((पिछले दिनों हरिद्वार यात्रा पर था तो कई पोस्टों के जरिए कई कई अनुभवों, मिलाकातों, भ्रमण आदि के बारे में बताया था। पर एक चीज छूट गई थी जो शायद सबसे कोमल चीज है। हरिद्वार के बसे और देश भर में मशहूर गीतकार रमेश रमन से मुलाकात। डा. अजीत तोमर के सौजन्य से जब रमेश रमन जी से मिलने उनके आफिस पहुंचे तो उस वक्त आफिस बंद होने का समय हो चला था। ढलती हुई शाम के वक्त रमन जी के आफिस में हो शुरुवाती परिचय होने के बाद जो स्वर लहरियां फूटीं तो रुकने थमने का नाम ही नहीं लेतीं। मुझसे रहा नहीं गया, कागज कलम उठाकर तुरंत नोट करने लगा। शब्द जितने अच्छे, स्वर उतना ही उत्तम। ये संयोग, ये मेल बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। अगर संक्षेप में कहूं कि मेरी हरिद्वार यात्रा का सबसे कोमल पक्ष व सबसे संवेदनशील पक्ष कोई रहा है तो वो रमेश रमन जी से मुलाकात ही है। देर से ही सही, मैं रमन जी द्वारा लिखित कई गीतों, कविताओं को यहां नीचे भड़ासियों के लिए डाल रहा हूं। मैं तो इन सभी को उनके कोमल कंठ से मय राग के सुन आया हूं इसलिए मैं तो इन लाइनों के पिछे छिपे धुन व संगीत को भी महसूस कर पा रहा हूं व बैठे बैठे गुनगुना भी रहा हूं। आप लोग फिलहाल पढ़िए, कभी मौका मिला तो भड़ास सम्मेलन के दौरान रमन जी को बुलाया जाएगा...जय भड़ास, यशवंत))
----------------
1.
तू अगर पुरवाई है तो
तू अगर पुरवाई है तो बादलों के साथ आ
प्यास धरती की बुझा, ये पेड़ पौधे मत हिला
खेत की क्यारी है सूखी, आ जरा यहां घूम जा
भीगे भीगे होठों से तू, क्यारी क्यारी चूम जा
झरनों को दो जिंदगी, कुछ नदी का कर भला
तू अगर पुरवाई है तो...............
धूल धरती की उड़ा मत, देख फूलों को सता मत
दर्द सोये तू जगा मत, प्यास को पागल बना मत
गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला
तू अगर पुरवाई है तो...............
प्यास की तू अंजुली भर, कुछ दान कर कुछ पुण्य कर
आके पेड़ों को नहला जा, कर कृपा इन फूलों पर
परियों की तरह उतरकर, परिंदों को झुला झूला
दू अगर पुरवाई है तो................
-------------
2.
बिन आहट के आ जाते हो
बिन आहट के आ जाते हो
आंखों को नहला जाते हो
बहुत सताते हो पलकों को
सांसों को उलझा जाते हो
बिन आहट के......
सागर के पानी से खारे
कैसे कह दें तुम हो हमारे
कितने राज छुपा जाते हो
अंदर कुछ पिघला जाते हो
बिन आहट के .....
तुम ममता की गोद पले हो
तुम यादों के बहुत सगे हो
कितने दर्द जगा जाते हो
दिल को बहुत दुखा जाते हो
बिन आहट के ......
---------------------
3.
आम कट गया
आम कट गया
शीशम ने तो देखकर
आंखें फेर लीं
पीपल ने पूजा का
बहाना बनाकर
मौन धारण किया
बरगद को अपने बुढ़ापे
का खयाल आया
कुछ नहीं बोला
और......
आम कट गया
---------------
4.
अस्तित्व की कविता सुनें
आओ कभी किसी वृक्ष से अस्तित्व की कविता सुनें
या फिर कभी किसी फूल से व्यक्तित्व की कविता सुनें
जीना का दर्शन सरल मिल जायेगा निश्चित है ये
आओ कभी किसी दीप से अपनत्व की कविता सुनें
----------------
5.
तुम्हारा मेरा साथ
तुम्हारे पास अर्थ बहुत है
मेरे पास शब्द बहुत हैं
आओ, थोड़ी दूर तक चलें
शब्दार्थ बनकर
जीवन के भावार्थ से मिलने
विश्वास रखना
तु्म्हारे अर्थ का अनर्थ नहीं होने दूंगा
तुम्हें भी ध्यान रखना होगा
कि मेरा कोई भी शब्द
अपशब्द की संज्ञा न पा जाए
--------------
उपरोक्त सभी गीत व कविताएं गीतकार रमेश रमन द्वारा रचित हैं। आप रमन जी से उनके निवास के फोन 01334-220749 और कार्यालय के फोन 01334-227904 पर फोन कर संपर्क कर सकते हैं।
4.3.08
गीतकार रमेश रमनः गेंद सूरज को बनाकर खेल मेघों को खिला.....
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
Labels: गीत, डा. अजीत तोमर, मुलाकात, रमेश रमन, संस्मरण, हरिद्वार
भड़ासी बनने को छह अनुरोध, बिल्लोरे फिर चाहते हैं भड़ासी बनना, भई क्यों बनाएं?
-अजमेर से शकीर रहमान भाई ने अपने मोबाइल नंबर के साथ एक मेल भेजकर भड़ास की मेंबरशिप के लिए अनुरोध किया है। शकीर भाई, आपको न्योता भेज दिया है। मेंबर बनते ही एक पोस्ट लिखकर अपने बारे में, अपने शहर के बारे में और अपने करियर व जीवन के बारे में थोड़ा हम भड़ासियों को भी बताइएगा ताकि आपसे जान पहचान बढ़ सके।
-शार्दूल विक्रम जी, आपने भड़ास की मेंबरशिप के लिए मेल भेजकर अनुरोध किया है, साथ में मोबाइल नंबर भी दिया है, शुक्रिया। आपको मैंने निमंत्रण भेज दिया है। मेंबर बनते ही पहली पोस्ट प्रकाशित कर भड़ासियों को अपने आगमन की खबर दे दीजिएगा।
-अपने वरिष्ठ भड़ासी साथी अंकित माथुर के सौजन्य से सहारनपुर के खालिद और बनारस के गौरव मिश्रा ने भड़ासी बनने के लिए अनुरोध किया है। अंकित भाई, दोनों ही साथियों को मैंने उनकी मेल आईडी पर न्योता भेज दिया है। उम्मीद करते हैं कि वो भी भड़ासी बनकर भड़ास पर धमाल मचाएंगे। दोनों साथियों का एडवांस में स्वागत कर देता हूं।
-शेफाली, आपके अनुरोध पर आपको भी भड़ास का मेंबर बनने के लिए न्योता भेज दिया गया है। हालांकि हम भड़ासी थोड़े बेवकूफ, बुरे व भदेस किस्म के लोग हैं, बावजूद इसके आपको लगता है कि आप इन लंठों के साथ मजे में रह सकेंगी तो आपका स्वागत है।
-गिरीश बिल्लोरे जी अपने पुराने व सक्रिय भड़ासी साथी रहे हैं लेकिन पिछले दिनों जब कुछ लोगों ने भड़ास की भाषा व अश्लीलता आदि को लेकर चूतियापे का बवाल मचाया तो उसी दौरान बिल्लोरे साहब भी चुपके से भड़ास से कट लिए। एक दो और साथी भी कट लिए। ऐसे साथियों के बारे में मेरी बड़ी साफ राय है कि कमजोर दिल वाले और मौका देकर पलटी मारने वालों के लिए भड़ास में कोई जगह नहीं है। बिल्लोरे जी के हर कदम पर भड़ास खड़ा रहा पर जाने किस बात पर वो चुपके से भड़ास से कट लिए। बिल्लोरे जी ने जो मेल भेजा है उसमें वजह बताया है रमेश मिश्रा की पोस्ट को। तो भइये, रमेश मिश्रा की पोस्ट से आपको दिक्कत थी तो मुझे फोन करते, एतराज जताते....। ये क्या कि चुपचाप खुद की मेंबरशिप डिलीट कर दी। आप अब अगर दुबारा भड़ासी बनना चाहते हैं तो कृपया स्पष्टीकरण दें कि....
नंबर एक- आपने देखा कि भड़ास के खिलाफ माहौल बन रहा है तो चुपके से कट लिए, क्या ये अवसरवादिता नहीं है कि जिस भड़ास ने आपकी लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया, आपके ब्लाग को प्रमोट किया, आपने भड़ास का अपने ब्लाग के लिए बखूबी इस्तेमाल किया और हम लोगों ने होने दिया....और उसी भड़ास के सामने जब कुछ चूतियों ने संकट खड़ा किया तो आप निकल लिए पतली गली से? हमें लगता है कि ये घोर अवसरवादिता है, आपका क्या कहना है?
नंबर दो- अगर किसी रमेश मिश्रा की किसी पोस्ट से आपको दिक्कत थी तो आपको मुझे तुरंत फोन कर मिश्रा की पोस्ट हटवाने का अनुरोध करना चाहिए था और ये हक हर एक भड़ासी को है। आपने ऐसा करने के बजाय भड़ास की सदस्यता ही डिलीट कर दी। मुझे तो लगता है कि रमेश मिश्रा का मामला एक बहाना है, आप असल में दिल से कमजोर आदमी हैं, ये मेरा आरोप है? हो सकता है मैं गलत हूं, आप स्पष्टीकरण दें।
नंबर तीन- अब जबकि सीधे सदस्यता लेने की परंपरा खत्म कर दी गई है तो आपने अनुरोध किया है कि आपको फिर से भड़ासी बना लिया जाए। मेरा मानना है कि जब आपने अपना रंग दिखा ही दिया है तो आपको फिर क्यों भड़ास का सदस्य बनाया जाए? भड़ास दरअसल उन साथियों और दोस्तों के लिए है जो मुश्किल घड़ी में भी साथ रहते हैं और साथ लड़ते मरते हैं न कि सुख के साथी बने रहिए और दुख में पोलो ले लीजिए।
हो सकता है मैं गलत होउं लेकिन यह तभी स्पष्ट हो पाएगा जब आप अपनी स्थिति स्पष्ट कर देंगे। उम्मीद है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे और मेरे बातों को मेरी भड़ास समझकर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे।
जय भड़ास
3.3.08
विवाद के अंत के बादः कुछ झलकियां
-जिन दिनों भड़ास पर पाबंदी लगाने की कुछ साथियों ने साजिश रची थी और भड़ास ने उनको करारा जवाब देना शुरू किया, तो उन दिनों विवाद के केंद्र में रहे भड़ास और एक अन्य ब्लाग की टीआरपी कुछ इस कदर बढ़ी कि एडसेन्स खाते में डालरों की बरसात हो गई। ये बरसात आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा था। ये मैं भड़ास के माडरेटर के बतौर निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं क्योंकि उन दिनों पेज इंप्रेसन जबर्दस्त रूप से बढ़ चुका था। यही हाल उस दूसरे ब्लाग का भी था। मेरे लिए यह पहला अनुभव था कि विवाद होने से दाम ज्यादा मिलते हैं। इसी के चलते कुछ लोगों ने लिखा भी कि विवाद पैदा कराकर टीआरपी हासिल करने के साथ ही कमाई करने का यह फार्मूला है। उनकी बात कतई गलत नहीं है। इसलिए ये जान लीजिए कि कुछ कुख्यात ब्लागर जो लगातार विवाद पैदा करते रहते हैं उसके केंद्र में सिर्फ और सिर्फ कमाई करना होता है, इसीलिए अपने को गरियाकर या दूसरे को बेइज्जत कर, विवाद करिये और डालर कमाइए। भड़ास को यह ज्ञान इस जबरन दिलाए गए अनुभव के बाद पहली बार हुआ है। ईश्वर न करें, दाम के लिए हमें यह नीच हरकत करने की आदत लगे। हम तो खुद को जिंदा रखने के लिए पैना लेकर मैदान में उतर आते हैं ताकि दुश्मन के हाथों हलाल होने की बजाय लड़ते हुए बहादुरों की तरह मरें या फिर जिंदा बच गए तो जश्न मनाएं। इस बार तो जश्न वाले ही हालात हैं।
-विवाद खत्म करने के ऐलान के बाद भी कई ब्लागरों को लगातार उल्टियां हो रही हैं। ये उल्टियां स्वाभाविक उल्टियां नहीं हैं बल्कि उल्टी करने वालों को लाइव देख कर आ रही उबकाई के चलते हो रही उल्टियां हैं। सो, कुछ महिला ब्लागर व कुछ पुरुष ब्लागर लगातार भड़ास निकाल रहे हैं, अपने अपने ब्लागों पे, विवाद खत्म होने के बाद भी। उम्मीद है कि उनका बलगम वगैरह साफ हो जाएगा। कुछ लोग जो कुतर्क रूपी पुरानी रणनीति के जरिए अपने को साफ फाक होने करने की बात कह रहे हैं, तो इसके चलते उनका असली चेहरा और सामने आ जा रहा है, इससे सभी लोगों को यह समझने में सुविधा रहेगी कि आखिर रंगा सियार कौन है, और हालात बदलते ही किस तरह की भाषा बोलने लगा है।
-कुछ लोगों से फोन कर मैंने उनसे अपना गुनाह जानना चाहा तो उन लोगों ने वो वो कारण बताए जिसे सुनकर मैं दंग रह गया। मसलन, तुमने कई महीनों से तेल नहीं लगाया, फोन नहीं किया, हाल खबर नहीं ली...आदि आदि। अरे भइया, पहले इशारा कर दिये होते कि अगर गुट से दूर रहने का यह नतीजा होता है कि आप गला ही दबा दोगे तो सच्ची कह रहा हूं कि जरूर दुवा पल्लगी लगातार कर रहा होता। असली वजह पूछने पर बोले कि फोन पर नहीं मिलने पर बताएंगे। तो भइये, वैसे तो मिल लेता, लेकिन अब इस तरह के कुकृत्य करने के बाद मिलने में अपन का कोई इंटरेस्ट नहीं है। न तो तुम मेरे यहां राशन पहुंचा रहे हो और न मैं तुम्हारे लिए कुछ भला करने की सोच रहा हूं। मैं तो यही कहूंगा कि साजिशें रचना जारी रखो, कभी तुम जैसे शेरों को भड़ास जैसा सवा शेर भी मिलेगा तो अपने आप औकात पता चल जाएगी।
-भड़ासियों को इस विवाद से लाभ ही लाभ मिला है। एक तो कथित दोस्तों के चेहरे में छिपे दुश्मनों और दोस्ती के लबादे में छिपे अवसरवादियों की शिनाख्त हो गई है, साथ ही भड़ास का अपना खुद का घर भी सुधारने का मौका मिल गया है। सो, हम तो यही कहेंगे कि अगर ऐसी बलाएं लगातार आती रहें तो शायद भड़ास वाकई बिलकुल फिट दुरुस्त होकर एक स्मार्ट ब्वाय की तरह हो जाएगा। वैसे तो बाकी दिनों में जब कोई टोकता रोकता नहीं है तो भड़ासी बिलकुल अराजक होकर अल्ल बल्ल सल्ल करने लगते हैं, और मैं भी टुकुर टुकुर देखते हुए इन्हें नादान मानकर माफ करता रहता हूं। सो प्यारे भड़ासियों, क्या यह जरूरी है कि हम लोगों को रास्ते पर लाने के लिए कोई भाई लोग पैना लेकर गांड़ खोदें, तभी चेतेंगे। यार, इससे अच्छा तो है कि हम खुद ही सुधर जाएं और ये जो साले लगातार आरोप लगा रहे हैं कि हम लोग चूतिये टाइप लोग हैं तो इस लांछन को हटा देना ही अच्छा है। बोले तो भड़ास धीरे धीरे निकालो, उल्टियां रुक रुक कर करो ताकि इन लोगों को हम लोगों की लगातार होती उल्टियां देखकर उबकाई न आए और ये खुद उल्टी न करने लगे। वैसे, अगर सुधरने का मूड नहीं है तो कोई बात नहीं क्योंकि मैं खुद ही आज तक नहीं सुधरा तो दूसरों को क्यों सुधरने का उपदेश दूं।
-इस विवाद के बाद मैंने खुद तीसरी कसम खा ली है। किसी भोसड़ी वाले पर कभी भरोसा न करो। जो करना है अपने दम और बल पर करो। जो अच्छे और अपने माने जाते हैं, वो मौका आने पर सबसे पहले दुश्मनी कर लेते हैं, और जो अजनबी व बुरे लोग कहे जाते हैं, वही मुश्किल में काम आते हैं। अच्छे लोग तो केवल मीठी मीठी बातें करते हैं और मौका मिलने पर गांड़ काटने के लिए तैयार रहते हैं। और ये दिल्ली नगरी की दास्तान है जहां रहने वाला कोई भी शख्स कुछ ही दिनों में संवेदनहीन होकर सोकाल्ड प्रोफेशनल हो जाता है और लगता है आत्मकेंद्रित व अवसरवादी तरीके से सोचने। तो ऐसे में अगर इन अवसरवादियों के झांसे में आकर इन्हें दोस्त वोस्त मान लिया तो फिर समझो को हम दिल वालों को हो गया बेड़ा गर्क। तो भइये, अपनी कश्ती खुद खेवो, किसी को साथी मानकर चप्पू उसके हाथ में न थमा देना वरना वो तुम्हारी ही नैया डुबो देगा और खुद तैराकी के लंबे अनुभवों का इस्तेमाल कर पार निकल लेगा।
-जो लोग विवाद इसलिए करते हैं कि उन्हें विवाद से फायदा होता है तो उन्हें इस बार समझ में आ गया होगा कि दूसरों के घर में आग लगाने वालों के घर भी कभी कभी जल जाया करते हैं और उस भगदड़ में उनके अपने भी साथ छोड़ जाते हैं। या यूं कहें कि जो लोग अपना मानकर उस घर में रह रहे होते हैं उन्हें उसी दौरान पता चलता कि वो तो दरअसल जिस आग बुझाने वाले के घर में रह रहे थो वो दरअसल किसी दंगाई का घर था, और इतना पता चलते ही बोरिया बिस्तर उठा कर भाग रे भाग रे कहते हुए भाग लेते हैं।
-और जब विवाद हो रहा होता है तो कुछ लोग इसलिए सक्रिय हो जाते हैं कि उन्हें विवाद में इधर और उधर लगाने बुझाने में मजा आता है और इसी दौरान वे अपनी भी मार्केटिंग करने में लगे रहते हैं। तो ऐसे मिडिलमैनों ने इस बार भी खूब बहती गंगा में हाथ धोया और वो भी गंदा ये भी गंदा कहकर खुद को सबसे बड़ा अच्छा साबित करने में लगे रहे। ऐसे लोगों के लिए अगर एक बात कही जाए तो वो अनुचित न होगा कि अगर विवाद न हों तो ये लोग तो जीते जी मर जाएं और खुद का दर्शन कहीं न पेल पाएं, सो इन लगाई बुझाई करने वालों को इंतजार है कि देखो, अगला विवाद कब होता है ताकि खुद खाने पकाने का मौका मिलि जाए।
....जय भड़ास
यशवंत
प्रसून जी के साथ सात अन्य लोगों ने सहारा छोडा है
सचिन लुधियानवी has left a new comment on your post "क्या लालू यादव से डायलागबाजी के चलते निकाले गए पुण...":
प्रसून जी के साथ सात अन्य लोगों ने सहारा छोडा है उनमें पहले एनडीटीवी में रहे सीनियर एग्जीक्यूटीव प्रोड्यूसर एन के सिंह, एग्जीक्यूटीव प्रोड्यूसर संजय ब्राग्ता और नाजिम नकवी के अलावा आलोक कुमार, साथ ही स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के हेड और आउटपुट हेड पीयूष पांडे शामिल हैं. ये सभी पहले आजतक में थे. पंकज श्रीवास्तव हेड फीचर और अजय कुमार भी इसी लॉट के साथ गए हैं, जिनके बारे में खबर हैं कि संडे को रिजाइन के बाद आईएनएक्स ज्वाइन कर लिया है....
Posted by सचिन लुधियानवी to भड़ास at 3/3/08 5:42 PM
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
एक आम आदमी के हैसियत के करीब है भड़ास
Posted by
Anonymous
3
comments
कंट्री हेड (एडीटोरियल एचआर)
नए दौर में कंटेंट व क्वालिटी की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए अब दैनिक जागरण समूह भी प्रोफेशनल रास्ते पर चल पड़ा है। इसी के तहत दैनिक जागरण समूह के संपादकीय सेटअप में कई तरह के नए बदलाव किए जाने को टाप मैनेजमेंट ने सहमति प्रदान कर दी है। इसी क्रम में जो पहली जानकारी भड़ास को मिली है वो ये है कि संपादकीय विभाग की कार्यकुशला को और बेहतर बनाने और उसकी जरूरतों व संवेदनाओं की बिलकुल सही सही महसूस करने के लिए जागरण समूह ने कंट्री हेड (एडीटोरियल एचआर) नामक एक बड़ा पद सृजित किया है। इस पद पर तैनाती के लिए ढेर सारे नामों पर विचार किया गया। पद के नाम से ही जाहिर है कि इसके लिए किसी वरिष्ठ व समझदार पत्रकार के नाम को ही ओके किया जाना था। अंततः डा. उपेंद्र पांडेय के नाम को कंट्री हेड (एडीटोरियल एचआर) पद पर तैनाती के लिए फाइनल किया गया। डाक्टर साहब इस वक्त दैनिक जागरण इलाहाबाद के संपादक हैं। वे शनिवार को नोएडा आकर नए पद भार को ग्रहण करेंगे। नई पारी के लिए डाक्टर साहब को भड़ास की तरह से ढेर सारी शुभकामनाएं।
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
1 comments
क्या लालू यादव से डायलागबाजी के चलते निकाले गए पुण्य प्रसून?
पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई और लालू यादव-- इन दोनों में कोई योग संयोग या दुर्योग तो नहीं दिख रहा पर हुआ कुछ ऐसा ही। जानकारों का कहना है कि सहारा समय के सर्वेसर्वा पुण्य प्रसून जब रेल बजट के दौरान लालू यादव का इंटरव्यू करने पहुंचे तो लालू ने पूछ दिया की पंडी जी आप कब पहुंच गए सहारा समय? पुण्य प्रसून ने जो जवाब दिया उसका लब्बोलुवाब ये था कि सहारा समय को सुधारने के लिए चले आए हम। इसके जवाब में संभवतः लालू ने कहा कि सहारा ग्रुप को कोई सुधार पाया है जो आप सुधार पाएंगे? और जब ये सब बातें हो रही थी तो सब कुछ लाइव और आन एयर था। बताते हैं कि प्रसून जी के साथियों व अन्य लोगों ने सुझाव दिया कि इतना हिस्सा हटा देना चाहिए पर प्रसून जी ने इसे सहजता का संवाद बताकर चलने देने को कहा। और यही बात सहारा ग्रुप के मैनेजमेंट को नागवार गुजरी। तुरत फुरत निर्णय लिया गया और प्रसून जी को एंकरिंग करने से मना कर दिया गया। दो दिन अवकाश पर रहे और जब अगले दिन आफिस आए तो मैनेजमेंट निर्णय ले चुका था। बताते है कि थोड़ी नोंकझोंक के बाद प्रसून जी और उनकी पूरी टीम नारेबाजी करते हुए बाहर निकल गई और अंदर सहारा समय के बचे हुए स्टाफ ने जश्न मनाना शुरू कर दिया।
तो देखा आपने, लालू जी के डायलाग और प्रसून जी की सहजता के कारण यह सब इतना बड़ा कांड हो गया।
जानकारों का कहना है कि प्रसून जी ने अपने व्यवहार के चलते सहारा समय के ढेर सारे लोगों को अपने खिलाफ कर लिया था। सहारा की एक बड़ी लाबी प्रसून जी को लेकर लगातार अभियान चलाए हुए थी और उनकी विदाई की अफवाहें हर समय उड़ाया करती थी। प्रसून जी अति-आत्मविश्वास और स्ट्रेट फारवर्ड बिहैवियर के कारण कामकाज तो अच्छा करते कराते रहे पर लोगों में अलोकप्रिय होते गए। दरअसल एक लीडर के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह खुद अच्छा कार्यकर्ता हो, उसमें जरूरी गुण ये है कि वो कार्यकर्ताओं में अव्वल दर्जे का जोश ओ खरोश बनाए रखे और उन्हें बार बार शाबासी व दिशा देते रहे। पर कई बार हम कुछ लोग जो खुद काम में बहुत अच्छे होते हैं, टीम लीडर बनने के बाद खुद ही अच्छा कर दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं और बाकी लोगों से खुद द्वारा किए गए काम के स्तर के काम की अपेक्षा करने लगते है। इसके चलते दिन ब दिन खाई बढ़ती जाती है और आखिरकार एक दिन ऐसा होता है कि दो तिहाई टीम आपके खिलाफ खड़ी हो गई। और जिस संस्थान में दो तिहाई लोग किसी नेता के खिलाफ हो जाते हैं तो वहां काम का मौहाल नहीं रहता और कोई बेस्ट रिजल्ट नहीं दे सकता।
खैर, जो हुआ सो हुआ। आना जाना तो जीवन का एक बड़ा छोटा हिस्सा है लेकिन बौने टाइप के लोग इसे सबसे बड़ा कांड और सदी की सबसे बड़ी घटना के रूप में पेश करते हैं। दरअसल जो लोग हर साल दो साल में कुछ नया करते रहते हैं उनसे ही ज्यादा कुछ अपेक्षाएं होती हैं। वरना एक जगह रूका हुआ पानी तो सड़ ही जाता है।
नया सवाल ये उठ रहा है कि अब प्रसून जी अपनी टीम लेकर किस गली की ओर जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि उनके पास अब त्रिवेणी ग्रुप के आने वाले नए चैनल का आप्शन है जहां वो कुछ कम ज्यादा में बारगेन कर अपनी टीम सहित जा सकते हैं। और रामकृपाल सिंह को भी अभी तक किसी एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो उनके नए चैनल की रीढ़ बने और एक विजन दे सके। तो राम मिलाये जोड़ी। उम्मीद है, जल्द ही प्रसून जी अपने लोगों के साथ किसी नई जगह पर झंडे गाड़ते नजर आएंगे। उन्हें भड़ास की तरफ से शुभकामनाएं। अगर कोई मीडियाकर्मी साथी यह बता सके कि प्रसून जी के साथ किस किस ने सहारा समय छोड़ा है, तो बड़ी कृपा होगी।
उपरोक्त जो बातें लिखी कही गई हैं, वो इलेक्ट्रानिक मीडिया के कुछ वरिष्ठ साथियों द्वारा बताई गई बातों पर आधारित है और इसे कई जगहों से क्रास चेक भी किया गया है। अगर किसी को कोई आपत्ति हो या उपरोक्त बातों में कोई तथ्य गलत हो तो कृपया जरूर ध्यान आकृष्ट कराएं, नीचे कमेंट करके।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
4
comments
Labels: अफवाह, खुलासा, पुण्य प्रसून वाजपेयी, मीडिया, सहारा समय, हलचल
सोचता हूं तो
सोचता हूं तो अजीब लगता है।
वो दूर है पर करीब लगता है।।
सुकुनोचैन से जीता है वो आदमी लेकिन
शक्ल से हमेशा गरीब लगता है।।
उम्र भर जिसको इत्तफाक समझा हमने।
वो कायदे से अब नसीब लगता है।।
फासला रख के जिससे चलते रहे हर कदम।
आज वो ही अपना रकीब लगता है।।
जिंदगी भर जिसे समझने की कोशिश की।
अपने जेहन को वो ही अदीब लगता है।
Posted by
अबरार अहमद
2
comments
भड़ास की सदस्यता के लिए नई शर्त
रमेश शर्मा नामक सज्जन ने जिस तरह रेशमा और मोइन की नंगी सेक्स स्टोरी को बेहद अश्लील तरीके से लिखकर भड़ास पर प्रकाशित किया, उससे यह जाहिर हो गया कि कुछ लोग जान बूझकर भड़ास को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक साजिश करने के लिए उतर आए हैं। मुझे तुरंत ही इस पोस्ट को डिलीट करना पड़ा और इन सज्जन की मेंबरशिप को हटाना पड़ा। इससे पहले इन साजिशकर्ताओं की तरफ से ही किसी एक सज्जन ने अनाम नाम से एक सीनियर महिला ब्लागर का नाम लेकर उनके खिलाफ भड़ास के चैट बाक्स पर अश्लील कमेंट लिख डाले। मुझे तुरत फुरत बिना देर किए उस चैट बाक्स को ही लेआउट से रिमूव करना पड़ा।
उपरोक्त दोनों ही कारनामों के दौरान संयोग ये था कि मैं खुद आनलाइन था और मेरी नजर तुरंत इन जगहों पर पड़ गई। ऐसे में इन साजिशों को देखते हुए मुझे भड़ास की सदस्यता के लिए आनलाइन ओपेन इनविटेशन देने के बजाय मांगने पर सदस्यता देने का निर्णय लेना पड़ा ताकि सदस्यता देने से पहले संबंधित सज्जन के बारे में पड़ताल की जा सके। अब भड़ास का सदस्य बनने के लिए किसी को भी अपना मोबाइल नंबर व नाम लिखकर yashwantdelhi@gmail.com पर भेजना पड़ेगा। उनसे बातचीत के बाद ही उनकी सदस्यता एप्रूव की जाएगी।
मुझे उम्मीद है कि जितने भी लोग इस वक्त भड़ास के सदस्य हैं, उनमें जिन लोगों को मैं निजी तौर पर उनके लेखन, उनके ब्लाग, उनसे परिचय होने के नाते जानता हूं, उनके अलावा जो लोग हैं, वे संयम बरतते हुए कुछ भी ऐसा नहीं लिखेंगे जिससे किसी ब्लागर या किसी पाठक को कोई कष्ट हो। भड़ास आज भी अपने मूल मंत्र पर कायम है कि अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिए, मन हलका हो जाएगा....इस मूलमंत्र से जाहिर है कि वही बात लिखिए जो आपके जीवन व विचारधारा के सुख दुख से जुड़ी हो और जिसे आप अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हों। इसमें अश्लील बातें भी आ सकती हैं लेकिन उनका एक सामाजिक संदर्भ व संदेश व निजी जीवन से कोई मतलब होना चाहिए। सिर्फ काल्पनिक व गपोड़ी सेक्स कहानियों को भड़ास के मंच पर डालना आपराधिक कृत्य होगा।
उम्मीद है मौके की नजाकत को देखते हुए आप सभी लोग भड़ास जैसे सबसे बड़े हिंदी ब्लाग की व्यवस्था बनाए रखने में मदद करेंगे और इसे बढ़ाने में दिल ओ जान से प्रयास करेंगे।
जय भड़ास
यशवंत
yashwantdelhi@gmail.com
2.3.08
रमेश शर्मा, आपकी सदस्यता भड़ास से खत्म की जाती है
रमेश शर्मा नामक शख्स ने जिनकी मेल आईडी ये है rameshfromdelhi@gmail.com , भड़ास पर एक बेहद अश्लील कहानी प्रकाशित की, जो किसी मायने में भड़ास नहीं बल्कि अश्लील सेक्स स्टोरी है। मुझे पता है कि कुछ लोग साजिशन फर्जी मेल आईडी व फर्जी नाम से भड़ास पर गंदी गंदी चीजें पोस्ट कर रहे हैं। मैं अनुरोध करना चाहता हूं कि अगर ये गंदी अश्लील कहानियां ही प्रकाशित करनी है तो कृपया आप अपना खुद का ब्लाग बना लें और उसमें प्रकाशित करें। भड़ास एक सांस्कृतिक मंच है जहां निजी व सार्वजनिक जीवन से जुड़ी कुंठाओं, सहजताओं, विसंगतियों आदि को प्रकाशित किया जाता है।
मैं रमेश शर्मा की मेल आईडी को लेकर साइबर पुलिस में कल रिपोर्ट दर्ज कराने जा रहा हूं। रमेश शर्मा की आईपी एड्रेस को पता कर उस शख्स के खिलाफ भड़ास कार्रवाई को समुचित प्रयास करेगा ताकि इन नकली सज्जनों को पता चल सके कि यह सब करने का अंजाम क्या हो सकता है।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
6
comments
Labels: अश्लील पोस्ट, फर्जी आईडी, भड़ास, रिपोर्ट, साइबर पुलिस
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं, दुश्मनों का भी मान रखते हैं...डा. सुभाष भदौरिया
[भड़ास] New comment on लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो....
डॉ.सुभाष भदौरिया. has left a new comment on your post "लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरो...":
यशवंत सिंह जी
आपने आदरणीया मनीषाजी से माफी माँगकर बहुत ही नेक काम किया है.रंगेसियारों को वे पहिचानने की नज़र रखती हैं.उनके दोगलेपन को उन्होंने खुद उजागर किया है.
देर अबेर वे हम पापियों को भी पहिचानेंगी.
आमीन.
अन्य आदरणीय मनीषाजी से मैं माफी मांग रहा हूँ कि उनके दिल को ठेस लगी होगी. साथ में डॉ.रूपेशजी से जो एक गंभीर समस्या की ओर इंगित कर रहे हैं.पर उन पर शंका कर पूरे मामले को कहाँ से कहाँ ले जाया गया.
उनके पीछे आड़ लेकर वार करने वाले मठाधीशों कठमुल्लों के फ़तवों की हमें परवाह नहीं है.
आ गये कमज़र्फ कंधा ले के आँसू पोछने.
लाइन लग गई यार ढोंगियों की फाइर काल के नाम पर.
अपनी एक ग़ज़ल के कुछ अशआर अपने तमाम भड़ासी दोस्तों को नज़र कर रहा हूँ.
ग़ज़ल
जान देकर के शान रखते हैं.
हम अजब आनबान रखते है.
शब्द भेदी हैं हम को पहिचानो,
दिल में तीरो कमान रखते हैं.
दोस्तों पर तो जां छिडकते हैं,
दुश्मनों का भी मान रखते हैं.
जितना खोदोगे रतन निकलेंगे,
सीने में वो खदान रखते हैं.
वैसे तो हम जमी पे रहते हैं,
आँख में आसमान रखतें हैं.
ग़ालिबो मीर के हैं हम वारिस,
अपने शेरों में जान रखते है.
जय भड़ास.
Posted by डॉ.सुभाष भदौरिया. to भड़ास at 2/3/08 7:15 PM
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
3
comments
Labels: अंत, जवाब, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मनीषा पांडेय, विवाद, स्त्री
क्या शाहरुख खान बददिमाग हैं?
जयप्रकाश चौकसे
Saturday, March 01, 2008 08:43 [IST]
email article
E-Mail
क्या शाहरूख बद दिमाग हैं
परदे के पीछे. शाहरुख खान ने बतौर अभिनेता काफी नाम और दाम कमाया है, परंतु इस सबके बावजूद उन्हें किसी को गाली देने का अधिकार नहीं है। बददिमागी का न दिखाई देने वाला कीड़ा जाने कब त्वचा के भीतर प्रवेश कर जाता है। दरअसल घटिया और निहायत ही फूहड़ फिल्म ‘ओम शांति ओम’ की आलोचना से शाहरुख बौखला गए हैं।
फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह में शाहरुख खान और सैफ अली खान ने फिल्म आलोचकों का खूब मजाक उड़ाया। मजाक उड़ाने का सबको अधिकार है परंतु इन दोनों ने आलोचकों को अपरोक्ष रूप से मां-बहन की गालियां भी दीं और तथाकथित तौर पर अभद्रता से बचने के लिए बचकाना कदम उठाया जैसे आलोचकों की मां और बहन बोलने के बाद क्षण भर के लिए रुके और आगे वाले अभद्र शब्द के बदले बोला गया कि मां-बहन लकी हैं। इसी तरह उर्दू के फख्र शब्द को भी अंग्रेजी की एक गाली की तरह उच्चरित किया गया।
उनका यह सोच सही हो सकता है कि अधिकांश आलोचकों को सिनेमा की समझ नहीं है और हिंदुस्तानी व्यावसायिक सिनेमा को यूरोप के मानदंड पर नहीं तौलना चाहिए। शायद यह भी सही है कि अधिकांश आलोचक आलोचना के बहाने स्वयं के ज्ञान का ढोल पीटते हैं, परंतु उन्हें मां-बहन की गालियां, भले ही वह अपरोक्ष ढंग से दी गई हों, देने का हक नहीं है।
इस गाली-गलौज से आलोचकों के अपमान से ज्यादा शाहरुख और सैफ का घटियापन जाहिर हुआ है। शाहरुख की ‘ओम शांति ओम’ सफल फिल्म है, परंतु वह महान कृति नहीं है। सच्चई तो यह है कि बतौर निर्माता शाहरुख ने अभी तक कोई तीर नहीं मारा है। उनकी ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’, ‘अशोका’ और ‘पहेली’ असफल और घटिया फिल्में रही हैं। अजीज मिर्जा की ‘चलते चलते’ अच्छी फिल्म थी।
फरहा खान की ‘मैं हूं न’ और ‘ओम शांति ओम’ महज पैसा कमाने वाली फिल्में थीं। पैसे के मानदंड पर अक्षय कुमार अभिनीत ‘वेलकम’ उनकी ‘शांति’ से ज्यादा सफल है। सैफ अली खान के ताज पर सिर्फ करीना ही हैं और उन्होंने क्या किया है? जिस चमड़ी पर मेहबूबा का नाम गुदवाया है, उसके भीतर चुल्लू भर लहू के अलावा कोई संवेदना नहीं है।
फिल्मफेयर के इसी मंच से पिछले साल शाहरुख ने अमर सिंह के लिए अपशब्द कहे थे, परंतु अमर सिंह का नाम इतना बदनाम है कि किसी ने इस अभद्रता की शिकायत नहीं की। अब इसी मंच से आलोचकों को गालियां दी गई हैं। क्या हम यह समझें कि इस अभद्रता में यह पत्रिका शामिल है? शाहरुख ने विदेशों में इतना नाम कमाया है कि लंदन, बर्लिन और पेरिस में उन्हें भीड़ से बचाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ता है।
हमें इस शाहरुख पर गर्व है। वह विज्ञापन आदि से सौ करोड़ रुपए प्रतिवर्ष कमाते हैं और एडवांस के तौर पर सत्ताइस करोड़ आयकर देते हैं, हमें इस पर भी गर्व है। परंतु इस सबके बावजूद उन्हें किसी को गाली देने का अधिकार नहीं है। उनमें ऐसी मर्दानगी भी नहीं है कि छाती ठोककर गाली दें। वह गालियों के लिए पतली गलियां चुनते हैं। क्या सफलता शाहरुख के सिर पर सवार है?
उनके दरबारी चमचे फरमाते हैं कि चालीस हजार किताबें भी शाहरुख का बखान नहीं कर सकतीं। यह शाहरुख को क्या हो गया है? उन्होंने अपने इर्द-गिर्द कैसी भीड़ पाली है? विनम्रता जीनियस का ताज होती है। शाहरुख तुमसे पहले और तुम्हारे बाद भी तुमसे बेहतर कहने वाले आए हैं और आएंगे। यह मसरूफ जमाना सबको भुला देता है। अगर किसी के पास विनम्रता नहीं है तो उसकी पूरी परवरिश पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
शाहरुख के पिता तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और उन्होंने अच्छी परवरिश दी है। शाहरुख ने फिल्मों में बिताए पहले पंद्रह वर्ष में कभी अभद्रता का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि वह सितारों के लिए रोल मॉडल रहे हैं। उनके व्यवहार का यह परिवर्तन मौजूदा दौर में ही नजर आ रहा है।
उन्होंने ‘ओम शांति ओम’ में अनेक लोगों का मखौल उड़ाया है। शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि वह बददिमाग होते जा रहे हैं। यह बददिमागी का न दिखाई देने वाला कीड़ा जाने कब त्वचा के भीतर प्रवेश कर जाता है। दरअसल घटिया और निहायत ही फूहड़ फिल्म ‘ओम शांति ओम’ की आलोचना से वह बौखला गए हैं।
मियां शाहरुख! बॉक्स ऑफिस के परे भी सिनेमा होता है- बैंक की पास बुक से बेहतर पटकथाएं होती हैं। शाहरुख की ही विचार प्रकिया में कहें तो यह ठीक है कि आलोचकों को सिनेमा की समझ नहीं और शाहरुख को कहां अभिनय आता है। यह सिर्फ जैसे को तैसा की शैली है।
Posted by
devendra sahu
0
comments
मनीषा बहन से माफ़ी
न जाने कितनी बार लिखा और मिटाया ,समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे बात शुरू करें । लेकिन जो मन में है वो तो कहना ही है क्योंकि भाई बोलते है कि अगर मन में बात रखा तो बीमार हो जाते हैं । अभी मेरे नाम वाली मनीषा बहन से एकदम सीधी बात कि आपको मेरे कारण परेशानी और दुख हुआ तो माफ़ करिये मुझे और मेरे भाई को । भाई तो इमोशनल हैं तो उन्होंने मेरे को लेकर एकदम डिफ़ेंसिव तरीका अपना लिया वो भी गलत नही हैं । आप लोगों के सामने मैं भाई की लिखी एक कविता रख रही हूं जिससे आप सबको भाई की सोच की गहराई और प्रेम व करुणा का अंदाज हो जायेगा ।
ए अम्मा,ओ बापू,दीदी और भैया
आपका ही मुन्ना या बबली था
पशु नहीं जन्मा था परिवार में
आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
कोख की धरती पर आपने ही रोपा था
शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे को
नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई
फलता भी पर कटी गर्भनाल,जड़ से उखड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं
सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज
मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में
जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र के पंख लिए आप
उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर
फिर मैं ही क्यों पंखहीन बेड़ी में जकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है
चाचा,मामा,मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं
ममता,स्नेह,अनुराग और आसक्ति पर
मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान
साफ स्वच्छ ,निर्लिप्त हर कलंक से
हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं
ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको
चल बोल नहीं सकता,साइंटिस्ट है और मैं?
सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर
इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं
मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित
बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ
आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है
हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं
पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी ;
मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सोचिये हमारे बारे में भी ,मनीषा बहन से एक बार फिर माफ़ी मांगती हूं । अब आप सब लोग होली की तैयारियां करिये ।
नमस्ते
नमस्ते
Posted by
हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा
3
comments
लड़ाई बंद, प्रकरण खत्मः मठाधीश, चिलांडुओं, ब्लागरों, भड़ासियों, साथियों, मनीषा पांडेय जी के लिए संदेश
और ये रहा ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे का पहला पार्ट
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके चिलांडुओं को लगा था कि वो एक साथ भौंकना शुरू करेंगे और भड़ासी डर कर उनके शरण में आ जाएंगे, त्राहिमाम करते हुए। पर हुआ उल्टा इन कुत्तों को न सिर्फ खदेड़ा गया बल्कि बताया भी गया कि दरअसल तुम लोग जिस हिप्पोक्रेसी के जरिए दुनिया को चूतिया बनाए हो और अपने को प्रगतिशीलता का पितामह साबित कर रहे हो, वो दरअसल विचार व व्यवहार का दोगलापन था, जिसे ढेर सारे दिन तुम ढंकने मे सफल रहे लेकिन भड़ास ने इसे उजागर कर दिया। इसी के चलते बजाय भड़ास का नुकसान होने के, ब्लागिंग के मठाधीश का मोहल्ला ही दरक गया। वहां भगदड़ मची हुई है। वो सदमें में है। हर बार का सफल दांव अब उसी को नष्ठ करने पर तुला हुआ है। उसे अब अपनी शक्ल भी छिपाने में मुश्किल हो रही है।
मठाधीश ने तो पहले तानाशाह की तरह फरमान जारी किया और चिलांडुओं से भी कहा कि वो भी फरमान का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटें...भड़ास बंद करो का। लेकिन जब उनके उखाड़े कुछ नहीं उखड़ा, बल्कि भड़ासियों ने उनकी झांटें नोचना शुरू कर दिया तो मठाधीश ने अपना पुराना कूटनीतिक दांव खेला, बिलो द बेल्ट प्रहार का खेल शुरू किया, जिसे वो हमेशा खेला करता है। पर हम इससे डरे नहीं, झुके नहीं, रोये नहीं, गिड़गिड़ाये नहीं.....इसके जवाब में भड़ास ने मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलने की शुरुवात की है। हमें मरना पसंद है, झुकना व रिरियाना नहीं। इसी क्रम में तमाम विरोधों के बावजूद आज दो मार्च से ब्लागिंग के मठाधीश के कच्चे चिट्ठे को खोलना शुरू कर रहा हूं।
मैं जानता हूं कि तमाम वरिष्ठ ब्लागरों और भड़ासियों को मेरे द्वारा विवाद को खींचा जाना नागवार गुजरेगा लेकिन उनसे मैं करबद्ध प्रार्थना करना चाहता हूं कि वो बस इस पहले पार्ट को मुझे लिख लेने दें, जिसे अंतिम पार्ट मैं मान लूंगा और मैं अपनी तरफ से इस पूरे चैप्टर को क्लोज कर दूंगा, ये मेरा वादा है। भले ही इसके बाद मठाधीश और चिलांडु शाब्दिक लफ्फाजियों और हिप्पोक्रेसी के जरिए अपनी जीत की दुहाई देते हुए राग दरबारी गाएं और दुनियां को अपनी जीत का जश्न दिखाएं लेकिन वो अपनी आत्मा के आइने में झांकेंगे तो उन्हें सच दिखाई देगा।
सो ये जो पहला पार्ट लिख रहा हूं, उसे अंतिम पार्ट मानते हुए पढ़ें...
----------------------------------------------
ब्लागिंग का जो मठाधीश है, उसने अपने करियर के ग्रोथ के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा और प्रगतिशीलता का जिस तरह बेहतरीन इस्तेमाल किया है, उसका इस दौर का कोई दूसरा नमूना नहीं हो सकता है। इसके लिए रांची और पटना और दिल्ली के ढेर सारे पत्रकार साथियों, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं और इसके मित्रों से बात की जा सकती है।
मेरे पास जो तथ्य मिले हैं, जो बातें बताईं गई हैं, जो मेल मिले हैं.....उसे मैं यहां जारी कर एक नई बहस को नहीं जन्म देना चाहूंगा लेकिन उसका लब्बोलुवाब यही है कि विचारधारा का अपनी तरक्की व उन्नति के लिए इस्तेमाल देखना हो तो मठाधीश का करयिर देखिए। जिस शख्स ने इसे कभी मदद की हो, इसने उसी की खाट खड़ी की। एक उदाहरण देना चाहूंगा। प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी के संरक्षण में इस शख्स ने करियर की उंचाइयां पाईं लेकिन जब एक न्यूज चैनल को ज्वाइन कर लिया तो उसने एक मैग्जीन में लेख लिखकर हरिवंश जी को जाने क्या क्या नहीं कहा। अरे भाई, थोड़ी तो कृतज्ञता होनी चाहिए दिल मे या दिल्ली आकर ऐसे प्रोफेशनल हो गए हो कि सिवाय खुद को, कोई दिखता ही नहीं है। ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे।
इसी तरह प्रगतिशीलत व विचारधारा के नाम पर इसने ब्लागिंग में लोगों का इस्तेमाल किया, दुराव फैलाया और एक-एक कर सारे वरिष्ठ ब्लागरों से पहले दोस्ती की, सीखा और फिर जब काम निकल गया, उनका इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें किनारे लगाकर, ठिकाने लगाकर खुद को बढ़ाता चला गया।
आज मठाधीश को जानने वाले जितने भी ब्लागर हैं, उनमें से किसी एक से बात कीजिए, वो बतायेगा कि मठाधीश किस कदर तानाशाह और अलोकतांत्रिक शख्सीयत है जो विचारधारा को प्रोफेशनली इस्तेमाल कर ब्लागिंग में खुद की शख्सीयत बढ़ाता है। जो पसंद न आए, उसे नष्ट कर दो, उसे अलगाव में डाल दो, उसे अकेले में छोड़ दो, उसके करीब के लोगों को उससे काट दो, उसे कहीं तवज्जो न दो, उसके नामलेवा लोगों को धमका लो.......ये सारी बातें सभी को पता हैं। इन्हें एक-एक उदाहरण के जरिए भी समझाया जा सकता है लेकिन मैं इसे फिर कभी लिखूंगा, अगर जरूरत पड़ी तो।
ब्लागिंग के मठाधीश ने शायद इतिहास से सबक नहीं लिया कि जिसको भी यह गुमान हो गया कि वो ही सर्वोच्च और सबसे ज्यादा ताकतवर है, उसका यह घमंड उन सामान्य लोगों ने तोड़ दिया, जिसे वो अपने मुट्ठी में दबोचने लायक माना करते थे। तो इसी तरह से बिना समझे, बिना विचारे, बिना बहसियाये, बिना समझाए, बिना कहे, बिना विश्वास में लिए...एकाएक भड़ास को बंद करने का नेक विचार, नेक ऐलान ब्लागिंग के मठाधीश सर्वनाश ने चिलांडुओं के साथ किया, उससे उन्हें यह विश्वास था कि उनकी इतनी मजबूत सत्ता, गुट व ताकत के चलते भड़ास वाले भों भों करते हुए रोएंगे व उनके पैर पकड़कर माफी वाफी मांग लेंगे....
लेकिन मैं यह बताना चाहता हूं कि भड़ास ने न तुम सबको नंगा कर दिया है, बल्कि ब्लागिंग व पत्रकारिता जगत में घृणा के लायक बना दिया है, जिसके तुम लोग काबिल हो। और रही बात हम भड़ासियों को तो ये जान लो....
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम बुरे लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम अच्छे हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम चूतिये हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम विद्वान हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम कुंठित लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम मोक्ष पाए हैं
हम लोगों ने हमेशा कहा कि हम अपूर्ण लोग हैं
तुम्हारी तरह कभी नहीं कहा कि हम्हीं अंतिम सत्य हैं
हम भदेस, फ्रस्टेट, देसज, असफल लोगों के कंधे
कमजोर भले हों, पर इतने नहीं कि झुक जाएं
उनके सामने जो हर चीज को सही गलत होने के लिए
सार्टिफिकेट देते घूमते फिरते हैं, आईएसआई मार्का
तुम लोग तो सफल होने के लिए ही पैदा हुए थे,
छा जाने के लिए ही इस धरती पर जन्मे थे,
विजय करने के लिए ही राजधानी पहुंचे थे,
इतिहास बनाने के लिए जी रहे हो, कर रहे हो
पर हमने तो हमेशा इतनी बड़ी बड़ी बातों के आगे
खुद को तुच्छ, नीच, मलिन माना और
चुपचाप जीते रहे, नून तेल के लिए मरते रहे
हर शाम पीकर बकते रहे, बड़ बड़ बकते रहे
गाली वाली देकर, कुछ लिखकर, कुछ बोलकर
बताते रहे कि हम लोग, आप एलीट व सभ्य
लोगों के आगे बड़े बुरबक हैं, और प्लीज जीने दें हमें
अपने तरीके से, अपनी गंदगी में लोटते हुए, हंसते हुए, रोते हुए
पर आपको नहीं था यह मंजूर कि आपकी प्रसिद्धि की हवेलियों के आसपास
बसी रहे, बढ़ती रहे कोई मलिन बस्ती जहां असभ्य लोग
खाते हगते मूतते हंसते रोते जीते सोते एक ही कमरे में गुजार लेते हों जिंदगी
आपको तो चाहिए हर रोज उनसे जीने का करारनामा
जिसमें लिखा हो कि हम नीच लोग, सताए लोग
आप महान वैचारिक सभ्य लोगों को वचन देते हैं कि
हम हर रोज उठते हुए आपको नमन करेंगे, यहां जीने देने के लिए
और जब भी दिखेंगे आप, या आपकी तरफ से आएगी कोई हवा
हम सम्मान में उठ खड़े होंगे और सिर झुकाकर कहेंगे हुजूर हुजूर हुजूर
पर माफ करना मठाधीश, तु्म्हारे चिलांडुओं....
तुम ये भूल गए कि कई लोग डर डर के जीने से बेहतर
एक रोज मरना समझते हैं
और जो मर मर के जीने से इनकार कर दे तो वो
तुम्हारी अट्टालिकाओं में घुसकर अपने सिर से दीवारों को फोड़ सकता है
और तुम्हारे फौज फाटे बस यूं ही हल्ला करते हुए
दाएं बाएं कुछ सक्रिय दिखने की कोशिश भर करते रहेंगे
प्लीज, आगे से ध्यान रखना, गंदे लोगों को भी जीने का हक है माई लार्ड
(यह पहला और अंतिम पार्ट उन अनाम कमेंटों के जवाब में है, जो मठाधीश ने मेरे खिलाफ अपने ब्लाग पर प्रकाशित कर रखे हैं, अगर उसी जैसे फिर अनाम कमेंट आए तो पहले पार्ट के आगे दूसरा पार्ट भी शुरू होगा, फिलहाल हिसाब बराबर कर लेने के कारण इस पहले पार्ट को ही अंतिम पार्ट घोषित करता हूं, हालांकि मठाधीश अभी हरकत से बाज नहीं आएगा और अपने पुराने पिट चुके दांव आजमाता रहेगा, रुक रुक कर चिंतनशील मुद्रा में जाने किस किस एंगिल से बौद्धिक बाजीगरी की पिपहिरी बजाता रहेगा, पर हम लोगों के पास और भी काम हैं भाया, सो इस मुद्दे को सलाम..........यशवंत)
------------------------------------------------
प्रकरण खत्म, साथ देने के लिए आप सभी साथियों का आभार
मैं इन्हीं गद्द और पद्द भरी बातों के साथ इस प्रकरण को समाप्त घोषित करता हूं। अपने भाई और कवि हरेप्रकाश उपाध्यय, डा. रूपेश श्रीवास्तव, मनीष राज, अंकित माथुर.....समेत सभी लोगों से इसलिए माफी चाहता हूं कि मैंने इस प्रकरण को लंबा खींचा, पर दोस्तों ये जरूरी था वरना हम लोग अब तक निगले जा चुके होते और बिना हमारा पक्ष सुने ही हमारे चरित्र पर अदालत से फैसला दिलाकर हमें फांसी पर लटकाया जा चुका होता। मैं निजी तौर पर वादा करता हूं कि मैं भड़ास पर खुद किसी पोस्ट में किसी महान ब्लागर का उल्लेख अब नहीं करूंगा और न ही किसी को अपना गुरु वुरु मानूंगा। हम लोग अपने दम पर लड़े भिड़े और आगे बढ़े लोग हैं जो अपनी मस्ती की धुन में पूरी टीम भावना के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं ताकि देसजपने की खुशबू या बदबू उन राजमहलों तक भी पहुंचे जहां हमारा जाना वर्जित है।
-------------------------------------
भड़ासी अपने पोस्टों में दूसरे ब्लागरों का नाम न लें, किसी पर टिप्पणी न करें
मैं आप लोगों से भी अनुरोध करूंगा कि अब किसी पोस्ट में किसी ब्लाग का नाम, किसी ब्लागर का नाम जो भड़ास का मेंबर न हो, न लिया जाए। हम लोगों के लिए भड़ास निकालने के ढेर सारे बिंदु अभी बाकी है, क्यों खामखा किसी के मुंह लगा जाए। हर हम लोग अपनी रक्षा हर हालत में करेंगे, एकजुटता के साथ, यह वादा है। भड़ास को हम कई हिस्सों में बांट सकते हैं जैसा आर्थिक भड़ास, राजनीतिक भड़ास, सांस्कृतिक भड़ास, देसज भड़ास, शहरी भड़ास, व्यंग्य भड़ास, गुस्सा भड़ास....और आप पाएंगे कि हमने अभी कई सेक्शन पर कुछ लिखा ही नहीं।
--------------
सीनियर ब्लागरों को विशेष आभार....
मैं अंत में उन ढेर सारे वरिष्ठ ब्लागरों को दिल से शुक्रिया कहता हूं जिन्होंने मुश्किल घड़ी में हम भड़ासियों का साथ दिया और हौसला बंधाया। मैं उन लोगों की सलाह पर ही इस विवाद को यहीं विराम देता हूं। साथी बोधिसत्व, अभय तिवारी, दिलीप मंडल, संजय तिवारी, मसिजीवी, अशोक पांडे, अरुण अरोरा, प्रमेंद्र प्रताप सिंह.....समेत ढेरों ऐसा ब्लागर साथी हैं जिनके लिखे, कहे से मैं प्रेरणा पाकर यह सारा झगड़ा खुद अपनी तरफ से खत्म कर रहा हूं।
-----------------
मनीषा पांडेय जी, हम भड़ासी बिना शर्त माफी मांगते हैं
मैं बेदखल की डायरी वाली मनीषा पांडेय से कहना चाहूंगा कि अगर हमारे बार-बार सफाई देने के बावजूद उन्हें यह लगा कि भड़ास ने उनकी भावनाओं को दुख पहुंचाया है, खिल्ली उड़ाई है, टारगेट कर लिखा है, बदनाम करने की साजिश की है....तो मैं बिना शर्त माफी मांगता हूं। हम लोगों की कभी ऐसी मंशा नहीं रही। हम स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी लड़ाई के साथ खुद को जोड़कर देखते हैं। ऐसे में हम किसी भी आम खास महिला साथी को टारगेट बनाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो कुछ सब हुआ वो गलफहमी व संवादहीनता के चलते हुआ। मैं इसी के साथ विश्वास दिलाता हूं कि भड़ास में जो कुछ छपा है, कहा गया है, उसके पीछे कतई आप नहीं थीं। आपके लिखे पर मुझे जो कुछ कहना था मैं उन्हीं दिनों एक पोस्ट के जरिए आपको संबोधित करते हुए आपके आरोपों के जवाब में कह दिया था। उसके बाद आपको टारगेट नहीं किया गया। यह दुर्योग था कि उन्हीं दिनों मुंबई के एक लैंगिक विकलांग साथी ने अपना ब्लाग शुरू किया और कुछ पोस्टें भड़ास पर भी डालनी शुरू कीं, और वो साथी ये काम डा. रूपेश के सहयोग से कर रहीं थीं। आपसे विवाद के बहुत पहले से मुंबई की उस लैंगिक विकलांग साथी के नाम का जिक्र डा. रूपेश अपनी पोस्टों में करते रहे हैं, ये बात हम लोगों ने कई बार कही है।
खैर, अब सफाई देने का वक्त नहीं है, और माफी मांगते समय सफाई देनी भी नहीं चाहिए। माफी के साथ कोई शर्त नहीं होती सो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं और आपकी गरिमा का सम्मान करते हुए आपकी मेधा की भूरि भूरि तारीफ करते हैं। अब तो ये कहने का वक्त है कि अगर दिल में कोई मलाल हो तो, प्लीज... उसे निकाल दीजिए। आपके लिखे का मैं हमेशा कायल रहा हूं, और रहूंगा, वैचारिक मतभेद तो होते रहते हैं लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। उम्मीद है, भूल चूक लेनी देनी को माफ करते हुए आप मुझ अज्ञानी मूरख समेत सारे नासमझ भड़ासियों को भी क्षमा कर देंगी, जिनके मन में किसी के लिए कोई पाप नहीं होता है और जो होता है वो सबके सामने होता है। आपकी माफी के इंतजार में....यशवंत
-----------------
अंत में भड़ासियों के लिए संदेश
हे प्यारे भड़ासियों, अब मस्त रहिए, डटे रहिए, किसी दूसरे के ब्लाग को न देखिए। भड़ास पर आप लिखते रहिए, आपस में लड़ते रहिए, आपस में सुलह करते रहिए, हम खुद ही इतनी संख्या में हैं कि हमें लड़ने के लिए भड़ास के बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है लेकिन अगर बाहर से भड़ास को चुनौती मिलती है तो हम सब मिलकर नाक तोड़ देंगे, इसकी गारंटी करिए। ये जंग थी, जिसमें न कोई हारा है न कोई जीता है। जैसे को तैसा वाले अंदाज में बातें की गईं हैं। लेकिन अब इसे खत्म करना चाहिए। बहुत हुआ।
और मैं ये चैप्टर अब बंद करता हूं। आपसे भी अनुरोध करता हूं कि कोई भी साथी अब अपनी पोस्ट में पीछे हुए किसी विवाद का कोई जिक्र नहीं करे। और हो सके तो हमें अपने विरोधियों, दुश्मनों से भी माफी मांग लेनी चाहिए तो वो अपनी महानता कायम रख सकें और हम हारे हुए लोग फिर हारकर जीने का सुख ले सकें। जीने का मजा इसी में है प्यारे.....
अंत में मेरी प्रिय लाइन...
तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
-----------------------
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
5
comments
Labels: खत्म, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीश, मनीषा पांडेय, विवाद, समाप्त, स्त्री
भडास ने गुंगो को आवाज और लंगरों को बैशाखी का सहारा दिया है.
Posted by
Anonymous
2
comments
अमर उजाला के Sundayआनंद में पूरे पेज का ब्लॉग राग
सुबह आंख खुली तो ढेर सारी मिस काल, कई संदेश। यूपी के विभिन्न शहरों से, कई दिल्ली से। माजरा क्या है?
अच्छा, अमर उजाला में मेरी फोटो छपी है, ब्लाग पर पूरा पेज है।
सोये सोये ही अंगड़ाई ली। बच्चे भी अधजगे हुए लेटे पड़े रहने का आनंद ले रहे थे। मैं भी संडे होने का आनंद उठाते हुए जगने के बावजूद अलसाया पड़ा रहा। मणिमाला जी उठ चुकी थीं। सामने पड़ीं और चाय वाय को पूछा तो मैंने रिक्वेस्ट कर दिया, प्लीज...जाओ न, चौराहे से अमर उजाला की चार कापियां खरीद लो। मैंने उन्हें वजह बताई...आपके महान पति की तस्वीर आज पूरी दुनिया देख रही है और आप इससे अभी तक महरूम हैं...
आखिर में तय यह हुआ कि सुबह का खाना मैं बनाऊंगा और उसके बदले आप जाकर अमर उजाला की चार कापियां खरीद लाएंगी। इस प्रस्ताव पर वो खुशी खुशी चली गईं।
तीन कापियां लेकर घर में प्रकट हुईं तो चेहरे पर मुस्कान थी। मुझे थमा दिया, अमर उजाला वाली मैग्जीन, संडे आनंद...अरे वाह, क्या खूब लिखा है, तस्वीर भी वही ब्लाग प्रोफाइल वाली है, कुटिल मुस्कान से युक्त, गोरी चमड़ी पर दाढ़ी...बोले तो चमड़ी गोरी हो तो भी देहातीपन दिख ही जाता है।
इसी दौरान मुजफ्फरनगर से हर्ष भाई का एसएमएस से बधाई संदेश, डा. अजीत तोमर का हरिद्वार से फोन, सौरभ शर्मा का मेरठ से फोन....आते रहे और इन भाइयों को नाटकीय तरीके से कुछ सकुचाया कुछ शर्माया कुछ अनजान सा बनकर थैंक्यू टैंक्यू बोलता रहा। अरे भाई, खुद की कोई तारीफ करे तो थोड़ा विनम्र व थोड़ा अज्ञानी व थोड़ा चूतिया तो बनना ही पड़ता है न.....।
सीनियर जर्नलिस्ट अरुण आदित्य की मेहनत प्रशंसनीय है। जिस तरीके से उन्होंने ब्लागिंग को समेटा, सजाया, प्रस्तुत किया है वह दिल को बागबाग कर देने वाली है। कुल तीन ब्लागरों और दो ब्लागराइनों की तस्वीरें छपी है, उनके बयान हैं, उनके ब्लागों के यूआरएल हैं, इनमें भड़ास भी है। मजेदार तो ये है कि जो तस्वीर बिलकुल उपर है वो भड़ास के मुख्य पेज की ही है, और वो बात साफ साफ पढ़ने में आ रही है जो भड़ास पर लिखा है.....अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिए, मन हलका हो जाएगा......
कवर स्टोरी सिर्फ मुख्य पेज पर ही खत्म नहीं हुई है बल्कि अंदर पेज दो पर भी है, मंगलेश डबराल व उदय प्रकाश की तस्वीरों के साथ, उनके बयानों के साथ।
आप सभी से अनुरोध है कि आप अमर उजाला खरीदकर पूरी स्टोरी जरूर पढ़ें जिससे कि आप ब्लागिंग के बारे में अपडेट हो सकें। मैं यहां सिर्फ भड़ास को लेकर जो मेरा बयान प्रकाशित हुआ है, उसे डाल रहा हूं....
---------------
कुंठा भगाने वाली भड़ास
यशवंत सिंह
माडरेटर-भड़ास
http://bhadas.blogspot.com
हमारी हिंदी पट्टी जिस सामंती कुंठा की शिकार है, उससे मुक्ति दिलाने की आकांक्षा का परिणाम है भड़ास। दरअसल हम सब दमित इच्छाओं की गठरी लिए घूमते हैं। भड़ास एक ऐसा मंच है, जहां आप बेहिचक इस गठरी को खोल सकते हैं। पहले अकेले शुरू किया था, फिर मुझे लगा कि मैं अकेला ही क्यों, हिंदी मीडिया में मेरे जैसे तमाम लोग हैं जिन्हें मन की बात कहने का मंच नहीं मिलता। तो मैंने भड़ास को खुला मंच बना दिया। इस तरह यह एक कम्युनिटी ब्लाग बन गया। आज यह हिंदी के मीडियाकर्मियों का सबसे बड़ा ब्लाग है, जिसमें 226 सदस्य हैं और 500 हिट्स रोज मिलती हैं। करीब 20 हजार लोग रोज पढ़ते हैं। सबकी एक ही मंशा है कि हिंदी वाले कुंठा से मुक्त हो जाएं और अंग्रेजी को लतियाएं।
-----------------------
मैं इस कवर स्टोरी के लेखक अरुण आदित्य जी को खासकर इस बात के लिए जरूर धन्यवाद देना चाहूंगा जो उन्होंने मेरी इस बात को स्थान दिया जिसमें मैंने कहा है कि ....सबकी एक ही मंशा है कि हिंदी वाले कुंठा से मुक्त हो जाएं और अंग्रेजी को लतियाएं ......।।। अंग्रेजी को लतियाने शब्द को छपा देखकर मुझे अपार खुशी हुई, लग रहा था कि वाकई अंग्रेजी की गांड़ पर लात पड़ रही है, ठक ठांय दम भम घम......।
जय भड़ास
यशवंत
पुण्य प्रसून के सहारा समय छोड़ने के निहितार्थ
पक्की खबर मिली है कि अपने समय के सचेत व तेवरदार पत्रकारों में से एक, मशहूर एंकर और पिछले कई महीनों से सहारा समय न्यूज चैनल के सर्वेसर्वा पुण्य प्रसून वाजपेयी ने इस चैनल को बाय बाय बोल दिया है। इसके पीछे वजह क्या रही? यह तो नहीं पता चल पाया है लेकिन पुण्य प्रसून का जाना उनके चाहने वालों को दुखी कर गया। उनमें मैं भी हूं। फोन पर संक्षिप्त बातचीत में पुण्य प्रसून ने सहारा छोड़ने की खबर की पुष्टि की।
पुण्य प्रसून के चलते पिछले कई महीनों में सहारा समय पर ठीकठाक खबरें, बहस और मुद्दे देखने व सुनने को मिले। अब शायद वो सब न देखने को मिले। कई बार यह होता है कि आप काम तो ठीक से करते हो, मेहनत व विजन से करते हो पर सोकाल्ड टीआरपी की जो महिमा है उसमें दूसरे बाजी मार ले जाते हैं। न्यूज चैनल अब बाजार का हिस्सा हैं, सो उन्हें खबरों से ज्यादा टीआरपी से लेना होता है, गलती बस यही है। तो अगर पुण्य प्रसून जी को टीआरपी के पैमाने पर आंका गया होगा तो हो सकता है कि ढेर सारे छिछोरे चैनल इसमें बाजी मार ले गए हों और उन छिछोरे चैनलों के छिछोरे व रीढ़विहीन मुखिया लोग इसी बात से खुश हो होकर पार्टियां कर रहे हों और अपने चेलों से अपनी पीठ थपथपवा रहे हों कि उनके चैनल की टीआरपी ज्यादा है, लेकिन दरअसल पत्रकारिता के इतिहास में इन छिछोरों का जिक्र किसी हाशिए पर भी नहीं होना है, यह तय है।
अब तो ढेर सारे दर्शकों को यही नहीं पता है कि कुल कितने न्यूज चैनल हिंदी में चल रहे हैं। जो भी न्यूज चैनल खोलिए तो उसमें खबर कम, हल्ला ज्यादा दिखता है। देश की नीति व दशा-दिशा की तस्वीरें कम, खेल व मनोरंजन के विजुअल ज्यादा परोसे जाते हैं। हद तो ये है कि प्राइम टाइम जैसे समय में ढेर सारे कथित बड़े नाम लोगों को चूतिया बनाते हुए सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट व मनोरंजन की खबरों का खामखा हाईप देकर लोगों को बांधे रखने की कोशिश करते हैं।
खैर, यहां न्यूज चैनलों की मीमांसा करने नहीं बैठा हूं बल्कि पुण्य प्रसून वाजपेयी के सहारा समय छोड़ने की जिस खबर का पता चला है, उसे भड़ासियों तक पहुंचाने में लगा हूं। मैं निजी तौर पर पुण्य प्रसून का काफी सम्मान करता हूं। हालांकि उनसे केवल एक दो बार की चलताऊ मुलाकात है, लेकिन वो व्यक्ति आज भी इतनी ऊंचाई पर होने के बावजूद लोगों से जिस सहजता के साथ मिल लेते हैं, बतिया लेते हैं, उनके फोन काल रिसीव कर लेते हैं, अपने विचार व विजन पर अड़े रहते हैं, पत्रकारिता के तेवर को कायम रखने के लिए लड़ते रहते हैं, उससे जाहिर होता है कि इस व्यक्ति के पास अगर कोई कुर्सी न भी हो तो वो उन सभी से बड़ा और सम्मानीय है, जो कुर्सियों के लिए ही जीते मरते हैं और उसको बचाने में अपनी आत्मा की ऐसी तैसी कराते हैं, पत्रकारिता को भरेचौराहे लतियाकर डस्टबिन में फिंकवा देते हैं।
तो भई पुण्य प्रसून जी, हिम्मत न हारिएगा, परेशान मत होइएगा। आप के साथ हम सारे संवेदनशील और सजग लोग हैं जिन्हें वाकई लगता है कि पत्रकारिता कुछ व्यभिचारियों, छिछोरों की रखैल नहीं है बल्कि इस देश की आम जनता की तकलीफों और दशा-दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाला माध्यम है, जिसे आप बखूबी अपने करियर में कायम रखने में, जीते रहने में, आगे ले जाने में कामयाब रहे हैं।
तुच्छताओं के इस दौर में अगर पुण्य प्रसून जैसे लोग हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि उन्होंने अगर सहारा समय को बाय बाय कहा है तो जरूर इसके पीछे अपने मूल्यों पर टिके रहने की जंग ही होगी, वरना नौकरी बचाये रखने व चलाये रखने के लिए हजार फंडे होते हैं जिसे पुण्य प्रसून जी भी आजमा सकते थे, पर उन्होंने ऐसा न करके, अपनी सोच व समझ के लिए चैनल को ही बाय बाय कह दिया।
और, अगर कोई व्यक्ति किसी संस्थान में सर्वेसर्वा की हैसियत में काम करता है तो जाहिर है कि वहां उसके विरोधी भी होती हैं, जो तमाम आंय बांय सांय अफवाहें फैलाते हैं। इन लोगों की बातों, अफवाहों पर ध्यान न देकर हम तो इतना ही कहेंगे.....प्रसून बाबू, डटे रहिए। भड़ासी आपके साथ हैं। जनता आपके साथ है। आप जल्द ही अपने तेवर के साथ फिर किसी प्रिंट या इलेक्ट्रानिक के जरिए अपनी उपस्थिति की दस्तक दें, यह अपेक्षा है, यह अनुरोध है। होली जमकर खेलिएगा, हम भी खेलने आएंगे, फाग गाएंगे, चैन के दो चार पल जिएंगे......और फिर चल पड़ेंगे जीवन की जंग में अपने विचार के हथियार और अस्त्र-शस्त्र नुकीले करके, आगे बढ़ने। इसी को तो ज़िंदगी कहते हैं।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
5
comments
Labels: अफवाह, इलेक्ट्रानिक मीडिया, खबर, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विश्लेषण, सहारा समय
1.3.08
कीचड़ की होली बस करिए.........
होली का मौसम गया है भड़ास पर ऐसा जिक्र चल ही रहा था कि कुछ फागुन गाया जाए ,गीत गुनगुनाए जाएं कि लोगों को लगने लगा कुछ बवाल हो गया है । भाई लोग इतने समय से जो भी हुआ उसमें नया क्या था ? हम सब भड़ासी नीच, गन्दे, ढीठ, घिनौने, बदबूदार, कमीने, असभ्य, गलीज़ ,छिछोरे वगैरह-वगैरह न जाने क्या-क्या ऐसे हैं जो कि बौद्धिकता के नुमाइंदे नहीं हो सकते । अरे भाई लोग ,ये तो हम सरल सहज भावुक भड़ासियों का सम्मान है ,यही तमगे हैं जो हमारे सीने पर जगमगा कर हमें उस वर्ग से अलग रखते हैं । अब मैं दिल ,फेफड़ों ,गुर्दों ,तिल्ली ,आमाशय आदि(इनमें दिमाग़ शामिल नहीं है) तमाम अंग-उपांगों से यही कहना चाहता हूं कि यशवंत दादा और अविनाश भाई ने जो होली की शुरुआत कीचड़ से करी है अब वह रुके ; अरे भाई कितने सारे रंग हैं क्या साला पूरा मौसम कीचड़ की ही होली खेल कर बिता देना चाहते हैं आप लोग ? बस करो एक दूसरे पर कीचड़ उछालना । भड़ासी तो औघड़ हैं ही तो जिसने एक अंजुरी कीचड़ उछाला तो साले सब चल पड़े उसके ऊपर गटर का ढक्कन खोल कर मलीदा निकाल कर उछालने और छोटे बच्चों की तरह उसी में लोट-पोट होकर खुश होने लगे । अविनाश ,मसिजीवी और मनीषा पांडेय बहन ने बस कीचड़ की अंजुलि भर कर उछाला ही था कि यशवंत दादा ,मुनव्वर आपा ,मनीष (महा)राज , अपने पंडित जी ग्रीन लाइट (हरे प्रकाश) उपाध्याय और मैं खुद दौड़ पड़े ,होली है-होली है का नारा बुलंद करके कीचड़ की टोकरियां लेकर इन सब पर । आज मनीषा दीदी ने मुझे टोका तब होश आया कि यार वाकई और भी रंग हैं भड़ास में जो हम उड़ाकर समां रंगीन कर सकते हैं । आज उनसे मिला तो वे अपने ही अंदाज में एक उंगली से कुछ छिपा कर टाइप कर रहीं थीं मैंने जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि मै यह अपने नाम वाली मनीषा के लिए लिख रही हूं ,जब पूरा हो जाएगा तो खुद ही भड़ास पर भेज दूंगी और मैंने देखा मेरी बहन मनीषा की आंखो में कि वो इन्दौर वाली मनीषा बहन से शायद कुछ प्यार की बात कहना चाह रही हैं तो अब इंतजार है उनकी पोस्ट का कि कब पूरा कर पाती हैं वो अपनी बात.......
अरे मेरे प्यारों तो देर किस बात की है जरा हो जाए क्रांति-भ्रांति-शान्ति की सारी खुशबुओं को होली के रंगों में मिला कर भरपूर-भरपेट मस्ती करने का । अब मैं जरा गब्बर सिंह के अंदाज़ में यशवंत दादा से पूंछता हूं कि कब है होली ? होली कब है ?
मच्छर चालीसा
जय मच्छर बलवान उजागर, जय अगणित रोगों के सागर ।
नगर दूत अतुलित बलधामा, तुमको जीत न पाए रामा ।
गुप्त रूप घर तुम आ जाते, भीम रूप घर तुम खा जाते ।
मधुर मधुर खुजलाहट लाते, सबकी देह लाल कर जाते ।
वैद्य हकीम के तुम रखवाले, हर घर में हो रहने वाले ।
हो मलेरिया के तुम दाता, तुम खटमल के छोटे भ्राता ।
नाम तुम्हारे बाजे डंका ,तुमको नहीं काल की शंका ।
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारा, हर घर में हो परचम तुम्हारा ।
सभी जगह तुम आदर पाते, बिना इजाजत के घुस जाते ।
कोई जगह न ऐसी छोड़ी, जहां न रिश्तेदारी जोड़ी ।
जनता तुम्हे खूब पहचाने, नगर पालिका लोहा माने ।
डरकर तुमको यह वर दीना, जब तक जी चाहे सो जीना ।
भेदभाव तुमको नही भावें, प्रेम तुम्हारा सब कोई पावे ।
रूप कुरूप न तुमने जाना, छोटा बडा न तुमने माना ।
खावन-पढन न सोवन देते, दुख देते सब सुख हर लेते ।
भिन्न भिन्न जब राग सुनाते, ढोलक पेटी तक शर्माते ।
बाद में रोग मिले बहु पीड़ा, जगत निरन्तर मच्छर क्रीड़ा ।
जो मच्छर चालीसा गाये, सब दुख मिले रोग सब पाये ।
बहुत पहले मैंने भी एक मच्छरिया ग़ज़ल (व्यंज़ल) लिखा था. यह मच्छरिया ग़ज़ल कोई पंद्रह साल पुरानी
है, जब मलेरिया ने मुझे अच्छा खासा जकड़ा था, और, तब उस बीमारी के दर्द से यह व्यंज़ल उपजा
था---
मच्छरिया ग़ज़ल 10
मच्छरों ने हमको काटकर चूसा है इस तरह
आदमकद आइना भी अब जरा छोटा चाहिए ।
घर हो या दालान मच्छर भरे हैं हर तरफ
इनसे बचने सोने का कमरा छोटा चाहिए ।
डीडीटी, ओडोमॉस, अगरबत्ती, और आलआउट
अब तो मसहरी का हर छेद छोटा चाहिए ।
एक चादर सरोपा बदन ढंकने नाकाफी है
इस आफत से बचने क़द भी छोटा चाहिए ।
सुहानी यादों का वक्त हो या ग़म पीने का
मच्छरों से बचने अब शाम छोटा चाहिए ।
------.
गर्मी बढ़ रही है, और नतीजतन मच्छरों की संख्या भी. मेरा घर, मेरा शहर मच्छरों से अंटा-पटा पड़ा
है. इंटरनेट पर कितने मच्छर हैं? मैंने जरा मच्छरों को इंटरनेट पर ढूंढने की कोशिश की- परिणाम ये
रहे-
गूगल पर 4500
और याहू! पर 12000 से ऊपर!
अब समझ में आया, माइक्रोसॉफ़्ट, याहू पर क्यों निगाहें डाले बैठा है! और, हम याहू! से क्यों दूर रहते
हैं? मच्छरों की भरमार जो है!
Posted by
रमेश शर्मा
1 comments
’हिन्दी-ग़ज़ल‘ को ग़ज़ल से भिन्न विधा मानें
आम तौर पर पारंपरिक उर्दू साहित्य के लोग हिन्दी ग़ज़ल को हीन दृष्टि से देख नाक भों सिकोड़ते हैं।
उनके पास ग़ज़ल को मापने का जो पैमाना है उसके अनुसार वे ठीक ही करते हैं। किंतु उनके इस नाक भों
सिकोड़ने के बाद भी आज हिंदी ग़ज़ल दूधों नहा कर पूतों फल रही है, हाँ रही बात अच्छी बुरी की,
सो बड़े से बड़े शायर की भी सभी रचनाएँ एक जैसी श्रेष्ठता नहीं रखतीं तथा हर भाषा के लेखकों में
स्तर भेद विद्यमान है आप किसी भाषा के खराब साहित्य को नमूने के तौर पर रख कर यह नहीं कह
सकते कि यदि इस भाषा में लिखोगे तो ऐसा ही साहित्य निकलेगा।
वैसे तो ग़ज़ल भारतेन्दु हरिश्चन्द, मैथिली शरण गुप्त और निराला ने भी लिखी हैं तथा पंडित रघुपति
सहाय फ़िराक़ तो निराला को छोड़ कर बाकी के हिन्दी लेखकों को माँ बहिन की गालियों के साथ
याद करते थे। उनका कहना था कि उर्दू की जूतियों के चरमराने से जो आवाज़ आती है वह हिन्दी है।
हो सकता है किसी समय उनकी बात सही रही हो और खड़ी बोली किसी की मातृभाषा न होने के का
रण ऐसी बनावटी भाषा लगती रही हो जिसमें दिल की बात करना अस्वाभाविक लगने के कारण
उसकी कविता प्लास्टिक के फूलों जैसी लगती हो, किंतु खड़ी बोली वाली हिंदी आज लाखों लेागों की
मातृभाषा बन चुकी है और वे इसी में पैदा होने के साथ साथ इसी भाषा में हँसने रोने लगे हैं। किसी
भी भाषा के विकास में कुछ समय तो लगता ही है तथा खड़ी बोली को खड़े हुये अभी समय ही कितना
हुआ है? सच तो यह है कि हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी कविता की केन्द्रीय विधा तब ही बन सकी जब खड़ी
बोली ने लाखों लोगों के दैनिंदिन जीवन में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया।
बलवीर सिंह रंग, रामावतार त्यागी आदि ने दुष्यंत कुमार से भी पहले देवनागरी में हिंदुस्तानी भाषा
की ग़ज़लें लिखना प्रारंभ कर दिया था पर इस विधा की हिंदी ग़ज़ल के रूप में पहचान दुष्यंत की लो
कप्रियता के बाद उसी तरह की ग़ज़लों की बाढ़ आने के बाद ही हुयी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि
पहली बार इस विधा को पुराने पैमाने पर नाप कर इसे खारिज करने के प्रयास भी हुये। इन प्रयासों
में उसकी लोकप्रियता को नज़रअन्दाज़ किया गया। किसी भी लोकप्रिय विधा को आलोचक की छुरियाँ
मार नहीं सकतीं अपितु कई बार तो उसकी लोकप्रियता के आगे वे छुरियाँ ही भोंतरी हो जाती हैं।
हिन्दी ग़ज़ल के साथ भी ऐसा ही हुआ। साहित्य की सभी विधाएँ क्रमशः विकसित हुयी होंगीं और
अपनी स्थापना के लिए सभी को पहले पहले ऐसे ही अस्वीकार के वाण झेलने पड़े होंगे।
ये नई ग़ज़ल पारंपरिक ग़ज़ल के बहर वज़न रदीफ़ काफ़िये मतले मक़्ते के नियमों का लगभग वैसा ही
उल्लंघन कर रहीं थीं जैसा कि छंद मुक्त कविता वालों ने कभी छंद का किया था। पर इन लोगों की ये
रचनाएँ लोगों को पसंद आयीं व जिस छंदमुक्त नई कविता ने आम हिंदुस्तानी को कविता से दूर कर दि
या था उसकी रुचियाँ फिर से कविता की ओेर लौटीं। उर्दू की परंपरागत ग़ज़ल के नियमों का उल्लंघन
करने वालों ने भी आलोचकों की आपत्तियों को विनम्रतापूर्वक स्वीकारते हुये अपनी इन ग़ज़ल जैसी
रचनाओं का नया नामकरण किया। हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार नीरज ने इसे गीतिका कहा तो किसी
हास्यकवि ने उसे हजल का नाम दिया। व्यंगकारों ने उसे व्यंग़ज़ल कहा तो किसी ने उसे सजल कह दिया
। पत्र पत्रिकाओं ने इसे आमतौर पर देवनागरी में लिखी ग़ज़ल ही मानते हुये ग़ज़ल या हिन्दी-ग़ज़ल का
नाम देकर ही छापा। छन्दमुक्त नई कविता की तरह इसका कोई फार्म तय नहीं हुआ और यह हर तरह
के आकार प्रकार में ढल कर सामने आयी तथा दो तुकांत पंक्तियों के पाँच सात शेर नुमा जोड़ों को हि
न्दी ग़ज़ल माना गया। यह देवनागरी में हिन्दी भाषा के शब्दों के आधिक्य वाली 'ग़ज़ल' नहीं थी
जैसेी कि कुछ लोगों को गलतफहमी है। ये ग़ज़लनुमा वे काव्य रचनाएँ हैं जो केवल कथ्य के आधार पर ही
अपनी सफलता के सूत्र खेाजने बेसहारे खुले में निकल आयीं व जिन्दा बनी हुयी है। ऐेसी असुरक्षित दशा
में इसका जिन्दा बने रहना इस बात का प्रमाण है कि इसमें जनभावनाओं के साथा एकाकार होने की
ताकत है तथा सरकारी प्रोत्साहन, पुस्तकाकार प्रकाशन, और पुरस्कार के लालची टुकड़ों के बिना भी
यह अपना अस्तित्व बचाये हुये है।
मुझे लगता है कि उर्दू ग़ज़ल के बारे में भरपूर ज्ञान होने और उस सन्दर्भ में लम्बी चर्चाओं के बाद दुष्यंत
कुमार ने पूरे विश्वास के साथ इस क्षेत्र में अपने कदम रखे होंगे। यह बात न केवल 'साये में धूप' की
उनकी भूमिका से ही प्रकट होती है अपितु उनके अनेक शेर भी आलोचनाओं के उत्तर देते से लगते हैं। भूमि
का के अंश देखिये-
"कुछ उरदू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि
शब्द 'शहर' नहीं होता है 'शह्र' होता है, वज़न नहीं होता है वज़्न होता है।
-कि मैं उर्दू नहीं जानता लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया
है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिख कर इस दोष से मुकित
पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है जिस रूप में वे हिंदी में घुलमिल गये
हैं।.............इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।
- कि ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य
रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक
कवियों ने इस विधा को आजमाया है। परंतु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बाबजूद इस विधा
में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण
ये है कि पत्र पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़ कर और सुनकर विभिन्न वादों, रुचियों और
वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्मविश्वास दि
या है।''
यदि हम दुष्यंत को आज की हिंदी ग़ज़ल का अग्रदूत मानते हैं तो उपरोक्त पंक्तियों को इस विधा के
सूत्र मान सकते हैं जिनके अनुसार बोलचाल व व्यवहार की भाषा का प्रयोग व कथ्य के आधार पर
सम्प्रेषणीयता और जनप्रियता ही इसके प्राण तत्व हैं। उनके ही कुछ शेर देखें-
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
दुष्यंत की ग़ज़लें एक जनआंदोलन के लिए साथ जनता के साथ एकाकार होती उनके गले से लिपटती ग़ज़लें हैं-
मुझ में रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है
और इस आंदोलन के लिए ग़ज़ल की भूमिका का औचित्य बताते हुये वे कह रहे हैं -
सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होती नहीं
वे नितांत व्यक्तिगत दर्द तक केन्द्रित ग़ज़ल के शायर नहीं हैं अपितु उनकी ओढ़ने बिछाने
वाली ग़ज़लें हवाओं में घुल कर भी साँसों के द्वारा जीवन के साथ मिलती हैं-
जिन हवाओं ने तुझको दुलराया
उनमें मेरी ग़ज़ल रही होगी
उनकी ग़ज़लें ऊँघे हुये लोगों में चेतना के लिए भी काम करती हैं-
अब तड़फती सी ग़ज़ल कोई सुनाये
हमसफर ऊँघे हुये हैं अनमने हैं
उनकी ग़ज़लें फार्म की जकड़बन्दी को तोड़ कर स्वतंत्र रूप से व्यवहार करना चाहती है क्योंकि सिर्फ
हंगामा खड़ा करना उनका मकसद नहीं है अपितु वे सूरत बदलना चाहते हैं इसलिए कहते हैं कि-
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं हैं आदमी हम झुनझुने हैं
वे पुराने ग़ज़लकारों पर व्यंग्य करते हुये नये लोगों को सावधान करते हुये कहते हैं कि-
इस दिल की बात कर तो सभी दर्द मत उड़ेल
अब लोग टोकते हैं कि ग़ज़ल है कि मर्सिया
हिन्दी ग़ज़ल के पितृ पुरूष के ये सीधे संवाद करते शेर हिन्दी ग़ज़ल की भूमिका हैं जो उसे पुरानी ग़ज़ल से
अलग करते हुये एक नई विधा का रूप देते हैं भले ही वह किसी भी लिपि में लिखी गयी हो।
Posted by
रमेश शर्मा
0
comments
कुछ तो शरम करो भडास बंद करने वालों
सदियों से यही होता आ रहा है ..आज आप लोग ऐसा कर रहे हैं तो कौन नयी परिकल्पना,नए प्रतिमान को साकार कर रहे हैं....नई परिकल्पनाएं तो वे कर रहे हैं जो भारत की असली आबादी है जिनकी मज्बुरिआं आपके अस्तित्व को सहेजे खडा है ये वो आबादी है जो तुम्हारी तरह जीने का नाटक नही कर रही है। भले ही ये तुम्हारे नजरों में जाहिल,गंवार,मूर्ख और उपेक्षित हैं लेकिन ये जानते हैं की जड़ता और यांत्रिकता के मोहपाश से निकलने के बाद से ही वास्तविक जीवन प्रारम्भ होता है। ये तुम्हारी तरह प्रतिरोध,गतिरोध एवं विषैली रणनीति का हितैषी इसलिए नही बनना चाहते हैं क्योंकि ये भली भांति जानते हैं की समाज को बदलना है तो सबसे पहले मनुष्य को बदलना होगा और शक्ति की अराजकता जैसा तुमलोग कर रहे हो ठीक उससे इतर यह जाहिल शक्ति के संयम एवं संतुलन का हितैषी है। तुम लेने के पक्षधर हो तो ये देने को अपना सर्वस्व मानते हैं। क्योंकि ये जानते हैं की मेरे भीतर जो घाट रहा है उसे बांटना है,जो गीत घटा है उसे गा देना है,जो शोक घटा है उसे रो देना है,जिन पलों को जी चुके हैं उनको बाँट देना है ...ये बांटते जाओ बढ़ता जाएगा में यकीं रखते हैं क्योंकि उसे रोक दो वह रुक जाएगा ,तुम्हारा सत्य सड़ना शुरू हो जाएगा,दुर्गन्ध आने लगेगी जैसा तुम्हारे स्थिर सत्य से आ रही है। तो तुम इनके सत्य को स्वीकार करने का साहस नही कर सकते हो क्योंकि सत्य को ग्रहण करने में चोट पड़ते हैं और तुम लोगों ने यह धारणा बना लिए हो की सत्य,ज्ञान और विद्वता तथा समाज की प्रगति का गूढ़ रहस्य सिर्फ़ तुम्हारे पास है,तुम्हे सत्य कौन दिखला सकता है?यहाँ तुम्हारा अहम् वल्वती हो जाता है । तुम अपने आवरण से बाहर निकलने का साहस नही कर पाते हो .अगर कोई तुमसे कहे की वह शरीफ है तो तुम सौ बार पता लगाओगे...लेकिन कोई यह कहे की वह चोर है तो तुम और तुम्हारा अंहकार तृप्त होता है तुम्हे सुख मिलेगा की चलो हम अकेले चोर तो नही हैं सामने वाला भी चोर है।
Posted by
Anonymous
1 comments
एक कविताः सुन ले, ओ बे मठाधीश और मठाधीश के चिलांडु...
(((इस पोस्ट के ठीक नीचे पोस्ट है, साथी पंकज पराशर ने कई उदाहरणों के जरिये बताया है कि ब्लागिंग के जो मठाधीश आज भाषा के नाम पर भड़ास पर पाबंदी की बात कर रहे हैं, दरअसल उनकी चले तो काशीनाथ का अस्सी का मोर्चा कभी छपे ही नहीं और छप भी जाए तो काशीनाथ को इस जुर्म में फांसी पर लटका दिया जाए। मैं पंकज जी की पोस्ट पर कमेंट करने गया तो गद्य ने पद्य की शक्ल अख्तियार कर ली और बन कई एक कविता, बिलकुल धारधार, मठाधीशी के खिलाफ।
दरअसल मठाधीश कोई एक व्यक्ति नहीं होता, वह ट्रेंड होता है, वह संस्थान होता है, वह बीमारी होती है, वह माफिया होता है। और उसे समझने के लिए आपको थोड़ी अक्ल लगानी पड़ती है पर इनकी पहचान बहुत जल्दी हो जाती है।
ब्लागिंग के मठाधीश और उनके कुछ चिलांडुओं पर जो कविता बन पड़ी है जो नीचे पंकज पराशर वाली पोस्ट में कमेंट के रूप में भी लिखा है, उसे थोड़ा और बड़ा करते हुए और ठीक करते हुए एक अलग पोस्ट के रूप दे रहा हूं। अच्छा लगे तो कमेंट में वाह वाह कर दीजिएगा, बुरा लगे तो गरिया दीजिएगा....जय भड़ास, यशवंत.....)))
मठाधीशों के पास आत्मा नहीं होती,
आत्मा होने का नाटक होता है,
मठाधीशों के पास तर्क नहीं होता,
तर्क होने का नाटक होता है,
मठाधीशों का कोई सरोकार नहीं होता,
सरोकार होने का नाटक होता है,
मठाधीशों के पास व्यक्तित्व नहीं होता
व्यक्तित्व होने का नाटक होता है
और नाटकों से बने इन नाटकीय व्यक्तित्वों को
....
साहित्य
समझ
संस्कृति
सोच
सिनेमा
रेडियो
थिएटर
विचारधारा
सरोकार
....
से बस इतना लेना देना होता है कि
इनकी मठाधीशी और फैले
बोले तो
इनकी पल्लगी करने वाले और बढ़ें
इनको ढेर सारे पुरस्कार मिलें
इनका हर जगह नाम लिया जाए
इन्हें हर कोई सराहे
इनका हर कहा माना जाए
ये जहां जाएं तो लोग इन्हें सजदा करें
ये जो बोलें उसे संस्कृति का बोल माना जाए
ये जो सोचें उसे राष्ट्रीय सोच माना जाए
इनके कदम जिधर चलें, उधर ही आंदोलन शुरू हो जाएं
ये जब सोएं तो दुनिया शांत रहे
ये जब हगें तो दुनिया पानी लेकर खड़ी रहे
ये जब मूतें तो लोग वाह वाह करें
ये जब सलाह दें तो उसे आदेश माना जाए
ये जिसे चाहें बंद करा दें, जिसे चाहें आजाद करा दें
ये मठाधीश हैं, ये चिलांडु हैं
जो अपने घर में गंदगी फैलाए रहें, इनकी मर्जी
पर दूसरे के घरों में घुसकर अरेस्ट वारंट दिखाते हैं
उन्हें तहजीब और नसीहत सिखाते हैं
उन्हें जीने का ढंग और भाषा की समझ बताते हैं
ये सरोकारों के नाम पर खुद को विद्वान
और बाकी विद्वानों को चूतिया मानते हैं
...................
ऐसी ढेरों कामनाओं, भावनाओं, तावनाओं, खावनाओं....से अंटे बसे इन लोगों को
भइया या तो आइना न दिखाओ
या जब दिखाओ तो खुल के गरियाओ
और कह दो
कुत्तों....सूअरों....बिल्लियों.....
तु्म्हारे बौद्धिक मैथुन से हम स्खलित नहीं होंगे
वरन हम तुम्हारे मुंह को ही तोड़ देंगे
जिसका तुम लिंग के रूप में
इस देश की भाषा और जनता के पिछवाड़े
अनाम नाम से, स्याह अंधेरे में
और कभी कभी तो दिनदहाड़े
इस्तेमाल कर रहे हो....
तेरी गंदी सोच, विकृत मानसिकता और अंधी हो चकी संवेदना पर हम थूकते हैं
सुन ले ओ बे मठाधीश
और मठाधीश के चिलांडु
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
5
comments
कल खोई थी नींद जिससे मीर ने, इब्तिदा फिर वही कहानी की
Posted by
Pankaj Parashar
2
comments
कौन हैं ये लोग और अभी तक क्यों हैं
अविनाश, इरफान और प्रमोद सिंह - कौन हैं ये लोग और अभी तक क्यों हैं ?
Posted by
अनिल सिन्हा
3
comments
ब्लागिंग के मठाधीश को एक धक्का और दो, उसके कच्चे चिट्ठे को खोल दो
ब्लागिंग को अपने उंगलियों पर नचाने की महत्वाकांक्षा रखने वाले मठाधीशों के खिलाफ भड़ास द्वारा शुरू की गई जंग रंग दिखाने लगी है। मठाधीशों के सरगना अविनाश ने जंग की पहल खुद की। भड़ास पर बैन लगाने संबंधी मांग करते हुए एक पोस्ट अपने ब्लाग पर डाली। उसने न सिर्फ अपने ब्लाग पर डाली बल्कि कुछ चिलांडुओं के साथ बैठकर साजिश भी की और उन्हें भी उकसाया कि वे भी एक साथ अपने अपने ब्लागों पर भड़ास को बैन करने संबंधी पोस्ट डालें। मुझे चिलांडुओं से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि सारा खेल सरदार करता है। और सरदार है अविनाश। जिसने अपने पूरे करियर में सिर्फ अवसरवादिता और महत्वाकांक्षा का खेल खेला है और वही खेल दुहराकर ब्लागिंग का शहंशाह बन जाने क भ्रम पाल बैठा है। उसने अपने करियर में दोस्तों, मित्रों और विचारधारा का सिर्फ और सिर्फ अपने करियर के ग्रोथ के लिए इस्तेमाल किया। उसी महत्वाकांक्षा और मठाधीशी को बढ़ाने के इरादे से भड़ास को खत्म करने की सद्दाम हुसैनी साजिश रच डाली। पर इतिहास गवाह है कि सद्दाम हुसैन का क्या हश्र हुआ? उसे अंत में गुफा में छिपना पड़ा और फांसी पर लटकना पड़ा। हम तो ये नहीं चाहते कि किसी को फांसी हो पर हम चाहते हैं कि वो अपनी करतूतों को भड़ास के आइने में देखकर खुद अपने से शर्मा जाए और घृणा करने लगे।
जब उसने पहली गलती की भड़ास को बैन करने संबंधी पोस्ट अपने ब्लाग पर डालने की तो भड़ास ने इसका करारा जवाब देते हुए उसके ब्लाग को भी बैन करने की मुहिम चलवाई क्योंकि उसने महिलाओं पर गंभीर बहस का नाटक कर एक कुत्सित और अश्लील तस्वीर अपने ब्लाग पर लगा रखी है। साथ ही हमने अविनाश के भड़ास विरोधी अभियान के पीछे असली वजहों का खुलासा कर दिया। इससे बौखलाकर अविनाश ने एक और बड़ी गलती कर दी है जो अब उसके गले की फांस बनने वाली है।
ये दूसरी गल्ती यह कि उसने अपने ब्लाग पर मेरे खिलाफ अनाम माने एनानिमस नाम से ऐसी बातें खुद लिख डालीं हैं जिसे थोड़ी भी गैरत वाला व्यक्ति अपने ब्लाग पर न तो लिख सकता है और न पब्लिश कर सकता है। पर अविनाश जैसे गिरे हुए इंसान, धूर्त आदमी, मक्कार व्यक्ति और मठाधीशी की महत्वाकांक्षा पाले व्यक्ति से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हालांकि उसने मुझसे निजी चैट में माफी मांगी है इस हरकत पर और उसने कबूल किया है कि ये अनाम कमेंट उसी ने लिखे हैं क्योंकि वह नाराज था। (देखें नीचे चैट वाली पोस्ट)।
पर उसे यह नहीं पता कि वो अगर नरक में गिरकर जंग लड़ना चाह रहा है, बिलो द बेल्ट प्रहार कर लड़ाई लड़ना चाह रहा है अनाम नाम से तो हम वहीं नरक में पहुंचकर अनाम नाम से नहीं बल्कि खुद के नाम से जंग लड़ेंगे और उसकी गर्दन को दबोचेंगे। उसकी मठाधीशी की महत्वाकांक्षा को तो तार-तार करेंगे ही, उसके जीवन के सारे कूड़े कचड़े को सरेआम कर देंगे। इसी मिशन के तहत भड़ास ने मुहिम शुरू की है। नीचे लिखी एक पोस्ट में, जिसमें मैंने आपसे अपील की है कि अगर आप अविनाश से किसी भी तरह प्रताड़ित या दुखी रहे हैं, तो मुझे फोन करिए, सारी बातें नोट कराइए, या मेरी मेल आईडी पर खुद लिखकर मेल कर दीजिए, इन सारे कच्चे चिट्ठों को कल दो मार्च से सिरीज में प्रकाशित करेंगे।
मेरे पास कुछ साथियों के मेल आए हैं। मैं उनका आभार प्रकट करता हूं और उनकी हिम्मत की दाद देता हूं जो उन्होंने अपने नाम से ही अविनाश की करतूतों को, जो मेल से मेरे पास भेजा है, छापने का अनुरोध किया है। ऐसे बहादुर इंसानों की एकता की बदौलत ही झूठ की नींव पर खड़े मोहल्लों का नाश कर देंगे।
तो दोस्तों, ब्लागिंग के मठाधीश को एक धक्का और दो...के अभियान में आप सभी को आमंत्रण भेजता हूं। आप चाहें जिस धर्म, जाति, क्षेत्र, विचारधारा या संप्रदाय से जुड़ें हों, अगर आप सिर्फ एक मुद्दे, ब्लागिंग के मठाधीश अविनाश को नेस्तनाबूत करना, के अभियान में भड़ास का साथ देना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है। मुझे आपके मेल, आपके सुझाव, आपके गाइडेंस का इंतजार रहेगा।
अगर आप कुछ लिखना कहना चाहते हैं तो पहले मुझे मेल करें ताकि उसे मठाधीश को नेस्तनाबूत करने के अभियान की सीरिज वाली पोस्टों का पार्ट बना सकूं।
मेरी मेल आईडी है yashwantdelhi@gmail.com
जय भड़ास
यशवंत सिंह
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
1 comments
Labels: अविनाश, नेस्तनाबूद, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीशों से पंगा
अतिमहत्वाकांक्षी अविनाश की मठाधीशी के खिलाफ भड़ास का अभियान, आप साथ दें....!!!
अविनाश की शक्ल के पीछे छिपे काले दिल का खुलासा करने जा रहे हैं हम। भड़ास ने अपने खिलाफ छेड़े गये सुनियोजित जंग को स्वीकार कर लिया है। इसी के तहत अविनाश से किए गए निजी चैट को सार्वजनकि कर दिया है, जैसा कि अविनाश की आदत रही है। और ये आदत जन्मी है अतिमहत्वाकांक्षा की बीमारी के कारण। ये बीमारी जिसे लग जाती है वो दीन, धरम, ईमान, मित्र, नैतिकता, सगे, संबंधी, देश, समाज, विचारधारा...सबको भूलकर सिर्फ और सिर्फ अपना लाभ, अपना नाम, और अपना पैसा देखता, जोड़ता, गिनता, गुनता है। इसीलिए जैसे को तैसा अंदाज में अविनाश से हुए चैट को सार्वजनिक कर दिया गया है जिसमें उसने भड़ास पर प्रतिबंध की बात से इनकार किया है और क्षमा भी मांगी है।
लेकिन अविनाश, तुमने जो खेल बहुत लोगों से खेला है, वही दाव यहां आजमाना चाह रहे थे, तो वो अब तुम्हें महंगा पड़ेगा। जिस मनीषा पांडेय के पैरोकार बनकर तुमने भड़ास पर पाबंदी लगाने की बात कही, उसी ने तुम्हें कहा कि तुम तो सबसे गये गुजरे हो जो निजी चैट को सार्वजनिक कर दिया।
तुम्हारे ब्लाग से विस्फोट के संजय तिवारी ने खुद को अलग कर लिया। अनिल रघुराज ने अलग करने का तुमसे अनुरोध किया है। बोधिसत्व समेत ढेर सारे ब्लागरों ने भड़ास पर पाबंदी के खिलाफ तुम्हारे अभियान से अलग होकर भड़ास को नैतिक समर्थन दिया है।
सवाल यहां भाषा, या शील, अश्लील का नहीं, भड़ास तुम्हारी दादागिरी और तुम्हारे आत्मकेंद्रित, स्वार्थी और दादागिरी वाले अंदाज का है, जिसे अब बिलकुल नहीं चलने दिया जाएगा। तुम्हारे अतीत के सारे कच्चे चिट्ठे भड़ास पर दो मार्च से डाला जाएगा। सिरीज में। पार्ट वन से लेकर पार्ट टेन तक। तुमने रांची से लेकर पटना तक और फिर दिल्ली तक किससे क्या क्या धोखाधड़ी की, किससे कब कब स्वार्थ सिद्ध किया, सब कुछ बताया सुनाया जाएगा।
अब जो हवा चल पड़ी है, वो रुकेगी नहीं क्योंकि हम शरीफों को तुमने छेड़ा है जो अपनी खोल में मस्त रहने के आदी थे, हैं और रहेंगे। यहां भोले शंकर की बारात है जिसे कल क्या होगा, कोई चिंता नहीं।
चलो, तुम थोड़ा अपनी करनी-कथनी पर सोच लो, फिर दो मार्च से मिलते हैं.....
मैं उन सभी ब्लागर साथियों, पाठकों, पत्रकारों, साहित्यकारों से अपील करता हूं कि अगर आपके मन में अविनाश की दादागिरी को लेकर कोई पेंच, कोई दुख, कोई सदमा है तो हमें जरूर बताएं। अगर आप चाहते हैं कि आपका नाम न छपे तो हम अनाम नाम से आपकी बात को छापेंगे। यहां किसी विचारधारा की बात नहीं, किसी निजी हित-अहित की बात नहीं, यहां बात ब्लागिंग में अविनाश की मठाधीशी के खिलाफ के अभियान की है, जिसे भड़ास नेतृत्व प्रदान कर रहा है। यह एक मौका है जिसमें आप सभी को भड़ास आमंत्रित कर रहा है, अपनी बात रखने के लिए। आप भड़ास से असहमत हो सकते हैं, हमारीर भाषा पर सवाल उठा सकते हैं लेकिन इसके बावजूद अगर आप तानाशाही के खिलाफ हैं, आप अवसरवादिता के खिलाफ हैं, आप स्वार्थसिद्धि के खिलाफ हैं तो हमसें हाथ मिलाएं। यह मौका है अविनाश को सबक सिखाने का।
आप अपनी बात मुझे YASHWANTDELHI@GMAIL.COM पर भेज सकते हैं। आप अगर अनुरोध करेंगे तो आपका नाम गोपनीय रखा जाएगा, यह मेरा निजी वादा है।
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
2
comments
Labels: जंग, पाबंदी मुहिम, भड़ास, मठाधीशों के खिलाफ मोर्चा
मोहल्ला पर गंदी तस्वीर, इसे बैन कराने को गूगल से शिकायत करें
भड़ासियों के लिए एक काम...
दो ब्लागरों मोहल्ले के अविनाश और टूटी हुई बिखरी हुई के इरफान ने भड़ास पर पाबंदी लगाने की मुहिम शुरू कर दी है। ये कथित प्रगतिशील साथियों की ब्लागिंग में मठाधीशी टूटती हुई दिख रही थी तो इन्होंने अभद्र और अश्लील भाषा के नाम पर भड़ास की आवाज को कुचलने की मुहिम छेड़ दी है। इन लोगों ने भड़ास पर पाबंदी लगाने के लिए गूगल और ब्लाग एग्रीगेटरों तक अपने अभियान को पहुंचाना शुरू कर दिया है। अगर इनका वश चले तो ये मंटो, इस्मत आपा, धूमिल पर भी पाबंदी लगा दें और इनकी रचनाओं को सामने न आने दें क्योंकि इन लोगों ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है।
तो दोस्तों, कभी स्वतंत्रा और अभिव्यक्ति की पैरोकारी करने वाले इन साथियों को करारा जवाब देना बहुत जरूरी है। इनकी मठाधीशी इस बार सदा के लिए खत्म हो जाए, इसके लिए आप इन दोनों ब्लागों के आपत्तिजनक कंटेंट को देखें, इसके लिए नीचे इनके ब्लाग की शिकायत गूगल से करिए।
((असल मुद्दा कोई मनीषा या अश्लीलता नहीं है, ब्लागिंग के इन कथित प्रगतिशील मठाधीशों की मठाधीशी को चैलेंज करना है। पिछले दिनों भड़ास में अविनाश के सीडीएस के मीटिंग में जाने को लेकर जो टिप्पणी अफलातून जी ने की थी भड़ास पर उसे मैंने पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर दिया, जो अविनाश को नागवार गुजरा और उन्हें पूरी सफाई देनी पड़ी। इसी तरह मोहल्ले पर इरफान ने एक पोस्ट में भड़ास और उनके ब्लाग की रेटिंग को लेकर भड़ास को दोयम बताते हुए टिप्पणी की थी जिसके जवाब में मैंने भड़ास पर इरफान को कहा था कि कृपया ऐसी राजनीति न खेलें। इससे इन मठाधीशों को ये पता चल गया कि दरअसल भड़ास इनके खांच में फिट नहीं हो रहा, और इन पर सवाल भी उठाता रहता है, तभी से ये दोनों मौके की ताक में थे। और भाई प्रमोद जी तो शामिल बाजा हैं, जिधर प्रगतिशील बैंड पार्टी को बाजा बजाने का ठेका सट्टा मिल जाए, उधर जाकर पों पों पें पें हें हें बजाने लगते हैं, ईश्वर उन्हें और उनके ब्लाग को माफ करे।))
गूगल को गंदी तस्वीरें प्रकाशित करने वाले मोहल्ला व टूटी हुई बिखरी हुई के बारे में बतायें, इसके लिए आप नीचे लिखे लिंक को क्लिक करें...
गूगल को गंदी तस्वीरें प्रकाशित करने वाले मोहल्ला व टूटी हुई बिखरी हुई के बारे में रिपोर्ट
उपरोक्त लिंक पर क्लिक करेंगे तो वो उस गंदी साइट का यूआरएल मांगेगा जिसे आप नीचे दिए गए यूआरएल को कापी करके डाल दें, फिर सबमिट बटन दबा दें....यूआरएल इस प्रकार है...
http://tooteehueebikhreehuee.blogspot.com/2008/02/blog-post_19.html
ये तो हुआ टूटी हुई बिखरी हुई ब्लाग की गंदगी के बारे में रिपोर्ट, उसके बाद मोहल्ले की गंदगी को रिपोर्ट करने के फिर उपरोक्त गूगल के लिंक पर क्लिक करें और अब मोहल्ले का यूआरएल डाल कर सबमिट बटन दबा दें..., मोहल्ले का यूआरएल इस प्रकार है...इसे नीचे से कापी करके उपरोक्त लिंक में डाल दें...
http://mohalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_2166.html
जय भड़ास
यशवंत
Posted by
यशवंत सिंह yashwant singh
0
comments
Labels: आरोप, पाबंदी मुहिम, फ्लैग ब्लाग, भड़ास
हास्य कविता :प्रतियोगिता
हास्य कविता :प्रतियोगिता
मित्रो,होली के अवसर पर आप सभी कलम उठाइए , लिखा भेजिए एक छोटी सी हास्य रचनामध्य-प्रदेश लेखक संघ, जबलपुर की और सेप्रथम तीन विजेता प्रतिभागीयों को क्रमश: 300/- , 200/- तथा 100/- की पुरूस्कार राशी एक एक प्रशस्ति पत्र भेजा जावेगा। 10 प्रतिभागी भी सम्मानित होंगे,नियम:
रचना की मौलिकता ज़रूरी होगी,
स्पष्ट पता -मेल आई डी , तथा मौलिकता की घोषणा पत्र , रचना के साथ संलग्न हों।
कविता ए-फॉर आकार के पेज से अधिक लम्बी होने पर प्रतियोगिता से हटाने का अधिकार निर्णायक मंडल का होगा
व्यक्तिगत आक्षेप न हों
एक रचना कार एक रचना ही भेज सकते हैं,
यूनीकोड पर टंकित कर ने इस लिंक का सहारा लीजिये => http://www.google.com/transliterate/indic
तथा रचना/प्रविष्ठी girishbillore@gmail.com पर मेल करिए
अन्तिम तिथि:- १०/०३/२००८
गिरीश बिल्लोरे "मुकुल "
Posted by
Girish Billore Mukul
0
comments
Labels: कविता, जबलपुर, प्रतियोगिता, म०प्र०, लेखक, संघ, हास्य, होली
