड़े और नादान सबने फ़िल्म को जमकर सराहा और वक्त बीतने के साथ चेतन की याद भी कुछ कुछ धुंधली पड़ गई, इधर जिन्दगी की धकापेल में इस शहर से उस शहर और कई दिक्कतों में चेतन दिल और दिमाग से दूर होता गया, इधर दिल्ली आया और पाश सी कही जाने वाली एक कालोनी में एक अदद मकान का जुगाड़ करके दिल्ली को फिर से गले लगाने की कोशिशों में जुटा ही था की एक दिन अनायास 'चेतन' से मुलाक़ात हो गई, 'चेतन' और वो भी छोटा 'चेतन' इस मोड़ पर बेसाख्ता छोटा चेतन से मिलना और रोज मिलना, न सिर्फ़ मिलना बल्कि छोटा चेतन के साथ अक्सर बिस्कुट खाना और कुछ देर खेलना आदत सी बन गई, जाहिर है जिस चेतन की पूरी दुनिया दीवानी है और मेरी कालोनी का हर इंसान तोः चेतन का मुरीद बने बिना रहने की हिमाकत मैं कैसे कर सकता था, दरअसल हुआ यूँ की एक रोज यूँही छुट्टी के दिन पैदल टहलते टहलते किसी दूकान सी कही जाने वाली जगह पर कुछ देर रुका ही था की चेतन साहब टकरा गए, अब इंसान होने के नाते और उम्र में चेतन के बेहद छोटे होने के चलते उनके वाजिब स्नेह को ब्याज समेत लौटाना फर्ज था, कुछ फर्ज की मजबूरी और कुछ चेतन के प्रति प्यार, बस एक ब्रेड का छोटा सा टुकडा क्या ऑफर किया चेतन अपना दोस्त बन बैठा और दोस्त भी ऐसा-वैसा नही, ''ये दोस्ती हम नही तोडेंगे'' टाइप की दोस्ती, अब इस अजनबी शहर मेंबैठे बिठाये एक बेहतरीन दोस्त को कौन खोना चाहेगा, जब कमीनगी लोगों के चेहरे से टपकने के बजाय जज्बातों तक से टपकती हो , तोः साहब अपनी दोस्ती यूँही अनायास शुरू हो गई, रात एक बजे मेरे घर पहुँचने तक चेतन का मेरा इन्तजार करना, दूर से ही मुझे देख भर लेने के बाद अपनी पूरी बच्चा पार्टी के साथ बिना किसी मोल भावः के दोस्ती के नए नए मायने समझाने में चेतन लग गए, हाँ इस दोस्ती में न कोई फरमाइश है न कोई चालाकी और न छुपा हुआ कोई स्वार्थ, बस दो अजनबियों का दिल्ली जैसे बेदिल शहर में एक अनाम रिश्ता, क्यूंकि चेतन मेरी भाषा नही समझता और मैं उसकी, संवाद होता है लेकिन भावों से, अगर भावनाओं की येः कड़ी टूट गई तोः न चेतन मेरा दोस्त रहेगा और न मैं उसका, हम दोनों की बिरादरियों के बीच पहले ही संशय की इस कदर मोटी दीवार खड़ी है की अगर इस रिश्ते से एक दूसरे के बीच स्नेह की इस कड़ी को हटा दें तोः कहने के लिए कुछ भी नही बचता, बहुत लोग चेतन को नही जानते, लेकिन न्यू फ्रेंड्स कालोनी में रहने वाले ज्यादातर लोग न सिर्फ़ चेतन के दोस्त हैं बल्कि ''चेतन'' इस कालोनी का हीरो है, जाहिर है उसके कई सारे प्रशंषकों में मैं भी हूँ और चेतन का दोस्त होने के नाते इस दोस्ती पर गर्व करने की वजह भी मेरे पास दूसरो की ही तरह कई हैं, भले ही चेतन को लोग ''कुत्ता'' कही जाने वाली बिरादरी का एक सदस्य भर मानते हों पर हमारे लिए वोः बेहतरीन दोस्त, यार और भाई है, फर्क सिर्फ़ दो और चार पैरों का है, उम्मीद है ''छोटा चेतन'' को आप सब जान गए होंगे, तोः इस तरह के कई चेतन हमारी आपकी दोस्ती के लिए तैयार हैं बस हाथ तोः बढाइये उनकी तरफ़ दोस्ती का
''हृदयेंद्र''

मिशन इस्तांबुल-बेहतरीन कोशिश


मिशन इस्तांबुल

निर्देशक-अपूर्व लाखिया

संगीत-अनु मलिक और जाने कौन-कौन

आतंकवाद आज पूरी दुनिया की उभयनिष्ठ समस्या बना हुआ है। महाशक्ति अमरीका, ब्रिटेन समेत भारत इस नासूर का से त्रस्त का इलाज खोज रहा है। आतंकवाद पर हॉलीवु़ड और बॉलीवुड में कई फिल्में बन चुकी हैं। निर्देशक अपूर्व लाखिया की हालिया रिलीज फिल्म मिशन इस्तांबुल भी आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी है। लेकिन अपूर्व की फिल्म में आज के आतंकवाद की तबाही मचाने वाली नई सोच को दिखाया गया है। फिल्म में चरमपंथी मीडियाकर्मियों का मुखौटा पहनकर एक जाने माने खबरिया चैनल अल जौहरा के अंदर बैठकर दुनियाभर में आतंक और दहशत का खेल खेलते हैं। अपूर्व ने फॉर्मुला फिल्म में भी नयापन का छौंका लगाया है। अपूर्व की पिछली फिल्म शूट आउट....में माया डोलास का दमदार किरदार निभाने वाले विवेक ओबरॉय ने इस फिल्म में भी शानदार काम किया है। दुर्भाग्य से उनके खाते में कम सीन थे। बाकी पलटन का काम औसत है। विशाल शेखर, प्रीतम और शंकर महादेवन की नई और प्रयोगधर्मी धुनों के आने के बाद लोगों द्वारा लगभग भुला दिए गये अनु मलिक ने फिल्म का संगीत तैयार किया है। अब वह इंडियन आयडल सरीखे नाटक नौटंकी वाले रियलिटी शोज में जज की भूमिका अदा करें तो उनके लिए वही बेहतर होगा। हां, अभिषेक बच्चन पर फिल्माया गया आयटम गीत जब बजता है तो लगता है फिल्म में संगीत भी है।फिल्म में शूटिंग तुर्की के खूबसूरत शहर इस्तांबुल में की गई है। कहानी के हिसाब से लोकेशन एकदम फिट बैठती है।

लोकतंत्र गया तेल लेने........

कल दोपहर को जब मुंबई के सबसे ज्यादा जगमगाते क्षेत्र जुनैद नगर, अंधेरी(पश्चिम) में अपने किसी काम से गया तो नजारा देखा कि युवकों की एक टोली दुकानो में जा-जाकर कुछ पर्चे दे रहे हैं और कुछ ऊंची से आवाज में दुकानदारों को हिदायत(धमकीनुमा) दे रहे हैं। इतना देख कर तो मेरे जैसे प्राणी को कौतूहल स्वाभाविक है कि जान तो लें कि भइए चल क्या रहा है......? दुकानदारों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पर्चे हुक्म हैं इस बात का कि यदि मुंबई महानगरपालिका के आदेशानुसार दुकानों के नामों मे बोर्ड एक माह के अंदर मराठी में नहीं करे तो अवधि समाप्त होने के बाद दुकानो को तोड़ दिया जाएगा, आग लगा दी जाएगी; ये "राजा साहब" का आदेश है......। अरे स्स्साला... हमारे तो दिमाग में भोलेनाथ तांडव करने लगे कि जल्दी से पता करो कि देश आजाद हुए इतने साल बाद कहीं फिर से लोकतंत्र समाप्त तो नहींथो गया रातोंरात और राजा-महाराजा अस्तित्त्व में आ गए हों। जब मैंने लपक कर उन युवकों को जादू की झप्पी दी और पूछा कि भाई लोग आप क्या मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी हो या राजा साहब के सिपाही तो उन्होंने हिकारत भरी नजरों से मेरी तरफ़ देख कर बताया कि हम लोग राजा साहब के सैनिक हैं इसपर हमने जान की खैर मांगते अगला सवाल पूंछ लिया कि सेनापति जी ये तो बता दीजिये कि अब हम किस राजा साहब की प्रजा हैं। पता चला कि जब बाळ ठाकरे बालासाहब ठाकरे हो सकता है तो राज ठाकरे राजा साहब ठाकरे क्यों नहीं......? मुंबईवासियों को ये भी नहीं पता कि मुंबई में लोकतंत्र तेल लेने जा चुका है अब वहां राजा-महाराजा राज्य करते हैं। अगर आजादी के बाद हमारे वीरों ने शहादतें देकर कुछ सर्वाधिक मूल्यवान कुछ पाया था तो वह था इस देश में अपना कानून,एक लिखित संविधान जिसे बनाने वाले हर धर्म, जाति,रवायतों और भाषा के साथ-साथ क्षेत्र की भी विशेषताओं को समझते हुए उनका सम्मान करते थे लेकिन ऐसे राजाओं ने अपने स्वार्थ के लिये उस संविधान को ऐसा बना दिया है जो कि सिर्फ़ इनके इशारों पर नाचने वाली रंडी है(विद्वानजन इन कठोर शब्दों के लिये क्षमा करें किन्तु मैं आहत हूं)।

Shukriyaa

भाई रजनीशजी,
आपने मेरी हास्य ग़ज़ल पढ़कर पंडितजी को याद किया,यह इस बात का प्रमाण है की हमारे और उनके सम्बन्ध कितने घनिष्ट हैं.और जहाँ तक सवाल पंडितजी का है तो निराशा की कोई बात नही है, वो किसी भी छन प्रगट हो सकते हैं.इंतज़ार कीजिये.पीने-पिलाने के मामले में मैं भी khaalis भडासी हूँ। ग़ज़ल पसंद करने के लिए शुक्रिया।
Maqbool

Impact: सेक्स बनाम संचार क्रांति भाग-1

पहले मै आपको एक किस्सा सुनाता हूं।

आज से करीब पंद्रह साल पुरानी बात है। टीवी पर उन दिनों परिवार नियोजन का एक विज्ञापन आता था। तब हमारे यहां पूरे परिवार के साथ टीवी देखने का चलन था। जैसे ही वह विज्ञापन आने को होता, मेरे दादा जी मुझे पानी लाने के बहाने कमरे से बाहर भेज देते। मुझे ताज्जुब होता कि दादा जी को रोज एक निश्चित समय पर ही प्यास क्यों लगती है। बाद में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि उस समय परिवार नियोजन का विज्ञापन आता था।

लेकिन अब यह बीती बात हो गई है। अब तो दादा जी खुद विज्ञापन में बच्चों को समझाते नजर आ सकते हैं कि एड्स से बचाव के लिए सुरक्षित सेक्स कितना जरूरी है। फिल्म खुद्दार में करिश्मा कपूर पर 'सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोले' गाना फिल्माया गया तो हंगामा मच गया। गाने पर बैन लगा और 'सेक्सी-सेक्सी' की जगह 'बेबी-बेबी' करना पड़ा। डेढ़ दशक में ऐसा बदलाव आ गया कि अमिताभ की चीनी कम में आठ साल की एक बेबी का नाम 'सेक्सी' है।

पर यह सिर्फ फिल्मों की बात नहीं है, संचार क्रांति के साथ-साथ पूरे समाज में सेक्स क्रांति आ चुकी है। सेक्स की खुले आम चर्चा कभी वर्जित रही होगी लेकिन आज सेक्स शायद हमारी दैनिक बातचीत का हिस्सा बन गया है। वह जमाना और रहा होगा, जब लोग डॉक्टर से भी सेक्स के बारे में संकोच के साथ बात करते थे। आज सब कुछ खुला और साफ है।

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ पी के जायसवाल से एसएमएस द्वारा ऑनलाइन प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में पूछे गए इस सवाल को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि सेक्स चर्चा अब कितनी ओपेन है। सवाल अंग्रेजी में था, मै यहां उसका शालीन भावार्थ दे रहा हूं-मैं 24 वर्षीय युवती हूं। मैं जानना चाहती हूं कि सेक्स क्षमता बढ़ाने के लिए क्या कोई दवा है? मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने सब-कुछ आजमाकर देख लिया। मैं आपसे मदद चाहती हूं कि आप मुझे कुछ अच्छी टैबलेट्स बता दीजिए जिससे ।। धन्यवाद।

पंद्रह साल पहले पोते को पानी लाने भेजकर परिवार नियोजन का विज्ञापन न देखने देने वाले दादा जी अब इस पोते या पोती का क्या करेंगे?

एक के साथ एक फ्री की तरह संचार क्रांति के साथ-साथ सेक्स क्रांति भी भारत को उपहार में मिली है। जो लड़के -लड़कियां आपस में सेक्स की चर्चा करने में संकोच करते थे वे बिना हिचक नॉनवेज जोक्स एसएमएस करने लगे। रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी। एसएमएस में तो थोड़ा संकोच भी रहता है, क्योंकि उससे आपकी पहचान जुड़ी होती है, लेकिन इंटरनेट पर आप पहचान छुपाकर आसानी से सेक्सी चैट कर सकते हैं। यहां न कोई पहचान है न कोई बंधन, इसलिए बातें भी खुल्लमखुल्ला होती हैं। पर जरूरी नहीं कि वहां जो जवाब दिए जा रहे हैं वे सही ही हैं। कई बार तो लड़के -लड़की बनकर और लड़कियां लड़का बनकर चैट करती हैं। पर ये फैंटेसी की दुनिया है और इसका निर्मल आनंद लेने वाले इस चक्कर में नहीं पड़ते कि जिसे वे लड़की समझ के बात कर रहे हैं, वह भी उन्हीं की तरह कोई लड़का है। वैसे इस दुविधा से मुक्त करने की सुविधा भी बाजार ने उपलब्ध करा दी है। रसीली बातें, मजेदार बातें शीर्षक से टेलीफ्रेंडशिप के तमाम विज्ञापन छपते हैं, जिनमें दिए गए नंबर पर डायल करके आप अपना मन और जेब दोनों हलके कर सकते हैं।

अब जमाना विजुअल का है इसलिए सिर्फ आडियो से काम नहीं चल सकता, बाजार इस बात को अच्छी तरह जानता है। ब्लू फिल्मों का ट्रेंड तो काफी पहले से है। लेकिन ब्लू सीडी खरीदने के लिए आपको वीडियो पार्लर तक जाना होता था। इसमें भी संकोच होता था। संकोच सेक्स बाजार का सबसे बड़ा दुश्मन है, लिहाजा यह हर तरह का संकोच मिटा देना चाहता है। आपके छोटे से संकोच के खिलाफ अनगिनत पोर्न साइट्स हाजिर हैं। आप अपना कंप्यूटर ऑन कीजिए, सेक्सी-दुनिया आपका मनोरंजन करने को हाजिर है।

पर, जिस संस्कृति में पति-पत्नी अपने शयनकक्ष में भी दिया बुझाकर ही प्रेम करते थे, उसने क्या यूं ही सेक्स-बाजार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया? प्रतिरोध हुआ है पर बदलाव की लहर इतनी तेज थी कि तटबंध भी साथ में बह गए। ऊपर में जो मैने दादा जी वाला किस्सा बताया है, भारत में सेक्स-बूम की शुरूआत भी उसी दौर से होती है। जिस कपूर परिवार में लड़कियों को फिल्मों में काम करने की छूट नहीं थी, उसी की एक बेटी करिश्मा कपूर ने जब खुद्दार फिल्म में 'सेक्सी-सेक्सी मुझे लोग बोलें' गाया तो हड़कंप मच गया। गाने को बैन कर दिया गया तो इसे 'बेबी-बेबी मुझे लोग बोलें' करके रिलीज किया गया। हालांकि अभी भी सेक्सी-सेक्सी वाला वर्जन सुनने को मिलता रहता है। करिश्मा ने तो खुद को ही सेक्सी कहा था, लेकिन गो¨वदा तो उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर अपनी पैंट और शर्ट को भी सेक्सी बताने लगे। इसके बाद सेक्स की जो आंधी चली उसमें प्रतिरोध के दरख्त उखड़ गए। चौदह साल पहले 'सेक्सी' को 'बेबी' बनना पड़ा था, आज बेबी को सेक्सी बना दिया गया। अमिताभ बच्चन की फिल्म चीनी कम में सात-आठ साल की एक बच्ची स्वीनी खैरा का नाम 'सेक्सी' रखा गया है। सेक्सी होना अब एक खिताब है। हाल ही में बिपाशा बसु को एशिया की सबसे सेक्सी महिला और शाहरुख को सबसे सेक्सी पुरुष का दर्जा मिला तो इनके भाव बढ़ गए।

क्रमश:.....

और कितने `रामकृष्ण´ को निगल जाएंगे बापू के ये आश्रम

आसाराम बापू केआश्रम में एक के बाद एक कई बच्चों की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए है।

पहले अहमदाबाद आश्रम में दो बच्चों की मौत .... हिंसा... बवाल....

और अब छिन्दवाड़ा के आसाराम बापू आश्रम के स्कूल में दो बच्चों की मौत ....।

पहला बच्चा- रामकृष्ण यादव
दूसरा बच्चा- वेदांत मनमोधे अब
तीसरा बच्चा - विशाल ... गंभीर हालत में है
उसे इलाज़ के लिए नागपुर रिफर कर दिया गया है ...
वैसे देर शाम को अफवाह फैली थी कि उसकी भी मौत हो गई है ...

सवाल उठता है ...आखिर और कितने `रामकृष्ण´ को निगल जाएंगे बापू के ये आश्रम ...।

इस पर भी यह बात समझ से परे है कि आखिर मासूम बच्चों केमां-बाप क्यों कर स्कूल प्रबंधन को क्लीनçचट दे रहे हैं। पहले रामकृष्ण के पिता ने क्लीनचिट दी और अब ... वेदांत के पिता कृष्ण मनमोधे ने भी।

उन्होंने कहा कि वह वेदांत की मौत के लिए स्कूल प्रबंधन को जिमेदार नहीं मानते। और वह अपने बेटे का पोस्टमार्टम भी नहीं कराना चाहते। बच्चे की मां पूजा ने तो अंध भçक्त जाहिर करते हुए कहा कि अगर स्कूल प्रबंधन जांच में दोषी भी पाया गया तो भी वह उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगी। उनकी केजी में पढ़ रही छोटी बेटी इसी स्कूल में पढ़ती रहेगी। इससे भी बढ़कर वेदांत की मां पूजा ने कहा कि कोई बापू को बदनाम करने की साजिश रच रहा है।

माजरा क्या है समझ में नहीं।

एक तरफ तो अपने जिगर के टुकड़ों को खोते जा रहे हैं उस पर भी अंधश्रध्दा दिखाते हुए स्कूल प्रबंधन को क्लीनचिट दे रहे है।

छिन्दवाड़ा के लोगों को कहना है कि आश्रम के खिलाफ साजिश की बात बेईमानी है। जिन परिस्थितियों में दोनों बच्चों की मौत हुई उनमें किसी बाहरी व्यçक्त की हाथ हो ही नहीं सकता। और कोई बाहरी तत्व क्यों कर आश्रम या बापू को बदनाम करने की कोशिश करेगा।


RAMKRISHNA DONGRE
http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

हिन्दुओ तुम विवाद पैदा करते हो

बम-धमाके, मन्दिर-मुद्दा, अमरनाथ यात्रा जमीन विवाद, गोधरा काण्ड, गुजरात दंगे, श्रीराम जन्मभूमि विवाद, श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, विश्वनाथ मन्दिर विवाद, अक्षरधाम मन्दिर पर हमला..............क्या-क्या गिनाएं........कितना-कितना गिनाएं............कितनी-कितनी बार गिनाएं? चलिए गिनाते नहीं हैं बताते हैं, ये सब क्या हैं कुछ विवाद. इन विवादों के पीछे एक समानता है और वो है हिंदू होने की समानता. कुछ समझे आप? इन विवादों के पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदू जुडा है। अब कुछ समझ में आया? यानि कि हर विवाद के पीछे हिंदू रहता है. आख़िर हिन्दुओं को भी चैन नहीं है कि वे शान्ति से बैठ सकें। अरे कोई आकर उनके आराध्यों का अपमान करता है तो करने दो. क्या वे अराध्य आकर हिन्दुओं से कहते हैं कि फलां-फलां उनका अपमान कर गया? कोई आराध्य क्या हिन्दुओं को खाने को देता है, किसी को नौकरी देता है? नहीं न, फ़िर किस बात पर हिंदू अपने आराध्यों के लिए विवाद खड़ा कर देते हैं? कुछ नहीं ये हिन्दुओं के खुरापाती दिमाग की उपज है कि अपने आराध्यों का नाम लेकर विवाद खडा करदो और फ़िर मुसलामानों को, सरकार को कोसते रहो. चलो मान भी लिया कि आराध्यों से हिन्दुओं को कुछ लाभ भी होता है तो क्या देश की सुरक्षा से बड़ा, भाईचारे से बड़ा हो गया आराध्यों का मामला कि हिंदू उनकी थोड़ी सी बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सके? इतनी छोटी सी मानसिकता लेकर हिंदू कहते हैं कि वे सच्चे देशभक्त हैं? वह हिंदू! थोड़ा सा भी बर्दास्त नहीं कर सकते। देश के लिए तो लोग जाने क्या-क्या बर्दाश्त नहीं करते. वैसे देखा जाए तो हिदुओं ने सिवाय विवादों को जन्म देने के कुछ भी नहीं किया है। अरे मन्दिर (राम जन्मभूमि) का विवाद है, उसको हवा तो हिन्दू ही दे रहे हैं. तमाम सारे जागरूक नागरिक, नेता, धर्मनिरपेक्ष ताकतें बार-बार कह रहीं हैं कि विवादित भूमि पर हिंदू-मुस्लिम मिल कर कोई स्कूल, हॉस्पिटल या कोई समाज सेवा जैसा भवन बनवा दे. मुस्लिम तो तैयार है पर ये कट्टर हिंदू बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं हैं. हुई न विवाद की शुरुआत. अरे यदि मन्दिर न बन पाये कोई बात नहीं कुछ और बन जाने दो और अपनी सांस्कृतिक पहचान नष्ट हो जाने दो. वैसे भी हिन्दुओं की पहचान रह ही क्या गई है? यहाँ तुम अपनी पहचान, अपनी अस्मिता, अपने आराध्यों की जमीन पर कुछ भी बनवा लेने दो (सुलभ शौचालय ही सही) आख़िर भाईचारे का मामला है पर अपने बाप-दादाओं की गांवों-शहरों की एक-एक इंच जमीन पर सारी उमर मुकदमा लड़ते रहना, क्योंकि वो तुम्हारी संपत्ति है और ये भूमि विवादित है. विवाद हिन्दू पैदा कर रहा है, भाईचारा नहीं बना रहा है. ओ हिन्दुओ! जागो, तुम्हारे देश के लोग धर्म-निरपेक्ष हैं और तुम विवाद पैदा करते जा रहे हो। सोचो जब तुम बड़े ही प्रेम से किसी से कहते हो सलाम साहब तो कहा जाता है कि कितना आदर है और जब तुम्ही कह देते हो जे श्रीराम तो कहा जाता है कि तुम्हारे अन्दर साम्प्रदायिकता की बू आ रही है. अब तुम हिन्दुओ ख़ुद सोचो तुम्हारा राम साम्प्रदायिकता लाता है तो तुम कैसे शान्ति लाओगे? भूल जाओ अपना अस्तित्व और जुट जाओ जी-हुजूरी करने में क्योंकि इस देश में जहाँ हिन्दुओं को छोड़ किसी भी धर्म की बात करो तो वो उनके विकास की बात होती है, धर्म-निरपेक्षता की बात होती है पर हिन्दू की बात करना भी विवाद का विषय होता है, साम्प्रदायिकता फैलाने वाला होता है. साम्प्रदायिकता न फैलाओ, देश हित में, भाईचारे में, तुष्टिकरण में, आराध्यों की पूजा-अर्चना करने में, अपने धर्म-स्थानों की यात्रा करने में, हिन्दुओं के मरने पर दुःख प्रकट करने में, जे श्री राम बोलने में, विवादित देव-स्थानों को खाली करने की बात करने में, अपने धर्म के लिए कुछ भी करने में यदि जूते भी खाने पड़ें तो खाओ क्योंकि तुम हिन्दुओ सिवाय विवाद पैदा करने के कुछ भी नहीं करते.

1.8.08

patna: govindacharyan ki rah par harendra pratap

bihar bhajapa ke varishat neta aur asam ke prabhari harendra partap urf bhajapai baba govindacharya ke raste par chal rahen hain. yah arop hai unke hi karibi rahe ek MLC ka. MLC ka manana hai ki jab vajapeyi ji satta me the to govindacharya ji pratipaksha ki bhumika me the. swadeshi jagaran manch mediavalon ke liye pasandida vishaya tha. lekin NDA ke satta se jate hi govindahcharya bhi kahin kho gaye. swadeshi jagaran manch bhi kahi kho gaya.
usi raste par RSS ke pracharak rahe harendra pratap bhi ja rahe hain. mediavale bhi unhen uchhal rahen hain. lagata hai asali pratipaksha ki bhumika me harendra pratap hi hain.
sutron ki mane to jab BJP vipaksha me thi aur college shikshakon ki hadatal karib 4 mahine chali thi tab harendra pratap ne koi andolan shuru nahi kiya tha. jabaki we BJP ke pradesh mahamantri the. aur ab jabaki bhajapa satta me hai to harendra pratap vipaksha ki bhumika me hain. dusare shabdon me kahen ki we ab asantuston ke sarvamaya neta ban gaye hain.
mana ja raha hai ki mediavale harendra pratap ko parti se nikalvane ke bad hi chain ki sansh lenge. media me jis tarah se unhen uchhala hai aur HP utsahit hain, uski parinati govindacharya ki gati me hi ho sakati hai.

पत्रकार की ह्त्या

आज वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक भाष्कर रीवा के ब्यूरो चीफ श्री दीपक मिश्रा कि ह्त्या कर दी गयी, ह्त्या का खुलासा रीवा के भडासी मित्र करेंगे. दीपक जी के इस आसमयिक निधन पर भडास परिवार शोक संतप्त है और मिश्रा जी के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनके इस दुखद पल में साथ है.

संग ही प्रशाशन से इस ह्त्या कि जांच और तत्काल आपराधियों के गिरफ्तारी कि माग करता है और इस निंदनीय कृत की तीव्र भ्रत्सना करता है.

भड़ास: वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार गौतम के दुख को महसूस करिए

भड़ास: वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार गौतम के दुख को महसूस करिए

बारिश में पतंग मत उड़ाओ सोमकुंवर (संदर्भ: पत्रकार जुबैर कुरैशी पर बेबुनियाद आरोप)

अवधेश बजाज
त्वरित टिप्पणी

सच कहते हैं तो बुरा मानते हैं लोग
और रो-रो कहने की आदत नहीं हमारी
इस अशआर से प्रेरित होकर राज एक्सप्रेस के अपराध संवाददाता ने राज एक्सप्रेस में गुरुवार को एक खबर लिखी। खबर का शीर्षक था ‘अधीक्षक के सामने आईएसओ जेल में कैदियों से क्रूरता’। इस खबर से भोपाल के जेल अधीक्षक पीडी सोमकुंवर इतने बौखलाए कि उन्होंने जुबैर कुरैशी पर प्रतिबंधित संगठन सिमी से ताल्लुकात का आरोप मढ़ दिया। इस तारतम्य में सोमकुंवर ने राज एक्सप्रेस के मैनेजमेंट को एक पत्र भी लिखा है।

दरअसल इसमें सोमकुंवर की गलती नहीं है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था के अर्थतंत्र की गलती है। सत्ता के साकेत में बैठे दल्ले ऐसे सोमकुंवर पैदा करते हैं, जिनकी प्रेस वालों पर उंगली उठाने की हिम्मत होती है। सत्ताई अर्थतंत्र के आंगन की सदा सुहागन सोमकुंवर क्या है, उनका चरित्र और उनकी आर्थिक सेहत किसी से छुपी नहीं है। उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके स्थानांतरण को रूकवाने के लिए दो सांसद, पांच मंत्री और भाजपा के दो राष्ट्रीय महामंत्रियों ने लाबिंग की थी। इसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूं। सोमकुंवर सत्ताई दल्लों के संरक्षण में गदरा रहे हैं। वे राजनीतिज्ञों को खरीद सकते हैं, लेकिन मीडियाकर्मियों को नहीं।

जुबेर कुरैशी मुस्लिम है। लिहाजा उस पर सिमी से संबंध का आरोप लगाने का उपक्रम सोमकुंवर जैसे मानसहीन लोग ही कर सकते हैं। सवाल यह उठता है कि हमारी तंत्र व्यवस्था में सोमकुंवरों का जन्म कैसे होता है, एक ही पद पर ये नौ-नौ साल कैसे जमे रहते हैं? दरअसल ये हमारी अफसरशाही के नव सामंत हैं, जो राजनीतिज्ञों के संरक्षण में बेलगाम हो रहे हैं। मीडियाकर्मियों को एकजुटता के साथ ऐसे बेलगाम मानसहीन सोमकुंवर को करारा जवाब देना चाहिए। आज एक जुबैर कुरैशी के खिलाफ एक अफसर बेबुनियाद, मिथ्या आरोप लगा रहा है। कल आपकी बारी आ सकती है।
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(लेखक अवधेश बजाज मध्य प्रदेश केंद्रित लोकप्रिय मीडिया पोर्टल बिच्छू डाट काम के प्रधान संपादक होने के साथ-साथ प्रदेश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार हैं)

भड़ासी भाई मनोज पमार, डॉ. रूपेश श्रीवास्तव, कृपाशंकर, रजनीश झा का आभार


नगर निगमों की माया निराली॥शीषर्क में की थी मैंने जुगाली। उसमें आपने प्रतिक्रिया डाली, जो करती खालिस घरवाली। अब मैं भड़ासी बनके रहूंगा, सबके बीच में तनके रहूंगा। आप भड़ास के बड़े खिलाड़ी, मैं हूं बालक निरा अनाड़ी। तुम मुझे सराहो, मैं तुम्हें सराहूं, चाहे जितना बेसुरा गाऊं। संग कमेंट निज E- मेल भेजना,फिर भड़ास का तेल देखना।

डॉ. भानु प्रताप सिंह, आगरा।

31.7.08

जय भोले और ये दे मारा

किस पुराण में लिखा है की किसी को सताकर भी आप भक्ति कर सकते हैं. सिर्फ़ हरिद्वार जाने से ही वहां का गंगाजल पैदल चलकर लाने से ही भगवान् खुश नही हो जाते. अभी मैंने कंवाद के मेले में जो देखा उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ जो आप सुनकर दंग रह जायेंगे. मैं अपने घर वापस जा रहा था आश्रम के पास से डाक कांवड़ वाले जा रहे थे एक आदमी गंगाजल लेकर दौड़ रहा था और एक मिनी ट्रक में १५ के लगभग लोग भगवे रंग के ड्रेस में बैठे हुए थे. इस ट्रक के आगे ६ लोग मोटर साइकिल पर सवार थे जिनके हाथ में मज़बूत हान्कियाँ थीं. ये लोग रास्ता खाली करवाने का काम कर रहे थे. मैंने अपनी आंखों से देखा की जय भोले के नाम का नारा लगते ये लोग रास्ता खाली करवाने के लिए तीन चार गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए. एक बार मेरा मन हुआ की लावो मैं इन्हे भोले की महिमा बता दूँ पर चुप रहा क्यूँकी ये आस्था का सवाल था. अब हमारे देश में आडम्बर के नाम पर इस तरह से अपने ही लोगों के लिए मुसीबतें खादी कर रहे हैं जो किस हद तक जायज़ है ये सोचने वाली बात है. अब जी गाड़ियों के शीशे टूटे थे वो कहीं इसकी शिकायत भी नही कर सकते क्यूंकि ये आस्था का सवाल था. अब आप ही सोचिये क्या ऐसे दोषियों को सज़ा देने का प्रावधान हमें नही बनाना चाहिए. पता नही क्यूँ जब इस तरह के भोले बने लोगों को मैं देखता हूँ ज़ल भुन जाता हूँ. अरे भइया किसी के लिए कुछ न कर सको तो कम से कम उनका बुरा तो मत करो. भोले सबकी रक्षा के लिए जाने जाते हैं सिर्फ़ आग लगाने के लिए और दंगा फैलाने के लिए नही. अमित द्विवेदी

नफरत की आग......

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 28 और 29 जुलाई को संपन्न हुई सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं की वार्षिक बैठक में केन्द्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली के संबंध में अनेक प्रकार की चिंताएं सामने आईं। देशभर के 21 राज्यों के करीब 150 आरटीआई कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने राज्यों के सूचना आयोग की कार्यप्रणाली का जिक्र किया और उन्हें सुधारने के लिए सुझाव दिए। पूरी बैठक में बहस का मुद्दा यह रहा कि क्या आयोग को सुधारने के लिए सीधी कारवाई का वक्त आ गया है? अरविंद केजरीवाल ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि केन्द्रीय सूचना आयोग के खिलाफ सीधी कारवाई करने का वक्त आ गया क्योंकि आयोग को सुधारने के हमारे सभी प्रयास विफल हुए हैं। उन्होंने बताया कि सूचना आयुक्त पदमा बालासुब्रमण्यन ने अब तक किसी भी दोषी लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगाया है। शैलेश गांधी सहित कुछ कार्यकर्ताओं ने सीधी कारवाई से पहले आयोग को सुधारने के अन्य उपायों पर जोर दिया।अनेक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाए कि सूचना आयोग ही सूचना के अधिकार के सफल कार्यान्वयन में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं क्योंकि सूचना आयुक्त की आवेदकों की बजाय प्रशासन और सरकार से सहानुभूति है। छत्तीसगढ़ से आए कार्यकर्ताओं ने आयोग द्वारा लोक सूचना अधिकारी से रिश्वत लेने की बात कह आयोग को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने बताया कि राज्य में आयोग पर राजनैतिक दबाब बहुत अधिक है और वहां प्रथम अपीलीय अधिकारी लगभग नििष्क्रय हो चके हैं। सूचना आयोग की कार्यप्रणाली के संदर्भ में अनेक राज्यों की तरफ से जो आंकड़े उपलब्ध कराए गए वह भी काफी चौंकाने वाले थे और आयोग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे। मध्य प्रदेश के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने बताया कि मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने तीन सालों में मात्र 4 लोगों को दंडित किया है जिनमें 3 दंड उच्च न्यायालय के दखल के बाद हुए हैं। यह आंकडे मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग कार्यप्रणाली बताने के लिए पर्याप्त हैं।केरल से आए एक कार्यकर्ता ने बताया कि केरल सूचना आयोग प्रति माह मात्र 10 मामलों का निपटारा करता है और वहां सेक्शन 4 की कोई व्यवस्था नहीं है। ध्यान देने की बात है कि केरल में यह स्थिति 7 सूचना आयुक्तों के होने के बाद है।बैठक में यह भी महसूस किया गया कि देश की जनता को इस कानून के प्रति जागरूक बनाने की जरूरत है ताकि इस मुद्दे पर जन समर्थन प्राप्त हो सके। साथ ही विभिन्न राज्यों के सूचना आयोग में बढ़ते लंबित मामलों पर भी चिंता व्यक्त की गई। लोगों ने एकमत में यह स्वीकार किया कि आयोग में मामलों का निपटारा अतिशीध्र होना चाहिए और सूचना देने में देरी करने वाले लोक सूचना अधिकारियों का जुर्माना लगना चाहिए ताकि लोगों का इस कानून में भरोसा बना रहे। अरविंद केजरीवाल ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वह अगले एक साल में अपने-अपने आयोग को सुधारने में ध्यान केिन्द्रत करें।सभी कार्यकर्ताओं ने एकतम से माना कि देशभर में आरटीआई बचाओ नाम के अभियान की जरूरत है। इस अभियान को सफल बनाने और आयोेग को उत्तरदायी बनाने के लिए कार्यकर्ताओं ने अनेक सुझाव दिए जो निम्नलिखित हैं-

1 अयोग्य सूचना आयुक्तों पर जुर्माना लगना चाहिए

2 आरटीआई को विषय के रूप में छात्रों का पढ़ाया जाना चाहिए

3 सूचनाएं ऑनलाइन हों

4 आरटीआई कार्यकर्ताओं का राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क तैयार हो

5 हस्ताक्षर और एसएमएस अभियान शुरू हो

6 प्रत्येक राज्य में आयोग की कार्यप्रणाली के बारे में अधिक से अधिक चिटि्ठयां राष्ट्रपति को भेजी जाए। पूरे देश में आयोग के गलत निर्णयों के खिलाफ जन सुनवाईयां हों

7 नींद उडाओ अभियान के जरिए लगातार फोन करके आयुक्तों को तंग किया जाए

8 केन्द्रीय समन्वय समिति गठित हो

9 आरटीआई विषय का राजनीतिकरण हो

10 इंगित करो अभियान शुरू हो जिसमें गलत निर्णय देने वाले सूचना आयुक्त को उंगली दिखाई जाए

11 देश के हर जिले में आरटीआई पर कार्यशालाएं और अभियान शुरू हों

12 हर राज्य के राज्यपाल को ज्ञापन भेजा जाए

13 गलत निर्णय देने वाले आयुक्तों को हटाने और अच्छे आयुक्तों को नियुक्त करने का दबाव बनाया जाए

14 घूस को घूंसा अभियान फिर से शुरू हो

15 आयोग के गलत निर्णयों के विरूद्ध ब्लैक फलैग मार्च हो

16 चुनाव घोषणा पत्रों में राजनीतिक दलों को आरटीआई शामिल करने को मजबूर करना चाहिए

17 आरटीआई ग्रीटिंग कार्ड बनें और इन्हें सभी राज्य और केन्द्रीय सूचना आयोग में भेजा जाए

18 राहुल गांधी को वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाए

19 आवेदन का शुल्क जमा करने में लचीलापन हो

20 अपीलीय अधिकारी कानून के जानकार हों

21 देश भर में सेक्शन 4 के सम्पूर्ण क्रियान्वयन पर प्रदर्शन हों

22 मीडिया से संबंधित नेशनल बैकअप सपोर्ट विकसित हो

23 हर्जाने की मांग की जानी चाहिए

24 न्यायाधिकरण में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया जाए और जन समर्थन तैयार किया जाए


अपना पन्ना की ओर से

REMEMBERING RAFI

A TRIBUTE TO THE VELVET VOICE
(On his 28th death anniversary i.e. 31st July)

BY SHRI RAM SHAW
Mohammed Rafi was the greatest ever playback singer of
India. He was uniquely and singularly responsible for the
very existence of the finest artistic grandeur, splendor and
original creativity that embodied the Golden Era of music
and melodies of Hindi Cinema. He had such fascinatingly
wide musical range, supreme artistic caliber, versatility
and mastery over music and melodies. Such was his
voice clarity, pleasantness of pitch and exquisite tone that
he was unsurpassable and unparalleled.He has the distinction of being the first playback singer of
all times to be featured in the pioneering list of the
Guinness Book of World Records, for having sung the
highest number of songs, which is a total of 26000 songs,
in Hindi and other languages.Mohammed Rafi created a unique musical artistic identity
and niche for each music composer whose compositions,
he sang. His voice conveyed every intricate human
emotion with such subtle care, artistic dexterity, exquisite
pleasantness and unique artistic creativity that it
influenced and over-powered the hearts and souls of
millions of music lovers all over the world. He had
infused life into the poetry written by legendry poets, song
writers with the power of his supreme capabilities as a
musical genius and marvelous singer.In 1948, on the fateful day when the father of the Indian
nation, Mahatma Gandhi was no more, famous poet:
Rajendra Krishan wrote: “Bapu ki Amar kahani”. It was
sung by Mohammed Rafi on the very same day on All
India Radio. It was so mesmerizing to hear the poetic-
biography of Mahatma Gandhi, in the melodious voice of
Mohammed Rafi that the millions of the listeners of All
India Radio were all moved to tears with sorrow and
poignancy. It was a great achievement because before
that no singer had ever attempted to sing songs which
had more than 2 stanzas but to sing a whole poetic-
biography seemed impossible at that time however for
Mohammed Rafi it was natural and many a time he has
sung the most difficult and long compositions with
absolute panache and marvelous elegance.Mohammed Rafi was like an angel. He was very soft
spoken, seldom angry, very humble. He was very pious
person. Rafi sahab's wife's name was Bilquis and they
had three sons and four daughters. He believed in the
concept of simple living and high thinking. During his
lifetime Mohammed Rafi had donated immeasurable
money in charity, noble causes and for our country. He
was a true patriot of India and he believed in our
country's secular values and our rich culture, tradition and
heritage. The boundaries of religion, caste, creed,
richness, poverty, economic class, language and politics
were beyond the legendry stature of Mohammed Rafi and
he was above all these boundaries. Numerous instances
are there when he bought expensive imported Dialysis
equipment to our country to assist charity hospitals that
serve ailing kidney patients of our nation.Rafi sahab was an ideal man with loft ideals and
esteemed values for which he was ready to face
anything. This was the same reason that he declared that
he will not take royalty for any of the songs that he had
sung. A view-point that resulted in a grave clash of
principles with another legend Lata Mangeshkar, who had
a major debate over the issue of royalties in 1960. Rafi
believed that once a recording was over and a singer has
been paid, he or she should not ask for more. Lata, on
the other hand said that singers should be paid royalties
for their works, over and above the amount given for the
singing. For, three years Mohammed Rafi and Lata
Mangeshker did not sing duets or speak with each other.
It was the most dignified silence over clash of principles.
They refused to sing songs together. At the insistence of
Nargis they finally made up at a stage concert and sang
Dil Pukare from the film Jewel thief, composed by S D
Burman. Many new music directors would come to Rafi sahab and request him that if he sang for their
compositions then they would get chance in films.
Mohammed Rafi sahab would not only sang for them but
also when the producer used to pay renumeration for the
songs, Rafi sahib would gift it to these new music
directors. That was the encouragement that Rafi sahab
had for new talent. He would recommend names of his
contemporary singers without an iota of jealousy. Thus,
making Rafi sahab the most loved respected and
cherished human being of all time. Till the day he lived,
he ruled like a king and after passing away from this
mortal world also Mohammed Rafi's voice and his
melodies continues to reign the music world.
End of matter

Yours
Shri राम Shaw
9818632282