Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

7.7.08

धर्मांधता अंततः महंगी ही पड़ेगी-2

दोस्तों, कल चूँकी बात अधूरी रह गई थी इसलिए पुनः हाजिर हूँ। बात धर्म और उसके प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रयासों की हो रही थी। धर्म गुरूओं ने तो शायद इतना कोहराम नहीं मचाया होगा जितना कि उनके अनुयायियों ने मिलकर मचा दिया, तो बात आगे बढ़ाई जाए.....।अपनी ऊपर कही हुई बात में दो लाइन और जोड़ना चाह रहा हूँ कि..... बुद्ध ईश्वर के मामले में पूरे समय चुप्पी ही लगाए रहे। हाँ, उन्होंने किसी भी प्रकार के भगवान की मूर्तियों का जमकर विरोध किया और मूर्तिपूजा का भी विरोध किया। अभी कुछ साल पहले मैंने पढ़ा कि संसार में सबसे अधिक गौतम बुद्ध की ही प्रतिमाएँ हैं और उनमें से ज्यादातर की पूजा भी होती है। धन्य हैं समझाने वाले, और धन्य हैं उनसे समझने वाले.....। तो दोस्तों, सारे धर्मों की बात हमने कल ही कर ली थी। तो कुछ दिन पहले मैंने एक खबर पढ़ी थी कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने यह घोषणा की है कि हमें अपने सौरमंडल की परिभाषा वापस से तय करनी होगी। पहले इस सौरमंडल में 9 ग्रह थे। प्लूटो को बेदखल करने के बाद अब इसमें 8 ग्रह रह गए हैं। प्लूटो के लिए नई श्रेणी बना दी गई है। उसका नाम प्लूटोइड रखा गया है और उसमें कुछ अन्य तारे और ग्रह जोड़े जाएँगे। तो वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके पास अब नए उपकरण आ गए हैं और वे बेहद अत्याधुनिक हैं, ऐसे में वर्तमान सौरमंडल अब छोटा पड़ने लगा है और उन्हें दूर तक दिखाई देने लगा है। तब फिर नए सौरमंडलों के बारे में हमें जल्दी ही पता चलेगा और साथ ही पता चलेगा हमारी लघुता का। अब पृथ्वी की हमारे सौरमंडल में ही मझोली औकात है। यानी वो तीन ग्रहों से बड़ी है और अन्य से छोटी। और जो विकट बड़ा सूर्य है उससे कई हजार गुने बड़े तारे भी खोजे जा चुके हैं। तो साहब सर्वशक्तिमान ईश्वर ने ही इन सबकी रचना की है ना (ऐसा मैं तो मानता हूँ, शायद आप सब लोग भी मानते होंगे)। तो उस विकट ब्रह्माण्ड को रचने वाले ईश्वर को क्या इतनी फुरसत रहती है कि वो पृथ्वी जैसे तुच्छ ग्रह का विशेष रूप से ख्याल रखे। और चलो मान लेते हैं कि उसे इतनी फुरसत है तो क्या वह यह भी चाहता है कि किसी धर्म विशेष के लोगों का इस संसार यानी पृथ्वी पर राज हो जाए। धन्य है हमारी सोच, इतना छोटा सोचते हैं। लोगों को अपने पड़ौस और मोहल्ले के बारे में पूरा पता नहीं रहता लेकिन वो लगे रहते हैं अपने धर्म की पताका पूरी दुनिया में फहराने के लिए। और अगर मेरी बातें गलत हैं तो शायद पृथ्वी का ईश्वर अलग होता होगा, बाकी ब्रह्माण्ड का अलग। हालांकि मैं अकेले उस पृथ्वी वाले ईश्वर को नहीं जानता। हाँ, मैं उस ईश्वर को जरूर जानता हूँ जो ब्रह्माण्ड में हो रहे विस्फोटो को आतिशबाजी की तरह देखता होगा। उन विस्फोटो को जिनसे कई सौरमंडल बनते और बिगड़ते हैं। वो ईश्वर वाकई बहुत बड़ा है, आपकी और हमारी सोच जितना छोटा कतई नहीं है। आजकल जिस तरह से पृथ्वी के वातावरण के बिगड़ने की बातें कही जा रही हैं और वैज्ञानिक मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को लेकर जिस तरह से चिंतित हैं उससे तो लग रहा है कि पहले तो यह पृथ्वी बची रहे, बाद में धर्मों के बारे में भी सोचा जा सकता है। दूसरी बात अमेरिका से चिढ़ने वाले लोगों के लिए लिख रहा हूँ। इस्लामी देश अमेरिका से किस इंतहा तक नफरत करते हैं यह बताने की जरूरत नहीं है। मैं भी करता हूँ उसकी दोगली नीतियों के लिए। लेकिन एक बार किसी मुस्लिम भाई से मेरी बात हो रही थी। वे कह रहे थे कि अमेरिका का नाश जल्ही ही होने वाला है। शायद उनकी जमात वाले लोग ही करेंगे। लेकिन मेरा भी एक तर्क था। यह अमेरिका के खिलाफ कतई नहीं है लेकिन तार्किक है। आप भी सुनिए। आपने एक जुमला सुना होगा, कि हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे। यानी अमेरिका के पास इतने परमाणु और हाइड्रोजन बम हैं कि वो इस पृथ्वी को 90 बार नष्ट कर सकता है। ये अलग बात है कि दूसरी बार वो नष्ट हो ही नहीं सकती। या कह सकते हैं कि पृथ्वी जितने बड़े ग्रह को 90 बार नष्ट कर सकता है। अमेरिका के पास लगभग 12 हजार परमाणु अस्त्र-शस्त्र हैं। रूस के पास इनकी संख्या 18 हजार हैं। तो साहब इन बमों की ताकत कितनी है यह बताने में मैं अपना और आपका समय जाया करना नहीं चाहता। बस इतना बताना चाहता हूँ कि अब वे जापान पर गिराए बमों से कई हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली हैं। तो अमेरिका ऐसे ही दुनिया में अपनी धाक नहीं जमाए हुए है। अब वो जमाना गया जब मानव बल के ऊपर युद्ध लड़े या जीते जाते थे। इस्लाम को मानने वाले दुनिया में 135 करोड़ हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि संख्या इन भयानक हथियारों के सामने करेगी क्या? इराक युद्ध में अमेरिका के लगभग 4000 सैनिक मारे गए जबकि मरने वाले इराकियों की संख्या 10 लाख (यह नॉन आफिशियल आंकड़ा है, आफिशियल आंकड़ा तो डेढ़ लाख है जिसे कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने पहले ही झूठा करार दे दिया है) से ज्यादा है। वो भी तब जब अमेरिका जमीन पर उतरकर लड़ा। जापान की तरह उसने परमाणु बमों का उपयोग नहीं किया। तो जिस दिन अमेरिका को लगेगा कि उसका विनाश तय है तो वो अपना अंतिम वार क्या चलेगा ये तो फिर आप ही सोचिए। मैं किसी को अमेरिका के नाम से डरा नहीं रहा हूँ लेकिन सिर्फ यह बता रहा हूँ कि अब संख्या के बल पर हावी होना संभव नहीं। धर्म के नाम पर तो बिल्कुल नहीं। हाँ, अर्थ और सामरिक ताकत की बात की जा सकती है। लेकिन धर्मांधता नाश करेगी यह तय है। अभी कुछ दिन पहले एक संदर्भ सामने आया था। कि मक्का में 56 मुस्लिम राष्ट्रों की पारंपरिक बैठक में (इस बैठक का एजेंडा काफी गुप्त रखा जाता है) यह तय हुआ है कि इसाक और अब्राहिम के वंशजों के साथ मुस्लिम मिलकर या सौहदार्यपूर्वक रहें क्योंकि उन सबके पूर्वज एक थे। इसाक और अब्राहिक के वंशजों में ईसाई और यहूदी दोनों शामिल हैं। दोनों ही धर्म के लोग बाइबल को मानते हैं। इस्लाम में भी ईसा को हजरत पैगंबर ईसा मसीह कहा जाता है। उनके ऊपर कुरान में पूरा डेढ़ चैप्टर है। इस धर्म के सारे पैगंबर भी बाइबल खत्म होने तक यानी ईसा तक एक ही रहे हैं। मतलब ये तीनों धर्म के लोग मिलकर रहें, यही जीस्ट है। लेकिन इसमें मेरी आपत्ति यह है कि भाई हमें क्यों छोड़ दिया यहाँ। हम तो उनसे भी पुराने हैं। शांतिप्रिय तरीके से रहना चाहते हैं लेकिन अब चूँकी ईसाई और यहूदी भारी पड़ रहे हैं तो उनके साथ मिलकर रहने की बातें चल रही हैं। मेरा यह कहना है कि अगर हमें अपनी भावी पीढ़ी को वाकई एक खूबसूरत पृथ्वी रहने के लिए उपहार में देनी है तो हम सबको मिलकर रहना होगा बिना ये देखे कि कौन किसका वंशज है। मुझे लगता है कि अगर ईश्वर मेरी बात सुन रहा है तो विश्व में एक दिन धर्मों से परे शांति जरूर आएगी। आमीन....।आपका ही सचिन.....।

मै और मीडिया

मैने कोल्कता से जौर्नालीस्म कीया है। सहारा समय में मुझे बतौर ट्रेनी मौका मीला। बड़ी मेहनत से ६ महीने कम कीए। रांची aaya तो पता चला की kolkata के एक बड़े ग्रुप का चैनल रांची मै खुल रहा है। मेरी खुशी का ठीकाना नही था। और लोगों की तरह मेने भी अपपल्य कीया मेरा सेलेक्शन भी हो गया। काम भी करने लगा।

दो तीन महीने बाद मुझे पता चला की मेरे अयौग बॉस के कारण इस चैनल का कोई भविष्य नही है। उसपर रोज़ नए नए नीयम बनने लगे। सारे सीनियर पदों पर बठे लोगों को हटा दीया गया. बडेही मानसिक तनाव में mene भी इस्तीफा दे दीया।

इसके बाद मुझे धमकी भरे फ़ोन कीए गए। मै अच्छे काम की तलाश मै डेल्ही आगया उस्वक्त जब में डेल्ही की गलीयों मै भटक रहा था तब मुझे एक ऐ_मेल मीला। जीस में मुझे मेरे पुराने रांची वाले ऑफिस से धमकी भरा ऐ_मेल था। मुझे कहा गया था की आप को मीडिया में काम करने नही दीयाजाएगा। अभी तक उस चैनल में मेरा एक महीने का मेहनताना बचा हुआ है। में डरता हूँ की कही वो लोग मुझे मीडिया में काम ही न करने दें।


लेकिन अब में डरने वाला नही हूँ। मुझे धमकी di गई तो में भी आपने साबुत के साथ नय्लय में जाऊँगा। मुझे पुरा वीश्वास है की आप सभी मेरा साथ देंगे।

फोटो नही

भाई रुपेश जब बेशरम पुलिस ने लाठी भाजी उस समय अँधेरा था। इसलिए किसी मीडिया के फोटोग्राफर ने वंहा की फोटो खीच पाया। उस घटना की कोई फोटो नही है।
भारत भूषण

अमर उजाला के डिप्टी न्यूज़ एडिटर संजीव कुमार सिंह ने करुनाकर को दिया एक हज़ार रूपया

अमर उजाला के डिप्टी न्यूज़ एडिटर संजीव कुमार सिंह ने करुनाकर के इलाज के लिए १००० रुपये की मदद की है. संजीव जी बिगत कई वर्षों से इस संस्थान से जुड़े हुए हैं. उन्होंने करुनाकर के जल्द स्वस्थ होने की कामना की है.
अमित द्विवेदी

एसी लो फ्लोर बस और मैं

रविवार को जब मैं ऑफिस पहुँचा तो बुरी तरस से बरसात की वजह से गीला हो चुका था। पहले सोचा लावो ऐसे ही काम कर लेते हैं। पर तवियत ने जवाब दे दिया और मैं घर वापस चला गया. रविवार को ही यशवंत दादा ने कवि सम्मलेन का न्योता दिया था. तो मैंने सोचा चलो शाम को इसे ही अटेंड कर लेते हैं. जब कवि सम्मलेन के लिए मैं अपने हौज़ खास स्थित घर से निकला तो सोचा आज ना तो गाडी ला जायेंगे ना ही मोटर साइकिल . ये विचार करके मैं बस स्टैंड पर पहुँच गया. तोडी देर में ५०२ नम्बर की दिल्ली सरकार की लो फ्लोर एसी बस वहां आकर रुकी. मैं उसमे स्वर हो गया इस बस में मेरी ये पहली यात्रा थी. बस सफ़दर ज़ंग टोम्ब तक ठीक आयी. इसके बाद में उसका ड्राईवर रास्ता भूल गया. सौभाग्य से उस बस में कुल मुझे लेकर कुल पाँच यात्री थे. थोड़ी देर तक ड्राईवर बस कंडेक्टर पर चिल्लाता रहा इसके बाद में उसने मुझ से कहा की आपको रास्ता पता हो तो बता दो. मैंने कहा ठीक है मैं रूट को तो नही जनता पर हाँ आइतियो तक ज़रूर पहुंचा सकता हूँ. मैंने उसे रास्ता बताना शुरू किया और उसे इंडिया गेट तक लेकर भी आया. पर जब वो इंडिया गेट पहुँचा तो मुझे बोलता है की तुमने मुझे भटका दिया और मुझसे उसने लड़ना शुरू कर दिया. मैं उसे डांटकर चुपचाप बैठ गया. बन्दे ने इंडिया गेट की परिक्रमा करनी शुरू की और वहां के पाँच चक्कर भी लगाये पर इंडिया गेट ने ड्राईवर साहब पर मेहरबानी नही की. अंत में परेशान होकर उसने मेरी बात मान ली और मैंने उसे उसकी मंजिल तक पहुचाया. पर बीच में उसने गुस्से में आकर एसी भी बंद कर दिया. तब मैंने उस पर चिल्लाना शुरू किया. तब जाकर उसने एसी ओं किया. इस बीच में कई लोग बस में चढ़े पर उसका किराया देखकर अगले स्टैंड पर ही कंडेक्टर से ही लड़कर उतर गए. एक चीज़ समझ में नही आता दिल्ली सरकार ने इन बसों पर करोड़ों रूपये तो खर्च कर दिया पर आम लोगों तक सही से इसकी सूचना नही पहुंचाई और कंडेक्टर और ड्राईवर ऐसे रख दिए जिन्हें रूट की बात अलग रास्ता तक पता नही है. गवर्नमेंट को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है. नही तो एसी बसों में लोग इंडिया गेट का गोल गोल चकार काटते रहेंगे.
अमित द्विवेदी

जय भड़ास

सर्वप्रथम जय भड़ास, जय जय भड़ास
सभी गुणी भड़ासियों को एक नए भड़ासी का सादर प्रणाम स्वीकार हो
जय धन्वन्तरी ( रुपेश भाई के लिए )जय यशवंत जय भड़ासपुनः कुछ अपने अंदर से उल्टियाँ करूँगा अभी एक प्रोजेक्ट में व्यस्त हूँ समूह में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
आलोक

सीईओ के हाथ में नारियल

लूमर को उड़ती उड़ती ख़बर मिली कि एक आने वाला न्यूज़ चैनल के सीईओ को उनके ही ऑफिस में उनके ही अधिकारीयो ने बुरी तरह पीटाई कर दी । कारण ,सीईओ साहब लगातार अपने सहकर्मियों का शोषण करते रहे । वे उनको समय पर वेतन नही देते थे ,हद तो तब हो गई जब उन्होंने अपने समाचार संपादक एवं ह्यूमन रिसोर्स हेड का वेतन पुरे माह का काट लिया । बहस होती गई ,होती गई ........................................................ और सीईओ साहब उनके आक्रोश का कोपभाजन का शिकार हुए .यह चैनल रांची बेस्ड है,जहाँ सीईओ का आतंक मचा हुआ है।
मीडिया वालों के विषय मेंन कहा जाता है कि ये दूसरों की समस्याओं को उठाते है और दूसरों के शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं ,लेकिन एक विदम्बना इनके साथ बनी रहती है कि ये अपनी मीडिया कंपनी /बॉस के ख़िलाफ़ जो कि उनका शोषण करते है आवाज़ नही उठा पाते। कहा जाता है कि इंसान परिश्थितियों का गुलाम होता है ,ऐसी ही परिस्थिति से रांची से शुरू होने जा रहा उपग्रह चैनल के संपादक ,प्रोड्यूसर ,ह्यूमन रिसोर्स ,मार्केटिंग ,रिपोर्टर्स ,टेक्नीकल एक्सपर्ट्स आदि गुजर रहे हैं। उक्त चैनल में पिछले सात आठ माह के अन्दर लगभग २ दर्ज़न पत्रकारों को या तो हटा दिया गया या फिर ऐसी इस्थिति बना दी गयी कि वे छोड़ कर चले गए .२ दर्ज़न पत्रकारों का वेतन पिछले छ सात माह से नही दिया गया है । जो कुछ लोगो को चैक के रूप में दिया गया है उनका भी लगभग सारा चैक बौंस कर गया है ।
.....................................ऐसी स्थिति से गुजर रहे है बिहार ,झारखंड के पत्रकार । ये पत्रकार आख़िर वहां क्यों जाते है ? यह प्रश्न पुरे मीडिया जगत के लिए बहस का विषय है क्यूँ कि ये वही बिहार झारखण्ड के पत्रकार हैं जो मीडिया जगत में काफी ऊंचाई को छू रहे है पर अपने ही प्रदेश के मीडिया में उनकी स्थिति आर्थिक रूप से बदतर है
यह बात वैसे पत्रकारों से नही जुरा हुआ है जो राजधानी से जुड़े हुआ है । जिला ,अंचल ,प्रखंड पत्रकारों कि स्थिति अवर्णनीय है ,उनके बारे में कुछ भी लिखना कम लिखना होगा ।
हम बात कर रहे थे रांची के उस चैनल कि जहा का सीईओ तानाशाह के रूप में काम कर रहा है । इससे पहले सीईओ रांची में एक राष्ट्रीय चैनल का ब्यूरो चीफ था जहाँ उसने बिहार झारखण्ड से उक्त चैनल के लिए रिपोर्टर्स को बहाल करने के लिए ३५ हज़ार रुपैये लिए थे .मामला कोर्ट में लंबित है .सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उनके ऊपर १४ ,१५ केस है जिनमे से कुछ क्रिमिनल केस भी है । इन केसेज के कारण ही शायद चैनल को लाइसेंस सरकार ने अभी तक नही दिया है और ऐसा सुना जा रहा है कि लाइसेंस अगले छ माह तक मिलने कि संभावना नही है । "सीईओ के हाथ में नारियल "ऐसा ही उस चैनल के एम्प्लोयीस सोचते हैं और यह भी सोचने पर मजबूर हैं कि कही उनका करियर भी तो नारियाल नही हो गया है ?

उपदेश


फोटो पर क्लिक करें और पढ़ें
................
.................
क्यों समझे कि नहीं समझे।

पंडित सुरेश नीरव को पहली बार सुनने का मौका मिला

नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्टान में आयोजित काव्य गोष्टी में मंच संचालन करते अरविंद पथिक, आशीर्वाद देते पंडित सुरेश नीरव, मंचासीन पीएन सिंह और यशवंत सिंह।

भड़ासियों को काव्य गोष्ठी का न्योता पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के महासचिव अरविंद पथिक की ओर से काफी पहले मिल चुका था। रविवार शाम छह बजे से शुरू हुई काव्य गोष्टी साढ़े आठ बजे तक चली और उसके बाद भोजन का दौर चला। लगभग दर्जन भर कवियों ने अपनी रचनाओं के जरिए खचाखच भरे हाल के श्रोताओं को भाव विभोर किया। पंडित सुरेश नीरव ने पर्यावरण जैसे मुद्दे पर अपनी कविता के जरिए काफी वाहवाही लूटी। इसके अलावा श्लोक अधर...वाली अपनी मशहूर कविता का गायन कर जमकर तालियां लूटीं। मेरे लिए खास यह रहा कि बहुत दिनों बाद किसी काव्य गोष्ठी का हिस्सा बना और इस मौके पर क्रांतिकारी कविताओं की काकटेल को मंच से सुनाया। इस काव्य गोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट अरविंद पथिक जी भड़ास पर डालेंगे पर मैं यहां इतना जरूर कहना चाहूंगा कि रविवार की यह शाम कई मायनों में मेरे लिए काफी फायदेमंद रहे। भड़ास संचालन समिति के सदस्य रजनीश के झा मुंबई से बिहार गए हुए थे और वापसी में दिल्ली आए तो उनसे भी प्रथम मुलाकात का मौका यह कवि सम्मेलन ही बना। कविवर भगवान सिंह हंस के जन्मदिन के मौके पर आयोजित इस कवि सम्मेलन में मेरे मित्र गोपाल राय, अमित द्विवेदी, मनीष राज आदि भी पहुंचे। यहां भारतीयम ब्लाग वाले अरविंद चुतर्वेदी जी से भी मुलाकात हुई। साथ ही प्रवासी संसार मैग्जीन के संपादक राकेश पांडेय जी से परिचय हुआ। ऐसे ढेरों नाम हैं जिनसे पहली दफा मुलाकात का मौका मिला। पंडित सुरेश नीरव को पहली बार मंच से कविता पढ़ते गाते सुनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। कई बड़े कवि भोपाल से पधारे, उन्हें भी सुनने का मौका मिला।

फिलहाल इसे प्राथमिक रिपोर्ट समझा जाए। विस्तृत रिपोर्ट के लिए हम अरविंद पथिक जी के पोस्ट का इंतजार करेंगे।
जय भड़ास
यशवंत

6.7.08

और यूं बदला हमारा संडे एडिशन










जयपुर से नीलिमा सुखीजा अरोरा

किसी भी अखबार का स्पेशल हिस्सा होता है, संडे के दिन लोग आफिस की आपाधापी से मुक्त होते हैं और दिमाग में सिर्फ सुकून होता है, ऐसे में संडे का अखबार ऐसा होना चाहिए जो आपको पढ़ने के बाद रिलेक्स करे न किदिमाग भारी करे। अकसर संडे के अखबारों में संडे स्पेशल स्टोरीज करके अखबारको अलग होने का दावा कर दिया जाता है। लेकिन जब दैनिक भास्कर के संडेएडिशन को नया, अलग और ज्यादा करने की बारी आई तो इसे केवल संडे स्टोरी तकही सीमित नहीं किया गया।
तो कैसे बना संडे एडिशन स्पेशल
इस दिन के फ्रंटपेज को अलग करने के लिए हमारे स्टेट एडिटर कल्पेशजी ने अपनी टीम के साथ एक हजार से भी ज्यादा देशी-विदेशी अखबारों का अध्ययन किया कि जो हम शुरूकरने जा रहे हैं कहीं वो पहले से तो कहीं नहीं हो रहा है। उन्होंने अपनी टीम के साथ आइडियाज को जब शेयर किया तो कोई भी आम रोजमर्रा में इस्तेमालहोने वाला डिजायन या पेज एलिमेंट पहले ही चर्चा से बाहर कर दिया जाता था.क्योंकि हम एक ऐसा पेज बनाने वाले थे जो इतिहास रचने वाला है।
क्या रहा खास
संडे के प्रथम पृष्ठ के लिए हमने तीन एकदम नई प्रोपर्टीज खोजी , सबसेपहले था वाटर कलर। जिसमें हमने संडे के दिन सुर्खियों में रहने वाले किसीशख्सियत को चुना जो उस दिन खबरों में रहने वाला था। इस शख्सियत का वाटरकलर स्कैच बनाने का आइडिया पूरी तरह से नया था, हालांकि इससे पहले भीअखबार इस तरह के वाटर कलर स्कैच्स इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन इसे पूरीतरह से एक डेडिकेटेड पेज प्रोपर्टी बनाने का ख्याल किसी भी अखबार ने नहीं सोचा।

लगभग हर रविवार को कोई न कोई खबर ऐसी रहती है जो किसी एक आदमी केइर्द गिर्द घूमती है, चाहे वो बिल गेट्स हों या महंगाई रोक पाने में अक्षम वित्त मंत्री पी चिदम्बरम। हमारा अखबार भास्कर इस मामले में लकी भीसाबित हुआ, हमारे पास ऐसे चार बड़े कलाकार थे जिन पर हम भरोसा कर रहे थे, इंदौर से लहरी और कुमार, पंजाब से सुखवंत और कोलकाता से आए बिश्वजीत। लेकिन केवल एक बदलाव हमारा लक्ष्य नहीं थे, हमारे टीम लीडर हैं कल्पेश जी और उनके साथ काम करने वाले ही जानते हैं कि वो किस स्तर पर कामके मामले में गंभीर है। पत्रकारिता के प्रति उनका जो जुनून है वो रेअरली देखने में आता है.

दूसरी पेज प्रोपर्टी तय हुई संडे ग्राफिक जो संडे कीबड़ी खबर पर आधारित है। इसके लिए कोई भी एक विषय तय किया जाता है फिर इसपर हमारे डिजायनर्स और ग्राफिक आर्टिस्ट उसके लिए ग्राफिक्स बनाते हैं। ग्राफिक्स के मामले में भी हमारे पास एक से बढ़कर एक आर्टिस्ट हैं। मुम्बई में सुमन्त वर्मा तो नए उभरते दीपक बुडाना। इस संडे ग्राफिक्स कीखासियत भी इसकी फ्रेशनेस और एकदम अलग हटकर कन्सेप्ट रहा। हमने जितना सोचा था, उससे कहीं अच्छा रिस्पान्स हमें इन संडे पेजेस का मिला। पहले हीदिन जब नए लेआउट के साथ 15 जून को अखबार मार्केट में आया तो दिन भरपाठकों के एसएमएस आते रहे।
बात मास्टहैड की
किसी भी अखबार का लुक उसकामास्टहैड तय करता है, इसे साधारण डल मत्थे से कलरफुल, उत्साही मत्थे मेंबदलना बड़ा चैलेंज था, साथ ही जिसमें न्यूज एलिमेंट भी हों। मास्टहैड कोविजुअल अपील के लिए परफेक्ट माना गया और तब आया यह आइडिया की जो भी उसदिन का बेहतरीन फोटो होगा वो जगह बनाएगा मास्टहैड पर। 15 जून से अब तक लगातार हम तीन एडिशन निकाल चुके हैं और जो रिस्पान्स हमें मिला है वो माइंड ब्लोइंग हैं। लेकिन ये तो थी हमारी बात अब हम ये चाहते हैं कि आपलोग भी अपने सुझाव हमें दें, कमेंट्स या काम्पिलमेंट्स, सबका स्वागत है।

तीनों पेज उपर हैं, नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके भी आप इन्हें देख सकते हैं...
http://www.newspagedesigner.com/portfolios/portfolio1.php?UserID=14236

एक गधे की दुःख भरी दास्ताँ

आप लोग न्युं मत समझना कि मैं आपको ऐसे ही कोइ कहानी
सुना रह्या सूं ! भाई थम इब कोई बालक थोडे हि हो !
या कहानी सै बिल्कूल सांचीं, तो भाइ सुनो !
एक था गधा ! और भाइ वो था एक धोबी का गधा ! इब आप पूछोगे कि
भाइ यो कुणसे जमाने की बात सै ? आज कल ना तो धोबी रहे और ना
उनके पास गधे ! इब जो धोबी थे उन्होने लान्ड्री खोल ली और गधे
की जगह स्कूटर ले लिये !
बिल्कूल भाई थारी बात भी कती सांची सै ! पर यार ये तो सोचो की सारे कूओं
में ही भांग थोडे पडगी सै ? अरे भाई थोडे बहुत परम्परावादी धोबी भी
सैं और उतने ही परम्परा वादी उनके गधे भी सैं ! और भाइ यकिन
ना हो तो आजाना ताउ के पास ! आपको मिलवा देंगे , इस ग्यानी धोबी और
उसके गधे चन्दू से !
यो दोन्युं बडे मजे मे थे ! रोज सुबह धोबी अपने गधे पर कपडे लाद के
और छोरियां के कालेज कै सामने से होता हुया कपडे धोनै जलेबी घाट जाया करता
और वो जब तक अपने कपडे धोता तब तक चन्दू गधा नदी किनारे की
हरी हरी घास खाया करता ! और फ़िर समय बचता तो ठन्ढी छांव मे लोट
पोट हो लिया करता ! इतना सुथरा और गबरू गधा था की , आप पूछो ही मत !
कभी इसका मूड आजाया करता था तो नेकी राम की रागनी भी बडे
उंचे सुर मे गा लिया करै था ! और भाइ बडा सुथरा गाया करै था !
पर भाइ पता नही यो गधा कुण सी जात का था कि इतना सुन्दर और
जवान होने के बावजूद भी इसने कभी किसी पराई गधी पर बुरी नजर नही डाली !
और ना ही कभी किसी गधी पर लाइन मारनै की सोची !
वहां पर दुसरे धोबियों और कुम्हारों की सुन्दर सुन्दर और जवान गधियां
भी आया करै थी पर चन्दू ने कभी उनकी तरफ़ नजर उठा कर भी नही देखा !
हालांकि ये और बात है कि चन्दू को रिझाने के लिये उन गधियों ने
बहुत सारी कोशिशें की जो सब बेकार गई ! यहां तक कि उन पुरातन पन्थी
गधियों ने टाइट जीन्स और लांडी कुर्ती भी पहनना शुरू कर दिया
पर वो चन्दू का दिल नही जीत सकी !
और साहब आप ये समझ ल्यो कि चन्दू गधा लन्च करता हुवा
यानि घास चरता हुवा इन गधियों के बीच मे चला जाता तो भी उन
सुन्दर और जवान गधियों के मालिकों को कोई ऐतराज नही होता , बल्कि
कोइ कोइ तो अपनी गधी का जिम्मा भी चन्दू गधे को दे देता कि कहीं कोइ
दुसरा गधा उनकी जवान गधी को बहला फ़ुसला कर भगा ना ले जावै !
इतना शरीफ़ और लायक था चन्दू !
इधर कुछ दिनों तैं ग्यानी धोबी नै देख्या कि आज कल कालेज कै
पास आकै गधा थोडा धीरे हो जाता था ! और कालेज कै सामनै आली
दुकान पै आके तो एकदम रुक ही जाया करै था ! असल मै चंदू गधे को एक
सुन्दर, जवान और चटक मटक सी कालेज की छोरी धोरै प्यार हो गया था !
इब गधा तो था ही सो चढ गया इस नव योवना कै चालै ! और आज कल बडा
रोमान्टिक मूड मै रह्या करता और घर से गठरी लादनै के पहले बाल बनाके,
दाढी कटिंग सब तरिके से करकै निकल्या करै था !
इब इन दोनुआं का इश्क परवान चढनै लग गया !
कभी छोरी इसके तरफ़ देखकै मुसकरा देवे,
कभी बाल झटक कै अपनी अदा दिखावै
और कभी मुस्करा के गर्दन को बडी अदा से घुमा ले !
और गधा भी कभी आंख का कोना दबा कर और कभी
कोइ प्रेमगीत गुन गुना कर जबाव देता था ! और साहब "हम तो तेरे आशिक हैं
सदियों पुराने"
इसी गाने को चन्दू गधा गुन गुनाया करै था !
आप न्युं समझ ल्यो की इब से पहले भी इस हसींन जवान कन्या ने कई
गधों को अपने इश्क के जाल मैं उलझाया था और इबकै बारी आगी सै
इस चिकनै और कर्म जले चन्दू गधे की जो इतनी सुन्दर और सुशील
गधियों को छोडकर इस सर्राटा आफ़त के लपेटे मे आ लिया !
इब बात यहां तक आ गई कि दोन्युं डेटिंग भी करनै लग गये ! धोबी जब तक
कपडे धोता तब तक चन्दू गधा फ़ुर्र हो लेता और वो जवान छोरी भी तडी
मारके कालेज से गायब ! कभी माल मै जाकै सिनेमा तो कभी काफ़ी शाप
पर ! और साहब ये समझ लो कि चन्दू तो २४ घन्टे इसी परी
के ख्वाबों और ख्यालों में डूबा रहने लग गया ! उस इश्क के
अन्धे को ये भी नही दिखाई दिया कि उन दोनु को
खुले आम लप्पे झप्पे करते देख कै दुसरे गधे भी
उस कन्या पर डोरे डालनै लग गये हैं !
कुछ समय बाद चन्दू को लगा की वो कन्या उससे कुछ
ढंग से बात नही करती थी ! और उससे कूछ उखडी उखडी सी
रहण लाग री थी ! इब चन्दू ठहरा सीधा बांका नौजवान और उपर
से गधा , सो वो क्या जाने इन अजाबों के चाल्हे !
और इस सीधे सादे गधे को क्या मालूम था कि वो बला तो अपना
टाइम पास कर रही थी ! वर्ना तो उसके सामने क्या चन्दू और क्या
चन्दू की ओकात ! अपनी जात से बाहर जाकै प्यार करने के यो ही
अन्जाम हुया करै सैं ! गधा होकै आदम जाद तैं प्यार करनै
चला था !...... गधा कहीं का....... ! हमनै तो सुण राख्या था कि गधे ही
दुल्लत्ती मारया करै सैं पर भाई इस बला नै तो चन्दू गधे को
वो दुल्लत्ती मारी कि यो चन्दू ओंधे मूंह कुलांट खा गया !
वाह रे चन्दू गधे की किस्मत !
असल में हुया यो की इब उस छोरी का दिल चन्दू से ऊब
गया था और वो एक सेठ के गधे से फ़ंस गई थी !
ये सेठ का गधा भी क्या गधा ? बल्कि गधे के नाम पर कलंक !
पर चुंकि सेठ का गधा था तो था ! आप और हम इसमे क्या कर लेंगे ?
इसिलिये तो कहते हैं "जिसका सेठ मेहरवान उसका गधा पहलवान" !
बिल्कुळ मोटा काला भुसन्ड और दो जवान बच्चों का बाप !
पर आया जाया करै था मर्सडीज कार मे और घने
दिनों तैं डोरे फ़ेंक राखे थे इस छोरी पै ! इब कहां ग्यानी धोबी
का गधा चन्दू और कहां सेठ किरोडीमल का गधा ? चन्दू पैदल छाप और ये
मर्सडिज बेन्ज मै चलने वाला गधा ! सो छोरी को तो फ़सना ही था ! फ़ंस ली !
क्यों की फ़ंसना और फ़साना ही तो उसके प्रिय शगल थे !
और इसकै नखरै उठानै मैं इस मोटे गधे ने कोइ कमी भी नही
छोड राखी थी ! चन्दू की तो इस सेठ के गधे के सामने ओकात हि क्या ?
इब चन्दु सडक के बीचों बीच गाता जावै था
" वो तेरे प्यार का गम इक बहाना था सनम"
ताऊ उधर तैं निकल रह्या था ! गधे नै यो गाना गाते सुन के बोल्या --
अबे सुसरी के ! बेवकूफ़ गधे के बच्चे ! इब क्युं देवदास बण रह्या सै ?
तेरे को पहले सोचना चाहिये था कि इन बलाओं से तेरे जैसे साधारण गधे
को इश्क नही करना चाहिये ! इनसे तो कोई बडे सेठ का गधा ही इश्क
कर सकै सै ! फ़िर वो भले ही दो जवान बच्चों का बाप हो ! या काला मोटा
और उम्रदराज हो ? आखिर धन माया ही तो सब कुछ है इस जमाने में !
अरे उल्लू के पठ्ठे... ये कोइ लैला मजनूं वाला जमाना नही सै ! अबे गधेराम
ये इक्कसवीं सदी है ! इसमे तो धन माया के पीछे भाइ भाइ , बाप बेटे
यहां तक की मियां बीबी भी एक दुसरे की कब्र खोद देवैं सै !
तु भले कितना ही सुथरा और शरीफ़ गधा हो !
है तो तू आखिर धोबी का ही गधा !
और ये सुन कर चन्दू , चुपचाप, हारे जुआरी जैसा कपडे की गठरी
लादे जलेबी घाट की और बढ लिया !

हिंदू धर्म के लोगों को कब तक उपेक्षा सहनी पड़ेगी?

हिंदू धर्म के लोगों को कब तक उपेक्षा सहनी पड़ेगी? (देखें) कब तक भेद-भाव के माहौल में जीना पड़ेगा? है कोई जवाब बिना मुस्लिम तुष्टीकरण को ध्यान में रखे बताइयेगा। साथ ही यह भी बताइए कि हिन्दुओं को अपने आराध्यों के दर्शन के लिए इजाज़त तो नहीं लेना पड़ेगी?

धर्मांधता अंततः महंगी ही पड़ेगी-1

इंदौर में हिन्दू और मुस्लिमों के बीच हुए दंगों ने मन को झकझोरकर रख दिया है। कई कोणों से मैं इन बातों को सोच रहा था। क्या धर्म वाकई इतना महत्वपूर्ण है कि उसपर लोग अपनी जान न्यौछावर किए दे रहे हैं। मुझे तो लगता है कि अगर संसार में धर्म नहीं होते तो शायद यह ज्यादा अच्छा और खुशनुमा होता। मैं कार्ल मार्क्स की उस बात का हामी नहीं हूँ कि धर्म अफीम के नशे जैसा होता है ( हालांकि मार्क्स को पढ़ने और पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने मुझसे कहा था कि मार्क्स ने कभी ऐसा बोला ही नहीं था) लेकिन एक बात जरूर है कि धर्म से तमाम प्रकार की सहायता मिलने के बावजूद इस मानव को एक लत तो इससे जरूर लग गई है, वह है अपना धर्म दूसरों पर हावी करने की। तो दोस्तों, यहाँ मैं कुछ धर्मों की बात करूँगा। विश्व के १० आरगेनाइज्ड यानी संगठित धर्मों में पहले नंबर पर कैथोलिक ईसाई धर्म है। इस धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या विश्व में लगभग २१० करोड़ है। दूसरे नंबर पर इस्लाम (सुन्नी मुसलमान) आता है। इसे मानने वालों की संख्या लगभग १३५ करोड़ है। तीसरे नंबर पर हमारा धर्म यानी हिन्दू धर्म आता है। इस धर्म को मानने वालों की संसार में संख्या ९० से १०० करोड़ के बीच है। उसके बाद बौद्ध धर्म है जिसके अनुयायी ३५ करोड़ हैं। इसके अलावा सिख धर्म को मानने वाले करीब ३.५ करोड़ और जैन धर्म को मानने वाले करीब ७० लाख से एक करोड़ के बीच हैं। बाकी कई अन्य धर्म भी हैं जिन्हें छोटे स्तरों पर माना जाता है। अफ्रीकी लोग कई समुदायों में बँटे हुए हैं और आस्ट्रेलिया में भी कई जनजातियाँ हैं। लेकिन कम संख्या में जो प्रभावी धर्म हैं उनके शिया मुस्लिम और यहूदी शामिल हैं। चीन में शिंटो और कन्फ्यूशियज्म को मानने वाले भी ४५ लाख से २.५ करोड़ के बीच हैं। शियाओं का मुख्य गढ़ ईरान है लेकिन ये लैबनान, यमन, कुवैत, ब्राजील, अल्बेनिया, तुर्की और पाकिस्तान में भी मिलते हैं। दूसरी ओर यहूदी हैं। आज की तारीख में यह धर्म इस्लाम का नंबर एक दुश्मन है। इस धर्म के अनुयायी करीब १ करोड़ १०-५० लाख के बीच हैं। इनमें से करीब ५५ लाख इसराइल और इतने ही संयुक्त राज्य अमेरिका में रहते हैं। बाकी बचे कुछ हजारों की संख्या में पूरे विश्व में रहते हैं जिनमें से इनके पाँच हजार परिवार भारत में भी रहते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैं धर्मों की इतनी वृहद विवेचना क्यों कर रहा हूँ। वस्तुतः मैं इन धर्मों में छुपी हिंसा को जानने की कोशिश में यहाँ तक पहुँचा हूँ। संसार का हर धर्म और उसे मानने वाला अपने आपको सर्वश्रेष्ठ मानता है। सब धर्मों की व्याख्या भी बहुत रोचक है। अब चूँकी बात इंदौर में हुए हिन्दू-मुसलमानों के दंगों से शुरू हुई है तो सबसे पहले इन्हीं दो धर्मों की सुनिए। इस्लाम को मानने वाले मानते हैं कि उनका धर्म जो नहीं मानता वो काफिर होते हैं और उनका धर्म चूँकी सीधे ऊपरवाले से जुड़ा हुआ है इसलिए इसे ना मानने वाले सीधे दोजख में जाएँगे। दोजख यानी नर्क। इस्लाम यह भी मानता है कि एक दिन पूरे विश्व में इस धर्म और इसे मानने वालों का राज रहेगा। इस धर्म को सब-दूर पहुँचाने के लिए इसके अनुयायियों ने बल का भी खूब जमकर प्रयोग किया है। इसमें आप भारत का मुगलकालीन इतिहास और औरंगजेब सरीखे राजाओं को जोड़कर देखिए। दूसरी ओर हिन्दू धर्म है। इस धर्म के अनुयायी मानते हैं कि यह सबसे पुराना यानी सनातन धर्म है। एक समय पूरे विश्व में इसी का ही राज था और समय के साथ-साथ इसमें क्षेपक जुड़ते गए और इसका ह्रास हुआ। लेकिन भविष्य फिर से सुनहरा है और इनका है। अगर कभी प्रलय हुई तो संसार का एक पीपल के पत्ते जैसे आकार का हिस्सा बना रहेगा जो बिल्कुल भारत जैसा दिखता है और उस हिस्से पर भगवान जन्म लेंगे और सारे हिन्दुओं का उद्धार करेंगे। यह विष्णु भगवान का दसंवा अवतार भी हो सकता है। वैसे उस रूप में इमेजिन श्री कृष्ण को ही किया गया है। इस बात को जस्टिफाई करने वाले इसके पीछे नास्त्रेदमस की कुछ भविष्यवाणियों का भी हवाला देते हैं जो इस बात के आस-पास सी प्रतीत होती हैं। हालांकि नास्त्रेदमस की १९९५ के आस-पास प्रलय वाली भविष्यवाणी अभी तक अधूरी ही चल रही है और मेरे जैसा व्यक्ति उसे पूरा होते देखना चाह रहा है।अगर विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली धर्म ईसाईयत की बात करें तो वो १०० देशों से अधिक देशों में फैला हुआ है और उसे मानने वालों की संख्या २१० करोड़ है। इस धर्म को मानने वाले देश विकसित हैं और संसार की आर्थिक तथा सामरिक व्यवस्था पर उनका राज है। मसलन अमेरिका, और पूरा योरप। इनमें जी-८ समूह के देश भी शामिल हैं जो सबसे अधिक औद्योगिक देश हैं और सब ईसाई धर्म को मानने वाले हैं। तो दोस्तों ईसाई धर्म भी दुनिया में पाँव फैलाने में पीछे नहीं हैं। इनके लिए चीजें काम करती हैं। क्रिश्चिनिटी और चर्चेनिटी। मतलब ईसाई सेवा भाव से भी काम करते हैं और लालच से भी। इनका एजुकेशन में पुराना दखल है। संसार भर में मिशनरी स्कूल्स चल रहे हैं। दूसरा कई अन्य चीजें भी हैं जो लोगों को आकर्षित करती हैं। इस्लाम ने जहाँ ने अभी तक ताकत से अपने धर्म का विस्तार किया है वहीं ईसाई धर्म ने सब प्रकार के लोगों को साथ रखकर अपनी बात रखी है। इनके मिशनरी गाँव-खेड़ों, बस्तियों से लेकर आदिवासी इलाकों तक में जाते हैं। सेवा करने के लिए। लेकिन शायद उनकी बातों में ऐसा जादू होता है कि लोग उनके होकर रह जाते हैं। झारखंड की राजधानी राँची के आस-पास मैंने ढेरों ऐसे गाँव देखे जो ईसाई धर्म को अपना चुके थे। पूछने पर पता चला कि कुछ साल पहले तक ये सारे गाँव आदिवासी समुदायों के ही थे लेकिन अब धर्म के मामले में उनकी तरक्की हो गई है। कुल मिलाकर यह काम काफी सौम्य और शांत तरीके से किया जाता है इसलिए इसकी ज्यादा चर्चा नहीं होती। लेकिन ये तय है कि दुनिया में छाने की तैयारी तो उनकी भी पूरी ही है। बस यही अंतर क्रिश्चिनिटी और चर्चेनिटी में है। चौथे उस धर्म की भी बात की जा सकती है जो सर्वथा अजीब ही है। यहूदी धर्म के लोग थोड़े डिफरेंट होते हैं। इस धर्म के लोगों ने ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया। खुद ईसा भी यहूदी ही थे। खैर, तो इस धर्म की भी सुनिए। बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट में एक बात लिखी हुई है जिसे पेन-यहूदी कहावत भी कहा जाता है। इसके अनुसार संसार में यहूदियों की आबादी हमेशा कम रहेगी लेकिन वो हमेशा ताकतवर रहेंगे, राज करने की स्थिति में होंगे। इसलिए उन्हें अपने खून यानी ब्लड (रेस) को शुद्ध बनाए रखने की सख्त हिदायत दी जाती है। वो अन्य धर्मों में शादी करके या बच्चे पैदा करके अपने खून को मिलावटी नहीं होने देते। हिटलर यहूदियों की इन बातों से हमेशा चिढ़ता रहा और अपनी जीवनी माइन कांफ में पूरे समय यहूदियों की इन बातों को याद कर-करके उन्हें पानी पी-पीकर कोसता रहा। बाद में उसने यहूदियों पर अपनी भड़ास भी निकाली और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ६० लाख यहूदियों को मरवा डाला। वो अपनी जाति आर्य को सर्वश्रेष्ठ मानता था। तो दोस्तों यह सही भी है कि यहूदी हमेशा राज करने की स्थिति में होते हैं। अमेरिका में वे ५५ लाख हैं लेकिन वहाँ की सीनेट में वो आधे से भी अधिक हैं और किसी भी क्षेत्र की बात करें वो वहाँ अव्वल रहते हैं। तो इसलिए अमेरिका की सीनेट में इसराइल के खिलाफ कभी कोई प्रस्ताव पारित ही नहीं हो पाता। हालांकि मैं अपने जिस मूल विषय धर्मांधता की बात करना चाह रहा था, उससे थोड़ा भटक गया हूँ लेकिन उससे पहले यह सारी भूमिका बता देना भी बहुत जरूरी था। यहूदियों के बारे में एक रोचक बात और बता देना चाहता हूँ। आपने डेल कम्प्यूटर कंपनी का नाम सुना होगा। तो डेल साहब यानी उस कंपनी के मालिक एक यहूदी हैं जो अमेरिका की बहुत बड़ी कम्प्यूटर कंपनी है। इसी प्रकार मल्टीनेशनल ओरेकल सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर कंपनी है। तो ओरेकल साहब भी यहूदी ही हैं। मशहूर हॉलीवुड स्टार हैरीसन फोर्ड भी यदूही ही हैं। वही एयरफोर्स-वन वाले। आप समझ गए होंगे। ऐसा माना जाता है कि चार यहूदियों ने तो दुनिया ही बदल दी है। जिसे हम सब आज भी जानते-मानते हैं। उन चार यहूदियों में से पहले हैं महान कलाकार माइकल एंजेलो, दूसरे हैं महान विचारक कार्ल मार्क्स, तीसरे हैं महान चित्रकार पाब्लो पिकासो और चौथे हैं महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आंइस्टीन। ये सभी लोग संसार में अपना लोहा मनवा चुके हैं और यह बताने की जरूरत नहीं कि इनकी क्या उपलब्धियाँ रही हैं। तो दोस्तों ये सारे धर्म मानते हैं कि संसार पर देर सबेर उनका ही राज होगा। लेकिन क्या ये संभव है....। इसपर मैं आप लोगों से अपने अगले लेख में बात करूँगा। यानी कि इस लेख के भाग दो में। तब तक के लिए विदा...।आपका ही सचिन.........।

विकासवाद के विरूद्ध

प्रणाम करने की मुद्रा में वे इतना झुके कि
देखते ही देखते
गायब होने लगी
रीढ की हड्डी
पार्श्व में उभरने लगी एक दुम
वक्त बेवक्त मालिकों के आगे हिलाने के लिये
कान फैलकर लंबे हो गये
सिर्फ चुगली सुनने के लिये
नाखून पैने हो गये
हाथ पंजों में बदल गये
पर अजीब बात की कटोरा फिर भी सलामत रहा
आत्मा नाम की चीज का पता नहीं क्या होता
अच्छा हुआ कि वह पहले से गायब थी
कण्ठ से वाणी छिन गयी
रह गयी सिर्फ कुकुआने की आवाज
हां साहब
यस सर
जी हुजूर
बोलिये माइबाप
जुबान पर धार नहीं रही
लपलपाने लगी जीभ सिर्फ मुफ्त के माल पर
हक की रोटी में भला स्वाद कहां से आता
जब बिना लडे सहज ही मिलने लगी
जूठन में बोटियां
फेंकी हुई हड्डियों के चंद टुकडों के लिये
अपनी ही बिरादरी पर गुर्राने वालो
तुम्हारी शक्लें तो मनुष्यों सी है
पर सच सच बताना
असल में तुम्हारी नस्ल क्या है

दिनेश चौधरी

कहाँ तक जाएगी हिन्दू-मुसलमानों के बीच की ये लड़ाई?

इंदौर में दो संप्रदायों (हिन्दू और मुसलमान) के बीच में हुए दंगों ने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हालांकि शनिवार को माहौल शांत रहा और दिन भर में तीन घंटों की कर्फ्यू में ढील भी दी गई लेकिन कई प्रश्न इसके बाद अभी भी अनुत्तरित ही रह गए। मेरे मन में भी दो दिन से कई बातें उमड़-घुमड़ रही थीं सोचा कि आप लोगों से बोल कर देखूँ।तो दोस्तों, पूरे विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ दो अलग-अलग धर्मों के लोग इतनी अतिवादिता से लड़ते हैं। हालांकि पहले यानी कई शताब्दियों पूर्व यह सब चलता रहा है लेकिन जब से दुनिया छोटी हुई है और साधन-संपन्नता बढ़ी है किसी भी देश में ऐसी अराजकता नहीं देखी गई है। आप लोगों को मेरी बात थोड़ी अजीब सी लगी होगी तो मैं इसमें कुछ और बिंदु जोड़ रहा हूँ। संसार के ज्यादातर देश किसी ना किसी धर्म से संबंध रखते हैं। मसलन संसार में ५६ मुस्लिम देश हैं। १०० से अधिक देश ईसाई हैं जो कैथोलिक धर्म को मानते हैं। कई बौद्ध देश भी हैं जो बौद्ध धर्म का पालन करते हैं और भगवान बुद्ध को मानते हैं। चीन जैसे कुछ ऐसे देश भी हैं जो कहने को तो कम्युनिस्ट हैं लेकिन वहाँ बौद्ध, मुस्लिम, शिंटो धर्म को मानने वालों के साथ-साथ कंफ्यूशियस जैसे विद्वानों की विचारधारा को मानने वाले भी बड़ी संख्या में हैं। इन ज्यादातर देशों में इस तरह दंगे नहीं होते। श्रीलंका में हो रहे हैं तो वह सिंहलियों और तमिलों के बीच की लड़ाई है और वे स्वायत्ता को लेकर लड़ रहे हैं। चीन कड़े अनुशासन वाला है और इस तरह के दंगे नहीं होने देता। हालांकि ज्यादातर अफ्रीकी देश गृह युद्ध की आग में जल रहे हैं लेकिन वो वहाँ की स्थानीय जातियों के बीच सत्ता और दबदबा कायम करने की लड़ाई है जो कई समुदायों में बँटी हुई हैं। दक्षिण अफ्रीका में काफी पहले रंगभेद को लेकर लड़ाई लड़ी गई थी लेकिन वह भारत से जुदा मामला था। उन अंग्रेजों से तो हमने भी लड़ाई की थी, आजादी प्राप्त करने के लिए लेकिन वो भारत में हो रही दो धर्मों की लड़ाई जैसा मामला नहीं था। ईरान-इराक ९ साल तक आपस में लड़े लेकिन दोनों देश एक ही धर्म को मानने वाले थे बस उनकी शाखाएँ अलग थीं। दूसरे कि दोनों अलग-अलग देश थे, एक ही देश में ऐसी लड़ाई नहीं हो रही थी। दोस्तों एक जगह जरूर जंग को लेकर संसार भर में मशहूर है। दो अलग-अलग धर्मों का ही मामला है लेकिन उनकी सूरत थोड़ी सी अलग है। मैं उस उदाहरण का जिक्र करना चाह ही रहा था। तो देखिए....मध्य-पूर्व एशिया में दो देशों की लड़ाई विश्वप्रसिद्ध है। एक विकसित है तो दूसरा अल्प विकसित। एक को दुनिया के ताकतवर देशों का समर्थन हासिल है तो दूसरे को सिर्फ अरब और गुटनिरपेक्ष देशों का। हालांकि अब भारत के अमेरिका की झोली में गिरने के बाद गुरनिरपेक्ष की टर्म की बेमानी हो गई है। तो यहाँ बात इसराइल और फिलीस्तीन की हो रही है। तो दोस्तों, जब आप इसराइल को देखेंगे तो वहाँ साधन-संपन्नता है। बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। लड़ाई के लिए उनके सैनिकों के पास आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्र हैं। वो मोटार्रो, हैलीकॉप्टरों, हवाई जहाजों से हमले करते हैं। बड़े लेवल की लड़ाई है लेकिन फिलीस्तीन उस सबके बावजूद इसराइल से ६० सालों से लड़ रहा है। वहाँ लड़ाकों के पास अरब से धन और हथियार आते हैं। सभी मुस्लिम देशों का फिलीस्तीन को समर्थन है। वहाँ वाकई धर्म के लिए युद्ध हो रहा है। यहूदी और इस्लाम को मानने वालों के बीच। लेकिन अंतर फिर भी वही है, कि भले ही इसराइल ने फिलीस्तान की भूमि हड़पकर अपने को बनाया या बसाया हो लेकिन इस समय वो मामला दो देशों के बीच का हो गया है। दूसरे दोनों देश आकार में इतने छोटे हैं कि इसराइल बचने के लिए फैंसिंग लगा लेता है, चौकी बंदोबस्त भी कर लेता है लेकिन भारत जैसे बड़े देशों के साथ ऐसा नहीं है। तो वापस भारत में होने वाली धार्मिक लड़ाई पर आते हैं। तो पाकिस्तान के बँटवारे के बाद से इन दोनों धर्मों के अनुयायियों ने एक-दूसरे को जितना लूट-खसोट लिया है (पिछले ६० सालों में) उतना तो शायद संसार में लड़े कई महायुद्धों में भी नहीं हुआ होगा। इस देश में राजनेता राजनीति की रोटी सेंकने की खातिर इन दोनों धर्मों के लोगों को आपस में भिड़वा देते हैं लेकिन इसका भविष्य में क्या अंजाम होगा ये कोई सोच ही नहीं रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में १४ से १७ करोड़ मुस्लिम आबादी है लेकिन गैरसरकारी तौर पर यह आबादी २०-२५ करोड़ है। ये मैं नहीं कई मुस्लिम वैबसाइट्स कह रही हैं उनमें से एक मुस्लिम वर्ल्ड डॉट कॉम भी है। आप उसपर जाकर स्वयं देख-पढ़ सकते हैं। तो भारत की ११० करोड़ आबादी में से लगभग २० प्रतिशत मुस्लिम हैं। लेकिन क्या कारण हैं कि इस धर्मनिरपेक्ष देश में वो उस तरह से खप नहीं पा रहे जैसे कि सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई या अन्य धर्मों के लोग खपे हुए हैं। मेरे कई मुस्लिम मित्र हैं। उनसे बातचीत के आधार पर लगता है कि वो लोग अपने साथ जो व्यवहार चाहते हैं वैसा ना तो सरकार उनके साथ करती है और ना ही समाज। और राजनीतिक पार्टियों ने उनका इस्तेमाल कर-करके उनका सिर्फ नुकसान ही किया है, कभी कोई भला नहीं किया। किसी एक मुस्लिम विद्वान ने बातचीत के दौरान मुझसे कहा कि किसी भी मुस्लिम घर में कोई भी युवक यह मानकर नहीं चलता कि उसे सरकारी नौकरी मिल सकती है। इसलिए वह अपनी अलग ही दुनिया खड़ी करने की सोचता है। वो फिर कोई भी व्यापार व्यवसाय हो सकता है। दूसरे मुस्लिम कांग्रेस या समाजवादी पार्टी को एक तरफा वोट तो दे देते हैं लेकिन दोनों ही पार्टियों का चरित्र दोगला है। थोड़े दिन पहले तक वो दोनों एक दूसरे को गाली दे रही थीं और आज गले मिल रही हैं। उन्होंने मुसलमानों की बातें कर, उन्हें आश्वासन देकर उनके वोट तो कबाड़े लेकिन उनके लिए, उनकी शिक्षा के लिए किया कुछ नहीं। बस सिर्फ अपने ही घर भरे। ऐसे में मुस्लिमों के दिल और मन में हिन्दुओं और इस देश की सरकार या कहें सिस्टम के खिलाफ जहर घुलता रहा। ६० सालों में यह जहर इतना कटु हो गया है कि जब-तब बाहर छलक आता है। खैर, हमारे देश के राजनेताओं को यह सब सोचने की फुरसत नहीं है, लेकिन क्या वो अपनी गंदी चालों से मुस्लिमों का एक ऐसा वर्ग तैयार कर रहे हैं जो हमारे देश से इतनी नफरत पालकर तैयारी कर रहा है कि वो लड़ाई श्रीलंका में हो रहे विद्रोह या फिलीस्तीन जैसी हो जाएगी.......क्या हमारी और उनकी कई पीढ़ियाँ इस लड़ाई को लड़ेंगी जो अंतहीन होगी और उसका मतलब सिर्फ विनाश होगा, देश का विनाश, घरों का विनाश, सभ्यता और संस्कृति, आपसी भाईचारे का विनाश। क्या भारत इस प्रकार से विश्व में कोई मिसाल कायम करना चहता है, अपने राजनेताओं के बूते पर जो भविष्य को देखना नहीं जानते.....?? क्या आप सुन रही हैं सोनिया जी, और क्या आप भी सुन रहे हैं लालू जी, मुलायम जी, करात जी......?? हम इस देश को ऐसा देखना नहीं चाहते। हम इंदौर को दंगों से घिरा देखना नहीं चाहते। हम धर्म के नाम पर लड़ाई होते नहीं देखना चाहते..........। आशा करता हूँ कि आप सब लोग सुन रहे होंगे। आपका ही सचिन...........।

क्या पता था कि कश्मीर की आग इंदौर तक पहुँच जाएगी!

इंदौर में इस समय दंगे भड़के हुए हैं। कल चार लोग मारे गए थे, आज भी इतने ही या इससे ज्यादा मारे जा चुके हैं। पुष्टि होनी बाकी है। कई जगह पुलिस पिटी है और कई जगह पुलिस ने गोलियाँ भी चलाई हैं जिनमें कई लोग घायल हुए हैं। क्योंकि मैं कोई अखबार की खबर नहीं लिख रहा हूँ इसलिए साफ तौर से लिखना चाहता हूँ कि दंगे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच भड़के हुए हैं। गुरुवार यानी ३ जुलाई की रोज भारत बंद के दौरान यह माहौल शुरू हुआ था जो आज भी जारी है। कल का बंद अमरनाथ श्राइन बोर्ड को आवंटित भूमि को लेकर था जिसने वहाँ से पूरे दो हजार किमी दूर जाकर आग पकड़ी। हमें नहीं पता था कि कश्मीर की आग इंदौर तक पहुँचेगी....दोस्तों, मैं जिन ४-५ शहरों में रहा हूँ उसमें से यह पहला है जहाँ इस प्रकार से दो धर्मों के लोग आपस में लड़ रहे हैं। लड़ाई इस तरह से हो रही है कि लग रहा है कि पूरी तैयारी पहले ही कर ली गई थी। कई ट्रक पत्थर फैंके जा चुके हैं और कुछ मौहल्लों से तीन ट्रक पत्थर जब्त भी हुए हैं। पुलिस ने बल प्रयोग किया है, पूरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है। एक दर्जन लोग मारे जा चुके हैं और कई दर्जन घायल हुए हैं। बंद तो कल पूरे भारत में था लेकिन इस शांतिप्रिय शहर में ही यह आग क्यों लगी ये फिलहाल मेरी समझ में नहीं आया है। मैं इस शहर का नहीं हूँ फिर भी मुझे इस घटना पर दुख है, तो जो लोग यहाँ के रहने वाले हैं उन्हें कितना दुख हो रहा होगा, ये मैं सोच सकता हूँ। हालांकि मैं इस शहर में पहले भी पाँच साल (१९९५-२०००) तक रह चुका हूँ लेकिन तब ऐसी कोई भी घटना का मैं गवाह नहीं बना था। तो अब मैं आप लोगों के साथ ही इस घटना की विवेचना करने की कोशिश करूँगा। दोस्तों, मप्र में भाजपा का शासन है और मैंने कई लोगों से यह कहते सुना है कि यह दंगे भाजपा करवा रही है, सत्ता हासिल करने के लिए। उसने ऐसा गुजरात में भी किया था वगैरह-वगैरह। लेकिन इस बार तो गुजरात में कुछ नहीं हुआ, वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साफ कर दिया था कि वो इस बंद का समर्थन नहीं करेंगे। खैर मैं कोई नरेन्द्र मोदी की शह नहीं ले रहा हूँ लेकिन बताना चाह रहा हूँ कि गड़बड़ कहाँ है। बात कांग्रेस से शुरू करते हैं। कांग्रेस जानती है कि इस देश का कोई भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देता। लेकिन बीच-बीच में भाजपा की ओर से मुस्लिमों को अपने फेवर में करने की नाकाम कोशिशें सामने आती रहती हैं। मसलन वो आडवाणी और जिन्ना वाला किस्सा। तो दोस्तों कांग्रेस को लगता है कि कहीं मुसलमान उसकी गोदी से उतरकर भाजपा की झोली में ना चले जाएँ तो इसलिए वो कोई ना कोई तुर्रा फैंकती रहती है। कुछ माह पहले हुआ रामसेतु मुद्दा भी वैसा ही तुर्रा था। उस मामले में कांग्रेस की दोगलाई देखिए कि उसने सुप्रीम कोर्ट में यह हलफनामा तक पेश करवा दिया था कि राम का कोई अस्तित्व ही नहीं मिलता और वो इतिहास में कहीं दर्ज नहीं हैं। धन्य है कांग्रेस......। तो साहब देश भर में हंगामा हुआ, कांग्रेस की नाक नीची हुई। लेकिन कांग्रेस नहीं सुधरी। कांग्रेस जानती है कि उसका हिन्दू मतदाता तो कभी महंगाई, कभी पेट्रोल, कभी प्याज तो कभी किसी और बात से बहकाया जा सकता है लेकिन मुसलमान मददाताओं को धर्म की बात करके ही रिझाया जा सकता है इसलिए वह अपने पत्ते चलती रहती है। वह अंग्रेजों की तर्ज पर ही देश पर शासन कर रही है। यानी फूट डालो और राज करो की नीति पर। अब अमरनाथ मामले को ही ले लीजिए। ढाई हजार किमी दूर का मामला है। जम्मू-कश्मीर की कांग्रेस सरकार ने आगे बढ़कर २१ करोड़ रुपए में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन दी थी। वहाँ प्रदर्शन हुए, पीडीपी ने समर्थन वापस ले लिया और कांग्रेस झुक गई। अब कांग्रेस को दो बातें सोचनी चाहिए थी जमीन वापस लेने से पहले। कि वो जानती है कि यह मामला धार्मिक था, उसे वहाँ के प्रदर्शनकारियों पर ध्यान नहीं देना था। अब उस २१ करोड़ की जमीन की कीमत मात्र कुछ ही दिनों में हजारों करोड़ पहुँच गई है। क्या आपको पता है? नहीं समझ आया तो मैं समझता हूँ..।इंदौर दो दिन से बंद है। सिर्फ इसी शहर का करोड़ों रुपयों का कारोबार प्रभावित हुआ है। लाखों रुपए की संपत्ति को नुकसान पहुँचा। ३ जुलाई को देश बंद था, हजारों करोड़ रुपए का देश को नुकसान हुआ। मात्र उस २१ करोड़ रुपए की जमीन के कारण। इंदौर की स्थिति इतनी खराब है कि यहाँ पूरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है। यह आगे भी कुछ दिन चल सकता है। ऐसे में यहाँ का कारोबार तो ठप होगा ही आस-पास के क्षेत्रों में लोगों का जीना भी दूभर हो जाएगा। इंदौर मालवा और निमाड़ के लोगों को भारी मात्रा में साधन और व्यवसाय उपलब्ध करवाता है। वो सब इलाके भी इस बंद की चपेट में आ गए हैं। आप सोचिए कितनी महंगी पड़ी हमें वो अमरनाथ वाली जमीन.......।।।।अब सवाल यह है कि कांग्रेस अमूमन ऐसे मामले बीच-बीच में क्यों ले आती है। क्या उसकी मंशा भाजपा को मुद्दा देने की होती है ताकि कुछ सांप्रदायिक हो और भाजपा को कटघरे में खड़ा किया जा सके? या फिर उसे देश के विकास की कोई परवाह नहीं है वह सिर्फ सत्ता में रहना चाहती है जैसा कि अभी तक रहती आई है। कांग्रेस ने जिस पीडीपी का दबाव स्वीकार किया है वह वो ही पार्टी है जिसकी रूबीना सईद को छुड़ाने के लिए १३ दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ दिया गया था। उस पीडीपी से भी क्या दबना जो साफतौर से देशद्रोही है और हमेशा भारत से अलग होने की ही माँग करती रहती है, बस उसके शब्दों में स्वतंत्रता की जगह स्वायत्ता होती है। इंदौर में १९८९ से हालात खराब हैं। तब यहाँ कई सप्ताह का कर्फ्यू लगा था और भयानक दंगे हुए थे। वो दंगे भी हिन्दू और मुसलमानों के बीच हुए थे। उसके बाद १९९१ फिर १९९२ में भी दंगे हुए थे। लेकिन पिछले लगभग १५ साल से कुछ-कुछ शांति वाली स्थिति ही थी। इस विवाद ने पुराने जख्मों को फिर हरा कर दिया है। कांग्रेस और भाजपा के चक्कर में यहाँ की जनता १५ साल पीछे चली गई है। पिछले सवा साल में इस शहर और इसके आस-पास के क्षेत्रों में कुछ सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। अगर यही स्थिति रही तो इस शहर का मिनी मुंबई बने रहने का सपना बिखर जाएगा। व्यापार व्यवसाय ठप हो जाएगा। बाहर से यहाँ आकर बसने वाले व्यापारी लोग इस शहर से जाने की सोचने लगेंगे। कुछ छोटे मामलों की इस शहर को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। शब-ए-मालवा के साथ ऐसा होते देखना कम से कम मैं तो नहीं चाहता हूँ। इन नेताओं के चक्कर में हमें इस जिंदादिल शहर को मरने नहीं देना है। आपका ही सचिन....।

निंदनीय है

कुछ समय से लगातार मीडिया पर हमला देखने को मिल रहा है। कुछ दिन पहले सतना के मीडिया कर्मियों पर पुलिस द्वारा लाठी बरसी गई। जिस को लेकर सतना का मीडिया पुलिस के खिलाफ लामबंद हुआ। आलम यह था की नाराज मीडिया कर्मियों ने सीएम का प्रोगाम कवर नही किया। अब मेरठ में टीवी पत्रकार के साथ मर- पिट। वाकई एसी घटनायों की जीतनी निंदा की जाय उतना कम है।
भारत भूषण श्रीवास्तव
satna

अमीर बनाने का साफ्टवेयर

व्यंग्य
अमीर बनाने का साफ्टवेयर

विवेक रंजन श्रीवास्तव

रामपुर, जबलपुर.

युग इंटरनेट का है . सब कुछ वर्चुएल है. चाॅद और मंगल पर भी लोग प्लाट खरीद और बेच रहे है. धरती पर तो अपने नाम दो गज जमीन नहीं है, गगन चुम्बी इमारतों में, किसी मंजिल के किसी दडबे नुमा फ्लैट में रहना महानगरीय विवषता है, पर कम्प्यूटर के माध्यम से अंतरजाल के जरिये दुसरी दुनियां की राकेट यात्राओं के लिये अग्रिम बुकिंग हो रही है , इस वर्चुएल दुनियाॅ में इन दिनों मैं बिलगेट्स से भी बडा रईस हॅूं . हर सुबह जब मैं अपना ई मेल एकाउण्ट, लागइन करता हॅूं , तो इनबाक्स बताता है कि कुछ नये पत्र आये है. मैं उत्साह पूर्वक माउस क्लिक करता हॅंॅू , मुझे आषा होती है कि कुछ संपादकों के स्वीकृति पत्र होगें, और जल्दी ही में एक ख्याति लब्ध व्यंग्यकार बन जाऊॅंगा, पत्र पत्रिकायें मुझ से भी अवसर विषेष के लिये रचनाओं की माॅग करेंगे. मेरी मृत्यु पर भी जाने अनजाने लोग शोक सभायें करेंगे, शासन, मेरा एकाध लेख, स्कूलों की किसी पाठ्यपुस्तक में ठॅूस कर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर लेगा, हो सकता है मेेरे नाम पर कोइै व्यंग्य अलंकरण बगैरह भी स्थापित हो जावे. आखिर यही सब तो होता है ना, पिछले सुप्रिसद्व व्यंग्य धर्मियों के साथ पर मेरी आषा निराषा में बदल जाती है, क्योंकि मेल बाक्स में साहित्यिक डाक नहीं , वरन अनजाने लोगो की ढेर सी ऐसी डाक होती है, जिससे में वर्चुएली कुछ और रईस बन जाता हॅंू.
मुझे लगता है कि दोहरे चरित्र और मल्टिपल चेहरे की हो तरह ई मेल के इस जमाने में भी हम डाक के मामले में दोहरी व्यवस्था के दायरे में है. अपने विजिटिंग कार्ड पर, पत्र पत्रिका के मुख पृष्ठ पर वेब एड्र्ेस और ई मेल एड्र्ेस लिखना, स्टेटस सिंबल माज बना हुआ है. जिन संपादको को मैं ई मेल के जरिये फटाफट लेख भेजता हॅू, उनसे तो उत्तर नहीं मिलते, हाॅ जिन्हें हार्ड प्रिंट कापी में डाक भेजता हॅंू , वे जरूर फटाफट छप जाते है , मतलब साफ है, या तो साफ्टवेयर, फान्टस मिल मैच होता है, या मेल एकाउष्ट खोला ही नहीं जाता क्योंकि पिछली पीढी के लोगो ने पत्रिका का चेहरा सामयिक और चमकदार बनाने के लिये ई मेल एकाउण्ट क्रियेट करके उसे मुख पृष्ठ पर चस्पा तो कर लिया है, पर वे एकाउण्ट आपरेट नहीं हो रहे. वेब साईट्स अपडेट ही नहीं की जाती , हार्ड कापी में ही इतनी डाक मिल जाती है कि साफ्ट कापी खोलने की आवष्यकता ही नहीं पडती . ई सामग्री अनावरित, अपठित वर्चुएल रूप में ही रह जाती है ,
सरकारी दफ्तरों में पेपर लैस आफिस की अवधारणा के चलते इन दिनों प्रत्येक जानकारी ई मेल पर, साथ ही सी.डी.पर और त्वरित सुविधा हेतु हार्ड कापी पर भी बुलाते है. समय के साथ चलना फैषन है.
यदि मेरे जैसा कोई अधिकारी कभी गलती से , ई मेल पर कोई संदेष अपने मातहतो को प्रेषित कर, यह सोचता है कि नवीनतम तकनीक का प्रयोग कर सस्ते में, शाध्रिता से, कार्य कर लिया गया है, तो उसे अपनी गलती का आभास तब होता है , जब प्रत्येक मातहत को फोन पर अलग से सूचना देनी पडती है, कि वे कृपया अपना ई मेल एकाउण्ट खोलक देखें एवं कार्यवाही करें,
ई वर्किग का सत्य मेरे सम्मुख तब उजागर हुआ, जब मेरे एक मातहत से प्राप्त सी.डी. मैने अपने कम्प्यूटर पर चढाकर पढनी चाही. वह पूर्णतया ब्लैंक थी. पिछले अफसर के कोप भाजन से बचने के लिये , कम्प्यूटर पर जानकारी न वनने पर भी , वे लगातार कई महीनों से ब्लैंक सी.डी. जमा कर देते थे. और अब तक कभी पकडे नहीं गये थे. कभी किसी बाबू ने कोई पूछताछ करने की कोषिष की तो सी.डी.न खुलने का , साफ्टवेयर न होने या सी. डी. करप्ट हो जाने का , वायरस होने वगैरह का स्मार्ट बहाना कर वे उसे टालू मिक्चर पिला देते थे. ई गर्वनेंस का सत्य उद्घाटित करना हो तो पाॅच-दस सरकारी विभागों की वेब साईटस पर सर्फिग कीजिये. नो अपडेट महीनों से सब कुछ यथावत संरक्षित मिलेगा अपनी विरासत से लगाव का उत्कृष्ट उदाहरण होता है ये साइट्स
सरकारी वर्क कल्चर में आज भी ई वर्किग , युवा बडे साहब के दिमाग का फितूर माना जाता है दृ अनेक बडे साहबों ने पारदर्षिता एवं शीध्रता के नारे के साथ, पुरूस्कार पाने का एक साधन बनाकर, प्रारंभ करवाया . हौवा खडा हुआ विभाग का वेब पेज बना. पर साहब विषेष के स्थानांतरण के साथ ही ऐसी वबे साईट्स का हश्र हम समझ सकते है.
कुछ समझदार साहबों ने आम कर्मचारी की ई अज्ञानता का संज्ञान लेकर विभाग के विषिष्ट साफ्टवेयर, विषेष प्रषिक्षण, एवं कम्प्यूटर की दुनियाॅ में तेजी से होते बदलाव तथा कीमतों में कभी के चलते, कमाई के ऐसे कीर्तिमान बनाये, जिन पर कोई अंगुली भी नहीं उठा सकता . मसला ई गर्वनेंस का जो है .बौद्विक साफ्टवेयर कहाॅ, कितने का डेवेलेप हो यह केवल बडे, युवा साहब ही जानते है, अस्तु
जब से मैने एक नग ब्लाग बनाकर अपना ई मेल पता सार्वजनिक किया है , मैं दिन पर दिन अमीर होता जा रहा हॅंू वर्चुएल रूप में ही सही. गरीबी उन्मूलन का यह सरल, सुगम ई रास्ता मैं सार्वजनिक करना चाहता हॅू. इन दिनों मुझे प्रतिदिन ऐसी मेल मिल रही है. जिनमे मुझे लकी विनर, घोषित किया जाता है. या दक्षिण आफ्किा के किसी एड्वोकेट से कोई मेल मिलता है, जिसक अनुसार मेरे पूर्वजों में से कोई ब्लड रिलेषन, एअर क्रेष में सपरिवार मारे गये होते है मेरी संस्कृति एवं परम्परा के अनुसार यह पढकर मुझे गहन दुख होना चाहिये, जो होने को ही था, कि तभी मैने मेल की अगली लाइन पढी मेल के अनुसार अब उनकी अकूत संपत्ति का एकमात्र स्वामी में हॅंू , और एडवोकेट साहब ने बेहद खुफिया जाॅच के बाद मेरा पता लगाकर, अपने कत्र्तव्य पालन हेतु मुझे मेल किया है. और अब लोगल. कार्यवाहियों हेतु मुझ से कुछ डालर चाहते है.
मैं दक्षिण अफ्रिका के उस समर्पित कत्र्तव्य निष्ठ एड्वोकेट की प्रषंसा करता हुआ अपने गांव के उस फटीचर वकील की बुराई करने लगा, जो गांव के ही पोस्ट आफिस में जमा मेरे ही पैसे , पास बुक गुम हो जाने के कारण , मुझे ही नहीं दिलवा पा रहा है. यह राषि मिले तो मैं अफ्रिका के वकील को उसके वंाधित डालर देकर उस बेहिसाब संपत्ति का स्वामी बनूं, जिसकी सूचना मुझे ई मेल से दी गई है. इस पहले पत्र के बाद लगातार कभी दीवाली, ईद,क्रिसमस, न्यूईयर आदि फेस्टिवल आफर में, कभी किसी लाटरी में, तो कभी किसी अन्य बहाने मुझे करोडों डालर मिल रहे है, पर उन्हें प्राप्त करने के लिये जरूरी यही होता है कि मैं उनके एकाउंट में कुछ डालर की प्रोसेसिंग फीस जमा करूं मैं गरीब देष का गरीब लेखक, वह नहीं कर पाता और गरीब ही रह जाता हॅू, तो इस तरह, नोषनल रूप से मैं इन दिनों बिल गेट्स से भी अमीर हॅू, अपने एक अद्द, फ्री, ई मेल एडेस के जरिये,
जब मैने ई मेलाचार के इस पक्ष को समझने का प्रयत्न किया तो ज्ञात हुआ कि ई मेल एड्र्ेसेस, खरीदे बेचे जाते है , कोई है जो मेरा ई मेल एड्र्ेस भी बेच रहा है . स्वयं तो उसे बेचकर अमीर बन रहा है , और मुझे मुर्गा बनाने के लिये , अमीर बनाने का प्रलोभन दिया जा रहा है . अरबों की आबादी वाली दुनियां में 2-4 लोग भी मुर्गा बन जाये तो, ऐसे मेल करने वालों को तो, बेड बटर का जुगाड हो ही जायेगा ना हो ही जाता है.
अब मुझे पूर्वजों के अनुभवों से बनाई गई कहावतों पर संषय होने लगा है. कौन कहता है कि ’’लकडी की हाॅडी बार-बार नहीं चढती ’’ ? कम से कम अमीर बनाने ये मेल तो यही प्रमणित कर रहे है, अब मैं यह भी समझने लगा हॅू कि मैं स्वयं को ही बेवकूफ नहीं समझता मेरी पत्नी, सहित वे सब लोग जो मुझे इस तरह के मेल कर रहे है, मुझे निषुद्व बेवकूफ ही मानते है, वे मानते है कि मै उनके झांसे में आकर उन्हें उनके बांधित ’ डालर ’ भेज दूंगा. पर में इतना भी बेवकूफ नहीं हूॅ मैने वर्चुएल रईसी का यह फार्मूला निकाल लिया है, और बिना एक डालर भी भेजे, मैं अपनी बर्चुएल संपत्ति को एकत्रित करता जा रहा हूं,
तो आप भी अपना एक ई मेल एकांउट बना डालिये ! बिल्कुल फ्री उसे सार्वजनिक कर डालिये. और फिर देखिये कैसे फटाफट आप रईस बन जाते है. वर्चुएल रईस.
Posted by vivek ranjan shrivastava

सही खबर के लिये धन्यबाद

नीचे लिखी ख़बर भडास4मीडिया पर छापी गई है। धन्यबाद यशवन्त जी आपने इस खबर को फेक्ट के रुप मे छापा है अन्यथा दैनिक जागरन तो ये साबित कर दिया था कि हम एक दूसरे के पक्के दुश्मन है।
मेरठ में टीवी पत्रकार की पुलिस वालों ने की
पिटाई

Written by Administrator
Monday, 30 June 2008 11:01
मेरठ में टीवी पत्रकार विनोद महाजन और पुलिस वालों के बीच जमकर मारपीट होने की खबर है। मामला पार्किंग के विवाद से शुरू हुआ। घटनास्थल मेरठ स्थित पीवीएस माल और नौचंदी थाना है। एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर विनोद महाजन के रिश्तेदार पवन सोंधी अपने परिवार के साथ पीवीएस माल गये थे। कार पार्किग में खड़ी की पर वापस आए तो उन्हें कार न मिली। इसको लेकर पवन सोंधी की पार्किग ठेकेदार संजय से पहले कहासुनी फिर मारपीट हो गई। खबर पाकर विनोद महाजन भी पहुंचे और उनकी भी ठेकेदार से मारपीट हुई।

बताया जाता है कि एक सिपाही के साथ भी विनोद महाजन का विवाद हुआ फिर मारपीट हो गई। मामला इतना आगे बढ़ा कि विनोद महाजन व उनके रिश्तेदार पर कई लोगों ने हमला बोल दिया। थोड़ी देर बाद पहुंची पुलिस फोर्स ने भी विनोद की पिटाई की। सभी पक्ष थाने पहुंचे तो वहां भी हाथापाई हुई। पत्रकारों का आरोप था कि दरोगा नशे में था और उसने जानबूझकर विनोद महाजन से मारपीट की। देर रात पुलिस अधिकारियों ने दोनों पक्षों का मेडिकल कराया। दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिये तहरीर दी है।

एक बार फिर धन्यबाद


लोहे से लोहा काटती पुलिस

एक हैं रामसहाय गुर्जर। इन दिनों महाशय का आतंक राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की पुलिस झेल रही है। बीहड़ में डकैत हैं रामसहाय गुर्जर। कल तक इनकी डकैत कमल गुर्जर से खूब छनती थी लेकिन अब पुलिस कमल गुर्जर के जरिए रामसहाय तक पहुंचने की फिराक में है। कमल गुर्जर गुर्जर आंदोलन के दौरान राजस्थान की मुख्यमंत्री को धमकी तक दे डाली थी। धमकी जगन गुर्जर ने भी दी थी। जगन पर अब दस लाख का ईनाम घोषित कर दिया गया है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की पुलिस हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गई है। कमल का भाई भी उसका साथ छोड़कर समर्पण कर चुका है। ऐसे में कमल भी समर्पण का मन बना रहा है। उसे जरूरत है तो किसी ऐसे विश्वस्त की जो उसकी जान सलामती का भरोसा दे सके। कमल की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर पुलिस कमल के जरिए रामसहाय तक पहुंचने की जुगत लगा रही है। कहा जाता है कि रामसहाय इन दिनों धौलपुर के जंगलों में डेरा डाले हुए है। यह इलाका कमल गुर्जर का कहा जाता है। रामसहाय के पास मुरैना और ग्वालियर की कुछ पकड़ भी हैं।

5.7.08

माफीनामा

मित्रों ,

मैं अचानक से कुछ दिनों के लिए भड़ास से बिना सूचना के नदारद रहा, ह्रदय से माफ़ी चाहता हूँ। हालाँकि हमारे वरिष्ठ भडासी साथी डॉक्टर रुपेश,मुनवर आपा और मनीषा दीदी से मिलकर ही मैं छुट्टी पर गया था मगर फ़िर भी भड़ास पर बिना पूर्व सुचना देने के कारण एक बार फ़िर से माफ़ी चाहूँगा।

आज मैं वापस भडास पर आया तो भडास को अपने उसी रंग रूप में रचा बसा पाया। भाई करुणाकर का मामला देख कर दिल बड़ा कचोट रहा है की इस लड़ाई में मैं पीछे कैसे रह गया। लानत है घर जाने की जब जंग में मेरी जरूरत तो मैं नदारद, शर्मिन्दा हूँ। मगर भडास की एकजुटता, भड़ास की ताकत और सबसे बड़ी बात जिम्मेदारी और जवाबदेही को आत्मसात करने की तत्परता। नमन है भडास को और तमाम भडासी बंधू को संग ही इश्वर से प्रार्थना की हमारे विजय पथ को बस अग्रसर करने में हमारे साथ रहे।

अंत में सर्फ इतना की मैं भी किसी भडासी से पीछे नही हूँ करुणाकर के साथ होने में और विजय पथ पर भाई के साथ ही रहूँगा।

रजनीश के झा

जमाने की रफ्तार

मेरी मां के बाल
कमर तक लंबे थे
वे माथे के बीचो-बीच
बिंदिया लगाती थीं
मेरी जानम भौहों के बीच
बिंदिया लगाती हैं
हर महीने ब्यूटी पार्लर जाकर
बाब कट बाल कटवाती हैं
जमाने की रफ्तार यही रही तो
२० साल बाद मेरी पुत्रवधू
नाक पर बिंदिया लगायेगी
हर हफ्ते मुंडन कराएगी
जगदीश त्रिपाठी

पैसे के लिए नहीं रुकेगा करूणाकर का इलाज, डा. रूपेश मुंबई लौटे

करूणाकर के इलाज के लिए आए डा. रूपेश मंगला एक्सप्रेस से मुंबई के लिए वापस लौटते।
सिलिगुड़ी से रेडियो मिष्टि 94.3 एफएम के वाइस प्रेसीडेंट दिलीप डुग्गर ने कहा है की करूणाकर का इलाज पैसे के लिए किसी कीमत पर नही रुकेगा. डुग्गर जी ने 1000 रुपये की आर्थिक सहायता करने के साथ ये बताया है कि जब तक करूणाकर स्वस्थ नहीं हो जाता, हम सब मिलकर ये प्रयास जारी रखेंगे. डुग्गर जी के साथ साथ और भी कई ऐसे लोग हैं जो भारत के विभन्न शहरों में रह रहे हैं, वो भी लगातार करूणाकर से फ़ोन में सम्पर्क में हैं। सभी के इस प्रयास ने करूणाकर को जीने की सकारात्मक सोच दे दी है. वो अब किताबें पढता है, टीवी देखता है. लोगों से बातें करता है. कहानियाँ सुनाता है.

डॉक्टर रुपेश आज सुबह मंगला एक्सप्रेस से मुंबई रवाना हो गए हैं. उन्होंने जाते समय स्टेशन से ही करूणाकर से बातें करके सारे परहेज़ और दवाइयाँ कैसी लेनी है, ये समझाते रहे. कल मुंबई जाकर डॉक्टर साहब करूणाकर के लिए दवाइयाँ तैयार करेंगे. लोगों के सहयोग से अब कुछ भी मुश्किल नहीं लगता. ऐसा लगने लगा है भगवान भी एक बार लोगों की सकारात्मकता और दुवाओं पर अपनी मुहर ज़रूर लगायेगा.

-अमित द्विवेदी

राकेश जी ने करूणाकर के लिए 2100/- दिए

प्रवासी संसार के सम्पादक राकेश पाण्डेय जी ने भड़ास पर करूणाकर की दास्तान पढ़कर इस नौजवान की मदद के लिए 2100 रुपये देने की घोषणा की है। राकेश जी 'प्रवासी संसार' नाम की पत्रिका के संम्पादक हैं. यह एकलौती ऐसी हिन्दी पत्रिका है जो प्रवासी भारतीयों के लिए समर्पित है. राकेश जी ने रात को ११ बजे फ़ोन लगाकर कहा कि अमित जी, सबसे पहले मैं इस बच्चे को अपनी तरफ़ से २१०० रूपये दे रहा हूँ जो इसके अकाउंट में पहुंचा रहा है और इसके साथ मैं ये वादा करता हूँ की करूणाकर का इलाज पैसे के कारण किसी कीमत पर नहीं रुकेगा.

Hindi media news portal

Yashwant Singh of Bhadas blog fame has launched India's first Hindi media news portal. Yashwant a rebel by heart is a pure journalist who is experimenting with different forms of communication. His blog was in news last month. Blog Bhadas is unique in the way that it has 360 bloggers submitting their posts regularly. Blog is an example of freedom of expression where bloggers at times use abuses also. Now Yashwant's news portal provides news of media, mainly Hindi media, in real time. The portal in the popular Joomla Content Management System is the creation of Yashwant from concept to creation to commissioning. It took almost a month for Yashwant to learn fundas of joomla to create the website having some excellent web 2.0 tools. Here is Bhadas 4 media http://www.bhadas4media.com more troubled time for small and medium newspapers that have already facing manpower resource crunch.

साभारः गुजरात ग्लोबल डाट काम

करूणाकर, तेरे हौसले को सलाम


(अमर उजाला, नोएडा संस्करण में प्रकाशित)

राष्ट्रहित की धूम मची है.....धूम मचा ले

पुष्यमित्र

इन दिनों पूरे देश में राष्ट्रहित की धूम मची है. यह सब कुछ. कुछ वैसा ही है, जैसा कारगिल युद्ध और उससे पहले परमाणु परीक्षणा के दिनों में हुआ करता था. आजकल देश की हर बङी राजनीतिक पार्टी, राजनीति के बदले राष्ट्रहित करने का दावा करने लगी है और राष्ट्रहित के नाम पर एक दूसरे को गलत साबित करने में जुट गई है.

अब जैसे लोहियाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी के मुताबिक परमाणु करार के लिए यूपीए के साथा हो जाना राष्ट्रहित है, अपने पक्ष में उसने पूर्व राष्ट्रपति कलाम तक से सहमति ले ली है।गुरुवार की शाम से इस पार्टी के प्रवक्ता ऐसा बयान तक जारी करने लगे हैं. हालांकि जैसा माननीय मुलायमजी ने अपना रेपुटेशन बना रखा है, लोग किसी भी सूरत में उन्हें और उनके महासचिव अमर सिंह के राष्ट्रहित पर भरोसा नहीं करते, यह बात दोनों महाशयों को भी मालूम था, इसलिए दोनों ने इसमें कलामजी का एंगिल भी फिट करवा लिए. ऐसे में देश की बहुसंख्यक उत्साही जनता ने भी मानना शुरू कर दिया कि राष्ट्रहित एशिया कप जीतने में नहीं बल्कि परमाणु करार में ही है.

मगर आज दोपहर वामपंथियों ने फिर से पूरे देश को कंन्फयूज कर दिया. लंम्बी चौङी बैठक के बाद उनके नेता प्रकाश करात ने घोषणा कर दी कि इस राष्टविरोधी सरकार से समर्थन तो वापस लिया ही जाएगा, 14 अप्रैल से पूरे देश में अभियान चलाकर लोगों को बताया जाएगा कि परमाणु करार किस तरह राष्टहित के खिलाफ है. वैसे तो अपने देश की आबादी का बङा हिस्सा मानता है कि वामपंथी जो कहते हैं सच अक्सर उसके उलट होता है, यानी अगर वे करार को राष्ट्रहित के खिलाफ बता रहे हैं, तो मुलायम की बातों में कुछ न कुछ सच्चाई जरूर होगी. कुछ प्रगतिशील जनता के लिए आज भी वाम का स्टैंड ही अंतिम सत्य होता है. लिहाजा राष्ट्रहित के सवाल पर वे कुछ कन्फूज हो गए.

अगर कन्फ्यूजन सिर्फ इतना ही होता तो चल जाता, मगर इन सब के पैरलल देश की एक और बङी राजनीतिक शक्ति ने अलग कन्फ्यूजन फैला रखा है कि राष्ट्रहित का परमाणु करार से कोई लेना देना नहीं, न इसके समर्थन से न ही इसके विरोध से. राष्ट्रहित का संबंधा अगर किसी बात से है तो वह श्राइन बोर्ड की जमीन पर उठे विवाद से है. हम सबों को श्राइन बोर्ड की जमीन छीने जाने की साजिश का मुकाबला करना चाहिए, वह भी राष्ट्रहित में।

-पुष्यमित्र
हजारों ख्वाहिशें ऐसी

क्या हो गया मेरे इंदूर

धर्मेंद्र चौहान
क्या हो गया मेरे इंदूर (इंदौर) को। अक्टूबर २००६ में ही तो मेरा ट्रांसफर पंजाब हुआ है। शायद ही ऐसा कोई दिन गया हो जब मैंने इसकी (इंदूर की) खैर खबर न ली हो। रोज अखबारों के जरिए इसकी गतिविधियों को जानता हूं, पिछले साल ही तो जवाहर मार्ग में कर्फ्यू लगाया गया था। टीवी चैनल पर पथराव की लाइव कवरेज देखकर याद आ गया कि यही वो रंगरेज की दुकान है जहां से मैंने दोस्त की जींस का कलर बदलने के लिए रंग खरीदा था। लेकिन अब वो रंगरेज की दुकान जल चुकी है। लोग पथराव कर रहे थे। हमेशा लोगों और वाहनों की भीड़ से भरा जवाहर मार्ग खाली था। शांति के दुश्मन पथराव कर रहे थे। दूसरे तरह के लोग पुलिस वाले थे जो कभी आंसू गैस छोड रहे थे। तो कभी कर्फ्यू की बात सुन साइकिल से घर जा रहे अधेड पर लाठियां बरपा रहे थे।

पिछले साल १२ मार्च २००७ को सुबह दोस्त से बात हुई थी तब उसने बताया कि साउथतोड़ा में लडक़ी को छेडऩे को लेकर फिर पथराव हुआ था। अब अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीनी मामले को लेकर मेरा इंदूर सुलग रहा है, माफ करना सुलग नहीं रहा, जल रहा है। पहले पंढरीनाथ, छत्रीपुरा, खजराना और मल्हारगंज में कफ्र्यू लगा था। अब पूरा शहर उसकी चपेट में आ गया है। सच कहता हूं मेरे इंदूर तू वहां जल रहा है यहां पंजाब में मेरा दिल बैठ रहा है। पिछले साल भी ऐसा ही दिल तेजी से धडक़ रहा था इसलिए कि कफ्र्यू न लग जाए पिछले साल तो शहर के समझदारों ने संभाल लिया था कर्फ्यू नहीं लगा था। लेकिन इस साल दिल रो पड़ा है। पत्नी बार-बार टीवी चैनल बदलती है कहती है स्टार न्यूज लगाओ वह देखो खजराना का रिलायंस फ्रैश फोड़ दिया। ये आईबीएन ७ वालों को फोन लगाओ थानो का नाम बद्रीनाथ नहीं पंढरीनाथ है। ये चत्रीपुरा नहीं छत्रीपुरा है। मलहारगंज का ल आधा आएगा शुक्र है खजराना तो ठीक लिखा है। क्यों कभी लड़कियों की छेडख़ानी से पथराव की शुरुआत होती है तो कभी खुदा और ईश्वर के नाम से। अमन चैन के दुश्मनों ने पेट्रोल बम तैयार कर रखे हैं। बस उन्हें किसी बंद या झगड़े का इंतजार होता है। क्यों लोग उन मुठ्ठीभर अमानुष जिनका न कोई धर्म न है न ईमान उनकी जमात में शामिल हो जाते हैं। अपने प्यारे इंदूर से तेरह सौ किमी दूर रह कर बस मन करता है लौट आऊं, लेकिन एक बार सोचने पर मजबूर हो जाता हूं। मेरे इंदूर में तो सिर्फ व्यवस्था बनाने के लिए झांकी निकलने पर लोगों का रास्ता रोका जाता है, कर्फ्यू लगने पर नहीं।

मेरे इंदूर में नई फिल्म रिलीज होने पर सिनेमा हॉल की टिकट खिडक़ी पर पुलिस उन मनचलों पर लाठी बरसाती है जो बिना नंबर के लाइन में लग कर टिकट लेते हैं। वहां भागवत यात्रा निकलने या किसी संतजन के आने पर स्वागत स्वरूप शोभायात्रा में बम (रस्सी बम) फोड़े जाते हैं। लोगों के घर जलाने के लिए नहीं। वहां एक दिन पेट्रोल पंप हड़ताल होने पर शहर में कई गाडिय़ां सडक़ पर नहीं आतीं। इंदूर में लोगों के घर जलाने के लिए पेट्रोल (पेट्रोल बम) का इस्तेमाल नहीं होता। क्या मेरा इंदूर इतना बदल गया कि मुझे घर लौटने के लिए एक बार सोचना पड़ता है। इंदूर तुम्हारे पास अस्सी बरस की मेरी दादी, मम्मी-पापा और एक प्यारी बहन को छोडक़र इस भरोसे पंजाब आया था कि मेरा इंदूर सबसे सुरक्षित है। इंदूर शहर नहीं संयुक्त परिवार है। जहां एक सदस्य के बाहर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। शहर जहां कुछ दिन पहले शांति यात्रा निकली थी वहीं अब पत्थर बरस रहे हैं। मेरे अमन पसंद परिवार को क्या हो गया। कितना अच्छा लगा है जब सुना बिगबी आए हैं। खुद को इंदौर की मेजबानी का घायल बता गए हैं। जगजीत अपनी गजलों का जादू बरसा गए हैं। अब कफ्र्यू की खबर सुनकर अच्छा नहीं लगता। बार-बार दिल कहता है क्या हो गया मेरे इंदूर को।

धर्मेंद्र चौहान, इंदौर
(हाल मुकाम लुधियाना, पंजाब)

भड़ासियों को न्योता

भड़ासियों को न्योता

पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के तत्वावधान में रविवार सायं ५.३० बजे भगवान सिंह हंस काव्य-संध्या का आयोजन स्थनीय गांधी शांति प्रतिष्ठान,दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। पं. सुरेश नीरव के गरिमामय सान्निध्य में होने जा रहे इस कविता-अनुष्ठान में सभी भड़ासी बंधु सादर आमंत्रित हैं। आयोजन के पश्चात कृपया भोजन-सुख प्राप्त कर, हमें अवश्य अनुगृहीत करें।

अरविंद पथिक
महासिचवः बिस्मिल फाउंडेशन,नई दिल्ली

4.7.08

बस अफवाह के पीछे भागना सुरु

सतना जब में आया तो यंहा के मीडिया में एक अजब सी shथिति देखने को मिली। यहाँ के मीडिया कर्मी के पास कोई जानकारी हो या न हो । बस अफवाह के पीछे भागना सुरु कर देते हैं। कई बार ये भी देखने को मिलता है कि एक ही ख़बर को पेपर खंडन करते नज़र आ जाते हैं। एसे ही एक घटना लगभग २-३ माह पहले सतना के जंगलो में १ बाघ को शिकारियों ने गोली मार दी थी। नव भारत के अनुसार शेर के सरीर से गोलिया प्राप्त हुई, वह्नी दैनिक जागरण के अनुसार शेर को गोली लगी ही नही थी। अब पाठक किस पेपर कि ख़बर पर भरोसा करे, पाठक दुबिधा में था। क्या मीडिया में एसा होना चाहिए ?

क्या पूरी तय्यारी है.....?

पिछले कई महीनो से टेलिविज़न पर हिंदुस्तान दैनिक का विज्ञापन देख रहा हूँ । स्लोगन है -"क्या पुरी तय्यारी है, अब हिंदुस्तान की बारी है." बिज्ञापन में एक बच्चा अखबार को जहाज़ बना कर उडाता है......... आगे आपको पता ही होगा।
बहरहाल बात दरअसल यह है कि कल भड़ास फॉर मीडिया पर "नई दुनिया , हिंदुस्तान दिल्ली के कई विकेट गिराए।" शीर्षक से एक ख़बर पढ़ी, बल्कि सिर्फ़ मै ही नही हिंदुस्तान दैनिक के पुरे रिपोर्टर पढ़ रहे थें। दिलचस्प बात यह है कि इस बीच बिजली भी गायब हुई। और तरह तरह कि बातें भी चली, जिनका उल्लेख यहाँ करना मै मुनासिब नही समझता हूँ। खैर, इस विज्ञापन से हिंदुस्तान दैनिक ने लाभ उठाया हो या न उठाया हो, पर भड़ास कि ख़बर से तो यही लगता है कि नई दुनिया के लिए यह विज्ञापन लाभकारी हो सकता है। इसने भी यह तय कर लिया कि लोग हिंदुस्तान को पढ़े नही बल्कि हवा में जहाज़ बना कर उड़ा दे। फिर भी मुझे लगता है कि नई दुनिया के लिए दिल्ली में हिंदुस्तान से टक्कर लेना इतना आसान नही होगा, जितना वो समझता है। और वैसे भी सिर्फ़ बॉलरों के सहारे मैच नही जीती जा सकती है।
http:// suchnaexpress.blogspot.com

कुछ यूं मना करूणाकर का बर्थडे

करूणाकर के लिए भागदौड़ में लगे अमित द्विवेदी, जिनके जीवन का फंडा है- किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है.......।
चेहरे पे आई रौनकः डा. रूपेश की त्वरित आयुर्वेदिक थिरेपी के बाद से करूणाकर न सिर्फ भर पेट खा पी रहा है बल्कि दर्द गायब होने से वह जी भर सो रहा है। उससे उसके चेहरे पर अब अनायास मुस्कान आ जाती है और भड़ासियों को देखते ही खिलखिलाने लगता है। ज़िंदगी के प्रति उम्मीदें बढ़ती देख वो अब फिर से जीने का अर्थ तलाशने लगा है।

बाएं से दाएं- डा. रूपेश श्रीवास्तव, करूणाकर मिश्रा, अमित द्विवेदी और यशवंत सिंह।
करूणाकर के साथ कुख्यात भड़ासाधीश :) यशवंत सिंह।
नई उम्मीदों का केक...तुम जियो हजार साल।
हैप्पी बर्थ डे.....करूणाकर एंड कंपनी।
करूणाकर को जादू की झप्पी:) देते मुन्नाभाई:) डा. रूपेश।
करूणाकर को केक खिलातीं अमित द्विवेदी की मां। दोनों के बीच में खिलखिला रहे डा. रूपेश।
अपनी मामी के हाथों केक खाता करूणाकर

3.7.08

ताऊ की पाती

प.जगदीश जी त्रिपाठी जी प्रणाम ! आपने जो सूर्य भगवान से प्राथना की है वो स्वीकार हो गई सै ! डा. साहब भी पहुँच गए और करुनाकर का इलाज भी शुरू हो गया सै ! और भई पंडीत जी , आज म्हारी यशवंत भाई और डाक्टर साहब सै भी द्विवेदीजी नै बात कराई ! ताऊ नै बड़ा मजा आया, उन दोन्यू भडासीया तैं बात करके ! भई डाक्टर साहब तो ताऊ के एग्झास्ट फेन हो राखे सें ! भई उन्होंने करुनाकर का जनम दिन बड़ी जोरदार तरीके तैं मनाया सें ! और आप अफ़सोस क्यूँ करते हो ? आप तो चराचर में व्याप्त हैं आपके आराध्य देव भगवान सूर्य, आपकी बात थोड़े ही टाल सके सें ! उनको रोज सबेरे उगना सै की नही ? यार पंडीत जी महाराज ताऊ नै तो थारी चिंता हो राखी सै ! इतने दिन हो लिए थारी किम्मै ख़बर कोनी ! आपकी तबियत तो ठीक सै ? या फ़िर ताऊ की सलाह मानके अपनी लक्ष्मी जी के गधे तो नही बन लिए कदी ? और कितै बोझा बाझा गेरना शुरू कर दिया होवे ! अगर उंच नीच हो ही गई होवे तो बता देना , शरमाना मत ! अडे तो सारे ही भडासी भाई सें ! आपका इलाज भी डाक्टर रुपेश जी धोरे करवा देंगे ! पंडितजी थम बिल्कुल भी मत घबराइयो ! थाने घर आली के गधे से वापस भडासी भाइयां नै सोंपने की जिम्मेदारी ताऊ की ! पर सब सही सही बता देना ! और चिंता मत करना ! अडे करुना कर भी राजी सै और सारे भडासी भी राजी सै !भई कुछ उंची नीची छोडो ज़रा ! अच्छा तो इब ताऊ की राम राम !

तुम जियो हजारों साल

करुणाकर को जन्मदिन की ढेरों बधाइयां.चाहकर भी यह नाचीज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे साथ नहीं रह पाया.इसका मुझे दुख है.भगवान सूर्य तुम्हें चिराय करें.जगदीश त्रिपाठी

Happy-birthday bhaai karunakar

Janamdin ki haardik badhaai.
Zindagee jindaadilee kaa naam hai,
Murdaadil kyaa khaak jiyaa karte hain.
Har raat ke baad subah zaroor hotee hai, Ye prakriti kaa atal niyam hai.
Khoob khush rahiye aur subah kaa intazaar kijiye.

Maqbool

करूणाकर को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें

गम तो हर जगह है इसका मतलब थोड़ी की हम हँसना छोड़ दें
मरना तो सबको है एक दिन इसका मतलब थोड़ी की हम जीना छोड़ दें
करूणाकर की zindadilee देखने layak है, उसे पता है की sangharsh आगे है फिर bhee डॉक्टर rupesh के दिए hausalon से वो आगे बढ़ rahaa है। कल डॉक्टर sahab को dekhkar वो ऐसे खुश हो गया जैसे की कुछ huaa ही ना हो। कुछ dawa डॉक्टर sahab ने उसे दी तो उसके chehre से saree udaasee गया हो गयी। अब वो आज cake katkar अपना जन्मदिन हम sabke साथ manaa रहा है। हर कोई उसे जन्मदिन की badhaiyan दे रहा है। पापा के chootne से uski खुशी dogugni हो गयी है।
हम तो चले kaunakar के साथ cake खाने अब लोग bhee खुश हो jaiye। kyunki आज करूणाकर का जन्मदिन है। उसको अपने mubarakbaad दीजिये। वो आप सबका wait कर रहा है। दूर हैं तो क्या huaa आप sabke उसके पास हैं। kyunki वो sabko याद कर रहा है।
अमित dwivedi

आओ मिलकर हंस लें

भड़ास के इस भड़भड़ाते प्रयास और उसकी सफलता के साझीदार ही नहीं उसकी चेतना के अंग बन चुके हम सभी अभिषेक, राघवेंद्र और मैं स्वयं योगेश जादौन, सोच रहे हैं कि काश कल हम भी दिल्ली हो सकते। करुणाकर की खुशियां बांटने। उसके दर्द को कम करने में। फिर भी हमारी ढेरों बधाइयां जन्मदिन पर और हां.....हवाओं से टूट कर बिखर जाएं वो पत्ते हम नहींआंधियों से कह दो औकात में रहे।।

एक कहानी जो कभी सामने नहीं आई

न्यायालय का आदेश ईश्वर का हुकुम। मगर इस संदर्भ में मैं एक घटना का जिक्र कर देना चाहूंगा। बात उस समय की है जब में उत्तरप्रदेश के औरैया जिले में एक प्रतिष्ठित अखबार का ब्यूरो चीफ था। उस समय न्यायालय से जुड़ी तमाम खबरें मैने धारावाहिक निकाली थी। उसमें एक डकैती की फाइल के चोरी होने और बाद मे उस फाइल के एक माननीय जज के ड्राइवर के पास उनकी ही गाड़ी से मिलने का समाचार भी था। मैं उन जज साहब का नाम भी लिख सकता हूं लेकिन यहां उसे बताना जरूरी नहीं समझता। तो, साहब उन खबरों के बाद मुझे डाक से एक चिट्ठी मिली। यह चिट्ठी जैसा की उस पर अंकित था उस समय के दुर्दांत डकैती जगजीवन परिहार की ओर से भेजी गई थी। इस चिट्ठी के साथ एक और चिट्ठी की फोटोकापी भी थी। यह चिट्ठी उन्हीं जज साहब ने जगजीवन को लिखी थी। इसमें लिखा गया था कि अगर जगजीवन इस रिपोर्टर यानी मुझे ठिकाने लगा दे तो 10 लाख रुपये देगा। दूसरी चिट्ठी जो कि जगजीवन की ओर से मुझे लिखी गई थी उसका लब्बोलुबाब यह था कि वह किसी पत्रकार को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। ऐसे में मेरी भलाई के लिए वह यह पत्र मुझे भेज रहा है। साथ ही एक पत्र पुलिस अधीक्षक भिंड को भी ताकि मेरी हिफाजत की जा सके।कुल मिलाकर इस पत्र के बाद में चुप नहीं बैठा। मै और मेरे एक वकील साथी इस पत्र को लेकर तत्कालीन एसएसपी दलजीत चौधरी, जिन्हें बाद में डकैतों के सफाए के लिए राष्ट्रपति पदक भी दिया गया के पास पहुंचे। भिड़ के एसपी जिनका नाम इस वक्त मुझे याद नहीं है से भी मिला। भिंड एसपी की बातों से हमें ऐसा लगा कि उन्हें इसके बारे में बहुत कुछ जानकारी है लेकिन वह कुछ छुपा रहे हैं। हालांकि उन्होंने मुझसे सावधान रहने को जरूर कहा। यहां यह जरूर बता देना चाहता हूं कि इस समय जगजीवन का गैंग भिड़ के आसपास ही था।दलजीत चौधरी ने शुरूआत में पत्र को काफी गंभीरता से लिया लेकिन बाद में वह भी धीरे पड़ गए। इस मामले मैं रिपोर्ट लिखाना चाहता था लेकिन वह नहीं लिखी गई।बाद मैं इन्हीं जब साहब के बारे में एक स्टोरी और मैने की। जज साहब जिस मकान में कुछ दिन किराएदार रहे उसका पुत्र गायब था। मकान मालिक का आरोप था कि जज के उनकी पुत्रवधू से नाजायज संबंध थे और जज साहब ने ही उसका मर्डर करा दिया था। यह पुत्र इन बुजुर्गों की एकमात्र संतान थी। हालांकि मेरी इस स्टोरी को बाद में स्टार ने भी चलाया। नतीजा यह हुआ कि जज साहब को निलंबित कर दिया गया। मगर मेरे नाम जगजीवन को सुपारी देने वाली उस चिट्ठी की सच्चाई अभी भी मेरे लिए रहस्य बनी हुई है। न्यायालय में मैने इस संबंध में पत्र भी दिया था लेकिन कुछ नहीं हुआ।मैरे कहने का मतलब है कि हर अच्छे बुरे में मीडिया के सिर बुराई का ठीकरा फोड़ने से पहले खुद की ओर देख लेना भी ठीक रहता है।ज्यादा क्या कहूं। कोर्ट चालू है.....पता नहीं कब कह दिया जाए मोहन जोशी हाजिर हो....

डाकुओं पर हाईकोर्ट की अंगुली

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बैंच ने केंद्र और राज्य सरकार समेत देश के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को निर्देशित किया है कि वे डकैतों का महिमा मंडन कतई न करें और न होने दें। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि भावी पीढ़ी डकैतों के जघन्य अपराधों से प्रेरित न हो। मुख्य न्यायाधीश एके पटनायक और न्यायामूर्ति एके गोहिल की युगलपीठ ने यह निर्देश शर्मा फार्म रोड चार शहर का नाका निवासी विशन सिंह की जनहित याचिका की सुनवाई पर दिया। यह याचिका तब दायर की गई जब निर्भय सिंह के आत्मसमर्पण की योजना चल रही थी।

ब्लॉग अब समाचार-पत्रों पर भी

पूरा पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

2.7.08

रंग लाया प्रयास, पिता ओंकार जेल से रिहा, करूणाकर का इलाज शुरू

कहते हैं इंसानी हौसलों की न कोई सीमा होती है और न कोई दायरा...बस इस बार जो हुआ उसमे नया कुछ नही था जीत थी, महक थी छोटे प्रयासों की बड़ी सफलता की, उम्मीद थी उजाले की...

कैंसर से जूझ रहे करुनाकर और जेल में बंद उनके पिता को न्याय दिलाने के यशवंत सिंह, डॉ रुपेश श्रीवास्तव, अमित द्विवेदी व अन्य ब्लागरों की मुहिम और भड़ास के प्रयासों से जेल में बंद करुनाकर के पिता ओंकार मिश्रा को जमानत मिल गई है...

अपने होनहार बेटे से मिलने के लिए लालायित पिता कल अपने बेटे के जन्मदिन पर उसकी खुशियों में भागीदार बन सकेगा, उसके दुख को साझा कर सकेगा..एक पिता के लिए इससे बड़े गौरव की दूसरी बात क्या हो सकती है...हर बार जब उम्मीदें ख़त्म होती लगती हैं तो लोग भड़ास की तरफ़ रुख करते हैं और हर बार भड़ास के गैर दुनियादार, असमाजिक, कुंठित, बेकार और दूसरे कई अलंकारों से नवाजे गए लोग करिश्मा कर डालते हैं...

''कई लोग जब करुनाकर के मामले में बहुत कुछ होने की उम्मीद खो बैठे थे तब भड़ास ने उम्मीद पालने की जिद पकड़ ली'' और हमारे प्रयासों का जब पहला ही परिणाम आसमान चूमने का हौसला पैदा करता हो तो असफलता की बात इस मंच से करना बेमानी है...

सारी दुश्वारियों को धता बताकर जब रुपेश जी मुंबई से दिल्ली पहुँच गए हैं और देखते ही देखते कई मदद करने वाले हाथ साथ जुड़ गए हैं तो करुनाकर के साथ कुछ ग़लत होगा, ऐसा कोई मूर्ख और अज्ञानी ही सोच सकता है...

कहते हैं दुआओं में असर होता है...और अब तो असर दिख भी रहा है....


करुनाकर के पिता जेल से छूट गए हैं, जमानत पर। करुनाकर का जीवन आयुर्वेद के पुरोधा के हाथ में है। जन्मदिन पर परिवार के सारे बुजुर्गों का आशीर्वाद है और दुआ के लिए भड़ास के ३६० हाथ हर वक्त तैयार हैं...

क्या अब भी किसी को भड़ास के इस अभियान की सफ़लता पर शक है...ये वक्त है जश्न मनाने का है...करुनाकर को बधाइयां देने का...साथ ही उन सबको विनम्र धन्यवाद देने का जो इस मुहिम में करुनाकर के साथ डटकर खड़े रहे...

''जन्मदिन की पूर्वसंध्या पर करुनाकर को ह्रदय की असीम गहराइयों से हार्दिक बधाइयां और बेहतर जीवन की शुभकामनाएं''...

''हृदयेंद्र''

पत्रिका को बिच्छू डॉट कॉम का साधुवाद

बिच्छू डॉट कॉम की समीक्षा से पत्रिका मैनेजमेंट इतना आहत होगा, इसका अंदाजा हमें नहीं था। हमने तो सुना था की राजस्थान की माटी में बहुत सहनशीलता है और ग्राहता का भाव भी, लेकिन ऐसा नहीं है। यह तब लगा, जब पत्रिका के कर्मचारियों ने बिच्छू सर्च किया, तो स्क्रीन पर पत्रिका प्रकट हुई। जब पत्रिका भू-पल्लवित हुई, तब बिच्छू डॉट कॉम ने पत्रिका के प्रयोगों का स्वागत किया, खबरों की तारीफ की। कालांतर में पत्रिका के नवजात, प्रौढ़ और थके-थकाए सम्पादकीय साथियों ने जब खबरों में तथ्यात्मक गलतियाँ की या पुरानी खबरों को री-ड्राफ्ट किया या छपी-छपाई खबरों को ज्यों का त्यों परोसा, तो उनकी खिंचाई भी हमने की। इससे खूटी पर टंगे लोग, सूली पर टंगे लोग, कोहनी पर टंगे लोग, बरगद की बात करते हैं गमले में उगे लोग, यानि बोनसाई पत्रकारों को इससे बुरा लगा और उन्होंने पत्रिका के कंप्यूटर पर बिच्छू बंद करवा दिया। धन्यवाद् गुलाब कोठारी साहब !

कोठारी जी, तीन माह पूर्व जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परिवार ने राजस्थान में आपके अख़बार का बहिष्कार किया था, तब अपने राजस्थान पत्रिका के प्रथम पेज पर विशेष सम्पादकीय में लिखा था, कि बूढे़ मुर्गे अख़बार पढ़ना बंद कर देंगे, तो इससे कोई फर्क नही पड़ेगा। लेकिन युवा चूजों को संघ परिवार कब तक अख़बार पढ़ने से रोकेगा? वे संघ परिवार के बूढे मुर्गों के सामने नहीं, छुप-छुपकर पत्रिका पढेंगे।

इसी तर्ज पर मैं आपसे कहना चाहता हूँ, कि आपके यहाँ के नाकाबिल, थकी-थकाई मानसिकता वाले पत्रकार अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकते, लेकिन जो नई पीढी है, जो पत्रकारिता में अपने लाभ-शुभ के लिए नहीं आई है, उसे बिच्छू देखने से कैसे रोकेंगे ?

वैसे भी अच्छे टाँगे वाले अपने घोड़ों को झांप बाँध कर दौड़ते है। लेकिन पत्रकारिता तांगे की रेस नहीं, विचार-आलोचना-समालोचना का आईना है। इस आईने में शायद पत्रिका की 'सम्पादकीय बहुंयें' स्वयं को बद-सूरत पा रही होंगी।

अवधेश बजाज

संपादक

बिच्छू डाट काम

हर माह करूणाकर के एकाउंट में एक निश्चित राशि पहुंचाएंगे

ब्लोगर साथियों को प्यार और दुलार....

एक हफ्ते वाइरल फीवर से निपटने के बाद आज भड़ास देखने का मौका मिला...इस बीच बहुत कुछ हो गया जो वाकई नही होना चाहिए था...

एक होनहार नौजवान का असमय कैंसर जैसी बीमारी की चपेट में आना...अपने बेहद प्रिय रुपेश भाई साहब का सभी ब्लोगरों से मदद के लिए गुहार लगाना ...ये सब कुछ वैसा ही था जिसे इस रूप में कभी नहीं देखना चाहता था...लेकिन नियति शायद इसे ही कहते हैं...तो अग्रज रुपेश जी के इस अभियान में हर तरह से साथ हूँ... अगले २४ घंटे में करुनाकर को आर्थिक मदद मैं भेज दूंगा...रही बात उसके जन्मदिन की उसे भी शानदार तरीके से मनाया जायेगा...और हर माह एक नियत राशि करुनाकर के अकाउंट में पहुंचाता रहूँगा...ये वायदा है...

इस बीच जब हम कल करुनाकर का जन्मदिन पूरे जोश-खरोश के साथ मनाने जा रहे हैं तो इस वक्त हम अगर भड़ास और नए ब्लागरों के मार्गदर्शक सुरेश नीरव जी का का जन्मदिन भी लगे हाथ मना लें और उनको देर से ही सही, अपनी शुभकामनाएं दें तो शायद सबको अच्छा लगेगा...

नीरव जी अपने जन्मदिन के वक्त शहर से बाहर थे जिस वजह से उनका जन्मदिन मनाने की हसरत हम जैसे कई ब्लोगरों के मन में ही रह गई...हमें नही भूलना चाहिए की जब-जब हम ग़लत हुए हैं, भ्रमित हुए हैं, भटके हैं, अपनी कविताओं के माध्यम से नीरव जी ने हमें रास्ता दिखाया है...हमारे मार्गदर्शक, मित्र और प्रदर्शक रहे हैं...और करुनाकर के लिए इससे बड़े सम्मान और गौरव की बात कोई नहीं हो सकती की बेहद सम्माननीय नीरव जी के साथ करुनाकर का जन्मदिन मनाया जाए...उम्मीद है मेरे इस प्रस्ताव पर सहमति बनेगी और हम सब कल डबल उत्साह के साथ मिलेंगे...
(प्रिय रुपेश दादा आप अपने अभियान में सफल हों यही प्रार्थना है....करुनाकर के सफल, उज्जवल और सेहतमंद जीवन की प्रार्थनाओं के साथ .... रुपेश दादा... with u, for u always....

-हृदयेंद्र

इंजीनियर बनने की बारी आई तो रूठ गई तकदीर, कैसर के चलते काटना पड़ा था पैर




कल जो खबर डाली गई थी, उसमें शेष पृष्ठ दो पर.. वाला पार्ट शामिल नहीं था। आज इसमें शेष वाला पार्ट भी शामिल कर लिया गया है। तस्वीर पर क्लिक कर इसे बड़ा करें, फिर पढ़ें।
((अमर उजाला, गोरखपुर के एडीटर केके उपाध्याय और उनकी संपादकीय टीम के हम शुक्रगुजार हैं जिन्होंने न सिर्फ करूणाकर के मामले को पूरी संवेदनशीलता के साथ उठाया बल्कि उसे लगातार मुद्दा बनाए हुए हैं। आज भी वहां करूणाकर पर खबर है जिसमें सारे ताजे डेवलपमेंट का जिक्र है। उम्मीद करते हैं कि आज की कटिंग भी जल्द ही भड़ास के पास पहुंच जाएगी।))

हालात का है maaraa

बहुत खूब पंडितजी.बढ़िया तस्वीर खीची है.मगर तस्वीर का दूसरा पहलु भी है।
हालात का है मारा पर जोश कम नही है।
चलता है देखो फिरभी रस्ते बदल-बदल के।
Maqbool

दांतों का सेट मुंह से बाहर गिरा निकल के


हास्य-ग़ज़ल-
औंधे गिरे डगर में छिलके से वो फिसल के
दांतों का सेट मुंह से बाहर गिरा निकल के
शायर निकल के आया पतली गली ले चल के
इस हादसे पे पेले कुछ शेर यूं गजल के
गड्ढे भरी है सड़कें चिकना बहुत है रस्ता
है उम्र भी फिसलनी चला ज़रा संभल के
पैदल हो अक्ल से तुम और आंख से भी अंधे
क्या तीर मार लोगे इंसानियत पे चल के
हालात हैं निराले मेरे नगर के यारो
पानी तो है नदारद बिल आ रहे हैं नल के
फिर इस चुनाव में भी डूबी है इनकी लुटिया
आया ना रास कोई दल देखे सब बदल के
वो और हैं जिन्होंने गिरवी रखा कलम को
नीरव बने न भौंपू अब तक किसी भी दल के।
पं. सुरेश नीरव

करूणाकर को पाँच हज़ार की मदद दी

दिल्ली के एक संपन्न परिवार के अनीश गुप्ता ने करुनाकर के इलाज़ के लिए पाँच हज़ार रुपये की मदद देते हुए उसके जल्दी ठीक होने की कामना की है। उनका कहना है अगर इसी तरह से एक दूसरे की मदद के लिए हम आगे आयें तो हमारे जेब से थोड़ा भी निकलकर किसी के सारी विपदा दूर कर सकता है। यहाँ रहने वाले हर बन्दे में भगवान् बसता है। तो क्यूँ न हम किसी की बढ़कर मदद करें।

करूणाकर की हालत बिगड़ी

करूणाकर की हालत मंगलवार की रात अधिक ख़राब हो गयी जिसके कारन वो मुंबई नही जा पाया। उसके कमर में दर्द और सीने में तेज़ दर्द हो रहा था। जिसके कारण उसे बहुत खांसी आ रही थी। इसकी ख़बर रात में ही डॉक्टर रुपेश को दी। जिन्होंने कुछ दवाइयाँ बतायी पर रात होने के कारण वो मिल न सकी। करूणाकर के हालत को दखते हुए मैंने रात में डॉक्टर रूपेश से बात की और डेल्ही आने को कहाँ। वो फटाफट तैयार हो गए। मैंने रात में ही गो ऐरवेज़ से उनका टिकेट बुक करवाया। डॉक्टर साहब की ज़हाज़ मुंबई से १२.२० पर उडेगा और वो यहाँ पर २.२० पर पहुँच जायेंगे। करूणाकर के मदद के लिए जो यहाँ से लोगों का सहयोग मिला उसी के बदौलत आज हम तुंरत उसके कुछ कर पा रहे हैं। मैं भगवान से यही दुआ करूंगा की कोई ऐसा करिश्मा कर दें जिससे करुनकर बिल्कुल अछा हो जाए। डॉक्टर साहब के आने के बाद मैं अगली पोस्ट भेज दूंगा।
अमित द्विवेदी

1.7.08

मैं 2100/- करुनाकर के ईलाज खर्च के लिए ट्रांसफर कर रहा हूँ- पीसी रामपुरिया

from
P. C. Rampuria (rampuriapc@gmail.com)
to
Yashwant Singh (yashwantdelhi@gmail.com)

date
1 Jul 2008 12:47

subject
transfering Rs.2100/- to karunakar's a/c


प्रिय यशवंत जी

मैं अपनी तरफ़ से रुपया 2100/- करुनाकर के ईलाज खर्च के लिए उसके खाते में आन लाइन ट्रांसफर कर रहा हूँ! आज मैंने कोशिश की है, पर आज बैंकों का आनलाइन बंद है! कल यह राशि उसके खाते में ट्रांसफर हो जायेगी!

ईश्वर से उसके तुंरत स्वस्थ होने की प्रार्थना के साथ...

पी.सी.रामपुरिया (मुदगल)

धन्यबाद

यशवंत जी आपका और पूरी टीम का धन्यबाद। यह मेरी पहली पोस्ट है। मेरे पास भी कुछ मसाला है जिसे मैं उडेलना चाहता हूँ। समय समय पर उसे लिखता रहूँगा।

भगवान इतना निर्दयी नहीं है कि मेरी गोद सूनी कर दे : मनीषा दीदी

बड़प्पन और महानता जैसे शब्द हमारी दीदी के व्यक्तित्व के सामने बौने से लगने लगते हैं। आज जब मनीषा दीदी घर पर आयीं तो मैंने उन्हें करुणाकर के बारे में बताया तो इतनी भावुक हैं कि शुरू हो गयी तेलुगू में पता नही कौन कौन सी दुआएं करना...। बड़ी-बड़ी सुन्दर बंद आंखों से आंसू गिर रहे थे और फिर मुझे रुपए देकर बोली कि कि किसी को मत बताना कि मैंने रुपए दिये हैं लेकिन दीदी माफ करें मैं आप से किया हुआ वायदा तोड़ रहा हूं। मुझसे बोलती हैं रोते हुए कि मेरे बच्चे को कुछ नहीं होगा भाई मैं उसे गोद ले लूंगी, भगवान इतना निर्दयी नहीं है कि मेरी गोद सूनी कर दे......। एक दीदी हैं और वहीं दूसरी तरफ तमाम बड़े(?) मुंबापुरी के ब्लागर जिनसे मैंने सुबह पोस्ट डाल कर अपील करी थी हो सकता है कि अब तक किसी की नजर ही भड़ास पर न पड़ी हो या फिर नजरें चुरा रहे हों। खैर किसी से जबरई तो है नहीं पर धन्य हैं भड़ासमाता मुनव्वर आपा और हमारी मनीषा दीदी जो मेरे हाथ पर आकर पैसे रख गयी और आपा तो मेरे साथ दवा में लगने वाला हीरा भस्म के लिये हीरा कनी और स्वर्ण भस्म के लिये शुद्ध सोना खरीदने के लिये अपना डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड लेकर सर्राफ़ा बाजार चल पड़ीं कि अगर जैसी जरूरत हो पेमेंट करते चलेंगे....... इसे कहते हैं किसी के दुःख को दिल से महसूस करना। इस पोस्ट के द्वारा मैं मुनव्वर आपा और मनीषा दीदी के बारे में क्या कह सकूंगा क्योंकि ये काले अक्षर बड़े जड़ प्रतीत हो रहे हैं उनके प्रेम और करुणा को बता पाने के लिये........।

मैने करूणाकर के खाते में एक हजार रूपये आज जमा करा दिये हैं - शशिकांत

from
Shashikant Awasthi (awasthi.shashikant@gmail.com)
to
Yashwant Singh (yashwantdelhi@gmail.com)

date
1 Jul 2008 15:43

subject
करूणा के सम्‍बन्‍ध में

बडे भाई यशवंत जी,
सादर प्रणाम
आपने एक बार फिर मुहिम छेड़ दी है एक नेक काम करूणाकर की जिन्‍दगी बचाने के लिये। मुझको यह पूरा विश्वास है कि पिछली बार की तरह आप एक बार फिर अपने अभियान में सफल हो जायेंगे । जिस प्रकार आपने मां-बेटे का मिलन कराया था, ठीक उसी प्रकार एक बार फिर एक बाप-बेटे का मिलन करा कर ही दम लेंगे। साथ में रूपेश भाई जिस जोश खरोश के साथ लगें है वह भी अविस्मरणीय है।

मैने करूणाकर के खाते में एक हजार रूपये आज जमा करा दिये हैं। मेरे तरफ से एक छोटा सा प्रयास है। आगे जो भी होगा वह करूंगा। इस प्रकार के कार्य आप द्वारा कराये जाते रहेंगे तो निःसन्‍देह आप उस जगह पहुंच जायेंगे जहां पर लोग जाने हेतु काफी प्रयास करते है, परन्‍तु पहुंच नहीं पाते। सही मायने में आप द्वारा किया जा कार्य ही ईश्वर पूजा है।

आपका अनुज
शशिकांत अवस्थी
कानपुर

करुनाकर बुधवार को मुंबई के लिए होगा रवाना

करुनाकर मंगला एक्सप्रेस से सुबह नौ बजकर बीस मिनट पर हज़रात निजामुद्दीन स्टेशन से मुंबई के लिया रवाना होगा। यह ट्रेन पनवेल स्टेशन पर दूसरे दिन सुबह बजकर तीस मिनट पर पहुंचेगी। जहाँ पर उसे स्वयं डॉक्टर रुपेश जी लेने आयेंगे। डेल्ही से चलकर मुंबई पहुंचाते ही करुनाकर २२ साल का हो चुका होगा क्यूंकि उसका जन्मदिन ३ जुलाई को है। वहीं पर सभी सुका जन्मदिन मनायेगे। आप भी करुनाकर को जन्मदिन की बडाई प्रेषित कर सकते हैं। आज वैसे गोरखपुर संस्करण अमर उजाला में करुनाकर की कवरेज पहले पन्ने पर आयी है। वहां के बहुत से लोग इस युवा होनहार छात्र से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे जिस तरस से रिपोर्टर विनोद तिवारी ने इस ख़बर को लिखा है उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। कौर्नाकर वह से कब लौटेगा इसकी जानकार हम आपको बाद में देंगे।
अमित द्विवेदी

करुनाकर के खाते मे आनलाइन ट्रांसफर हेतु

मेरी तरह आप सभी को करुनाकर के खाते मे आन लाइन ट्रांसफर मे दिक्कत आ रही होंगी ! मेरी अभी
अमीत द्विवेदी जी से बात हुई है ! कृपया आन लाइन ट्रांसफर में गंतव्य स्थान पुरानी बस्ती करे ! आराम से ट्रांसफर हो जायेगा !

करुणाकर के लिए

एक होनहार नवयुवक बीमारी की चपेट में हो और इसका पता भड़ासियों को लग जाए और वह हाथ-पर- हाथ धरे बैठे रहें ऐसा हो ही नहीं सकता। भाई यशवंत और डॉ.रूपेश श्रीवास्तव ने इस संदर्भ में मदद करने के लिए जो बीड़ा उठाया है,वह प्रशंसनीय है। हमें इसमें अपनी मनुष्यता का परिचय देना ही चाहिए। मेरा एक विनम्र सुझाव है कि उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री और केद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की ईमेल आई.डी भड़ास पर यदि दे दी जाए और हर भड़ासी करुणाकर की मदद के लिए मुख्य मंत्री और केद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से गुहार करे तो सरकारी खर्चे पर न केवल इनका इलाज हो सकेगा बल्कि कुछ आर्थिक अनुदान भी मिल जाएगा क्योंकि मुख्य मंत्री के पास एक विवेकाधीन कोटा होता है और इस प्रकार के प्रकरण में मदद करने का प्रावधान भी है। और जब तक यह व्यवस्था नहीं होती है,व्यक्तिगत स्तर पर हमें अपने प्रयास जारी रखने चाहिए।
पं. सुरेश नीरव

हरिशंकर ने दिया करुनाकर को एक हज़ार रुपया

हरिशंकर त्रिपाठी ने करुनाकर को की एक हज़ार रुपये की मदद की। कहा भाई करुनाकर तुम जल्दी से अच्छे हो जावोगे। हरिशंकर जी अमर उजाला में इस समय नॉएडा में कार्यरत हैं। करुनाकर को भड़ास पर पढ़कर इतना प्रभावित हुए हैं की उसकी हर तरह से मदद करना चाहते हैं।
रक्त और पानी में बड़ा अंतर है पत्थर और नगीने में बड़ा अंतर है
साँस लेते हो जी लेते हो मगरसाँस लेने और जीने में बड़ा अंतर है
हरिशंकर के घर में उनकी बहन की आठ जुलाई को शादी है। पर वे कहते हैं की जब से भड़ास पर करुनाकर की स्टोरी पढी है तब से अपने घर का काम भूल गए हैं। तथा करुनाकर की सारी जानकारी हासिल करना चाहते हैं। वो जल्द ही भडास के मेंबर बनेंगे।

था लूटा जिन्हे भी, आकर खुशी ने


हमें फ़ासलों को बढ़ाना नहीं था
कभी प्यार को आज़माना नहीं था

न ही हाथ पकड़ा न कोई गुज़ारिश
ठहरने का कोई बहाना नहीं था

ये सपने वसल के, खुश्बू बदन की
जो जागी तो तेरा ठिकाना नहीं था

था लूटा जिन्हे भी, आकर खुशी ने
जुदा उनसे मेरा , फसाना नहीं था

न दामन पर उसके कोई दाग आए
लहू आंसूओं में बहाना नहीं था
………………………………………………………
तेरे हाथों से छूटी जो, मैं मिट्टी से हम-वार हुई
हँसती - खिलती सी गुड़िया थी, इक धक्के से बेकार हुई

ज़ख़्मों पर मरहम देने को,जब उसने हाथ बढ़ाया तो
घायल थी मैं ना उठ पाई, वो हमदरदी तलवार हुई

ये गरम फ़ज़ा झुलसाएगी, पाँवों में छाले लाएगी
देती थी साया अब तक जो, दूर वही दीवार हुई

लम्हों की बातों में जिसने,सदियां साथ निभाई थी
ये कुरबत फिर मालूम नहीं, क्यूँ उसके दिल पर भार हुई

अब तो हैं खामोश ये लब, बस सन्नाटा है ज़हन में
तन्हाई इस महफ़िल की , महसूस मुझे इस बार हुई

साथ गुज़ारे लम्हे अब, बन फूल महकते दामन में
करती शुकराना उन लब का , जिससे “श्रद्धा” इक प्यार हुई

मैं डा.रूपेश श्रीवास्तव करुणाकर के उपचार हेतु आपके आगे झोली फैला रहा हूं

कभी भी उपचार के लिये औषधियों का खर्च तो मांग नही सका, परामर्श शुल्क का तो सवाल ही पैदा नही हुआ और मेरी इसी फ़ितरत ने मुझे डा.रूपेश श्रीवास्तव बनाए रखा है। जिस दिन मैं आपके धन से रोटी खाने लगूंगा मुझे यकीन है कि मेरे हाथों का चिकित्सकीय गुण विदा हो जाएगा। जो मुझे निजी तौर पर जानते हैं वे मेरी इस बात से परिचित हैं। आज मैं हाथ जोड़ कर विनयपूर्वक उन लोगो से सहायता मांग रहा हूं जिन्हें मैंने मुंबई में अभय तिवारी भाईसाहब के घर पर देखा और जाना है, इनमें श्री प्रमोद सिंह जी, बोधि(सत्त्व)भइया , श्री उदय यादव जी, और श्री अनिल रघुराज जी; दूसरे दिन श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी और श्री शशी सिंह से मिला था। आप सब में एक बात सर्वनिष्ठ है कि आप सब भावुक हैं दूसरों की पीड़ाओं को भली प्रकार समझ पाते हैं। आज मैं बिना किसी भूमिका के आप सभी से करुणाकर की बीमारी के इलाज के लिये यथासंभव अधिकतम आर्थिक सहायता की आशा कर रहा हूं ये धन आप सीधे ही उसके बैंक एकाउंट (Karunakar Mishra ,State Bank of India ,AC No. 30037096026) में जमा कर सकते हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि वो बच्चा फ़ेफ़ड़ों के कैंसर की असाध्य स्थिति में पहुंच चुका है। एम्स के महान डाक्टरों ने उसे मात्र छह माह का जीवन है कह कर घर भेज दिया है लेकिन जब ऐसी परिस्थिति में कि रोगी गतायु हो तब कहा जाता है कि वैद्य अपने मान की रक्षा के लिये इस तरह के रोगियों का उपचार न करें किन्तु मैंने कभी इस नियम को अपने ऊपर लागू नही होने दिया और एक बार फिर से मैं इस नियम का उल्लंघन कर रहा हूं आप सब के सामने, जब कि सब जानते हैं कि करुणाकर की हालत कैसी है। मुझे भरोसा रहता है कि यदि मिल कर दुआ करें तो गतायु रोगी की भी प्राणरक्षा हो जाती है। मुझे जिन महानुभावों से आशा है कि वे मुझे इस कार्य की सफलता के लिये सहायता करेंगे वे हैं-- श्री अनिल रघुराज जी,श्री अभय तिवारी जी, श्री उदय यादव जी, श्री अजय ब्रह्मात्मज जी, श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी जी, श्री शशी सिंह, श्री बोधिसत्त्व, श्री प्रमोद सिंह, श्री गुरुदत्त तिवारी, श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना और सबसे अंत में मनीषा दीदी से भी आशा कर रहा हूं जो कि स्वयं भिक्षा पर ही जीवन यापन करती हैं(सहर्ष राजी हो गयीं हैं)। ज्यादा लिख नहीं पा रहा हूं दवाएं कूटने पीसने में लगा हूं क्योंकि कल या परसों करुणाकर आने वाला है। फिर करबद्ध प्रार्थना है कि सहायता शीघ्र करें विलंब से सब व्यर्थ होगा, हो सकता है कि आप कागज के रुपयों से किसी की जान बचा सकें..........

बचपन से खिलवाड़ न करो

आधुनिकता में दौड़ते-दौड़ते हम कब अपने बच्चों को उनके बचपन से दूर ले गए हमें पता ही नहीं चला. अब आप कहेंगे कि इसमें आधुनिकता जैसी कोई बात कहाँ है? बिल्कुल है जनाब, बस आप गौर से देखिये. आधुनिकता इस मायने में कि हम अपने बच्चों को फिल्मों, टी0 वी0 की तरह का बच्चा बना देना चाहते हैं. हमें लगता है कि हमारा बच्चा तुम्हारे बच्चे से कमजोर कैसे?(बिल्कुल वही अंदाज़, तुम्हारी शर्ट मेरी शर्ट से सफ़ेद कैसे?)अब जनाब बच्चा न हो गया कोई प्रोडक्ट हो गया, जब जैसे चाह वैसे उसका उपयोग कर डाला. शुरुआत एकदम छोटे से ही होती है. घर में मित्र या महमान आने भर की देर है कि हम चालू हो जाते हैं अपनी जादूगीरी दिखने के लिए. "चलो बेटा अंकल को पोयम(कविता नहीं) सुनाओ, चलो बेटा पूरी टेबल(पहाड़े कहना कठिन है) सुना दो. यहाँ तक भी होता तो गनीमत थी, हमारे कदम बढ़ जाते हैं और आगे को. मेरा बेटा फलां फिल्मी एक्टर की नक़ल कर लेता है, किसी के डांस की कॉपी कर लेता है. इसके बाद शुरू होता है बच्चे का फिल्मी एक्टर बनना. डांस, डायलोग का सिलसिला तब तक चलता है जब तक कि बच्चा न रोने लगे या फ़िर महमान ही उठ कर न चल दे. आख़िर उसके मन में भी तो कीडा कुलबुलाने लगा है अपने बच्चे को एक्स्ट्रा बनने का और उसके घर पर आने वालों के लिए मनोरंजन करने का.इसके अलावा परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लेन का दवाब, मेरिट में आने का दवाब. अब कुछ दवाब हमारे कथित विकासवादियों ने भी बढ़ा दिया है, टी वी की दुनिया में रियलिटी शो का व्यापार खड़ा करके. बच्चे तो बच्चे उनके माँ-बाप तक नाचने गाने में लगे हैं कि पता नहीं कब मौका लगे और बच्चा तो मंच पर नाचे ही कुछ एंकर(जावेद जाफरी टाईप) माँ-बाप को भी नचवा देते हैं. अब इससे बच्चों का बचपन तो कहीं गम हो गया है, दवाब के चलते बच्चों की जिंदगी भी गुम हो रही है. आए दिन बच्चों की आत्महत्याओं की ह्रदय-विदारक खबरें इसी का दुष्परिणाम है. क्या हम बच्चों को उनका नैसर्गिक जीवन जीने देंगे?