Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

14.7.08

क्या परमाणु करार देशहित में है?

आज-कल देश में सबसे बड़ा मुद्दा है परमाणु करार का .हमारे देश के लीडर्स को न बढती महंगाई की चिंता है और न ही दिनों-दिन बढ़ रहे आतंकवाद और नक्सलवाद की .उन्हें चिंता है तो सिर्फ़ इस बात की कि कैसे वो अपनी सरकार बचाए ताकी बाकि बचे समय में भी वो सता का मजा लूट सके और अपनी जेबे भर सके।
आज सरकार परमाणु करार के बारे में जनता से सहायता मांग रही है और ये ही वो सरकार ह जिसने परमाणु करार का मसोदा संसद में रखने से इन्क्कर कर दिया था कि यह गोपनीय है .आख़िर वो चेअसे गोपनीय कसे हो सकती है जिसे अमेरिकन कांग्रेश में पेश किया जा चुक्का हो और यह्हा तक कि उसका आदे से ज्यादा मैटर अमेरिकन वेबसाइट्स पर भी आ चुका हो .क्या यह जनता के साथ साफ-साफ धोखा नही है?
आज सरकार कह रही है कि परमाणु करार होगा तो बिजली मिलेगी और तरक्की होगी लेकिन क्या सरकार ने
ये भी हिसाब लगाया है कि पनबिजली और हवा से बिजली बनाना काफी सस्ता परेगा बजाये कि परमाणु बिजली खरीदने के।
सरकार कह रही है कि अगेर परमाणु करार हो जाता है तो इंडिया में बिजली कि कमी नही रहेगी ,महंगाइ कम हो जायेगी लकिन मै जानना चाहुगा कि क्या सरकार के पास इतने परमाणु रेअक्टेर है जिनसे पुरे देश को बिजली मिल सके?
जवाब है नही।
तो फ़िर आख़िर क्या फायदा है इश परमाणु करार का?
क्यों इस मुदे पर बाकि सभी जरुरी मुददों को दबाया जा रह है?
क्या जनता इतनी बेवकूफ है जो अपने से जुड़े मुददों को छोड़ केर परमाणु करार पर वोट देगी?
इन सवालो का जवाब ढूँढना वास्तव में आज कि जरूरत है.

मुंबई नवभारत टाइम्स से..........


१३ जुलाई के नभाटा मुंबई संस्करण ने भडास की मुहीम को महानगर के पन्ने पर जगह दिया है, चुकि नभाटा का ईपपेर नही है सो मैं इसे भड़ास पर डाल रहा हूँ। और नभाटा को इस मुहीम का पक्ष रखने के लिए साधुवाद देता हूँ ।
जय जय भड़ास

चंदा जो मिलता है

एसे लिमटेड कंपनिया कराती है हमारी धार्मिक धरोहरों का संरक्षण। पिस्म सीमेंट ने कितना अच्छा तरीका निकला है । अपने विज्ञापन के लिए ........... ये फोटो सतना जिले की माधवगढ किले की मन्दिर की है। ये सब बीजेपी और बजरंग दल वालो को दिखाई नही देता। गाय मर जाय तो कमीने आदमी को मार डाले, हड़ताल के नाम पर किसी शहर में दंगा कर सकते है। किसी की जान ले सकते है, पर ये सब नही दिखता। क्योंकि पार्टी को चंदा जो मिलता है।

माँ

मुझ से दूर ही रह रही हैं
माँ की चिता से उठती लपटें
मैं स्फुलिंग से डरता था
माँ को अब तक यह याद है
प्रणव सक्सेना
स्फुलिंग -चिंगारी

दो लोगों की सदस्यता भड़ास से खत्म

दो लोगों की सदस्यता भड़ास से इसलिए खत्म की जा रही है कि ये दो लोग अपने मोबाइल नंबर, नाम और पते भड़ास संचालन समिति के पास नहीं भेज पाए हैं और बिना भेजे ही भड़ास पर छुपी पहचान के साथ कई तरह की विवादित पोस्टें डाल रहे हैं। ये लोग फर्जी नाम से पोस्टें लिख रहे थे। कृपया इन दोनों लोगों से गुजारिश है कि पहले वे अपने बारे में संपूर्ण डिटेल भेजें। उसके बाद उन्हें भड़ास की सदस्यता के लिए फिर से लिंक भेज दिया जाएगा।
यशवंत

13.7.08

राजस्थान पत्रिका में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी- ब्लॉग बोलता है

राजस्थान पत्रिका ने आज के अंके में संडे के परिशिष्ट में हिंदी ब्लागिंग पर स्टोरी प्रकाशित की है जिसे लिखा है मशहूर हिंदी ब्लागर शैलेश भारतवासी ने। इसमें भड़ास के बारे में भी जिक्र है। यहां भड़ास के बारे में जो कुछ प्रकाशित हुए है, उसे हू ब हू दे रहा हूं ताकि बाकी भड़ासियों को भी पता चल सके....

पत्रकारों के ब्लॉग सबसे आगे
हिंदी ब्लागिंग में अभी पत्रकार ब्लागरों का प्रतिशत सबसे अधिक है। इस बात का अंदाजा यहां से लगाया जा सकता है कि हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले कम्युनिटी ब्लाग भड़ास http://bhadas.blogspot.com में 300 से अधिक कांट्रीब्यूटर हैं और अधिकाधिक पत्रकार हैं। इस ब्लाग पर हिंदी पत्रकारों की जाब छोड़ने-पकड़ने की जानकारी भी मुहैया कराई जाती है। भड़ास पर अभद्र ब्लाग का आरोप लगने पर ब्लाग प्रमुख यशवंत सिंह कहते हैं, ''हम तो खुद कहते हैं कि हम फटेहाल, परेशान, कुंठित, दमित, डरे हुए लोग हैं, जो गांव देहात से आए हैं और शहर के अजनबीपन और प्रोफेशनलिज्म में अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं।''

पूरी स्टोरी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं

थैंक्यू नवभारत टाइम्स, मुंबई- करूणाकर के लिए भड़ास की मुहिम को सराहा

जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है....


करूणाकर के मामले को और भड़ास के अभियान को अब मुंबई के एक प्रतिष्टित अखबार नवभारत टाइम्स ने कवरेज दी है, जिंदगी और बता, तेरा इरादा क्या है शीर्षक से। अगर आप मुंबई के रहने वाले हैं तो करूणाकर की ख़बर पेज नम्बर पांच पर नवभारत टाइम्स में ज़रूर देंखें। डाक्टर रूपेश जी और रजनीश भाई से अनुरोध है कि इस कवरेज को भड़ास पर डालें ताकि बाकी भाई भड़ासी भी पढ़ सकें। मुंबई में आज प्रकाशित स्टोरी को पढ़कर मुंबई से बहुत से लोग करूणाकर से जुड़ गए हैं। कई लोगों ने करूणाकर के लिए आर्थिक मदद भी दी है।

मुंबई के वार्ष्णेय चेरीटिबल ट्रस्ट के दिनेश वार्ष्णेय ने करूणाकर को 2000 रुपये की मदद की है जो कि सोमवार तक उसके खाते में आ जायेगी। इसके साथ ही नोएडा के सेक्टर 18 में कपड़े का शोरूम चलने वाले अमित गुप्ता ने 500 रुपये, अमर उजाला के सीनियर सब एडिटर गौरव त्यागी ने 1000 हज़ार रुपये और अजय नथानी जी की अगुवाई में उनके स्पोर्ट्स डेस्क ने भी 1000 रुपये देने का वादा किया है। ये सभी लोग ये राशि सोमवार को करूणाकर के खाते में जामा करवा देंगे। भड़ास परिवार इनका हार्दिक आभार व्यक्त करता है।

इन लोगों ने करूणाकर की तबीयत के बारे में जानने की इच्छा जताई। मैं इसके लिए माफी चाहता हूँ की करूणाकर की कुशल क्षेम भड़ास पर नहीं दे सका। पर आज मैं आपको सारी जानकारी दे देता हूँ।

करूणाकर अब पूरी तरह से स्वस्थ महसूस कर रहा है। उसे भूख लग रही है तथा नींद भी अच्छी आ रही है। डॉक्टर साहब के दवाइयों को नियमित सेवन कर रहा है और उनके बताए परहेज व चिकित्सा विधि का पालन कर रहा है। अभी जब मैंने उसे फोन किया तो नेटवर्क सही नहीं आ रहा था तो करूणाकर फोन लेकर अपनी छत पर लकड़ी की सीढियों के सहारे चढ़ गया, मुझसे बात करने के लिए। वहां जब वो बात कर रहा था तो उसकी सांसें ऊपर नीचे हो रहीं थीं। मैंने उसे खूब डांट लगाई की अब आगे से ऐसा मत करना। डांट खाकर वो सॉरी बोल रहा था पर वो बात करते हुए पूरी तरह से खुश था।


वैसे आपको ये बताना ज़रूरी है कि डॉक्टर रूपेश जिस तरह से उसकी मदद कर रहें हैं, वैसा और कोई भी करूणाकर के लिए नहीं कर सकता था क्योंकि पैसा तो हर कोई दे सकता है पर इलाज़ तो एक डॉक्टर ही कर सकता है।

फिलहाल इतना ही, मैं अगली पोस्ट ज़ल्द लिखूंगा।

-अमित द्विवेदी

देवर के मायने

रात वोदका का आचमन कर सोया था।नींद अच्छी आई।लेकिन सुबह-सुबह सेलफोन बज उठा.गुस्सा तो बहुत जोर का आया पर यह सोच कर फोन उठा लिया कि कहीं फोन बास का न हो.शायद ख़बर में कोई गलती चली गई हो.हालांकि ऐसा था नहीं.फोन भौजाई का था.मेरे हलो करते ही उन्होंने सीधा सवाल किया,रात दफ्तर से कितने बजे लौटेगो ? क्यों भौजी.कोई खास बात है क्या? रात को खाना खिलाना चाहती हो?मैने भी बजाय जवाब देने के उनसे एक साथ तीन सवाल कर डाले.उधर से भौजाई की आवाज आई,नहीं.आज शनिवार है.रात में सब्जी खरीदने बाजार चलना है.तुम्हारे भैयू जी बाहर गए हैं.सब्जी का झोला काफी वजनी हो जाता है.सो वह साथ में जाते हैं.झोला उठा कर लाते हैं.आज यह काम तुम्हें करना पड़ेगा.मैंने मुसीबत छुड़ाने के लिए कहा.भौजी मैं भैयू जी की जगह कैसे ले सकता हूं.क्यों ? भौजाई की आवाज आई,तुम मेरे देवर हो.और देवर वही होता है जो दे वर का काम.सो तुम्हें सब्जी का झोला तो ढोना ही पड़ेगा.यह तो कहो कि मैं भैयू जी द्वारा किए जाने वाले अन्य ढेर सारे काम तुम्हें नहीं सौंप रही हूं.मेरा अहसान मानो.मैंने जवाब दिया,भौजाई आपका आदेश मानना मेरी मजबूरी है. लेकिन कभी इनवर्टेड कामा वाला काम के लिए भी तो देवर को आजमा कर देखो...हां,हां वह भी कभी सौंपूंगी,लेकिन इस बार नहीं.इस बार तो उसकी डेट तक तुम्हारे भैयू जी वापस आ जाएंग.अब मेरे सामने भौजाई का आदेश शिरोधार्य करने के अलावा कोई चारा नहीं था.हालांकि मै जानता था कि वह डेट कभी नहीं आएगी.क्योंकि भौजाई मुझे यह आश्वासन ३२१वीं बार दे रही थीं.हर बार भैयू जी उस डेट के पहले लौट आते हैं.भौजाई डेट ही ऐसी तय कर उन्हें बाहर भेजती हैं.हम जैसे उल्लू को सब्जी का झोला उठाने के लिए देवर की मनमाफिक परिभाषा गढ़ लेती हैं.

सीईओ की तानाशाही चरम पर

लूमर बैठा न्यूज़ चैनल की वर्तमान स्थितियों के बारे में सोच ही रहा था की उसे कुछ विशेष ख़बर मिली । इससे पहले भी इस चैनल की कहानी आप सभी को बताया था .एक रांची बेस्ड न्यूज़ चैनल जो अभी आने की तैयारी में है ,वो बिहार-झारखण्ड में बहुत सारे "प्रोजेक्ट लेकर मीडिया हाउस के नाम पर खेल खेलना शुरू कर दिया है, जिनमें कृषि,हेल्थ,सुगर मिल,मेडिकल कॉलेज & हॉस्पिटल, बिहार के सारे अस्पताल में दवा की दुकानें खोलना शामिल है।ताजा ख़बर के अनुसार uria- बीज को लेकर खेल भी शुरू हो गया है। इसी खेल को लेकर पिछलेl माह बिहार के कुछ कैबिनेट मंत्रियों के साथ कई बैठकें हो चुकी है .ख़बर यहाँ तक है की उन मंत्रियों के ऊपर "विशेष ध्यान "दिया जा रहा है। अब देखना है की ये लोग क्या गुल खिलते है। वैसे चर्चित मीडिया हाउस ने २५ अप्रैल को रांची में अपना एक प्रोग्राम रखा था जिसमें झारखण्ड के मुख्य मंत्री मुख्य अतिथि थे। उस कार्यक्रम में मीडिया हाउस के चेयरमैन भी उपस्थित थे ।i कुख्यात सीईओ ने अपनी बातों से मुख्य मंत्री को फंसाने की भरसक कोशिश की । लेकिन मुख्य मंत्री महोदय सीईओ के जाल में नही फंसे। वैसे उस कार्यक्रम के लिए लालू जी को आमंत्रित किया गया था,किंतु वो सिंगापूर के बहने बच निकले .आप सोच रहे होंगे की लालू जी को बहाना बनने की जरुररत क्यो पड़ गई .बात दरअसल यह थी की उनको बुलाने की जिम्मेदारी बिहार इंचार्ज को सौंपा गया था जिसे लालू जी बहुत चाहते रहे हैं.वैसे उसी ने अपनी कंपनी के लिए अनेक विभागों से कई टेंडर तक निकलवा दिया .लेकिन............... । आजकल सुनने में आया है की बिहार के एक विख्यात मंत्री के साथ सीईओ खूब खिचडी पका रहा है. अब तक अनगिनत बैठकें हो चुकी है। लेकिन नीतिश की सरकार में खिचडी कितनी पकती है यह तो समय ही बतायगा । अंधेर नगरी चौपट रजा एक और ख़बर --सीईओ ने अपने दर्जन भर स्टाफों ko bahar निकाल दिया है.कारन भी अलबेला है --उसने सभी को महीने में तेरह-पन्द्रह स्टोरी करने का काम दिया ,साथ ही साथ एक पत्रिका का एक हज़ार ग्राहक बनाने का अतिरिक्त टास्क दे दिया .बेचारे क्या करते सीईओ सब से पंगा ,न बाबा न । उन लोगों ने किसी तरह कुछ ग्राहक महीने भर के अन्दर बना सके .टारगेट का पुरा नही होना उनके लिए आफत लानी के लिए काफी था . .....और बहार कर दिए गए.उन लोगों का दो -तीन माह का वेतन भी रोक दिया गया ।

क्या लौटेगी हरियाली

चंबल में इन दिनों खूब पानी है। बरसात से पहले नदी की धारा सिकुड़ गई थी। अब वह पूरे तेज पर है। चंबल के क्षेत्र में पानी की कमी से हालात यह हो गए हैं कि गांव बूढ़ा गए हैं। मतलब साफ है गांव के जवान काम की तलाश में बाहर हैं। गांव का गंवईपन गायब हो गया है। जो जवान गांव में बचे भी हैं वह जवानी में ही बूढ़े हो गए हैं। खेत खाली हैं और घर के कोठर से अनाज। कई सालों के बाद चंबल क्षेत्र में अच्छा पानी हुआ है। इन पानी से फसल की उम्मीद तो अधिक नहीं लेकिन जल स्तर में सुधार होना संभव है। हालांकि दृषिटहीन प्रशासन ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है कि जिससे गांव का पानी गांव में रह सके। जनता के बीच भी ऐसी कोई पहल नहीं दिखाई दे रही है। हां गांव और खेतों के पेड़ जरूर गायब हो गए हैं। हालात दिन ब दिन खराब हो रहे हैं। इस बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूंगा लेकिन हालात ऐसे हैं जो दिल्ली और प्रदेश की अन्य राजधानियों में बैठे लोगों की समझ में नहीं आएंगे। उम्मीद है कि अगर ऐसी ही बारिश हुई तो खेत से लेकर आंख तक हरियाली लौट आएगी।

12.7.08

राम राज्य में ऐसा भी

मेरे जिम में दो लडकियां आती हैं। वो जिम में व्यायाम करने कम बल्कि इसका पता लगाने आती हैं की जिम में उन्हें कितने लोगों से कमेन्ट मिलता हां। उनकी आदत ठीक एक नए ब्लोगर की तरह है जो अपने हर पोस्ट पर ये देखना चाहता है की उसे लोगों से कितने कमेन्ट मिले हैं. इसे जानने के लिए वो अपने ब्लॉग का सबसे अधिक विज़िट करने वाला होता है पर बाद में ये देखकर खुश हो जाता है की आज उसे इतने लोगों ने विज़िट किया भले ही उन विजिटर में उसकी ख़ुद की संख्या ९० फीसदी होती है. तो मैं उन लड़कियों की कहानी सूना रहा था. तो जिम का कोई भी ऐसा बन्दा नही है जो उनसे वाकिफ ना हो. तीन घंटे रोज़ जिम में बिताने के कारन एक मैडम तो सूख के मिनुस जेरो साइज़ में पहुँच गयी हैं. फिर भी वो रोज़ एब्स और लेग्स का व्यायाम करती हैं. वैसे मुझे वो क्या करती हैं इससे मतलब नही होना चाहिए पर इसे बताना इसलिए ज़रूरी थी क्यूंकि किसी और की कहानी में उनकी ये भूमिका देनी ज़रूरी थी ठीक सरस्वती बंदना की तरह. एक दिन मेरे पास एक लड़का आया जो की मुझसे रोज़ जिम में हेल्लो करने आता है. उसने उस लडकी का नाम लेकर उसे गलियाँ देने शुरू कर दीं और कहने लगा देख अमित उसने ख़ुद मुझे मिलने के लिए बुलाया और मेरी बेईज्ज़ती कर दी. बता मैं इस कु... का क्या करूं देखना ये कभी खुश नही रहेगी अपनी ज़िंदगी में. मैंने इसके बाद नोटिस करना शुरू किया की आख़िर माजरा क्या है जो लड़के इससे दो तीन सप्ताह तक तो बिना उससे हेल्लो ही किए बगैर व्यायाम नही शुरू करते थे. अब उसके पास भी नही जाते. तो मुझे बाद में पता चला की इस लडकी को ये सब करने में मज़ा आता है. जो उनकी जाल में फंसा उसकी बेईज्ज़ती पक्की. इसके बाद इनमे से कोई भी उनसे बात नही करता. वैसे मेरा जिम ऐसा है जो बहता पानी है हर रोज़ वहां नए बन्दे बॉडी बनाने आते हैं. और मैडम अपनी खावाहिस पूरी कर लेती हैं. अब सोच रहे होंगे की मैं उसके चक्कर में क्यूँ नही फंसा तो मैं आपको बता दूँ मैं भी नम्बर में था. पर उस लड़के ने मेरी आँखें खोल दी थीं जो उनके चक्कर में आ चुका था. पर यार ये देखने में बहुत अच्छा लग रहा है. और अब तो एक ही बात दिल से निकलती है की अच्छा जी राम राज्य में ऐसा भी होता है.
अमित द्विवेदी

अंटी अपनी बापू की

सबसे पहले में ये जानना चाहता हु, क्या दिल्ली की हर घटना राष्ट्रीय न्यूज़ है ? हिंदुस्तान का चर्चित आरुसी हत्या कांड - सीबीआई के अनुसार डॉ तलवार हत्यारे नही है बल्कि तीनो नौकर है। लगातार पिचले ५० दिनों से चले आ रहे इस ड्रामे में मीडिया अब पुलिस को गुनाहगार मन रही है। साथ ही डॉ तलवार के परिवार वालो से पुलिस के खिलाफ जहर भी उगलवा रही है। क्या मीडिया कभी अपने को भी देखती है कि वो कहा खड़ी है ? तलवार परिवार कि बदनामी के पीछे .................... क्या मीडिया कि भूमिका नही ? या फिर चिट अपनी, पट अपना और अंटी अपनी बापू की ,

२४ ghante khabro के पीछे भागने wale कब तक किसी chij की parwah किए बिना अपनी खबरे देते रहेंगे, मीडिया वाले ही बताये क्या तीनो नौकर (सीबीआई अनुसार हत्या के अपराधी घोषित है ) को अदालत में अपराधी साबित किया जा सकता है, अगर ये भी पाक साफ सिद्ध हो गए तो फिर मीडिया किस पर आरोप लगयेगा।

भारत भूषण
सतना

एक संस्मरण...............

अभी कुछ दिनों पूर्व में मुंबई में था, वहां से चलने की बारी आयी तो अपने परिवार से मिलने की तमन्ना भी सबसे पहले। डॉक्टर साब को बताया तो डॉक्टर साहब ने कार्यक्रम भी तय कर दिया। जगह था नवी मुंबई का वाशी स्टेशन जहाँ हमारा परिवार मेरे लिए जमा था और मैं अपने आप में लाखों खुशियों को समेटे इस परिवार की सन्निकटता महसूस कर रहा था।

मनीषा दीदी रुपेश भाई को इडली खिला रहीं हैं

दीदी इडली मेरे लिए भी !!!!!!!



दीदी का मातृत्व भाव और मैं भावःविह्वल और आह्लादित डॉक्टर साब



न्याय के लिए दो सिपाही हुए साथ

दो भडासी मंथन करते हुए

हमारी आपा और आपा के दो नौनिहाल रजनीश और रुपेश

ये एक छोटा सा भड़ास परिवार मिलन समय था कहने सुनने को बहुत कुछ जो बाद में मगर पहले इन्तेजार कीजिये की इडली के साथ वाला साम्भर कहाँ गया.
जारी रहेगा.................

सूचना के अधिकार पर ब्लॉग

प्यारे भडासी भाइयो,
कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर सूचना के अधिकार पर एक ब्लॉग बनाया है। इसे सूचना के अधिकार की पाक्षिक पत्रिका अपना पन्ना के सदस्य संचालित करते हैं। मैं इस पत्रिका से जुडा हुआ हूँ। आशा है भडासी मित्र अपने सुझावों और कमेन्ट से हमारा उत्साह वर्धन करेंगे।
ब्लॉग का पता है
www.rtihindi.blogspot.com

यशवंत जी और जागो रे जागो

गतसप्ताह पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन के तत्वावधान में भगवान सिंह हंस काव्य-संध्या का आयोजन स्थनीय गांधी शांति प्रतिष्ठान,दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली में आयोजित किया गया. इस कविता-अनुष्ठान में सभी भड़ासी बंधु सादर आमंत्रित थे. इस मौके पर हमारे भाडासानंद यशवंत सिंह का "जागो रे जागो" ऊपस्थित लोगों में एक नया जोश का संचार कर गया। एक छोटी सही झलकी.......


छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में भारी अनियमितता

परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किया तो चपरासी बनने के लायक नहीं और कम अंक प्राप्त किया तो नायाब तहसीलदार के पद पर बिठा दिया। ऐसी कहानी एक-दो नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सामने आए है। ये मामलें है छत्तीसगढ लोक सेवा आयोग का। जहॉ सूचना के अधिकार के तहत परीक्षाथियों के चयन में भारी संख्या में अकल्पनीय भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है।

अच्छी परीक्षा और संतुष्ट साक्षात्कार देने के बाद जब कई परीक्षार्थियों का चयन नहीं हो पाया, तो अभ्यार्थियों ने सूचना कानून के तहत इस परीक्षा के उत्तर पुस्तिका दिखाने के मांग की। आयोग ने इसे नियम-कानून का हनन का दलील देकर उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया। लेकिन बड़ी संख्या में छात्रों के आंदोलन के बाद बात वहॉ के विधानमंडल तक पहुंची तो पहली खेप में 15 छात्रों की उत्तर पुस्तिका दिखाई गई। लेकिन इसके तुरंत बाद केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश के तहत और उत्तर पुस्तिका दिखाने से मना कर दिया गया। दिखाइ गई 15 उत्तर पुस्तिका को देखने के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिसमें पाया गया कि उस 15 उत्तर पुस्तिका में से 9 उत्तर पुस्तिका के जांच में गड़बड़ है। इनमे 300 अंक के एक विषय, जिसमें 60 अंक के 5 प्रश्न थे। जिसके उत्तर पुस्तिका में 60 अंक के उत्तर को 75-75 अंक का मानकर केवल चार उत्तरों को ही जॉचा गया था। इसी विषय के कुछ अन्य उत्तर पुस्तिका के 5 प्रश्नों में दो प्रश्न को 50-50 अंक और शेष 3 को 60-60 अंक के आधार पर जांच कर दिया गया था। साथ ही प्रश्न के सही जवाब लिखने पर 20 में से 10 अंक मिले और इसी प्रश्न के असंबंधित उत्तर देने पर एक अभ्यार्थी को 20 में से 13 अंक दे दिया गया था। इसी तरह संक्षिप्त नोट के प्रश्न पर पूर्ण गलत उत्तर लिखने पर भी पूरे अंक दिए गए थे। इसके अलावा अन्य विषय में अनुवाद के सही जबाव देने पर शून्य अंक दिया गया। इस तरह की कई गड़बिड़या पाई है। आयोग द्वारा संचलित न्यायायिक सेवा परीक्षा में एक परीक्षार्थी के पूरे उत्तर पुस्तिका के जॉच के बावजूद बीच के दो पृष्ठ (पेज नण् 10, 11) को जांच ही नहीं किया गया था। इसी प्रकार आयोग के गूढ़ हथियार स्केलिग प्रणाली में भारी गड़बड़ी पाई गई है। राजेश कुमार(रोल न 105188 वर्ष 2003) के सांख्यकी के 300 अंक की परीक्षा में स्केलिंग के बाद 304 अंक दे दिया गया था। एक अन्य अभ्यार्थी ग्रजेस प्रताप सिंह(रोल न 66136) अपराध शास़्त्र में 233 अंक मिले थे जिनका स्केलिंग बाद शून्य कर दिया गया था। इसके अलावा एक अन्य चयनित छात्र राजू सिंह चौहान (रोल न 31106) ने एक वैकल्पिक विषय में 182 अंक प्राप्त किए थे जिनका अंक स्केलिग के बाद 188 अंक कर दिया गया। इसी तरह दो अन्य छात्र जिन्होंने एक सांख्ययिकी में 235-235 अंक प्राप्त किए थे। स्केलिंग के बाद उसे शून्य बना दिया गया। मानव शास्त्र विषय के छ: विद्यार्थियों (16834, 102564, 40912, 77632, 97129, 102526) ने 300 में प्रत्येक ने 200 अंक प्राप्त किए थे। जिसे स्केलिंग के बाद क्रमश: 170, 210, 205, 196, 196, और 239 कर दिया गए थे। इसी परीक्षा में वषाZ डोगरे का कर्ट माक्र्स से उपर 1290 अंक प्राप्त करने के बाद भी चयन नहीं किया गया। जबकि उससे नीचे 1274, 1273, 1247 अंक प्राप्त करने वाले कई अभ्यार्थियों का चयन कई पदों पर चयनित किया गया है। इसी प्रकार इस परीक्षा की टॉपर रही पदमीनि भोई जिन्होंने कुल अंक 1481 प्राप्त किए थे और स्केलिग के बाद इसका कुल अंक 1501 कर दिया गया। साथ ही कुन्दर कुमार जिन्होंने कुल अंक 1523 अंक प्राप्त किए थे। जिनका स्केलिंग के बाद कुल अंक 1314 कर दिया गया। लेकिन कुन्दन का किसी भी पद पर चयन नहीं सका था।

इन्हीं आंकडे़ के आधार पर आवेदकों द्वारा बिलासपुर उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई, तो आयोग के अध्यक्ष अशोक दरवाड़ी ने स्वीकार किया कि आयोग ने परीक्षा में बड़ी मात्रा में गड़बड़ी की है। जिस पर उच्चतम न्यायालय में केस चल रही है। जिन्हें वर्तमान मे जमानत पर रिहा किया गया है। साथ ही आयोग के एक अन्य सदस्य अमोद सिंह फरार है।
साभार: अपना पन्ना `` सूचना के अधिकार पर एक अर्द्धमासिक पत्रिका´´
अर्जुन कुमार बसाक

मत सिरिसियाव भाई

अरे ई डाक्टर रूपेसवा का का हुइ गवा है.ई तो बात-बात मा सी(रिसिया)जाता है.भैयू,जब हम पहले ही कहि दिहिन की हम किरानिक बत्तमीज हैं.तो हमरी बात का काहे क बुरा मानत हो.अरे इ सब कौनउ सास्तर में नाहीं लिखा है.इ तो हमारी खोपड़िया की उपज है.हम व पीसी रामपुरिया जैसे परमामेंट भड़ासी इ कसम खा के दुनिया में आए हैं कि सबको बुरा-बुरा बताएंगे.भला तो सबै बताइ सकत है.बुरा तो हमहीं बताइ सकत हैं न.अब एक बात हम अउर बताइ देई.दिल्ली आए हमका अबहीं सिरफ सात महीना हुआ.ईके पहले हम पांच साल हरियाना (पानीपत)में रहिन.हरियाना जानत हो ना.जित दूध दही का खाना,देसा मं देस हरियाना.तो हुआं हम एक होटल मां गए.होटल मां हरियाणवी ताऊ व ताई आय रहें.अपने वियाहे कै सालगिरह मनावे.दूनौ जने रात मां सुहागरात मनाएं,खाएं पिएं.जाए लागें तो होटल वाला बिल दिहिस.बिल देख के ताऊ कहेन मन्नै तो दाल मखनी कोनी खाई.होटल वाला बोला आपने नहीं खाई तो क्या तैयार तो थी.अइसने ढेर आइटम कै पैसा होटल वाला बिल मां लिखे रहा.ताऊ बेचारे हयरान रहें.का करैं.एतने में ताई बोल पड़िन.थारा बिल चार हजार का.म्हारा पांच हजार का.एक हजार दे इब हम चाले.अब होटल वाला भौचकिया गया.बोला आपका कैसा बिल? तौ ताई कहीं,तन्नै म्हारे को छेड़ा इसका.होटल वाला बोला,मैनैं कब छेड़ा.ताई बोली,तन्नै छेड़ा या नहीं मन्ने तो तैयार थी.

जो चिकने घडे़ हैं

जो चिकने घड़े हैं
हाथ जोड़कर दांत निपोरते खड़े हैं
जो जुल्म करने वालों को मसीहा
और जुल्म को अपनी नियति समझते हैं
जो समझते हैं कि अपनी चमड़ी बचाने के लिये
तलुए चाटना बहुत जरूरी है
जो लड़ाई के हर मोर्चे पर सबसे आखिर में
और प्रसाद पाने के लिये सबसे पहले खड़े पाये जाते हैं
जो बिकट गंदी से गंदी गालियों को भी श्रद्धापूर्वक
प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं
नंगा कर देने पर भी जिनका खून नहीं खौलता
थूक कर चाटने की विधा को जिन्होंने
ललित कला का दर्जा दिलाया है
जो मक्खन से ज्यादा मुलायम और
बर्फ से भी ज्यादा ठंडे हैं
जिनकी रीढ़ की हड्डी
आस्था से तर्क की तरह गायब है
ऎसे बिलबिले
गिलगिले
लिजलिजे केंचुऒं से
डर तो नहीं लगता
पर घिन बहुत आती है ।

दिनेश चौधरी

नोकिया एन सीरिज का प्रमोशन ऑफर

मित्रों,
अभी मुझे एक मेल मिला, मेल में नोकिया की तरफ़ से प्रमोशन ऑफर का जिक्र है,

FROM: NOKIA N SERIES PROMOTION
DATE: Thu, 10 Jul 2008 6:29:39 -0400
SUBJECT: NOTICE!!!(You Have Won)

FROM THE DESK OF THE MANAGER NOKIA N'SERIES PROMOTION Your e-mail was attached to ticket number 1110002786, serial number 6022345. This batch draws the lucky numbers as follows 4-13-7-37-1 bonus number 20, which consequently won the lottery in the First category. You hereby have been approved a lump sum of GBP 1,000,000.00(ONE MILLION GREAT BRITISH POUNDS).To file for your claim,Please contact our Fiduciary Agent for वलिदेशन

: Mr James Keegan।
Email: james.keegan@live.com

Regards, Dr Mrs। joys johnson
NOKIA! 2008 Lottery program

तो क्या नोकिया का ये नया व्यापार है रातोरात लखपति करोड़पति और पता नही कोन कोन सा पति।
दृष्टिपात करें.
जय जय भड़ास




इन्फोसिस का शुद्ध मुनाफा 1302 करोड़

इन्फोसिस का शुद्ध मुनाफा 1302 करोड़
बंगलौर। वैçश्वक मंदी के बावजूद प्रमुख आईटी कंपनी इनफोसिस टेक्नोलॉजी ने चालू वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में राजस्व में 28.7 प्रतिशत की वृदि्ध दर्ज की है। शुक्रवार को कंपनी द्वारा जारी परिणाम के मुताबिक 30 जून को समाप्त अवधि के दौरान कंपनी की कुल आय 4,854 करोड़ रुपए रही।

कंपनी ने पिछले साल के मुकाबले इस साल 20.7 प्रतिशत ज्यादा शुद्ध मुनाफा कमाया है। टैक्स अदा करने के बाद कंपनी ने 1,302 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ अर्जित किया है। कंपनी का ईपीएस 20.4 प्रतिशत बढ़कर 22.75 रुपए हो गया है जबकि पिछले साल प्रथम तिमाही की समाçप्त पर यह 18.89 रुपए था। कंपनी के कुल राजस्व में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है जिससे कुल कोष 202 करोड़ से बढ़कर 216 करोड़ हो जाएगा।

मुख्य बिंदु:
कुल आय 4854 करोड़, बढ़ोतरी 28.7 प्रतिशत
शुद्ध मुनाफा 1302 करोड़, बढ़ोतरी 20.7 प्रतिशत
ईपीएस 22.75 रुपए
कंपनी और इसकी अनुषंगी इकाईयों से जुड़े 49 नए ग्राहक

* यद्यपि वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चतता की स्थिति बनी हुई है और कुछ समय बाद यह आईटी उद्योग को प्रभावित कर सकती है हम विकास की कई संभावनाएं देख रहे हैं, क्योंकि हमारी नजर ग्राहकों में अपनी क्षमता बढ़ाने की बेचैनी पर है।
—एस गोपालकृष्णन, सीईओ, इंफोसिस टेक्नोलॉजी

यशवंतजी के नाम sandesh

प्रिय यह्श्वन्त्जी,
भड़ास का मैं नियमित पाठक और हिस्सेदार हूँ.अभी कुछ दिनों सीक सज्जन की रचनाये भड़ास के स्टार की नही लग रही क्योंकि मेरा मानना हे,गाली-गलौज किसीभी भाषा का साहित्य नही हो सकता.अभीतक भड़ास पर पंडित सुरेश नीरव सरीखे साहित्यकारों की रचनाये पढने को मिलती थी,परन्तु आजकल गाली-गलौज पढने को मिल रही है.भड़ास मैं संभ्रांत महिलाए भी सदस्य हैं,लिहाजा ऐसी रचनाओं से बचना ही चाहिए क्योंकि ऐसी रचनाये ब्लॉग की गरिमा को धूमिल करती है।
विश्वास हें कि आप मेरे सुझाव पर गौर करेगे।
शुभचिंतक
Maqbool

कातिल बाप से बेगुनाह बाप तक की कहानी

मीडिया यानी की देश का चौथा स्तम्भ। इसकी कहाने ऐसी है जो कभी भी बदल सकती है. पिछले ५७ दिनों से चल रहे आरुषि के ड्रामे में मीडिया को जो रोल रहा वो बिल्कुल गैर जिम्मेदाराना रहा. सिर्फ़ एक्स्लूसिव ख़बर के चक्कर में जो खबरें मीडिया ने अपनी मर्जी से दिखाईं उसे भी सीबीआई ने बेगुनाह करार दे दिया. शुक्रवार को जब ये ख़बर सीबीआई के तरफ़ से आयी. बस मीडिया वालों का रंग बदल गया. फिर से एक नयी कहानी सबने शुरू कर दी. चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज़ में दिखाया की आख़िर क्या दोष था एक मासूम पिता का. क्यूँ उसे इतनी बड़ी सज़ा दीगयी. अब इन उल्लू के पाठों को कौन बताये की उस बाप को पुलिस से ज्यादा मीडिया ने कातिल ठहराया था. अपने कार्टून के ज़रिये ये सब दिखाया गया की किस तरह से डॉक्टर तलवार ने पहले अपनी बेटी को मारा इसके तुंरत बाद चाट पर ले जाकर नौकर को मर दिया. तकरीबन दो महीने तक मीडिया इस तरह से डॉक्टर तलवार के पीछे पडी रही और ये भी कहने से नही हिचकी की सीबीआई डॉक्टर को बचने की कोशिश कर रही है. अचानक सारा का सारा माहोल ही बदल गया है. अब डॉक्टर को मीडिया एक प्यार करने वाला पिटा बता रही है जिसकी ज़िंदगी का बस एक मकसद उसकी बेटी थी. एक चैनल ने आरुषि के स्विमिंग पूल के विडियो को दिखाकर उसमे ये संबाद बनने की कोशिश कर रहा था जिसमे डॉक्टर तलवार उस चैनल के अनुसार आरुषि को गहराई में ना जाने को बोल रहे थे. तथा आरुषि उन्हें बोल रही थी नही पापा मुझे तैरना आता है. अब आप ख़ुद अंदाजा लगाइए क्या ये वोही राम की धरती है जहाँ लोग रामराज्य में रहते थे. इन मीडिया वालों पर भी अब कोई कानून होना चाहिए जो इन्हे कुत्तों के तरह व्यवहार करने से रोक सके. नही तो ऐसे ही बेगुनाहों के ये जिंदगियां तबाह करते रहेंगे और इन्हे सरकार भी चौथा स्तम्भ कह कर इन पर कोई लगाम नही लगा पायेगी. अब आप ही सोचिये क्या मीडिया का मतलब कहीं से भी ये होता है. बिना तथ्यों को जांचे परखे प्रस्तुत करना खून करने भी बड़ा गुनाह होता है. ये भारतीय कानून नही बल्कि इंसानियत के कानून के अंतर्गत आता है. वैसे मैं आप को बता दूँ इस पर हमें ही शुरुआत करनी है तभी रामराज्य का सपना साकार हो पायेगा.
अमित द्विवेदी

Three pegs for two

Hangover of Delhi visit is still there. Its about a visit to the Press Club. I had forgotten my GMC card and without that it was "no entry".

Yashwant Singh of Bhadas who was with me had his sharp eye roving on the notice board of the Club while I searched for some friend to get us in. Ultimately, Ashok Bedi helped me get entry as his guest. We ordered two pegs. But, the waiter placed three on our table. The odd number three was a quiz for me. Yashwant drew my attention to the announcement of three pegs for two on the notice board. However, one peg free was a news for me and Yashwant suggested that I must have it in the Newsletter that there is incentive scheme in liquor also get three pegs for two.

While coming out , I saw Pradip Saurabh , a regular feature of the Club in his charateristic style. There was Amit Mukherjee with his friends on a table. Like many in Delhi, Amit was also curious to know the truth of the TOI issue. While parting , I could not resist myself and asked his Do kaa teen business.

He said that it happens whenever there is some scheme from the liquor company.This literally killed the news. But, in the interest of Delhi journalists who do not visit the Press Club and others elsewhere in the country , it must be a news. And so, friends I have the news that you can drink more paying less!!!!!

-Yogesh Sharma
http://www.gujaratglobal.com/
साभारः गुजरात ग्लोबल डाट काम

भड़ास4मीडिया पर पदमजी का संपूर्ण इस्तीफानामा जल्द

हिंदी मीडिया के मशहूर खेल पत्रकार पदम पति शर्मा उन दिनों दैनिक हिंदस्तान में बनारस में सहायक संपादक हुआ करते थे। उन्होंने 26 अप्रैल 2002 को अपने अखबार के प्रधान संपादक को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। पत्र को मेल से भेजने के तुरंत बाद उन्होंने संस्थान को टाटा बाय बाय बोल दिया। पदम जी का वह इस्तीफानामा कई मायनों में ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। तीन दशकों तक हिंदी प्रिंट मीडिया के लिए खेल पत्रकारिता के पर्याय रहे पदम जी ने इस्तीफे में अपने पूरे खेल जीवन के मर्म को निचोड़कर रख दिया है।

इसमें उन्होंने अपने जीवन, अपने करियर, अपने मिशन, अपने दुखों, अपनी भावना, अपनी सोच को उजागर किया है। यह इस्तीफानामा भड़ास4मीडिया को एक अनाम सज्जन ने मेल के जरिए उपलब्ध कराया। पत्र पदम जी का ही है, यह कनफर्म करने के लिए भड़ास4मीडिया टीम ने पदम जी से संपर्क करने के लिए उनके पुराने दिनों के मित्रों और शिष्यों से संपर्क स्थापित किया। पदम पति का मोबाइल नंबर उपलब्ध होने पर जब उन्हें इस्तीफे में लिखी बातों को पढ़कर सुनाया गया तो पहले तो वे इस बात पर चौंके कि यह भड़ास4मीडिया तक कैसे पहुंचा, बाद में उन्होंने इस पत्र को वास्तविक बताया और इसे भूली बिसरी एक कहानी बताकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की।

11.7.08

खोलकर अपनी जो दिखायेंगे.

ग़ज़ल
पिछला इतिहास जो भुलायेंगे
खोलकर अपनी जो दिखायेंगे.

देशवासी अगर रहे सोते,
अब की अमरीकी मार जायेंगे.

बेचकर देश को ये रखवाले,
बारी-बारी से मुस्करायेंगे.

चूतिये देखना अब संसद में,
हल्ला गुल्ला ये सब मचायेंगे.

अपने दुश्मन की देखना लोगो,
गांड में ऐसा हल चलायेंगे.

ब्लॉग पे जितने भी ये लुच्चे हैं,
साले हगने को तरस जायेंगे.

गर भड़ासी न होंगे दुनियाँ में,
हम ये ग़ज़लें किसे सुनायेंगे.

डॉ.सुभाष भदौरिया,अहमदाबाद.ता.11-07-08 समय-10.35























श्रन्धान्ज्ली

लोकमत समाचार औरंगाबाद के मुख्य उप संपादक हसन नजमी का आज तड़के ५ बजे निधन हो गया। ५३ वर्षीय नजमी साहब लोकमत समाचार के औरंगाबाद संस्करण की स्थापना काल से जुड़े हुए थे। स्वभाव से मृदुभाषी होने के साथ कुशल रिपोर्ट भी थे। पिछले १६ वर्षों के अपने कार्यकाल के में नजमी साहब ने बेहतरीन छवि बनायी और नए पत्रकारों के लिए उदाहरण बन गए। अपने पीछे पत्नी के अलावा तीन बच्चे का भरा पूरा परिवार छोड़ गएँ हैं। नजमी साहब के असमय निधन के कारण लोकमत समाचार के सम्पादकीय विभाग के अलावा उनके पुराने साथ शोकाकुल हैं। हम सभी उन्हें भावभीनी श्रधान्जली व्यक्त करते हैं.

कुछ बातें रामराज्य से

कथा चल रही थी बाबा ने कहा माया त्याग दो संसार के चक्करों से मुक्त हो जवोए यही ओ माया है जिसमे हम अपने इस 'बड़े भाग्य मानुष तन' को बर्बाद करते जा रहे हैं। आप ही सोचो क्या करोगे इस माया का जिसमे तुम्हे भगवान् का ध्यान ही न हो. तुम कभी पापा कभी मम्मी तो कभी चाचा के ही जंजाल में फंसे रह जावोगे. बाबा जी की बात को ध्यान से एक श्रोता सुन रहा था उसने वहीं से खड़े होकर आवाज़ लगाई बाबा जी इस माया का हम क्या करें. तभी बाबा के एक भक्त ने स्टेज पर खड़े होकर जवाब दिया वत्स इतना बड़ा हमने पंडाल लगा रखा है इसका लाखों का खर्चा है इसीलिये हर पोल के तरफ़ एक दान पत्र की भी व्यस्था है. दिल खोलकर माया त्यागो ये पत्र उसी के लिए हैं. ये मजाक नही हकीकत है जिसपर हमें कुछ करने की ज़रूरत है. आप ही सोचो वो कौन सा भगवान् है जिसे पैसे की ज़रूरत है. जो इस्वर आप में है उसकी तो हम पूजा करते नही. हाँ लोगों से इधर उधर दौड़कर ये ज़रूर पूछते रहते हैं भगवन कैसे मिलेगा. बाबा जी का भव्य पंडाल जो लगता है उसका खर्चा हर दिन लाखों में आता है जिसे आप स्वयं देते हैं. अगर यही पैसा आप अपने उत्थान में सकारात्मक ढंग से लगायें तो आप अपने साथ दूसरों की भी मदद कर सकते हैं. मुझे लगता है रामराज्य ऐसे ही आयेगा न की बाबा जी के चक्कर लगाने से.
जय श्री राम राम राज्य से
अमित द्विवेदी

शहरनामा: नेता जी का बदल गया है एड्रेस

राजधानी में चुनाव आयोग द्वारा विधानसभा व लोकसभा सीटों का नया परिसीमन लागू हो जाने के बाद अब राजनीतिक दलों व नेताओं ने भी अपनी सीमाओं को पहचानना व बदलना शुरु कर दिया है। एक पार्टी जहां दिल्ली में अपने संगठन का माडल बदलने के लिए नए राजनैतिक जिले गठित कर रही है वहीं तमाम नेता बदले समीकरण के अनुसार अपना निवास भी बदलने लगे हैं. चुनाव व टिकट की राजनीति चाहे जो कराए........पूरा पढ़े....

मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)

मुझे आजकल लगता है कि मैं कोई जमाने से यहीं खड़ा, हवा चले न चले सिर पटकता पेड़ हूं।

या कोई धूल से अटी पिचके टायर वाली जीप हूं जिसके स्टीयरिंग का पाइप काटकर मेरे गांव छोकरे लोहार से कट्टा बनवाने की सोच रहे होंगे।

या कोई हिरन हूं जिसकी सींगों को तरास कर, भुस भर दिया गया है और जिसकी कांच की आंखों में उजबकपन के सिवा कोई और भाव नहीं है।

कभी लगता है कि बीमार, मोटे, थुलथुल, सनकी, भयभीत और ताकत के नशे मे चूर लोगों से भरे एक जिम में हूं।

पसीने और परफ्यूम की बासी गंध के बीच मुझे एक ऐसी मशीन पर खड़ा कर दिया गया है जिस पर समय लंबे पट्टे की तरह बिछा हुआ है।

मैं उस पर दौड़ रहा हूं, पसीने-पसीने हूं, हांफ रहा हूं लेकिन वहीं का वहीं हूं।

कहीं नहीं पहुंचा, एक जमाना हुआ।

समय का पट्टा मुझसे भी तेज भाग रहा है।

अगर मैं उसके साथ नहीं चला तो मशीन से छिटक कर गिर पड़ूंगा और कोई और मेरी जगह ले लेगा।

मैं थक रहा हूं यानि समय जरूर कहीं न कहीं पहुंच रहा है।

मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)

जमाना हुआ, मैं कहीं गया ही नहीं।

कई बार सपनों में बेहद तेज हूक उठी लेकिन वह नींद में ही मर गई।

आखिरी बार मैं शायद............Read More......

अब ब्राह्मणों की बारी

इस बार आरक्षण की मुहिम दक्षिण भारत से उठी है। लक्ष्य है इस मुद्दे पर देश भर के ब्राह्मणों को एकजुट करना। इसकी कमान संभाली है दक्षिण भारत के छोटे से गांव के अय्यर परिवार ने। पिता-पुत्र दोनों ही इन दिनों ब्राह्मणों की राय लेने के लिए उत्तरप्रदेश के दौरे पर हैं। वह अब तक कई जिलों में घूमकर आधा सैकड़ा से अधिक बैठकों में रायशुमारी कर चुके हैं। इसके साथ ही देश भर में कितने तरह के ब्राह्मण हैं इसका भी लेखाजोखा तैयार किया जा रहा है।कर्नाटक के बैंगलोर में रहने वाले एम एस शंकर अय्यर और उनके पिता एमएस मनी अय्यर इन दिनों उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। यह अय्यर पिता-पुत्र कभी केरल के पालघाट का निवासी था। यह वही गांव है जहां से एक तेज तर्रार मुख्य चुनाव आयुक्त थे। अय्यर अयंगर ब्राह्मण होते हैं। इनकी केरल में मजबूत लॉबी है। कर्नाटक में बस चुके यह लोग कर्नाटक ब्राह्मण सभा से जुड़े हैं। पुत्र एक प्रतिष्ठित कंप्यूटर साफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत है।अय्यर पिता-पुत्र अब तक प्रदेश के 35 से अधिक जिलों का दौरा कर ब्राह्मणों में आरक्षण की आग सुलगा चुके हैं। पहली बार मिलने पर अय्यर किसी को यही बताते हैं कि वह देश भर में कितने तरह के ब्राह्मण हैं यह जानने को निकले हैं। बातों का सिलसिला आगे बढ़ता है तो फिर आरक्षण की बात खुलकर कहते हैं। यह भी कहते हैं कि देश भर में ब्राह्मणों की दशा का अध्ययन करने के बाद इंटरनेट पर ब्लॉग जैसा कुछ करना है। हालांकि अभी इसकी रुपरेखा तय नहीं है। किसी भी शहर में यह दो या फिर तीन दिन रुकते हैं। लोगों से व्यक्तिगत बातें करते हैं और बातों का यह सिलसिला अपनों में फैलाने का संदेश भी देते हैं। बात मतलब की होती है सो तेजी से शहर के ब्राह्मण आगंतुकों से मिलते हैं। फिर अगले दिन बैठक बुला ली जाती है। इन बैठकों में बकायदा मोरचा बनाने और शहर में कमेटी गठित करने की बात होती है। बातों का लब्बोलुबाब आरक्षण ही होता है। बकौल शंकर अय्यर अब तक वह प्रदेश के 35 जिलों का दौरा कर चुके हैं। वह अपनी बात पहले छोटे शहरों के लोगों में फैले सजातीयों तक पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही दिसंबर की 15, 16, 17 को बंगलौर में होने वाले कर्नाटक ब्राह्मण सभा के सम्मेलन में भी आने का बुलावा दे रहे हैं। उनके मुताबिक लोग उनकी बात सुन रहे हैं। कमेटी बनाने को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। मणि के मुताबिक इस प्रदेश के लोग उन्हें ध्यान से सुन रहे हैं इससे उनका हौसला बढ़ा है।

Geet

हरी भरी सी क्यारियों में बहता ठंडा पानी
ओढ़ चुनरिया धानी नाचे ऋतुओं की महारानी
हरे-भरे पर्वत नदियों से करते छेड़खानी
हरे-भरे मौसम में तू भी बरखा बनके आ
खुशबू के लफ्जों में नगमे तू सावन के गा।

Maqbool

सान्तवना के दो शब्द

"बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हरे भाई और पंडित सुरेश नीरव जी अब नहीं रहे।"


इससे दुखद समाचार कोई हो ही नही सकता !


पर नियति ने किसी को भी नही छोडा है !


यश्वंत्जी बडा ही ह्रदय विदारक समाचार आपने दिया सै ! परमात्मा उन दोनुओ की आत्मा नै शांति प्रदान करै ! और हम घर् वालो को दुख नै बर्दाश्त करण की ताकत दे ! या ही म्हारी इश्वर तैप्रार्थना सै ! इब्बी पांच सात दिन पहले ही हमनै डा. साब तै मरण के बाद जिंदा होण की दवा पूछी थी सो मिल गीहोवै तो इन पर ट्राई करी जा सकै सै ! और आप लोग उचित समझो तो एकता कपूर धोरे भी कालाजादू कै बारे मै पूछ्या जा सकै सै !

उनको अपने भले की चिन्ता है, मुल्क की क्या करें भलाई वे

ग़ज़ल
देश की दे रहे दुहाई वे.
बांट खायेंगे फिर मलाई वे.

लोटे बिन पेंदी के लुढ़क करके,
दे रहे देखो अब सफाई वे.

गांड फाड़े है सब की मँहगाई,
बुश से करने चले सगाई वे.

चोर-चोरों में मौसिया रिश्ता,
हैं तो आपस में भाई भाई वे.

उनको अपने भले की चिन्ता है,
मुल्क की क्या करे भलाई वे.

भाँड निकले हैं फिर तमाशे को,
कर रहे देखो जगहँसाई वे .

हमने जिन पे था एतबार किया,
आज करते हैं बेवफ़ाई वे.

रोज़ ताज़ा वो ज़ख्म देते हैं,
हँस के बांटे हैं फिर दवाई वे।
-डॉ.सुभाष भदौरिया, अहमदाबाद.

10.7.08

"छीछालेदर रस" वही पुरानी कहानी

बहुत अरसे से मैं लेखन से जुदा हूँ। इसी बीच बिना प्रयास के पत्रकारिता में भी प्रवेश पा गया. तब पता लगा कि यदि किसी लेखक को पत्रकारिता का शौक (भूत) लग जाए तो अच्छी-भली स्थिति की खाट खडी हो जाए. उसका एक अहम् कारण है बाल की खाल निकालने वाला मुहावरा, वो यूँ कि कोई लेखक बाल की खाल निकालता है और यदि ऐसे में वो कहीं पत्रकार हुआ तो समझो कि बाल की खाल तो निकलेगी ही उस खाल में भी एक बाल वो पैदा करेगा और फ़िर उसकी खाल निकालेगा. ऐसी स्थिति को देख कर मैंने तुंरत एक नए रस का निर्माण कर दिया. अपनी तरफ़ से किसी भी बात को, किसी भी स्थिति को देख उसमें कुछ नया, अलग सा खोजने की कोशिश और बना दिया नया-नवेला रस "छीछालेदर रस". बहरहाल इस रस पर चर्चा बाद में क्योंकि रसों की चर्चा सरल, सहज नहीं है पर ये विश्वास है कि हमारे बनाए इस "छीछालेदर रस" की चर्चा सरस एवं सरल होगी. फ़िर कभी..............ठीक है.
अभी इस रस से सराबोर एक किस्सा। ये किस्सा हम इस समय लगातार देख रहे हैं पर "छीछालेदर" के साथ देखिये तो शायद मजा आएगा। परमाणु करार पर लगातार धमकी, लगातार सरकार गिराने का प्रयास और हो गया मन का. ये स्थिति तो तब आई जब सरकार परमाणु समझौता करने की बात कर रही है. लेफ्ट की स्थिति तो ये है कि यदि सरकार शुरू से इस करार के ख़िलाफ़ रहती तो लेफ्ट इस कारण सरकार गिरती कि सरकार करार का समर्थन क्यों नहीं कर रही है. मतलब लेफ्ट को सरकार गिरानी ही गिरानी थी चाहे समर्थन करो चाहे न करो. सत्ता का मजा खूब लूटा अब चुनाव आते ही ठीकरा फोड़ा सरकार के सर. ये तो हमेशा से यही करते आए हैं.......ऐसे लोगों की हालत से परेशां एक बाप-बेटे की कहानी है आज के "छीछालेदर रस" की.
एक गाँव में एक बाप-बेटे ने घोड़ा खरीदने का विचार किया और पहुँच गए मेले में घोड़ा खरीदने। घोड़ा खरीदा और बापस चल दिए अपने गाँव की तरफ़. बेटे ने कहा "पिताजी आप बुजुर्ग हैं आप घोडे पर बैठ जाइये मैं पैदल चल लूँगा." पिता घोडे पर बैठ गया, बेटा पैदल चलने लगा. मेले से निकल कर अपने गाँव के रस्ते में पड़ते पहले गाँव में पहुंचे तो लोगों ने कहा "देखो कितना कसाई बाप है, ख़ुद तो घोडे पर लदा बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है."
पिता को लगा लोग सही कह रहे हैं। मुझे बड़े होने के नाते पैदल चलना चाहिए और अपने बेटे को घोडे पर बैठना चाहिए. ऐसा सोच कर पिता घोडे से उतर गया और अपने बेटे को घोडे पर बिठा दिया. अब घोडे पर बेटे बैठा था, पिता पैदल चल रहा था. रस्ते में दूसरा गाँव मिला. लोगों ने देखा तो फ़िर वही लोगों की बक-बक "देखो संस्कार, सभ्यता तो रह ही नहीं गई है, बाप बुजुर्ग है और पैदल चल रहा है. बेटा जवान, चुस्त-दुरुस्त तो घोडे पर शान से बैठा है.......थू ऐसी औलाद पर जो अपने होता बाप को पैदल चला रही है."
बाप-बेटे ने सलाह की कि अभी जब बेटे पैदल चल रहा था तो लोगों ने भला-बुरा कहा, अब जब कि बाप पैदल चल रहा है तो भी लोगों को अच्छा नहीं लगा। ऐसा किया जाए कि कोई पैदल न चले, दोनों लोग घोडे पर बैठ जाते हैं. ऐसा विचार आपस में करके दोनों (बाप-बेटे) एक साथ घोडे पर बैठ कर अपने गाँव की तरफ़ जाने लगे. रास्ते के तीसरे गाँव में जब उन दोनों ने प्रवेश किया तो डरे कि पता नहीं लोग क्या कहें? हुआ कुछ ऐसा, जैसे ही थोड़ा आगे चले, वहां बैठे लोगों ने कहा "देखो तो ज़माना, दया-धर्म नाम की कोई भी चीज़ नहीं बची है. एक बेचारा घोड़ा और उस पर दो-दो लोग चढ़े बैठे हैं. ये नहीं कि एक बैठे, एक पैदल चले. मारे दे रहे हैं घोडे को.....राम....राम."
बाप-बेटे ने एक दुसरे का मुंह देखा और चुपचाप गाँव से बाहर आ गए। अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? ये ज़माना तो किसी में खुश नहीं है. न बाप के बैठने में, न बेटे के बैठने में, न दोनों के एक साथ बैठने पर. तब किया क्या जाए? सोचते-सोचते दोनों ने फ़ैसला किया कि अब दोनों लोग पैदल ही चलेंगे.
अब ऐसा विचार कर दोनों पैदल चलते हुए गाँव की तरफ़ बढ़ने लगे। गाँव पहुँचने से पहले हीएक और गाँव मिला. अब दोनों को कोई डर नहीं लग रहा था कि कोई क्या कहेगा क्योंकि दोनों ही पैदल चल रहे थे. पर ऐसा होता कहाँ है कि लोग किसी को चैन से जीने दे. यहाँ भी यही हुआ, जो दो-चार लोग बैठे थे हँसे और बोले "देखो बेवकूफों को, घोड़ा लिए हैं पर पैदल चले जा रहे हैं. यदि घोडे पर बैठना ही नहीं है तो ले क्यों लिया? पैदल तो बिना घोडे के भी चल सकते थे."
बाप-बेटा अब समझ चुके थे कि समाज को किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं किया जा सकता है। वे दोनों लोगों के कटाक्षों से इस हद तक परेशां, हताश हो चुके थे कि समझ नहीं पा रहे थे कि करना क्या है? दोनों ने रुक कर पूरी स्थिति पर विचार किया और समझा कि किसी भी स्थिति में वे सफल नहीं हो सकते हैं. गुस्से में, खीझ में, हताशा में, नाराजी में, परेशानी में उन दोनों ने कहा कि इससे भले तो वे बिना घोडे के थे. बस उनको आइडिया आ गया कि करना क्या है.............बिना समय गुजारे दोनों ने घोडे की लगाम को छोड़ उसको भगा दिया. बोले न रहेगा घोड़ा........न होगी परेशानी.
कुछ समझे आप....................नहीं? समझेंगे कैसे, ये तो मनमोहन सिंह से पूछिये.

मार रही है महंगाई!

ओफ्फ दोस्तों, गर्मी तो चली गई लेकिन हमारा भारत फिर भी तप रहा है। खासकर आम आदमी का घर, जिसके घर के चूल्हे में से इतनी तेज लपटें निकल रही हैं कि उसका जीना मुहाल हो रहा है। मैं भारत की केन्द्र सरकार, इसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, और इसके वित्तमंत्री पी. चिदंबरम का शुक्रगुजार हूँ, जिन्होंने हमें इतनी तपन महसूस करवाई और इसलिए भी वे रिकार्ड पर रिकार्ड बनाए जा रहे हैं और हम बेचारे लोग मुंह ऊँचा किए उन्हें निहारे जा रहे हैं..........लेकिन याद रहे, ये हालात ताली बजाने वाले कतई नहीं हैं.....हां, इनसे आंसू जरूर निकल सकते हैं।
तो मुख्य बात मप्र के उज्जैन में हुई, बात संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की आमसभा से शुरू करूँगा, जहाँ भाषण देते समय उन्होंने यह आरोप लगाया कि महंगाई केन्द्र सरकार की वजह से नहीं बल्कि राज्य सरकार की नीतियों की वजह से बढ़ी है।........................धन्य हैं ये सोनियाजी, इनके इस वकतत्व से यह तो साफ हो गया कि ये राजनेता अभी तक जनता को मूर्ख ही समझते हैं। इन्हीं सोनिया के एक पुराने पिट्ठू और मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्याज के महंगे होने को भाजपा की केन्द्र सरकार की करतूत बताकर यहाँ का विधानसभा चुनाव जीत लिया था और इस प्रदेश की जनता की पाँच सालों तक जमकर ऐसी की तैसी की थी। अब सोनिया हमें बता रही हैं कि बेचारगी में रहने वाली प्रदेश सरकार हमारा शोषण कर रही है और धोतीछाप वित्तमंत्री (जिनका पहनावा भले ही देशी हो लेकिन दिमाग से वो पूरे विदेशी ही हैं) चिदंबरम पाक-साफ हैं जबकि मेरे पास कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो यह बताते हैं कि भारत में ४०० प्रकार के कर (टैक्स) हैं जो यहाँ का बेचारा आम आदमी चुकाता रहता है। इतने विविध प्रकार के कर तो पूरे संसार में कहीं नहीं हैं। यह कर मुख्य रूप से दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में लगे। एक नरसिंह राव और दूसरे मनमोहन सिंह के। दोनों में ही मनमोहन सिंह कॉमन हैं क्योंकि वो राव सरकार में वित्तमंत्री थी। तो साहब, चिदंबरम सरदारजी की ही पसंद हैं और खुद तो धोती पहन रहे हैं जबकि आम आदमी की धोती उतारे दे रहे हैं।
तो दोस्तों, एक बात यह भी कि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी नंबर की बड़ी अर्थव्यवस्था है। जीडीपी के मामले में यह दुनिया का १२ वें नंबर का देश है। लेकिन -पर कैपिटा इनकम- यानी प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह विश्व का १३३ वें नंबर का देश है। मतलब दुनिया में कुल २१९ देश हैं उनमें से यह हालत है इसकी। तो चिदंबरम अपने मुखिया मनमोहन के साथ मिलकर भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने पर तुले हुए हैं लेकिन भइया जब घरों में रोटी ही नहीं बचेगी तो क्या करोगे महाशक्ति बनकर। दूसरा आप लोग महंगाई बढ़ने के प्रतिशत का जो हो-हल्ला आजकल सुन रहे हैं उसमें भी सच्चाई नहीं है। मतलब पिछले सप्ताह अखबारों की जो लीड थी कि महंगाई ११.६३ फीसदी बढ़ गई है और उसने पिछले १३ साल का रिकार्ड ध्वस्त कर दिया है। तो यह पद्धति भी समझिए। ठीक पेट्रोल की तरह है जो २१ की मूल कीमत का है और बिक ५५ रुपए में रहा है।
तो महंगाई बढ़ने का जो प्रतिशत भारत में मापा जाता है वह होलसेल रेट का होता है। यानी कीमतें ११ फीसदी तो होल-सेलर को महंगी पड़ेंगी, हम आम उपभोक्ता को तो यह ३०-४० फीसदी तक महंगी पड़ेंगी। यह पद्धति भारत में ही अपनाई जाती है, योरप में होल-सेल की बजाए रिटेल रेट (जिनपर हम आम उपभोक्ता निर्भर करते हैं) के आधार पर ही महंगाई मापी जाती है। भारत में ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इतनी महंगाई बता दी जाए तो यहाँ हाहाकार मच जाए, जबकि होल-सेल वाली बात आम आदमी को समझ ही नहीं आएगी और वो चुप बैठा रहेगा। यानी यहाँ भी राजनेता हमें हमेशा की तरह मूर्ख बनाते हैं (राजनेता दोबारा इसलिए कहा क्योंकि महंगाई कितनी बढ़ी इसकी जानकारी भी हमें केन्द्रीय वित्त मंत्रालय का सांख्यिकी विभाग ही देता है)।
आप छोटे में समझें कि अगर किसी व्यक्ति का वेतन १०,००० रुपए है और वह अपने घर की गुजर-बसर इतने में कर लेता था तो पिछले २ साल में जितनी महंगाई बढ़ी है उस हिसाब से अब उसे अपने उसी प्रकार के रहन-सहन को मैंटेन करने में १४,००० रुपयों की जरूरत पड़ेगी। तो दोस्तों महंगाई तो ४० फीसदी बढ़ गई और क्या आप या हममें में से किसी दोस्त का वेतन ४० फीसदी बढ़ा क्या??.....तो इसका मतलब आप-हम लोग जीवन में आगे बढ़ने के बजाए पीछे जा रहे हैं और अपने पुराने रहन-सहन को मैंटेन करने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं।
मैंने बीबीसी पर एक खबर पढ़ी थी कि आम आदमी के भोजन की थाली भी २० प्रतिशत महंगी हो गई है। मैं वो घिसा-घिसाया डॉयलॉग तो नहीं मारूँगा कि संप्रग सरकार को उखाड़ फैंकों, क्योंकि अगर भाजपा भी सरकार में आएगी तो उन्हीं नीतियों पर चलेगी जिनपर वर्तमान सरकार चल रही है, क्योंकि हमारा देश अब अमेरिका और वर्ल्ड बैंक की गिरफ्त में है, उसे उन्हीं की बातें माननी पड़ेंगी भले ही वो चाहे या ना चाहे। तो दोस्तों हमारे पास मताधिकार की शक्ति तो है ही साथ ही कई लोकतंत्रिक तरीके भी हैं जिनसे हम सरदारजी और उनके वित्तमंत्री को समझा सकते हैं कि हमें ऐसे इकोनॉमिक रिजोल्यूशन्स नहीं चाहिए जो हमारे घर के चूल्हे को ही बुझा दें, हमारे बच्चों को अच्छे स्कूलों से महरूम कर दें और हमें अपने लिए एक अदद मकान तक नहीं बनाने दें.......। आप समझ रहे हैं ना......??
आपका ही सचिन......।

ब्लॉग की मौसी बहुत हँसती हैं.

ग़ज़ल
ब्लॉग की मौसी बहुत हँसती हैं.
खेत में सबके जा बरसती हैं.

हाय इनकी अदा के क्या कहने !
उल्टे पल्लू में खूब जँचती हैं.

तितलियों और गुलों की बस्ती में,
सबसे पहले ये जा पहुँचती हैं.

छोरियों की करे ये वाह-वा हैं,
हमको अकसर ये घुड़कती हैं.

मिल के गाँधी से ये जुआ घर में,
पी के दारू ये फिर बहकती हैं.

चेले लेते हैं इनके इन्टरव्यू,
मौसीजी आप किस पे मरती हैं.

लौंडे जब भी बवाल करते हैं,
फिर तो धीरे से ये खिसकती हैं.

रेप के केश में फँसा गब्बर,
मौसी अपनी भी फिकर करती है.

ज़ख्मी ठाकुर की ये तो ग़ज़लें हैं.
सीधे जा के कलेजे घुसती हैं।
डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद।


वतन के लिए शहीद होने वाले स्वतंत्राता सेनानी हैं आंतकवादी

राष्ट्रीय मुक्त विद्यालीय शिक्षा संस्थान के पाठयक्रम का शर्मनाक अध्याय

राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान की नजर में वतन के लिए शहीद होने वाले अमरशहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरू व सुखदेव जैसे महान स्वतंत्राता सेनानी क्रांतिकारी नहीं बल्कि आतंकवादी थे। संस्थान की 12 वीं कक्षा की इतिहास की पुस्तक में देश के महान स्वतंत्राता सेनानियों का परिचय आतंकवादियों के रूप में दिया गया है। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान की 12 कक्षा के पाठयक्रम में शामिल इतिहास की पुस्तक में शहीदों व स्वतंत्राता सेनानियों को आतंकवादी कहा गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 170 व 171 में अनेक स्थानों पर स्वतंत्राता सेनानियों के लिए आतंकवादी शब्द का प्रयोग किया गया है। पुस्तक में एक स्थान पर लिखा गया है कि ‘अक्तूबर 1928 ई. में साइमन कमीशन का विरोध करते हुए शेरे पंजाब लाला लाजपत राय पर लाठी का घातक प्रहार किया गया। आतंकवादी क्रोधित हो उठे----इस प्रकार दिसंबर 1928 में भगत सिंह आजाद और राजगुरु ने लाठी प्रहार का आदेश देने वाले सांडर्स की हत्या कर डाली। इससे आगे लिखा है ‘ आतंकवादियों का उद्देश्य जनसाधारण द्वारा क्रांति लाना था, अप्रेल् 1929 में भगत सिंह और वी.के.दत्त ने केन्द्रीय लेजिस्टलेटिव असेम्बली में एक बम फैंका----आतंकवादियों का कहना था कि उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था वरन बहरां को सुनाना था’। इससे आगे एक स्थान पर लिखा है -‘ जेल के दौरान आतंकवादियोंने जेल के अमानुषिक वातावरण का विरोध करने के लिए भूख हड़ताल रखी।’ पुस्तक के दो पृष्ठों पर कुल 9 स्थानों पर स्वतंत्राता सेनानियों के लिए आतंकवादियों या आतंकवादी शब्द का प्रयोग किया गया है।

भड़ास की मुहिम की हर ओर सराहना

एक दिन मेरी एक बहन जैसे फ्रेंड का फ़ोन आया। वो मेरी पत्रकारिता के जीवनकाल में मिली सबसे अच्छी दोस्त है. वो गुडगांव में आपने पति के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रही है. मैंने उसे भड़ास के बारे में बताया उसने तुंरत इस इसको देखा और आप विश्वास नही करेंगे उसने तुंरत अपने पति से बात की और इस मुहीम में अपना योगदान करने का ठान लिया. मैंने उससे बहुत दिन बाद बात की थी मैंने उसे बोला देख बहन बहुत ज्यादा मदद करने की ज़रूरत नही है. बस थोड़ा सा ही करना मैंने उसे ऐसा इसलिए कहा क्यूंकि वो एक सुंदर से बेबी को जन्म देने जा रही है. आजतक की वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है. उसने जल्द करुनाकर के ठीक होने की दुवा की और यही नही संतोष जी यानी की स्वयं के पति जब अपने ऑफिस गए और वहां पर भड़ास के इस मुहीम की चर्चा की तभी वहां पर उनके साथ काम करने वाले एक सहयोगी अलोक मिश्रा ने भी करुनाकर को एक हज़ार की मदद करते हुए उसके अकाउंट में चैक जामा करवा दिया. उन्होंने भड़ास की करुनाकर से समबन्धित सारी सूचनाएँ भी पढीं. भड़ास के ऑब्जेक्टिव को देखकर हर कोई इसका प्रशंशक हो गया है. मैं इन शब्दों के मध्यम से अपनी बहन दोस्त को यूँ ही हमेशा अपने से जुदा रहने का निवेदन करूंगा. विशाल शुक्ला जी से मैं माफी चाहूंगा उन्होंने कहा था की उनका नाम भड़ास पर प्रकाशित न किया जाए सहयोग सूची में. पर दादा मैं आपको कहना चाहूंगा की यहाँ पर ये प्रतिस्पर्धा नही चल रही की कौन कितना दे सकता है. भाई साहब ये एक सहयोग है जो की करोड़ों रूपये से भी बढ़कर है. इसलिए हमने आपको यहाँ प्रकाशित क्या है. वैसे आपका जो प्यार है वो हम सबके लिए बहुत ही कीमती है.
अमित द्विवेदी

बुआ से परिहास नैतिक या अनैतिक

जैसे अपने अटल बिहारी वाजपेयी क्रानिक बैचलर हैं वैसे ही मैं क्रानिक बदतमीज हूं.सो मेरी बदतमीजियों को झेलना आप सबकी मजबूरी है.इसी क्रम में मेरा एक सवाल है.बुआ से मानसिक बलात्कार (या अभिसार)नैतिक है अथवा अनैतिक.अब आप इसे क्या मानते हैं.इससे हमें कुछ भी लेना-देना नहीं.हमारी दृष्टि में तो यह पूरी तरह नैतिक है.मानसिक भी और शारीरिक भी(यदि बुआ जी राजी हों तो)दरअसल,हमारे यहां इसकी पूरी आजादी है.हो सकता है आपको मेरी बात अच्छी न लगे.लेकिन है सोलह आने सच्ची.सुलतानपुर व इसके आसपास के जिलों में बुआ से मानसिक व्याभिचार के पीछे जो कारण है,यदि आप उस पर गौर फरमाएंगे तो शायद आपको यह बात बुरी न लगे.हुआ यह कि भगवान राम व उनके तीनों भाइयों द्वारा सरयू में जल समाधि लेने के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र कुश अवध के सम्राट बने.कुश अतीत की दो घटनाओं से बेहद आहत थे.पहली घटना थी उनकी बुआ द्वारा माता सीता के विरुद्ध के रची गई साजिश.दूसरी अयोध्या के एक धोबी द्वारा माता सीता के चरित्र पर टिप्पणी.अवध के लोकगीतों के अनुसार राजा दशरथ की एक दत्तक पुत्री थीं और उनका विवाह श्रंगी ऋषि के साथ हुआ था.लव व कुश जब गर्भ में थे तो परंपरानुसार ननद होने के नाते वह माता सीता की देखभाल व मार्गदर्शन के लिए मायके में लाई गई थीं.एक दिन उन्होंने माता सीता से कहा कि भाभी रावण का चित्र का बनाओ.सीता जी ने यह कह कर मना कर दिया कि उन्होंने कभी रावण के चेहरे की तरफ नजर ही नहीं डाली थी.लेकिन बुआ जी (माता सीता की ननद)कहां मानने वाली थीं.अनवरत हठ करती रहीं.एक दिन उनका मन रखने के लिए माता सीता ने कहा कि जब रावण अशोक वाटिका में उन्हें अपनी पटरानी बनाने का प्रस्ताव देने आया था तो वे अपने पैर के नाखूनों पर निगाह गड़ाए चुपचाप बैठी थीं.उस समय रावण के चेहरे का अक्स उनके पैर के अंगूठे के नाखून पर दिखा था.उसी आधार पर मैं तुम्हें रावण का चित्र का बना कर दिखाती हूं.जब उन्होंने चित्र बना दिया तो बुआ जी ने उसे लेकर चुपचाप भगवान राम को दिखा दिया.साथ में यह भी जोड़ दिया कि तुम अग्रि परीक्षा की बात कहते हो सीता तो अब भी रावण को याद कर उसकी तस्वीर बनाया करती हैं.उसी समय एक घटना और हो गई.रात में भगवान राम प्रजा का हाल लेने के वेश बदल कर अयोध्या में विचरण में कर रहे थे.उनके कानों में आवाज पड़ी.एक धोबी अपनी पत्नी को पीट रहा था.साथ में यह कह कर उलाहना भी दे रहा था कि तू आधी रात तक घर से बाहर रही.मैं राम नहीं हूं.जो तुझे फिर रख लूंगा.इन दोनों घटनाओं से राम इतने क्षुब्ध हुए कि उन्होंने माता सीता को वनवास दे डाला.कुश और लव वन में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पैदा हुए.जिन्हें महल में पैदा होने के बाद रेशम के बिस्तर मिलना चाहिए था उन्हें कुश नामक जंगली पौधे से बनी चटाई मिली.उसी पौधे के नाम पर कुश का नामकरण भी महर्षि ने किया.कुश अपनी मां साथ हुए इस अन्याय को आजीवन नहीं भुला पाए.सम्राट बनने के बाद उन्होंने अयोध्या के बजाय वहां से ३६ मील दूर गोमती के तट पर कुशभवन पुर नामक नगर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया.बुआ और अयोध्यावासियों के प्रति उनके मन में ग्रंथि थी कि इनकी वजह से ही उनकी पतिव्रता मां को दारूण दुख झेलने पड़े.साथ यह भी कि सरयू में उनके पिता और चाचा ने जल समाधि ली थी.कुशभवन पुर में बुआ के प्रति मजाक की भी परंपरा इसी कारण प्रारंभ हुई.यों भी मां का सबसे ज्यादा उत्पीड़न बुआ ही करती है.सो मां के सुयोग्य पुत्र होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम मां के साथ बुआ द्वारा किए गए दुव्यवहार का ऋण अवश्य चुकाएं.

और अब जयपुर में डुप्लीकेट अखबार भी बांटने लगे ...

कई बरस पहले स्कोत्लैंडयार्ड पुलिस के जासूसी किस्सों को लेकर एक किताब पढ़ी थी। उसमें एक पते की बात लिखी थी कि अगर कोई नौसिखिया बदमाश होगा तो सबसे पहले पत्थर का सिक्का बनाएगा और इंग्लैंड के कोने-कोने में फैली अखबार वेंडिंग मशीन से अख़बार खरीदेगा। लेकिन अब तो हद हो गयी है देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी जयपुर में कुछ इलाकों में डुप्लीकेट अखबार भी बंटने लगे हैं। मामला भी देश में हिन्दी के सबसे बड़े अखबार का है।
किस्सा यूँ है कि जयपुर शहर में आजकल इलाकाई पत्रकारिता की धूम मची हुई है। हर इलाके में अलग ढंग का अखबार बंटता है। इस चक्कर में कई दफा किसी एक इलाके को किसी ख़ास ख़बर या स्तम्भ से वंचित होना पड़ता है। खाकसार भी छोटा-मोटा कलमकार है और लाहौर (पाकिस्तान) से प्रकाशित होने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका में सामजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर स्तम्भ लिखता है। कई बार भारत-पाक दोस्ती और साझा इतिहास के हवाले से किताबों या घटनाओं का भी वर्णन होता है। इसी क्रम में इस हफ्ते भास्कर के मशहूर स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे की किताब 'ताजमहल-बेकरारी का बयान' और इस्माईल चुनारा के नाटक 'यादों के बुझे हुए सवेरे' का ज़िक्र किया गया था। जयप्रकाश चौकसे जी को फ़ोन कर यह सूचना दी गयी तो बातों-बातों में उन्होंने पोछा कि आज यानी आठ जुलाई का स्तम्भ देखा क्या? बन्दे ने जवाब में कहा कि आज तो आपका स्तम्भ छपा ही नहीं। ज़ाहिर है इस से स्तंभकार को बुरा ही लगा होगा। उन्होंने कोई घंटे भर बाद फ़ोन करके कहा कि राजस्थान के सम्पादक जी ने कहा है कि आपका स्तम्भ तमाम संस्करणों में प्रकाशित हुआ है। मैंने दुबारा अखबार देखा तो घर से दस किलोमीटर दूर एक दफ्तर में मिले सिटी भास्कर में भी 'परदे के पीछे' स्तम्भ नदारद था।
खैर यह तो एक दिन कि बात हुई। अगले दिन भी येही आलम रहा, यानी जयप्रकाश चौकसे जी का कालम नहीं छपा तो नहीं ही छपा। हद तो तब हुई जब लगातार तीसरे दिन भी सम्पादकों ने स्तम्भ नहीं छापा। आज जब सुबह चौकसे जी से बात हुई तो वोह बोले कि यार अपने अखबार विक्रेता से ही कहो कि इस कालम के बिना भास्कर नही दिया करे।
इस पूरे मामले में एक बात सामने आई कि स्तंभकार कों सम्पादक कह रहे हैं कि स्तम्भ रोज़ छप रहा है और पाठक कों पढ़ने कों नही मिल रहा। बकौल चौकसे जी एक सम्पादक जी ने तो उन्हें शहर के ६ के ६ संस्करण डाक से भेजने की बात कही।
इसी लिए यह ख़याल पैदा हुआ कि हो न हो जयपुर शहर में जाली अखबार छप रहे हैं, तभी तो पाठको कों अपने पसंदीदा लेखक का लिखा पढ़ने से वंचित किया जा रहा है। अब यह खोजी पत्रकारिता के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है कि जाली अखबार छपने वालों का पर्दाफाश किया जाए, ताकि पत्रकारिता की साख बची रहे, सम्पादक जी की बात झूठी ना हो और पाठकों के साथ भी न्याय हो।

परमाणु उर्जा का दूसरा पहलू

(साभार एनडीटीवी ख़बर.कॉम से....सौजन्य--रवीश कुमार--दरअसल धर्म मार्ग के सच को जिस तरह रवीश जी ने बयान किया है...उसके बाद मुझे इसमे कुछ जोड़ने की बजाय इसे प्रसारित करने की आवश्यकता महसूस हुई..इसलिए आप सबके सामने इसे पेश कर रहा हूं)
परमाणु मार्ग से गांधी मार्ग की ओररवीश कुमारनई दिल्ली, सोमवार, जुलाई 7, 2008पानी को लेकर परेशान गांधीवादी अनुपम मिश्र गांधी मार्ग पत्रिका निकालते हैं। गांधी शांति प्रतिष्ठान की इस पत्रिका में परमाणु समझौते की अपनी अलग व्याख्या की गई है। आज की बहस से 21 साल पहले अनिल अग्रवाल और प्रफुल्ल विदवई के लेख के ज़रिये अनुपम मिश्र इस बहस में विकल्प पेश करते हैं।यह लेख बता रहा है कि परमाणु ऊर्जा बेहद खर्चीली योजना है। इसे साकार करने के लिए तमाम तरह के संगठन हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई तरह के सपने भी बेचे गए हैं, लेकिन इस पूरी बहस में यह चिंता ग़ायब है कि परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला कचरा कितना ख़तरनाक है। इस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय सावधानी बरतनी होती है, बल्कि हज़ारों साल तक भंडारण का इंतजाम भी करना होता है। अनेक लोगों का मानना है कि इस समस्या का स्थायी हल नहीं है। एक बार प्लूटोनियम को अलग कर लेने के बाद परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत ज़हरीले कचरे को कांच में बदलकर एक ही जगह स्थिर की जा सकती है। लेकिन यहां भी इसे कांच को शीतगृह में 20 साल तक स्थिर रखा जाता है। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होता है, जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हज़ारों साल तक छेड़ न सके। परंतु ऐसी जगह मिलना मुश्किल है। हिमालय, सिंधु-गंगा के कछार, थार के रेगिस्तान और दक्षिणी पठार आदि भूजल की अधिकता के कारण रद्द किए जा चुके हैं। परमाणु ऊर्जा आयोग के वैज्ञानिकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और उससे लगे आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ ज़िलों का कंकरीला पठार इसके लिए उपयोगी हो सकता है। 21 साल पहले के इस लेख में अग्रवाल और बिदवई सवाल उठाते हैं कि अगर ऐसी जगह मिल भी गई तो क्या हज़ारों साल तक उसकी सुरक्षा की जा सकती है। कहते हैं कि हमारा परमाणु ऊर्जा आयोग बहुत महत्वकांक्षी है।परमाणु बिजलीघरों से निकला अति भयानक रेडियोधर्मी कचरा अनंतकाल तक, यानि जब तक यह धरती है, बिल्कुल सुरक्षित रूप से जमा करके रखना होगा। है कोई राजनेता या वैज्ञानिक, जो इसका दावा कर सकता है... परमाणु ऊर्जा के कट्टर समर्थकों में कोई भी यह नहीं कह सका है कि उस कचरे के निपटान की समस्या का हल मिल गया है। यह विष आज संसार में 20,000 टन तक की मात्रा में मौजूद है। इसका अधिकांश भाग बिजलीघरों में काम आ चुके ईंधन के हौजों में पड़ा है।इतना ही नहीं, यह लेख यह भी जानकारी देता है कि पुराने हो चुके परमाणु बिजलीघरों को बंद करने में भी इसी प्रकार की आर्थिक परेशानी पैदा होती है। यह बंद करना इसलिए भी ग़लत है, क्योंकि उसका अर्थ होता है - साधारण रीति से किसी निर्जन मकान में ताला लगा देना। लेकिन दसियों साल तक काम करते रहने वाले परमाणु संयंत्रों के अनेक हिस्सों में रेडियोधर्मिता छा चुकी होती है। बंद करते समय उन्हें कंक्रीट की बहुत मोटी तह वाली एक विशाल कब्र में दफनाकर सदियों तक वायुमंडल से बचाकर रखना पड़ेगा। अब तक तोड़ा गया सबसे बड़ा संयंत्र अमेरिका में मिन्नेसोटा स्थित 22 मेगावाट क्षमता का एल्क नदी संयंत्र है। पूरी प्रक्रिया में दो साल और 60 लाख डॉलर लगे। आगे जिन बिजलीघरों को दफनाना होगा, वे तो इससे 50 गुना बड़े और सैंकड़ों गुना अधिक रेडियोधर्मी प्रदूषित संयंत्र हैं। आखिर क्या बात है कि अमेरिका में 1976 के बाद से एक भी नए रिएक्टर के लिए अनुमति नहीं दी गई है। 1975 में 90 से भी अधिक संयंत्र रद्द कर दिए गए। एक अमेरिकी विद्वान ने लिखा है कि जिस देश ने संसार को परमाणु विद्युत के युग में प्रवेश कराया, वही संसार को उससे मुक्त कराने में भी अगुवाई करेगा।अभी ऐसे दिन तो नहीं आए हैं, लेकिन परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र विकल्प होता तो दुनिया इसी के पीछे भागती। ऊर्जा के अन्य विकल्पों के मंत्रालय नहीं होते। जितना पैसा परमाणु ऊर्जा के नाम पर बहाया गया है, उनसे तो सूरज से चलने वाले लाखों पंप चालू हो सकते थे, लेकिन यह सब नहीं हुआ। परमाणु ऊर्जा को लेकर बहस हो रही है। हमारी राष्ट्रीय तरक्की के लिए सबसे ज़रूरी है। कोई यह नहीं बता रहा है कि इसके ख़तरे क्या हैं। गांधी मार्ग में छपा यह लेख बता रहा है।

भड़ास के दो साथियों का सम्मान, लोकतन्त्र की पहचान कराने के लिए

यशवंत जी बड़ा दुख हुआ भड़ास के दो सशक्त स्तम्भों के विरत हो जाने की ख़बर से...वैसे लोकतन्त्र में सभी को अधिकार है साथ चलने या अलग होने का ..लेकिन किसी भी भड़ासी के लिए भड़ास का लोकतान्त्रिक होने पर होने वाले गर्व पर आक्षेप है ये..इसलिए मैं आपके माध्यम से दोनों ही वरिष्ठजनों तक अपनी बात पहुचाना चाहता हूं कि ..दोनों को उनके इस कठोर निर्णय के लिए हार्दिक बधाई...वो इसलिए कि देर रात तकरीबन चार बजे के करीब मैने भड़ास पर अपनी पहली पोस्ट डाली थी ..तब तक पं सुरेश नीरव जी अपनी पूरी चमक भड़ास पर बिखेर रहे थे..लेकिन सुबह होते ही उनकी इच्छानुरूप ब्लाग से उनकी हर निशानी को मुक्त कर दिया गया...ये साबित करता है..कि भड़ास पूर्णतया लोकतान्त्रिक है..ये घटना ठीक उसी तरह से है..जैस एक बड़े तूफान के बाद इंसान की ताकत की पहचान होती है...पूरी उम्मीद है भड़ासी साथी भड़ास पर आये इस छोटे से तूफान से, दोनों ही अनन्य साथियों के साथ, भड़ास की किस्ती मझधार से निकाल लायेंगें....क्योकि हमें सच्चाई के मनकों को जोड़ना है..उन्हें तोड़ना नहीं..
ईश्वर सभी को ताकत दे..औऱ स्वतन्त्र अभिव्क्ति की क्षमता भी

हरे भाई और पंडित नीरव जी नहीं रहे

बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हरे भाई और पंडित सुरेश नीरव जी अब नहीं रहे। ये लोग भड़ास की दुनिया से विदा हो गए हैं। इन लोगों ने दूरभाष पर मुझे सूचित किया कि किन्हीं कारणों के चलते वे भड़ास के साथ खुद को जोड़े रख पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं इसलिए उनकी सदस्यता और उनके कंटेंट भड़ास से हटा लिए जाएं।

दोनों महान आत्माओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए भड़ास से उनके नाम को धो-पोंछ दिया गया है। उम्मीद है कि वे लोग अब राहत महसूस कर रहें होंगे।

जितने दिन तक साथ दे पाए, उसके लिए शुक्रिया। आप लोग आबाद रहें, नई दिल्ली में रहें या इलाहाबाद या अहमदाबाद रहें।

बाकी भड़ासी भाई अपने इन दोनों साथियों के विदा होने से दुखी तो जरूर होंगे लेकिन मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे भाई भड़ासियों को इन दोनों साथियों के विदा हो जाने से पैदा दुख को सहने की ताकत प्रदान करेंगे।

जय भड़ास
यशवंत सिंह

तेरी पतली कमर के क्या कहने.

ये ग़ज़ल उपरोक्त तस्वीर से वाबस्ता है हज़्रात मुलाहज़ा फ़र्मायें और अपनी नवाज़िश से ग़रीब को मालामाल करदे। आमीन। इस तस्वीर के स्त्रोत यहाँ हैं।http://www.tarakash.com/special/holi-special-hindi-bloggers.html


गज़ल
तेरी शातिर नज़र के क्या कहने.
तेरी पतली कमर के क्या कहने.

थाह पाई कहाँ ? जमाने ने ,
तेरी गहरी नहर के क्या कहने.

कितने जलवाये, कितने कटवाये,
तेरे ख़ौफ़ो-ख़तर के क्या कहने.

चीखें अब भी सुनाई देती हैं,
तेरे क़ातिल शहर के क्या कहने.

रुहें अब भी सवाल करती हैं,
तेरे पिछले ग़दर के क्या कहने.

मैं भी तेरी ज़बान बोले हूँ ,
मुझ पे तेरी असर के क्या कहने.

डॉ.सुभाष भदौरिया










परमाणु उर्जा और आम आदमी

पिछले चार साल का साझा तानाबाना टूट गया..करार ने आम आजमी के सरोकारों के सभी बंधन तोड़ डाले..देश की कुल आबादी के हितों की बली चढ़ा दी गई। और महज कुछ महिनों की सत्ता का सुख भोगने के लिए दिनरात जोड़तोड़ की कवायद जोरों पर है। इन सब के बीच हरदम हाशिये पर रहने वाला आम आदमी ये नहीं समझ पा रहा कि अमरीका ,जो हरदम भारत के ख़िलाफ पड़ोसी मुल्कों को पिछवाड़े से उकसाता रहा है..(साथ ही आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक सहयोग भी) करता रहा है..आचानक जाते हुए राष्ट्रपति ने कौन सी घुट्टी पी ली है..जो सब कुछ बुलाकर भारत का हितैषी बन गया है..एख बहुत छोटा सा सवाल किसी ने मुझसे पूछ लिया कि ..भैय्या जब भारत को अपनी उर्जा जरूरतों के लिए क़रार करना ही है ..चो केवल अमेरिका के पीछे ही काहे पड़े हो..उससे भी बड़े सप्लायर है..न्यूकिलियर सप्लायर ग्रुप में उनसे काहे करार नहीं करते ..सवाल तो बड़ा छोटा है लेकिन मुद्दे को गंभीर बनाता है..वैसे भी हम भारतीयों की एक आदत जिससे हम मजबूर हैं..वो ये कि जब भी कोई बहस छिड़ जाती है..तो उसमें हम कूद जरूर जाते हैं ..उससे चाहे हमें छटाक भर भी लेना या देना न हो..उस वक्त हमें न तो अपने वक्त का खायाल रहता है..और बहस मुबाहिसे में लगे दूसरे भाई का ...लेकिन एक बात जो काफी अहम है....कि आम आदमी के हितों की आवाज कहीं न दब जाए..जो देश की सरकार को चुनने में सबसे ज्यादा भागीदार होता है(ये आंकड़े बताते हैं कि 50 से 60 फीसदी मतदान में सबसे बड़ा हिस्सा गांवो और कस्बों और शहर के निम्न मध्यम वर्गों से आता है) उसके टुने हुए प्रतिनिधियों को ये बारबार याद दिलाने की जरूरत है कि भाई उसका तो ख़याल करो जिसने तुम्हें अपना ख़ुदा बना दिया.

9.7.08

हाय हेलो के बाद कहें क्या समझ नहीं पाये

हाय हेलो के बाद कहें क्या समझ नहीं पाये
मितृ हमारे संबंधों मे ऎसे पल आये
कुशल छेम हारी मजबूरी दर्द नही पूंछे
जीवन रस के पातर् हो गये असमय ही छूंछे
अवसादी घन उमङ घुमङ मन ऑगन पर छाये

उलटे घडे है

भाई रुपेश और रजनीश
सतना मीडिया ने एस पी और कलेक्टर दोनों की ख़बर ली, लेकिन साले ये सरकार के दलाल है, प्रमोट होकर आए है, साले बीजेपी वालो की बजाते रहते है। उलटे घडे है इन पर जितना पानी डालो बह जाता है। ये सतना का दुर्भाग्य है प्रमोटियो के बल पर यंहा का प्रशाशन चल रहा है।

स्वस्थ करूणाकर चला अपने गांव

डॉक्टर रुपेश की दवा और भड़ासियों की दुवावो से स्वस्थ होकर करूणाकर अपने गांव जीजिरामपुर के लिए बुधवार की शाम कैफिअत एक्सप्रेस से रात के ७ बजकर २० मिनट पर अयोद्यया के लिए रवाना हो रहा है। वो काफी हद तक आराम में है. उसके घर वाले अपने बेटे का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. उसकी खुशी का अंदाजा इसी बात से लगाया हा सकता है की वो बहुत से भडासी भाइयों का आभार व्यक्त करना चाहता है. कई लोगों ने उसे कॉल करके उसका हालचाल लिया. वहीं दूसरी और डॉक्टर साहब उससे लगातार सम्पर्क में हैं. करूणाकर को मुख्यमंत्री के कोटे से आर्थिक मदद दिलवाने के लिए बहुत से लोग प्रयास रत हैं. उम्मीद की जा सकती है उसके परिवार को मुख्यमंत्री के तरफ़ से जल्द ही कुछ आर्थिक मदद मिलेगी. भाई महावीर लगातार इस प्रयास को कर रहे है. वैसे अभी भी कुछ और धन की उसके अकाउंट में ज़रूरत है जो डॉक्टर साहब को भेजवाना है. पर लोग अभी भी करूणाकर के अकाउंट में जिस तरह से रूपये ट्रान्सफर कर रहे है. उससे ये मुश्किल भी आसान हो जायेगी.
अमित द्विवेदी

khabar ranchi se

ranchi se ek aachi khabar hai jald hi yahan se ek sattelite channel ki shuruat hone ja rahi hai । Channel ka naam Raftaar hai
aap koi apna cv bhejna caahe to is patte pe bhej sakta hai
Raftaar media Pvt Ltd,
Nandan Enclave , Gurudwara road,
Hatia, Ranchi
Web:www.raftaarmedia.com

परमाणु उर्जा कि राजनीति

परमाणु उर्जा

आज हमारा देश एक बहुत ही बडे राजनैतिक संकट से गुजर रहा है सारे के सारे राजनैतिक दल, अपने दलगत स्वर्थो से उपर उठ कर सोचने की सामर्थ्य खो बैठे है चाहे वो भारतीय जनता पाट्री हो या कांग्रेस या अन्य राजनैतिक दल सभी के सभी एक दुसरे के टांग खीचने के अलावा और कुछ नही कर सकते किसी भी देश के प्रमुख के पास अंतर्राष्ट्रीय समझौता करने का अधिकार होता है और अगर नही हो तो वो देश का प्रमुख कैसा, लेकिन् भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ सत्ताधारी दल को अपने प्रधानमंत्री पर भी विश्वास नही, हम कह सकते है की ईन सबके लिये कही न कही पुर्ववर्ती प्रधानमंत्री जिम्मेवार है जिन्होने ईस पद की गरीमा को धुमिल किया, और ईसके लिये सारे के सारे दल एक समान रुप से जिम्मेवार है
प्रधानमंत्री जापान जी ८ सम्मेलन में जापान गये है, शायद अब ये परमाणु उर्जा मसौदा एक समझौते का रुप ले ही ले लेकिन हमारे देश के कर्ता धर्ता ये नही कह सकते की ईससे हमारे देश की उर्जा समस्या का समाधान पुर्ण रुप से हो जायेगा हमे अपने संसाधनो पर ध्यान तो देना ही पडेगा और उससे भी ज्यादा उनका समुचित उपयोग सुनिश्चित करनी होगी ताकी उनका दुरुपयोग रुके
१. देश की ट्राफिक सिग्नल का सुधार- आयातित तेल का लगभग १०% सिर्फ यहाँ पर जाता है
२. स्ट्रीट लाईटे - स्ट्रीट लाईटे लगभग पुरे दिन जलती रहती है
३. घरो का निर्माण - विकसित देशो में घरो का निर्माण ईस प्रकार होता है की उनमे बिजली की खपत कम हो
४. पब्लिक ट्रांसपोर्ट- ईन्हे बेहतर करने की जरुरत ताकी लोग अपने वाहन का ईस्तेमाल कम करे
५. कुडा-कचडे का समुचित रुप से प्रबंधन हो- दिल्ली नगर निगम के एक योजना(रिसाईकिल्ड कर एनर्जी बनाने की विधी को) कनाडा ने सहयोग करने क वदा किया है जरुरत है हमे ईस तरह के किसी भी प्रयास को प्रोत्साहित करने की
६. सौर्य उर्जा के उपर शोध करने जरुरत
७. वैकल्पिक उर्जा के नये स्रोतो की खोज करना
८. लोगो की भागीदारी सुनिश्चित करना

8.7.08

गाँधी जी के बारे में

तमाम ब्लॉग की यात्रा करते-करते कई बार गाँधी जी के दर्शन हुए. कहीं जुआघर में खड़े, कहीं हत्यारे के रूप में. क्या हैं गाँधी? क्या है उनकी प्रासंगिकता? कोई बताएगा, बिना भेद-भाव के. बिना ये परवाह किए की वह सबके सामने बोल रहा है, क्योंकि सबके सामने बताने पर तो गाँधी अच्छे हैं पर अकेले में दे मारते हैं सैकडों गलियां. क्यों सही है?

संघर्ष .......

पिछले कुछ माह से पहले एक प्रशिक्षु के तौर पर ( Intern ) के तौर पर और फिर संघर्ष प्रक्रिया की पूर्ति के लिए नॉएडा - गाजिआबाद - दिल्ली में हूँ ...... हालांकि अब संघर्ष पूर्णता की ओर है पर इस प्रक्रिया में जो कुछ अनुभव किया ......... वो शब्दों में कहना कठिन अवश्य है पर एक प्रयास किया है ! आशा है की वे सारे अग्रज जो इस दौर से गुज़र चुके हैं या वे साथी जो इस से गुज़र रहे हैं ...... इसे महसूस करेंगे ! अनुजो के लिए ये हमारा अनुभव है जो आगे काम आएगा क्यूंकि संघर्ष सफलता के लिए नही बल्कि उसे बनाये कैसे रखना है इसके सबक के लिए होता है !

संघर्ष

आजकल
आज और कल
सुनते ही समय कटता है
दिशान्तरों में
चलते फिरते
आते जाते
युगान्तरों सा दिन निपटता हैं

सुबह घर से रोज़
हर रोज़
निकल कर
लम्बी दूरियां
पैदल चल कर
सूरज की तेज़ किरणों से
चुंधियाती आंखों को मलता
कोने से एक आंसू
टप से निकलता

तेज़ गर्मी में
शरीर की भाप का पसीना
थक कर
हांफता सीना
सिकुडी हुई जेबों में
पर्स की लाश
और
उस लाश के अंगो में
जीवन की तलाश
ख़ुद को हौसला देने को
बड़े लोगों की बड़ी बातें
पर
सोने की कोशिश में
छोटी पड़ती रातें

वो कहते हैं
हौसला रखो बांधो हिम्मत
तुम होनहार हो
संवरेगी किस्मत
ये संघर्ष
फल लाएगा
तू मुस्कुराएगा
बस
थोड़ा समय लेता है
अन्तर्यामी
सबको यथायोग्य देता है

मैं चल रहा हूँ
न तो
उनके प्रेरणा वाक्य
मुझे संबल देते हैं
न ही उनके ताने अवसाद
उनके आशीर्वादों से मैं
प्रफ्फुलित नहीं
न ही
उनकी झिड़की हैं याद

मैं चल रहा हूँ
क्यूंकि
मुझे चलना है
ये चाह नहीं
उत्साह नहीं
शायद यह नियति है
की
मुझे अभी चलना है

सुना है कि
पैरों के छालों के पानी से
जूते के तले के फटने से
जब पैर के तलों का
धरातल से मेल होता है
तब कहीं जा कर
संघर्ष का यज्ञ पूर्ण होता है
वही होती है
संघर्ष के वाक्य की इति
प्रतीक्षा में हूँ
कब होती है
संघर्ष की परिणिती

मयंक सक्सेना

बेगुनाह की आत्मदाह की जवला

धर्मेन्द्र भाई की दिल की बात भड़ास पर पढ़ा। इसको पढ़ने के दो कारण है। पहला धर्मेन्द्र भाई मेरे क्लास मेट है। दूसरा इंदौर की तरह मेरा सतना भी जला। बेगुनाह की आत्मदाह की जवला से ........ दोष किसको दे ? वह एक सच्चा इन्सान था। बस उसकी गलती ये थी, कि बीजेपी के राज में घर में ही छोटी दुकान खोले बैठा था । उसको दिन भर की कमाई की चिंता थी, क्योंकि उसने अपनी भांजी को गोद ले रखा है, जिसकी शादी करनी है, दिन में जो कमा लेता , तो कुछ paisa उसकी शादी के लिए इकठ्ठा हो जाता। उसे क्या पता था ..... उसी के साथ खेल कर बड़े हुए आज उसके दोस्त नही है, बल्कि भाजपाई है .... उन्हें तो बंद से मतलब है । आख़िर आलाकमान का निर्देश है। बंद को सफल बनाना है। चुनाव सर पर है , अब नही मुद्दा उठाएंगे ..... तो आखिर कब उठाएंगे । क्षेत्र का सांसद बीजेपी का , विधायक , सरकार बीजेपी ki। आखिर जब तक उसको समझ आती उससे पहले ही उसने अपने जिन्दगी की किताब हमेशा के लिए बंद कर ली। पुलिस ने भी अपनी नपुंसक तत्परता दिखाई , सब जानते हुए भी अज्ञात लोगो के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। मीडिया द्वारा उसके भाई की बात को बार - बार महत्व दिए जाने के बाद पुलिस ने कुछ नामजद मामले दर्ज किया। वही सतना कलेक्टर, एस पी और डी आई जी rewa ने तो उस समय हद कर दी। मृतक के परिवार से मिलने जाने की वजाय थाने में ही बैठे रहे ।

ब्लागवाणी के तकनीकी कमीनेपन के सच का खुलासा........


नए हिन्दी के ब्लागर रेटिंग से बहुत प्रभावित रहते हैं और इसी कारण से वे एग्रीगेटर का सहारा लेते हैं तो आज लीजिये हमारे ही एक हंदी के नए ब्लागर बंधु ने जो कि ब्लागबुद्धि नाम से ब्लाग लिखते हैं इन्होंने ब्लागवाणी नामक एक निहायत ही वणिक मठाधीशी सोच रखने वाले एग्रीगेटर के तकनीकी कमीनेपन का खुलासा करा है जिसे पढ़ कर आप इन दुष्टों से सावधान हो जाएं। लीजिये मैं यह पूरी पोस्ट यथावत डाल रहा हूं----

ब्लोग्वाणी 'आज की पसंद' के नाम से एक रेटिंग देता है। जिससे बहुत सारे लोग असंतुष्ट रहते हैं। (एक चिंतित हिन्दुसतानी यहाँ देखें) और मैं उन सबसे सहमत हूँ क्यूंकि इस तरह की कोई भी रेटिंग सही मायनों मे बेकार की है जिसे कोई भी ग़लत तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। और इसके लिए किसी भीड़ का होना भी आवश्यक नहीं है। रेटिंग के बारे मे थोडी बहुत जितनी भी तकनीकी जानकारी मुझे है, वो मैं बताना चाहता हूँ।रेटिंग करने में कोई भी वेबसाईट दो चीजों का ध्यान रखता है। पहली ये कि वो आपके ही ब्राउजर पर एक छोटी से फाइल स्थापित करता है जिसे कुकी कहते हैं। और दूसरी कि वो आपका आईपी पता नोट कर लेता है। और हर बार जब आप रेटिंग करते हैं तो वो सबसे पहले आपका कुकी चेक करता है कि कहीं आप पहले ही तो रेट नही कर चुके हैं। लेकिन चूकि ये कुकी आपके ब्राउजर मे स्थापित है, इसे आप थोडी सी तकनीकी जानकारी से मिटा सकते हैं। इसलिए आईपी पता भी नोट किया जाता है। परन्तु बहुत सारे लोग जो किसी कार्यालय या तकनीकी संस्थान से कार्य कर रहे होते हैं, वो एक प्रोक्सी सर्वर के द्वारा इंटरनेट से जुड़े होते हैं। इन मामलो में आप अपना आईपी पता स्वयं परिवर्तित कर पाते हैं।सो, यदि हम अपना आईपी पता परिवर्तित कर सकें। और कुकी को मिटाने कि जानकारी हो तो ऐसे किसी भी रेटिंग प्रणाली को निरर्थक किया जा सकता है।तो यही मैंने किया। परिणाम देखिये:जैसा कि आप उपरोक्त चित्र में देख सकते हैं कि ७ बार पढी गई चीज १० लोगों की पसंद है।थोडी देर में इन्होने वापस मेरी रेटिंग रिसेट कर दी। (शायद प्रोक्सी सर्वर के आईपी के अनुसार) जो कि आपलोगों को सही प्रतीत हो सकता है। लेकिन अब समस्या यहां भी आती है कि जो फोर्मुला मेरे बदले हुए आईपी को थोडी देर बाद मिटा देता है, वो फोर्मुला तो मेरे साथ मेरे संस्थान मे रह रहे ५००० लोगों के आईपी को मिटा देगा। (मतलब उनकी रेटिंग का कोई महत्व ही नहीं?)और अब जाते जाते एक और मजेदार चीज देखिय।एक जगह पोस्ट को २ लोगों की पसंद बता रहे हैं और उसी पृष्ट पर एक जगह ४ की।गोपाला गोपाला! ये कैसा गड़बडझाला?

--:ब्लागबुद्धि से साभार

अंशुमाली का ब्लाग गूगल ने किया लाक


भाई यशवंत जी
एक समस्या आन खड़ी हुई है। गूगल ने मेरा ब्लॉग लॉक कर दिया है। इस मेल के साथ मैं वो प्रिंट-स्क्रीन भी भेज रहा हूं जोकि मेरे ब्लॉग पर दिखाई दे रही है। पोस्ट नहीं दे पा रहा हूं। क्या करूं। कोई समाधान हो तो बताएं। हां गूगल की समीक्षा के लिए मैंने अपनी स्वीकृति दे दी है ४ जुलाई को ही। उत्तर की प्रतिक्षा में।
आपका
अंशुमाली
(अंशुमाली भाई, मैं तो खुद स्तब्ध हूं आपका मेल पढ़कर। ये गूगल ने क्यों किया? हो सकता है आपकी तरह किसी दिन भड़ास पर भी ऐसी ही गाज गिर जाए। आपका मेल पढ़कर तो हम भड़ासियों को यह सोच के रखना चाहिए कि एक दिन भड़ास भी इसी तरह किसी साजिश का शिकार बनाकर बंद कराया जा सकता है। आपको मेरी सलाह यही है कि गूगल से पत्राचार करें और पत्राचार को जारी रखें। मैं इस मामले में आपकी तरह ही अज्ञानी हूं। मैं आपका पत्र इसलिए डाल रहा हूं ताकि कोई प्रबुद्ध ब्लागर आपकी मदद तो करे ही, हम सभी लोगों का ज्ञानवर्द्धन भी करे। आभार के साथ, यशवंत)

आख़िर भड़ास पर छपी टी वी चैनल की ख़बर

बहुत खुशी हुई की किसी ने झारखण्ड और बिहार में पत्रकारों की बदहाल स्तिथि पर भड़ास में आवाज़ उठाई , खास कर झारखण्ड में खुल रहे एक उपग्रह चैनल जो की कोलकत्ता की एक बड़ी ग्रुप द्वारा खोला जा रहा है । चैनल की बदहाल स्तिथि पर मैंने बहुत पहले लिखा था पर अब मेरी बात को जुबान मिलने लगा है । हाल ही में इस चैनल के ऐ चार हेड और सीईओ आपस में भीड़ गए । लातम जूतम हुई । सीईओ साहब की तो यहाँ मनमानी चलती ही है । इसी मनमानी के शिकार न्यूज़ एडिटर भी हुए । उन्हें भी नौकरी से हाथ गवानी पड़ी । हलाकि न्यूज़ एडिटर और ऐ चार भी दूध के धुले नही हैं । सीईओ के साथ मिलकर उन्होंने भी कईयों को बाहर का रास्ता दिखा दिया । पत्रकारिता की शुरुआत कर रहे युवाओ को धमकी भरा ईमेल भेजा गया। एक को तो न्यूज़ एडिटर ने यह भी कहा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर आप रजत शर्मा नही बन जायेंगे काम करना है तो कीजिये नही तो यहाँ से जाइये । फिर कुछ दिन बाद ही उस युवा को मीटिंग में लज्जित कर निकाल दिया गया। ऐसा नही था की वह अयोग्य था , लेकिन उसकी गलती थी की उसने सीईओ की ग़लत नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई थी । ऐसे में जरा सोचिये उस युवा पर क्या बीती होगी ? पत्रकारिता के शुरुआत में ही मीडिया के दलालों ने उसकी मानसिकता पर क्या प्रभाव डाला होगा ?खैर खुशी हुई की किसी ने नामी ब्लॉग "भड़ास " में इस चैनल में हो रही गतिविधिओं की जानकारी दी । इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

साक्षात्कारः भड़ास के आने से नकली गंभीरता, हिप्पोक्रेसी और गुडी गुडी का दौर खत्म हुआ


अंडरलाइन नामक एक मैग्जीन में ब्लागिंग और भड़ास को लेकर एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ है। उसे भाई भड़ासियों तक पहुंचाने के लिए इसे यहां डाल रहा हूं। उपरोक्त चित्र पर क्लिक करके आप इसे पूरा पढ़ सकते हैं।
जय भड़ास
यशवंत

शुक्रिया भास्कर, धर्मेंद्र की संवेदना को इंदौर वालों तक पहुंचाने के लिए


भड़ास पर पांच जुलाई को धर्मेंद्र चौहान की प्रकाशित पोस्ट क्या हो गया मेरे इंदूर को दैनिक भास्कर, इंदौर ने भड़ास को क्रेडिट देते हुए प्रथम पेज पर प्रकाशित किया है। आप उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक करके पूरा पढ़ सकते हैं। यह पोस्ट धर्मेंद्र ने खुद के शहर इंदौर से दूर रहते हुए इंदौर के हालात पर दुखी होकर लिखा था और इसे भड़ास ने अपने यहां प्रमुखता से स्थान दिया था। दैनिक भास्कर, इंदौर को हम धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने इंदौर शहरवासियों को उस शहर से प्यार करने वाले पर दूर बसे एक पत्रकार की भावनाओं से रुबरू कराकर मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया।

जय भड़ास

यशवंत

कविता का उत्सव बन गया एक आयोजन



आज की इस भागदौड़भरी जिंदगी में कुछ लम्हें कविता के जी लेना अपने आप में स्थित होना है। अपने से हौलो-हौले बतियाना है। राजधानी के काव्यरसिकों को कविता के कुछ ऐसे ही क्षण उपलब्ध कराए पं. रामप्रसाद बिस्मिल फाउंडेशन ने, महात्मा गांधी शांति प्रतिष्ठान में। रविवार का अवकाशभरा दिन। मानो श्रोताओं का मन ही रविवार हो रहा था। रिमझिम फुहारों से जहां वातावरण कवितामय हो रहा था वहीं सभागार में कविता की रसभावन फुहारों से कविता स्वयं कविता से बतिया रही थी। कविता की हर अच्छी पंक्ति पर जीवंत श्रोताओं की मिल रही दाद से कवियों का उत्साह बढ़ रहा था, वहीं धीरे-धीरे कवि सम्मेलन का आयोजन किवता-दर-किवता अपनी ऊंचाइयों को छूता जा रहा था। भगवान सिंह हंस ने जब पंक्षी उड़ता जाता है,गीत सुनाकर वातावरण को एक गीतात्मक प्रारंभ दिया तो वहीं दूसरी ओर अरविंद चतुर्वेदी ने दुमदार दोहे पढ़कर वातावरण को खुशनुमा बनाया। डा. मधु चतुर्वेदी ने गजलें सुनाकर एक अदभुत समां बांध दिया तो वहीं भड़ास शिरोमणि यशवंत ने जागो..रे जागो..गीत सुनाकर समारोह में एक नई जान फूंक दी। संचालन कर रहे पुरुषोत्तम.एन.सिंह ने सूरत तेरी रेशम-रेशम गीत सुनाकर जहां रेशमी संवेदवाओं से माहौल को लवरेज कर दिया तो वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध कवि पं. सुरेश नीरव ने ग्लोबलवार्मिंग और अणुधर्मी आतंक के विरुद्ध अपने गीत सुनाकर कविता के इस अप्रतिम अनुष्ठन को अभिव्यक्ति का एक सुखद उत्सव बना दिया- टूटती ओजोन पर्तें रोज़ आसमानों में,आतिशों की बारिस है प्यास के तराने हैं डूबते जहाजों पर तैरते खजाने हैं और फिर आध्यात्मिक प्रतीकों के गीत श्लोक अधर मंत्र-सी आंखें,देवालय-सा तन, रामायण-सा रूप तुम्हारा सांसें वृंदावन सुनाकर पूरी महफिल को एक मुकद्दस पाकीजगी से भर दिया। अरविंद पथिक ने भी इस बार वीर रस की कविताएं न पढ़कर गीत सुनाए। अन्य कवियों में रजनी कांत राजू, रमाकांत पूनम और यशवर्धन ने भी कविताएं पढ़ीं। इस अवसर पर भोपाल से आए वीरेद्र सिंह ने हवा मान जाएगी ओर शहीदो के लिए कविताएं पढ़कर जहां वातावरण को फिर एक नया रंग दिया तो भोपाल के ही सतीश चतुर्वेदी ने सत्यं-शिवं-सुंदरं कविता पढ़करआयोजन को एक नया तेवर दे दिया। अंत में जयपुर से आये युवा गीतकार शिव दर्शन ने वंदे मातरम रचना का गायन कर शब्द के इस सात्विक अनुष्ठान को सार्थक पूर्णविराम दिया। इस अवसर पर भड़सी बंधुओं की उपस्थितिने कार्यक्रम की सार्थकता को और बढ़ाया।
प्रस्तुतिः मृगेन्द्र मकबूल

ताऊ हुआ परेशान, भडासी ले गए इलाज कराने

आदरणीय सुल्तानपुर के बदतमीज, बदतहजीब, बददिमाग,बदमिजाज, बदअक्ल, बदशक्ल, बेवफा, बेहया, बेगैरत, बेमुरौव्वत, बदजुबान,बदगुमान शख्स पंडीत जगदिश जी त्रिपाठी जी को ताउ की सुबह सुबह प्रणाम !
इब आप पुछोगे कि बिना बात सुबह सुबह क्या प्रणाम ?तो भाइ नाराज क्यु हो रे हो ?ताउ को आज सुबह सुबह सपना आ गया कि ताउ वाइरल फीवर से तडपरहा है ! और भडासाधीश यशवंत जी , परम पंडीत जगदीश जी त्रिपाठी ,और अपनै संत शिरोमणी नीरव जी ताउ को दिखाने परम भडासी डा. श्रीवास्तव जी के पास पहुंच गये ! वहा जाकर -----
ताउ--अरे भाइ डाग्दर साब कोई ऐसी दवाइ दो जिससेमैं मर भी जाउ ओ वापस जिंदा हो जाउ ! क्युंकी मेरा मन इन भडासिया मे लग्या हुया सै ! और इबी मेरी मरण की इच्छा कोनी !
डाक्टर श्रीवास्तव -- अरे ताउ तन्नै सुबह सुबह मैं ही मिल्या था के ?अरे मैं तो जिंदा नै अच्छी तरिया जिंदा रख सकु हूँ ! अगर तन्नै मर के जिंदा ही होणा सै तौ मेरे धोरै के करण आया सै ?चल निकल ले एकता कपूर के पास !
इब थम बताओ ताउ का फीवर कुण तारेगा ?ताउ घणा परेशान सै !

7.7.08

क्या इस अखिल विश्व में हम दोयम दर्जे के है ?

क्या इस अखिल विश्व में हम दोयम दर्जे के है ? यह सवाल मेरे मन में तब उत्पन्न हुआ जब मै अपने देश से बाहर निकला हम भारतीय जो की ओबामा को जीत का सेहरा पहना सकने के हैसियत रखते है वो क्या दूसरे देशों में निकृष्ट व्यवहार के काबिल है यह एक ज्वलंत मुद्दा है क्या हम अपनी काबलियत को दूसरों के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे या अपना देश हमें ऐसे मौके देगा की जो हम दूसरो को देते है वो उसे दे सकें एक सवाल मै सभी भड़ासियों के लिए छोड़ता हूँ भड़ासी भाइयों मुझे पोस्ट लिखने का अनुभव नही है परन्तु आपके विचारों ( बुरे हो तो ज्यादा अच्छा है ) का स्वागत करूँगा और कुछ और सीख सकूँगा

संवेदनाओं के मकड़जाल

रोज मेरे हाँथ में होता है-
एक कोरा काग़ज़,
जिसपर बनाने की कोशिश करता हूँ-
मैं कोई आकृति-
जिसमे दिखूं मैं, मेरी सोच,
खीचता हूँ ढेर सारी रेखाएं
कुछ छोटी, कुछ लंबी-
कुछ संवेदनाओं के मकड़जाल की तरहउलझी हुई-
एक में गुत्थम-गुत्था.
रंग भी भरता हूँ,
हर तरह के-
हर एक प्रतीकों केरंग
सोच के रंग,मंथन के रंग,
झुझलाहट के रंग-
फ़िर अंत में देखता हूँ एक ऐसी तस्वीर,
जिसमें कुछ नहीं दिखता,
कुछ समझ में नहीं आता।
न उन आड़ी तिरछी रेखाओं का mahatva ,
न ही उनका मतलब.
रंग भी कुछ नहीं कह paate
sunn हो जाते हैं, बिल्कुल निशब्द.
एक सन्नाटा पसर जाता है
कुछ टूट जाता है achanak
waqt दहाडें मारते हुए गुजर जाता है
train की तरह, धड धड धड
कुछ अनसुना रह जाता है-
एक निर्जन पुल की कराह की तरह